हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह जश्न, यह गीत किसी को बहुत हैं…

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/18/2010 04:02:00 PM

जो कल तक हमारे लहू की खामोश नदी में तैरने का अभ्यास करते थे.

आपने पोस्कोविरोधी आंदोलन पर क्रूरतम पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करती हुई एक अपील हाशिया पर पढ़ी. नीचे हम इस कार्रवाई की एक और भर्त्सना पेश कर रहे हैं.यह टिप्पणी फेलिक्स पाडेल की है. फेलिक्स चार्ल्स डार्विन के पड़पोते हैं और अपनी आदिवासी पत्नी के साथ पिछले 17 वर्षों से दक्षिण-पश्चिमी उड़ीसा के एक गांव में रह रहे हैं. फेलिक्स ऑक्सफोर्ड और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़े और प्रशिक्षित एक स्वतंत्र नृतत्वशास्त्री हैं. उनकी पहली किताब में आदिवासी समाज पर औपनिवेशिक संरचना को थोपे जाने के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है. उनकी नई किताब- सैक्रीफाइसिंग पीपुलः इनवैशन ऑफ ए ट्राइबल लैंडस्केप- ओरियंट ब्लैकस्वान से प्रकाशित हुई है.

प्यारे साथियों
अपने सामने उड़ीसा में कलिंगनगर और पोस्को विरोधी आंदोलनों पर क्रूर हमले होते देखना बेहद पीड़ाजनक है. यही कहानी पूरे मध्य आदिवासी भारत में दोहराई जा रही है. यह पीड़ा सिर्फ इसलिए नहीं है कि औरतें, मर्द और बच्चे अपनी हर चीज को जोखिम में डाल कर अपनी जमीन पर कारपोरेट के कब्जे के खिलाफ एक शानदार एकता और अहिंसा के साथ उठ खड़े हुए हैं, बल्कि इसलिए भी कि पुलिस और गुंडों द्वारा छेड़ी गई इस राजकीय हिंसा में भविष्य के अत्याचारों की आशंकाएं छिपी हैं और ये कार्रवाइयां माओवादी विद्रोहियों के लिए नए लोगों की भर्ती को सुनिश्चित करेंगीं.
जो हो रहा है उसे समझने के लिए हमें एक ही साथ मध्य वर्ग के बहुत सारे लोगों के उस भोले विश्वास को- जो यह मानते हैं कि ये विदेश संपोषित उद्योग वास्तव में सबकी समृद्धि के द्वार खोलेंगे- और दूसरी तरफ किसानों के उस अविश्वास को जिनके परिवार हमेशा इस डर के साथ जीते आए हैं कि सरकारी कर्मचारी आतंक मचा सकते हैं, समझने की जरूरत है.
कैसे कोई भी ’सभ्य' व्यक्ति जमीन के प्रति और उन लोगों को प्रति जो इस पर खेती करते हैं, इस तरह का असम्मान दर्शा सकता है? जब गांव के लोग टाटा और पोस्को के अरबों रुपए के प्रचार तंत्र के मुस्कुराते हुए चेहरे के पीछे छिपी निर्मम असलियत को देखते हैं और देखते हैं कि उनकी जमीन और समुदाय को खत्म किया जा रहा है, जिसे बचाने के लिए वे पीढ़ियों से संघर्ष करते आए हैं, तब उन्हें अपनी खीझ और गुस्से को किस पर उतारना चाहिए?

फेलिक्स पाडेल

इस कार्रवाई के वीडियो देखें




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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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