हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

हमरी अटरिया पे आओ संवरिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/31/2010 01:41:00 PM

कभी कभी कुछ गीत कितनी पुरानी यादों को छेड़ देते हैं. उस रात जब उमा (अचानक, जिसकी मैं अपेक्षा भी नहीं कर रहा था) ने यह गीत सुनाया तो हमें पटना के वे दिन याद आ गए, जब प्रभात खबर के दफ्तर के सामने अजय जी (जो तब प्रभात खबर के संपादक हुआ करते थे) के साथ फुटपाथ पर बैठ कर देर तक यह गीत गुनगुनाया करते थे. कभी यह गीत जब उन्हें अपने दफ्तर में याद आता तो वे टेबल पर थाप देकर गाते. इस गीत के साथ मैं उसी तरह बड़ा हुआ हूँ जैसे...

नहीं, ज्यादा इंतजार नहीं. बस अब ये गीत सुनिए.

बेगम अख्तर






शोभा गुर्टू


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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ हमरी अटरिया पे आओ संवरिया ”

  2. By pratibha on June 1, 2010 at 12:29 AM

    बहुत ही अच्छा!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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