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बीच सफ़हे की लड़ाई

भारतीय गणतंत्र और युवा

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/28/2010 07:17:00 PM

कोपेनहेगन में पर्यावरण पर चिंता, देश में मंहगाई पर चिंता , थ्री इडियट के मनोरंजन और ज्योति बसु के निधन से अचानक हम देश के 61वें गणतंत्र दिवस पर चले आये हैं। यदि नजर दौड़ायें, तो साफ हो जाता है कि खनिज संपदा से भरपूर इस देश में गणतंत्र के सभी मायने बेकार साबित हो रहे हैं। आजादी तो मिली , लेकिन यहां के लोग आज भी मूलभूत समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं ,देश के गर्व, अपनी पहचान, उमंग, उत्साह के दिवस पर मात्र एक दिन का विभिन्न शासकीय स्तर पर कार्यक्रम, मीडिया में देशभक्ति पर हल्का-फुल्का शोरगुल। क्या करें आज के युवा पीढ़ी को इसके मायने और महत्व ठीक से नहीं पता। 15अगस्त को हम आजाद हुए और 26जनवरी को भारतीय संविधान में टांग दिए गए। कुछ लोगों के लिए यह स्वतंत्रता, स्वाधीनता और स्वशासन को आगे बढ़ाता एकदिवसीय शब्द सा हो गया है। बहरहाल असल मायने जो भी हो आज के हालात में उसके मायने और उपयोगिता बदलती जा रही है। असल में आज का युवा वर्ग ऐसे कार्यक्रम में आना नहीं चाहता । उसके लिए यह एक छुट्टी का दिन भर रह गया  है। गणतंत्र दिवस की भावना से कितने प्रतिशत लोग जुड़े हैं। पूर्व संध्या पर वह राष्ट्रपति का भाषण भी नहीं सुनता। परेड को प्राइवेट चैनल दिखाना नहीं चाहते और मस्ती में डूबा युवावर्ग राष्ट्रीय चैनल का बटन कम दबाता है। आजादी के बाद से 2010 तक के सफर में युवा वर्ग की संवेदना इस तरह से कुंद हुई है कि वो देश के लिए अपनी वह भावना नहीं रख पाता है जो हमारे देश में महान् राष्ट्रवादियों के दिल में बसती थी , अगर विश्लेषण किया जाये तो उसके कई कारण है राजनीतिक ,आर्थिक और सामाजिक। ज्ञान का जिस तरह से व्यावसायीकरण हुआ है, स्कूल-कॉलेजों में गणतंत्र दिवस की रौनक गायब होने लगी है। आज देश का युवा पढ़ने या नौकरी करने के लिए बाहर जाने के लिए आकुल -व्याकुल है। पढ़ने के लिए या नौकरी करने के लिए जब मौका मिले तब। ऐसी नयी युवा पीढ़ी के लिए गणतंत्र दिवस के नए मायने तलाशने होंगॆ। इतिहास के बारे में हमें यह पढ़ाया जाता है कि अंग्रेज भी ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में व्यवसाय करने के लिए भारत आये थे। अर्थात आर्थिक व्यवस्था के प्रसारक द्वारा ही राजनीति गुलामी का बीजारोपण हुआ था। मगर हम फिर भी सचेत नहीं कि दूसरी आर्थिक शक्तियां हमें गुलाम बनाने की ओर अग्रसर हो रही हैं। अब अधिकांश राजनीतिक शक्तियां व्यावसायिक घरानों के हाथों नियंत्रित होती हैं। लगता है कि मानो देश को कुछ चंद व्यावसायिक घराने चला रहे हों। कई फैसले तो इनके हितों को देखकर किए जाते हैं। आज दैनिक जीवन की मूलभूत भौतिक चीजों पर नियंत्रण व्यावसायिक घराने के हाथों में है। क्या इन नये महाराजाओं के लिए गणतंत्र दिवस का कोई महत्व है ? शायद नहीं । उनका बस एक ही उद्वेश्य है मुनाफा कमाना। इन्होंने समाज की हर महत्वपूर्ण चीजों पर अपना कब्जा कर लिया है और अब साझेदारी भी करने लगे हैं। ऐसे माहौल मे क्या गणतंत्र दिवस के नये मायनों की तालाश नहीं होनी चाहिए ? गणतंत्र दिवस में पुरानी बातों का राग अलापना एक डयूटी-सी लगती है जिसमें 50-.60 साल पहले की यादें शामिल हैं।  हमें अब राष्ट्र व गणतंत्र के नये पैमाने, नयी मंजिलें, नयी सोच, नयी चीजें समझनी और विकसित करनी होगी। हर नये युग में बहुत दिनों तक पुराने को बनाये रखना संभव नहीं। यहां अच्छे और बुरे की बेवजह की बहस में पड़ने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि इतिहास सदैव अपने अंदर सब कुछ समेटते हुए आगे बढ़ता हुआ चला जाता है, रुकता नहीं। कुछ वर्षों पूर्व तक कर्ज को गलत घोषित करने वाले समाज में जब लोन सर्वाधिक प्रचलित हो तो लोगों को देश व स्वतंत्रता की नयी रेखाएं भी तय कर लेनी चाहिए।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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