हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताए प्रशासन

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/18/2010 01:21:00 PM

दिलीप
यह हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य है कि उनके पास अपनी बात रखने का ज़्यादा विस्तृत आयाम विश्वविद्यालीय मंच के बजाए मीडिया मुहैया कराती है.  मैं इसे दुर्भाग्य इसलिए मान रहा हूँ क्योंकि मीडिया के जरिए यहाँ की सहमति-असहमति देश-दुनिया के लोग सुन तो लेते हैं लेकिन इसका समाधान कानूनी तौर पर अंततः विश्वविद्यालय प्रशासन के पास ही होता है. छात्रों के पास मीडिया है, विश्वविद्यालय के पास कानून है. विद्यार्थी मीडिया का इस्तेमाल जानता है, प्रशासन कानून का इस्तेमाल जानता है. प्रशासन राजनीतिक मामले में यहाँ के छात्रों से कहीं अधिक परिपक्व है. उनकी परिपक्वता का आधार तर्क नहीं है बल्कि वे कुछ काम शुरू से ही  शानदार फिनिसिंग के साथ करते रहे हैं. इनमें छात्र-छात्राओं को मुद्दे से भटकाना और उनके बीच अविश्वास की एक मोटी काली चादर खड़ी करना एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें उन्होंने लगातार बड़ी सफ़लता हासिल किया है.  यहाँ मुद्दों की बाढ़ आती है. अब छात्रों को यह तय करना होता है कि वे किस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता की शुरूआत में रखते हैं. बाहरी लोगों (मेरा मतलब यहाँ की स्थितयों को सिर्फ़ मीडिया से जानने वाले लोगों से है) को शायद यह पता न हो कि यहाँ विद्यार्थियों की कुल संख्या महज 300 के आंकड़े को छूते हैं. और यह भी कि इनमें से लगभग 100 विद्यार्थी शोध के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते हैं. अब यह आसानी से महसूसा जा सकता है कि  वर्तमान समय में छात्र राजनीति के अर्थ में जिस तरह नकारात्मकता भरा गया है उससे कई छात्र इस पचड़े से दूर रहना ही पसंद करेंगे. कुछ छात्रों के भीतर स्वाभाविक तौर पर प्रतिकार करने के गुण होते है लेकिन यह भी बहुत सच है कि यही वह समय होता है जब घर-परिवार और समाज की बड़ी अपेक्षाओं से वे दबे होते हैं. उनका अंतर्द्वन्द्व इन दो मुद्दों को लेकर तीक्ष्ण स्तर तक गुथता है जिनमें उसे कैरियर और विरोध को चुनना होता है. जाहिर है विरोध कैरियर का  विकल्प नहीं हो सकता. इन दो स्तरो के विद्यार्थियों को प्रशासन लगातार बहला-फुसलाकर और भविष्य के हसीन सपने (एम. फिल. और पीएचडी. मे नामांकन सहित कई तरह के विश्व्विद्यालयीय नौकरियों के सपने) दिखाकर- जिसमें डर के तत्त्व को चासनी के तौर पर लपेट दिया जाता है - अपने पक्ष में करने का हर संभव यत्न करता है. हालाकि कई विद्यार्थियों में प्रशासनिक जी हुजूरी के भी स्वाभाविक गुण पाए जाते है जिसके कारण इनके मद में प्रशासन को अधिक ऊर्जा खर्च नहीं करना पड़ता. अब बच गए बेचारे विरोध को अपना वर्तमान और भविष्य समझने वाले स्टूडेंट (जिनके बारे में देश भर में यह भ्रामक प्रचार है कि ये पढ़ने में निहायत ही बेवकूफ़ टाइप के होते है). इन्हें देश भर में अपने बारे में मौजूद भ्रांतियां भी तोड़नी है और विरोध को भी लगातार जारी रखना है. हिंदी विश्वविद्यालय के  प्रशासनिक हित के आड़े इस हिसाब से कुल कितने कमिटेड विद्यार्थी आते है, जबकि उनकी कुल संख्या उतनी ही है जितनी ऊपर बताई जा चुकी है, यह एक सवाल है? प्रशासन का यह गणित बहुत ठोस है. 
    बावजूद इन तमाम तथ्यों के, जिनमें से ज़्यादातर प्रशासनिक पक्ष में ही झुके हुए है, प्रशासन कुछ और स्तर पर सक्रिय है. मसलन यहाँ शिक्षकों के यूनियन है. ग़ैर शैक्षणिक कर्मचारियों के यूनियन है लेकिन छात्र यूनियन और चुनाव को लेकर यहाँ अब तक कुलपति अपनी असहमति जाहिर करते रहे है. आखिर वे कौन से कारण है जो छात्र संघ के गठन नहीं करने को लेकर उनकी इस राय को पुख्ता करते हैं? शायद छात्रों की एकजुटता के संभावित खतरे.
    अभी अनिल चमड़िया के मामले को लेकर लगातार बहस चल ही रही है कि इसी बीच बड़ी सतर्कता के साथ एक और बड़ा मुद्दा छात्रों को थमा दिया गया. मोहल्ला पर अभी-अभी पीएचडी के छात्र अनिल के डिग्री त्यागने संबंधी एक चिट्ठी को सार्वजनिक किया गया था. डिग्री त्यागने संबंधी मुद्दे पर 22 छात्र-छात्राओं के बीच सहमति थी. यह विश्वविद्यालय पर एक बड़े दबाव का कारण बन सकती थी. इसको दुरूस्त करने और अनिल चमड़िया के जाने के बाद छात्रों में जन्में असंतोष को एक अलग दिशा में मोड़ देने के लिए गुरूवार (दिनांक 18.02.2010) को  अनिल को छः महीने के लिए रेस्टीकेट करने का पत्र भेज दिया गया. इस दौरान अनिल दिल्ली से वर्धा आ रही रेलगाड़ी में थे. अनिल शुरू से बोलने वाले छात्र के तौर पर जाने जाते है. वह ख़तरनाक साबित हो रहे थे. विश्वविद्यालय में और ख़ास तौर पर जनसंचार विभाग में उसने कई सवाल उठाए जिसके जवाब देने में प्रशासन असहज महसूस करता रहा. यह बारीक राजनीति है जिसमें एक छात्र द्वारा डिग्री त्यागने का आधिकारिक इस्तेमाल किए जाने से पहले ही उसे निष्कासित कर दिया गया. काम भी हो गया और इज़्ज़्त भी सुरक्षित रह गई. अब कुछ छात्रों का ध्यान भी मूल मुद्दा अनिल चमड़िया से भटक कर शोध छात्र अनिल के निष्कासन पर टंग जाएगी. बहुत खूब विभुति जी.
      अब जरा अनिल पर लगे आरोप के बारे में जान लिया जाए. पिछले छमाही में हमारा बैच ’जनसंपर्क’ पर सेमिनार प्रस्तुत कर रहा था. अनिल सेमिनार में बैठना चाह रहे थे. सहायक प्रोफेसर अख़्तर आलम ने उसको कक्षा में आने से रोक दिया. उनका कहना था कि जब तक विभागाध्यक्ष से वह अंदर आने की अनुमति नहीं ले लेता उसको अंदर नहीं आने दिया जाएगा. अनिल ने प्रतिवाद किया. अंत में अख़्तर आलम ने मुझसे पूछा कि क्या कोई सीनियर विद्यार्थी दूसरे बैच के सेमिनार में बैठ सकते हैं?  मैंने जवाब दिया कि हाँ बैठ सकते हैं और अब तक बैठते आए हैं. यह विश्वविद्यालय में पहला मौका था जब किसी विद्यार्थी को सेमिनार में आने से यह कहकर रोका गया कि इसके लिए विभागाध्यक्ष की अनुमति ज़रूरी है. अख़्तर आलम के  पास फैसला लेने का क्या इतना साहस नहीं था कि वे या तो सीधे रोक सके या फिर अंदर आने दें?  दरअसल कमज़ोर व्यक्ति की कमज़ोरी वक़्त-बे-वक़्त साफ नमूदार हो जाती है. अख़्तर आलम विभागाध्यक्ष ’चोर गुरू’  अनिल राय अंकित के बहुत ही खा़स हैं. विभाग की अनियमितताओं पर सवाल उठाने वाले छात्रों को परेशान करने के लिए यह एक स्पष्ट योजना का हिस्सा थी जिसके तहत अनिल को न सिर्फ़ रोका गया बल्कि इस घटना के बाद उल्टे अख्तर आलम ने यह शिकायत की कि अनिल ने उन्हें बेइज़्ज़्त किया है. अनिल पर तीन सदस्यीय जाँच कमेटी बैठा दी गई जिसका निर्णय वर्तमान रूप में आया है. जाँच कमेटी में शामिल आत्मप्रकाश श्रीवास्तव- जिसके जातिवादी रंग के बारे में पाठक राहुल कांबले के मामले में परिचित हो चुके हैं- अनिल राय अंकित के बेहद घनिष्ट मित्र में से हैं जो उनके दफ़्तर में प्रतिदिन कम से कम 2-3 घंटे समय निकाल कर ज़रूर बैठते हैं. विभूति नारायण राय के कुलपति नियुक्त होने से पहले आत्मप्रकाश श्रीवास्तव यहाँ के कार्यकारी कुलपति हुआ करते थे और यही वह दौर है जबसे अनिल उनकी नज़र में चढे हुए थे. उनका कार्यकाल भीषण अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के लिए भारतीय विश्वविद्यालय के इतिहास में एक मज़बूत उदाहरण हो सकता है.
    दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में गठित तीन सदस्यीय समिति ने वहाँ मौजूद छात्रों से घटना के बारे में पू्छने तक की जहमत नहीं उठाई. मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया. तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख़्तर आलम के शिकायत पर फैसला लिया है. फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ़ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूँ बल्कि यह ’चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है. विश्वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूँ कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूँ कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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