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बीच सफ़हे की लड़ाई

महिला आरक्षण और राजनीति के क्षेत्र में व्यभिचार

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2010 08:40:00 AM


दिलीप मंडल
राजनीति के क्षेत्र में महिला आरक्षण का उप-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) नेताओं के यौन भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी की शक्ल में नजर आ सकता है। भारतीय राजनीति में यौन भ्रष्टाचार का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है, जबकि राजनीति का यह एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी सार्वजनिक चर्चा अक्सर नहीं होती, लेकिन इसके बारे में सभी जानते हैं। इसे भारतीय राजनीति का सर्वज्ञात रहस्य भी कहा जा सकता है। ये ऐसा कदाचार है जो मोहल्ला और पंचायत स्तर से लेकर राजनीति के शिखर पर मौजूद है।
भारत में सत्ता यानी पावर के साथ हरम और भरे पूरे रनिवास की अवधारणा पुरानी है और भारतीय राजनीति कम से कम इस मायने में समय के साथ नहीं बदली है। लोगों की मानसिकता ऐसी बना दी गई है प्रभावशाली लोगों के यौन कदाचार को बुरा भी नहीं माना जाता और नेताओं के कई स्त्रियों के साथ यौन संबंधों को उनके शक्तिशाली होने के प्रमाण के तौर पर देखा जाता है। एकनिष्ठता की भारतीय अवधारणा महिलाओं पर तो लागू होती है पर पुरुषों पर लागू नहीं होती। हिंदू धर्म की किताबें बताती हैं कि –पत्नी को दुश्चरित्र पति का त्याग नहीं करना चाहिए, प्रत्युत अपने पातिव्रत धर्म का पालन करते हुए उसको समझाना चाहिए।[i] हिंदू संस्कृति व्यभिचार का किस हद तक समर्थन करती है, इसे जानने के लिए ये प्रश्नोत्तर पढ़ें:-
प्रश्न- यदि कोई विवाहिता स्त्री से बलात्कार करे और गर्भ रह जाए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर- जहां तक बन पड़े स्त्री के लिए चुप रहना ही बढ़िया है। पति को पता चल जाए तो उसको भी चुप रहना चाहिए। दोनों के चुप रहने में ही फायदा है।[ii]
पश्चिमी समाजों के मुकाबले भारतीय समाज में अनैतिक होने की कई गुना ज्यादा छूट है। यहां की सनातनी शास्त्रीय परंपराओं में बेटी, बहन, गुरुपत्नी आदि के साथ रिश्ते बनाने की मान्यता रही है। हिंदू धर्मग्रंथों को पढ़ें तो कभी किसी महिला को खीर खिलाने से बच्चा पैदा हो जाता है तो किसी के पसीने की बूंद मुंह में गिरने से गर्भ ठहर जाता है, तो किसी का दर्शन ही कोई महिला गर्भवती होने का कारण बन जाता है। संतानों के लिए यज्ञ कराने का मतलब आप सहज ही समझ सकते हैं। आजकल भी बाबा लोग बेऔलाद दंपतियों को संतान दिलाने के लिए स्पेशल पूजा कराते रहते हैं। ऐसे अनैतिक किस्सों से उत्तर वैदिक धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं। खजुराहो से लेकर कोणार्क और देश भर के सैकड़ों मंदिर इन अनौतिक कहानियों के गवाह हैं। यूरोप या अमेरिका जैसी नैतिकता अगर भारतीय समाज के प्रभुवर्ग में होती, तो कई नेताओं को राजनीति छोड़नी पड़ती। यूरोपीय और अमेरिकी देशो में यौन विचलन के लिए नेताओं को सत्ता गंवानी पडी है, लेकिन भारत में एक नारायणदत्त तिवारी को छोड़कर ऐसी कोई और मिसाल नहीं मिलती। हमारे देश के प्रभुवर्ग में यौन शुचिता को लेकर आग्रह नहीं है। दुखद ये है कि आम जन में भी ऐसा आग्रह नहीं है।
ऐसे भारतीय समाज और राजनीति में अगर महिला आरक्षण लागू होता है तो यह यौन कदाचार को बढ़ावा देने का एक और माध्यम बन सकता है। आखिर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि भारत में राजनीतिक दलों का स्वरूप पुरुष प्रधान है और महिला आरक्षण लागू होने के बाद भी ये बदलने वाला नहीं है? अगर राजनीतिक दलों में नैतिकता होती और वे सचमुच महिलाओं का भला चाहते तो पार्टी की संरचना में महिलाओं को स्थान दे सकते थे। इसके लिए न तो कानून बनाने की जरूरत है और न ही संविधान को बदलने की। पुरुष प्रधान राजनीतिक संरचना में जब आरक्षण की वजह से बड़ी संख्या में महिलाओं को टिकट देने की बारी आएगी, तो इसके खतरे समझे जा सकते हैं। महिलाओं का सशक्तिकरण अगर नीचे से होता, तो उनके शोषण के खतरे कम होते। किसी महिला का सशक्त होना उसे यौन संबंधों की दृष्टि से भी स्वतंत्र बनाता है। लेकिन महिला आरक्षण के समर्थन ये नहीं मानते कि पहले महिलाओं को आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक रूप से समर्थ बनाया जाए। ऐसा होने के बाद महिला आरक्षण की जरूरत ही क्यों होगी?
साथ ही महिलाओं का आर्थिक रूप से समर्थ बनाए बगैर उन्हें बेहद खर्चीले चुनाव में झोंक देना भी उन्हें पुरुष सत्ता की शरण में जाने को बाध्य करेगा। जिस देश में संपत्ति में महिलाओं की नाम मात्र की हिस्सेदारी हो वहां महिला उम्मीदवार करोड़ों का चुनाव खर्च कहां से निकालेंगी। राजनीति में पैसा अब कितना महत्वपूर्ण हो गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस समय देश की लोकसभा में 306 करोड़पति सांसद हैं जबकि राज्यसभा में 54 % सासंद करोड़पति हैं।[iii] बड़े राजनीतिक दलों के लिए लोकसभा चुनाव लड़ने का औसत खर्च प्रति सीट चार करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के बिना उनका राजनीतिक सशक्तिकरण स्वाभाविक रूप से कैसे मुमकिन है? इसलिए सबसे पहले तो ये जरूरी है कि उत्तराधिकार में महिलाओं को वास्तविक अर्थों में बराबरी दी जाए, क्योंकि कागजी बराबरी का कोई मतलब नहीं है। जमीन और घरों के सभी पट्टों और रजिस्ट्री में महिलाओं के नाम होने को अनिवार्य बनाया जाए।
बहरहाल, इस बात को लेकर कोई सदेह नहीं हो सकता कि महिला आरक्षण विधेयक, महिला सशक्तिकरण को ऊपर से थोपने का जरिया है। इसे स्वाभाविक प्रक्रिया तभी कहा जाएगा जब देश में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक  और शैक्षणिक स्थिति बदले और इसका असर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या की शक्ल में नजर आए। जिस देश में जमीन के मालिकों में सिर्फ 9.5 फीसदी महिलाएं हों[iv], उस समाज के एक हिस्से में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण को लेकर जो उत्साह और उल्लास का भाव नजर आ रहा है, वह आश्चर्यजनक है। जमीन के मालिकाने का ये आंकड़ा भी सिर्फ कागज पर ही है क्योंकि महिलाएं बेशक जमीन का इस्तेमाल कर लें, लेकिन ग्रामीण भारत में ऐसे मौके बिरले ही आते हैं जब कोई महिला अपनी मर्जी से जमीन बेच पाती हो। अगर कोई महिला पैत्रिक संपत्ति पर दावा करे और इसके लिए अदालत जाए, तो उसे भद्र महिला नहीं माना जाता। [v]
जो लोग, नेता और बुद्धिजीवी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए इतने उद्धत और उत्साहित हैं, वे अपने परिवारों में संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर भी यही उत्साह दिखाते, तो समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को भी रास्ता दिख जाता। इस तरह समाज में व्यापक तौर पर महिलाओं की हालत बेहतर होने का रास्ता खुलता। यह बहुत गंभीर सवाल है कि कोचिंग सेंटरों में बेटों को भेजने के लिए जो उत्साह समाज में दिखता है, वो बेटियों के मामले में नजर क्यों नहीं आता? महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण देने से पहले, ऐसे कई सवाल हल होने चाहिए क्योंकि इन सवालों का संदर्भ और असर कुछ महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में पहुंचने की तुलना में कई गुना बड़ा है। दशकों से सीबीएससी और बारहवीं के तमाम बोर्ड इम्तहानों में लड़कों से बेहतर रिजल्ट लाने वाली लड़कियां आईआईटी, आईआईएम, और देश की तमाम और शिखर संस्थाओं और कोर्स में क्यों नजर नहीं आतीं, इसका जवाब मांगा जाना चाहिए। अगर समाज में प्रचलित पुत्र-मोह इसमें बाधक है तो सरकार इन शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान लाकर सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकती है।
महिलाओं की स्थिति अगर आज भी बुरी है, तो इसके कारणों की शिनाख्त होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महिला आरक्षण विधेयक पर राज्य सभा में चर्चा के दौरान ये माना कि विकास प्रक्रिया का लाभ उठाने में महिलाओं को दिक्कत होती है। परिवारों में उनके साथ भेदभाव होता है, मारपीट होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा के मामले में उनके साथ पक्षपात किया जाता है।[vi] अब इस बात की चर्चा होनी चाहिए कि समाज ही नहीं, लोकतांत्रिक देश का कानून भी किस तरह महिलाओं को वंचित बनाए रखने में भूमिका निभाता है। हिंदुओं के उत्तराधिकार से जुड़े कानून महिलाओं के खिलाफ झुके हुए हैं। कॉरपोरेट जगत में चेयरमैन और प्रेसिडेंट जैसे शिखर पदों पर महिलाएं लगभग अनुपस्थित हैं। कई उद्योगपति परिवारों में पुत्र न होने पर संपत्ति भतीजे या भांजे या दामाद को या फिर दत्तक पुत्र को स्थानांतरित कर दी गई। आम भारतीय परिवारों में भी ऐसा होना बेहद आम है। लेकिन इस चलन को बदला जाए, इसकी कोई कोशिश नहीं की जाती। मठों और आश्रमों की अकूत संपत्ति पर महिलाओं का भी अधिकार हो, इसकी कोई पहल धार्मिक नेतृत्व, समाज या सरकार की तरफ से आज तक नहीं हुई है।
देश में महिलाओं की साक्षरता दर कम है[vii] और स्कूलों में लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट ज्यादा है, लेकिन ऐसी समस्याओं को अब तक ठीक नहीं किया जा सका है। शिशु मृत्यु के मामले में आंकड़े लड़कियों के खिलाफ झुके हुए हैं, जबकि वैश्विक आंकड़ा और चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक बालकों की तुलना में बालिकाओं में जीवनी शक्ति ज्यादा होती है। महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए का ही असर है कि इस देश में प्रति 1000 पुरुष 933 महिलाएं हें।[viii] महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में लाने से पहले ऐसे सैकड़ों कार्यभार हो सकते हैं, जिन्हें भारत की राजसत्ता और भारतीय समाज को पूरा करना चाहिए। नौकरशाही में महिलाओं की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए यूपीएससी को तमाम नियुक्तियों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करनी चाहिए। शैक्षणिक पदों पर भी महिलाएं अच्छी संख्या में नजर आएं, इसके लिए शिक्षा विभागों और यूजीसी को आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। महिलाओं के इस तरह के सशक्तिकरण और आरक्षण का विरोध कोई भी राजनीतिक दल नहीं करेगा और इस तरह की आम सहमति बनाने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। महिला सशक्तिकरण के कई रास्ते हैं। महिला आरक्षण विधेयक अगर उनमें से एक होता तो शायद इसे लेकर संदेह पैदा नहीं होता। लेकिन अब ये विधेयक और इसे लेकर राजनीतिक दलों की नीयत संदेह के घेरे में है।
महिला आरक्षण से महिलाओं का भला कैसे होगा?
सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं का सशक्तिकरण किए बगैर अगर ढेर सारी महिलाएं सांसद और विधानसभाओं में आ भी जाती हैं, तो इससे महिलाओं की हालत कैसे बदलेगी, ये सरकार या महिला आरक्षण के बता नहीं रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में दलितों और आदिवासियों को आरक्षण तो संविधान लागू होने के साथ ही हासिल है। लेकिन क्या दलितों और आदिवासियों की विधायिका में उपस्थिति से इन समुदायों का कोई भला हो पाया है? सवर्ण हिंदुओं और दलितों के बीच हुए पूना पैक्ट के आधार पर दिए गए इस आरक्षण का आगे चलकर खुद आंबेडकर ने विरोध किया था और इसे निरर्थक करार दिया था।[ix]  कई दलित संगठन ये मांग कर रहे हैं कि ये आरक्षण खत्म किया जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि ये समुदाय अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। पूना पैक्ट की बहस में आंबेडकर यही पक्ष रख रहे थे। अभी जो व्यववस्था देश में चल रही है, उसमें दलित और आदिवासी नेता संसद और विधानसभाओं में रिजर्वेशन की वजह से चुनकर आ तो जाते हैं, लेकिन वो अपने समुदायों के मुद्दे उठाने में समर्थ नहीं हैं। वर्तमान व्यवस्था के तहत किसी दलित या आदिवासी नेता का चुना जाना दलितों या आदिवासियों की मर्जी से नहीं होता। चुने जाने के लिए अक्सर वे किसी दल पर निर्भर होते हैं, और उनका चुना जाना किस न किसी सामाजिक-राजनीतिक समीकरण का नतीजा होता है। किसी भी आरक्षित चुनाव क्षेत्र में गैर-दलित मतदाता किसी दलित नेता का चुनाव कर सकते हैं।[x]
भारतीय लोकतंत्र में विधायी मामलों में सांसद या विधायक की व्यक्तिगत राय का कोई मतलब नहीं होता। कानून बनाने और संसद या विधानसभा के अंदर नेताओं का अन्य कार्य व्यवहार व्यक्तिगत नहीं, दलगत स्तर पर तय होता है। दलबदल निरोधक कानून[xi] और ह्विप की सख्ती के बीच कोई सांसद या विधायक अपने मन या विचार से कोई विधायी कदम नहीं उठा सकता। दलित और आदिवासी सांसद/विधायक अपने समुदायों के लिए अपने मन या विचार से कुछ नहीं कर सकते और महिलाएं भी इस नाते कुछ अलग नहीं कर पाएंगी कि वे महिला आरक्षण विधेयक की वजह से चुनकर आ गई हैं।  इस तर्क में दम नहीं है कि महिला सांसद और विधायक महिलाओं के हित में कानून बनाएंगी क्योंकि इस तर्क का विस्तार ये होना चाहिए कि दलित और आदिवासी सांसद/विधायक दलित और आदिवासी हितों के लिए कानून बनाएंगे। हम सब जानते हैं कि हकीकत ऐसी नहीं है।
फिर क्यों दिया जा रहा है महिलाओं को आरक्षण
महिला आरक्षण विधेयक कोई सामान्य विधेयक नहीं है। इसका संदर्भ और इसका असर बेहद गहरा है। आजादी के बाद से भारतीय विधायिका यानी कानून बनाने वाली संस्थाओं के स्वरूप में बदलाव लाने की ये सबसे बड़ी कोशिश है। ये विधेयक भारतीय संविधान को बुनियादी रूप से बदलने में सक्षम है। इसलिए इस मुद्दे पर आम सहमति की भेड़चाल को तोड़ने और गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। महिला आरक्षण पर मीडिया और राजनीतिक विमर्श में जिस तरह से आम सहमति की क्षद्म खड़ा किया जा रहा है उसे मीडिया विश्लेषकों की भाषा में मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट[xii] कहते हैं। इस विधेयक के दूरगामी असर को देखते हुए ये आवश्यक है कि असहमति के खतरे उठाए जाएं, क्योंकि इस बात का जोखिम  है कि भारतीय लोकतंत्र ने सामाजिक विविधता के क्षेत्र में पिछले साठ साल में जो थोड़ी-बहुत उपलब्धि हासिल की है, उसे इस विधेयक के जरिए बेअसर किया जा सकता है। आखिर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि महिला सशक्तिकरण के लिए उन संस्थाओं (लोकसभा और विधानसभाओं) को चुना गया है, जो सामाजिक विविधता का सबसे बड़ा मंच बन गए हैं। 

राजनीति के क्षेत्र में आई सामाजिक विविधता से कौन डरता है?

महिला आरक्षण विधेयक क्या समाज के कमजोर हिस्से के सशक्तिकरण का कानून है? महिला आरक्षण के जरिए सरकार विधायिका यानी कानून बनाने वाली संस्थाओं में जेंडर डायवर्सिटी यानी लैंगिक आधार पर विविधता लाना चाहती है। इसके लिए कानून बनाने (109वां संविधान संशोधन विधेयक) की प्रक्रिया चल पड़ी है। इसे लेकर कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दलों के बीच नेतृत्व के स्तर पर जिस तरह की सहमति है, उसमें इस विधेयक के कानून बनने में कोई अड़चन नहीं है। लेकिन क्या विधायिका में जेंडर डायवर्सिटी लाने की ये कोशिश सोशल डायवर्सिटी (सामाजिक विविधता) को खत्म करके या कमजोर करके आगे बढ़ेगी? 

कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दलों में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण को लेकर नजर आ रहे उत्साह का कारण क्या है? ये सवाल इसलिए भी पूछा जाना चाहिए क्योंकि इन दलों की आंतरिक संरचना में महिलाओं की स्थिति बुरी है। ये पार्टियां चुनावों में महिलाओं को टिकट नहीं देतीं। कैबिनेट में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देतीं। राज्यसभा में चुनकर आने के लिए पार्टियों की इच्छा सबसे बड़ा मापदंड है। यदि ये दल महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को लेकर गंभीर होते तो राज्यसभा में अच्छी संख्या में महिलाओं को पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन 2010 के राज्यसभा के आंकड़े बताते हैं कि इस सदन में सिर्फ 9 फीसदी महिलाएं हैं। कांग्रेस की 13 फीसदी, बीजेपी की 9 फीसदी, सीपीएम की 7 फीसदी और सीपीआई की शून्य फीसदी सांसद महिलाएं हैं।[xiii] महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में लाने के लिए इतनी बुरी तरह तत्पर दिख रही पार्टियां, राज्यसभा में उन्हें बेहतर प्रतिनिधित्व देने की कोशिश क्यों नहीं करतीं? इसके लिए तो किसी संविधान संशोधन या कानून पास करने की भी जरूरत नहीं है। किसी पार्टी को ऐसा करने से कोई रोक भी नहीं सकता। इसके लिए न मार्शल की जरूरत है न आम सहमति बनाने की। लोकसभा में चुनकर आने में महिलाओं को होने वाली कोई भी दिक्कत यहां लागू नहीं होती। लेकिन कांग्रेस-बीजेपी और वामपंथी दल राज्यसभा में 33 फीसदी महिलाओं को नहीं भेज रहे हैं।
जाहिर है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिला आरक्षण विधेयक लाया तो जरूर गया है, लेकिन इसका मकसद कुछ और हो सकता है। कहीं इसका मकसद आजादी के बाद विधानसभाओं और लोकसभा की सामाजिक संरचना में आए बदलाव को खत्म करना तो नहीं हैं? ओबीसी जातियों का लोकसभा और विधानसभाओं में बड़े पैमाने पर आना साठ के दशक में शुरू हुआ और नब्बे के दशक के बाद ये प्रक्रिया एक तरह से पूरी हो गई। इसी दौरान इन सदनों में सवर्णों और खासकर ब्राह्मण सदस्यों की संख्या घटती चली गई। भारत का संविधान बनाने का दायित्व जिस संविधान सभा ने संभाला था, उसके 20 सदस्यीय कोर ग्रुप में 13 सदस्य ब्राह्मण थे।[xiv] 1951 में पहली लोकसभा के लिए चुने गए सांसदों में लगभग आधे ब्राह्रण थे। 2004 में यह संख्या घटकर 9.5 फीसदी रह गई।[xv] वहीं वर्तमान में ओबीसी सांसदों की संख्या 200 से ज्यादा है।[xvi]महिला आरक्षण विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान ये बताया गया कि पहली लोकसभा में ओबीसी सांसदों की संख्या 12 फीसदी थी, जो अब बढ़कर 30 फीसदी हो गई है।[xvii]
ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं कि लोकसभा और विधानसभाओं में पिछड़ी जातियों की बढ़ती उपस्थिति को महिला आरक्षण विधेयक के जरिए नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्र ने यह सवाल उठाया। सरकार और प्रमुख विपक्षी दलों की नीयत को लेकर संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या इस बिल के पास होने के बाद पहले से ही कम संख्या में नौजूद मुस्लिम सांसदों और विधायकों की संख्या और कम हो जाएगी। 2001 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी में 13.4 फीसदी मुस्लिम हैं।[xviii] इतनी संख्या के हिसाब से लोकसभा में 72 मुस्लिम सांसद होने चाहिए। जबकि वर्तमान लोकसभा में सिर्फ 28 मुस्लिम सांसद हैं।

महिला आरक्षण से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है कि क्या ये कानून विधायिका यानी संसद और विधानमंडलों की सामाजिक विविधता को नष्ट करेगा। इसी की व्याख्या के क्रम में ये बातें आ रही है कि भारत की सामाजिक विविधता, जो आजादी के बाद शुरुआती लोकसभाओं में नजर नहीं आई थी और अगड़े जाति समूहों का वर्चस्व विधायिका पर था, वहां से देश अब काफी आगे बढ़ चुका है। इस समय महिला आरक्षण का विरोध जिन आधारों पर किया जा रहा है, उसका प्रमुख तर्क यही है कि महिला आरक्षण राजनीतिक क्षेत्र में दशकों के सामाजिक बदलाव और पिछड़ा उभार को फिर से नकार देगा और संसद का चरित्र एक बार फिर वैसा हो जाएगा, जैसा पिछड़ा उभार से पहले था। इस तर्क की अपनी कमजोरियां हैं और पंचायतों का अनुभव भी बताता है कि वोट के आधार पर जब चुनने या खारिज करने के फैसले होंगे तो उसमें संख्या का महत्व खत्म नहीं होगा। किसी सीट पर किसी जाति समूह या जातियों और धार्मिक समूहों का समीकरण अगर प्रभावशाली है तो उस सीट पर उस समीकरण का उम्मीदवार सिर्फ इसलिए नहीं हार जाएगा कि वो सीट महिलाओं के लिए रिजर्व हो गई है। लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े समूहों को शुरुआती दौर में कुछ दिक्कतें जरूर आएंगी क्योंकि शैक्षणिक पिछड़ेपन की वजह से इन समूहों की महिलाओं को न सिर्फ चुने जाने में दिक्कत होगी बल्कि राजकाज के बाकी काम करने में भी उन्हें शुरू में कुछ  असुविधा हो सकती है।   

क्यों एक हो गई कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी पार्टियां

महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के दिन संसद भवन से एक रोचक तस्वीर आई। इस तस्वीर में बीजेपी नेता सुषमा स्वराज, नजमा हेपतुल्ला और सीपीएम नेता वृंदा कारात गले मिल रही हैं और साझा खुशी का खुलकर इजहार कर रही हैं। वैसे तो तीन महिला नेताओं के मिलकर खुश होने में किसी को भी एतराज क्यों होना चाहिए, लेकिन बीजेपी और सीपीएम की इस खुशी में अगर कांग्रेस भी शामिल हो जाए तो संदेह होना चाहिए कि आखिर हो क्या रहा है। ज्यादातर सवालों में मतभेद रखने वाले इन दलों के दिल आखिर महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक साथ क्यों धड़क रहे हैं? महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर इन दलों के अपने रिकॉर्ड बेहद शर्मनाक हैं। राज्यसभा में सिर्फ 9 फीसदी महिला सासंदों का होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि ये दल, मूल रूप से, महिला विरोधी हैं।

महिला आरक्षण का विधेयक लंबे समय से लंबित चला आ रहा है, लेकिन इस पर कभी विस्तार से बहस नहीं हुई। यहां तक कि राज्यसभा में इसे लगभग जबर्दस्ती पास कराया गया। इससे पहले सात सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने एक दिन पहले महिला आरक्षण विधेयक की कॉपी फाड़ दी थी और सभापति के टेबल से कागज फेंक दिए थे। राज्यसभा के इतिहास में पहली बार मार्शल का इस्तेमाल करके सांसदों को सदन के बाहर फेंक दिया गया। जनहित के सैकड़ों अन्य मुद्दों पर न तो दलों के बीच ऐसी एकता दिखती है न ही ऐसा जोश। महिला आरक्षण विधेयक इस मामले में असामान्य है, कि इसने कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी दलों को एक कर दिया है। इस व्यापक एकता के सूत्र इन दलों के नेतृत्व की सामाजिक संरचना में छिपे हो सकते हैं।

इस समय भारतीय राजनीति में इन तीनों समूहों के शिखर पर सवर्ण हावी हैं। कांग्रेस में शिखर पर मौजूद तीन नेता- अध्यक्ष सोनिया गांधी (राजीव गांधी से शादी के बाद उन्हें ब्राह्मण मान लिया गया), प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रणव मुखर्जी सवर्ण हैं। बीजेपी में अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, तीनों ब्राह्मण हैं। सीपीएम और सीपीआई के नेतृत्व में ब्राह्मण और सवर्ण वर्चस्व तो कभी सवालों के दायरे में भी नहीं रहा। कारात, येचुरी, पांधे, वर्धन, बुद्धदेव की पूरी कतार वामपंथी दलों के नेतृत्व में सामाजिक विविधता के अभाव का प्रमाण है। महिला आरक्षण पर इन तीनों दलों/समूहों के बीच एकता के सूत्र इन दलों के शिखर नेतृत्व की सामाजिक बनावट में तलाश किए जा सकते हैं।


   




[i] गृहस्थ में कैसे रहें(54वां पुन:प्रकाशन), स्वामी रामसुखदास, गीताप्रेस, पेज 72
[ii]  वही, पेज 92
[iii] नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट
[iv]  संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन, जेंडर एंड लैंड राइट डाटाबेस (http://www.fao.org/gender/landrights/report/)
[v] वही
[vi] राज्यसभा में 9 मार्च, 2010 की कार्यवाही
[vii] 2001 की जनगणना के मुताबिक भारत में साक्षरता दर 65.38% है जबकि महिलाओं की साक्षरता दर 54.16% ही है।
[viii] 2001 की जनगणना का आंकड़े, संयुक्त राष्ट्र ने सन 2000 में कहा था कि भारत में 4.4 करोड़ महिलाएं विलुप्त हो गई हैं।
[ix]पूना पैक्ट के फलस्वरूप अधिक सीटों की प्राप्ति हुई, पर ये सभी गुलामों द्वारा भरी गई हैं। यदि गुलामों की पलटन से कोई लाभ है, तो पूना पैक्ट को लाभप्रद कहा जा सकता है”- डॉ अंबेडकर (डा. हरिनारायण ठाकुर के बहुरि नहिं आवनापत्रिका के जुलाई-दिसंबर अंक में छपे आलेख से)
[x]  क्रिस्टोफ जेफरेलोट, डॉ. अंबेडकर एंड अनटचेबिलिटी, एनालाइजिंग एंड फाइटिंग कास्ट (2005)
[xi] संविधान की दसवीं अनुसूचि, (संविधान के 91वें संशोधन के बाद)
[xii] एचवर्ड एस हरमन, नोम चोमस्की (2008)
[xiii] नेशनल इलेक्शन वाच की रिपोर्ट, राज्यसभा के सांसदों की विश्लेषण, 2010
[xiv]आउटलुक, 4 जून, 2007 http://www.outlookindia.com/article.aspx?234779
[xv]आउटलुक, 4 जून 2007  http://www.outlookindia.com/article.aspx?234783
[xvii]  9 मार्च, 2010 को राज्यसभा में जेडी यू सांसद शिवानंद तिवारी का वक्तव्य, राज्यसभा की कार्यवाही से

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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