हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उड़ीसा में शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस हमला बंद करो

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/18/2010 02:32:00 PM

15 मई को उड़ीसा में प्रस्तावित पोस्को स्टील परियोजना का विरोध कर रहे किसानों के शांतिपूर्ण धरना पर पुलिस की 40 डिवीजनों ने हमला किया, ताकि किसानों को जमीन से हटा कर उसे पोस्को को सौंपा जा सके. पुलिस फायरिंग से सौ से अधिक लोग घायल हुए और कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई. पुलिस ने दुकानें और घरों को आग लगा दिया. बड़े आंकड़ों के लिए अभ्यस्त हो चुके मन को ये आंकड़े भले साधारण लगें, लेकिन पुलिस ने गांव वालों के साथ जिस तरह का सुलूक किया- वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है. इस कार्रवाई और इससे जुड़े हर पहलू के बारे में जानने के लिए यहां आएं. साथ में पोस्को विरोधी आंदोलन को समझने के लिए यहां क्लिक करें. हाशिया पर पेश है तीन दिन पहले कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अपील. हम कुछ और अपीलें भी यहां पेश करेंगे.

15 मई 2010

अपने हस्ताक्षरों के साथ हम लोग उड़ीसा राज्य पुलिस द्वारा जगतसिंहपुर जिले में प्रस्तावित पोस्को स्टील परियोजना के विरोध में धरना दे रहे किसानों और मछुआरों के खिलाफ बिना किसी उकसावे के की गई फायरिंग और आग लगाए जाने की कड़ी निंदा करते हैं.

ताजा रिपोर्टों के अनुसार धरनास्थल बालीतुथा गांव में आज 100 से अधिक लोग घायल हो गए और अनेक दुकानें और घर पुलिसकर्मियों ने जला दिए. इस अभियान में पुलिस की करीब 40 डिवीजनें शामिल थीं, और यह अभियान अब भी जारी है, जब हम यह लिख रहे हैं. पीपीएसएस (पोस्को प्रतिरोध संघर्ष समिति) से जुड़े हुए सैकड़ों गावंवासी 26 जनवरी 2010 से प्रस्तावित प्लांट के खिलाफ अपनी असहमति जताने के लिए एक शांतिपूर्ण धरना पर बैठे थे.
यह देखना भी क्रूरता पूर्ण है कि इस समय पुलिस द्वारा बालीतुथा में किए जा रहे ये अत्याचार और आगजनी जिले के एसपी के नेतृत्व में हो रहे हैं जबकि भुवनेश्वर में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक 'हम शांतिपूर्ण औद्योगिकीकरण चाहते हैं' जैसे बयान मीडिया को जारी कर रहे हैं. नवीन पटनायक राज्य में पिछले दस सालों के दौरान लोकतांत्रिक प्रतिरोधों से निबटने के लिए अपने निर्मम तरीकों के लिए जाने जाते हैं, जिनके कारण निर्दोष लोगों ने पुलिस फायरिंग और राज्य द्वारा अन्य तरीकों से छेड़ी गई हिंसा में अपनी जान गंवाई है.

आज  (15 मई 2010) की पुलिसिया कार्रवाई से पहले राज्य प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण के लिए चिह्नित गांवों और उन गांवों पर जहां प्रतिरोध मजबूत है, पहले से ही आर्थिक नाकाबंदी थोप रखी थी. इसका भारी डर था कि गांव वालों को उनकी जमीन से हटाने के लिए की गई किसी भी पुलिसिया छापेमारी के नतीजे में इस इलाके के निर्दोष लोगों की मौतें होंगी, जहां महज एक दशक पहले एक बड़े चक्रवात में पहले ही हजारों जानें जा चुकी हैं. हालांकि यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है और इसकी अपनी एक समृद्ध अर्थव्यवस्था है, और स्थानीय समुदाय ने बार-बार यह जताया है कि वे अपने संसाधनों, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को कारपोरेट जगत के लालच के लिए नहीं बेचना चाहते.
हम यह मानते हैं कि एसे निर्मम तरीके से शांतिपूर्ण असहमति को कुचलने से सिर्फ भारतीय लोकतंत्र की जड़ें ही कमजोर होंगी और यह भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से को हताशा में धकेल देगा. अपने संघर्ष के पांच सालों से अधिक समय के दौरान कभी भी पोस्को विरोधी आंदोलनकारी हिंसक कार्वराइयों में शामिल नहीं हुए हैं और इसके वजाय उन्होंने वास्तव में बाकी देश के लिए एक मिसाल कायम की है कि कैसे केवल साधारण मर्दों और औरतों के जन समर्थन को आधार बना कर एक लोकतांत्रिक संघर्ष को चलाया जा सकता है.

हम भारत की सभी  राजनीतिक पार्टियों और सरोकार रखनेवाले नागरिकों से अपील करते हैं कि वे पोस्को विरोधी आंदोलनकारियों पर की जा रही ओड़ीसा सरकार के इस चेतनाशून्य और कठोर कार्रवाई का विरोध करें और इलाके से पुलिस बलों के तत्काल हटाए जाने की मांग करते हैं. केवल शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए ही समाधान हासिल किया जा सकता है और भारतीय लोकतंत्र में आम जनता की खत्म होती आस्था को फिर से स्थापित किया जा सकता है.

Yours sincerely,
1. Prashant Bhushan, Advocate, New Delhi
2. Medha Patkar, NAPM
3. Arundhati Roy, Writer and Activist, New Delhi
4. Sandeep Pandey, NAPM
5. B Ramakrishna Raju, NAPM
6. Praful Samantara, Lok Shakti Abhiyan, Orissa
7. Meher Engineer, Academic, Kolkata
8. Ashok Chaudhury, NFFPFW, New Delhi
9. Subrat Kumar Sahu, Independent Filmmaker, New Delhi
10. Sanjay Bosu Mallick, NFFPFW
11. Madhumita Dutta, Vettiverr Collective, Chennai
12. Nityanand Jayaraman, Journalist, Chennai
13. Shweta Narayan, Community Environmental Monitoring, Chennai
14. Dr Karen Coelho, Academic, Chennai
15. Shazia Nigar, Delhi University and NAPM, New Delhi
16. Soumitra Ghosh, NFFPFW – North Bengal Regional Committee, Siliguri, West Bengal
17. Mamata Dash, Researcher and Activist, NFFPFW, New Delhi
18. Amit Sengupta, Journalist, New Delhi
19. Satya Sivaraman, Journalist, New Delhi
20. Ravi Hemadri, the Other Media, New Delhi
21. Manshi Asher, Environment Research and Action Collective, Himachal Pradesh
22. Shalini Gera, Friends of South Asia, Delhi
23. Shibayan Raha, New Delhi
24. Madhu Sarin, Researcher and Activist, Chandigarh
25. Nandini Sundar, Professor of Sociology, Delhi University
26. Saswati Swetlana
27. Ashish Fernandes, Bangalore
28. Amar Kanwar, Independent Filmmaker, New Delhi
29. B Karthik Navayan, Advocate, Hyderabad
30. Amit Srivastava, India Resource Center
31. Madhuresh Kumar, NAPM
32. Maj Gen (Retd) S G Vombatkere
33. Rashida Bee, Bhopal Gas Peedit Mahila Stationery Karmachari Sangh
34. Champa Devi Shukla, Bhopal Gas Peedit Mahila Stationery Karmachari Sangh
35. Syed M Irfan, Bhopal Gas Peedit Mahila Purush Sangharsh Morcha
36. Rachna Dhingra, Bhopal Group for Information and Action
37. Satinath Sarangi, Bhopal Group for Information and Action
38. Safreen Khan, Children Against Dow Carbide
39. K P Sasi, Independent Filmmaker, Bangalore
40. Anivar Aravnd, ICT Consultant, Movingrepublic, Bangalore
41. Kanchi Kohli, Kalpavriksh, New Delhi
42. Latha Jishnu, Journalist, New Delhi
43. Chanda Asani, Academic, Jaipur
…and many more concerned citizens

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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