हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/15/2010 10:19:00 PM

गिरीश मिश्र
पहले
की तरह ही इस बार चालू वित्तीय वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति की रूपरेखा संसद के समक्ष आगामी वर्ष का बजट पेश करने के पूर्व रखी गई जिससे बजट प्रस्तावों पर सार्थक बहस हो सके. 'आर्थिक समीक्षा 2009-10' में संवृध्दि की संभावनाओं और घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है.
 'आर्थिक समीक्षा 2009-10' से स्पष्ट है कि हमारी अर्थव्यवस्था विकसित देशों में पैदा होकर सर्वत्र फैली अति मंदी के चंगुल से काफी कुछ बाहर आ गई है और उसने आर्थिक संवृध्दि के मार्ग पर बढने की रफ्तार तेज कर दी है. हमारी वार्षिक संवृध्दि की दर 2007 में अतिमंदी का दौर शुरू होने के पूर्व, यानी 2006-07 में 9.7 प्रतिशत हो गई थी और भारतीय अर्थव्यवस्था एशिया में तीसरें स्थान पर चीन और जापान के बाद पहुंच चुकी थी. उम्मीद की जा रही थी कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो वह जापान को पीछे धकेल कर दूसरे स्थान पर काबिज हो जाएगी. कुछ लोग भारत के महाशक्ति बनने का सपना भी देखने लगे थे. किन्तु, दुर्भाग्यवश अतिमंदी के कारण संवृध्दि दर में भी सुस्ती आई और वह 2007-08 में 9.2 प्रतिशत तथा 2008-09 में 6.7 प्रतिशत पर आ गई. वर्तमान वित्तीय वर्ष 2009 -10 में आशा है कि वह 7.2 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी. जो भी हो, भारतीय अर्थव्यवस्था को उतना नुकसान नहीं हुआ है जितना कई अन्य देशों को हुआ है. इसका एक बडा कारण नेहरू-इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों को नहीं छोडना रहा है. कांग्रेस-नीत संप्रग की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने कई महीने पहले 'हिन्दुस्तान टाइम्स' द्वारा आयोजित एक समारोह में इस तथ्य को रेखांकित किया था. यहां हम इसके समर्थन में दो बातों का उल्लेख करना चाहेंगे. पहली, नवउदारवाद के गढ़, शिकागो स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से अभिन्न रूप से जुडे रघुराम जी राजन (जो कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे) की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने भारतीय मुद्रा को पूंजी खाते में पूर्ण परिवर्तनीय बनाने के सलाह दी थी. मगर परिस्थितियों में बदलाव के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका था. जब  देश में खेतिहरों द्वारा आत्महत्या करने की दुखद घटनाओं को देखते हुए सरकार ने कर्जमाफी जैसी कदम उठाए तब इन्हीं राजन साहब ने उसका जोरदार विरोध किया. उनका कहना था कि इससे 'मोरल हैजार्ड' का खतरा पैदा होगा जिससे लोग कर्ज लेंगे मगर नहीं लौटाएगे क्योंकि वे यह मानकर चलेंगे कि देर-सबेर उसे सरकार माफ कर देगी.
दूसरी, कौशिक बसु ने, जो अभी भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं, 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में अपने नाम से एक पत्र लिखकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना का विरोध किया क्योंकि उनके अनुसार इससे काहिलपन बढेग़ा.
कई 'ज्ञानी' लोगों के हवाले से लंदन के दैनिक पत्र 'फाइनेंसियल टाइम्स' (25 फरवरी) ने लिखा है कि इस योजना से गांव के गरीबों को रोजगार और मजदूरी मिलने से खाद्यान्नों की मांग बढ़ रही है जिससे उनकी कीमतों में इजाफा हो रहा है. पिछले वर्ष की तुलना में इस साल खाद्य पदार्थों की कीमत 18 प्रतिशत बढी है. अगर यह तर्क सही है तो देश में गरीबी बढनी चाहिए जिससे क्रयशक्ति के अभाव में मांग और परिणामत: कीमतें नहीं बढेंग़ी.
मप्र के पूर्व राज्यापाल बलराम जाखड़ के रिश्तेदार अजय जाखड ज़ो भारत कृषक समाज के अध्यक्ष हैं, नरेगा के विरुध्द हैं क्योंकि उनके अनुसार खेतिहरों की परेशानी बढ ग़ई है. कारण है: मजदूरों द्वारा मजदूरी की ऊंची दर की मांग. स्पष्टतया हमारे देश में मनोरोगियों की संख्या बढ रही है.  'आर्थिक समीक्षा के अनुसार विनिर्माण क्षेत्र मंदी के दौर से लगाता है कि बाहर आने लगा है. उसकी संवृध्दि दर 2006-07 में 14.9 प्रतिशत थी जो घटकर 2007-08 में 10.3 और 2008-09 में 3.2 प्रतिशत पर आ गई थी. चालू वर्ष में उसके 8.9 प्रतिशत होने की आशा की जा रही है. इसके विपरीत, कृषि क्षेत्र की स्थिति चिन्ताजनक बनी हुई है. कृषि उत्पादन की संवृध्दि दर 2007-08 में 4.7 प्रतिशत थी जो 2008-09 में 1.6 प्रतिशत हो गई. आशंका है कि चालू वर्ष में उसमें ऋणात्मक यानी -0.2 प्रतिशत की संवृध्दि दर्ज होगी. याद रहे कि कृषि क्षेत्र पर हमारी 60 प्रतिशत जनसंख्या रोजी-रोटी के लिए निर्भर है. अत: कृषि क्षेत्र की पैदावार में गिरावट से हमारी बहुसंख्यक जनसंख्या प्रमावित होगी. दक्षिण पश्चिम मानसून की कृपणता को ही इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. राज्य भी काफी हद तक उत्तरदायी है. कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश अपर्याप्त रहा है. सिंचाई की  सुविधाओं का पर्याप्त विस्तार नहीं हो रहा है. नेहरू-इन्दिरा काल में बनी नहरों का नियमित सफाई न होने के कारण उसमें रेत जम जाने के कारण उनकी सिंचाई क्षमता कम होती जा रही है. सडक़ों, बिजली, कीमत प्रबंधन आदि की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चीनी मिलों में ताला लगने के बाद नकदी फसलों को उगाने के अवसर तेजी से घटे हैं. इन सब कारणों से गरीबी बढती जा रही है. गांवों से शहरों की ओर पलयान और नगरों में मलिन बस्तियों के विस्तार में तेजी आई है. हाल में आई गरीबी से जुडी सुरेश तेंदुलकर और अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोटों की चर्चा हम पहले कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार अतिमंदी ने 2008-09 में ही 3 करोड चार 40 लाख लोगों की गरीबी की रेखा के नीचे धकेल दिया है. जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 1991 और 2001 के बीच 80 लाख कृषि क्षेत्र से अन्यत्र पलायन कर गए. सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सिर्फ 2008 में 16,136 खेतिहरों ने आत्महत्या कर ली. 1997 और 2008 के बीच 1,99,132 खेतिहरों ने खुदकुशी कर ली. 'आर्थिक समीक्षा' के अध्याय दो के लेखक हैं सरकार के मख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु. इसमें उन्होंने समावेशी संवृध्दि की अवधारणा की विस्तार से व्याख्या करने तथा यह बतलाने की कोशिश की है कि यह नया विचार है. वस्तुत ऐसा कुछ भी नहीं है. यह एक पुरानी और बदनाम अवधारणा 'ट्रिकल डाउन' सिध्दांत को नए परिधान में प्रस्तुत करने की कोशिश है. इस सिध्दांत का मानना है कि सरकार को राष्ट्रीय आय के वितरण को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. यदि अधिकांश राष्ट्रीय आय थोडे से लोगों के पास जाती है तो चिंतित नहीं  होना चाहिए. अंतत:  उस आय का एक बडा भाग रिस या टपक कर निचले तबकों को प्राप्त होगा. नवउदारवादी वाशिंगटन आम राय पर आधारित भूमंडलीकरण के पक्षधरों का इसमें अटूट विश्वास है. हमारे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसके समर्थन में कई शोध पत्र लिखे हैं. मगर कई लोग इसे गलत और अमानवीय मानते हैं. दिवंगत प्रो. गालब्रेथ ने कहा था कि यह बहुत कुछ वैसे ही है जेसे किसी छोडे क़ो काफी दाना खिलाया जाय जिससे उसकी लीद में  कुछ दाने बाहर आ जाएं जिनको चुगकर गौरेए जिन्दा रहें. साज सज्जा जो भी हो 'समावेशी संवृध्दि' और 'ट्रिकल डाउन' सिध्दान्त में सारत: कोई फर्क नहीं है. हम कह सकते हैं कि जब धनवानों की बारात चलेगी तो हाथी, घोडा, पालकी, रॉल्सरॉयस आदि पर सभ्रांत लोग चलेंगे और साथ-साथ चॅवर डुलने और भाडू लगाने वाले ही होंगे. वधू के घर पर सबको हैसियत के अनुसार खाना पीना मिलेगा कोई भूखा न रहेगा.
 नवउदारवादी चिन्तन का प्रभाव वित्तमंत्री के भी बजट भाषण में स्पष्ट रूप से दिखता है. उनके अनुसार अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका सक्रिय और मुख्य न होकर सहायक की होगी. मुख्य भूमिका निजी क्षेत्र और बाजार की होगी. राज्य सिर्फ 'इनेब्लर' या सहायक का कार्य करेगा. नवउदारवादी चिंतन में फैसिलिटेटर शब्द का इस्तेमाल हुआ है. अर्थ की दृष्टि से दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय हैं. राज्य, श्री मुखर्जी के शब्दों में एक ऐसा वातावरण बनाएगा जिसमें निजी क्षेत्र बाजार द्वारा संचालित हो, जनता की जरूरतों को संतुष्ट करेगा. वित्त मंत्री ने रेखांकित किया है: 'संघीय बजट सरकारी लेखा का विवरण मात्र नहीं हो सकता. उसे सरकार की दृष्टि और भावी नीतियों को प्रतिविम्बित करना चाहिए. ' इस प्रकार श्री मुखर्जी ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत सरकार की नीतियां अब राष्ट्रीय आंदोलन तथा नेहरू-इंदिरा युग की प्रतिबध्दताओं से दूर चली गई है. वे अब नवउदारवादी चिंतन को  प्रतिविम्बित करेंगी. सर्वोच्च स्थान पर राज्य नहीं बल्कि बाजार बैठेगा. वह जमाना लद गया जब बाजार समाज में सन्निहित था.
अब बाजार समाज पर हावी है. आर्थिक विकास का उद्देश्य समाज में समता और क्षेत्रीय दृष्टि से संतुलन लाना नहीं रह गया है. यह अप्रत्याशित नहीं है. कार्ल पोलान्यी ने अपनी अमर कृति 'द ग्रेट ट्रांसफॉर्मेशन' में 1944 में ही इसे बडे वस्तिार से बतला दिया था. अनेक देशी-विदेशी शक्तियां बेचैन हैं. वे चाहती हैं कि नवउदारवादी आर्थिक चिन्तन को तेजी से पूरी तरह लागू कर दिया जाए. 'फाइनेंशियल टाइम्स' के जेम्स लेमात ने फरवरी 4 के अंक में लिखा कि डा. मनमोहन सिंह 77 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं. अगली बार वे शायद प्रधानमंत्री नहीं बन पाएं. हो सकता है कि राहुल गांधी उनकी जगह लें जिनका वास्ता नेहरू-गांधी परिवार के  साथ है. अत: यह नकारा नहीं जा सकता कि वे नवउदारवादी चिंतन को धत्ता बता कर नेहरूवादी चिंतन को न अपना लें. अत: तत्काल प्राप्त अवसर  को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए. 'वॉल स्ट्रीट जर्नल के दक्षिण एशिया ब्यूरो प्रधान पॉल बेकेट ने प्रणब मुखर्जी के नाम एक खुला पत्र प्रकाशित कर कहा है कि अब वामपंथियों का दबाव नहीं है और भाजपा ने खुद ही अपना बंटाधार कर लिया है. अत: नवउदारवादी आर्थिक सुधार कार्यक्रम की गाडी स्पष्ट दौडनी चाहिए. यह पत्र बजट पेश होने के एक दिन पूर्व यानी 25 फरवरी को छपा था. अब देखना है कि आने वाले समय में  सरकार आम आदमी के साथ अपनी प्रबिध्दता तथा नवउदारवादी चिंतन की अपेक्षाओं के बीच कैसे तालमेल बिठाती है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य ”

  2. By कृष्ण मुरारी प्रसाद on March 15, 2010 at 10:41 PM

    भारतीय व्यबस्था यानी कि...
    सब धन बाईस पसेरी...
    अंधा बांटे रेवड़ी मुड-मुड अपनों को देय
    ....
    लड्डू बोलता है...इंजीनियर के दिल से....
    laddoospeaks.blogspot.com

  3. By शरद कोकास on March 16, 2010 at 1:05 AM

    अच्छा आलेख ।

  4. By ravishndtv on March 16, 2010 at 9:36 AM

    achhaa lagaa..

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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