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बीच सफ़हे की लड़ाई

अभय कथा अर्थात बिहार गाथा

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/13/2010 08:02:00 AM

अभय कथा अर्थात बिहार गाथा

गिरीश मिश्र

बिहार देश के उन राज्यों मे है जिनका अतीत काफी गौरवशाली रहा है। रामायण और महाभारत आख्यानों के कई महत्वपूर्ण चरित्र बिहार के थे। उदाहरण के लिए सीता बिहार में जनमी थीं, विश्वामित्र का आश्रम वर्तमान बक्सर में था जहां राम और लक्ष्मण की शिक्षा दीक्षा हुई थी जरासंध राजगृह का था जिसके लगातार आक्रमणों से पस्त होकर कृष्ण रणछोड बन द्वारका गए जैन धर्म और बौध्द धर्म तथा बहुत बाद मे खालसा पंथका प्रादुर्भाव बिहार की भूमि से जुडा था. लिच्छवी गणराज्य हो या अजातशत्रु का राज या फिर मौर्य एवं गुप्त साम सब बिहार में उपजे के कौटिल्य का अर्थशास्त्र या वाराह मिहित की वृहत संहिता दोनों की रचना पाटलिपुत्र में हुई थी। तत्कालीन समय में ज्ञान विज्ञान में बिहार अन्य सबसे कही आगे था। नालन्दा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की ख्याति देश विदेश में थी।

मध्यकाल में शेरशाह सुरी ने दिल्ली पर अपना शासन जमाया था तथा अंग्रेजों के शासनकाल में वहाबी हो या कुवर सिंह विदेशी शान की जडें हिला दी थी। सरदार भगत सिंह के अनेक संगी साथी बिहार के थे जिनमें से कुछ ने लाहौर षडयत्र के मुखबिर फणीन्द्र घोष को मौत की नींद सुला दी थी गांधी जी का प्रथम किसान आंदोलन 1917 में बिहार क चम्पारन में ही सफलता पूर्वक चला था उसके बाद के स्वामी सहजानन्द के किसान आन्दोलन तथा 1942 के भारत छोडाे संघर्ष की लोग अब तक नहीं भूल है इस शानदार अतीत के बावजूद आजादी के बाद के छ: दशकों के दौरान प्रगति के मार्ग पर पिछडता ही जा रहा है। राज्य में पर्याप्त नए निवेश की कौन कहे, बडी तेजी से विनिवेश हो रहा है चीनी, जूट, सीमेंट, और कागज उद्योग समाप्त प्राय है इंजीनियरिंग उद्योग और उर्वरक कारखाने में कब को ताला लग चुका है खेती की हालत गभ्मीर है अनमने ढंग से जमींदारी उन्मूलन के बाद भूमि सुधार ठप हो गया भले ही कानून बने और दाले किए गए। हाल ही में आई डी बद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट ने जानुजी लेडेजिस्की पी एस अजू सुनील सेन गुप्त हनुमंत राव आदि विशेषज्ञों के पहले आए निष्कर्षो का समर्थन करते हुए भूमि सुधार कार्यक्रमों के कार्यान्वयन ही पोल खोल दी है। नतीजतन कृषि क्षेत्र बदहाल है। गांवों से बड़ी संख्या में लोगों का शहरों और अन्य राज्यों की ओर पलायन हो रहा है बडे भूस्वामी उद्यमी और दूरदर्शी नहीं बल्कि परजीवी हैं बिहारी औद्योगिक उद्यनिता अब भी जन्म नहीं ले सकी है, पढ लिखकर लोग नौकरियों विशेषकर सरकारी क्षेत्र की ओर भागते है जहां वेतन के अतरिक्त ऊपर वार कमाई के अवसर भरपूर होते हैं। अमेरिका के शिकागों विश्वविद्यालय से कभी जुड़ी समाज शास्त्री कुसुमनायर ने अपनी एक चर्चित पुस्तक में राज्य में भूस्वामी नौकर शाह राजनेता की लगभग अजेय तिकडी क़ो राज्य की बदहाली और अवनति के लिए जिम्मेदार ठहराया था आज भी विभिन्न राजनीतिक रंगों की सरकारों के आने जाने के बावजूदों यह तिकडी राज्य पर काबिज ही नही ं बल्कि कहीं अधिक शक्तिशाली है। इस तिकडी क़े दबे दबे का परिणाम है कि राज्य से एक ओर नौजवानों का पलयान हो रहा है तो दूसरी ओर अपरहरण रंगदारी हत्या लूटपाट भ्रष्टचार आधिक की घटनाओं मे ंलगातार वृध्दि के साथ ही नक्सलवादी आंदोलन तेजी से बढ रहा है। विश्वविद्यालय हो या स्कूल या फिर अस्पताल सबकी हालत दयनीय है बिजली के दर्शन यत्र- तत्र तब कुछ समय के लिए होते है। सडक़ की स्थिति कुछ सुधरी है मगर विशेष नहीं। बाढ़ और सूखा हर साल अपने समय पर आते ही है। पिछले 62-63 वर्षो के दौरान राज्य की आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का ऐसा कोई विवेचना नही मिलता जो आम पाठक के प्रशनों के उत्तर देकर उसके जिज्ञासु मन को शान्त कर सके। बिहार में हिन्दी के साहित्यकार है परन्तु किसी ने यह नही बताया है कि क्यों कभी प्रशंसित रहे हिन्दी साहित्य सम्मेलन, राष्ट्रभाषा परिषद और काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान चर्चा में नहीं रह गए है तथा अनुग्रह नारायण सिन्हा शोध संस्थान बारात घर बन कर रहा गया है। पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाज के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रमेशचन्द्र सिंहा ने अपने हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ''अभय कथा'' सारांश प्रकाशन में एक तरह में स्वातंत्र्योत्तर बिहार की दशा और दिशा को तथ्यों और तर्कों के आधार पर बडे रोचक ढंग से प्रस्तुत किया हो । यहां वह टिप्पणी बरबस याद आ जाती है कि फ्रंासीसी क्रान्ति के बाद की स्थिति को जानने के लिए विद्वानों की उबाऊ और नीरस कृतियों को देखने बदले बाल्जाक के उपन्यासों को पढना अच्छा रहेगा। इस छोटे से लेख में इस महत्वपूर्ण कृति का पूर्ण रूपेण विवेचना असंभव है फिर भी उसकी कुछ झलकियां प्रस्तुत कर पाठकों को उसे ध्याान पूर्वक पढने के लिए उकसाया जरूर जा सकता है।

पहले ही अध्याय में सिंहा ने पटना विश्वविद्यालय के एक प्रतिनिधिक विभाग का बडा ही सटीक चित्रण किया है- ््''फोकस और ढाट- बाट में उस दुबले पतले स्मार्ट अध्यक्ष का पूरे कैंपस में मुकाबला करने वाला दूसरा कोई नहीं था। फालतू के शोध करना और कराना उसके फोकस का सबसे असरदार अंदाज था जिसकी वजह से उसे सारे मुल्क में शोहरत हासिल थी और पैसे के साथ साथ वह पद प्रतिष्ठा भी हथियाता फिरता था। हर कमेटी कमीशन का मेंबर होना कभी चंडीगढ तो कभी मद्रास फुदकत रहना शोध के नाम पर लाखों की रकम ले आना ओर उसे हजम करके डकार तक न लेना उसका ही कश्रिमा माना जाता। उसका माया जाल इताना गहरा और विशाल था कि जिसे चहाता उसे किसी कालेज या यूनिवर्सिटी में रखवा देता। पी एच डी की डिग्री उसकी इनायत होती। विभाग के आधे से अधिक टीचर उसके ही बहाल किए हुए थे, जिनमें खूबसूरत महिलाओं की संख्या काफी थी''

नेपाल से लंबी सीमा लगने के कारण बिहारर् वत्तमान भूमंडलीकरण के पहले तस्करी का केंद्र था। भांति-भांति के विदेशी माल आते और देशभर में वितरित होते थे इस में काफी कुछ स्थानीय तौर पर निर्मित होता था इस धंधे में लगा घासीराम बडा धर्मात्मा था। ''ललाट पर हमेशा चंदन का टीका करते की जेब में हमेशा तुलसी की माला'' लोग उसे महात्मा कह कर पुकारते थे और उसके भव्य मकान में कीर्तन अविराम चलता है। बुध्दिमान लोग बताते है कि कीर्तन के दर्शनयान महात्मा जी के घर में हिंदुस्तान के बने कपडाें और दूसरी दूसरी चीजों पर ''मेड इन चाइना''''मेड इन यू एस ए'' बगैरह विदेशी ठप्पे तडातड लगाए जाते है। सब जानते हैं कि आधुनिक उद्योग धंधों के अभाव में येन केन प्रकारेण सरकारी पैसों को लूटना एक बडा कारोबार है । राजनेता- अफसर- ठेकेदारों को तिकडी ऌसमें लगी रहती है। कहना न होगा कि ठेकों के अवाटंन में गुण्डागर्दी का बोल बाला रहता है। यह धंधा कैसे चलता है इसका वर्णन सिन्हा ने विस्तार से किया है। हरधन गोप जो पहले चोर ओर बदमास था एक पुलिस अधिकारी की प्रेरणा से पहले छोटा और फिर बडा ठेकेदार बन गया। कागज पर या फिर घटि या सामानों को लगाकर निर्माण करने लगा तथा मंत्री और अफसर की जेब भरते हुए पांच साल लगते न लगते उसने लाखों रूपए बना लिए। कदम कुआं में मकान पुनराईचक में मकान नाला रोड पर होटल कार बगैरह अब वैसी चीज न थी जिसके बास्ते उसे कोई रश्क हा।े हरधन से हरधन जी और अब हरधन बाबू कहलाने लगा। एक से एक तोदियल मंत्री एक से ऐ अडियल हाकिम एक से एक कडियल पुलिस कोतवाल उसके दोस्त या संबंधी होने का गुमान पालने लगे।

आजादी के कुछ ही वर्षो बाद स्वतंत्रता सेनानी और उनके आदर्शो को धक्का मार कर बाहर कर दिया गया और अवांछित लोग बडी तादाद में सत्तारूढ़ हो गए। उपन्यास का एक मशहूर इतिहास पात्र कहता है- ''आंनद बाबू मुल्क गोया बडे ख़तरनाक दौर से गुजर रहा है। आज हां जम्हूरियत का दामन थामकर ऐसे ऐसे लोग हुकूमत पर काबिज हो रहे है जिनको जेलखाने की सीखचों के पीछे होना चाहिए था। जिन्हें चपरासी होने की भी सलाहियत नहीं है वे जम्हूरियत और सोशल जस्ट्रिस के नाम पर मिनिस्टर चीफ मिनिस्टर हो रहे हैं। ये लोग केवल अपना उल्लू सीधा करना जानते हैं। इन्हें मुल्क और अवाम और कानून से क्या वास्ता? तकलीफ ज्यादा तब होती है जब सोचता हॅूं िक जिस आजादी की वजह से ये लोग आज हुकूमत कर रहे है, वह बडी क़ुरबानियों से हासिल हुई है । हैरत इस बात पर है कि सन 47 से ही सच्चे और त्यागी सिपाहियों को दरकिनार करते जाने का सिलसिला शुरू हो गया था और सन् 62-63 आते आते कांग्रेसी हुकूमत पर गलत लोगों का कब्जा हो गया।''

उपन्यास में हिन्दू-मुस्लिम समस्या के बारे में बहुत कुछ है और हिन्दू सम्प्रदायवादियों के इस दावे का तथ्यात्मक खंडन किया गया है कि अतीत में हिन्दू से मुसलमान हो जाने के पीछे कई वजहें थीं। इस्लाम एक ऐसा मजहब है जिसमें कोई खास उलझनवाली या बारीक फिलसफाई बात नहीं है। बडा सीधा-सादा और दुनियावी मजहब है यह। इसमें सबसे बडी चीज यह है कि यहां जात-पात का कोई झमेला नहीं है और इस्लाम कबूल करने वालों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता। सभी खुदा के बंदे है और सभी एक साथ उसकी इबादत करते हैं। ये सब बातें हिन्दुओं के निचले तबकों के लोगों गोया बेहद जंची, क्योंकि जात की वजह से वे बेहिसाब सताए हुए थे।

उपन्यास का नायक अभय एक पढा-लिखा, खाते-पीते परिवार का नौजवान है। वह क्यों नक्सली बन जाता है और वहां क्या कुछ देखता-सुनता है, इस उपन्यास में दर्ज है। कहना न होगा कि जिन्हे बिहार और उसकी समस्याओं को जानने-समझने और हल करने में दिलचस्पी है उनके लिए यह कृति सहायक होगी। नक्सलवादी आंदोलन पुलिस के जरिए नहीं दबाया जा सकता। उसके समाजिक- आर्थिक जडाे को तलाशना और समझना पडेग़ा तभी उससे मुकाबला किया जा सकता है। लोग कतिपय मजबूरियों के कारण ही उसमें जाते हैं। वे मजबूरियां क्या है, यह सिन्हा अपने उपन्यास में बतलाते हैं।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ अभय कथा अर्थात बिहार गाथा ”

  2. By रंगनाथ सिंह on February 13, 2010 at 12:45 PM

    गिरीश जी ने तारीफ की है तो जरूर पढ़ा जाएगा।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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