हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जातिवाद को बाजार बरकरार रखेगा और बेचेगा.

Posted by Reyaz-ul-haque on 2/04/2010 07:19:00 PM

उचक्का नाम से आई अपनी आत्मकथा के जरिए लक्ष्मण गायकवाड़ ने हिंदी पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाई. मूलत: मराठी मे लिखनेवाले गायकवाड़ एक और पुस्तक पथरकटवा भी हिंदू में अनूदित हो चुकी है. कभी राजनीति के जरिए दलितों की मुक्ति के लिए कोशिश करनेवाले गायकवाड़ का मानना है कि राजनीति अब पूंजी बनाने का साधन हो गई है और उससे नए राजे-महाराजे पैदा हो रहे हैं.  1947 के बाद से हर तरह की सुविधाओं से वंचित खानाबदोशों के अधिकारों के लिए वे अभी संघर्ष कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि उन्हें नागरिकता मिले, राशन कार्ड दिए जाएं. उनका अपना एक गांव हो और वे आजादी से जी सकें. इस पर हाल में मराठी में उन्होंने एक किताब ‘हे स्वातंत्रे कोणा आचे’ (यह आजादी किसकी है) लिखी है. उनसे हुई मेरी इस अनौपचारिक बातचीत के कुछ अंश तहलका पर भी प्रकाशित हुए हैं.
आप ‘उचक्का’ के लेखक के रूप में जाने जाते हैं. जैसा कि उचक्का से ही हम जानते हैं, आपका जीवन बेहद संघर्षों से होकर गुजरा है. उचक्का के आने के बाद उसमें क्या बदलाव आए?
समाज ने उचक्का के आने के बाद मुङो बहुत प्यार दिया. समाज बदलाव चाहता है. समाज में हर तरह के लोग हैं. उनमें से गाली देनेवाले को गाली दो, जो अच्छे हैं, उन्हें प्यार करो. में अच्छे को अच्छा बोलूंगा, बुरे को बुरा. अगर एक कास्ट सर्टिफिकेट बनाने के लिए एक ब्राह्मण पैसा नहीं लेता है और दलित पैसा लेता है तो मैं उस दलित के खिलाफ लिखूंगा.

दलित साहित्य ने साहित्य में अपनी सशक्त दावेदारी पेश की है. इसने साहित्यिक बहसों की दिशा को मोड़ दिया है और एक केंद्रीय स्थान हासिल किया है. लेकिन अभी दलित साहित्य के सामने आपकी नजर में कौन-कौन से कार्यभार हैं?
दलित साहित्य में एकजुटता नहीं है. हमने दलित साहित्य को क्रांतिकारी बनाया है. हमने शब्दों को ताकत दी है. उसे अलग-अलग समय और समाजों में प्रवाह भी दिया है. लेकिन आज सबसे बड़ी जरूरत पूरे देश के दलित लेखन को एकताबद्ध होने की है, उसे एक जगह एक मंच पर लाए जाने की है. आपने सही कहा कि दलित लेखन के आने के बाद से बहुत बदलाव आया है. अब लोग साहित्य में दलित चेतना को न तो नजरअंदाज कर सकते हैं और न उससे बच सकते हैं.
लेकिन हमें एक और बात पर ध्यान देने की जरूरत है. अलग से दलित साहित्य का अस्तित्व मानना ठीक नहीं है. जब कोई गैर दलित या कोई ब्राह्मण कोई साहित्य लिखता है तो क्या उसे ब्राह्मण साहित्य कहा जाता है? तो फिर दलित साहित्य क्यों कहा जाए? सिर्फ साहित्य क्यों नहीं कहा जाए? दलित साहित्य, उच्च वर्ग का साहित्य या आदिवासी साहित्य जैसी कोई चीज नहीं होती. जो लेखन इनसान को उच्च मूल्यों से लैस करे, प्रगतिशील हो, वह साहित्य होता है. लेखन कभी दलित या आदिवासी नहीं होता. लेखन लेखन ही होता है. फिर भी चाहे जो माना जाए, आनेवाले दिनों में वही साहित्य बदलाव लाएगा, जिसे दलित साहित्य कहा जा रहा है.

यह सवाल अब भी लोग बार-बार उठाते रहते हैं कि दलित साहित्य क्या सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं. आपके नजरिए में क्या यह सवाल सुलझ चुका है? या इसे सुलझाया जाना बाकी है? आप क्या सोचते हैं?
इतनी सरलता से एक लाइन में इसके बारे में नहीं कहा जा सकता. आप प्रेमचंद को ही लीजिए, या फिर टैगोर को लीजिए. इनके अलावा भी बहुत सारे लेखक हैं, जिन्होंने दलितों पर लिखा है. ये हमारे समाज के प्रमुख लेखक हैं. उन्होंने अपने लेखन में जाति के आधार पर टीका-टिप्पणी की है. वे पूरा न्याय नहीं कर पाए. एक दलित किस गंदगी में रहता है, क्यों रहता है, यह स्थिति कैसे बदलेगी, इसके बारे में वे नहीं लिखते. हो सकता है कि कोई दलितों पर लिखे और उसे मनोरंजन का साधन बना डाले. लेकिन लेखन को बदलाव का साधन बनाने की जरूरत है.

आपने अपने वक्तव्य में कहा कि दलितों में एक ब्राह्मण वर्ग पैदा हो रहा है.
हां, मेरा यह कहना है कि दलितों के बीच एक ब्राह्मण वर्ग तैयार हो रहा है. वह सभी सुविधाओं का लाभ उठा कर और ऊपर बढ़ता जा रहा है. उसे न तो अब नीचे आने की चाहत है और नीचेवालों की फिक्र. यहां तक कि आंबेदकर का नाम लेने में भी उसे हिचक होती है. इस प्रवृत्ति पर मैंने पथरकटवा में लिखा है. दलित ब्राह्मण ब्राह्मण से भी खराब होते हैं. वे तो अपने ही समाज का शोषण कर रहे हैं.

ऐसा क्यों होता है कि जिन स्थितियों से संघर्ष कर के वे ऊपर आ रहे हैं, उन्हें भूल जाना चाहते हैं?
इसकी जड़ें वर्ण व्यवस्था में ही हैं. जब तक समाज जातियों में बंटा रहेगा और कुछ उच्च जातियां और कुछ निम्म जातियां बनी रहेंगी, तब तक सब लोग ऊपर ही जाना चाहेंगे. ऊपर जाना अपने आप में बुरी बात नहीं है. यह तो अच्छा है कि सब ऊपर जाएं. लेकिन दिक्कत की बात यह है कि सिर्फ कुछ ही ऊपर बने हुए हैं. हमारा दलितों से कहना है कि आप ऊपर जाएं, लेकिन जो नीचे रह गए हैं, उन्हें भूलें नहीं. उन्हें अपने साथ रखें, उनके साथ रहें. लेकिन इसका उल्टा हो रहा है. दलित अधिकारी और पूंजीपति व्यवस्था के खिलाफ खड़े नहीं होते, लड़ते नहीं. इसलिए जो लोग समाज में ऊपर जा रहे हैं, उनका नीचे आना भी जरूरी है.

हवेलियों में फव्वारों के लिए पानी है, गन्ने के खेतों के लिए पानी है, लेकिन सूखे होठों के लिए पानी नहीं है, आपके द्वारा सुनाई गई एक कविता के इस अंश में जटिल भारतीय समाज का एक द्वंद्व भी दिखता है, जहां कई बार दलित और पिछड़े वर्ग एक दूसरे के सामने खड़े नजर आते हैं. जबकि पिछड़ा वर्ग भी दलित समुदाय से बहुत आगे नहीं है. आप इस द्वंद्व को कैसे देखते हैं.
पिछड़े और दलितों का दुख दर्द एक जैसा है. लेकिन वे इसे जानते नहीं हैं, इसलिए आपस में टकराव होते हैं. जब वे इससे अवगत होंगे कि उनके दुख एक जैसे हैं और उनके कारण भी एक ही जैसे हैं, जो फिर वे साथ आएंगे. लेखन की दुनिया में भी मैं कोशिश कर रहा हूं कि देश के स्तर पर दलित लेखक एक जगह आएं और फिर व्यापक एकता बने. हमारी कोई भी कोशिश जातिवाद को बढ़ाने के लिए नहीं उसे खत्म करने की दिशा में होनी चाहिए.

आप अश्वेत लेखन के बरअक्स दलित लेखन को किस तरह रखते हैं? दोनों में किसी दूरी और नजदीकी है?
मेरा मानना है कि दलित लेखन अश्वेत लेखन से आगे है. लेकिन इसमें भाषा एक बड़ा अवरोध है. लोग जान ही नहीं पाते हैं कि कहां क्या लिखा जा रहा है. अगर लोग जानेंगे तो सही बात पता लगेगी.

आप राजनीति में भी रहे. और अब आप इस राजनीतिक तंत्र की आलोचना कर रहे हैं. क्या अनुभव रहे आपके?
1991 में वीपी सिंह ने सोलापुर से मुझे जनता दल का टिकट दिया था. लेकिन तब राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को लोगों का समर्थन बढ़ गया था. मैं हार गया. इसके बाद के भी कुछ अनुभवों से हमें समझ आया कि राजनीति हमारी जगह नहीं है. वे हमें बदनाम करने और बेचने का काम करते हैं. मैं किसी पार्टी का सदस्य कभी नहीं रहा. अभी दलितों के लिए राजनीति कर रहे जो मौजूदा दल हैं वे राजनीति में बने रहने के लिए जो जरूरी होता है करते हैं. वे अपनी सुविधा के हिसाब से कभी आपके नजदीक आएंगे और कभी दूर हो जाएंगे.
राजनीति पूंजी कमाने का साधन बन गई है. राजनीति के जरिए नए राजे-महाराजे बनने का काम चल रहा है. राजनीति के साथ जातिवाद के मिलने से जमींदारी प्रवृत्ति आई है.
अगर समाज का सही कल्याण चाहते हैं तो एक साथ आना पड़ेगा. अगर कोई ठीक काम कर रहा है तो उसके साथ आना होगा. इसके अलावा यह भी समझना होगा कि ऊंची जातियों ने दलितों को खिलौना बना लिया है.

जाति के उन्मूलन के लिए एक मान्यता यह भी है कि बाजार बढ़ेगा और वश्वीकरण की प्रक्रिया तेज होगी तो जाति खत्म हो जाएगी. आप क्या सोचते हैं? क्या बढ़ते हुए बाजार ने कुछ ऐसे संकेत दिए हैं जिससे इस नतीजे पर पहुंचा जा सके?
ऐसा कभी नहीं होगा. दुनिया की बात और है. भारत की बात और है. भारत में बाजार के विस्तार के बावजूद जातिवाद बरकरार रहेगा, क्योंकि यहां की परिस्थिति दूसरी है. ऐसी परिस्थिति में भाषाएं मर सकती हैं, लेकिन जाति नहीं मरनेवाली. यहां तो जन्म से ही यही सिखाया जाता है कि कुछ लोग जन्मजात बुरे होते हैं. कानून और पुलिस एकेडमी तक में यही सिखाया जाता है कि निचली जातियों के लोग चोर कैसे बनते हैं. क्या बाजार इस तंत्र को, ऊपर से नीचे तक स्थापित इस पूरे मकड़जाल को तोड़ सकता है?
नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. जातिवाद को बाजार भी खत्म नहीं करेगा. वह उसे बरकरार रखेगा और बेचेगा. वह जातियों के हीरो पैदा करेगा और उन्हें बेचेगा. वह एक को ऊपर उठा कर उसका उत्थान सबको दिखाएगा, लेकिन बाकी को उसी पुरानी दशा में बनाए रखेगा, ताकि उस हीरो को बेचा जा सके. व्यापार बढ़ेगा, लेकिन जाति भी बनी रहेगी. यह हम पहले से देखते आ रहे हैं और आगे भी यही होगा. वश्वीकरण से इसमें कोई फायदा नहीं होनेवाला है. हालात और खराब ही होंगे.

आरक्षण का न्यायपालिका, अनेक शिक्षा संस्थानों में और दूसरी अन्य जगहों पर विरोध किया जाता है, जिसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि आरक्षण लागू करने से गुणवत्ता पर असर पड़ेगा. आप सामाजिक न्याय के सामने गुणवत्ता के प्रश्न को खड़ा करने को किस तरह देखते हैं?
यह गलत है. गुणवत्ता का सवाल लाने के पीछे छिपी मंशा को हम जान सकते हैं. अगर उन्हें इतनी चिंता है तो मेडिकल और इंजीनियरिंग में डोनेशन देकर जो लड़के एडमिशन लेते हैं और डिग्री हासिल करते हैं, उनके समय गुणवत्ता का सवाल कहां चला जाता है? अब तो हम अनेक जगहों पर यह देखते हैं कि एससी-एसटी-ओबीसी भी सामान्य श्रेणी के छात्रों जितने ही अंक लाते हैं. फिर गुणवत्ता की बात ही कहां उठती है. यह तो वास्तव में अब तक वंचित रहे समुदायों को आगे भी वंचित रखने की दलील है.


आपने दक्षिणपंथी राजनीति की बात की. गुजरात से लेकर उड़ीसा तक में तथा दूसरी जगहों पर भी दक्षिणपंथ ने आदिवासियों-दलितों का दंगों में इस्तेमाल किया. सांप्रदायिक राजनीति के साथ दलित-आदिवासी समुदाय की यह संगति थोड़ी अस्वाभाविक लगती है. लेकिन फिर भी यह हमारे समय में देखने में आ रही है. आप खुद ऐसे समुदाय से आते हैं, उसके बारे में लिखते रहे हैं. आप इस प्रक्रिया को कैसे देखते हैं?
फासीवादी दलितों-आदिवासियों को इसलिए अपने साथ लेते हैं, क्योंकि ये लड़ने में अच्छे लोग हैं. नंगे, भूख, बेरोजगार लोगों को यह समझ-बुझ कर कि आपकी समस्याओं पर बहस तो संसद में चल रही है, आपकी समस्याएं दूर होंगी, वे उन्हें अपने साथ लेते हैं. नंगे, भूखे लोगों को आसानी से उकसाया जा सकता है, क्योंकि तात्कालिक तौर पर जो उन्हें रोटी देगा, वे उधर जाएंगे. गुजरात में तो दलितों-आदिवासियों के बीच ढोल और त्रिशूल मुफ्त बांटे जाते हैं. उनसे कहा जाता है कि तुम लड़ो, हम तुम्हारे साथ हैं. राम ने हनुमान सेना बनाई थी. इन्होंने बजरंग सेना बनाई है. यह इनकी वानर सेना है. आप इसमें दक्षिणपंथी राजनीति की मानसिकता भी देख सकते हैं. कि वे दलितों-आदिवासियों को क्या समझते हैं. वे राम मंदिर के नाम पर लंका जलाने का काम दलितों-आदिवासियों से कराना चाहते हैं. इनसे को कहीं अच्छे नक्सलवादी हैं, जो गरीबों के हक की लड़ाई तो लड़ते हैं. वे कुछ बदलना चाहते हैं. लेकिन दक्षिणपंथी तो वर्ण व्यवस्था और धर्म को मजबूत कर समाज को सदियों पीछे धकेलने के लिए लड़ रहे हैं.

आगे क्या लिख रहे हैं? किन योजनाओं के बारे में सोच रहे है?
राजस्थान के ही सत्यनारायण गोयनका पर लिख रहा हूं. उन्होंने बुद्ध की प्रज्ञा, शील करुणा के लिए काम किया और वे दुनिया को विपश्यना सिखा रहे हैं. उन्हीं पर थोड़े विस्तार से काम करने की योजना है.

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ जातिवाद को बाजार बरकरार रखेगा और बेचेगा. ”

  2. By रंगनाथ सिंह on February 4, 2010 at 8:39 PM

    This comment has been removed by the author.

  3. By रंगनाथ सिंह on February 4, 2010 at 8:43 PM

    साक्षात्कार अच्छा लगा।

  4. By shishirant on May 25, 2010 at 10:51 PM

    This is a better and mature interview comparatively given by most of the Hindi Dalit writers who they are not state forward. You said about social and caste related issues that most of the north Indian Dalit intellectuals as well as bureaucrats especially in Hindi belt are not honest and dedicated in the particular cause. You were in a programme in Sahitya Academy, New Delhi organized by Dalit Lekhak Sangh but I could not attend. I want to see you. My contact Nos. are 09868862563 (M) 011-23386211 (R). If you Mumbai, I will come soon. Shri Surajpal Chauhan, an eminent Hnidi dalit writer is also in Mumbai now-a-days.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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