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बीच सफ़हे की लड़ाई

विभूति की तानाशाही के खिलाफ छात्र ने छोड़ी पीएचडी

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/12/2010 07:50:00 PM

श्रीमान विभूति नारायण राय,
कुलपति, महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय

सर, मैं बहुत निराशा के साथ ये कह रहा हूं कि आपके द्वारा अनिल चमड़िया सर को टर्मिनेट किये जाने पर हिंदूवादियों और प्रतिक्रियावादियों की एक बड़ी जीत हुई है। इस प्रक्रिया में सर्वाधिक अफसोसनाक बात यह है कि इसमें न सिर्फ ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ के साथ भद्दा सलूक किया गया है बल्कि आपकी भूमिका बेहद संदिग्ध है। एकदम शुरू से ही अनिल चमड़िया के पीछे प्रतिक्रियावादियों की एक लॉबी सक्रिय थी, जिसके जाल में फंसने से आप अपने आप को नहीं बचा सके।

मैं व्यक्‍तिगत तौर पर यह नहीं मान पा रहा हूं कि आपने इस मामले में कोई ‘ईमानदार’ भूमिका निभायी है। अनिल चमड़िया को हटाने के क्रम में अकादमिक जगत के गंभीरतम भ्रष्‍टाचार के आरोपों का सामना कर रहे अनिल कुमार राय ‘अंकित’ को बचाने और अंततः उन्हें स्थापित करने के लिए आप हरसंभव स्तर पर सत्ता के दुरुपयोग और निरंकुशता दिखाने में जरा भी नहीं हिचके।

जैसा कि आप भी जानते हैं, एकदम प्रारंभ से ही कई छात्र-छात्राओं सहित मैं भी विभाग में स्थापित फर्जी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता रहा हूं। आप यह भी जानते हैं कि विभागाध्यक्ष के पद पर होते हुए अनिल कुमार राय ने कैसे अटेंडेंस शीट तथा कक्षा लेने में हेरफेर की। अपने निरंकुश और फूहड़ निर्णयों को साकार करने के लिए उन छात्र-छात्राओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर प्रताड़ित किया, जिन्होंने विभागाध्यक्ष के बतौर उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने की कोशिश की। अनिल कुमार राय अंकित ने अपनी वैधानिकता बचाने के लिए कुछ छात्रों का एक क्षुद्र गुट बनाया। अपना मुंह बचाने के लिए इन लड़कों का इस्तेमाल किया और यह दिखाने की कोशिश की कि सब कुछ ठीक चल रहा है और जो गलत है, वह कुछ ‘अराजक’, और ‘विरोधी’ तत्त्वों का ‘षडयंत्र’ है। अफसोस कि इन मनगढ़ंत बातों की हिस्टीरिया के चक्कर से आप अपने आप को नहीं बचा सके।

इन स्थितियों के विश्‍लेषण के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि विश्‍वविद्यालय के कुलपति के बतौर गंभीर अकादमिक वातावरण बनाने, पढ़ाई-लिखाई की संस्कृति का विकास करने में आपको कोई वास्तविक दिलचस्पी नहीं है। आप खुद को चापलूसों, भ्रष्‍टाचारियों और प्रतिक्रियावादियों के हाथों में खेलने से नहीं रोक पा रहे हैं। आप कुलपति के बतौर, कहते कुछ और करते कुछ और ही हैं। इस बात से आप भी सहमत होंगे कि हिंदी में स्वस्थ, चिंतनपरक अकादमिक माहौल बनाना मुश्किल है। इसके लिए सजातीय, परिवारवाद तथा भाई-भतीजावाद की संकीर्णताओं सहित दोहरा जीवन जीने की सुविधाभोगिता को त्यागने के कष्‍ट उठाने पड़ेंगे।

आप हर तरह के संसाधन, पहुंच और ताकत से लैस हैं। फिर आपकी पुलिसिया घुड़कियां अधिकतर लोगों में घिग्घी बांध देती हैं। आप विश्‍वविद्यालय को जैसे चाहें, वैसे चलाने में समर्थ हैं। इसीलिए आपने अनिल चमड़िया (आपके शब्दों में, हमारे ’प्रिय गुरु) को अलग-थलग करने की हरसंभव कोशिशें कीं, उनके बारे में झूठे प्रचार को आपने हवा दी। ऐसे कई उदाहरण मैं गिना सकता हूं, लेकिन फिलहाल उनका जिक्र नहीं कर रहा हूं।

जबकि पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को अकूत मुनाफे का सौदा बना दिया गया है, सारे विश्‍वविद्यालय परिसरों में लोकतंत्र को कुचलकर ‘दमनतंत्र’ की स्थापना की जा चुकी है, ऐसे में इस विश्‍वविद्यालय में अपने आगमन से बनी गतिशील और चेतना-संपन्न संस्कृति के विकास की बची-खुची उम्मीद को आपने स्वयं ख़ारिज कर दिया है।

जब तक आप इन तथ्यों की सच्चाई से इनकार करते रहेंगे और विभाग में अनिल कुमार राय अंकित की बहाली बरकरार रखेंगे, मैं अपने पीएचडी पाठ्यक्रम को त्यागने की घोषणा कर रहा हूं। अगर इस पर आप मुझ पर ‘विश्‍वविद्यालय विरोधी’ का ठप्पा लगाने की सोच रहे हैं, तो आपको यह बताना मैं अपना फर्ज समझता हूं कि कई छात्र-छात्राएं ऐसी घोषणा करने को तैयार हैं।

अनिल
पी एच डी, जनसंचार, महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ विभूति की तानाशाही के खिलाफ छात्र ने छोड़ी पीएचडी ”

  2. By Anonymous on February 15, 2010 at 2:16 PM

    yeh kadam sach-much kabile tarif hai agar anil jaise kuch our chhatr samne aaye to anil chamadia ke khilaf hue is shadiyantra ka muh tod javab diya ja sakta hai

  3. By avani on February 16, 2010 at 10:03 PM

    yah katai samajhdari bhara kadadm nahi hai. anil rai ankit jaise pratikriyavadi aur vibhuti narayan ray jaise bahrupiye har jgah milenge. ap kaha-kaha se bhagenge. vardha me jo ho raha hai, kamobesh pure desh me use duhraya ja raha hai. pratirodh aur parivartan ko na satta swikar rahi hai na satta prtisthan ke pyade. phir ap par nirbhar karta hai ki ap kya kdam utahte hai. pratiraodh ya palyan!?

  4. By Kaviraaj on February 17, 2010 at 1:03 PM

    बहुत अच्छा । सुदर प्रयास है। जारी रखिये ।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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