हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/17/2010 01:43:00 PM

भारत के किसी अखबार का शायद यह पहला संपादकीय है, जिसमें साफ-साफ शब्दों में सरकार से ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके जाने की मांग की गई है और माओवादियों से एक ईमानदार बातचीत शुरू करने का आह्वान किया गया है. डेक्कन हेराल्ड के इस संपादकीय को पढ़वाने के लिए भाई दिलीप मंडल का आभार. पेश है हाशिया पर इसका मेरे द्वारा किया गया अनुवाद.

माओवादियों से बातचीत के प्रस्ताव में ईमानदारी होनी चाहिए

गृह मंत्री पी चिदंबरम द्वारा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड और बिहार के अधिकारियों के साथ माओवादियों के खिलाफ एक अंतरराज्यीय सुरक्षा अभियान शुरू करने के बारे में की गई बैठक के एक हफ्ते के भीतर ही माओवादियों ने यह साफ संदेश दे दिया है कि सरकार के ऐसे अभियानों का क्या नतीजा होनेवाला है. उन्होंने प बंगाल के मेदिनीपुर जिले में संयुक्त बलों के एक कैंप पर हमला किया और 24 जवानों की हत्या कर दी. अनेक सैनिक अब भी लापता हैं. कहा जा रहा है कि इस सुनियोजित हमले में दर्जनों माओवादियों ने भाग लिया और सुरक्षा बलों को घंटों उलझाए रखने में सफल रहे. सरकार द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट को शुरु किए दो माह बीत चुके हैं लेकिन माओवादी इलाकों में नागरिकों के खिलाफ इस तरह की भयावह हिंसा छेड़ने के बावजूद इस ऑपरेशन की उपलब्धि बहुत कम रही है. अनेक जगहों पर तो आदिवासी जनता को युद्ध का सामना करने के लिए छोड़ कर माओवादी जंगलों में पैठ गए हैं.
अगर सरकार यह उम्मीद कर रही थी कि ऑपरेशन ग्रीन हंट माओवादियों को हथियार डालने पर मजबूर कर देगा, तो वह गलत थी. माओवादियों ने लगातार इसके संकेत दिए हैं कि सरकार अपनी ताकत के प्रदर्शन के जरिए उन्हें झुका नहीं सकती. बल्कि सोमवार को बंगाल में हुआ हमला दिखाता है वे नए तेवर के साथ हमले कर रहे हैं.

सरकार और माओवादी नेता दोनों कह रहे हैं कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं. लेकिन सरकार चाहती है कि माओवादी पहले हिंसा छोड़ें जबकि माओवादी बिना किसी शर्त के बात करने पर जोर डाल रहे हैं. वे चाहते हैं कि ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद हो. दोनों फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और दूसरे पक्ष से उस बात की अपेक्षा कर रहे हैं, जिसे वे खुद नहीं करना चाहते.
अगर माओवादी सरकार की शर्तों के साथ बातचीत को लेकर संदेह कर रहे हैं तो इसकी वजह यह है कि अतीत में सरकार ने युद्ध विराम का इस्तेमाल माओवादी नेताओं को, जब वे बाहर आए तो दबोचने के लिए किया है. उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश में उनका यह अनुभव रहा है. सरकार को माओवादियों को यह भरोसा दिलाना होगा कि बातचीत का उद्देश्य समाधान की एक ईमानदार तलाश होगा.
बातचीत के पहले और उसके दौरान हिंसा पर विराम माहौल को सुधारने में मदद करेगा. बातचीत के लिए यह एक अच्छा कदम है, लेकिन यह उसके लिए एक जरूरी शर्त नहीं है. कुछ लोग एक ऐसे  मौके पर अभियान को रोकने का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि इसके जरिए अब तक हासिल किए गए फायदों के बेकार हो जाने का खतरा पैदा हो जाएगा. लेकिन ऐसा सोचना अदूरदर्शिता है. सरकार को निश्चित तौर पर एक दीर्घकालिक नजरिया अपनाना होगा और इसके लिए जरूरी है कि वह ऑपरेशन ग्रीन हंट को रोके और बातचीत शुरू करे. विद्रोहियों से यह उम्मीद करना कि वे बातचीत से पहले अपनी ताकत को त्याग दें, यह अवास्तविक है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार ”

  2. By Anonymous on February 17, 2010 at 2:32 PM

    आदिवासियों का शिकार बंद करे सरकार और आदिवासियों को शिकार होने दे। :)

  3. By रंगनाथ सिंह on February 17, 2010 at 9:47 PM

    दोनो पक्ष तत्काल हिंसा बंद करके बातचीत के लिए राजी हों।

  4. By संगीता पुरी on July 16, 2010 at 8:23 PM

    बातचीत से कोई समाधान निकल जाए .. तो हिंसा की क्‍या जरूरत ??

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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