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बीच सफ़हे की लड़ाई

नवउदारवादी दलदल में भारत

Posted by Reyaz-ul-haque on 3/10/2010 06:33:00 PM

गिरीश मिश्र
गरीबी, गांवों से शहरों और पिछड़े राज्यों से अपेक्षाकृत विकसित राज्यों की ओर पलायन, भ्रष्टाचार, अपराध, आतंकवाद, सामाजिक विषमता, क्षेत्रीय असंतुलन, मलिन बस्तियां आदि हमारे देश में अनेक दशकों से विद्यमान हैं मगर इनमें परिणामत्मक एंव गुणात्मक परिवर्तन 1980 के दशक के उत्तरार्ध से हो रहे हैं. लाखों दावों के बावजूद गरीबी बढ़ती ही जा रही है. सुरेश तेंदुलकर की रिपोर्ट देखें या अर्जुन सेनगुप्ता की अथवा गरीबी-रेखा के नीचे जिंदगी बसर करने वालों से जुडी विशेषज्ञ समिति की, सब यही रेखांकित करती हैं कि देश में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है. गरीबी की मार से बहुत बड़ा जनसमुदाय त्रस्त है. अभी-अभी प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार 2008-2009 में अति मंदी के कारण तीन करोड़ 40 लाख अतिरिक्त लोगों की गरीबों की जमात में धकेल दिया गया है. देश में आतंक और माओवादी आंदोलन का तेजी से विस्तार हो रहा है. अपहरण और लूटपाट की वारदातें बढ़ती जा रही हैं. एक जमाना था जब संसद के परिसर से दिल्ली परिवहन निगम की बसें आती-जाती थीं और राष्ट्रपति भवन का परिसर और दुकानें आम लोगों के लिए खुली रहती थीं. आज वे वर्जित क्षेत्र के अंतर्गत हैं. अधिकतर कॉलोनियों में गेट बन गए हैं तथा चौकीदार तैनात हैं. क्षेत्रीयता जोर पकड़ रही है. महाराष्ट्र और असम की घटनाएं इसे उजागर करती हैं. भ्रष्टाचार में लिप्त लोग उच्च पदों पर आसीन होते जा रहे हैं. न्यायपालिका में बैठे व्यक्तियों पर भी अंगुली उठाई जा रही है. धनाढ्य अपनी दौलत का अश्लील प्रदर्शन कर रहे हैं और सत्ता से बाहर जाने पर भी राजनेता अपने सुरक्षाकर्मियों को बनाए रखने के लिए हर संभव दबाव डालते हैं. मीडिया की कोई जनसंवेदना प्रतिबद्धता नहीं रह गई है. कम से कम लागत पर अधिकाधिक विज्ञापन-आय प्राप्त करना मुख्य उद्देश्य है. बॉलीवुड, क्रिकेट और दलाल स्ट्रीट के अतिरिक्त जोर सनसनीखेज खबरों और मुद्दों पर है. उपर्युक्त परिवर्तन अकारण नहीं हुए हैं. वस्तुत: इनकी जड़ में देश द्वारा नवउदारवादी आर्थिक चिंतन को अपनाकर अपने दृष्टिकोण एवं नीतियों को नेहरू युग के विपरीत ले जाना रहा है. जो काम पश्चिमी दबावों और धमकियों, फोरम ऑफ फ्री इंटरप्राइज, स्वतंत्र पार्टी आदि नहीं करा पाई वह बड़े ही शान्ति पूर्ण ढंग से हो गया. इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि जनता पार्टी की सरकार ने तैयार की और विश्वनाथ प्रताप सिंह और चन्द्रशेखर की सरकारों ने उसमें भारी योगदान दिया. उनके कुप्रबंधन का ही नतीजा था कि ''समाजवादी'' चन्द्रशेखर के वित्तमंत्री और अभी भाजपा के नेता भारत से सोना लेकर विदेश गिरवी रख आए. इस दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के द्वारा नेहरु का रास्ता छोड़ नवउदारवादी मार्ग अपनाने के लिए अमेरिकी दबाव बढ़ा. एल के झा से लेकर गुरचरणदास इसके समर्थन में अपनी किताबें लेकर आए. अंतत: नरसिंह राव की सरकार ने नवउदारवाद को अपनाने का फैसला किया और उसके अनुकूल आर्थिक सुधार कार्यक्रम आरंभ किए जो वाजपेयी की राजग सरकार ने जारी रखी और अब भी जारी है. यद्यपि नवउदारवाद शब्द पिछले तीन दशकों में अधिक प्रचलित हुआ है और दावा किया जा रहा है कि वही आगे की दुनिया का मार्गदर्शक है तथा वर्तमान युग उसी के नाम है, फिर भी उसका पहली बार इस्तेमाल जर्मन समाजविज्ञानी अलेक्जेंडर रुस्टो ने 1938 में किया. उन्होंने क्लासिकी उदारवाद को पुन: परिभाषित किया.मान्यता थी कि पूर्ण प्रतिद्वंद्विता तथा बाजार से जुड़ी तमाम जानकारियों से अवगत होने की स्थिति में उत्पादन और वितरण समुचित ढंग से होगा. विज्ञापन का उद्देश्य सही जानकारी देना मात्र होगा. कहना न होगा कि उपर्युक्त मान्यताएं कब को समाप्त हो चुकी हैं. पूण प्रतिद्वंद्विता इजारेदारी के उद्भव और अर्थव्यवस्था पर हावी होने के कारण कोसों पीछे छूट गई है. उपभोक्ता हो या उत्पादक या फिर श्रमिक, किसी को पूरी जानकारी नहीं मिलती. विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना ही रह गया है. आप इलेक्ट्रानिक मीडिया देखें या प्रिंट मीडिया, और उदाहरण के लिए वाशिंग पाउडर को लें आपके लिए यह फैसला करना कठिन होगा कि कौन सा अच्छा है. ब्रांड, पेटेंट आदि अनेक तरीकों से सही जानकारी और मुक्त प्रतिद्वंद्विता को रोका जाता है. ब्रेटनवुड्स प्रणाली के अवसान के साथ परिवर्तनीय मुद्राओं के युग का आरंभ हुआ और भूमंडलीय पूंजी बाजार का जन्म हुआ. विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया. सोवियत संघ और समाजवादी खेमा धराशायी हो गया. गुटनिरपेक्ष आंदोलन और आत्मनिर्भर स्वतंत्र अर्थव्यवस्था का सपना समाप्त हो गए. सूचना और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए और पूंजीवाद का पुराना सपना कि सारे विश्व को बाजार बना संचालित किया जाये, साकार होता दिखने लगा. अमरीका एकमात्र महाशाक्ति बन गया. भूमंडलीकरण का एक नया दौर शुरू हुआ, जिसने राष्ट्र-राज्य और उसकी सार्वभौमिकता से जुडी मान्यताओं को निरर्थक कर दिया. इस नए दौर का वैचारिक आधार नवउदारवाद बना जिसे ''वाशिंगटन आम राय ''के रूप में जॉन विलियम्सन ने 1990 में प्रस्तुत किया. इसे अमेरीका सरकार (ट्रेजरी, फेडरल रिजर्व और वाणिज्य विभाग)और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और इंटर अमेरिकन बैंक ने आगे बढ़ाया. जोसेफ स्टिग्लिट्ज के शब्दों में, 'यह आम राय वाशिंगटन की 15वीं और 19 वीं सडक़े पर बनी थी. कहना न होगा कि इन्हीं सडक़ों पर अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं स्थित हैं. याद रहे कि इस आम राय के प्रेरणा स्त्रोत शिकागो स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स के मिलटन फ्रीडमैन, जार्ज स्टिग्लर, फ्रेडरिक फॉन हायक आदि रहे'. वाशिंगटन आम राय में दस बातें हैं: (1) राकोषीय अनुशासन : बजटीय घाटे को सीमित रखने के लिए कठोर कदम, (2) सार्वजनिक व्यय-संबंधी प्राथमिकताओं में परिवर्तन, सबसीडी में कटौती और गरीबी निवारण के कार्यक्रमों की समाप्ति (3) कर संबंधी सुधार : कराधान के आधार का विस्तार और कर की सीमान्त दर में कमी, (4) वित्तीय उदारीकरण : ब्याज दरों का बाजार द्वारा निर्धारण, (5) विनिमय दर का ऐसा निर्धारण कि गैर परम्परागत निर्यात बढ़े, (6) व्यापार का उदारीकरण, (7) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बेरोकटोक, (8) निजीकरण, (9) सब प्रकार के विनियमों और प्रतिबंधों को हटा नई देशी-विदेशी फर्मों के प्रवेश और काम करने पर कोई रोक नहीं हो, और (10) संपत्ति संबंधी नियम कानूनों में सुधार जिससे संपत्ति प्राप्त, इस्तेमाल और हस्तांतरण करने में कोई दिक्कत न हो. इस नवउदारवादी चिन्तन को बढाने और प्रतिष्ठित करने में थैचर, रीगन, चिली के तानाशाह पिनोशे और चीन के नेता देंग शिआयोपिंग का विशेष हाथ रहा. विश्व प्रसिध्द मार्क्सवादी विद्वान डेविड हार्वे ने अपनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ नियोलिबरलिज्म' के मुख्य पृष्ठ पर इन चारों महानुभावों के चित्र अनायास नहीं दिए हैं. साफ है कि इस चिंतन को अपनाने में औपचारिक वैचारिक प्रतिबध्दता आडे नहीं आई.भारत ने इसे खुले आम 1991 में अपनाया और बीस वर्षों बाद भी इसके तमाम कुपरिणामों से बिना विचलित हुए उस पर कायम है.
इधर कीमतों में उछाल का मामला गर्म है. कृषि मंत्री शरद पवार को जो कुछ भी कहें असली मुजरिम नवउदारवाद है. जिसके तहत राज्य ने जनहित में बाजार की शक्तियों और मुनाफाखोरी पर लागाम लगाना छोंड दिया है. शिवसेना का सिंहगर्जन भी नवउदारवाद का परिणाम है.  क्योंकि अर्थ व्यवस्था को पूरी तरह बाजार के जिम्मे छोड देने से अवश्यंभावी रूप से समाज में विषमता और विकास की दृष्टि से क्षेत्रीय असंतुलन बढेग़े . गांवों से शहरों और पिछडे इलाकों से विकसित इलाकों की ओर पलायन होगा. उपभोक्तावाद का दबदबा बढेग़ा. जिससे तरह-तरह के अपराध पनपेंगे क्योंकि लोग रातों-रात धनी बनकर ऐशों आराम की जिन्दगी बिताना चाहेंगे. आप जो भी प्रवचन करें. भ्रष्टाचार के कीटाणु पनपेंगे ही. प्रशासनिक सेवा के उच्च अधिकारी हों या राजनेता लगातार भ्रष्टाचार में लिप्त होते जाएगें. सत्ता पर औपचारिक तौर पर जो भी बैठे उसकी चाभी उनके हाथों में रहेगी. जिनकी जनता के प्रति कोई जिम्मेदारी न होगी. संगठित श्रम की ताकत तथा ट्रेड यूनियनों के प्रभाव घटेंगें. मजदूर किसान की एकता नारे से आगे कुछ भी नहीं होगी. जरूरत है कि नवउदारवाद की परिघटना का उसके सभी आयामों सहित समझा-बूझा जाए. खेद है कि भारत में इस दिशा में कुछ भी नहीं हुआ है. हिन्दी पाठकों को कुछ भी पठनीय उपलब्ध नहीं हैं. ले देकर अमित भादुडी क़ी एक छोटी सी पुस्तक अग्रेजी में उपलब्ध है.

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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