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बीच सफ़हे की लड़ाई

परमाणु जवाबदेही विधेयक में छिपे सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/25/2010 07:06:00 AM

प्रफुल्ल बिदवई

क्या हमने भोपाल गैस त्रासदी से कोई सबक लिया है? क्या चौथाई सदी लंबी चोट, बदनामी और अपमान की उस स्थायी पीड़ा से हमने कुछ सीखा है जो दुनिया की सबसे भयावह रासायनिक दुर्घटना के पीड़ितों को भुगतनी पड़ी है? परमाणु दुर्घटना होने पर मुआवजा देने संबंधी असैन्य परमाणु जवाबदेही विधेयक को पास करवाने के लिए सरकार जिस तरह की तत्परता दिखा रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि हमने कुछ नहीं सीखा. बल्कि सीखने की बजाय हमारा तंत्र इस तरह की आपदाओं की आशंका के प्रति लगातार इनकार की मुद्रा बनाए हुए है. सरकार दिखावा कर रही है कि उसे अपने नागरिकों की चिंता है और उसे किसी भी आपदा से निपटना अच्छी तरह आता है. इसी तरह का दिखावा 1984 में भी किया गया था जब भोपाल गैस पीड़ितों को उनके अधिकार  दिलाने की बात आई थी. लेकिन बाद में दोषी कंपनी के साथ मिलीभगत करके इन पीड़ितों को मामूली मुआवजा देकर टरका दिया गया.

इस विधेयक में गंभीर खामियां हैं. इसका मुख्य मकसद है किसी परमाणु संयंत्र में होने वाली दुर्घटना से होने वाले संभावित व्यापक नुकसान की जिम्मेदारी इसके डिजाइनरों, निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं से हटाना. इसमें विदेशी परमाणु कंपनियों से कहीं ज्यादा मुआवजा सरकार को देना पड़ेगा. यानी भुगतेगी भी जनता और मुआवजे का पैसा भी उसी जनता की जेब से जाएगा. इस तरह देखा जाए तो यह विधेयक कानून, संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के अधिकार और जवाबदेही के मूल सिद्धांतों और जनहित के खिलाफ जाता है. इसका सबसे आपत्तिजनक पहलू ही इसका बुनियादी पहलू है. यह विधेयक विनाशकारी दुर्घटना की क्षमता रखने वाले एक ऐसे उद्योग की जवाबदेही को सीमित करने की बात कहता है जो बेहद खतरनाक और दुर्घटना संभावित माना जाता है.

परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन का अकेला ऐसा तरीका है जिसमें विकिरण के जरिए व्यापक स्तर पर विनाश पैदा करने की क्षमता होती है. इसका घातक असर लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है. अदृश्य होने की वजह से इसकी भयावहता और बढ़ जाती है. पिछले दिनों दिल्ली के एक कबाड़ बाजार में हुए कोबाल्ट-60 विकिरण हादसे से यह बात उजागर भी हो चुकी है. यह तर्क दिया जाता है कि बहुत विनाशकारी दुर्घटनाओं की संभावना कम होती है मगर दुर्घटना की हालत में इसके नतीजे कितने विनाशकारी होंगे इस पर ज्यादा चर्चा नहीं होती. 1986 में युक्रेन में हुए चेर्नोबिल हादसे को कौन भूल सकता है जहां परमाणु संयंत्र में हुए रेडियोएक्टिव रिसाव में 65,000 लोग विकिरणजनित कैंसर की भेंट चढ़ गए थे और आर्थिक नुकसान का आंकड़ा था 350 अरब डॉलर.

परमाणु दुर्घटना की जवाबदेही सीमित करना सैद्धांतिक रूप से भी गलत है. ऐसा करना दो मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन है- एहतियाती सुरक्षा का सिद्धांत और जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा भुगतान का सिद्धांत. पहला सिद्धांत कहता है कि इतने व्यापक पैमाने पर विनाश की क्षमता रखने वाली किसी ऐसी गतिविधि को इजाजत नहीं मिलनी चाहिए जिसके बारे में पूरी जानकारी न हो. दूसरा सिद्धांत कहता है कि जिन लोगों ने नुकसान किया है वे पीड़ितों को पूरा मुआवजा दें.

इन सिद्धांतों और संपूर्ण जवाबदेही की धारणा का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने फैसलों में भी किया है. इनका जिक्र धारा 21 (जीवन का अधिकार), 47 और 48ए (जन स्वास्थ्य उन्नति और पर्यावरणीय संरक्षण) में है. 1996 में कोर्ट ने कहा था: 'एक बार कोई गतिविधि, जिससे जोखिम जुड़ा हो, शुरू होने के बाद इसे शुरू करने वाला व्यक्ति ही इसके अच्छे या बुरे के लिए जिम्मेदार होगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने जरूरी उपाय कर रखे थे.'

परमाणु जवाबदेही विधेयक में इन सिद्धांतों की अनदेखी की गई है. इसमें मनमाने ढंग से उत्तरदायित्व संबंधी धन की सीमा बेहद कम  (2,300 करोड़ रुपए) निर्धारित की गई है. इसमें भी संचालकों की जिम्मेदारी की सीमा सिर्फ 500 करोड़ रुपए है. बाकी का जो अंतर है उसे सरकार वहन करेगी यानी आप और हम, वे लोग जो इस दुर्घटना के लिए रत्तीमात्र भी जिम्मेदार नहीं हैं.

यह विधेयक परमाणु आपूर्तिकर्ताओं और डिजाइनरों को जवाबदेही के शिकंजे से बच निकलने की छूट देता है. अपने उत्पाद की जवाबदेही के तहत भविष्य में उनके उपकरण (रिएक्टर) से किसी भी तरह के नुकसान की हालत में - मसलन डिजाइन या निर्माण संबंधी खामी उजागर होने पर - उन्हें हर्जाना भुगतना चाहिए. यह पूरी तरह से नाइंसाफी होगी यदि निर्माण या फिर डिजाइन संबंधी किसी खामी के चलते हुई दुर्घटना के बावजूद सारी जिम्मेदारी संचालक के सिर पर हो. संचालक यानी सरकार जो इन रिएक्टरों को परमाणु विद्युत निगम के तहत संचालित करेगी. इस कानून का उतना ही घृणित एक पक्ष और है. यह जवाबदेही की अवधि सिर्फ 10 साल तक सीमित करने की बात करता है जबकि किसी विकिरण दुर्घटना के प्रभावों का असर (कैंसर, जेनेटिक विकार आदि) 20 साल बाद देखने को मिलता है.

स्पष्ट रूप से इस बिल का खाका परमाणु कंपनियों को उनकी जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करने के लिए रचा गया है. और इसकी जड़ें 1960 के दशक में हुए दो सम्मेलनों में जुड़ी हैं - धनी देशों (ओईसीडी) द्वारा प्रायोजित 1960 का पेरिस सम्मेलन और 1963 का वियना सम्मेलन. यह ऐसा दौर था जब लोगों के अंदर ये उम्मीदें बनाई जा रही थीं कि ऊर्जा का भविष्य परमाणु ऊर्जा में ही छिपा हुआ है जो सुरक्षित, सस्ती और पर्याप्त होगी. लेकिन उम्मीदें उम्मीदें ही रह गईं. जितना दावा किया जा रहा था परमाणु ऊर्जा उत्पादन में उसके दस फीसदी भी बढ़ोतरी नहीं हुई. अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी है. वैश्विक ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का योगदान लगातार कम होता जा रहा है जबकि पूर्ण रूप से सुरक्षित, हर तरह के प्रदूषण से मुक्त सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन की दर सालाना 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है.

दुनिया के इतिहास में परमाणु ऊर्जा सबसे बड़ी औद्योगिक विफलता साबित हुई है. अमेरिकी ऊर्जा विशेषज्ञ एमरी लोविंस के मुताबिक दुनिया भर में इसमें खरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है. परमाणु ऊर्जा जैसी विनाशकारी तकनीक को सब्सिडी देना 1960 में भी गलत था. आज भी यह हास्यास्पद है जबकि यह तकनीक 60 साल पुरानी हो चली है और शायद अपनी क्षमता का पूरा दोहन कर चुकी है. रेडियोएक्टिव कचरे को निपटाने का कोई सुरक्षित तरीका नहीं है जो अगले हजारों साल तक विनाश पहुंचाने की क्षमता रखता है. कल्पना कीजिए किसी परमाणु संयंत्र के बंद होने के 100 साल बाद उसके कचरा भंडार में रिसाव हो जाता है. तब कौन जिम्मेदार होगा? विधेयक के मुताबिक खुद जनता जिम्मेदार होगी.

लेकिन यूपीए सरकार 1997 के कंवेंशन ऑन सप्लीमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) फॉर न्यूक्लियर डैमेज नामक अंतरराष्ट्रीय संधि से इस तरह चिपकी हुई है जैसे यह बड़े पैमाने पर स्वीकार्य हो. जबकि असलियत यह है कि सिर्फ 13 देशों ने इस संधि पर दस्तखत किए हैं और अब तक यह अमल में नहीं आ पाई है. इसे प्रायोजित करने वाली अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए खुद एक निष्पक्ष संस्था नहीं है. इसका मकसद ही परमाणु ऊर्जा का प्रसार करना है.

इस विधेयक का औचित्य सिद्ध करने के लिए सरकार के पास एक ही दलील है कि जवाबदेही को सीमित किए बिना कोई भी विदेशी उद्योगपति भारत में निवेश नहीं करेगा. लेकिन इस दलील से सवाल उठता है कि क्या हमें परमाणु ऊर्जा की जरूरत है भी, और है तो हम इसके लिए कितनी बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हैं? यह विधेयक भारतीय और अमेरिकी उद्योगपतियों के दबाव के सामने घुटने टेकने जैसा है. अमेरिकी अधिकारी और औद्योगिक समूह इसके पक्ष में जबर्दस्त लामबंदी कर रहे हैं. परमाणु ऊर्जा समझौते के बाद उन्हें इसका फायदा जो चाहिए. विधेयक को खारिज कर हम इस धोखे से बच सकते हैं. (तहलका से साभार)

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“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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