हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

एक दमनकारी होते राज्य में जनता का प्रतिरोध और साहित्य की जिम्मेदारियां

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/24/2010 12:13:00 PM

तद्भव का यह संपादकीय अपने आप में एक पूरी टिप्पणी है. हाशिया पर साभार.

इन दिनों राज्य के दमनकारी चरित्र को लेकर विचार मंथन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। नक्सलवाद के सफाये के नाम पर बेकसूर और मुफलिस लोगों पर राज्य का कहर इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण है। यह एक दीर्घ श्रृंखला है। इसके अंतर्गत कश्मीर में आतंकवाद से मुकाबले की मुहिम के चलते वहां निर्दोषों को कत्ल, अत्याचार, बलात्कार तक का अंजाम भुगतना पड़ रहा है। बाटला मुठभेड़ हो या आजमगढ़ को आतंकवाद की नर्सरी घोषित करना, ये सब स्टेट के खूंखार की हद तक पहुंच चुकने के सबूत हैं। यहां हम गुजरात में हुए राज्य द्वारा प्रायोजित साम्प्रदायिक जनसंहार का जिक्र करना चाहेंगे और कर्नाटक तथा उड़ीसा की सरकारों को भी वाबस्ता करना चाहेंगे। तो क्या कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी में स्टेट ज्यादा हिंसक, शक्तिशाली और निरंकुश हुआ है? किसी नतीजे पर पहुंचने की हड़बड़ी न करते हुए तस्वीर को दूसरे कोण से भी देखना होगा...
राज्य को पहले से अधिक दमनकारी घोषित करने के पूर्व यह समझना होगा कि क्या आज उसके पास वाकई पहले की भांति अभेद्य और अथाह शक्तियां हैं? कहना न होगा कि अब इंदिरा गांधी के दौर की तरह स्टेट देश भर में आपातकाल लागू करने का फैसला शायद ही कर सके। आपातकाल सरीखी बड़ी दुर्घटना की बात छोड़ दें, मौजूदा दौर में केन्द्र सरकार के पास प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त करने का कानूनी हक प्राप्त होने के बावजूद उसके इस्तेमाल का बल नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उसने जब भी इस्तेमाल करने की ख्वाहिश दिखायी तो राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय जैसे संवैधानिक केन्द्रों ने निरस्तीकरण का हौसला भी दिखाया है। नतीजन अब प्रांतों में जबरन राष्ट्रपति शासन लागू करने के उदाहरण नहीं मिलते हैं। इस कड़ी में यह भी जोड़ा जा सकता है कि जितने अधिक मंत्री, सांसद, विधायक, प्रशासक इस दौर में सजायाफ्ता हो रहे हैं उतना पहले कभी नहीं। चुनाव में बूथकैप्चरिंग के हादसों में भी काफी गिरावट आयी है। इन सकारात्मक लक्षणों के निर्माण में एक बड़ा कारण यह रहा है कि राज्य की विभिन्न महत्वपूर्ण एजेंसियों के बीच अपनी अपनी शक्ति और स्वायनता की चेतना विकसित हुई। इसके अतिरिक्त मीडिया, तकनीक, नागरिक जागरूकता की भूमिकाएं भी अहम सिद्ध हुइर्ं हैं। लेकिन यह भी कि सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत की कमी से भी स्टेट की मिथकीय ताकत की मुश्कें ढीली हुईं। फिर केन्द्रीय सरकार से इतर प्रांतों में भिन्न विचार व्यवहार वाली राजनीतिक सनाओं की उपस्थिति के तनाव ने भी राज्य के दमनकारी चरित्रा में संतुलन की निर्मित की।
उपर्युक्त विश्लेषण से लग सकता है कि इधर राज्य के अधिक दमनकारी हो जाने का विचार महज एक शोर है। हल्ला। लेकिन क्या सचमुच राज्य दिनोंदिन कमजोर या सहृदय होता जा रहा है? यदि यह सत्य है तो राज्य के बर्बर और हिंसक होने का मत गल्प है-एक चटपटा वृतांत? या दोनों अपने अपने ढंग से सच हैं कि दोनों अपने अपने ढंग से झूठ?

दरअसल राज्य के जन्मदिन से ही उसकी दमनकारी भूमिका भी अस्तित्व में आयी और उसी के साथ दमन के प्रतिरोध का भी आरम्भ हुआ। राजसना कितनी भी महाबली एवं जालिम हो, वह निर्विरोध कभी नहीं हुई। प्रतिपक्ष के पास यदि सीधी मुठभेड़ की क्षमता नहीं रही तो वह समाज के लोकगीतों, आख्यानों, लतीफों, गप्पों में छिप कर छापामार युद्ध करता रहा। असहमति और विरोध का ही असर था, राज्य ने समय समय पर अपने बेहतर अवतार की घोषणा की और दावा किया कि वह ज्यादा नरम, मानवीय, करुण और कमजोर हो गया है। लेकिन इसके बावजूद उसने अपना दमनकारी रवैया नहीं छोड़ा। दमन उसका कवच, हथियार और विचार तीनों बना रहा। इसीलिए नये समाज के निर्माण में सबसे महान ख्वाब यह देखा गया कि राज्य मिट चुका है, उसके बगैर मनुष्यता अपने सुंदरतम तथा सर्वोत्तम रूप में सव्यि है। जनता के बीच सभी हर किसी की जरूरतों, आकांक्षाओं का सम्मान करेंगे और सामाजिक क्रिया व्यापार में राज्य नामक मशीनरी नेस्तनाबूत हो चुकी होगी। बहरहाल यह सपनों के विध्वंस का दौर है, महान सपनों का सृजन करने वाली स्वप्नगर्भा परिस्थितियों की कोख के सूनी होने का समय है, इसलिए हम राज्यविहीन समाज की चर्चा को विराम देते हुए महज इतना कहना चाहते हैं कि राज्य का विरोध करने वाली शक्तियां हमेशा रही हैं और आज भी हैं।
अब हम राज्य का विरोध करने वाले एक अन्य पक्ष की तरफ ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे। अभी हाल में ही महत्वपूर्ण कथाकार राजू शर्मा का अप्रतिम उपन्यास 'विसर्जन' प्रकाशित होकर आया है। विसर्जन की सार्थकता और विलक्षणता का विश्लेषण करने का यहां अवसर नहीं है, यहां हम उसका सप्रयोजन एक अंश उद्धृत करना चाहते हैं। यह कथन उपन्यास के भीतर सबसे बड़े शक्तिकेन्द्र, खलनायक, विश्वविख्यात अर्थशास्त्री, पदमविभूषण पी.वी. द्वारा उच्चरित है : तुम्हारा राज्य और उसके अंग उत्तर आधुनिक समाज का कैदखाना हैं। राज्य का स्वरूप और नियमन इस युग की सृजन क्षमता की राह में कांटा है। इसे निकालना अब जरूरी हो गया है। समझ लो, यह इक्कीसवीं सदी का महाभारत है। इस देश में एक लाख सेनानी वो हैं जो डालर मिलिनेयर हैं। देश की दस फीसदी आय इनकी बदौलत है। कारोबार, उद्यम और सृजन के इंजन यही हैं। और मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि श्रीकृष्ण की तरह मैं इस सेना को मार्ग दिखा रहा हूं। और जो तुम सुन रहे हो वह इस युग की गीता है।' पृष्ठ - 443
इस बिन्दु पर राज्य के दमनकारी होने और अपेक्षाकृत उदार होने की गुत्थी सुलझती नजर आ रही है। हुआ यह है कि उत्तर आधुनिक समय में राज्य के चेहरे का जो उदारवादी हिस्सा है वह विसर्जन के पी.वी. के शब्दों में 'डालर मिलिनेयर' के लिए है। बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी के मध्य एक फर्क यह भी है कि बीसवीं सदी में गरीब, शोषित मनुष्य के पक्ष में राज्य के खिलाफ संघर्ष छेड़ा गया, कुर्बानियां दी गयीं जबकि 'इक्कीसवीं सदी का महाभारत' पूंजीपति वर्ग के लिए सम्पन्न हो रहा है। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि एक लाख डालर मिलिनियर लोगों की जो सेना है उसकी ताकत बाजार है इसलिए बाजार को जगमग बनाये रखने के लिए उक्त मिलिनियर वर्ग दबाव बनाता है कि राज्य 'उदार' हो। ऐसी स्थिति में प्रस्तुत की गयी राज्य की उदारता का लाभ मिलिनियर वर्ग और उस तबके को मिलता है जो अपनी व्यक्षमता के कारण बाजार में सम्माननीय होता है। यही वजह है कि सेना के प्यादों के रूप में देश भर में फैला मध्यवर्ग भी स्टेट को फूटी आंख पसंद नहीं करता। इतना नापसंद करता है कि मतदान में भागीदारी से भी गुरेज करता है। कितनी दिलचस्प स्थिति है कि राज्य की भर्त्सना करो और राज्य को अपने हित में इस्तेमाल करो।
जब संसार एकध्रुवीय व्यवस्था में समाया हुआ न था तब गैर समाजवादी सरकारों को भी लगता था कि खुलेआम वर्चस्वशाली वर्ग की हिमायत करने पर जनता उनके ताज उछाल सकती है, इसलिए राज्य अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए एक जनप्रिय चोला धारण करता था। अतः जनता के सम्मुख यदि राज्य और धनाढ्य वर्ग के बीच अपनी नजदीकी बताने का अवसर आता था तो वह राज्य की तरफ झुकी दिखती थी। क्योंकि जैसा भी हो, निजी के समानांतर राज्य सामूहिकता के रेशों से बनता है फलस्वरूप वह चाहे न चाहे, लोकतंत्रा में उसे जवाबदेह होना होता है। राज्य और उद्योगपतियों के बीच जनरुचि के संदर्भ में यह भी सच है कि आज भी समाजवाद के स्वप्न से गुजरे हुए मानस की बनावट राज्य के करीब ठहरती है। इसे एक रोचक उदाहरण से भी देखा जा सकता है। एक दिन मैंने अपने मोबाइल फोन में संरक्षित नम्बरों को देखने पर पाया कि चालीस से ऊपर की अवस्था वाले अधिसंख्य लेखकों (चार महानगरों को छोड़ दें) के फोन नम्बर भारत सरकार के उपक्रम बीएसएनएल के थे जबकि चालीस से कम अवस्था वाले अधिसंख्य रचनाकारों के फोन निजी कम्पनियों के थे।
भूमंडलीकरण के बाद निश्चय ही स्थितियां बदलने लगीं। जहां पहले राज्य अपनी लोकप्रियता और अस्तित्व रक्षा के लिए ही सही गरीबों के प्रति सदय और अमीरों के प्रति सख्त होने का यथार्थ या स्वांग प्रस्तुत करता था, वहीं भूमंडलीकृत विश्व में राज्य वंचित तबके के प्रति अपने दायित्वों को दरकिनार करके वर्चस्वशाली समुदाय के लिए निधड़क गलीचे बिछाने लगा। गरीबों, किसानों, मजदूरों को दी जा रही रियायतों को कम या खत्म करते हुए उद्योगपतियों को तोहफे देने की होड़ मच गयी। वस्तुतः अमीरों के लिए राज्य का यह तथाकथित लचीला और उदारवादी आचरण एक तरह से साधारणजन के लिए दमनकारी ही था। उसके हित, उसकी रियायतों को क्षतिग्रस्त करने के कारण वह दमनकारी था तो औद्योगिक घरानों को जनता को लूटने का स्वर्ण अवसर मुहैया कराने के कारण भी वह दमनकारी था। यह बहुत लुभावना और भयानक कारोबार था जिसमें राज्य विनम्र, दूरंदेशी और उदार दिखता था किन्तु वह उद्धत, चालू और निर्मम था। वह अपने फरेब पर मुग्ध और आश्वस्त था कि मामूली लोग हकीकत नहीं जान सकेंगे। इस स्थिति का सटीक उदाहरण था एनडीए के नेतृत्व वाली सरकार। इंडिया शाइनिंग की तोप लेकर वह चुनाव में जनता को भरमाने निकली थी लेकिन मुंह की खायी।
एनडीए सरकार की पराजय के बाद आप सना के मुद्दों और भाषा का अध्ययन करें तो सुर बदला हुआ दिखेगा। अभी स्वतंत्रता दिवस की 62वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम जो व्याख्यान था उसमें ग्रामीण क्षेत्र और गरीब आदमी के लिए काफी आहें कराहें थीं। उन्होंने 7 प्रतिशत कृषि विकास दर का लक्ष्य रखा, कुपोषण खत्म करने पर बल दिया। खाद्य सुरक्षा कानून बनाने, शीघ्र ही महिला विधेयक लाने, सूखे से निपटने के लिए हर तरह की मदद करने का आश्वासन परोसा। उन्होंने हरित क्रांति की वकालत की और कहा कि जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई की जायेगी और अल्पसंख्यकों की भलाई पर जोर दिया जायेगा। इस कड़ी में इस सरकार द्वारा शपथग्रहण के बाद सौ दिन के भीतर वायदों के क्रियान्वयन के लक्ष्य को भी शामिल करें, थोड़ा और पीछे जाकर पिछले कार्यकाल की नरेगा और सूचना का अधिकार सरीखी योजनाओं का आकलन भी करें तो चकित होना पड़ता है कि राज्य सचमुच कल्याणकारी राज्य, जनतांत्रिक राज्य की दिशा में दौड़ लगा रहा है?
इसलिए क्या यह खुश होने, जश्न मनाने का समय है? नहीं, यह सोचने की घड़ी है। इतिहास गवाह है कि जब समाज में असंतोष तीव्र होता है, वह फूट फट पड़ने के सीमांतों को छूने लगता है तो वह वंतिकारी चरण में रूपांतरित न हो सके, इसलिए राज्य कल्याणकारी चोला पहन लेता है। दुनिया में समाजवाद के चरण जब बढ़ने लगे थे और समाजवाद दुनिया के सताये हुए, परेशान लोगों को अपनी मुक्ति का मार्ग लगने लगा था तब पूंजीवाद नियंत्रित राज्यों ने अपने अपने यहां अनेक कल्याणकारी घोषणाएं की थीं। मेहनतकश लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने का इरादा जताया था। कह सकते हैं कि भलमनसाहत उसकी सद्बुद्धि के कारण नहीं रणनीति के कारण थी। हमारे देश में भी इधर राज्य अगर जनोन्मुखी दिखायी दे रहा है तो इसीलिए कि भूमंडलीकरण, चमक दमक, एक लाख डालर मिलेनियर लोगों के सेनानी होने की भ्रांतियों का गुब्बारा फूट चुका है। हाशिए पर पड़े समाज की तकलीफें सब्र और कराहों की जद से बाहर निकल कर चीख और गुस्से में बदलने लगी हैं। रिलायंस के आउटलेट्स को लूटने की, सेज के विरोध में प्रबल संघर्ष की घटनाओं को इससे जोड़ कर देखा जाना चाहिए।
यकीन करें लोक लुभावन फाहों से जैसे ही मामूली मनुष्य का गुस्सा, उसका आवेश थिर होगा, राज्य अपने 'स्वाभाविक' ड्रेस में पुनः प्रकट होगा।
आखिर में यह भी कहना है कि जिस दिन राज्य को लगता है कि उसके चोला बदलने के करतब को कोई वर्ग या समुदाय यथार्थ नहीं अभिनय व रणनीति मान रहा है, वास्तविकता को समझ गया है, वह अपने दमनात्मक हथियारों को खुलेआम पहटने और प्रयुक्त करने लगता है। इसी तर्क से आज जहां जहां सशक्त प्रतिरोध का स्वर बुलंद है, आक्रामक है और संगठित है, वहां राज्य निर्लज्ज रूप से दमनकारी है।
साहित्य की दुनिया में हमें राज्य की रणनीति, होशियारी को उजागर करना होगा। उसके दमन का प्रतिपक्ष बनना होगा। हमें राज्य की ताकत का शिकार बने उजड़े हुए, मिट रहे, बिछुड़े हुए, लथपथ लोगों के पक्ष में खड़ा होना होगा। जाहिर है कि यह छटाक भर संवेदना, आधा छटाक सरोकार और पांच किलो कलाकारी वाले लेखन के बूते का नहीं जिसका चलन आजकल कुछ ज्यादा हो गया है।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ एक दमनकारी होते राज्य में जनता का प्रतिरोध और साहित्य की जिम्मेदारियां ”

  2. By mahesh on February 25, 2010 at 7:48 AM

    Samapaadak mahoaday
    Katipay ekpakshiya udaaharan dekar aap sabit kya karna chahte hain? Kya aap Islam ke nam par vishwavyapi jihad evam Kashmiri panditon ki lootpat evam deshnikale ke pakshadhar hain? Athwa Maoism ke nam par narsanghar evam deshvibhajan chahte hain?
    Mahaashay! Jab balshali log nirbalon ka shoshan/apharan/hatya karte hain(chahe ve kisi paksh ke hon)tab aap jaise lekhak taTashth ho jaate hain, aur jab rajya (arthat security agencies ke log)aap jaison ko bachane ko apni jan gavate hain, tab katipay apavadon ko udaaharan banakar aap ki lekhakiya pratibha ubhar par aa jaati hai.
    Kripaya apni pratibha yah batane me lagayen ki rajya ko kya karna chahiye. Kya hatyaron evam luteron ki daya par chhod dena chahiye?
    Mahesh Chandra Dewedy

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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