हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विभूति नारायण राय और विश्वरंजन में क्या फर्क है

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/29/2010 07:10:00 PM

इस पोस्ट के ज़रिये हम मांग करते हैं अनिल चमडिया की फिर से बहाली की जाए, और उनसे माफी भी माँगी जाए. इसी जगह पर यह विचार भी करना चाहिए कि वीएन  राय और विश्वरंजन में क्या कोइ फर्क नहीं है?


वर्धा से जब कुछ छात्रों ने फोन किया कि अनिल चमड़‍िया सर को निकाल दिया गया है, तो वीएन राय की गतिविधियों को लेकर पहले जितना गुस्‍सा था – वो लगभग घृणा में बदल गया। सृजन और लोकतंत्र का नकाब पहन कर कोई आदमी इस हद तक घिनौना हो सकता है कि एक असहमत आदमी को अपने घमंड की बूटों तले कुचल डाले? मुझे किसी ने बताया कि जिस कार्यकारिणी समिति ने अनिल चमड़‍िया को निकालने के फैसले पर मुहर लगायी है, उसमें विष्‍णु नागर और कृष्‍ण कुमार भी थे। विष्‍णु नागर कवि हैं और कृष्‍ण कुमार शिक्षाविद। दोनों को मैं व्‍यक्तिगत रूप से जानता हूं और मेरी जानिब दोनों ही बेहतरीन इंसान हैं और अच्‍छे-जुझारू लोगों का भरपूर साथ देते हैं।


मैंने तुरत नागर जी को फोन किया, तो उन्‍होंने बताया कि नहीं मैं पहले ही कार्यकारिणी से इस्‍तीफा दे चुका हूं – लिहाजा मैं बैठक में नहीं था। (बाद में किस्‍सा पता चला कि कार्यकारिणी समिति में मृणाल पांडे हैं और हिंदुस्‍तान के दिनों में विष्‍णु नागर उनके मातहत हुआ करते थे। उन्‍होंने वीएन राय को कहलवाया कि मैं पसंद नहीं करूंगी कि मेरा मातहत कार्यकारिणी की बैठक में मेरे बराबर बैठे। यह संदेश नागर जी के पास गया, तो उन्‍होंने कार्यकारिणी समिति से अलग होने का फ़ैसला लिया।)

कृष्‍ण कुमार से बात नहीं हुई – लेकिन पता चला कि उन्‍होंने सहमति दी है। गंगा प्रसाद विमल से बात हुई तो उन्‍होंने बताया कि अनिल चमड़‍िया की पात्रता में कमी थी। यह अजीब विडंबना है कि अनिल चमड़‍िया जैसे संघर्ष और न्‍याय के प्रति कमिटेड शिक्षक-पत्रकार को पात्रता के आधार पर बर्खास्‍त करने का फ़ैसला ले लिया गया। वह भी कृष्‍ण कुमार जैसे शिक्षक के रहते हुए, जो पोथी से ज्‍यादा समाज और लेक्‍चर से ज्‍यादा लय और खेत-खलिहान को ज्ञान की राह बताते आये हैं।

मामला दरअसल जातिवाद का है और कुछ नहीं। अभी दो दिनों पहले हिंदुस्‍तान अखबार में छपे आलेख गणतंत्र में छिपे हैं लोकतंत्र के बीज के लेखक विभूति नारायण राय ने मं गां अं हिं विवि वर्धा के अपने अब तक कार्यकाल में जितनी भी नियुक्तियां की हैं, उनमें नब्‍बे फीसदी भूमिहार हैं। इस वक्‍त जब अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने की खबर मिली है, उसी वक्‍त एक खबर यह भी आ रही है कि विभूति नारायण राय कवि आलोकधन्‍वा को विश्‍वविद्यालय का हिस्‍सा बना रहे हैं। यक़ीनन आलोकधन्‍वा एक बड़े और प्रभावशाली और विलक्षण कवि हैं – लेकिन विभूति नारायण राय की तरफ से उनके हिस्‍से का सच ये है कि आलोकधन्‍वा भूमिहार जाति से आते हैं। मुझे लगता है कि अनिल चमड़‍िया को निकाले जाने का मसला सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि न्‍याय से छेड़खानी का मसला है और इस एक मसले पर हिंदी समाज के सृजनधर्मियों-संस्‍कृतिकर्मियों को अपना प्रतिवाद दर्ज करना चाहिए। विभूति नारायण राय के प्रचारित उज्‍ज्‍वल चेहरे के पीछे छिपे जातिवादी, अन्‍यायी और दंभी आदमखोर को बेपर्दा करना चाहिए।
खैर… इसी मुद्दे पर सवालों की शक्‍ल में कुछ नोट्स पत्रकार दिलीप मंडल ने हमें भेजे हैं : अविनाश (मोहल्ला लाइव से साभार)

क्या अनिल चमड़िया का टर्मिनेशन अवैध है?


 दिलीप मंडल



पत्रकार, शिक्षक और सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ता अनिल चमड़िया की महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से नियुक्ति रद्द किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
सवाल 1 : क्या दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 13 जनवरी को हुई एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक के मीनिट्स (मीटिंग में हुई बातचीत का ब्यौरा) लिये गये थे?

सवाल 2 : क्या मीटिंग का ये ब्यौरा एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सदस्यों को मंजूरी के लिए भेजा गया? नियमों के तहत ये जरूरी है ताकि बैठक में शामिल सदस्यों को इस बात की विधिवत जानकारी मिल सके कि बैठक में क्या फैसले किये गये?

सवाल 3 : क्या एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में शामिल सभी सदस्यों ने मीटिंग का ब्यौरा अपनी मंजूरी या एतराज के साथ वापस कर दिया है?

(नोट – लगभग दो दशक की पत्रकारीय साख को दांव पर रखकर मैं ये कह रहा हूं कि मीटिंग में शामिल सभी सदस्यों ने मिनिट्स पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगायी है। कम से कम 28 जनवरी की रात 9.30 बजे तक की स्थिति तो यही है।)

सवाल 4 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल विश्वविद्यालय से जुड़े फैसले करने वाली, सबसे बड़ी संस्था है। ऐसे में इसकी बैठक में शामिल सदस्यों द्वारा मीटिंग के ब्यौरे को मंजूर किए जाने से पहले क्या अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का आदेश विश्वविद्यालय जारी कर सकता है?

सवाल 5 : क्या ये विधि के विपरीत नहीं है? क्या ये एक्जिक्यूटिव कौंसिल को बाइपास करना नहीं है?

सवाल 6 : एक्जिक्यूटिव कौंसिल की बैठक में मौजूद सदस्यों द्वारा मिनिट्स को मंजूर किए बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन ने क्या अनिल चमड़िया को निकालने का फैसला कर दिया और उसे तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया?

सवाल 7: क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में किसी तरह की हड़बड़ी में है? अगर हां तो इसकी वजह क्या है?

सवाल 8 : प्रोफेसर चमड़िया की नियुक्ति का मामला जब सेलेक्शन कमेटी के सामने आया था, तो क्या विश्वविद्यालय प्रशासन को उन मानकों की जानकारी नहीं थी, जिसके आधार पर प्रोफेसर की नियुक्ति होती है? ऐसी हालत में एक्जिक्यूटिव कौंसिल के सामने क्या वाइस चांसलर ने अपनी गलती स्वीकार की?

सवाल 9 : क्या ऐसी ही और गलतियां भी की गयी हैं? क्या ऐसे सभी मामलों में वही फैसला किया गया जो अनिल चमड़िया के मामले में किया गया?

सवाल 10 : क्या विश्वविद्यालय में उन मानदंडों के आधार पर कोई नियुक्ति नहीं हुई है, जिस आधार पर अनिल चमड़िया की नियुक्ति हुई है?

नीति और नैतिकता से इतर ये कुछ ऐसे सवाल है, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए, ताकि अकादमिक जगत में शुचिता कायम हो और अकादमिक स्वायत्तता कोरा शब्द बन कर न रह जाए।

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  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ विभूति नारायण राय और विश्वरंजन में क्या फर्क है ”

  2. By अशोक कुमार पाण्डेय on February 3, 2010 at 7:21 PM

    मैं अनिल जी का समर्थन करता हूं।
    हस्ताक्षर तो समर्थन पत्र पर पुस्तक मेले के दौरान कर ही चुका हूं।

    वी एन राय से यह उम्मीद नहीं थी!

  3. By Nikhil Srivastava on February 4, 2010 at 3:35 PM

    यकीन है कि अनिल जी को हटाकर विभूति जी ने गलत किया है. सवालों के जवाब तो मिलने ही चाहिए..ये वाकई शर्मसार करने वाली हरकत है..

  4. By Anonymous on February 7, 2010 at 5:11 AM

    अनिल चमड़िया का ये कहना कि वे दलित हैं, 100 फीसदी झूठ है। श्री चमड़िया पत्रकारिता में मौका पाने के लिए स्वयं को दलित कहते हैं। इनका तथाकथित दलित प्रेम भी एक स्वांग है क्योंकि अनिल जी और इनके परिवार को दलितों से कोई लेनादेना नहीं है। अनिल चमड़िया न जाति से और न कर्म से दलित हैं। बल्कि वे जाति से मारवाड़ी बनिया और बड़े व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनकी शिक्षा सासाराम में ही हुई है। अत: हर व्यक्ति इनके बारे में अच्छी तरह जानता है। इनका विवाह सासाराम शहर के बड़े वैश्य परिवार गिरीश चन्द्र जायसवाल की बेटी से हुआ है। जिनका शहर में दर्जनों मकान, मार्केट और व्यापार है। अन्य भाइयों और बहन की शादियां भी बड़े मारवाड़ी व्यापारी परिवार में हुई है। इनके परिवार के किसी भी दूर के रिश्तेदार का भी वैवाहिक सम्बंध किसी दलित परिवार से नहीं है। अनिल चमड़िया और उनके परिवार का एक संक्षिप्त परिचय-
    अनिल चमड़िया, पिता स्व. राम गोपाल चमड़िया, निवासी -हरे कृष्ण कॉलोनी, कंपनी सराय, थाना- सासाराम, जिला-रोहतास, बिहार, अपने पांच भाई और एक बहन में सबसे बड़े हैं। इनके अन्य भाइयों का नाम सुनील चमड़िया पेशे से चार्टर्ड एकाउटेंट, आलोक चमड़िया और अमित चमड़िया पेशे से पत्रकार और अशोक चमड़िया पारिवारिक गल्ले के व्यवसाय में हैं। बहन प्रीती चमड़िया का विवाह हो गया है। इनके परिवार का लगभग 30-35 वर्षों से गल्ला के थोक दलाली का व्यवसाय है, जिसे पूर्व में इनके पिता और अब भाई संचालित करते हैं। ये लोग मूलत: मध्य प्रदेश के सागर शहर के निवासी हैं। जो बाद में व्यवसाय हेतु सासाराम आ गए थे। इनका परिवार सासाराम शहर के बड़े व्यवसायी मारवाड़ी परिवारों में शुमार होता है। अनिल चमड़िया के चचेरे चाचा श्री मनोहर लाल जी अपने ननिहाल के धन पर सागर से सासाराम आए। यहां आकर इन्होने अपनी सरनेम चमड़िया की जगह पोद्दार लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि इनके ननिहाल का उपनाम पोद्दार था। मनोहर लाल जी चूंकि अपने ननिहाल के घर पर आए तो इन्होंने अपना उपनाम पोद्दार रख लिया। परन्तु अनिल चमड़िया के पिता ने अपना मूल मारवाड़ी उपनाम चमड़िया बरकरार रखा। जो आज तक चला आ रहा है। श्री अनिल चमड़िया के दादा का नाम महावीर प्रसाद चमड़िया था, जो म.प्र. के सागर शहर में व्यवसाय करते थे। बाद में सासाराम आने से पहले इनके पिता और चाचा ने वहां की संपति बेच दी। आज श्री चमड़िया के परिवार के पास शहर और उसके आसपास करोड़ों का व्यवसाय पत्रकारिता के धौंस पर बखूबी चलता है। इनके और इनके भाइयों के पत्रकारिता की धौंस हमेशा इन लोगों के व्यवसायिक हितों के काम आई है।
    चमड़िया के सरनेम वाले श्री सीताराम चमड़िया कांग्रेस के जमाने में बिहार सरकार के मन्त्री हुआ करते थे। जो मारवाड़ी बनिया थे। अनिल जी शायद देश के पहले स्वघोषित दलित हैं, जिन्होंने दलित जुमले का इस्तेमाल अपने पत्रकारिता के करियर को चमकाने में किया है। लेकिन श्री चमड़िया पहले शख्स होंगे, जो गैर दलित होते हुए दलित के नाम पर सहानुभूति लेते हैं। मैं पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ इनके तहसील का ही निवासी हूं। इसलिए इनसे जुड़ी हुई सारी जानकारी आप लोगों के सामने रख रहा हूं। इनके दलित होने और दलित प्रेम का खुलासा करना अभी बड़ा मौजूं था क्योंकि मैं भी बेसब्री से इस वक्त का इन्तजार कर रहा था। आशा है आपको यह तहकीकात अच्छी लगेगी।
    रमेश पराशर
    पत्रकार

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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