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बीच सफ़हे की लड़ाई

आदिवासियों की संघर्ष कथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/22/2010 04:44:00 PM

उनकी कहानियां हों, या कविताएँ या उपन्यास- रणेंद्र अपने लेखन में जनता के सरोकारों से अभिन्न रूप से जुड़े दिखते हैं. खास कर आदिवासी समुदाय की पीड़ा, उसका विस्थापन और उसका संघर्ष उनके लेखन में अधिक मुखर होता है.



उनका ताजा उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता पढ़िए. सिर्फ सौ पन्नों में वे बेहद प्रभावी तरीके से ऑपरेशन ग्रीन हंट के दौर का यथार्थ पेश करते हैं. उनके ब्योरे में एक ओर देश के सबसे गरीब और उत्पीड़ित समुदाय का जीवन, उसकी उपेक्षा, उसके संसाधनों की लूट और उसका संघर्ष है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय- बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में काम करनेवाली दमनकारी होती राजसत्ता है, जिसके साथ हैं- कन्या आश्रम चलाने वाला कामुक बाबा, जमींदार और कथित सभ्य समाज के लोग. उपन्यास इतने अपनेपन के साथ रचा गया है कि आप इसमें जीने लगते हैं. कई बार उपन्यास का स्वर नृतत्वशास्त्रीय भी हो गया है जो इसे विश्वसनीयता देता है.

उपन्यासकार असुरों के गांव में शिक्षक के रूप में जाता है, जहां आदिवासियों के बारे में उसकी सारी धारणाएं गलत साबित होती हैं. वह इस नए समाज के गरमाहट भरे रिश्तों और बहुरंगी जीवन में घुल-मिल जाता है. एक काल्पनिक राज्य कीकट प्रदेश के कोयलबीघा थाना में बसनेवाली असुर जनजाति की कहानी के बहाने उपन्यास में छत्तीसगढ़ से लेकर पश्चिम बंगाल तक के आदिवासियों की कहानी कही गई है. और इसी के साथ लेखक सचेत रूप से हमें यह भी बताता चलता है कि भारत में घट रही यह प्रक्रिया कोई अनूठी-अनजानी नहीं है, बल्कि इतिहास की तथाकथित सभ्य जातियों ने इसी तरह अपने यहां की आदिवासी जातियों का क्रूरता पूर्वक और निर्मम संहार करके अपनी सभ्यता की बुनियाद खड़ी की है.

खनिज की अपनी भूख के कारण ग्लोबल देवता यहां के असुर समाज को उनके आखिरी बसेरे से भी उजाड़ने पर तुले हैं. इस समाज में अंधविश्वासों से होने वाली हत्याओं से अधिक जानें खनिज कंपनियों द्वारा बॉक्साइट निकाल कर खुले छोड़े गए गड्ढों में पनपे मच्छरों के काटने से जाती हैं. इससे भी अधिक जानें कंपनियां आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए लेती हैं- और मरने वालों को नक्सली बता दिया जाता है. ऐसे में जब एक भेड़िया अभयारण्य के बहाने सरकार ने 37 गांवों को खाली कराके खनन कंपनी वेदांग को देने की कोशिश की तो आदिवासी अड़ गए. जिस सरकार ने कभी उनकी सुध नहीं ली वह भेड़ियों को बचाने के लिए उन्हें उजाड़ रही थी. जब प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना भी काम न आया तो उन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाया. कंपनियों के दलाल बाबा शिवदास इसे तोड़ने में नाकाम रहे. उपन्यास में जंगल पार्टी का जिक्र है, जो आदिवासियों के अधिक संगठित (पर सरकार के लिए अवैध) प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती है. साथियों की शहादतों के बावजूद उनका संघर्ष उपन्यास के अंतिम वाक्य में भी जारी रहता है. उपन्यास का आग्रह एनजीओवादी-धर्मांध राजनीति से बाहर आकर अपने संसाधनों की रक्षा के लिए संगठित होने का है.

उपन्यास दिखाता है कि गरीबी खुद नहीं आती, संपन्न वर्गों द्वारा थोपी जाती है. उपन्यास के शुरू में एक ही इलाके के दो स्कूलों की तुलना की गई है. एक ओर जैसे-तैसे चलता प्राथमिक स्कूल है तो दूसरी ओर आलीशान भवनवाला स्कूल. पाथरपाट का यह स्कूल सौ से अधिक आदिवासी घरों को उजाड़कर बना था, लेकिन एक भी आदिवासी बच्चे को कभी इस स्कूल में नहीं लिया गया. वे बच्चे तो मांड़-भात खाकर अधपढ़-अनपढ़ मास्टरों से पढ़ रहे थे और बहुत हुआ तो क्लर्क बन सकते थे. यह बंटवारा इन समुदायों के भविष्यों का भी बंटवारा कर देता है और आदिवासियों को उन्हीं दीन-हीन स्थितियों में रहने को मजबूर करता है जिसमें वे सदियों से रहते आए हैं. आदिवासियों की लड़ाई वास्तव में इस बंटवारे के खिलाफ थी. उपन्यासकार भी इन्हीं मकई का घट्ठा खाकर खटने और लड़ने वालों के साथ उनकी हर लड़ाई में शामिल है.

रेयाज उल हक़

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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