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बीच सफ़हे की लड़ाई

विकास की छड़ी नहीं है जनगणना

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/21/2010 06:26:00 PM

साल दर साल ये आंकड़े आ रहे हैं कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाकी समुदायों से पीछे रह जा रहे हैं। लेकिन इस सूचना का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक कि सरकार सचेत रूप से इन समुदायों के हित में काम न करे और उनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए प्रयास न करे।

दिलीप मंडल
विकास प्रक्रिया के संसाधन/उपकरण के रूप में जनगणना और इसके मिले आंकड़ों का महत्व निर्विवाद है। भारत जैसे बड़े देश में विकास की नीतियां बनाने में जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। कई पश्चिमी देशों में राष्ट्र राज्यों के विकास की विशिष्ट प्रक्रिया की वजह से समाज में विविधता अपेक्षाकृत कम है। चीन जैसे एशियाई देशों में भी सामाजिक विविधता का दबाव कम है। इसके विपरित भारत में न सिर्फ इलाकाई बल्कि भाषाई और सामाजिक विविधता बहुत ज्यादा है। ऐसे देशों में एकांगी ढंग से विकास की नीतियां कारगर नहीं हो सकतीं। आबादी के अलग अलग हिस्सों और देश के अलग-अलग क्षेत्रों की समस्याएं विशिष्ट किस्म की हैं और इस नाते विकास की नीतियों और संसाधनों के बंटवारे में सामाजिक और क्षेत्रीय विशिष्टता होनी चाहिए। इसलिए जनगणना के आंकड़ों की अहमियत और बढ़ जाती है। इन आंकड़ों को सिर्फ अकादमिक महत्व का नहीं माना जाना चाहिए।
मिसाल के तौर पर जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से ये बात सामने आ सकती है कि पिछले दशक में देश के किन हिस्सों से लोगों का सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। साथ ही ये जानकारी भी मिल सकती है कि लोग पलायन करके कहां गए हैं। आंकड़े ये भी बता सकते हैं कि पलायन करने वाले लोग पहले क्या करते थे और अब क्या करते हैं। ये आंकड़े आबादी के आंतरिक पलायन संबंधी नीतियों का आधार साबित हो सकते हैं। सरकार चाहे तो पलायन की समस्या से प्रभावित इलाकों में अलग से अध्ययन करवा कर ये जान सकती है कि इस समस्या की वजह क्या है। इसके आधार पर नीतियां बनाकर पलायन को रोका जा सकता है। राज्य और केंद्र की सरकारें दरअसल ऐसा करती हैं या नहीं, यह तो उनकी नीतियों और नीयत से तय होगा, लेकिन जनगणना के आंकड़े ऐसी समस्याओं को समझने और उनसे निबटने में मदद जरूर कर सकते हैं।
देश की आबादी के बारे में जानकारियां जुटाने की प्रक्रिया जनगणना से अलग और जनगणना के समांतर भी चलती रहती है। मिसाल के तौर पर केंद्र सरकार ने बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण कराने का फैसला किया है। ये सर्वे राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग, प्रधानमंत्री कार्यालय और योजना आयोग की पहल पर हो रहा है। इस सर्वे के जरिए जिला स्तर पर शिशु मृत्यु दर, लोगों की औसत उम्र, प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु समेत कई और तरह के आंकड़े जुटाए जाएंगे। इस तरह के आंकड़ों का इस्तेमाल जनस्वास्थ्य नीति बनाते समय या स्वास्थ्य के लिए आबंटित संसाधनों का बंटवारा करते समय किया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक स्थिति को जानने के लिए एनसीईआरटी भी एक राष्ट्रीय सर्वे करा चुका है, जिससे बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं।
यहां ये घ्यान रखना आवश्यक है कि जनगणना के आंकड़े विकास की प्रक्रिया के उपकरण मात्र हैं। कोई भी सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल कैसे करती है, यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण है। आजादी से पहले से और आजादी के बाद हर दस साल पर होने वाली जनगणना से आंकड़े तो इकट्ठा होते रहे और इन आंकड़ों का विश्लेषण भी किया जाता रहा, लेकिन इससे विकास के कामों में कोई तेजी आई हो, इसके संकेत नहीं हैं। मानव विकास सूचकांक में दुनिया भर के देशों में भारत का स्थान 134वां है और सिर्फ इस सूचकांक के आधार पर कहा जा सकता है कि जनगणना के आंकड़े कोई जादू की छड़ी नहीं हैं, जिससे देश के लोगों का विकास हो जाए। स्वास्थ्य के तमाम आंकड़ों इकट्ठा किए जाते रहे हैं, इसके बावजूद देश स्वास्थ्य के तमाम मानकों पर दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में है। आंकड़े हर बार यही बताते हैं कि देश में जन स्वास्थ्य की दशा बेहद खराब है, लेकिन इस तरह की सूचनाओं से कुछ बदलता नहीं है। 
जनसंख्या के आंकड़े समस्या के बारे में बता सकते हैं और किसी खास नीति के असर के बारे में सूचनाएं दे सकते हैं, लेकिन इन आंकड़ों और सूचनाओं का इस्तेमाल कहीं ज्यादा गंभीर मसला है। मिसाल के तौर पर, साल दर साल ये आंकड़े आ रहे हैं कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाकी समुदायों से पीछे रह जा रहे हैं। लेकिन इस सूचना का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक कि सरकार सचेत रूप से इन समुदायों के हित में काम न करे और उनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए प्रयास न करे। अगर सरकार इन समुदायों के लिए कोई नीति बनाती है, तो जनसंख्या के आंकड़े ये बता सकते हैं कि कोई नीति किस हद तक कारगर साबित हुई। लेकिन जो नीतियां असरदार नहीं रहीं, उनमें संशोधन करना या उन्हें बदलने का काम सरकार पर है।        

2011 की जनगणना की प्रक्रिया
जनगणना के लिए संदर्भ की तारीख 1 मार्च, 2011 है। इसके लिए सरकार की ओर से अधिसूचना जारी होने के साथ ही जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो गई है। भारत में जनगणना दो चरणों में होती है। पहले चरण की जनगणना दरअसल लोगों की गिनती वाले दूसरे चरण की पूर्वपीठिका है। पहले चरण की जनगणना इस समय चल रही है। इसमें घर, घरों में मौजूद सुविधाओं, सामग्रियों, संसाधनों आदि का ब्यौरा इकट्ठा किया जाता है। जनगणना का ये चरण सितंबर 2010 में पूरा हो जाएगा। पहले चरण में इकट्ठा किए गए आंकड़ों के आधार पर वास्तविक जनगणना यानी लोगों की गिनती की जाएगी। जनगणना के दूसरे चरण में लोगों की गिनती के क्रम में उनकी उम्र, लिंग, साक्षरता, धर्म, भाषा, आर्थिक गतिविधियां, आप्रवासन आदि ब्यौरे इकट्ठा किए जाएंगे। ये प्रक्रिया फरवरी-मार्च, 2011 में की जाएगी। कहा जा सकता है कि भारत की जनगणना अगले साल फरवरी-मार्च में होगी। बीते साल जून से अगस्त के बीच जनगणना का रिहर्सल किया जा चुका है।  

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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