हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

शोकगीत नहीं, उल्लास का उत्सवः पढ़िए अरुंधति को

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/25/2010 04:34:00 PM

आनेवाले दशकों में शायद इसे एक क्लासिक की तरह पढ़ा जाएगा. इन बेहद खतरनाक- और उतने ही शानदार- दिनों के बारे में एक विस्तृत लेखाजोखा. पिछले एक दशक से अरुंधति के लेखन में शोकगीतात्मक स्वर बना हुआ था, पहली बार वे इससे बाहर आई हैं और पहली बार उनकी किसी रचना में इतना उल्लास, इतना उत्साह, इतनी ऊर्जा और इतनी गरमाहट है. जैसा अपने एक ताजा साक्षात्कार में खुद अरुंधति ही कहती हैं, यह यात्रा वृत्तांत सिर्फ ऑपरेशन ग्रीन हंट या राजकीय दमन या अत्याचारों के बारे में नहीं है. यह जनता के विश्वव्यापी प्रतिरोध आंदोलनों और हर तरह के - हिंसक या अहिंसक - संघर्षों में से एक का आत्मीय ब्योरा है. इसे लिखते हुए अरुंधति ने अपने कुछ पुराने आग्रहों, विचारों और धारणाओं को छोड़ा ही नहीं है, बल्कि उसके ठीक उलट विचारों की हिमायत करती नजर आती हैं. एसा क्यों है, इसकी वजह भी अरुंधति ने यहां बताई है. थोड़ी संजीदगी के साथ पढ़ने पर पाठक की जिंदगी को बदल कर रख देने की क्षमतावाले इस आलेख में अरुंधति जिस तरह इतिहास और वर्तमान, जीवित लोगों और एतिहासिक हस्तियों के बीच आई-गई हैं, वह अनोखे अनुभवों से भर देनेवाला है. बेशक, इसमें अरुंधति शैली के आंकड़ों और तथ्यों की बेहद कमी खलती है, लेकिन शायद यह पूरा आलेख ही अपने आप में एक बड़ा तथ्य और आंकड़ा है. इसके पहले वे अपने लेखों में जगह-जगह पाठक को नए तथ्यों और उनके प्रस्तुतिकरण में नएपन की वजह से चौंकाती रही हैं (बकौल नोम चोम्स्की), लेकिन इस बार इस पूरी रचना के एक-एक वाक्य से चौंकाती हैं- हमारे सामने अपने ही समाज और समय के एक नये चेहरे से हम रू-ब-रू होते हैं.

हम इससे सहमत हो सकते हैं. इससे असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन उसके पहले इसे पढ़ना जरूरी है.

(अनुवाद इस यात्रा वृत्तांत का अब तक हो नहीं पाया है कहीं. इसलिए अंगरेजी में ही पढ़ा जाए अभी).

आइए, अब इसे पढ़ें

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ शोकगीत नहीं, उल्लास का उत्सवः पढ़िए अरुंधति को ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें