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बीच सफ़हे की लड़ाई

सेहत हमारी, बैंगन हमारा, उनका मुनाफा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/03/2010 04:14:00 PM


प्रफुल्ल बिदवई

भारत
सरकार की आनुवंशिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति ने, परिवर्तित आनुवंशिकी वाले बैंगन (जिसे विभिन्न भारतीय भाषाओं में बंगा, बंगी और बेगुन जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है) की व्यापारिक खेती को मंजूरी दे दी है। बैंगन, जिसकी उत्पत्ति भारत में हुई, का सदियों पहले मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया को निर्यात किया गया और इस समय वह विश्व भर में बहुपयोगी सब्जी के रूप में लोकप्रिय है।
भारत में इसकी 5 लाख हेक्टेयर भूमि में खेती की जाती है और इसका कुल वार्षिक उत्पादन 84 लाख टन है। भारत में ऐसा पहली बार हुआ है कि आनुवंशिक इंजीनियरींग अनुमोदन समिति ने परिवर्तित आनुवंशिकी वाले, खाद्य पदार्थ की फसल उगाने की मंजूरी दी है। यह 30 सदस्यों की एक कार्यवाहक समिति है, जिसमें मुख्यत: राज्यों की प्रयोगशालाओं और संस्थाओं में काम करने वाले अफसरशाहों और वैज्ञानिकों को शामिल किया गया है और नागरिक समाज के स्वतंत्र विशेषज्ञों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। उल्लेखनीय है कि नागरिक समाज एक नियामक एजेंसी के तौर पर काम करता है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय है, क्योंकि इससे परिवर्तित आनुवंशिकी वाली दूसरी खाद्य फसलों, जिनमें चावल, मक्का, सोयाबीन और जुवार की फसलें उगाने और भारत की खाद्य पदार्थ श्रृंखला में सीधे परिवर्तित आनुवंशिकी वाली सब्जियों को उगाने के लिए द्वार खुल गए है। इससे मानवों और पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर बहुज बडी अनिश्चितता और खतरे की स्थिति पैदा हो गई है। सरकार का कहना है कि समिति की रिपोर्ट पर निर्णय लेने से पहले वह उसका अध्ययन करेगी। पर्यावरण राज्यमंत्री श्री जयराम रोमेश ने जिन्होंने कुछ ही महीने पहले सार्वजनिक रूप से परिवर्तित आनुवंशिकी वाले खाद्य पदार्थों का विरोध किया था कहा है ''अंतिम निर्णय किसी कंपनी या एनजीओ के प्रभाव में आकर नहीं लिया जाएगा। बीटी बैंगन भारत में नहीं उगाया और बेचा जाना चाहिए, इसके कई कारण है। परिवर्तित आनुवंशिकी वाले इस बैंगन का विकास माहीको महाराष्ट्र (संकर बीज कंपनी) द्वारा पार-राष्ट्रिय अमरीकी कंपनी मोंसांटो के सहयोग से किया गया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत हर कोशिका में कीटनाशक जीवविष पैदा करने के लिए मृदा जीवाणु बेसीलम थुरिजिएनसिस की जीन भरी जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि नाशक कीट फसल को बर्बाद न कर सकें। सैध्दांतिक रूप से बीटी बैंगनों की खेती से सब्जी की कुछ बर्बादी से बजा जा सकेगा जो कि सरकारी दावों के अनुसार इस समय फल और अंकुरों को नष्ट कर देने वाले कीटों के कारण 50 से 70 प्रतिशत की बडी मात्रा में होती है। लेकिन जैसा कि जानने में आया है, सिध्दांत एक अलग बात है, परिवर्तित आनुवंशिकी वाली फसल की हकीकत उससे बिल्कुल हटकर है। बल्कि स्वयं सिध्दांत भी वैज्ञानिक संदेह और अनिश्चितता के दायरे में आता है।  बीटी बैंगन के प्रति विवेकी विरोध, आनुवंशिकी इंजीनियरी को एक हल्की फुल्की प्रतिक्रिया के रूप में नकार देने मात्र के लिए नहीं किया जा रहा बल्कि वह एक पुख्ता विज्ञान पर आधारित है। पुख्ता और सुस्थापित विज्ञान हमें यह बताता है कि हम पर्याप्त रूप से यह नहीं जानते कि जिस आर्गेनिज्म में बाहरी जीनों का प्रवेश कराया जा रहा है, उस पर उनके क्या प्रभाव पडेंग़े और इन प्रवेश कराए गए जीनों का अंतडियोें के बेक्टीरिया, मानव अंगों और वायरसों को अंतरित हो जाने का जोखिम कितना बडा है और मानवों तथा पशुओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर उसका क्या प्रभाव पडेग़ा। इसलिए व्यापारिक पैमाने पर परिवर्तित आनुवंशिकी वाले खाद्य पदार्थो के खेती की इजाजत देना बहुत जोखिम भरा काम है। जैसा कि हारवर्ड के आनुवंशिकी के प्रोफेसर रिचर्ड लिवोंटिंन का कहना है कि ''डीएनए से जीव कैसे विकसित होता है, उसकी हमें इतनी कम जानकारी है कि अगर हमें एक के बाद दूसरा जोर का धक्का नहीं लगता तो मुझे हैरानी होगी।'' समझदारी की यह मांग है कि हम जोर के धक्कों के लिए स्थितियां ही पैदा न करें। लेकिन कई अध्ययनों से पता चलता है कि परिवर्तित आनुवंशिकी वाले खाद्य पदार्थों का पशुओं और मानवों पर विपरीत प्रभाव पडता है। यूके के एक प्रतिष्ठित इंस्टीटयूट के श्री अरसद पुस्जताई के नेतृत्व में एक टीम ने, जीएनए लेक्टिन नामक कीटनाशक पैदा करने के लिए, परिवर्तित आनुवंशिकी वाले आलू, चूहों के खिलाफ उनका परीक्षण किया। खिलाए किए आलुओं ने नन्हें चूहों के लगभग प्रत्येक अंग पर विपरीत प्रभाव डाला। उनके दिमाग, जिगर और अंडकोश अपेक्षाकृत छोटे थे। उनमें ''प्रतिरक्षक प्रणाली की क्षति'' और जिगर में आंशिक क्षय देखा गया। जिन चूहों को ऐसे गैर बीटी आलू दिए गए जिनमें लेक्टिन मिलाया गया था वे अपेक्षाकृत अप्रभावित रहे, हालांकि उन्हें बीटी आलुओं से पैदा किए गए लेक्टिन की तुलना में 700 गुना ज्यादा लेक्टिन खिलाया गया था। टीम ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह क्षति स्वयं आनुवंशिकी परिवर्तित प्रक्रिया के कारण ही पहुचा था।
 इसी तरह एक और कंपनी कालजेने द्वारा विकसित किए गए बीटी टमाटर खिलाएजाने से चूहों के पेट में से खून निकलने लगा। 20 में से 7 चूहों के पेट में घाव पड ग़ए और 40 अन्य चूहों में से 7 चूहे दो सप्ताह के भीतर मर जाएंगे, इसके अलावा मोंसांटो के परिवर्तित मक्केके खिलाफ जाने पर चूहों पर कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो गईं जिनमें उनकी रक्त कोशिकाओं, जिगरों और मसानों में पैदा हुए बडे बदलाव भी शामिल थे।  मध्य प्रदेश में, जहां कृषि मजदूरों ने बीटी कपास चुनने-लादने और तोलने का काम किया था, तेज खुजली की ऐलर्जी होने की शिकायत की। बीटी बैंगन उगाने वाले राज्यों से भी एलर्जी की और कुछ और शिकायत सुनने को मिली है। आंध्रप्रदेश में अत्यंत सम्मानीय एनजीओ डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी के अध्ययनों से यह पता चला कि बीटी बैंगन उगाने वालों ने कीटनाशकों का इस्तेमाल जारी रखा, जिससे उद्योग का यह दावा झूठा साबित हुआ कि बीटी कपास को उगाने से कीटनाशकों की जरूरत नहीं पडेग़ी। इन फसलों के कारण जडे के सडने जैसी बीमारियां पैदा हो गईं जो अब तक देखने में नहीं आई थी। डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइयटी ने भेडो के सैंपल को लेकर एक और अध्ययन किया। दो समूहों को बीटीकपास की दो अलग-अलग किस्में खिलाई गई और तीसरे समूह को गैर बीटी कपास खिलाई गई। पहले दो समूहों की भेंडे छह सप्ताह के भीतर मर गईं। लेकिन जिन भेंडो को गैरबीटी कपास खिलाई गई थी, वे स्वस्थ्य बनी रहीं। फिलिप्पीन्स, अमरीका और जर्मनी से ऐसा प्रमाणा मिला है कि बीटी मक्का, कपास और परिवर्तित आनुवंशिकी वाले सोयाबीन से विपरीत प्रभाव पडता है, जिनमें मसूडो में एलर्जी और पशुओं में स्थाई क्षति होना शामिल है। पशुओं में सूअर, गाय और मुर्गियां शामिल हैं। अमरीका में एक परिवर्तित आनुवंशिकी वाले खास सप्लीमेंट से, जो कि एल-टाइप्टोफन कहलता है, 100 लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा इस सप्लीमेंट से सूजन, खांसी, ददोरों, शारीरिक कमजोरी, निमोनिया, सांस की मुश्किल त्वचा सख्त पडने, मूंह में छाले निकलने, डबकाई आने, सांस जल्दी-जल्दी चलने, मांसपेशियों में मरोड पडने, आंखों की समस्याएं, बाल गिरने, ध्यान केंद्रित करने या यादाश्त संबंधी मुश्किल और 1000 लोगों में अधरंग के आसार उभर आए।
 अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि जीन के द्वारा निर्दिष्ट किए गए प्रोटीन से भी कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। बाहरी प्रोटीन वांछित प्रोटीन से अलग हो सकता है। इसके अलावा जीन मानवीय पाचनतंत्र में परेशानी हो सकती है। परिवर्तित आनुवंशिकी वाली फसलो से पर्यावरणिक विषैले पदार्थों में बढाेत्तरी  हो सकती है और खाद्य पदार्थो में वे भारी मात्रा में जमा हो सकते हैं। बच्चों और नवजातों के लिए तो खतरा और भी ज्यादा हो सकता है।  इस बात के कायल कर देने वाले सबूत मौजूद हैं कि परिवर्तित आनुवंशिकी वाले खाद्य पदार्थों के बारे में निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि वे सुरक्षित हैं लेकिन बडे-बडे क़ार्पोरेशनों द्वारा अपने फायदे के लिए उन्हे बढावा दिया जा रहा है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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