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बीच सफ़हे की लड़ाई

चिंताएं, संविधान और सामाजिक विकास का यथार्थ

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/11/2010 08:00:00 AM

अनिल चमड़िया
संविधान में जो व्यवस्थाएं हैं उनकी व्याख्या विभिन्न विचारों वाली राजनीति अपने तरीके से कर सकती है. लेकिन संविधान से अलग कोई व्यवस्था करने का आश्वासन या भरोसा कोई राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देता है तो उसके दो ही मकसद हो सकते हैं. एक तो यह कि वह लोगों को झांसे में रखना चाहता है और दूसरा वह उस संविधानेतर व्यवस्था के लिए ऐसा जनमानस तैयार करना चाहता है, जिससे संविधान पर चोट की जा सके. जैसे भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का मकसद. जबकि संविधान का आधार धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था कायम करना है. जो विचारधारा और उस पर आधारित संगठन संविधान को नहीं मानते वह खुलेआम अपनी बात उसी रूप में रखते हैं. इस तरह समाज में दो स्तरों पर राजनीतिक संघर्ष चल रहे हैं. एक संविधान की व्यवस्थाओं की व्याख्याओं का राजनीतिक संघर्ष और दूसरा संविधान को बदलने के खुले और गुप्त संघर्ष. यहां सवाल उठाया जा सकता है कि इन तमाम तरह के संघर्षों में किस तरह के संगठनों की जगह समाज में बनी हुई है और क्यों बनी हुई है? यहां केवल संविधान की व्यवस्थाओं की व्याख्याएं करने वाली पार्टियों और उनके विरोधाभासों को समझने की कोशिश करते हैं. मसलन बार-बार कहा गया है कि केवल आधुनिक शिक्षा ही वह जरिया है जिससे मुसलमानों की मौजूदा स्थिति में परिवर्तन लाया जा सकता है. यह जोर देकर कहा जाता है कि मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह उस आबादी के बड़े हिस्से का धार्मिक और रूढ़ किस्म की संस्थाओं से संबंद्ध होना है लेकिन इसी बात को देश के आदिवासियों एवं दलितों के संदर्भ में देखा जाए तो इस व्याख्या के क्या अर्थ निकलते हैँ? दलित और आदिवासी तो धार्मिक और रूढ़ संस्थानों से नहीं चिपके हैं. वे तो जिस शिक्षा को आधुनिक कहा जाता है उसे हासिल करना चाहते हैं लेकिन उन्हें उससे वंचित किया जाता है. संविधान के मुताबिक उनके लिए आरक्षण की व्यव्स्था है लेकिन आंकड़ों का एक पुलिंदा हमारे सामने है कि आधुनिक शिक्षा हासिल करने वाली उनकी एक बड़ी आबादी को बराबर अयोग्यता के कटघरे में खड़ा रखा जाता है. व्याख्याओं का मकसद क्या है और उसका लक्ष्य क्या है, इसे स्पष्ट करना बहुत जरूरी होता है. हमारे समाज में संविधान की व्यवस्थाओं की जो व्याख्याएं तैयार की जाती हैं उनके बीच एक प्रतिद्वंद्विता तो दिखती है लेकिन वे लगभग एक ही लक्ष्य की तरफ जाते दिखाई देते हैं. जैसे देश में नक्सली गतिविधियों के बने रहने के कारणों का जब उल्लेख किया जाता है तो उसकी व्याख्या इस रूप में पेश की जाती है कि ये पिछड़ेपन की वजह से है. विकास के कार्यक्रम लागू ठीक तरीके से लागू नहीं होने के कारण पिछड़े इलाकों में नक्सलवाद पनपता है.
लेकिन क्या पिछड़ेपन की वजह से केवल नक्सलवाद पनपता है? बाबरी मस्जिद कांड की जांच करने वाली लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को लें. कथित मुख्य धारा की राजनीतिक शाखाएं दावा क्यों नहीं करती हैं कि पिछड़ेपन की वजह से साम्प्रदायिकता ने अपने डैने कितने फैलाए हैं. न्यायाधीश लिब्रहान कहते हैं कि रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिकता वहां फलती-फूलती है जहां आमतौर पर गरीबी और शैक्षणिक पिछड़ेपन हो, जहां अपेक्षित विकास न हुआ हो, स्थानीय नेता रंक से राजा बनने के लिए ललायित हो. साम्प्रदायिक हिंसा में जितनी जानें गई हैं और जिस कदर सामाजिक ढांचा प्रभावित हुआ है, यदि इस तरह के आंकड़ों के आधार पर नक्सलवाद को सामने रखा जाए तो साम्प्रदायिकता को खत्म करने के लिए पिछड़ेपन को दूर करना पहले जरूरी लगेगा. इस बात को छिपाने वाले व्याख्याकार नक्सलवाद के पीछे महज विकास के काम नहीं होने की जब वजह बताते हैं तो वे वास्तव में समाज में एक राजनीतिक ठहराव के पक्षधर के रूप में भी सामने आते हैं. यदि वे साम्प्रदायिकता के पीछे पिछड़ेपन की व्याख्या के साथ सामने आते है तो पिछड़ेपन की वास्तविकता सामने आती दिखाई देती है. इससे इन तमाम प्रतिद्वंद्वियों को अपने ऊपर एक राजनीतिक खतरा दिखाई देने लगता है. इसी तरह से एक उदाहरण मुस्लिम और महिला आरक्षण को लिया जा सकता है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियां विधायिका में महिला आरक्षण की पक्षधर हैं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी इसकी पक्षधर है. जबकि ये तीनों ही सामाजिक आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की विरोधी रही हैं. बाद में लाचारीवश उनके रूख में परिवर्तन आया. इसी कड़ी में देखा जाए तो वामपंथी पार्टियां महिला आरक्षण में सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर जातीय आरक्षण की विरोधी है. भाजपा और कांग्रेस भी इसके विरोध में है लेकिन इन्हीं वामपंथी पार्टियों की सरकार ने पश्चिम बंगाल में मुसलमानों को जातीय आधार पर आरक्षण देने का फैसला किया है.आखिर मुसलमानों में जातीय भेदभाव को स्वीकार करने का क्या कारण हैं? आंघ्रप्रदेश में भी कांग्रेस ने मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को आरक्षण देने का फैसला किया था. आखिर महिला को एक ही जाति मानने का क्या आधार है और जो इस्लाम अपने यहां किसी तरह के जातीय भेदभाव को नहीं मानता है उसके अनुयायियों के बीच जातीय भेदभाव को स्वीकार करने का क्या कारण है. दूसरी तरफ दिलचस्प बात यह भी है कि जो पार्टियां मसलन राजद और समाजवादी पार्टी सामाजिक आधार पर आरक्षण की प्रबल पक्षधर है और जो महिला आरक्षण में भी जातीय प्रावधान चाहती हैं, वो मुसलमानों के आरक्षण में जाति आधारित व्यवस्था के खिलाफ है. ठीक वैसे ही जैसे मुसलमानों में वर्चस्व रखने वाली जातियों और उससे जुड़े नेतृत्व द्वारा पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने का विरोध किया जाता है. जाति भारतीय समाज की एक वास्तविकता है और इसे उसके यथार्थ के साथ ही व्याख्यायित किया जा सकता है. समाज में राजनीतिक संघर्ष सभी स्तरों पर समानता लाने का है. यही संविधान की वास्तविक व्याख्या होनी चाहिए लेकिन यह पाया जाता है कि राजनीतिक पार्टियों ने अपनी व्याख्याओं से इस तरह से समाज को उलझा रखा है कि समानता की लड़ाई तेज नहीं हो पाती है. महिला हित की बात होते हुए भी महिला पिछड़ेपन की शिकार बनी हुई है. मुसलमानों के लिए चितिंत होने के बावजूद उनका पिछड़ापन बढ़ता जा रहा है. दलितों के लिए ढेर सारे आंसू बहने के बावजूद दलित अपने हक हकूक से वंचित हैं. आदिवासी लगातार अपने हालात पर बनने वाली रिपोर्टों में दबते जा रहे हैं. अंतिम सच है कि समाज में जिन लोगों का वर्चस्व बना रहा है उनका वर्चस्व बढ़ा है.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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