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तीन साल, तेरह सवाल : एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/05/2010 05:13:00 PM

बिहार में नीतीश राज आने के बाद पिछले चार सालों में बिहारी मीडिया का एक नया चरित्र उभर कर आया है. अच्छा देखो, अच्छा सुनो, अच्छा लिखो. इस पर विभिन्न तरह से चर्चा जारी है. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि एक अघोषित तानाशाही और प्रायोजित सेंसरशिप प्रेस पर हावी है. इस बीच सच्चाई सामने लाने के कुछ प्रयास भी हुए हैं. राजग सरकार के तीन साल पूरे होने पर दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका 'सब लोग' की यह रिपोर्ट आपके सामने है. यह आज भी प्रासंगिक है.


अनीश अंकुर

वैसे तो बिहार में नीतीश सरकार ऊपर से ठीक चल रही है. निकट भविष्य में इसे कोई खतरा भी नहीं दिखता, न अंदरूनी तौर पर और न बाहरी तौर पर. इसी वजह से अपने कार्यकाल के तीन साल पूरा होने पर बड़े शान से नीतीश कुमार ने अपना रिपोर्ट कार्ड जारी किया. तीन साल पूरा होने पर अलग-अलग दलों ने भी नीतीश के काम-काज का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया. मुख्यतः लालू प्रसाद के राजद और रामविलास पासवान की नुमांइदगी वाले लोजपा ने राज्य सरकार की विफलताएं गिनाते हुए पुस्तिकाएं निकालीं. लेकिन आम लोगों की नजर में ये विरोधी दलों के व्यवहारिक तकाजे हैं. लेकिन तीन साल पूरा होने पर एक ऐसा बुकलेट भी छपा जिसने कुछ दिनों के लिए नीतीश सरकार की नींद उड़ा दी, यह कहा जाए तो अतिद्गयोक्ति नहीं होगी. राधिका ऑफसेट, महेंद्रु से मात्र 23 पन्नों की छपी इस पुस्तिका ने सियासी हलकों में सरगर्मी और हलचल ला दी. छापने वाले ने अपना पता पुस्तिका पर नहीं छपवाया है. पता के नाम पर सिर्फ 'जनमत, महेंद्रू' है. एक ई-मेल नंबर भी है.
पुस्तिका के सियासी असर का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधायक दल की बैठक में देर तक इस बुकलेट की चर्चा की. कुछ सुत्रों के अनुसार, नीतीश कुमार ने यहां तक कहा कि 'मैं जानता हूं कि इसके पीछे कौन-कौन लोग हैं. विरोधी दलों की भूमिका के साथ-साथ इसमें कुछ अपने विधायक लोग भी हैं. लेकिन जिसे पार्टी छोड़कर जाना हो वह जा सकता है. जितने लोग विरोधी दल के संपर्क में हैं, उससे अधिक लोग उधर के हमारे संपर्क में हैं. हमारे विरोधी इस पुस्तिका को लाखों की संख्या में छापे जा रहे हैं.' वैसे सूत्र बताते हैं कि राजद ने इस पुस्तिका के एकाध हिस्से को कटवाकर इसे पुनः बड़ी मात्रा में छपवाया है. हालांकि छपने वाली पुस्तिका की संख्या 11.12 हजार से ज्यादा नहीं रही है. लेकिन मुख्यमंत्री को लगता है कि, जैसा कि उन्होंने विधायकों की मीटिंग में कहा कि 'हमारे विरोधी पुस्तिका की लाखों प्रतियां बंटवा रहे हैं '. पुस्तिका को पटना में जिन-जिन स्थलों पर बेचा जा रहा था वहां से इसकी प्रतियों को दुकानदारों को समझा-बुक्षाकर या डरा-धमका कर हटवाया गया.
पुस्तिका के कवर पर नीतीश की तस्वीर छपी है. जिसमें वे राज्य के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं-सूरजभान सिंह, रामा सिंह, मुन्ना शुक्ला, राजन तिवारी व अरुणा देवी आदि के साथ मुस्कुराते खड़े नजर आ रहे हैं.
'प्रतिक्रांति के तीन साल'-पुस्तिका का पहला आलेख किसी विनोद कुंतल का है. इसमें लेखक ने चुनाव परिणाम एवं बाद की स्थितियों का विद्गलेषण किया है, जिसमें सामाजिक न्याय की ताकतों को पीछे धकेला जाने लगा-'नया बिहार के स्लोगन के साथ नीतीश कुमार सत्ता में आए. इस स्लोगन के उन्हें अपेक्षित परिणाम मिले. नीतीश कुमार को फेंस पर खड़े पिछड़े तबके ने दिल खोलकर वोट दिया. दरअसल, वे लालू को किसी अपरकास्ट नेता से पदच्यूत नहीं करना चाहते थे. इस तरह नीतीश कुमार ने बाजी मारी. लेकिन नीतीश कुमार का हमेशा यही विद्गवास रहा कि उनकी जीत ऊंची जातियों के सहयोग के कारण संभव हुई है. पिछड़ी जातियों के सहयोग को उन्होंने नजरअंदाज किया. दरअसल, नीतीश को दो तरह के वोट मिले थे. एक तो सामंतों का वोट था दूसरा पिछड़ों का. सामंतों का वोट बहुप्रचारित 'पिछड़ा राज' हटाने के लिए था. पिछड़ों का वोट विकास के लिए था. लेकिन सत्ता में आने के साथ ही सामंती ताकतों ने उन्हें अपने घेरे में लेना शुरू कर दिया. सत्ता के शुरुआती दिनों में तो नीतीश ने इसका प्रतिरोध किया लेकिन पांच-छह महीने में ही वह इन्हीं ताकतों की गोद में जा बैठे. उनके आत्मसमर्पण के साथ ही बिहार में प्रतिक्रांति की शुरूआत हो गयी. लंबे संषर्ष से बिहार के पिछड़े तबकों को आत्मसम्मान हासिल हुआ था, उसे अचानक ध्वस्त किया जाने लगा '. इसी आलेख का दिलचस्प हिस्सा वह है जिसमें उन व्यक्तियों को उदाहरणस्वरूप गिनाया गया है जिनको नीतीश कुमार ने बाद के दिनों में अपने से दूर किया-'चुनाव के दरम्यान विजेंद्र प्रसाद यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. उपेंद्र कुशवाहा की तब बड़ी हैसियत थी. उपेंद्र-विजेंद्र की जोड़ी का जिक्र खुद नीतीश बड़ी शान से करते थे. प्रेमकुमार मणि जैसे चिंतक-लेखक तब नीतीश कुमार के खास थे, जिनसे हर बात में सलाह ली जाती थी. लेकिन राज पाट आते ही प्राथमिकताएं बदल गयीं. पिछड़े वर्गों से आने वाले नेता धकिया दिये गये. विजेंद्र-उपेंद्र की जोड़ी की जगह 'ललन-प्रभुनाथ' की जोड़ी हावी हो गयी. प्रेम कुमार मणि की जगह शिवानंद तिवारी लाये गये.(विधान सभा के उपचुनाव में हार के बाद अब नीतीश उपेंद्र कुशवाहा को वापस लाने की हास्यास्पद कोशिश में जुटे हैं) वस्तुतः नीतीश कुमार ने प्रयास करके पिछड़े राज की छवि को खत्म कर दिया है. सामंती ताकतों को लेने के लिए वह शीर्षासन करने से भी नहीं चूके. जिन शक्तियों ने बिहार में सामाजिक न्याय का आंदोलन पुखता किया था, उन सबको नीतीश कुमार ने एक-एक कर अपमानित किया.' शरद यादव और जार्ज फर्नांडिस के साथ किये गये सलूक का विद्गलेषण करते हुए कहा गया है कि-'जार्ज फर्नांडिस को धकेलने के बाद अब शरद यादव नीतीश के निशाने पर हैं. शरद को किनारे करने के लिए उपेक्षा की वही तकनीक लागू की जा रही है जो जार्ज के लिए की गयी थी. कुल मिलाकर तीन सालों में बिहार की सत्ताधारी पार्टी रणवीर सेना-भूमिसेना के साक्षा संगठन में तब्दील होती गयी है.' दूसरा आलेख दिवाकर नाम के किसी सज्जन का है, जिसका शीर्षक है-'मीडिया में महामारी'. इस आलेख में लेखक ने बताया है कि कैसे बिहार का मीडिया जगत सवर्ण जातियों के प्रभुत्व में है. तथ्य और आंकड़ों के साथ यह बताने की कोशिश की गयी है कि नीतीश कुमार ने सुव्यवस्थित तरीके से जनसंचार माध्यमों का इस्तेमाल अपने पक्ष में किया. राजद और नीतीश सरकार के दौरान मीडिया का तुलनात्मक विद्गलेषण किया गया है-'लालू प्रसाद के शासनकाल में सिर्फ सुशील कुमार मोदी के बयानों को आधार बना सप्ताह में चार विद्गोष खबर-स्टोरी-छापने वाले अखबारों को अब ध्यान से देंखें. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि पिछले तीन सालों में इन समाचार पत्रों में एक भी ऐसी खबर नहीं छपी है, जिससे नीतीश कुमार को राजनैतिक रूप से नुकसान पहुंचने की आशंका हो. वास्तव में नीतीश कुमार और उनके सहयोगियों ने सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को पालतू और भ्रष्ट बनाया है. खोजपरक रिपोर्ट की तो बात छोड़िए, अखबारों को भेजे गये विपक्षी दलों के बयान तक छपने के पहले मुख्यमंत्री के टेबल पर पहुंचाए जा रहे हैं. सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल तुरूप के पत्तों की तरह किया जा रहा है. नतीजा यह है कि बिहार के समाचार पत्र राज्य सरकार की योजनाओं, घोषणाओं की सूचना देने वाले बुलेटिन की भूमिका में पहुंच गये हैं.' तीसरा शीर्षक है-'क्या हुआ उन सुक्षावों का'. इसमें नीतीश कुमार द्वारा गठित तमाम आयोगों के हश्र को तथ्यों के साथ रखा गया है. कैसे इन आयोगों को एक रणनीति के तहत ठंडे बस्ते में डाला गया, इसको अलग-अलग विद्गलेषित किया गया है. पांचवें चैप्टर का शीर्षक है-'वादें हैं वादों का क्या'. इसमें चुनाव घोषणा पत्र के प्रमुख वायदे की तीन सालों के दौरान व्याख्या की गयी है. धर्मनिरपेक्षता के बारे में पुस्तिका में कहा गया है कि-'धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लंपट और स्वार्थी तत्वों को बढ़ावा दिया गया है. भागलपुर दंगों की जांच करने वाली नीतीश सरकार नालंदा के नगरनौसा दंगे पर एक शोधपत्र तो जारी करे. नगरनौसा के दंगे के कातिल भागलपुर दंगे पर क्या न्याय देंगे ?'
पुस्तिका का सबसे दिलचस्प चैप्टर है 'इसका ताज, उसका राज'. इसमें प्रशासन के भीतर चल रही जातिगत लड़ाइयों को निरंजन नामक व्यक्ति ने अनोखे अंदाज में विद्गलेषण करते हुए लिखा है-'नीतीश सरकार के गठन के पहले से पुलिस महानिदेशक के पद पर कुरमी जाति से आने वाले  आशीष रंजन सिंहा काबिज थे. नीतीश सरकार ने उन्हें तो पद पर बरकरार रखा लेकिन सरकार बनने के एक माह बाद ही दिसंबर,2005 में भूमिहार जाति से आने वाले अभ्यानंद को अपर महानिदेशक के पद पर बैठा कर पुलिस महकमा उनके हाथों में सौंप दिया. अभ्यानंद की छवि पैसे के मामले में ईमानदार पर जाति के मामले में बेईमान अधिकारी की रही है. एडीजी रहते उन पर जात-पात करने के आरोप लगे.' आगे इस आलेख में कहा गया है कि 'यहीं से शुरू हुआ कुरमी को ताज और भूमिहार को राज' तथा 'थोड़ा कुरमी, ज्यादा भुमिहार' का जुमला. जब तक आशीष रंजन सिंहा और अभ्यानंद अपने पदों पर रहे, उनके बीच छत्तीस का आंकड़ा बना रहा. दोनों अधिकारी अपना-अपना राज समझकर एक-दूसरे को ठेंगा दिखाते रहे. डीजी अपने आदमियों को मलाईदार पोस्टिंग दिलाने में दिलचस्पी दिखाते तो अभ्यानंद अपने पसंदीदा पदाधिकारियों को रुतबे वाली कुरसी पर विराजमान कराने की फिराक में रहते. लिहाजा पुलिस मुख्यालय में गुटबाजी चरम पर रही. आशीष रंजन सिंहा की सेवानिवृत्ति का समय आया तो इन अधिकारियों के माध्यम से कुरमी-भूमिहार के बीच सत्ता-संतुलन बना रहे मुख्यमंत्री ने अभ्यानंद को भी चलता कर दिया '.
इस पुस्तिका में स्पीडी ट्रायल की भी असलियत खोली गयी है-'कट्टा पकड़ने पर स्पीडी ट्रायल, एके-47 से मुख्यालय घायल'-स्पीडी ट्रायल का जिक्र आते ही एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यह जुमला सुना डालते हैं. वास्तव में स्पीडी ट्रायल पूरी तरह हास्यास्पद साबित हुआ है. इसकी शुरूआत कथित तौर पर सभी दलों के बड़े अपराधियों पर लगाम कसने के लिए हुई थी लेकिन हुआ उल्टा है. इस बड़े जाल में छोटी मछलियां तो फंस रहीं हैं लेकिन मगरमच्छ को जाल फाड़कर निकलवा दिया जा रहा है. इसके प्रमाण हैं अनंत सिंह और प्रभुनाथ सिंह जैसे लोग.
 इस बुकलेट की सर्वाधिक स्तब्ध करने वाली चीज है 'नीतीश का नालंदा प्रेम' संबंधी आंकड़ा. इसमें बताया गया है कि कैसे बिहार के तमाम बड़े पदों पर नालंदा-जो नीतीश का गृह जिला है-के लोगों को रखा गया है. 16 प्रमुख पदों-जिसमें जदयू के प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रभाषा परषिद, संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष से लेकर पटना के जिलाधिकारी, ग्रामीण एसपी सहित पीएमसीएच के सुप्रीटेंडेट तक सभी नालंदा के हैं. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सूचना यह है कि इन सोलह लोगों में ललन सिंह-प्रदेश अध्यक्ष जदयू-को छोड़कर सभी एक ही जाति-कुरमी-के हैं.
'साधो राह दुनो हम देखा'- इस शीर्षक तले पुस्तिका में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के काल्पनिक इंटरव्यू हैं. दोनों राजनेताओं से तेरह-तेरह सवाल पूछे गये हैं. नीतीश के साथ बातचीत का शीर्षक है-'बिहार के लोग बिहार को बरबाद नहीं होने देंगे.' जबकि लालू प्रसाद के इंटरव्यू का शीर्षक है-'अब हमहूं सीरियस बानी'. ये दोनों इंटरव्यू दोनों नेताओं के अपने खास चरित्र को काफी दिलचस्प तरीके से उजागर करते हैं. हालांकि राजद की ओर से छपवाए गये बुकलेट में लालू प्रसाद का इंटरव्यू हटा दिया गया है.
इस पूरे बुकलेट में नीतीश सरकार का वह चेहरा लोगों के सामने लाने की कोशिश की गयी है, जिसे बिहार की मुख्यधारा का मीडिया सामने लाने से बचता रहा है बल्कि उस चेहरे को छुपाने में सरकार की सहायता भी कर रहा है. पिछले तीन साल में पहली बार नीतीश सरकार के कामकाज का वस्तुपरक मुल्यांकन कर उसका सही आईना दिखाने की कोशिश बुकलेट में की गयी है. नीतीश सरकार की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि उसे इस वक्त आईना दिखाने वाले लोग बिल्कुल पसंद नहीं हैं. जिस ढंग का रवैया नीतीश सरकार के इस पुस्तिका के प्रति अपनाया है उससे यह स्पष्ट है कि भले यह सरकार ऊपर से बेहद निद्गिंचत और ताकतवर दिख रही हो भीतर से बेहद डरी हुई है. अपने खिलाफ जाने वाली इस छोटी सी सषाई को लोगों तक न पहुंचने देने के लिए सरकार और प्रशासन जिस निरंकुश ढ़ंग से आगे बढ़ा वो एक बानगी है कि नीतीश सरकार अपने विरोधियों के प्रति कैसा रवैया आने वाले वक्त में अपना सकती है.

('सब लोग', संपादक-किशन कालजयी, संयुक्त संपादक-वर्तिका नंदा, बी-3?44, सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली-89, के फरवरी, 2009 अंक से साभार)

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ तीन साल, तेरह सवाल : एक रिपोर्ट ”

  2. By अजय कुमार झा on January 5, 2010 at 6:28 PM

    हाल फ़िलहाल बिहार को लेकर इतना सार्थक और सटीक विश्लेषण कहीं पढने सुनने को नहीं मिला । आपने तो पूरा खाका ही खींच कर रख दिया ॥आभार

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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