हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विदेशी कंपनियां, दलाल व्यवस्था और गिरवी संप्रभुताः दो आख्यान

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/17/2010 02:56:00 PM

अभी संवाद प्रकाशन से आई मिशेल चोस्दुव्स्की की गरीबी का वैश्वीकरण पढ़ रहा था. पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के कसते शिकंजे की एक पड़ताल करने की कोशिश की है मिशेल ने. हालांकि उनके लेखे-जोखे में कुछ खामियां और गलतियां भी हैं, लेकिन कुल मिला कर एक शानदार और दहला देनेवाली कोशिश. जिन दिनों यह किताब पढ़ रहा था, उन्हीं दिनों तहलका में दो रिपोर्टें आईं. शोमा चौधरी की जीएम बैंगन को भारत में लाने की कोशिशों पर एक रिपोर्ट और दूसरी शांतनु गुहा रे और कुणाल मजूमदार की रिपोर्ट जिसमें बताया गया है कि किस तरह एक एसे टीके को लाखों बच्चियों को लगाया गया जिसके असर के बारे में किसी को पता नहीं था और जिसके साइड इफेक्ट्स सारी दुनिया में देखे गए. दोनों रिपोर्टें इसकी गवाह हैं कि कारपोरेट जगत और कंपनियों की पहुंच सरकार में कितनी भीतर तक है और सरकार उनके हितों के आगे किस तरह घुटने टेक चुकी है. साभार और क्रमशः दोनों रिपोर्टें.

बीटी बैंगन और देश की सेहत का भर्ता

एक मामूली-सी सब्जी राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा कैसे बन सकती है? शोमा चौधरी बता रही हैं कि किस तरह बीटी बैंगन हमारी जिंदगी के हर पहलू से जुड़ा है और अगर आप इसपर हो रही बहस का हिस्सा नहीं हैं तो मुमकिन है कि कुछ समय बाद प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले चूहों की जगह आप हों

कल्पना कीजिए कि एक साधारण-सा बैंगन भेस बदलने वाला ऐयार बन जाता है और आप नहीं जानते कि उसके इरादे अच्छे हैं या बुरे. या फिर रोटी के साथ आप जिस सब्जी को खाने जा रहे हैं वह कीटनाशक है, तो शायद आप बीटी बैंगन पर मचे बवाल को कुछ-कुछ समझ सकेंगे.
9 फरवरी को जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन के आगमन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया तब वे असल में एक ऐसे विनाश को स्थगित कर रहे थे जिसकी भरपाई भी शायद संभव न होती. उनके इस फैसले ने हर किसी को यह सोचने, समझने और जानने का समय दिया है कि दांव पर क्या लगा है.
हमारे यहां आम तौर पर विज्ञान और कृषि के बारे में बात ही नहीं की जाती. ज्यादातर शहरियों के लिए किसानों और सब्जियों की बातें बोरिंग होती हैं. यदि कोई आपसे कहे कि बीटी बैंगन राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है तो संभव है कि आप उसकी खिल्ली उड़ाएं. मगर ऐसे भी लोग हैं जो देसी बैंगन के समर्थकों की तुलना मंगल पांडे और भगत सिंह से कर रहे हैं और इसे बचाने के लिए लड़ी जा रही लड़ाई को इक्कीसवीं सदी का स्वाधीनता संग्राम बताते हैं. यह अतिशयोक्ति तो है लेकिन इससे भारत में चल रही पूरी बहस का अंदाजा तो हो ही जाता है. वह बहस, जो हमारी जिंदगी के हर पहलू से जुड़ी है- स्वास्थ्य, खाद्य पदार्थों की कीमतों, जैव-संपदा, आर्थिक सुरक्षा, हमारी संप्रभुता और पूरे भविष्य से. अगर आप इस बहस का हिस्सा नहीं हैं तो मुमकिन है कि कुछ समय बाद प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले चूहों की जगह आप ले लें.
हालांकि जयराम रमेश ने इस स्थगन को अनिश्चितकालीन बताया है, मगर आशंका यह है कि यह बहुत छोटा भी हो सकता है. इसीलिए इस बहस में आपका शामिल होना और भी जरूरी हो जाता है. खासकर तब जब मीडिया और सरकार का एक वर्ग हमें यह सिखाना चाह रहा हो कि आम आदमी को विज्ञान के मामले में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है. इसी कड़ी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण इंडियन एक्सप्रेस से कहते हैं देश की वैज्ञानिक उन्नति को विरोध प्रदशर्नों और नारों से नहीं रोका जाना चाहिए. अप्रत्यक्ष रूप से वे शायद पूरी बीटी लॉबी की नाराजगी को जुबान दे रहे हैं.
इस पूरे मामले पर कितना धन दांव पर लगा है, इसपर एक नजर डालते ही आपको इस नाराजगी की वजह समझ में आ जाएगी. भारत के पास विश्व का आठवां सबसे बड़ा बीज बाजार है और प्रतिवर्ष करीब 1 अरब डॉलर का कारोबार करने वाला यह बाजार फिलहाल असंगठित और सरकारी क्षेत्र के हाथ में है. कंपनियों की नजर इसी पर है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीज उद्योग में कॉर्पोरेट का दखल प्रतिवर्ष 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इस बाजार का 80 प्रतिशत से भी अधिक क्षेत्र अभी उनकी पहुंच से बाहर है.
लेकिन बीटी बैंगन तो सिर्फ दिखाने का दांत है. इसके पीछे 41 बीटी फसलें अनुमति के इंतजार में खड़ी हैं. चावल, आलू, टमाटर, भिंडी से लेकर गेहूं तक. एक अरब भारतीय पेटों का निजीकरण होना था और जयराम रमेश ने उसमें अड़ंगा लगा दिया है. इससे जुड़े उद्योग खुश कैसे रह सकते थे?
संसद के इसी सत्र में जैव-प्रौद्योगिकी विभाग - जो विज्ञान मंत्रालय के अधीन है और जिसका काम है जीन संवर्धित (जीएम) फसलों को बढ़ावा देना - एक बेतुका कानून लाने जा रहा है: राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी नियंत्रक प्राधिकार विधेयक 2009 (एनबीआरएआई). अभी तक ‘गुप्त’ रखा जा रहा यह विधेयक अलोकतांत्रिक और मनमाने नियमों से भरा पड़ा है. सबसे पहले तो यह पर्यावरण मंत्रालय की समिति से जीएम फसलों को पास करने या रोकने का अधिकार छीनकर विज्ञान मंत्रालय की तीन सदस्यीय समिति को देना चाहता है. इसका मतलब होगा- उनके आसानी से पास हो जाने की गुंजाइश बढ़ना और एक नैतिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे को नितांत तकनीकी मुद्दा बना देना.
यही नहीं, पारदर्शिता बढ़ाने की बजाय यह विधेयक चाहता है कि कंपनियों को अपनी व्यावसायिक सूचनाएं छुपाने के लिए कानूनी संरक्षण मिल जाए. (यह गौर करने लायक बात है कि माहिको द्वारा जमा की गई बीटी बैंगन जैव-सुरक्षा फाइल को सार्वजनिक करवाने के लिए ग्रीनपीस को जैव-प्रौद्योगिकी विभाग से ढाई साल लंबी आरटीआई की लड़ाई लड़नी पड़ी थी. माहिको ही वह कंपनी है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी अमेरिकी बीज कंपनी मोंसेंटो के साथ मिलकर भारत में यह फसल तैयार की है. विभाग कहता रहा कि उस फाइल को सार्वजनिक करने से माहिको के व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा. बाद में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद उसे ऐसा करना पड़ा.)
यह बिल भारत के संघीय स्वरूप के भी विरुद्ध है और राज्य सरकारों से कृषि एवं स्वास्थ्य संबंधी अधिकार छीनकर उसी तकनीकी समिति को देना चाहता है (इसकी वजहें शायद इस तथ्य में छिपी हैं कि अब तक अलग-अलग पार्टियों की दस राज्य सरकारें इन फसलों को अनुमति देने से मना कर चुकी हैं). बहुत सारी बेतुकी धाराओं के बीच इस बिल की सबसे चौंकाने वाली धारा 63 है, जो ‘सबूतों और किसी वैज्ञानिक आधार के बिना जीएम फसलों के प्रति जनता को गुमराह करने की कोशिश’ पर जुर्माने और दंड की सिफारिश करती है.     इसके सहारे आप सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को महज सवाल उठाने के जुर्म में जेल में डाल सकते हैं.
भारत में बीटी फसलों को बोने को लेकर इतनी हड़बड़ी क्यों है? अगर ये वाकई जनता के भले के लिए हैं तो फिर किसी बहस से डर कैसा?
यदि बीटी के समर्थक इस बहस को जनता की पहुंच से दूर ले जाने में सफल हो जाते हैं तो यह देश के लिए सबसे विनाशकारी घटना होगी. आप जयराम रमेश से सहमत हों या नहीं, पर जिस तरह से उन्होंने बीटी बैंगन का यह निर्णय लिया है वह हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत तो है ही. जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति (जीईएसी) - जिसके पास फिलहाल जीएम फसलों को अनुमति देने का अधिकार है - ने 14 अक्टूबर, 2009 को इन फसलों को व्यावसायिक रिलीज के लिए हरी झंडी दिखा दी थी. जयराम रमेश ने इस रिपोर्ट को अपने मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला और 31 दिसंबर, 2009 तक इसपर आम राय मांगी. उन्होंने सात सार्वजनिक चर्चाएं करवाईं - जिनमें वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ, किसानों के संगठन, उपभोक्ता समूह और स्वयंसेवी संगठन शामिल थे - और 9 फरवरी, 2010 को अपने स्थगन संबंधी निर्णय की घोषणा करने के कुछ समय बाद ही उससे जुड़ा सारा विवरण अपने मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया. उसमें उन्होंने जनता की प्रतिक्रियाएं और वे सारे कारण साफ-साफ लिखे थे, जिन्होंने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए बाध्य किया. 

यह न होता तो शायद पूरी कहानी कभी रोशनी में भी न आती. टाटा इंस्टिट्यूट आ¬फ सोशल साइंसेज के निदेशक डॉ एस परशुरामन, जो बीटी बैंगन के मूल्यांकन के लिए बनी पहली एक्सपर्ट कमेटी और विशेष तकनीकी समीक्षा समिति में थे, को दूसरी एक्सपर्ट कमेटी में शामिल होने का न्यौता नहीं मिला. पहली कमेटी में अपने अनुभवों के आधार पर वे कहते हैं कि उन्हें पता था कि यही होगा. वे बताते हैं, ‘हमारा काम था,       माहिको और उससे जुड़ी संस्थाओं द्वारा दी गई रिपोटरें को पढ़ना. मैंने 5,000 पन्ने पढ़े और अपनी राय लिखकर दी. जहां तक मैं जानता हूं, मैं ऐसा इकलौता शख्स था. उन रिपोटरें में जिस तरह की वैज्ञानिक कोताही बरती गई थी उसे देखकर मैं चकित था. न कोई निष्पक्ष विश्लेषण था और न ही कोई जवाबदेह कार्यप्रणाली. 99 फीसदी संस्थाओं की रिपोर्टें ऐसे रिसर्च कार्यक्रमों के आधार पर लिखी गई थीं जिन्हें माहिको ने फंड किया था. हर बैठक में सब वैज्ञानिक और भी ज्यादा संतुष्ट दिखते थे. ऐसा लगता था कि बीटी फसलों के दुष्परिणामों के बारे में वे एक बार भी नहीं सोचते. उनकी सारी बहस इन फसलों को अनुमति देने के इर्द-गिर्द ही घूमती थी.’
परशुरामन का यह वक्तव्य उस समिति के निष्कर्षों की पुष्टि करता है जिसमें कई प्रतिष्ठित भारतीय और 18 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शामिल थे. 8 फरवरी को इन वैज्ञानिकों ने पृथ्वीराज चव्हाण के एक पत्र की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा. पृथ्वीराज चव्हाण ने वह पत्र जुलाई, 2009 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ अंबुमणि रामादौस के प्रधानमंत्री के नाम लिखे गए एक पत्र के जवाब में लिखा था. तब वे प्रधानमंत्री कार्यालय में एक राज्य-मंत्री थे.
रामादौस ने अपने खत में जीएम खाद्य पदार्थों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित परिणामों को लेकर चिंता जताई थी. चव्हाण ने अपने उत्तर - जो करीब पांच महीने बाद लिखा गया था - में लिखा था,  ‘आपके पत्र में जिन मुद्दों का जिक्र किया गया है उनकी अत्याधुनिक वैज्ञानिक आधारों पर सावधानी से जांच कर ली गई है.’ एक्सपर्ट कमेटी के सदस्यों ने अब यह भेद खोला है कि चव्हाण के पत्र की ज्यादातर पंक्तियां जैव-तकनीकी उद्योग की प्रचार सामग्री से ज्यों-की-त्यों उठाई गई थीं. खासकर आईएसएएए से जो एक प्रकार का छद्म वैज्ञानिक संगठन है जिसमें मोंसेंटो और बायोटेक्नोलॉजी की अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश करती हैं. इस संगठन का मकसद है, विकासशील देशों में जीएम फसलों की व्यावसायिक घुसपैठ करवाना.
इस पत्र में इन वैज्ञानिकों ने चव्हाण के सभी दावों का खंडन करने के साथ-साथ प्रधानमंत्री से यह निवेदन भी किया है कि भारतीय जनता की सुरक्षा और किसानों की भलाई के लिए जीएम फसलों पर फिर से विचार किया जाए. यदि जयराम रमेश ने तथाकथित ‘विज्ञान’ के बदले ‘आम आदमी’ को न चुना होता तो हम आज अपनी डाइनिंग टेबल पर आराम से बैठकर दूसरी हरित क्रांति की घोषणाओं को टीवी पर देखते हुए बिना अपनी मर्जी के, बिना परीक्षण और बिना लेबल के बीटी बैंगन खा रहे होते.

सबसे जरूरी सवाल तो यह है कि क्या हमें बीटी बैंगन की जरूरत है? भारत बैंगन का जनक देश है और हमारे यहां बैंगन की तकरीबन 2,400 किस्में पैदा होती हैं. यह सिर्फ 5 लाख हेक्टेयर में उगाया जाता है और इसका सालाना उत्पादन 80 लाख टन है. जब हमारे यहां बैंगन की कोई कमी ही नहीं है तब हमें ऐसी सब्जी का इस्तेमाल करने को क्यों कहा जा रहा है जिसमें संक्रामक बीटी जीन होगा और जो दुनिया की पहली ऐसी बीटी फसल बनेगी जिसका सीधा उपयोग इनसान करेंगे, बिना किसी प्रोसेसिंग या मवेशियों पर प्रयोग किए बिना.
बीटी, बसिल्लस थुरिजिएन्सिस नाम के एक जीवाणु का संक्षिप्त नाम है, जो मिट्टी में पाया जाता है और ऐसे प्रोटीन बनाता है जिनके सेवन से कीड़े मर जाते हैं. 1980 के आसपास मोंसेंटो ने एक ऐसी तकनीक का पेटेंट लिया जिसमें इस जीवाणु के एक कीटनाशक जीन को बीजों में डालकर एक तरह से पौधे को ही कीटनाशक बना दिया जाता है. बताया जा रहा है कि इस पौधे को खाने वाला कीड़ा मर जाता है, मगर उसे खाने वाले आदमी का क्या होता है यह ठीक से कोई नहीं जानता. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ समीर ब्रह्मचारी, जो जीएम खाद्यों के बड़े समर्थक भी हैं, कहते हैं, ‘मनुष्य के शरीर में बीटी जीन कोई असर नहीं कर सकता, इसलिए ये खाद्य पूरी तरह सुरक्षित हैं.’ मगर बाकी वैज्ञानिक बताते हैं कि यह सुनिश्चित करने के लिए अभी पर्याप्त टेस्ट नहीं हुए हैं और अभी आप नहीं कह सकते कि अंदर जाकर यह जीवाणु किस तरह से रूप बदलकर आपके शरीर पर हमला कर दे.  
अपने आविष्कार के समय से ही बीटी खाद्य ऐसी बहसों का कारण बने रहे हैं. इनके समर्थक कहते हैं कि ये ज्यादा पैदावार देते हैं, सुरक्षित हैं और किसानों का कीटनाशक का खर्च बचाते हैं. इनका विरोध करने वाले लोगों के पास कहीं ज्यादा गहरे और खतरनाक प्रश्न हैं. ये मानव स्वास्थ्य के लिए कितने    सुरक्षित हैं? क्या इनपर पर्याप्त परीक्षण कर लिए गए हैं? हम कैसे भरोसा कर सकते हैं कि इन खाद्यों को कड़ी प्रक्रिया से गुजारने के बाद अनुमति दी गई है? परागण से ये फसलें वातावरण को प्रदूषित करेंगी तो आप कैसे रोकेंगे? इसके अत्यधिक उपयोग को कैसे काबू में करेंगे? जो जैव-विविधता इनसे नष्ट होगी उसे कैसे वापस लाएंगे? क्या ये सब तरह के कीड़ों पर उतनी ही असरदार हैं जितनी कुछ खास किस्म के कीड़ों पर? और क्या इन कीड़ों में कुछ समय बाद प्रतिरोध क्षमता तो विकसित नहीं हो जाती है? कीटनाशक के गुण के अतिरिक्त इन फसलों में ऐसा क्या है कि पैदावार ज्यादा हो? ये बीज ऐसे हैं कि हर साल किसानों को बाजार से नए खरीदने पड़ेंगे और इनकी कीमत भी कम नहीं है, फिर आप किसानों के कौन-से फायदे की बात कर रहे हैं? जीएम खाद्यों पर कोई लेबलिंग भी नहीं होगी, तब वह उपभोक्ता क्या करेगा, जो साधारण खाद्य खाना चाहता है? क्या उसके चुनने के अधिकार को खत्म करना अनैतिक नहीं है? क्या इन बीजों में टर्मिनेटर जीन हैं? और यदि मोंसेंटो जैसी कंपनियों के पास इन बीजों के पेटेंट होंगे तो क्या हम अपने खाने का नियंत्रण भी प्राइवेट कंपनियों को सौंपने जा रहे हैं?
इन सब दावों और सवालों के जवाब जानने के लिए फिलहाल हमारे पास 4 तजुर्बे हैं- बीटी बैंगन की कहानी, बीटी कपास के हमारे अनुभव, बीटी फसलों के दुनिया भर के अनुभव और मोंसेंटो की कहानी.
दुर्भाग्यवश, बीटी बैंगन की अब तक की कहानी सुखद नहीं है. अब तक कोई स्वतंत्र परीक्षण नहीं करवाया गया है और जीईएसी द्वारा दी गई अनुमति का आधार वे आंकड़े हैं जिन्हें माहिको और उससे जुड़े संगठनों ने ही उसे दिया है. भारत के जाने-माने सूक्ष्म-जीवविज्ञानी डॉपी एम भार्गव, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जीईएसी के काम पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया गया है, ने माहिको द्वारा जमा किए गए और      जीईएसी द्वारा पास किए गए जैव-सुरक्षा के कागजों पर 29 आपत्तियां उठाई हैं. उनके पास परेशान कर देने वाली सच्चाइयां हैं, जिनमें से एक यह भी है कि कुछ परीक्षणों के लिए तो सैंपल ही गलत लिया गया था.

भारत में मोंसेंटो के पूर्व प्रबंध-निदेशक टीवी जगदीशन तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि मोंसेंटो पहले भी अपने कृषि-रसायनों के लिए खुद के आंकड़ों के आधार पर कीटनाशक बोर्ड से स्वीकृति पाती रही है. 
आंध्र प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के कुलपति और दूसरी एक्सपर्ट कमेटी (जिसने बीटी बैंगन को अनुमति दी) के सह-अध्यक्ष डॉ अर्जुन रेड्डी इन आरोपों को गलत बताते हैं. वे कहते हैं कि कानूनन जो भी परीक्षण जरूरी थे सब किए गए हैं. वे कहते हैं कि हो सकता है कि कुछ और भी टेस्ट जरूरी हों. मगर फिर वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें उपभोक्ताओं और किसानों के हितों का खयाल रखने के लिए नियुक्त किया गया है, न कि कंपनियों की सुविधाओं का खयाल रखने के लिए. इसी भुलक्कड़ी में वे कहते हैं, ‘नौ साल के लंबे अंतराल के बाद आप कंपनी से नए टेस्ट करने के लिए कैसे कह सकते हैं? एक तरफ तो सरकार जीएम खाद्यों पर शोध को प्रोत्साहित कर रही है और दूसरी तरफ उन्हें रिजेक्ट कर रही है. यह कैसे चलेगा?’
मगर इसके साथ-साथ डॉ रेड्डी एक दूसरी चिंता की ओर भी इशारा करते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र में शोध तंत्र के कमजोर होते जाने का मतलब यह है कि आज कृषि अनुसंधान केवल निजी क्षेत्र द्वारा ही संचालित किया जा रहा है. उनके मुताबिक इसने ‘सार्वजनिक हित के विचार को ही धुंधला कर दिया है और इसकी जगह फायदे की भावना ने ले ली है.’ अब जबकि 51 जीएम खाद्य बाजार में आने की बाट जोह रहे हैं, जिनमें से 41 खाद्य फसलें हैं, ऐसे में वे स्वीकार करते हैं कि भारतीय वैज्ञानिकों को यह अंदाजा भी नहीं है कि इनसे मानव शरीर या पर्यावरण या फिर देश की जैव-विविधता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. वे यह भी बताते हैं कि इस समय देश के बाजार में पांच प्रकार की बीटी कॉटन उपलब्ध है, लेकिन किसान इनकी पहचान करने में असमर्थ हैं. ‘इसपर सरकार की नीति क्या है?’ वे पूछते हैं. अंत में वे जो कहते हैं वह जीएम खाद्यों के पक्ष में जाने वाले एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इंगित करता है. वे कहते हैं, ‘चीन ने पहले ही ट्रांसजेनिक चावल उगाने शुरू कर दिए हैं. हम इस तर्क से आगे बढ़ें कि लोग दिन भर में आधा किलो चावल से ज्यादा खाते हैं. और यदि वे फिर भी ऐसा कर रहे हैं तो हम बैंगन को लेकर इतना परेशान क्यों हैं, जिसे अपेक्षाकृत बहुत कम मात्रा में खाया जाता है.’ डॉ रेड्डी के इन विचारों से बीटी समर्थकों के एक वर्ग की मानसिकता की भी झलक मिलती है, ऐसी मानसिकता जिसकी बुनियाद आंकड़ों और तथ्यों की बजाय उत्साह, उतावलेपन और प्रतिस्पर्धी देश से पीछे न रह जाएं, जैसी चीजों से बनी है. आज जीएम खाद्यों पर सवाल उठाने पर देश के प्रति आपकी निष्ठा पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं जसा कि मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों पृथ्वीराज चव्हाण, कपिल सिब्बल और शरद पवार के वक्तव्यों से जाहिर होता है. पवार का कहना था कि जीएम बैंगन को फिलहाल बाजार में न लाने जैसे फैसले घड़ी की सुइयों को पीछे करते हुए देश के वैज्ञानिक समुदाय को हतोत्साहित करने का कारण बनेंगे. उनसे पूछा जा सकता है कि घड़ी की ये सुइयां दरअसल जा किस ओर रही थीं और विज्ञान भावनाओं से कब से संचालित होने लगा? देश और जनहित, वैज्ञानिकों की तथाकथित भावनाओं से छोटा कब से हो गया? मगर एनबीआरएआई के कानून बनने के बाद शायद ऐसे सवाल उठाना भी आपको जेल का हकदार बना सकता है.
एक और परेशान करने वाली बात यह है कि डॉ भार्गव के मुताबिक जीईएसी के निर्णय से करीब दो सप्ताह पहले डॉ रेड्डी ने उन्हें फोन कर बताया था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति के सदस्य के बतौर जिन अतिरिक्त परीक्षणों की मांग भार्गव ने की थी उनमें से आठ कराए ही नहीं गए हैं. और जो हुए भी हैं उनमें से कई या तो संतोषजनक या पर्याप्त नहीं थे. रेड्डी ने कथित तौर पर डॉ भार्गव से यह भी कहा कि वे बीटी बैंगन के पक्ष में सिफारिश करने के लिए ‘अत्यधिक दबाव’ में हैं और उन्हें कृषि मंत्री, जीईएसी और इस उद्योग से जुड़े लोगों के फोन आ रहे हैं. भार्गव ने उन्हें अपनी अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करने की सलाह दी. लेकिन दो सप्ताह बाद रेड्डी ने बीटी बैंगन पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी.

एक और चौंकाने वाला सच यह भी है कि बायोतकनीकी विभाग के एक शक्तिशाली नोडल ऑफिसर डॉ केके त्रिपाठी - जो एक ऐसी विशेषज्ञ समिति (आरसीजीएम) के सदस्य भी हैं जो जीईएसी को भेजे जाने से पहले जीएम फसलों के परीक्षण की स्वीकृति देती है - के खिलाफ पुलिस और केंद्रीय सतर्कता आयोग में शिकायतें दर्ज की गई हैं. 27 जून, 2009 को हैदराबाद के नुजीवीडु सीड्स के एसवीआर राव द्वारा पुलिस में दर्ज एफआईआर और 6 जून, 2009 को सतर्कता आयोग को लिखे पत्र के मुताबिक त्रिपाठी लगातार माहिको के बीटी कॉटन का पक्ष लेने और नुजीवीडु और दूसरी कंपनियों के रास्ते में रुकावटें खड़ी करने का काम करते रहे हैं. त्रिपाठी ने तहलका के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया.
मगर यह तो बस उन कई विवादों में से एक है जिनसे जीईएसी को बिना ज्यादा मेहनत करे जोड़ा जा सकता है. इसकी दूसरी एक्सपर्ट कमेटी (ईसी-2) की संरचना हितों के टकराव की अंतहीन कहानी कहती है. ईसी-2 के 16 में से दो सदस्यों रेड्डी और त्रिपाठी के बारे में हम पढ़ ही चुके हैं. इनके अलावा समिति के तीन सदस्य माहिको द्वारा प्रायोजित बायो सेफ्टी परीक्षणों से सीधे तौर पर जुड़े हुए थे, मगर उनपर उनके खुद के परीक्षणों का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई. एक सदस्य खुद ही बीटी बैंगन का उत्पादक है. दो सदस्यों ने जीएम फसलों से संबंधित सरकारी दिशानिर्देशों को अमेरिका के पैसे से (यूएसएड द्वारा) चल रही एक परियोजना के माध्यम से बदलने में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी. इसके बाद इन सदस्यों ने इन नए नियमों का हवाला देकर अपने अन्य सहयोगियों की कई परीक्षणों की मांगों को दरकिनार कर दिया. जीईएसी के दो सदस्य महज पर्यवेक्षक थे और एक ने इसकी किसी भी बैठक में हिस्सा ही नहीं लिया. इसके बाद केवल पांच सदस्य ही ऐसे बचते हैं जिनपर कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती.
इन तथ्यों के अलावा कि जीएम फसलों को लेकर न तो इनसानों के लिए लंबी समयावधि वाले परीक्षण किए गए और न ही चूहों पर परीक्षणों के प्रतिकूल प्रभावों को ही दुनिया के सामने उजागर किया गया, और भी तमाम ऐसी बातें हैं जो गंभीर चिंताओं को जन्म देती हैं. लंबी समयावधि वाले इनसानी परीक्षण इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जीएम खाद्यों के स्वास्थ्य पर प्रभाव काफी लंबे समय में ही दिखाई पड़ते हैं. भारत में डालडा के नाम से मशहूर ‘ट्रांसफैट्स’ का ही उदाहरण ले लें. बाजार में लाए जाने के तीस साल बाद आज इन्हें बेहद हानिकारक माना जाता है और इन्हें ज्यादातर जगहों पर बैन कर दिया गया है.

फिर लेबलिंग का मसला भी है जो हमारी चिंताओं में और भी इजाफा कर रहा है. मोंसेंटो लगातार अपने जीएम उत्पादों पर ऐसा स्पष्ट करने वाला कुछ भी लिखने का विरोध करती रही है. और हमारे देश में तो वैसे भी इन चीजों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता. सीएसआईआर के डॉ समीर ब्रह्मचारी तो आधिकारिक तौर पर कह चुके हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि बीटी बैंगन हमारे खाने के लिए पूर्णतया सुरक्षित हैं, क्योंकि अमेरिकी बीटी सोया और मक्का तो बिना जाने ही हम पिछले काफी समय से खाए जा रहे हैं और अगर हमें बीमार पड़ना होता तो अब तक हम पड़ चुके होते. लेकिन अगर हमारे साथ ऐसा हो भी रहा हो तो हमें यह कैसे पता लगेगा कि ऐसा बीटी उत्पादों के कारण हो रहा है? इसके अलावा शायद डॉ ब्रह्मचारी और उनके जैसे तमाम दूसरे लोग यह नहीं जानते कि उत्पाद के लेबल पर उसके बारे में जानकारी देना कार्टाजेना प्रोटोकॉल के प्रावधानों के तहत जरूरी है जिसका भारत भी हस्ताक्षरी है.
योजना आयोग के सदस्य अर्थशास्त्री अभिजीत सेन इस बात को थोड़ा घुमा-फिराकर कहने का प्रयास करते हैं. वे जीएम फसलों को एक नई हरित क्रांति के लिए जरूरी तो मानते हैं मगर यह भी मानते हैं कि बीटी बैंगन को रोकने का सरकार का निर्णय सही है क्योंकि खाद्य सुरक्षा से जुड़े इतने बड़े पैमाने के प्रयोग की नियामक व्यवस्था का हर संदेह के परे होना बेहद जरूरी है. जहां तक लेबल पर जानकारी देने का सवाल है तो उनका कहना है कि यह नैतिक रूप से बेहद जरूरी लगता है, मगर इसके लिए जिस स्तर की निगरानी व्यवस्था की जरूरत होगी वह इसे अव्यावहारिक बना देती है. यानी यदि इंतजार में खड़ीं बीटी फसलों को हरी झंडी मिल जाती है तो जिस तरह की स्थितियां आज हैं उनमें हममें से कई ऐसे लोगों के सामने, जो बीटी खाद्य खाना ही नहीं चाहते, तमाम शाक-सब्जियों को खाना छोड़ने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं होगा. बीटी फसलों के खिलाफ आस-पड़ोस के खेतों में संक्रमण फैलाने के आरोपों को भी संज्ञान में ले लिया जाए तो आने वाले समय में शायद हमारे खाने-पीने के विकल्प उंगलियों पर गिन सकने लायक भी नही रह जाएं. तहलका के साथ एक विस्तृत ई-मेल साक्षात्कार में मोंसेंटो इंडिया के प्रबंध निदेशक डॉ ज्ञानेंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘कुछ लोग मानते हैं कि लेबलिंग जानने के अधिकार से जुड़ा है तो कुछ का मानना है कि चूंकि बायोतकनीक संवर्धित और इसके बिना संवर्धित (सामान्य) उत्पादों में कोई अंतर नहीं है, इसलिए लेबलिंग की कोई जरूरत ही नहीं है...हम तब लेबलिंग की जरूरत का समर्थन करते हैं जब इसके वैज्ञानिक कारण मौजूद हों. उदाहरण के तौर पर तब जब बायोतकनीक संवर्धित और पारंपरिक उत्पादों के पोषक तत्वों में कोई अंतर हो.’
अब हमारे यहां नियामक संस्थाओं के जो हाल हैं उनमें जीएम उत्पादों को परंपरागत उत्पादों के जैसा बताने वाला तर्क आसानी से गले कैसे उतर सकता है? और फिर मोंसेंटो का गलत जानकारी देने का एक लंबा इतिहास भी रहा है. पीएम भार्गव द्वारा जयराम रमेश को भेजी जानकारी के मुताबिक इसका सबसे बढ़िया मामला 1996 का है जब मोंसेंटो ने जीएम सोयाबीन पर अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक की थी. इस रिपोर्ट में सोया में कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के कम होने की बात के साथ-साथ कुछ हानिकारक तत्वों के कई गुना ज्यादा होने की बात छुपाई गई थी. मगर मोंसेंटो के इस अध्ययन का शीर्षक था- ‘ग्लाइफॉस्फेट-टॉलरेंट’ सोयाबीन (जीएम सोयाबीन) और पारंपरिक सोयाबीन की संरचना एक समान है.’ 2005 में एक जांच के दौरान इस बात का पता लगा. यह भी दिलचस्प है कि जीएम सोयाबीन की जरूरत भी तभी पड़ी थी जब मोंन्सेंटो द्वारा ही निर्मित एक खरपतनाशक ‘राउंड अप’ ने सोयाबीन की फसल को नष्ट करना शुरू कर दिया था. पहले सोयाबीन से खरपतवार हटाने के नाम पर राउंड अप बेचा गया और फिर इससे सोया को बचाने के नाम पर राउंड अप के साथ-साथ जीएम सोया को भी बेचा जाने लगा. यानी मर्ज भी हम ही बेचेंगे और दवा भी. और तुम्हारे पास इन्हें खरीदने के अलावा कोई और विकल्प है ही नहीं!
भार्गव एक और डराने वाला तथ्य यह उजागर करते हैं कि जब तक उसे जर्मनी की एक अदालत ने ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं किया तब तक मोंसेंटो जानवरों के ऊपर किए अपने परीक्षणों के परिणाम दुनिया के सामने लाने के लिए कतई राजी नहीं थी. इन परीक्षणों में जीएम मक्का खाने से चूहों के ऊपर कई तरह के प्रतिकूल प्रभाव पाए गए थे, मगर मोंसेंटो इसे गोपनीय व्यावसायिक जानकारी कहकर सार्वजनिक करने को तैयार ही नहीं थी. इसके बाद बीटी मक्का उत्पादों में से एक को कई यूरोपीय देशों ने प्रतिबंधित कर दिया.
भारत में बीटी कपास की कथित सफलता ने जीएम उत्पादों से जुड़ी बहस को एक अलग ही आयाम दे दिया है. इस सफलता की जड़ में पहुंचने के लिए तहलका ने कपास पैदा करने वाले चार प्रमुख इलाकों - भटिंडा (पंजाब), विदर्भ (महाराष्ट्र), वारंगल (आंध्र प्रदेश) और सुरेंद्र नगर (गुजरात) में अपने संवाददाताओं को भेजकर वस्तु-स्थिति जानने की कोशिश की.

पहली नजर में लग सकता है कि बीटी कपास उत्पादकता बढ़ाने और कीटनाशकों के इस्तेमाल में भारी कमी लाने में बेहद सफल साबित हुई है और करीब 90 फीसदी भारतीय किसान आज इसी का प्रयोग करते है. मगर तहलका की जमीनी रपटें किसी हद तक इस सफलता को स्वीकार करने के साथ-साथ बीटी फसलों के ऊपर जताए जा रहे तमाम संदेहों को मजबूत करने का काम भी करती है.
बीटी बीजों का सबसे लुभाऊ दावा यह है कि इनसे पैदावार बढ़ जाती है. यह सही नहीं है. बीटी जीन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उत्पादकता को बढ़ा सके. पैदावार केवल इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि बीटी जीन कपास के लिए सबसे ज्यादा हानिकारी कीड़ों को खत्म करने का काम करती है. उदाहरण के तौर पर, बीटी कपास अमेरिकी बुलवर्म और बीटी बैंगन शूट बोरर का मुकाबला कर सकते हैं. इससे आगे कुछ नहीं. बीटी फसलों का अच्छा होना न होना पारंपरिक फसलों वाले कारकों पर ही निर्भर होता है.
गुजरात में बीटी कपास एक बहुत बड़ी सफलता मानी जा सकती है. मगर इसमें इसकी कीटनाशक क्षमता के साथ-साथ इस बात का भी योगदान है कि वहां के किसानों के पास एक तो बड़ी-बड़ी जोतें हैं और दूसरा वहां पिछले छह सालों से लगातार इंद्र देवता भी किसानों का साथ देते आ रहे है.  इसके उलट विदर्भ में जहां जोतें काफी छोटी हैं और पानी की कमी है, उत्पादकता काफी कम है.
बीटी कपास की कहानी और तमाम चिंताओं को भी जन्म देती है: बीजों की कीमतों का छोटे किसानों के दायरे से बाहर चले जाना; देसी बीजों का विलुप्त हो जाना; आसपास के खेतों में संक्रमण होना; दूसरी तरह के मिलीबग जैसे कीड़ों का प्रभावी होना और स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होना.
भटिंडा में जिस किसी भी बीटी कपास उत्पादक किसान से तहलका ने बात की, उसका कहना था कि कपास के खेतों में काम करने वालों को यहां त्वचा की गंभीर समस्याएं होना एक आम बात है. स्थानीय डॉक्टर भी इसकी पुष्टि करते हैं. जबकि गुजरात में ऐसा कुछ नहीं पाया गया. आंध्र प्रदेश में 2005-2008 के बीच बीटी कपास का भूसा या बीज खाने से भेड़-बकरियों के बीमार होने और मरने की शिकायतें सामने आईं. जीईएसी ने जनवरी, 2008 में भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान और आंध्र प्रदेश के पशुपालन विभाग की रपटों का हवाला देते हुए कहा कि जानवरों को बीटी कपास से कोई खतरा नहीं है. लेकिन जब आंध्र के एक संगठन ने इस बाबत पशु अनुसंधान संस्थान में आरटीआई दाखिल की तो संस्थान का कहना था कि ‘उन्होंने ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया है और संस्थान ने जीईएसी को कोई रपट नहीं दी है.’ जीईएसी और बीटी व्यवसायियों के घालमेल का इससे बड़ा सबूत भला और क्या हो सकता है?
अंत में कीड़ों में बीटी जीन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होने के आरोप भी हैं. खुद से छेड़छाड़ का जवाब देने के कुदरत के अपने ही तरीके हैं. अलग-अलग जगह बातचीत में किसानों का कहना था कि शुरुआती 3-4 सालों के बाद बुलवर्म फिर से दिखाई पड़ने लगा है. आंध्र प्रदेश में यह समस्या कुछ ज्यादा ही बड़ी जान पड़ती है. बीटी कपास के बारे में किए तमाम दावों के विपरीत तहलका ने आंध्र प्रदेश में जिस भी किसान से बात की उसका यही कहना था कि बुलवर्म लगातार उनकी उपज पर असर डाल रहा है. 2003-04 में, जब बीटी कपास के व्यावसायिक उत्पादन की शुरुआत हुई थी तब आंध्र प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा किए सर्वेक्षण में भी बुलवर्म के पाए जाने की बात सामने आई थी. बीटी बीजों के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा यही बताया जा रहा था कि इनसे बिना रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किए बुलवर्म को खत्म किया जा सकता है. मगर यदि ऐसा नहीं है तो हमपर और हमारे वातावरण पर अनजाने प्रभाव वाले इन बीजों के इस्तेमाल का खतरा मोल लेने का क्या तुक बनता है?
जैसा कि हम पहले भी देख चुके हैं, ऐसा नहीं है कि हमारे देश में बीटी के पैरोकार केवल पैसों के लिए ही इसका समर्थन कर रहे हैं. बीटी का धुर समर्थन करने वाले एक अति महत्वपूर्ण सरकारी ओहदेदार अपना नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘भारत एक बड़े संकट की ओर अग्रसर है. हमारी कृषि उत्पादकता तो स्थिर है मगर जनसंख्या लगातार बढ़ रही है. कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने हमारी जमीन की ऊपरी परतों को बेकार कर दिया है. हमारे पास खेती योग्य और जमीन भी नहीं है. तो ऐसे में क्या किया जा सकता है.’ यानी कि खाने की कमी का डर. और बीटी समर्थकों का एक बहुत बड़ा वर्ग इस एक डर के आगे बाकी सारों को दरकिनार करने की राह पर चल पड़ा है. अगर उनसे कहें कि जनसंख्या पर लगाम लगाने या फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और भंडारण तंत्र में सुधार के भी तो प्रयास किए जा सकते हैं. यदि उन्हें बताएं कि अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत में भुखमरी का अपर्याप्त उत्पादन से कोई लेना-देना ही नहीं है तो उनमें से कोई भी इसे नहीं सुनने वाला. जैसा कि हमारे अनाम बीटी समर्थक कहते हैं, ‘आप अपनी आर्थिक नीतियों को इस विचार के आधार पर नहीं बना सकते कि आपकी व्यवस्था में कुछ भी बर्बाद नहीं होने वाला. आईएएएसटीडी रिपोर्ट (कृषि अनुसंधान पर भारत सहित दुनिया भर के 59 देशों द्वारा अनुमोदित संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक की रिपोर्ट) भी इस मामले में हमारा मार्गदर्शन कर सकती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक ‘विश्व की खाद्य सुरक्षा का हल कुछ छोटे-छोटे, अनाकर्षक, स्थानीय उपायों द्वारा किया जा सकता है.’ इस दिशा में बदलती दुनिया की सोच का एक संकेत इस बात से भी मिलता है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के वर्तमान मुखिया और न्यूजीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क का एक फरवरी को कहना था कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा ‘बुनियादी चीजों की तरफ लौटने’ में है. जीएम खाद्यों के हिलेरी क्लिंटन और उनकी वैज्ञानिक सलाहकार नीना फैडरॉफ जैसे पैरोकारों के उलट क्लार्क का यह भी कहना था, ‘मुझे नहीं लगता कि जेनेटिक इंजीनियरिंग खाद्य समस्या का समाधान पेश करती है.’
भारत ने दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए अमेरिका के साथ कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी का समझौता किया है. और इस मामले में बनी समिति - इंडो-यूएस नॉलेज इनिशियेटिव इन एग्रीकल्चर (केआईए) - का जो स्वरूप है (इसके बोर्ड के सदस्यों में मोंसेंटो, वॉलमार्ट और आर्चर मिडलैंड भी शामिल हैं) उससे यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अमेरिका खाद्य और कृषि से संबंधित हमारी नीतियों को बना भले ही न रहा हो लेकिन उन्हें प्रभावित जरूर कर रहा है.
मोंसेंटो के शुक्ला कहते हैं, ‘हम हर साल नए उत्पादों के विकास और उन्हें बाजार में उतारने के लिए 5,000 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. निवेश की गई इतनी मोटी रकम की भरपाई सुनिश्चित करने के लिए पेटेंट बहुत जरूरी है. पेटेंट के सहारे के बिना निजी कंपनियों को बने रहने और नई खोजों में निवेश करने का प्रोत्साहन ही नहीं मिलेगा.’
भरपाई की उम्मीद में निवेश की गई इतनी बड़ी राशि, अभी तक भारतीय बीज बाजार का 85 फीसदी अनछुआ हिस्सा, वादों और बड़े-बड़े दावों को देखते हुए भारतीय अथवा अमेरिकी प्रतिष्ठानों से यह उम्मीद करना भी बेमानी होगा कि वे खेती की प्राचीन पारंपरिक विधियों के समर्थन के लिए तैयार होंगे. शायद तब भी नहीं जब वे खाद्य सुरक्षा संबंधी वैकल्पिक और सुरक्षित तरीके मुहैया करवाएं.
शुक्ला के मुताबिक एक अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि साल 2006 में कीटरोधी फसल उगाने वाले किसानों ने बहुत कम मात्रा में रासायनिक छिड़काव का इस्तेमाल किया, जिससे 1.2 अरब किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ. यह पांच लाख कारों को सड़क से हटाने के बराबर है (लेकिन वे किसी समय-सीमा का जिक्र नहीं करते हैं).
इन आंकड़ों के सम्मोहन में कोई भी आसानी से यह तथ्य भूल सकता है कि 1970 में इन्हीं रासायनिक कीटनाशकों को ‘चमत्कारिक खोज’ का नाम देकर खूब प्रचारित किया गया था. इसी की पीठ पर सवार होकर देश में पहली हरित क्रांति का सूत्रपात हुआ था, जिसमें अमेरिका का पूरा सहयोग था. आज महज 30 साल बाद बहुत आसानी से उन्हीं रासायनिक कीटनाशकों को दुश्मन नंबर एक घोषित किया जा रहा है और कीटरोधी जीएम बीजों को नई ‘चमत्कारिक खोज’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है (इसकी अच्छाइयों और बुराइयों के पुख्ता आंकड़ों के बिना ही). इसे उन सभी बुराइयों के खिलाफ रामबाण बताया जा रहा है जो पहली हरित क्रांति के साथ आई थीं. काफी हद तक उसी तरह, जैसे खरपतवारनाशक राउंड अप के मुकाबले के लिए जीएम सोया ईजाद किया गया था. ऐतिहासिक रूप से मोंसेंटो कृषि रसायन और जीएम बीज- दोनों ही क्षेत्रों का बड़ा खिलाड़ी रहा है.
तथ्यों को और स्पष्ट करने के लिए पंजाब के भटिंडा जिले का जिक्र जरूरी है. पहली हरित क्रांति की प्रयोगस्थली रहा यह  इलाका तेजी से कैंसर पीड़ित क्षेत्र के रूप में उभरा है. भटिंडा से बीकानेर के बीच चलने वाली एक पुरानी ट्रेन को लोगों ने ‘कैंसर एक्सप्रेस’ का उपनाम दे रखा है. इस ट्रेन में भटिंडा और पंजाब के ग्रामीण इलाकों से बीकानेर स्थित कैंसर अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले कैंसर मरीजों और उनके परिजनों की भीड़ रहती है. अब कीटनाशकों का प्रयोग कम हुआ है तो उसकी जगह बीटी फसलों ने ले ली है और किसान अब एक नई परेशानी का जिक्र करते हैं- गंभीर त्वचा रोग.
तो क्या 30 साल पहले हम इन खतरों से अनजान थे? क्या हमें एक बार फिर से खतरा मोल लेना चाहिए? ‘शायद इसका कोई जवाब नहीं है,’ यह कहना है बीटी समर्थक एक सरकारी अधिकारी का, जिनके जवाब से जड़ सरकारी मानसिकता प्रदर्शित होती है. ‘हो सकता है कि 30 साल बाद हमें जीएम फसलों के दुष्प्रभावों के बारे में पता चले, लेकिन हमारे पास और विकल्प क्या हैं? यह सच है कि पहली हरित क्रांति के कुछ विपरीत प्रभाव रहे हैं, लेकिन इसके सहारे हम 30 साल तक अपने लोगों का पेट भरने में तो कामयाब रहे ही हैं. अगर आप बीते दिनों की बात करेंगी तो मैं फिर से यही कहूंगा कि हमने उस वक्त सही कदम उठाया था. हो सकता है कि मानव जाति अपने आपको खत्म करने के लिए ही पैदा हुई हो. हम सभी जानते है कि जीवाश्म ईंधन का अतिशय इस्तेमाल पृथ्वी को विनाश की तरफ धकेल सकता है, लेकिन आप देख सकती हैं कि इससे कितनी प्रगति हुई है. क्या हमें उल्टी दिशा में जाना चाहिए? क्या हम अपनी कारों और जहाजों के बिना रह सकते हैं?’
हरित क्रांति के जनक डॉ एमएस स्वामिनाथन ने जयराम रमेश को पत्र लिखकर उन्हें इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने बीटी बैंगन के मामले में ढेर-सारे लोगों के साथ सलाह-मशविरा किया. उन्होंने लिखा, ‘इस बात में कोई संदेह नहीं कि इसके अल्पकालिक फायदे हैं, लेकिन मानव स्वास्थ्य और देसी बैंगन की किस्मों के लिए गंभीर दूरगामी खतरे भी तो छिपे हुए हैं.’
तो फिर उपाय क्या है? स्वामिनाथन सुझाव देते हैं कि सरकारी संस्थान और आईआईएम, अहमदाबाद के डॉ अनिल गुप्ता (इनके पास कृषि से जुड़ी जानकारियां और खोजों के बहुत-सारे आंकड़े हैं) जैसे लोगों को मिलकर देश भर से देसी बैंगन के विभिन्न प्रकारों को इकट्ठा करना चाहिए और उन्हें सहेजना चाहिए. ‘हजारों साल के प्राकृतिक विकास और मानवीय चयन के इस उपहार को विलुप्ति की हरी झंडी देने से पहले इसके संग्रह को हर हाल में बेहद सावधानीपूर्वक संरक्षित करना होगा.’
जीएम फसलों को लेकर दोनों पक्षों की तरफ से हो रही बयानबाजी को देखते हुए कोई एक सिरा पकड़कर किसी पक्ष में खड़े हो जाना बेहद आसान है. लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं होगा. कइयों के मुताबिक जीएम फसलें बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं. इस लिहाज से बीटी फसलों (जिनमें विशिष्ट बीटी जीन डाला जाता है) की तुलना जीएम फसलों से करना अदूरदर्शी होगा. असली चुनौतियां कहीं और हैं. उनमें से कुछ का जिक्र यहां पहले ही विस्तार से किया जा चुका है. मसलन, हमारी सेहत पर मंडराता खतरा, परीक्षण संबंधी खामियां, लापरवाही, पारदर्शिता का अभाव और आश्चर्यजनक हड़बड़ी.

लेकिन कहीं ज्यादा दूर तक मारने वाली चिंताएं भी हैं. हमारी जैव-विविधता को खतरा है, अपने बीजों पर अपना हक खत्म होने का डर है. डर इसका भी है कि नियम-कायदों को लेकर सत्ता के रुख में आमूल-चूल बदलाव आ रहा है. सूत्रों के मुताबिक 2007 में हुई एक गोपनीय राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा में इसपर सहमति बनी थी कि जहां तक राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है, देश की कृषि सुरक्षा को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के बराबर ही समझ जाएगा. भार्गव कहते हैं, ‘आप बात को समङों. इसमें बहुत बड़ी चीज दांव पर लगी है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं कि देश की 62 फीसदी आबादी खेती पर जी रही है. 70 फीसदी लोग आज भी गांवों में रहते हैं. अगर बीज या फिर खेती में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स बनाने का काम सिर्फ एक कंपनी या फिर कुछ कंपनियों के गठजोड़ को मिल जाए तो फिर पूरा देश असल में वे चलाएंगे.’ जव-तकनीकी विभाग बनने में भी भार्गव की अहम भूमिका थी. इसे अब वे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलतियों में से एक बताते हैं.
भारत के किसानों के पास आज जो बीज हैं वे विकास और आदान-प्रदान की लंबी सामाजिक प्रक्रिया का नतीजा हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यह हमारा सदियों से सहेजा हुआ ज्ञान है. अगर हम इस पूरी प्रक्रिया को उलट दें और बीजों को बनाने, बचाने और किसानों के उन्हें इस्तेमाल करने के हक को किसी एक अमेरिकी कंपनी या फिर किसी निजी भारतीय कंपनी को ही सौंप दें तो क्या होगा? चलिए यह भी जान लेते हैं.
अमेरिका, जहां खेती के एक बड़े हिस्से पर मोंसेंटो और कुछ दूसरी बड़ी कंपनियों का राज चलता है, में अब एक नई और अजीब-सी शब्दावली सुनने को मिलती है. सीड पुलिस का मतलब मोंसेंटो द्वारा तैनात किए वे लोग जिनका काम यह देखना है कि कोई छोटा किसान बिना खरीदे बीज इस्तेमाल न कर पाए. सीड पायरेसी यानी अपने बीजों से खेती करने की पारंपरिक मगर अब गैर कानूनी विधि.
रमेश कहते हैं, ‘1990 के दशक की शुरुआत में जो कोई भी एनरॉन के भारत आने का विरोध करता था उसके बारे में कहा जाता था कि वह ऊर्जा और देशविरोधी है और बेकार का डर फैला रहा है. बाद में क्या हुआ?’ उनकी बात सही है.
प्रभावशाली अमेरिका लॉबी भारत पर दबाव डाल रही है. इसका सबसे स्पष्ट सबूत है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग के अंतर्गत आने वाला केआईए. इसपर प्रधानमंत्री के शुरुआती विचार-विमर्श का हिस्सा रहे एक मंत्री बताते हैं, ‘प्रधानमंत्री का विचार था कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों के सहयोग के जरिए भारतीय शोध संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में नई जान फूंकी जाए. मगर जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढ़ी, इसने एक दूसरी ही शक्ल अख्तियार कर ली.’
केआईए के बनने में अहम भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ नौकरशाह अमेरिकी साजिश की बात करने पर नाराज हो जाते हैं. वे कहते हैं, ‘अमेरिका में हो रहे हर कृषि शोध को निजी क्षेत्र पैसा दे रहा है. इसीलिए केआईए के बोर्ड में मोंसेंटो, आर्चर मिडलैंड और वॉलमार्ट हैं.’
इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (नवंबर, 2008) में छपे अपने एक लेख में सिकंदराबाद स्थित सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रिकल्चर से जुड़ीं कविता कुरुगंती ने केआईए की बैठकों का विश्लेषण किया था जिससे भारत के कृषि क्षेत्र में हालिया अमेरिकी दखलअंदाजी का पता चलता है. उन्होंने लिखा था, ‘केआईए में मुख्य जोर इस बात को लेकर भी था कि खेती से जुड़े महत्वपूर्ण नियामक तंत्र बदले जाएं.’ निजी क्षेत्र खासकर कृषि से संबंधित नियम-कानून किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के नजरिए से बनते हैं. अब अगर इन कंपनियों को इन नियमों में ही बदलाव की इजाजत मिल गई तो इसका नतीजा क्या होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं.
भारतीय नियम-कायदे अमेरिकी हितों के हिसाब से मुड़ जाएं, इसके लिए इन दिनों एक नया शब्द गढ़ लिया गया है. यह शब्द है ‘कानूनों में अनुरूपता’. जीईएसी के जैव-सुरक्षा नियम अमेरिकी पैसे से चलने वाले एक कार्यक्रम के तहत फिर से परिभाषित कर दिए गए. इससे जीईएसी को न सिर्फ अपने जमीर वाले कुछ सदस्यों द्वारा सुझए गए कई महत्वपूर्ण परीक्षणों और प्रक्रियाओं की उपेक्षा करने की छूट मिल गई बल्कि इसके सामने कई ऐसे परीक्षण करने की बाध्यता भी नहीं रही जो पहले देश में किए जा रहे थे. कुरुगंती लिखती भी हैं, ‘इसलिए हैरत नहीं कि मोंसेंटो और माहिको गंभीरता से कहती हैं कि हम तो सरकारी नियमों के हिसाब से ही चलेंगे.’
कुरुगंती द्वारा दिया गया जीएम खाद्य के नियमों में बदलाव का एक हालिया उदाहरण बताता है कि दबाव किस तरह काम करता है. अप्रैल, 2006 में वाणिज्य मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की थी जिसके तहत आयात होने वाले खाद्य की हर खेप के लिए जीएम स्टेटस का सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य हो गया. अमेरिका ने मई, 2006 में विश्व खाद्य संगठन (डब्ल्यूटीओ) में इसपर ऐतराज जताया तो जुलाई, 2006 में भारत ने उसकी बात मानते हुए यह नियम केवल सोयाबीन संबंधी उत्पादों तक सीमित कर दिया.
जोर-जबर्दस्ती और दबाव के सहारे अनुरूपता बनाने की इस नीति का विस्तार कानून के और भी कई अहम क्षेत्रों में हो रहा है, जैसे जैव-विविधता कानून 2002, वनस्पति प्रजाति एवं कृषक अधिकार कानून, भारतीय कृषि पेटेंट प्रावधान, बीज नियमन, कांट्रेक्ट फार्मिंग आदि.

दिलचस्प यह भी है कि जिस अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्री मिशेल व्हाइट हाउस में जैविक सब्जियां उगा रहे हैं वही अमेरिका जीएम फसलों को लेकर इतने जोशीले और हमलावर तेवर में दिखता है. कहा यह भी जाता है कि खुद मोंसेंटो अपने ऑफिसों की कैंटीन में जीएम खाने का इस्तेमाल नहीं करती.
अंत में शायद बीटी बैंगन का पूरा मसला विश्वास से भी जुड़ा है. एक तरफ प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर से जुड़े वे सनातन विचार हैं जो बताते हैं कि एक केवल अपने निजी हित की सोचता है और दूसरा कुछ-कुछ जनहित की. तो दूसरी ओर कुछ लोग इसे पब्लिक सेक्टर के आलस बनाम प्राइवेट सेक्टर के ऊर्जा और उत्साह के रूप में भी देखते हैं.
लेकिन जैसा कि एक्सपर्ट कमेटी के सह-अध्यक्ष डॉ रेड्डी - जिन्होंने भार्गव के अनुसार, दबाव के आगे घुटने टेक दिए थे - कहते हैं, ‘इस पूरी बहस को मोंसेंटो के हौवे ने और भी जटिल बना दिया है.’ शायद वे कुछ-कुछ सही भी हैं. मोंसेंटो के हाथों पर पर्यावरण के विनाश का खून तो लगा ही हुआ है, साथ ही अपने इन अपराधों के सबूतों और इनके विरुद्ध उठी आवाजों को बेशर्मी से दबाने का भी उसका बड़ा रिकॉर्ड है. वैनिटी फेयर के अनुसार, अमेरिका की 50 जगहें ऐसी हैं, जहां मोंसेंटो को ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार माना जाता है. वैनिटी फेयर के पास डरा देने वाली घटनाओं की पूरी सूची है. 1929 से 1971 के बीच मोंसेंटो का अल्बामा के एनिस्टन में एक कैमिकल प्लांट था. उसमें से ऐसे रसायन निकलते थे जिनके जहरीले दुष्प्रभाव थे. मोंसेंटो को उनके दुष्प्रभावों के बारे में मालूम था, फिर भी वह अपने कचरे को वहां खुले में फेंकती और नदी में बहाती रही. सालों तक एनिस्टन के निवासी उसी विषैली हवा में सांस लेते रहे और विषैला पानी पीते रहे. 1966 में मोंसेंटो ने एक शोध में पाया कि यदि रासायनिक कचरे से भरे उस पानी में कोई मछली डाली जाती है तो वह साढ़े तीन मिनट में मर जाती है. अदालत के दस्तावेजों में इस बात के और भी सबूत हैं कि मोंसेंटो को इसके बारे में पहले से पता था, लेकिन उसने वहां काम चालू रखा. 1970 में अमेरिका के खाद्य और दवा नियंत्रक विभाग को मोंसेंटो का एक गोपनीय दस्तावेज मिला, जिसमें उन स्थानीय अधिकारियों का जिक्र था जिनके जरिए कंपनी इस मामले को गुपचुप तरीके से संभालती रही थी. एक लंबी लड़ाई के बाद 2003 में मोंसेंटो और उसकी सहयोगी कंपनी एनिस्टन की सफाई के लिए राजी हुई और उन्होंने हर्जाने के तौर पर वहां के 21,000 निवासियों को करीब 55 करोड़ डॉलर दिए.
सत्तर के दशक के आखिरी सालों में मोंसेंटो ने रसायनों को छोड़कर बायोटेक्नोलॉजी में पूंजी लगाना शुरु किया. 1982 में उसे तब मानो एक सोने की खान मिल गई जब उसे पहली बार जीन-संवर्धित पौधा उगाने में सफलता मिली. नब्बे के दशक के अंत तक उसने अपने आपको ‘लाइफ साइंसेज’ की कंपनी के रूप में स्थापित कर लिया था. अपने काले अतीत को छिपाने के लिए उसने रसायन और रेशा उद्योगों को एक नई कंपनी सॉल्यूशिया के नाम से जारी रखा. 2002 में मोंसेंटो ने अपने आपको पूरी तरह से एक ‘कृषि कंपनी’ घोषित कर दिया.
भारत में भी मोंसेंटो ने कुछ-कुछ इसी प्रकार राजू बरेवाला की कंपनी माहिको को बीटी बैंगन का सारा जिम्मा थमा दिया. माहिको ने न सिर्फ पूरी तकनीक मोंसेंटो से खरीदी है, बल्कि  मोंसेंटो के पास उसके 26 प्रतिशत शेयर भी हैं. साथ ही माहिको और मोंसेंटो ने बराबर की हिस्सेदारी वाली एक और कंपनी शुरू की है, जो बीटी कपास बेचती है.
इस मुद्दे के मीडिया में उछलने के बाद प्रधानमंत्री ने एक मीटिंग की, जिसमें कृषि मंत्री शरद पवार, मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश शामिल थे. एजेंसी की रिपोरर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने रमेश की बात का समर्थन करते हुए और परीक्षण करवाने को कहा है, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि यह कम से कम समय में हो जाए. खबर यह भी है कि प्रधानमंत्री विवादास्पद विधेयक एनबीआरएआई को संसद में पेश करवाना चाहते हैं. ये दोनों इच्छाएं ही अपने आप में विरोधाभासी हैं.
भारत दोराहे पर खड़ा है. प्रधानमंत्री और उनकी सरकार दोनों में से जो भी राह चुनेगी, उसके दूरगामी परिणाम होंगे और चाहे कोई भी राह चुनी जाए, उसपर से वापस लौटकर आना तो नामुमकिन ही होगा. 
दूसरी रिपोर्ट कल

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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