हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एक विस्थापित का अविश्वास प्रस्ताव

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2010 06:57:00 PM

देश का शासक वर्ग अपनी सीमाओं के भीतर एक और युद्ध लड़ रहा है. कारपोरेट कंपनियों, औपनिवेशिक स्वामियों और उनके दलाल देशी पूंजीवादी घरानों के हित में लड़ी जा रही यह लड़ाई पिछले छह महीनों से अधिक समय से लड़ी जा रही है. ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से चल रहा यह युद्ध संघर्षरत जनता पर सलवा जुडूम, रणवीर सेना, सेंद्रा और दूसरे दर्जनों हथियारबंद फासीवादी हमलों की नाकामी के बाद उनकी निरंतरता में चलाया जा रहा है. इस औपनिवेशिक लूट को देश के विकास के लिए जरूरी बताया जा रहा है, लेकिन यह साफ झूठ है. विकास के नाम पर की जा रही यह लूट कारपोरेट घरानों और पूंजी के साम्राज्य के हित के लिए है और इसका देश की व्यापक जनता के हित और संपन्नता से कोई लेना-देना नहीं है. दिलीप मंडल बता रहे हैं कि विकास, विस्थापन, संसाधनों की लूट और इस युद्ध का निहितार्थ क्या है.

मेरा अविश्वास प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र के प्रति है।

एक ऐसे लोकतंत्र के प्रति जहां लोगों की जमीन पर कब्जा करने और उसका सरकारी या निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने के लिए तो कानून है लेकिन पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए आज तक कोई कानून नहीं बन पाया है।

जमीन अधिग्रहण के लिए तो हमारे लोकतंत्र को कोई नया कानून बनाने की जरूरत भी नहीं पड़ी। 1894 के जमीन अधिग्रहण कानून को ही मामूली फेरबदल के बाद जारी रखा गया और उसका इस्तेमाल करके लाखों परिवारों को उनकी जमीन से उखाड़ा जाता रहा। जमीन अधिग्रहण को लेकर 1894 के कानून को बदलने को लेकर सरकार की सुस्ती भी बताती है कि सरकार इस मामले में कितनी अगंभीर है। 10 सितंबर 2009 को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने लोकसभा में बताया कि 1894 के जमीन अधिग्रहण कानून में संसोधन का मसौदा तैयार करने में सरकार लगी है। इस सिलसिले में मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों, विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, विशेषज्ञों और दूसरे संबंधित पक्षों से बात की है और उनके विचार जाने हैं। संसदीय समिति की 17 बैंठकें हो चुकी हैं और जो विचार विमर्श किया गया है उसके आधार पर समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है।(तारांकित प्रश्न संख्या 108 का 10 सितंबर, 2009 को लोकसभा में दिया गया जवाब)

दरअसल जमीन अधिग्रहण को लेकर कानून में संशोधन का काम अक्टूबर 1998 से ही चल रहा है। जमीन अधिग्रहण और विस्थापन को लेकर आंदोलनों के तेज होने की वजह से उस समय की सरकार ने ये आश्वासन दिया था कि सरकार अंग्रेजों के जमाने के इस कानून को बदलेगी। 23 नवंबर 1998 को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में तय किया गया कि जमीन अधिग्रहण कानून में संशोधन पर विचार करने के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया जाएगा। मंत्रिओं के समूह ने इस बारे में विचार करने के लिए कई बैठकें कीं। आखिरकार छह साल बाद 2004 में जमीन अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक कैबिनेट सचिवालय को सौंपा ताकि कैबिनेट के सामने इसे मंजूरी के लिए रखा जा सके। लेकिन कैबिनेट सचिवालय ने इस विधेयक को यह कहकर लौटा दिया कि 14वीं लोकसभा के गठन के बाद कानून का नया मसौदा पेश किया जाए। 14वीं लोकसभा बनी और फिर उसमें जमीन अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक पेश हुआ लेकिन इस काम में तीन साल और बीत गए। इसके बाद एक और लोकसभा चुनाव हो गए। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार की केंद्र में वापसी हो गई, लेकिन 1894 के जमीन अधिग्रहण कानून को बदलने का विधेयक जस का तस पड़ा है। (ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय की 39वीं रिपोर्ट, पेज 3-4)  विस्थापितों की हालत सुधारने के लिए इस विधेयक से मामूली तौर पर ही मदद मिलेगी, लेकिन सरकार इतने साल में इन मामूली संशोधनों को भी कानूनी रूप नहीं दे सकी है। इससे आप अंदाजा लगा सकती हैं कि जिन कंपनियों और उद्योग समूहों की नजर देश के लोगों की जमीन पर लगी है वो कितने मजबूत हैं और सरकार किनके हितों को पूरा कर रही है।


विस्थापन की बड़ी तस्वीर को देखें तो ये लाखों लागों के बेघरबार होने, बेरोजगार होने और उनकी संस्कृति के नाश की दारुण गाथा है। लेकिन ये तस्वीर दरअसल एक कोलाज है हजारों लाखों छोटी तस्वीरों का। विस्थापन की हर घटना अपने साथ अलग अलग तकलीफों, अलग अलग किस्म के असंतोष और अन्याय की विशिष्टताएं समेटे हुए हैं। इनमें जो एक सेंट्रल थीम, एक समान पहलू जो बराबर बना रहता है वो है शासन का, सरकार का अन्यायी चेहरा।

चलिए हम आपको 21वीं सदी के पहले दशक के आखिर के दिनों में ही ले चलते हैं ताकि इतिहास के किसी धुंधलके में सच की तलाश में आपको भटकना न पड़े। दो साल पुरानी बात है। झारखंड प्रांत के बोकारो स्टील प्लांट के विस्थापितों ने एक दिन भरी दुपहरिया में शहर के सबसे बड़े मैदान मजदूर मैदान में हल जोत दिया। देखते ही देखते लगभग 10,000 विस्थापित मजदूर मैदान में इकट्ठा हो गए और उन्होंने मजदूर मैदान में अपने मवेशी बांध दिए। इनमें से कुछ ने मैदान में अपना अपना प्लॉट बांट लिया और रस्सी से उसे घेर भी दिया। ये जमीन उनकी ही थी। देश का विकास करने के लिए सरकार ने उनसे जमीन औने पौने दाम में खरीद ली थी। इसके लिए उनकी सहमति लेने की कोई बाध्यता सरकार की नहीं होती है। अखबारों में नोटिस छपा था, जिसे उस इलाके के ज्यादातर लोगों ने पढ़ा भी नहीं, क्योंकि एक तो गांवों में अखबार आते नहीं थे और दूसरी और ज्यादा बड़ी बात ये कि उनमें से ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं थे।

मजदूर मैदान पर विस्थापितों का कब्जा मुश्किल से दो घंटे तक चला। देखते ही देखते वहां राज्य पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल यानी सीआईएसएफ और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान ऑटोमैटिक राइफलों से लैस होकर पहुंच गए। लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले दागे गए और हवाई फाइरिंग भी हुई। इस तरह विस्थापितों को उस जमीन से एक बार फिर खदेड़ दिया गया, जो उनकी अपनी थी। कई सौ लोग गिरफ्तार भी किए गए। और उनके खिलाफ धाराएं ऐसी लगाई गईं, कि उन्हें आसानी से जमानत न मिल सके।

इस बाते में शक नहीं कि भारत के कानून के हिसाब से विस्थापितों ने गैरकानूनी काम किया था। वो जिसे अपने बाप की जमीन समझ रहे थे, वो जमीन सरकार उनसे ले चुकी थी और वो अब सरकारी जमीन है। इस जमीन को जबरन जोत देना और उसे अपने लिए घेर कर कब्जा कर लेने जैसी हरकत को कोई भी सरकार कैसे बर्दास्त कर सकती है। इस तरह तो पूरे देश में अराजकता फैल जाएगी, कानून का राज खत्म हो जाएगा और लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों को भेजकर अगर फिर से कानून का राज स्थापित किया गया तो ये स्वाभाविक भी है।

लेकिन यहां पर थोड़ा रुककर आप ये सोच सकते हैं कि आखिर ऐसी क्या नौबत आ गई कि लगभग 10,000 विस्थापित, जिनमें बच्चे-बूढे और महिलाएं भी शामिल थीं, इस तरह कानून को अपने हाथ में लेने को उतारू हो गए। वो इतने भोले तो नहीं ही होंगे कि उन्हें अपने काम के गैरकानूनी होने का एहसान नहीं होगा। उन्हें ये भी मालूम होगा कि इस तरह वो अपने बाप-दादाओं की गंवाई हुई जमीन पर वापस कब्जा नहीं कर सकते। पुलिस और प्रशासन का इस मामले में क्या रुख होगा, इसका भी अंदाजा उन्हों होगा और य़े भी पता होगा कि ये सब करके लाठियां खाने और जेल जाने के अलावा उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। फिर भी उन्होंने मजदूर मैदान पर कब्जा करने का फैसला किया।

दरअसल ये बेहद मजबूरी में उठाया गया कदम था। विस्थापितों के लिए ये आखिरी रास्ता था, क्योंकि शिकायतों की सुनवाई के सारे रास्ते बंद हो चुके थे। बोकारो की ये घटना भारत में विस्थापन की पूरी कहानी का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन इसे इस पूरी पीड़ा का एक प्रतिनिधि हिस्सा मान सकते हैं। बोकारो में जब स्टील प्लांट बनना तय हुआ तो दामोदर नदी के उत्तर में एक जमीन के एक बड़े हिस्से को चिन्हित कर इसे खाली कराने का काम शुरू हुआ। लगभग 60 गांव पूरी तरह और कुछ गांवों के कुछ हिस्से को सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून का इस्तेमाल करके अपने कब्जे में ले लिया। सरकारी दरों पर जमीन का मुआवजा दिया गया जो जमीन के बाजार भाव से बेहद कम था। स्टील प्लांट में बड़ी संख्या में काम करने वालों की जरूरत थी। हर तरह के पदों पर लोग रखे जाने थे। लेकिन सरकार ने ये तय किया कि सिर्फ चौथी श्रेणी के पदों पर हर विस्थापित परिवार से एक आदमी को नौकरी दी जाएगी। इसके अलवा हर परिवार को रहने के लिए जमीन का एक टुकड़ा दिया जाएगा।

1960 के दशक में ये पूरी प्रक्रिया आम तौर पर बिना किसी विरोध के संपन्न हो गई। बुलडोजर चलाकर गांवों को समतल कर दिया गया और लोगों ने अपने समान बैलगाड़ियों पर लाद कर दूसरी ठौर ढूंढ लिए। गावों में घर, बाग, खेत, चारागाह, कुलदेवता के स्थान, श्मशान घाट सभी कुछ थे। सब देखते देखते खत्म हो गए। विस्थापन के साथ बहुत कुछ गया। और सबसे बढ़कर रोजगार का स्थायी साधन खत्म हो गया। ये सच हो सकता है कि खेतों से ज्यादातर परिवारों को ढेर सारी कमाई तो नहीं होती लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी इनसे परिवारों का पेट जरूर पलता है। इस मामले में नौकरी और खेती में फर्क है, जिसे हमारे नीति नियंता कभी समझना नहीं चाहेंगे। साथ ही पुनर्वास की सबसे उदार नीति भी इस बात का ध्यान नहीं रखती कि परिवार में सिर्फ पुरुष नहीं महिलाएं भी होती हैं। खेती बागवानी, पशुपालन, मछली पकड़ना, खेतों से वनोपज लाना, ये सब ऐसी आर्थिक गतिविधियां हैं, जिनमें महिलाओं की भी हिस्सेदारी होती है। लेकिन विस्थापन महिलाओं से आर्थिक गतिविधियों में हिस्सेदारी छीन लेता है या उसे बेहद कम कर देता है। इस तरह बोकारो के आसपास के इलाकों में विस्थापित कॉलोनियों में महिलाओं के पास अब करने को कोई ऐसा काम नहीं है, जिससे आमदनी हो। इस बात ने घर के बारे में फैसले करने में भी उनकी भूमिका को कमजोर बनाया है। ये विस्थापन की ऐसी सामाजिक कीमत है, जिसकी भरपाई करने की कोई परिकल्पना हुक्मरानों के पास नहीं है। वो तो इस तरह की सामाजिक पीड़ा को स्वीकार भी नहीं करते।

साथ ही जमीन अधिग्रहण में मुआवजा सिर्फ जमीन के मालिकों को मिलता है। इस व्यवस्था में एक भारी गड़बड़ी है। जमीन से उन लोगों का रोजगार तो चलता ही है जो जमीन के मालिक हैं, साथ ही जमीन के साथ अक्सर बटाईदार भी जुड़े हैं। खेती का काम दरअसल कई बार बटाईदार ही करते हैं। अक्सर गांवों में खेत मालिकों से ज्यादा संख्या बटाईदारों की होती है, जिनका जीवन खेतों के भरोसे चलता है। लेकिन जब किसान की जमीन का अधिग्रहण होता है तो बटाईदारों का ख्याल रखने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। सच तो ये है कि देश के ज्यादातर हिस्सों में बटाईदारों का रिकॉर्ड रखने का कानून ही नहीं है। (ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय की 39वीं रिपोर्ट, पेज-27) साथ ही ऐसे कई समुदाय होते हैं जो खेतों के मालिक तो नहीं होते पर खेती पर आधारित होते हैं। चरवाहों से लेकर खेती के उपकरण बनाने वालों तक को कोई मुआवजा मिले ऐसी व्यवस्था नहीं है। भूमिहीन किसानों यानी खेत मजदूरों के लिए भी पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं होती है। इस तरह विस्थापन का दायरा और उसका असर खेतों के मालिकाना से कहीं बढ़कर है। इनका ध्यान रखने के लिए एक ऐसी जमीन अधिग्रहण और राहत-पुनर्वास नीति होनी चाहिए जो बेहद मानवीय तरीके से विचार करके बनाई गई हो। लेकिन भारतीय राज्य का जो चेहरा लोग देख रहे हैं वो मानवीय तो दूर बेहद निर्मम, निष्ठुर और क्रूर है।  

जमीन का मुआवजा देने से लेकर, घर बनाने के लिए जमीन देने या यदा कदा नौकरियां देने में महिलाओं की पूरी तरह अनदेखी कर दी जाती है। जमीन अधिग्रहण और राहत-पुनर्वास की अब तक की नीतियां और कानून बनाते समय महिलाओं के बारे में सोचा भी नहीं गया है। इस वजह से उनके लिए किसी तरह के अलग प्रावधान नहीं किए गए हैं। जमीन से, और अपने निवास स्थल से उजड़ने का सबसे बुरा असर महिलाओं पर पड़ता है लेकिन शासन इस बारे में कभी नहीं सोचता। फिर आप जब किसी से खेत छीनते हैं और उसके बदले परिवार के एक सदस्य को नौकरी देते हैं तो दरअसल सिर्फ एक पीढ़ी के लिए लिए जीने का साधन मिलता है। अगली पीढ़ियों के लिए फिर एक शून्य बच जाता है।

स्टील प्लांट के विस्थापितों की नई पीढ़ी के हिस्से आज वही शून्य है और उससे उपजा असंतोष है।

असंतोष सिर्फ इस बात का नहीं है कि विस्थापित परिवारों की अगली पीढ़ियों के बारे में नहीं सोचा गया। असंतोष इस बात का भी है कि विस्थापितों को बाकी लोगों से कमतर माना गया। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि जिन लोगों ने उजाड़कर एक पूरा प्लांट और साथ में एक शहर बसा वहां आधुनिक जीवन के सारे साधन हैं। बिजली है। पानी की सप्लाई होती है। कॉलोनियों में शानदार सड़कें हैं। हर कॉलोनी में मार्केट हैं। हेल्थ सेंटर हैं। अस्पताल हैं। कम्युनिटी सेंटर और खेल के मैदान हैं। स्टील प्लांट के अच्छे स्कूल हैं। लेकिन उनकी तुलना में विस्थापित बस्तियों में सड़कें कच्ची हैं। इनमें से किसी भी बस्ती में अस्पताल या हेल्थ सेंटर नहीं है। स्टील प्लांट के स्कूल नहीं हैं। बिजली कभी आती है कभी नहीं आती। यानी कुल मिलाकर बस्ती के नांम पर एक बियाबान है जहां कई हजार लोग फेंक दिए गए हैं और ये सब इस बाता का पुरस्कार है कि इनकी जमीनें लोक उद्देश्य के नामं पर ले ली गई और उस पर देश का एक बड़ा स्टील प्लांट बसाया गया। इनमें से कई बस्तियों तक पहुंचने के लिए एप्रोच रोड तक नहीं हैं। अगर वहां तक पहुंचने के रास्ते में कोई नदी है तो बारह महीने तक कारगर रहने वाले पुल नहीं हैं। बरसात में इनमें से कुछ बस्तियों तक पहुंचना काफी मुश्किल होता है।

कुल मिलाकर एक ही इलाके में दो तरह के इलाके बना दिए गए हैं। विस्थापितों के साथ इस्तेमाल करके फेंक दिए जाने वाला व्यवहार हुआ है। इसे समझने के लिए इस शहर में कुछ घंटे बिताने की जरूरत है। ये सबकों दिखता है, लेकिन स्टील प्लांट प्रबंधन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के लिए ये एक सामान्य बात है और इस पर विचार करने की जरूरत है ऐसा किसी को नहीं लगता।

विस्थापितों के लिए एक और चुभने वाली बात ये हुई है कि उनसे जमीन लेते समय ये कहा गया था कि इस जमीन पर प्लांट बनेगा और वहां काम करने वालों के लिए कालोनियां बनाई जाएंगी। लेकिन विस्थापितों ने देखा कि स्टील प्लांट प्रबंधन ने प्रॉपर्टी डीलर की भूमिका अपना ली। पहले तो एक को-ऑपरेटिव कॉलोनी बनाकर लगभग 500 प्लॉट लीज पर दे दिए गए। इन 500 लोगों को प्लॉट देते समय विस्थापितों को किसी तरह की वरीयता या रिजर्वेशन नहीं दिया गया। प्लॉट अलग अलग साइज के थे औरं बड़े प्लॉट ज्यादा सेलरी वालों को और छोटे प्लॉट कम सेलरी वालों को देने का नियम बना। अब क्योंकि विस्थापितों में से लगभग सभी के हिस्से में चौथी श्रेणी की नौकरियां आई थीं, इसलिए बड़े प्लॉट पाने की दौड़ से वो ऐसे ही छंट गए। साथ ही अफसरशाही में विस्थापितों की गैर मौजूदगी की वजह से ज्यादातर प्लॉट उन लोगों को मिले जो विस्थापित नहीं थे। कुल मिलाकर नतीजा ये रहा कि विस्थापितों की आंखों के सामने उनसे ली गई जमीन पर एक कॉलोनी खड़ी हो गई और वो इसका कुछ नहीं कर पाए।

इसके बाद तो एक सिलसिला ही चल पड़ा। प्लांट में काम करने वालों के लिए बनी कॉलोनियों में जगह जगह मार्केट के लिए जगह तय कर दी गई। उन जगहों पर प्लॉट काटकर उन्हें कारोबारियों को लीज पर दे दिया गया। इस तरह पूरे शहर में हजारों की संख्या में प्लॉट लोगों के दे दिए गए। इन प्लॉट को देते समय भी इस बात की जानबूझकर अनेदेखी की गई कि ये जमीन किसी और की है। प्लांट बनाने के नाम पर ये जमीन जिन लोगों से ली गई है उनका इन पर पहला हक होना चाहिए। इस तरह विस्थापितों को उजाड़कर दूसरे लोगों के शहर भर में बसाया गया। साथ ही शहर की जमीन पर हर तरह के अवैध कब्जे होते रहे और प्रशासन ने कभी उन पर सख्ती नहीं की। इस तरह विस्थापितों की आंखों के सामने उनसे ली गई जमीन किसी और की होती चली गई और कुछ भी नहीं कर पाए।

हद तो तब हो गई जब स्टील प्लांट प्रबंधन ने मजदूरों के लिए बनाई गई कॉलोनियों के फ्लैट लीज पर देना शुरू कर दिया। इस तरह हजारों की संख्या में फ्लैट दे दिए गए। जाहिर है इन फ्लैट को देते समय भी विस्थापितों को किसी तरह की वरीयता नहीं दी गई। बाद में मामला अदालत में पहुंचा तो फ्लैट देने का सिलसिला तो रुका, जिन्हें फ्लैट दिए जा चुके थे, उनसे फ्लैट वापस नहीं लिए गए। इस तरह कुल मिलाकर पूरे इलाके की आबादी की संरचना अब बदल चुकी है। बोकारो में अब वहां के मूलनिवासी अल्पसंख्यक हैं। राजनीति के लेकर जीवन के तमाम क्षेत्रों में वो हाशिए पर हैं, पिछड़ चुके हैं। उनकी सांस्कृतिक पहचान विलुप्त हो रही है। वो अपने ही घर में बेगाने हैं। उनकी भाषा खत्म हो रही है। इस इलाके में चलाए जा रहे स्कूलों में विस्थापित बच्चों को मातृभाषा नहीं पढा़ई जाती। घर पर वो मातृभाषा सीखते हैं और स्कूल जाकर हिंदी, संस्कृत और इंग्लिश सीखते हैं। इस तरह उन पर चार भाषाओ का बोझ होता है। जाहिर है, हिंदी भाषी छात्रों के मुकाबले में आने में ही उनके स्कूली जीवन के शुरुआती कुछ साल खप जाते हैं। विस्थापित छात्रों के स्कूलों में अपेक्षाकृत खराब प्रदर्शन की ये सबसे बड़ी वजह है, लेकिन इसे दूर करने की बात कभी सोची नहीं गई। उन्हेंये विकल्प दिया जासकता है कि वो संस्कृत की जगह अपनी मातृभाषा पढ़ें। इस तरह वो भी गैर विस्थापित छात्रों के साथ बराबरी कर पाते। लेकिन ऐसे विकल्पों के बारे में सोचने के लिए जिस तरह की संवेदनशीलता शासन में होनी चाहिए, वो शुरू से ही नदारद है। इसका खामियाजा विस्थापितों की आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ रहा है। 

स्टील प्लांट प्रबंधन ने विस्थापितों की पहली पीढ़ी के काफी लोगों को नौकरियां दीं। लेकिन अब विस्थापितों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी नौकरी के काबिल हो चुकी है। उन्हें नौकरी पर रखने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। नौकरियों पर लोग अब भी रखे जाते हैं लेकिन उनमें विस्थापितों के लिए कोई रिजर्वेशन नहीं हैं। इस तरह विस्थापितों की युवा पीढ़ियां लोहा चोरी करके.या ठेका मजदूर के तौर पर काम करके या छोटा-मोटा बिजनेस करके अपना गुजारा कर रही है। स्टील प्लांट प्रबंधन और सरकार चाहती तो इन युवकों को कम के कम छोटे कॉन्ट्रेक्ट देते समय तो प्राथमिकता दे ही सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बोकारो के विस्थापित युवाओं के लिए इस समय सबसे बड़े रोजगार लोहा चोरी है। जिन लोगों की जमीन पर इतना बड़ा प्लांट लगा है उनके बच्चे प्लांट से फेंके गए कचरे के ढेर से गैरकानूनी रूप से लोहा चुनते हैं और उन्हें लोहा माफिया को बचेते हैं। कई विस्थापित युवा लोहा माफिया के लिए शूटर बन गए हैं और आपसी झगड़ों में गोलियों का शिकार बने हैं। ये अपने आप में इस बात का सबूत है कि इस प्लांट को बनाते समय लागू की गई विस्थापन और पुनर्वास की नीति में कितना बड़ा खोट था।

ऐसे ही विस्थापित बच्चों और जवानों का जब दिमाग खराब होता है तो हक मांगने लगते हैं। मजदूर मैदान में जब वो अपने हल बैल लेकर आ गए तो उनका तर्क यही था कि बोकारो प्लांट का प्रबंधन और सरकार विस्थापितों से ली गई जमीन के एक बड़े हिस्से को बेच चुका है और उसके खरीदार गैर विस्थापित हैं। ऐसे में या तो प्रबंधन खाली पड़ी बाकी जमीन विस्थापितों को लौटा दे या फिर वो ऐसी जमीनों पर कब्जा कर लेंगे, क्योंकि वैसे भी वो जमीन उनकी ही है जिसे प्लांट बनाने के लिए सरकार ने बेहद सस्ते में उनसे ले लिया है। लेकिन ऐसे भोले तर्कशास्त्र का सरकार चलाने वालों के लिए कोई मतलब नहीं होता। उनके लिए ऐसा करने वालों ने कानून तोड़ा है और उन्हें कानून की धाराओं के तहत मुकदमे झेलने पड़ेंगे।

विस्थापन की पीड़ा सिर्फ इतनी नहीं है कि आपसे कुछ छीन लिया गया है, बल्कि ये पीड़ा छले जाने की भी है। जब भी कोई प्रोजक्ट बनना होता है तो जमीन लेने के लिए वादों का पूरा जाल बुना जाता है। नौकरी, ढेर सारे पैसे, बिजनेस खोलने की सुविधा, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पुनर्वास के लिए जमीन, घर बनाने की सुविधा और ऐसे ही तमाम वादों के जरिए सरकार जमीन लेने की प्रक्रिया के राह में आने वाले रोड़ों और संभावित प्रतिरोधों को कमजोर कर देती है। लेकिन जब जमीन हासिल हो जाती है तो इन वादों को आसानी से भुला दिया जाता है।

ऐसा करना इसलिए भी आसान होता है कि ये बाते अब तक देश के किसी कानून का हिस्सा नहीं हैं। अगर पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति, २००७  को देखें तो हमें कई बेहतरीन बातें दिखेंगी। मिसाल के तौर पर इस नीति में ये कहा गया है कि
कि मैदानी इलाकों में ४०० से ज्यादा और आदिवासी, पहाड़ी या अनुसूचित इलाकों में २०० से ज्यादा परिवारों का विस्थापन करने से पहले उसके सामाजिक असर का अध्य्यन जरूरी होगा। ऐसा कोई अध्ययन करने की परंपरा नहीं है और इसके बिना ही लाखों परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। इस नीति में ढेर सारी अच्छी बातें कही गई हैं।

मिसाल के तौर पर अगर पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीति, २००७  में विस्थापन से पहले पुनर्वास को सिद्धांत के रूप में मान्यता दी गई है। ग्राम सभा के साथ विचार विमर्श और जनसुनवाई को अनिवार्य बनाया गया है। अगर संभव हो तो जमीन के बदले जमीन दी जाएगी। विस्थापित होने वाले लोगों को हुनरमंद बनाया जाएगा और परियोजना की नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। हर परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) से एक व्यक्ति को रोजगार देना इस नीति का हिस्सा है। इसके अलावा जमीन के बदले मुआवजा देना, प्रभावित परिवारों को बनने वाली प रियोजना में शेयर देने, भूमिहीन लोगों समेत हर परिवार के रहने के लिए घर देने, विकलांगों, अबलाओं, अनाथों, विधवाओं और अकेली अविवाहित लड़कियों को मासिक पेशन देने, मुआवजे को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ने, पुनर्वास वाले इलाकों में बुनियादी ढांचा और सुविधाएं मुहैया कराने, आसपास के इलाकों का विकास करने और विस्थापितों की शिकायत पर सुनवाई करने के लिए लोकपाल बनाने जैसी बेहतरीन बातें इस नीति में हैं। ये बातों कानों को बेहद मधुर लगती हैं। इनमें से कुछ पर भी अमल किया जाता तो विस्थापन को लेकर इतने हंगामे न होते।

लेकिन इन पर विस्थापितों का भरोसा जमना आसान नहीं है?  एक तो ये नीतिया बनाने में देश को आजादी के बाद साठ साल लग गए। इस बात का नीति में कहीं जिक्र नहीं है कि पिछले विस्थापनों पर ये नीति लागू की जा सकती है। साथ ही सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस नीति को लागू करने की कानूनी तौर पर कोई बाध्यता नहीं है। इस वजह से राज्य सरकारें इनके अमल में मनमाना रवैया अपनाने को स्वतंत्र हैं। और अब तक विस्थापन को लेकर शासन का जो रवैया रहा है उसे देखते हुए ये मानने का कोई कारण नहीं है कि इस नीति पर अमल किया जाएगा। ये कानून नहीं है कि इसे तोड़े जाने पर या इसका सही तरीके से पालन न किए जाने के खिलाफ आप अदालत का सहारा ले सकते हैं। कुल मिलाकर ये कुछ अच्छी और बेहतरीन बातें हैं, जिन्हें न मानने के लिए हर सरकार स्वतंत्र है।

साथ ही 1894 के जिस भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन की बात 1998 के बाद से की जा रही है उसमें भी कई खोट हैं। मिसाल के तौर पर पुराने कानून की जगह लेने के लिए लाए गए भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक 2007 में पुराने कानून की उन खामियों को दूर नहीं किया गया है जिसकी वजह से विस्थापन और जमीन अधिग्रहण इतना विवादित बन गया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस कानून में सार्वजनिक उद्देश्य (पब्लिक परपस) के लिए जमीन अधिग्रहण को सही ठहराते हुए सार्वजनिक उद्देश्य को इस तरह से परिभाषित किया गया है, जिसकी मनमानी व्याख्या की गुंजाइश है। इस विधेयक के क्लॉज  5(v)(f) का तीसरा बिंदु पब्लिक परपस की व्याख्या करते हुए ये कहता है कि “आम जनता के लिए उपयोगी किसी भी उद्देश्य के लिए जब कोई व्यक्ति कानूनी तरीके से 70 प्रतिशत तक जमीन अधिग्रहण कर ले और बाकी बची तीन प्रतिशत जमीन अभी तक अधिग्रहित न की गई हो। इसके साथ ये व्याख्या जोड़ी गई है कि इस कानून में जिस ‘व्यक्ति’ का उल्लेख आया है वो कोई कंपनी, एसोसिएशन या लोगों का समूह हो सकता है।” जाहिर है कि ये नया प्रस्तावित कानून जिस तरह के पब्लिक परपस की व्याख्या कर रहा है उसके तहत किसी भी निजी उद्योग या उपक्रम को “आम जनता के लिए उपयोगी” करार दिया जा सकता है और सरकार ऐसे उपक्रम के लिए लोगों से जमीन लेकर उन्हें विस्थापित कर पाएगी।

इस 70%-30% फॉर्मूले में कुछ और खामियां हैं। मिसाल के तौर पर जिस 30 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण सरकार करेगी उन पर मुआवजे और विस्थापितों के भलाई के कानूनी प्रावधान (हालांकि वो नाम के ही हैं) लागू होंगे। संशोधन विधेयक इस बारे में खामोश है कि जिस 70 प्रतिशत जमीन का अधिग्रहण निजी तौर पर किया गया है, उस पर राहत और पुनर्वास के प्रावधान लागू होंगे या नहीं। इस बारे में चुप्पी से भी सरकार की की नीयत का पता चलता है। जब ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने इस बारे में मंत्रालय से पूछा तो उनका जवाब था कि राहत और पुनर्वास के प्रवधान तभी लागू होंगे जब किसी से जबरन (असहमति के बावजूद) जमीन ली जाएगी। (ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़ी स्थायी संसदीय समिति की 39वीं रिपोर्ट  जाहिर है जमीन खरीदने वाली निजी कंपनियों और जमीन बेचने वालों के बीच के सौदे में ये प्रावधान लागू नहीं होंगे। मुमकिन है कि इस व्यवस्था के तहत किसी इलाके में बंजर और कम उपज वाली 70 प्रतिशत तक जमीन का अधिग्रहण कंपनियां कर लें और बाकी जमीन को खाली कराने का काम सरकार की मशीनरी करे। ये एक खतरनाक स्थिति हो सकती है। इस व्यवस्था की वजह से एक ही इलाके के लोगो को अलग अलग दरों पर जमीन बेचनी पड़ सकती है।

दरअसल जमीन अधिग्रहण को लेकर सबसे ज्यादा विवाद इस बात को लेकर है कि सरकार कंपनियों के लिए सस्ती दर पर लोगों से जमीन क्यों ले रही है। जमीन अधिग्रहण कानून के नए रूप में इस बात की व्यवस्था कर दी गई है कि पूरे कानून में कहीं ये नहीं कहा गया है कि सरकार कंपनियों के लिए जमीन लेगी। बल्कि अब तक लागू कानून में कंपनी शब्द बार बार आया है जबकि नए कानून में ये शब्द ही लगभग गायब है। लेकिन सरकार ने कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहण करने का अपना एजेंडा बदला नहीं हैं। विधेयक के क्लॉज  5(v)(f) में परसन यानी वयक्ति शब्द की व्याख्या करते हुए साफ कर दिया गया है कि वो व्यक्ति दरअसल कोई कंपनी भी हो सकती है। यानी सरकार कानून में संशोधन के बावजूद कंपनियों के लिए लोगों को उनकी जमीन से उजाड़ती रहेगी। साथ ही कानून में एक नई धारा 54 (ए) को जोड़ा गया है कि जिसके तहत अगर किसी अधिग्रहित जमीन का पांच साल तक इस्तेमाल नहीं होता और वो खाली पड़ी रहती है तो वो जमीन अपने आप संबंधित सरकार की हो जाएगी। यानी ली गई जमीन का इस्तेमाल हो या न हो, वो उसके पुराने मालिक को नहीं लौटाई जाएगी। ये एक बड़ी दिक्कत है। क्योंकि सरकार हमेशा जरूरत से ज्यादा जमीन अधिग्रहित करती है और खाली जमीन को अगर पुराने मालिक को लौटाने का प्रावधान नए कानून में जोडा़ जाता तो सरकारें जमीन अधिग्रहण करते समय सतर्क रहती। लेकिन यहां एक बार फिर सरकार की मंशा का सवाल सामने आता है।

साथ ही जैसा कि बोकारो स्टील प्लांट के मामले में हुआ, किसानों से जमीन लेने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी। उन्हें मुआवजा देने और उन्हें नई जगहों पर बसाने की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की थी। लेकिन इस जगह पर बने प्लांट से मिलने वाली सुविधाएं लोगों तक पहुंचाने का दारोमदार स्टील प्लांट प्रबंधन और प्रकारांतर में केंद्र सरकार का था। इसका नतीजा ये हुआ कि प्लांट के कर्मचारियों की कॉलोनी और विस्थापितों की कॉलोनियों में जनसुविधाओं से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के स्तर में भारी फर्क आ गया। इस प्लांट से पैदा होने वाले राजस्व का एक हिस्सा विस्थापितों के लिए खर्च करने जैसे कोई एजेंडा स्टील प्लांट प्रबंधन के पास नहीं था। चूंकि प्लांट को जमीन मिल चुकी थी, इसलिए विस्थापितों के हितों के लिए सचेत रहना अब स्टील प्लांट प्रबंधन की चिंता से बाहर की बात थी। राज्य सरकार का पुनर्वास विभाग बेरोजगार विस्थापितों की सूची लगातार स्टील प्लांट प्रबंधन को भेजता है, जिस पर अमल करने या ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी जाती। जब विस्थापित नौकरी के लिए आंदोलन करते हैं तो राज्य सरकार कहती है कि ये जिम्मा स्टील प्लांट का है और  जब लोग स्टील प्लांट प्रबंधन के पास जाते हैं तो उन्हें बताया जाता है कि उन्हें नौकरी देने का कोई वादा नहीं किया गया है और चूंकि उनसे जमीन राज्य सरकार ने ली है इसलिए उन्हें इस तरह की कोई भी मांग राज्य सरकार के सामने रखनी चाहिए। हालांकि जब किसी आंदोलन को दबाने की बारी आती है तो राज्य सरकार और स्टील प्लांट प्रबंधन मिल जुलकर काम करते हैं। मिसाल के तौर पर, बोकारो के मजदूर मैदान में विस्थापितों के आंदोलन की मांगों को लेकर राज्य सरकार और स्टील प्लांट प्रबंधन ने जिम्मेदारी एक दूसरे के सिर मढ़ने की कोशिश की। लेकन आंदोलन के दमन के लिए दोनों के ही सुरक्षा बलों ने मिलकर काम किया और उस दौरान इनके बीच समन्वय की कोई कमी नहीं रही।

केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जिम्मेदारी टालने का रवैया कई मौकों पर दिखता है। मिसाल के तौर पर केन्द्र सरकार की एसईजेड नीति के तहत हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में लोगो को विस्थापित करके उनकी जमीन कंपनियों को दी गई है। देश में 346 एसईजेड का नोटिफिकेशन हुआ है और इन्हें बनाने में 41,090 हेक्टेयर जमीन लगी है।
(लोकसभा में सांसद प्रबोध पांडा के पूछे गए सवाल का 30 नवंबर 2009 को दिया गया जवाब)। लेकिन केंद्र सरकार ये बताने को तैयार नहीं है कि अब तक इस नीति के तहत कितने लोगों को उजड़ना पड़ा है। न ही वो ये बताती है कि आने वाले दिनों में कितने और लोगों को विस्थआपित होना पड़ सकता है। सरकार ने ये भी बताने से इनकार कर दिया कि इस तरह पुनर्वास होने वाले लोगों के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कितनी रकम खर्च कर चुकी है और कितनी और रकम खर्च करने वाली है। सांसद सैयद अजीज पाशा के राज्य सभा में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि जमीन राज्य का विषय है। और एसईजेड के लिए जमीन संबंधित राज्य सरकारों की नीति और प्रक्रिया के तहत ली जाती है। सरकार का ये भी कहना है कि राहत और पुनर्वास का पैकेज भी राज्यों की नीतियों के मुताबिक में अलग अलग है। (राज्य सभा अतारांकित प्रश्न संख्या  १३८४, जवाब-२ दिसंबर २००९)

आज अगर सरकारों के लिए देश के लगभग तमाम हिस्सों में जमीन अधिग्रहण मुश्किल काम बन गया है और हर जगह उसे लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है तो इसकी जड़ों को समझना मुश्किल नहीं है। विस्थापन और पुनर्वास के अब तक के मॉडल और पिछले उदाहरण लोगों में विश्वास नहीं जगा पाते हैं। हर जगह से ठगे जाने की कहानी सुनकर कोई भी आदमी अब अपनी जमीन सरकार को देने में हिचकता है। देश के कई राज्यों में कारखाने अब इसलिए नहीं लग पा रहे हैं कि लोग इसके लिए जमीन देने को तैयार नहीं है। झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में मित्तल, जिंदल, टाटा और पास्को के कई बड़े प्रोजेक्ट अब फंस गए हैं। लोगों से जमीन लेने के लिए कंपनियां हर तरह के तिकड़म कर रही है। सरकार भी उनके पक्ष में जो भी मुमकिन हो वो कर रही है। लोगों को धमकाया जा रहा है। कई तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। दमन के तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों को माओवादी और नक्सली कहकर दमन तंत्र चलाया जा रहा है। विरोध करने वालों के बीच फूट डालने के तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं। युवाओं के एक हिस्से को नशे में चूर कर उनके प्रतिरोध को तोड़ने की कोशिशें हो रही हैं। विस्थापितों के प्रभावशाली हिस्से को ठेके देने के लालच के सहारे आंदोलन के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है।

लेकिन चूंकि लोगों की जिंदगी दांव पर है, इसलिए इस तरह के टोटके काम नहीं आ रहें हैं। प्रतिरोध की ताकत लगातार बढ़ रही है और उन्हें दबा पाना अब राज्य सरकारों के बूते के बाहर हो गया है। इसलिए अब केंद्र सरकार इस काम में बंदूकें लेकर उतर गई हैं। अर्धसैनिक बलों को देश की सीमा से हटाकर जमीन अधिग्रहण का प्रतिरोध तोड़ने के काम में लगा दिया गया है। सेना और वायुसेना का भी इस काम में इस्तेमाल हो रहा है। कुल मिलाकर विस्थापन और उसका प्रतिरोध देश के विकास प्रक्रिया का एक अहम सवाल बन गया है।

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  1. 9 टिप्पणियां: Responses to “ एक विस्थापित का अविश्वास प्रस्ताव ”

  2. By अभय तिवारी on April 29, 2010 at 8:53 PM

    सारे सवाल वाजिब हैं, सारी माँगे जायज़!

  3. By Sachi on April 29, 2010 at 9:16 PM

    किसी से सवाल पूछना, किसी पर उंगली उठाना हमेशा से बहुत आसान रहा है| ठीक है, व्यवस्था में कई भ्रष्ट लोग हैं, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में अपनी आस्था खोने की इजाज़त सिर्फ आपको भारतीय लोकतंत्र ही देता है|

    आप ही बताइए, क्या हम लोग इन समस्याओं का हल खोजने में नहीं लगे हैं? और भारत और भारतीय संविधान पर हमला कोई भी देशभक्त नहीं बर्दाश्त कर सकता|

    माओवादी तानाशाही की दुनिया में जीते हैं, और वसूली करते हैं| उन्हें भारत को अस्थिर करने के लिए चीन और पाकिस्तान से पैसा मिलता है| जरा इस पर भी अपनी कलाम चलाइए| इस लेख के दूसरे पाहुले को आप कहीं भूल गए हैं|
    जय भारत !
    वन्दे मातरम !

  4. By honesty project democracy on April 29, 2010 at 9:40 PM

    ओबामा हो या सिंह इज किंग ये कुछ नहीं कर सकते, जब तक इनको गद्दी पर बैठाने वाले इंटरनेश्नल सत्ता के दलाल ,जो इनके आका हैं ,इनको आदेश ना दे दे / जब तक इस देश में हर सरकारी खर्चों और घोटालों की जाँच देश भर के इमानदार समाज सेवकों से कराकर भ्रष्ट नेताओं और मंत्रियों को जनता के सामने सख्त सजा नहीं दी जाएगी, इस देश की हालत में सुधार नहीं होगा /अच्छी सार्थकता से भरी विश्लेष्णात्मक मानवीय रिश्तों के महत्व को दर्शाती हुई और जानकारी आधारित रचना के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद / आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

  5. By रेयाज on April 30, 2010 at 1:21 AM

    सची जी
    नहीं पता कि आप केवल शब्दों के रूप में लोकतंत्र के प्रशंसक हैं या वास्तव में इसके व्यवहार में लाए जाने के इच्छुक भी. हम ही नहीं, दुनिया के किसी भी समुदाय में, किसी भी देश की जनता लोकतंत्र से घृणा नहीं करती, और ठीक लोकतंत्र के प्रति जनता का यह प्यार और जिद ही है, जिसकी वजह से किसी भी हद तक क्रूर और जनविरोधी तानाशाह खुद को लोकतंत्र विरोधी घोषित नहीं करता. यहां तक कि हिटलर भी लोकतंत्र के एक रूप- संसद द्वारा चुन कर सत्ता में आया था और लोकतंत्र पर हमले (राइखस्टाग जला दिया गया था, खुद नाजियों द्वारा) के नाम पर यहूदियों और कम्युनिस्टों-मेहनतकशों पर अत्याचारों की शुरूआत की थी.

    तो दावे तो सब करते हैं, यह तो सत्ता में बैठे लोगों (वर्ग) के चरित्र से ही तय होता है कि लोकतंत्र के वास्तविक मायने क्या हैं और इस लोकतंत्र का क्या मतलब है. देश में कहीं भी लड़ रही जनता और किसी भी तरह से लड़ रही जनता लोकतंत्र विरोधी नहीं है- वह असल में जनवाद के उन्हीं मूल्यों को वास्तव में जमीन पर उतारने के लिए संघर्ष कर रही है. चाहे नर्मदा घाटी के लोग हों या टिहरी के या बस्तर के या बिहार के, लालगढ़ के या झारखंड के. कहीं के भी. और उनको जिस जनवाद से मतलब है, उसमें वे यह नहीं चाहते कि उनसे सिर्फ पांच साल पर वोट लिए जाएं और उसके बाद सत्ता में बैठे लोग उनके नाम पर एेसे फैसले करें जो उन्हें उजाड़े, बरबाद करे, जीन हराम कर दे और जीने के सामान्य से अधिकार भी छीन ले, ताकि कारपोरेट कंपनियों, प्रभुत्वशाली जातियों और कुछ पूंजीपति घरानों को फायदा हो.
    वे ठीक इस लोकतांत्रिक ढोंग के खिलाफ हैं. क्या लोकतंत्र का यह मतलब भी नहीं होना चाहिए कि लोगों का खुद अपने संसाधनों पर अधिकार हो और वे अपनी जरूरतों के हिसाब से उनका उपयोग अपने और सारे समुदाय के विकास में कर सकें? क्या हमारे देश में मौजूद लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप इसकी इजाजत देता है?
    और भारत के संविधान का सबसे बड़ा उल्लंघन को खुद भारत की सरकारें और पूरी व्यवस्था कर रही है. यहां तक कि एसे लोगों को गिरफ्तार किय जा रहा है, जो सिर्फ ये मांगे करते हैं कि अमुक मामले में भारतीय संविधान के प्रावधानों को लागू किया जाए. अगर आप हाल में आए माओवादी प्रवक्ताओं के सात्क्षात्कार पढ़ें तो पाएंगे कि उन्होंने सरकार के सामने जो मांगें रखी हैं, उनमें सबसे जोरदार मांग यह है कि भारत की शासन व्यवस्था भारत के संविधान के प्रावधानों को ईमानदारी से लागू करे.
    क्या आपने ये साक्षात्कार पढ़े हैं? क्या आप जानते हैं कि इन मांगों का भारतीय शासन व्यवस्था ने क्या जवाब दिया है? क्या आप जानते हैं कि लालगढ़ के लोगों की मांगे क्या थीं? वे तब केवल शांतिपूर्ण तरीके से पुलिस का बायकाट कर रहे थे और उनकी 13 मांगों में ये थीं कि पुलिस माफी मांगे, दोष पुलिस अधिकारियों को सजा मिले, जिन लोगों की साइकिलें-मोटरसाइकिलें तोड़ दी गई थीं पुलिस द्वारा उन्हें मुआवजा मिले, गलत तरह से पकड़े गए लोगों को छोड़ा जाए आदि.
    और उन्हें इस लोकतंत्र में क्या जवाब मिला इन मांगों का? 11 बटालियन अर्ध सैनिक बल. आपकी ही तरह हमें भी यह जान कर खुशी नहीं हो रही है कि लालगढ़ के लोगों ने अब पीसीपीए जैसै शांतिपूर्ण संगठन को भूमिगत घोषित कर दिया है और हथियारबंद लड़ाई में कूद पड़े हैं. तब भी उन्होंने कत्लेआम नहीं मचाया है- ट्रेनें रोकी हैं और कुछ अधिकारियों को अगवा किया है- बाद में उन्हें छोड़ा भी है.
    (अगले कमेंट में जारी)

  6. By रेयाज on April 30, 2010 at 1:30 AM

    इन कामों को जायज नाजायज ठहराने के सवाल नहीं है- सवाल यह है कि आखिर एक लोकतंत्र को कैसा होना चाहिए? उसे अपने नागरिकों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए.
    सैकड़ों उदाहरण हैं कि जंगल में ही रहनेवाले हजारों आदिवासी इसलिए वर्षों से जेलों में बंद हैं इस लिए कि कभी उनकी बकरी जंगल में घुस गई थी या वे महुआ बीनने जंगल में चले गए थे. और शायद आप जानते हों कि अरबों रुपए का घोटाला करनेवाली एनरॉन कंपनी- जिसे अब भी भारत सरकार लाखों-करोडो़ं रुपए इसलिए देती है कि वह कोई बिजली पैदा न करे- के वकील हमारे इसी लोकतंत्र के रखवाले चिदंबरम थे. वे उस वेदांता कंपनी के निदेशकों में से रहे हैं, जिसने भारत में बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा पैदा कर दिया है.
    और यह सब भारतीय संविधान को दरकिनार करते हुए किया जा रहा है.
    आपने माओवादी तानाशाहों की बात की है. हम नहीं जानते कि उनकी यह तानाशाही किन रूपों में सामने आती है. वसूली वे करते हैं- और इसे वे स्वीकार भी करते हैं. वे किनसे वसूली करते हैं- वे यह भी स्वीकार करते हैं.
    पाकिस्तान औऱ चीन से उन्हें कब और कितना पैसा मिला है- भारत सरकार तक ने इसकी कोई जानकारी नहीं दी है. उल्टे वह एसे किसी संबंध तक को नकारती है. जहां तक चीन का सवाल है, मौजूदा चीन के शासक उस माओ को अब पसंद नहीं करते, जिस माओ के नक्शे कदम पर भारत के माओवादी चल रहे हैं.
    आपने देशभक्ति की बात की. आपको पता है कि छत्तीसगढ़ में देश का खनिज (अयस्क) सिर्फ 27 रुपए प्रति टन ( या शायद इससे भी कम पर) विदेशों में भेजा जा रहा है. और अगर उसी खनिज को रायपुर का एक व्यापारी खरीदना चाहे तो उतनी ही मात्रा के लिए उसे 5000 रुपए से अधिक जापान को चुकाने पड़ेंगे. अपने संसाधनों को दूसरे देशों के हाथों लुटाना देशभक्ति है? परमाणु करार के नाम देश की संप्रभुत गिरवी रखना देशभक्ति है? अपनी शिक्षा व्यवस्था और अपने दिमागों को विदेशी विश्वविद्यालयों के हाथों बेच देना देशभक्ति है? देश के हर संसाधन खेतों, जंगलों, नदियों, पानी, पेड़, फसल यहां तक कि अपनी सेहत और सुरक्षा तक को विदेशी कंपनियों या उनसे जुड़े देशी दलालों को बेच देना देशभक्ति है?
    और इन सब कामों के लिए मंजूरी देनेवाली संसद देशभक्त है? क्या देशभक्ति की इस परिभाषा के लिए अपने देश की जनता और उसके हितों की बलि देकर विदेशी पूंजीपतियों और उनके चाकर देशी घरानों को फायदा पहुंचाना जरूरी है.
    मुझे यकीन है कि आप वास्तव में देशभक्त हैं...और आप भी देश को इस तरह गिरवी रखा जाना पसंद नहीं करते.
    लेकिन इससे पहले यह तो देखिए कि देश को बेच कौन रहा है और उसे बचा कौन रहा है.

  7. By रेयाज on April 30, 2010 at 1:34 AM

    देश को इस तरह बेचने में काग्रेस ही नहीं, भाजपा और माकपा भी पीछे नहीं हैं. वे सब जनता के खिलाफ और कारपोरेट लूट के समर्थन में एक हैं. उनमें इस विषय में कोई अंतर नहीं है.

  8. By दिलीप मंडल on April 30, 2010 at 1:55 PM

    मैं, एक विस्थापित, क्या इस बात के लिए बाध्य हूं कि उस लोकतंत्र में आस्था जताऊं जहां, लोकतंत्र लागू होने के साठ साल बाद भी विस्थापितों के पुनर्वास के लिए कानून नहीं है। और जमीन लेने का कानून अंग्रेजों के जमाने का है। सरकार मेरी जमीन लेकर उसे निजी कंपनी को सौंप देती है और कहती है कि जनहित में ऐसा किया गया है, तो इस पर क्या मुझे तालियां बजानी चाहिए। देश के आंतरिक उपनिवेश का नागरिक होने के नाते मैं विस्थापन की पक्रिया का विरोध करता हूं।

  9. By Reyaz-ul-haque on April 30, 2010 at 4:15 PM

    USA, UK, Japan aur doosare samrajyawadi desho ke upaniwesh (Bharat) ka ek nagrik hone ke nate Main Bhi is prakriya ka virodh karta hun.

  10. By विवेक श्री on May 3, 2010 at 12:04 AM

    कानून के तमाम तमाशे सिर्फ गरीब के लिए ही क्यों होते हैं, क्योंकि वो खरीद नहीं सकता. सची जी, लोकतंत्र के खेल सिर्फ सुरक्षित दूरी से देखने पर आकर्षक है.. मैं खुद भी उसी वर्गसे हूं पर आखिर कोई तो उन के बारे में भी सोचने और बोलने वाला चाहिए जो बेबात ही कानून की लाठी खाने को मजबूर हैं...

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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