हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गिरीश मिश्र के लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है

Posted by Reyaz-ul-haque on 6/04/2010 06:30:00 PM

सदानंद शाही के संपादन में निकलने वाली पत्रिका साखी के 20वें अंक में छपे अपने (मूलतः अंगरेजी में लिखे) पत्र में, अर्थशास्त्र के प्राध्यापक और आर्थिक इतिहासकार गिरीश मिश्र ने रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय के कार्यों पर गंभीर टिप्पणियां की थीं. इस पर रविभूषण जी ने एक जवाब लिखा है, जिसे हम यहां पेश कर रहे हैं. यह लेख प्रभात खबर में संपादकीय पन्ने (अभिमत) पर भी छपा है. जल्दी ही मैनेजर पांडेय से एक बातचीत (बातचीत का मुद्दा यह पत्र नहीं है) भी हाशिया पर पेश करेंगे.

हिंदी आलोचना का नया बखेड़ा
हिंदी में विगत कुछ वर्षों से आलोचना के नाम पर कई लोग अगंभीर टिप्पणियां कर रहे हैं. फालतू और विवेकहीन टिप्पणी पर कोई 'बहस' नहीं हो सकती. कई वर्षों से अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र का एकसूत्री अभियान विख्यात आलोचक रामविलास शर्मा की निंदा का है. उनके इस निंदा अभियान में हिंदी के कई अध्यापक, संपादक और आलोचक भी हैं. रामविलास शर्मा की स्थापनाओं से असहमत व्यक्तियों को तथ्य-तर्क के साथ अपने विचार प्रस्तुत करने चाहिए. संवाद और बहस की गुंजाइश बनी रहेगी.
अभी हिंदी की एक अनियतकालीन पत्रिका 'साखी' (अप्रैल 2010) के संपादक ने 'बहस' के लिए आलोचक पीएन सिंह को लिखा गया गिरीश मिश्र का पत्र प्रकाशित किया है. 'बहस' के लिए प्रकाशित इस पत्र का शीर्षक है 'हिंदी आलोचना में बचकाना मर्ज'. संपादक महोदय के अनुसार पत्र लेखक ने 'इस पत्र में हिंदी आलोचना के परिदृश्य पर चिंता प्रकट करते हुए कुछ महत्वपूर्ण और विवादास्पद सवाल उठाये हैं.' सच्चाई यह है कि इस पत्र में आलोचना से संबंधित एक भी सवाल नहीं है.
पत्र लेखक पीएन सिंह से 'पूरी तरह अजनबी' हैं. चार वर्ष पहले हिंदी के एक दैनिक समाचार पत्र में पीएन सिंह का एक लेख 'टकराव आलोचना के शिखर पर- नामवर का मैनेजरी पाठ' प्रकाशित हुआ था. इसी लेख ने पत्र लेखक को पत्र लिखने के लिए उकसाया. यह लेख प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पांडेय के इंटरव्यू की प्रतिक्रिया में था. चार वर्ष पहले गोरखपुर में जिस संवाददाता ने यह इंटरव्यू लिया था उसने उसे विकृत कर प्रकाशित किया. संवाददाता ने अपनी ओर से यह लिखा कि समकालीन आलोचना में नामवर सिंह की हैसियत क्या है. इस पर काफी हल्ला-हंगामा हुआ. गोरखपुर से बनारस तक. पीएन सिंह ने अपनी पत्रिका के संपादकीय में इस पर लिखा. मैनेजर पांडेय ने उन्हें यह बताया कि उस समय गोरखपुर में एक और दैनिक हिंदी पत्र के संवाददाता ने उनका इंटरव्यू लिया था, जिसे वे देखें. पीएन सिंह ने उस दूसरे इंटरव्यू को देखा-पढ़ा और अपनी पत्रिका में खेद भी प्रकट किया.
अब गिरीश मिश्र के पत्र को चार वर्ष बाद किस नीयत से प्रकाशित किया गया है? गिरीश मिश्र ने लिखा है, 'मैंने हिंदी भाषा और साहित्य का ज्ञान नहीं प्राप्त किया और न ही मैं डॉ नामवर सिंह के योगदान का मूल्यांकन करने में सक्षम हूं.' आलोचना उनके लिए 'हमला' है. नामवर सिंह की आलोचना करनेवाले हिंदी के लेखक उनके अनुसार 'हीन-भावना और ईर्ष्या से पीड़ित होते हैं.' और 'उनके लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है.' स्वयं उनके पत्र में 'अज्ञान और उद्दंडता का यह मिश्रण' वहां दिखाई देता है, जहां वे मैनेजर पांडेय और रामविलास शर्मा पर टिप्पणी करते हैं. वे किताब नहीं, उसकी 'फ्लैप टिप्पणी' पढ़ कर राय बनाते हैं. मैनेजर पांडेय की 'ताजा किताब' 'आलोचना की सामाजिकता' (2005) देख कर (पढ़ कर नहीं!) 'मुझे लगा कि उन्हें शुद्ध हिंदी लिखने भी नहीं आती और किताब की फ्लैप टिप्पणी से उनकी उद्दंडता की पुष्टि होती है.' 'फ्लैप टिप्पणी' पढ़ कर टिप्पणी करना आलोचना नहीं है. प्रकाशक 'फ्लैप टिप्पणी' लिखवाता है. गिरीश मिश्र 'रामविलास शर्मा के भक्तों' में से किसी का नाम नहीं लेते और उसकी संख्या वृद्धि की 'एक वजह नामवर सिंह की निंदा करने की आकांक्षा भी' मानते हैं.
वे 'एक वजह' पर अड़ कर अन्य कई वजहों की अनदेखी करते हैं. नामवर सिंह के महत्व और अवदान से भलीभांति अवगत लोगों की संख्या कम नहीं है. गिरीश मिश्र के जरिये नामवर सिंह को नहीं जाना जा सकता. डॉ राम विलास शर्मा के साहित्यिक लेखन से गिरीश मिश्र अपरिचित हैं. 'न तो उसे मैंने पढा़ है न अब मेरे पास इसका समय है.' इस ईमानदार कथन की प्रशंसा की जानी चाहिए, पर रामविलास शर्मा की 'कुछ साहित्येतर किताबें' पढ़ कर उन्होंने जो लिखा है, उसकी निंदा और भर्त्सना भी की जानी चाहिए. वे 'कुछ साहित्येतर किताबों' को 'निहायत लद्धड़' कहते हैं.
डॉ शर्मा के 'गांधी, अंबेडकर, लोहिया और आर्यों की उत्पत्ति संबंधी उनके लेखन में' 'गहरे अध्ययन' और मौलिक शोध' का अभाव देखते हैं. और 'मार्क्स की रचना' 'पूंजी' भाग दो के' रामविलास शर्मा द्वारा किये गये अनुवाद को 'भयावह' कहते हैं. उनके अनुसार डॉ शर्मा को क्लैसिकल अर्थशास्त्र का ज्ञान नहीं है और 'विशेष तौर पर मार्क्स के रवैये का भी नहीं. और अंत में उनका यह कथन है 'भारत में अंगरेजी राज का दो खंडों में किया गया अध्ययन उनकी अयोग्यता का प्रतीक है.' ऐसे फतवों से गिरीश मिश्र की योग्यता जाहिर होती है! पूरनचंद्र जोशी ने 'गांधी, अंबेडकर और लोहिया' ग्रंथ को 'भारतीय सामाजिक चिंतन का एक मार्गदर्शी मौलिक ग्रंथ' कहा है. इस पुस्तक को पढ़ने के बाद उन्होंने लिखा- 'आया था हंसी उडा़ने लेकिन ठहर गया वंदना करने'. वे रामविलास शर्मा को 'बहुआयामी प्रतिभावाले रेनेसां काल के मार्क्सवादी बुद्धिजीवी' कहते हैं. गिरीश मिश्र को यह पता नहीं है कि उन्होंने जिनको पत्र लिखा है, वे पीएन सिंह रामविलास शर्मा को 'भारतीय लूकाच' कहते हैं और गांधी, लोहिया संबंधी उनके अध्ययन को 'वर्तमान राजनीतिक सामाजिक विमर्श में एक गंभीर हस्तक्षेप मानते हैं. रामविलास शर्मा का अध्ययन, विवेचन और निष्कर्ष गिरीश मिश्र जैसे 'आर्थिक इतिहासकार' फूंक कर नहीं उडा़ सकते. बालजाक पर उन्होंने अपनी पुस्तक नामवर सिंह को समर्पित की है. इसके कई वर्ष पहले मैनेजर पांडेय ने अपनी पुस्तक 'साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका' (1989) डॉ नामवर सिंह को 'सादर समर्पित' की थी. उन्होंने 'नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि' लेख (1977) में नामवर की प्रमुख कृतियों की चर्चा की थी और चौबीस वर्ष बाद 2001 में 'नामवर के निमित्त' संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त किये हैं, जो इसी निबंध में प्रकाशित हैं. पीएन सिंह ने अपनी नयी पुस्तक का नाम रामविलास शर्मा की पुस्तक, 'गांधी, अंबेडकर और लोहिया' के नाम पर रख लिया है, जबकि उनकी पुस्तक इन तीनों पर केंद्रित नहीं है. वह समीक्षा संग्रह है.
'साखी' पत्रिका का संपादन वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने दिल्ली से आरंभ किया था. वे इसके प्रधान संपादक हैं. उनसे संपादक परामर्श नहीं करते. उनका पत्रिका से नाम मात्र का संबंध है. संपादक मंडल के पहले सदस्य पीएन सिंह हैं, जिन्होंने अपने नाम लिखे गये पत्र का प्रकाशन जरूरी समझा. दूसरे सदस्य अवधेश प्रधान ने संपादक को यह पत्र प्रकाशित करने से मना किया था. पत्र छपने पर अवधेश प्रधान ने संपादक मंडल से इस्तीफा दे दिया है. नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह का 'साखी' के इसी अंक में उन पर प्रकाशित एक लेख है. लेख के अंत में विजय प्रकाश सिंह ने हरिशंकर परसाई के व्यंग्य 'पहला सफेद बाल' की पंक्तियां उद्धृत की हैं- 'बडे़ आदमियों के दो तरह के पुत्र होते हैं- वे जो वास्तव में हैं, पर कहलाते नहीं हैं और वे जो कहलाते हैं, पर हैं नहीं... होने से कहलाना ज्यादा लाभदायक है.' विजय प्रकाश सिंह की चिंता और गिरीश मिश्र, पीएन सिंह एवं सदानंद शाही की चिंताएं एक नहीं हैं. विजय प्रकाश सिंह ने लिखा है 'अगर समझने का दावा करने वाले और 'कहलानेवाले' पुत्र उनकी घोषित पुस्तकों का काम लग कर पूरा करवा देते तो शायद पिताजी भी अपने अंतर्मन की बात कह पाते.'

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  1. 7 टिप्पणियां: Responses to “ गिरीश मिश्र के लेखन में अज्ञान और उद्दंडता का मिश्रण दिखाई पड़ता है ”

  2. By Girish Mishra on June 20, 2010 at 7:45 PM

    Mr. Ravibhushan is an ignoramus. He should read my letter to his editor Harvansh in which I have proved that he is a hireling of somebody. He must know that I do not believe in feet touching and bowing with folded hands. Dr. Sharma's books are full of howlers and his translation of Capital Vol. II is nothing but garbage and I am ready to prove this. His claim that the Aryans originally belonged to India shows his total ignorance. His book Bharat Mein Angrezi Raj was reviewed by me in Alochana when he was alive and he wrote to me a friendly letter.
    Ravibhushan should have produced the text of my letter along with his comments.

  3. By Anonymous on July 11, 2010 at 9:30 AM

    लगता है गिरीश मिश्र हिंदी तक नहीं जानते, वरना अपना पत्र अंग्रेजी में क्यों लिखते। ऐसे मूर्ख को रामविलास शर्मा जैसे महान चिंतक पर टिप्पणी करने का अधिकार ही नहीं है।

    मैंने रामविलास शर्मा की लगभग सभी किताबें पढ़ी हैं और व्यक्तिगत राय दे सकता हूं कि हिंदी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में उनके जैसा विचारक नहीं हुआ है।

    भारतीय इतिहास और राजनीति की अनेक गुत्थियां उनकी पुस्तकें पढ़कर मेरे लिए सलझी हैं और मैं मानता हूं कि भारत के हर युवक को उनकी किताबों का अध्ययन करना चाहिए। इससे उनमें न केवल देश भक्ति की भावना जगेगी बल्कि वे देश सुधार के ठोस कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की ओर अग्रसर भी होंगे।

    रामविलास शर्मा सत्य के अन्वेषक थे और देश हित उनकी सर्वोपरि कसौटी था। इसलिए उन्होंने कूड़ा लिखने वाले और विदेशी हितों के पोषक अनेक नामी-गरामी लेखकों पर स्पष्ट वक्तव्य दिए हैं, जिनके कारण उनके ही समय में उनके अनेक शत्रु हो गए थे।

    उदाहरण के लिए उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय, नावमर सिंह, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव आदि पर अत्यंत व्यंग्यात्मक और उपहासापूर्ण टिप्पणियां लिखी हैं। ये सब तथा इनके चेले-चपाटे हिंदी के लिए उनके द्वारा छोड़ी गई महान विरासत को नकारने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए हैं। पर सत्य और सच्चे पांडित्व पर धूल डालने से वह ढक नहीं जाता है। कोई न कोई ईमानदार सत्यान्वेषी उनका असली महत्व पहचान ही जाता है।

    रामविलास शर्मा अपने समय के बहुत आगे की सोचते थे। उन्हें ठीक से समझने के लिए अध्ययन की आवश्यकता है। आजकल के अंग्रेजीदां प्रोफेसरों में न तो उन्हें समझने के लिए आवश्यक अक्ल ही है न समय ही।

    युवा साहित्यकार और देश भक्त ही उनके स्तर की विचारों के प्रति न्याय कर सकते हैं।

    जब तक हिंदी और भारत का अस्तित्व रहेगा, रामविलास शर्मा के विचार प्रासंगिक बने रहेंगे और युवा जन उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे।

    भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में गढ़ने के लिए भी उनके विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं।

    आर्यों के संबंध में डा. शर्मा ने जो विचार व्यक्त किए हैं, वे मात्र सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि एक रणनीति है, भारत के जातीय एकीकरण के लिए, और भारतीय समाज को साम्राज्यवादी विष से मुक्त करने के लिए।

    अंग्रेजों ने भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखने के लिए आर्यों और द्रविडों की कहानी गढ़ी थी। डा. शर्मा ने देश के एकीकरण के विचार से उस पर से पर्दा उठा दिया।

    यह मोटी बात कम अक्ल गिरीश जैसे लोगों को कैसे समझ आएगी, जो हिंदी तक नहीं जानते?

    वेदों के संबंध में रामविलास शर्मा ने जो विचार रखे हैं, वे हिंदू सांप्रदायवादियों से इस महान ग्रंथ को छीनकर उसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को स्पष्ट करने के विचार से किया गया है।

    रामविलास शर्मा ने मार्क्स के विचार को प्रचारित करने लिए भगीरथ प्रयत्न किया क्योंकि वे मानते थे कि यह दर्शन भारत के गरीब जनों को ऊपर उठा सकता है।

    आज साठ साल के बाद भी भारत में 60 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, यह एक तथ्य यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि मार्क्स के विचार भारत के लिए कितने प्रासंगिक हैं और डा. शर्मा की सूझबूझ कितनी सही है।

    आज माओवादी अपने ढंग से मार्क्स के सिद्धांतों को लागू कर रहे हैं। यदि वे सफल हुए, तो यह भारत के गरीबों के लिए एक महान उपलब्धि होगी।

    गिरीश, तुम्हें मेरी सलाह। बाकी सब काम बंद कर दो और अपने बचे हुए जीवन के वर्ष डा. शर्मा की रचनाओं के अध्ययन में लगा दो। इससे तुम्हारा भी भला होगा, और देश के एक महान सपूत पर कीचड़ उछालने की मीर जाफरी से भी तुम बरी हो जाओगे। और हो सके तो डा. शर्मा के विचारों को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने में तुमसे जो हो सके करो, यही तुम्हारे लिए सही प्रायश्चित होगा ऐसे महान व्यक्ति पर अकारण छींटा-कशी करने के महापाप का।

  4. By Anonymous on July 11, 2010 at 9:32 AM

    1.

    लगता है गिरीश मिश्र हिंदी तक नहीं जानते, वरना अपना पत्र अंग्रेजी में क्यों लिखते। ऐसे मूर्ख को रामविलास शर्मा जैसे महान चिंतक पर टिप्पणी करने का अधिकार ही नहीं है।

    मैंने रामविलास शर्मा की लगभग सभी किताबें पढ़ी हैं और व्यक्तिगत राय दे सकता हूं कि हिंदी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में उनके जैसा विचारक नहीं हुआ है।

    भारतीय इतिहास और राजनीति की अनेक गुत्थियां उनकी पुस्तकें पढ़कर मेरे लिए सलझी हैं और मैं मानता हूं कि भारत के हर युवक को उनकी किताबों का अध्ययन करना चाहिए। इससे उनमें न केवल देश भक्ति की भावना जगेगी बल्कि वे देश सुधार के ठोस कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की ओर अग्रसर भी होंगे।

    रामविलास शर्मा सत्य के अन्वेषक थे और देश हित उनकी सर्वोपरि कसौटी था। इसलिए उन्होंने कूड़ा लिखने वाले और विदेशी हितों के पोषक अनेक नामी-गरामी लेखकों पर स्पष्ट वक्तव्य दिए हैं, जिनके कारण उनके ही समय में उनके अनेक शत्रु हो गए थे।
    ... 2 में जारी

  5. By Anonymous on July 11, 2010 at 9:33 AM

    2.
    उदाहरण के लिए उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय, नावमर सिंह, राहुल सांकृत्यायन, रांगेय राघव आदि पर अत्यंत व्यंग्यात्मक और उपहासापूर्ण टिप्पणियां लिखी हैं। ये सब तथा इनके चेले-चपाटे हिंदी के लिए उनके द्वारा छोड़ी गई महान विरासत को नकारने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए हैं। पर सत्य और सच्चे पांडित्व पर धूल डालने से वह ढक नहीं जाता है। कोई न कोई ईमानदार सत्यान्वेषी उनका असली महत्व पहचान ही जाता है।

    रामविलास शर्मा अपने समय के बहुत आगे की सोचते थे। उन्हें ठीक से समझने के लिए अध्ययन की आवश्यकता है। आजकल के अंग्रेजीदां प्रोफेसरों में न तो उन्हें समझने के लिए आवश्यक अक्ल ही है न समय ही।

    युवा साहित्यकार और देश भक्त ही उनके स्तर की विचारों के प्रति न्याय कर सकते हैं।

    जब तक हिंदी और भारत का अस्तित्व रहेगा, रामविलास शर्मा के विचार प्रासंगिक बने रहेंगे और युवा जन उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे।

    भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में गढ़ने के लिए भी उनके विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं।
    ... 3 में जारी

  6. By Anonymous on July 11, 2010 at 9:33 AM

    3.
    आर्यों के संबंध में डा. शर्मा ने जो विचार व्यक्त किए हैं, वे मात्र सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि एक रणनीति है, भारत के जातीय एकीकरण के लिए, और भारतीय समाज को साम्राज्यवादी विष से मुक्त करने के लिए।

    अंग्रेजों ने भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखने के लिए आर्यों और द्रविडों की कहानी गढ़ी थी। डा. शर्मा ने देश के एकीकरण के विचार से उस पर से पर्दा उठा दिया।

    यह मोटी बात कम अक्ल गिरीश जैसे लोगों को कैसे समझ आएगी, जो हिंदी तक नहीं जानते?

    वेदों के संबंध में रामविलास शर्मा ने जो विचार रखे हैं, वे हिंदू सांप्रदायवादियों से इस महान ग्रंथ को छीनकर उसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को स्पष्ट करने के विचार से किया गया है।

    रामविलास शर्मा ने मार्क्स के विचार को प्रचारित करने लिए भगीरथ प्रयत्न किया क्योंकि वे मानते थे कि यह दर्शन भारत के गरीब जनों को ऊपर उठा सकता है।

    आज साठ साल के बाद भी भारत में 60 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, यह एक तथ्य यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि मार्क्स के विचार भारत के लिए कितने प्रासंगिक हैं और डा. शर्मा की सूझबूझ कितनी सही है।

    आज माओवादी अपने ढंग से मार्क्स के सिद्धांतों को लागू कर रहे हैं। यदि वे सफल हुए, तो यह भारत के गरीबों के लिए एक महान उपलब्धि होगी।

    गिरीश, तुम्हें मेरी सलाह। बाकी सब काम बंद कर दो और अपने बचे हुए जीवन के वर्ष डा. शर्मा की रचनाओं के अध्ययन में लगा दो। इससे तुम्हारा भी भला होगा, और देश के एक महान सपूत पर कीचड़ उछालने की मीर जाफरी से भी तुम बरी हो जाओगे। और हो सके तो डा. शर्मा के विचारों को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने में तुमसे जो हो सके करो, यही तुम्हारे लिए सही प्रायश्चित होगा ऐसे महान व्यक्ति पर अकारण छींटा-कशी करने के महापाप का।

  7. By Ravi on August 6, 2010 at 1:03 PM

    ravi bhushan ji should mind his language....he is calling someone 'moorkh'. is this his hindi samskar. what does he know about Dr. mishra. He is one of the gratest economist of this country. ravi bhushan ji, asman mein dhela mat feinkiye, sir phoot jayega.

    ravi pandey
    delhi

  8. By Ravi on August 6, 2010 at 1:05 PM

    ravi bhushan ji should mind his language....he is calling someone 'moorkh'. is this his hindi samskar. what does he know about Dr. mishra. He is one of the greatest economist of this country. ravi bhushan ji, asman mein dhela mat feinkiye, sir phoot jayega.

    ravi pandey
    delhi

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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