हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

शहरों में अपराध का बदलता समाजशास्त्र

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/03/2010 05:27:00 PM

कभी मार्क्स का अपराधों पर लिखा वह दिलचस्प अंश भी हाशिया पर पेश किया जाएगा, जिसमें वे अपराध के राजनीतिक अर्थशास्त्र की खबर लेते (देते) हैं. दिलीप मंडल का यह लेख पढ़ते हुए महसूस होता है कि समाज के सभ्य होते जाने के जितने और जैसे दावे किए जा रहे हैं, अहिंसा और शांति के जितने कबूतर उड़ाए जा रहे हैं ( और उसी अनुपात में देश के दूर-दराज के इलाकों में जनता पर जितना कीचड़ उछाला जा रहा है) वह कितना क्रूर घोटाला है. कुछ साल पहले भाई प्रमोद रंजन ने भी एसा ही एक लेख लिखा था.

नए अपराधी आपके परिचित हैं, रिश्तेदार हैं, मित्र हैं, आपके विश्वसनीय हैं, सफेदपोश हैं और कई बार काफी पढ़े-लिखे हैं। ये कोई भी हो सकते हैं। ये नए अपराधी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढांचे की उपज हैं।

किसी पड़ोसी या रिश्तेदार या दोस्त की नौकरी छिन जाए यो वह किसी तरह के आर्थिक संकट में हो तो क्या उससे सहानुभूति रखने की जगह उससे डरना चाहिए? दिल्ली पुलिस ने फिरौती के लिए हुए अपहरण की घटनाओं के बारे में जो जानकारियां दी हैं, उसके बाद तो ऐसा ही लगता है कि मानवीय रिश्तों की कुछ नई परिभाषाएं जोड़ने-गढ़ने और कुछ नए मानदंड बनाने का समय आ गया है। ऐसा लगता है कि रिश्तों की पवित्रता को लेकर पुरानी अवधारणाएं बदलते समय की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही हैं। विकास के वर्तमान मॉडल ने कई चीजों को खंडित किया है। मानवीय रिश्ते उनमें से एक हैं।

दिल्ली पुलिस ने बताया है कि शहर में फिरौती के लिए हुई अपहरण की घटनाओं में 2009 में एक साल पहले यानी 2008 के मुकाबले डेढ़ गुना बढ़ोतरी हुई है। हालांकि पुलिस भी मानती है कि फिरौती के लिए अपहरण के काफी मामले पुलिस में दर्ज नहीं होते क्योंकि पीड़ित के परिवार वालों को लगता है कि ऐसा करने से अपह्रत की जान को खतरा बढ़ सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि फिरौती के लिए अपहरण के जो मामले दर्ज हुए उनमें से एक को छोड़कर हर घटना में शामिल लोगों में कम से कम एक आदमी ऐसा जरूर था, जो पीड़ित यानी अपहृत का परिचित था। साथ ही अपहरण की घटनाओं में ऐसे लोगों का शामिल होना बढ़ा है जो पढ़े लिखे हैं और जिनका पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है।

इनमें से ज्यादातर लोगों ने आनन-फानन में पैसे कमाने के लिए अपने ही किसी परिचित या रिश्तेदार का अपहरण किया। दिल्ली पुलिस ने आंकड़ा दिया है कि 2009-2010 में फिरौती के लिए अपहरण की 33 वारदातें दर्ज हुईं, इनमें से 32  मामलों में  कोई न कोई रिश्तेदार या दोस्त शामिल पाया गया।। इन वारदातों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए 73 लोगों में से ज्यादातर युवा थे और उनमें से कई ने अपराध के लिए प्रेरणा फिल्मों से ली। इनमें से कई लोग ऐसे भी हैं, जिनकी आर्थिक दशा आर्थिक मंदी की वजह से ठीक नहीं थी।

फिरौती के लिए अपहरण के मामलों में एक और तथ्य ऐसा है जो अपराध का ट्रेंड बताने के साथ ही भारतीय समाज पर भी टिप्पणी है। पुलिस के मुताबिक दिल्ली में अपहरण के जो मामले दर्ज हुए उनमें से सभी में पीड़ित की उम्र 4 से 21 साल के बीच थी और ये सभी लड़के थे। यानी दिल्ली में किसी भी लड़की का फिरौती के लिए अपहरण नहीं किया गया। अपराधी भी दरअसल जानते हैं कि लड़की की तुलना में लड़के की कीमत परिवार वाले बेहतर ढंग से अदा करेंगे। परिवारों में लड़की और लड़के के बीच बरते जाने वाले भेदभाव को ये अपराधी भी जानते-समझते हैं। लड़का-लड़की एक समान के नारों के शोर बीच उच्च और मध्यवर्गीय परिवारों का ये एक और सच है।

फिरौती के लिए अपहरण अकेला शहरी अपराध नहीं है, जिसमें शामिल होने वालों में परिचितों की बहुलता होती है। दरअसल घरों में लूट और चोरी की वारदात में भी पुलिस की शक की सुई सबसे पहले घरों में काम करने वालों और घर में आने जाने वालों पर होती है। पुलिस तफ्तीश की शुरुआत भी कई बार यहीं से शुरू होती है। घरेलू नौकर ऐसे अपराधों में सबसे पहले संदेह के दायरे में आते हैं।  इसी सोच के तहत महानगरों में पुलिस इस बात पर काफी जोर देती है कि बिना पुलिस जांच कराए घर में कोई नौकर न रखें। घरों में आने वाले फेरी वाले, कामवाली बाई, ड्राइवर, इस्तरी वाले, भिखारी, कबाड़ वाले ये सब ऐसे लोग हैं जो चोरी और लूटपाट के बाद पुलिस की जांच के दायरे में सबसे पहले आते हैं।

शहरी अपराध की सामाजिक प्रवृत्तियों को समझने के लिए जरूरी है कि अपने समाज को समझा जाए और उसके बदलते रुझानों की समीक्षा की है। समानता और समाजवाद जैसे आदर्शों को संविधान की प्रस्तावना में शामिल किए जाने के बावजूद ये सच है कि भारतीय समाज में असमानता बहुत ज्यादा है। शिखर पर मौजूद दस फीसदी लोगों के पास धन और समृद्धि का अपार संचय है तो नीचे के 10 फीसदी के हिस्से अतिशय गरीबी है। देश की एक तिहाई से ज्यादा आबादी की प्रतिदिन औसत आमदनी 20 रुपए से कम होना सिर्फ अर्थशास्त्रीय आंकड़ा भर नहीं है। इसका असर समाज पर चौतरफा होता है। देश की आबादी के बड़े हिस्से को इस असमानता का एहसास हो जाए तो ये बात सामाजिक असंतोष को बढ़ाती है।

टेलीविजन से लेकर मोबाइल फोन तक के तूफानी रफ्तार से हुए विस्तार की वजह से अब सूचनाओं का प्रसार लगभग अबाध हो गया है। इलीट की जिंदगी, जो कभी उंची दीवारों के अंदर रहती है, और जिसे लेकर एक रहस्यलोक सा बना होता था, उसका भेद टीवी सीरियलों ने करोड़ों लोगों तक पहुंचा दिया है। वो वक्त भी बदल गया है जब समृद्ध लोगों में धन के प्रदर्शन की प्रवृत्ति नहीं थी या कम थी। अब धन का खुलेआम और अश्लीलता की हद तक प्रदर्शन आम है। ये सारी चीजें समाज के एक हिस्से में असंतोष को बढ़ा रही हैं। अमीरी एक ऐसी फैंटसी है, एक ऐसी मरीचिका है, जिसे हासिल करने के लिए लोग रात-दिन खट रहे हैं, फटाफट अमीर बनने के तरीके ढूंढ रहे हैं, पैसे बचा रहे हैं, मासिक किश्तों पर निर्भर हो रहे हों और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसी फैंटसी के पीछे भागते हुए अपराध की अंधी सुरंग में जाकर फंस रहे हैं।

समाज के लिए ये नए तरह का खतरा है। पुलिस के लिए अपराध पर काबू पाना तब आसान होता है जब अपराधी जाना पहचाना हो, वो किसी गिरोह के सदस्य हों, अपराध का जाना-पहचाना सा तंत्र हो। लेकिन जब कोई आदमी पहली बार अपराध करे तो उसे अपराध करने से रोकना पुलिस के लिए बेहद मुश्किल होता है। नए अपराधी आपके परिचित हैं, रिश्तेदार हैं, मित्र हैं, आपके विश्वसनीय हैं, सफेदपोश हैं और कई बार काफी पढ़े-लिखे हैं। ये कोई भी हो सकते हैं। ये नए अपराधी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढांचे की उपज हैं। इस ढांचे को बदले बगैर ऐसे लोगों को अपराध करने से कैसे रोका जाए, ये सरकार और सत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती है।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ शहरों में अपराध का बदलता समाजशास्त्र ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें