हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि लाने का पाखंड

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/04/2010 04:44:00 AM


प्रमोद भार्गव
विषमता की बुनियाद पर सीना ताने खड़ा आर्थिक विकास देश की बढ़ी आबादी को लगातार खाद्य असुरक्षा के घेरे में धकेल रहा है। हाल ही में जर्मन और आयरिश की संस्थाओं ने दो अध्ययन किए हैं, जिनमें उजागर हुआ है कि 84 देशों के 'वैश्विक भूख सूचकांक' में भारत 65वीं पायदान पर है। मसलन भारत भूख, कुपोषण और बाल मृत्युदर जैसी चुनौतियोें का सामना करने में लगातार पिछड़ता जा रहा है।
इस हकीकत से रूबरू होने के बावजूद देश में ऐसी नीतियां अमल में लाई जा रही हैं जिससे कंपनियों के कारोबार फलें-फूलें और आम आदमी अपने पारम्परिक रोजगार-धंधों से लगातार वंचित होकर भूख की लाचार अवस्था में पहुंच जाए। इस बदतर हालात के बरक्स एक ओर तो कंपनियों को करों में रियायतें दी जा रही हैं, वहीं नरेगा और गरीबों को राशन की छूट दिए जाने वाले मदों की धनराशि घटाई जा रही है।  वैश्विक हित पोषण की यह विरोधाभाषी आर्थिकी भूख के संकट को और बढाने वाली है।
पूंजीवादी ताकतों ने प्राकृतिक संपदा का अकूत व निर्मम दोहन कर प्रकृति को तो संकट में डाल ही दिया है, इंसान को भी दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल कर दिया है। करीब सैंतीस देश भूख के इतने जबरदस्त संकट से गुजर रहे हैं कि इनमें से तेरह देशों की आबादी तो रोटी के लिए सड़कों पर उतर आई है। भारत में अनाज, दाल व तिलहन को सट्टा बाजार का हिस्सा बना दिए जाने से जहां महंगाई आसमान छू रही है, वहीं खेती लगातार घाटे का सौदा बनी रहने के कारण हर साल बीस हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसी विकट त्रासदी के बावजूद हमारी नीतियां ऐसी बनाई जा रही हैं जिनके बूते कंपनियों को लूट की कानूनी छूट मिले।
देश की 66 से 70 प्रतिशत आबादी की निर्भरता कृषि आधारित है, लेकिन देश की सकल आय में इस आबादी का हिस्सा केवल 17 फीसदी है। इसके विपरीत निजी कंपनियों की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होने के बावजूद वे देश की सकल आय में 33 प्रतिशत का दावा करती हैं। इसके अलावा करों और खनिजों वाली आय पर 55 प्रतिशत दावा सरकारी अधिकारी व कर्मचारियों का है। बावजूद इसके कंपनियों को करों में राहत व कर वसूली में ढिलाई दी जा रही है। 2008-09 में केंद्र सरकार द्वारा कंपनियों को 4 लाख 18 हजार 95 करोड़ का राजस्व करों में कानूनी खानापूर्ति कर छूट दे दी गई। यही उदारता अपनाते हुए 2007-08 में 48 प्रतिशत और 2006-07 में 50 प्रतिशत करों में छूट दी गई।
इसके उलट एक ओर तो केंद्र सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना नरेगा को पूरे देश में लागू करने का दावा कर सस्ती व झूठी लोकप्रियता बटोर रही है, वहीं कंपनियों को करों में दी गई छूट की तुलना में नरेगा को मात्र 39 हजार करोड़ रुपए और सस्ते राशन पर मात्र 55 हजार करोड़ रुपए का ही प्रावधान रखा गया है। जबकि कंपनियों को दी गई छूट जनकल्याण योजनाओं के मद में किए जाने वाले खर्च की तुलना करीब चार गुना अधिक है।
छूट के बाद जो कर तय किए जाते हैं उनकी पूरी वसूली भी सरकार कंपनियों से नहीं कर पा रही है। 2005-06 में बकाया कर राशि 90 करोड़ 255 लाख 88 हजार करोड़ रुपए थी, जो 2006-07 में बढ़कर 99 करोड़ 293 लाख 4 हजार करोड़ रुपए हो गई। संसद के वर्षा सत्र में देश को जानकारी दी गई कि देश के 100 प्रमुख बकायादारों पर 1.41 लाख करोड़ रुपए कर के रूप में बकाया हैं। कंपनियों के आर्थिक हित साधक ये उपाय वास्तव में आर्थिक विषमता बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
1984 तक खाद्यान्न उत्पादन वृध्दि की दर जनसंख्या की वृध्दि दर से अधिक रही। इसलिए देश की समूची आबादी को अनाज की आपूर्ति होती रही, लेकिन इसके बाद औद्योगीकरण और भूमण्डलीकरण की आई बाढ़ खेती के लिए उपयोगी जमीन और सिंचाई के पानी को कब्जाती चली गई। नतीजतन वर्तमान में कृषि भूमि का रकबा घटकर सिर्फ बारह करोड़ हेक्टेयर रह गया। कालांतर में लगातार आती जा रही पानी की कमी ने भी सिंचित कृषि भूमि का रकबा घटा दिया। वैसे भी हमारी साठ प्रतिशत कृषि भूमि हमेशा मानसून पर निर्भर रही है।
इन हालातों के दुष्परिणाम ये निकले कि कृषि उत्पादन में कुछ समय तो स्थिरता रही, लेकिन अब गिरावट के आंकड़े दर्ज किए जा रहे हैं। जो खाद्यान्न उपलब्धता 1991 में प्रति व्यक्ति 510 ग्राम थी, वह घटकर 2007-08 में 440 ग्राम रह गई। जर्मन और आयरिश अध्ययनों के पहले भी भारत की वैश्विक भूख सूचकांक में स्थान 119 विकासशील देशों की सूची में 96वें अनुक्रमांक पर था। इस सूची की तासीर यह है कि इसमें जिस देश का स्थान जितना नीचे होता है उस देश की आबादी उतनी ही भूख से ग्रसित मानी जाती है।
हालांकि हमारे देश में खाद्यान्न की उपलब्धता की उतनी कमी नहीं है, जितनी दुनिया के इन सैंतीस देशों में है, जिनमें भूख से लाचार लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। ऐसा इस साल दुनिया में कृषि पैदावार में साढ़े तीन प्रतिशत की गिरावट दर्ज किए जाने के कारण हो रहा है। जबकि हमारे यहां मौजूदा हालातों में भूख की कृत्रिम स्थिति अनाज व दालों को सट्टा बाजार के हवाले करने, राशन वितरण में पर्याप्त भ्रष्टाचार जारी रहने और निजी कंपनियों द्वारा आर्थिक विषमता के हालात निर्मित कर दिए जाने के कारण हुई है।
अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने भी स्वीकारा है कि भारत की आबादी के कुछ हिस्से जीवन-यापन की बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं तो इसलिए नहीं कि उन वस्तुओं की कमी है, बल्कि इसलिए कि सरकारी और निजी व्यवस्थाएं उन वस्तुओं के अभावग्रस्तों तक पहुंचने नहीं देतीं। यही कारण है कि गरीब को एक रुपए का लाभ पहुंचाने के लिए सरकार को 3 रुपए 65 पैसे अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। तिस पर भ्रष्टाचार की विडम्बना भी प्रभावी रहती है।
ऐसे ही हालातों के चलते गरीबी रेखा की सूची में वंचितों की संख्या घटने की बजाए बढ़ती जा रही है। अनाज को जैविक ईंधन में इस्तेमाल किए जाने के जो प्रयोग शुरू हुए हैं, उनके तई मानवतावादी आगाह कर रहे हैं कि 29 करोड़ लोगों का रोजगार खतरे में आएगा और भूखों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी। अभी भी हमने आर्थिक विषमता बढ़ाने वाले कारकों पर अंकुश नहीं लगाया तो हालात बेलगाम होंगे, नतीजतन देश में अराजकता व हिंसा का माहौल गरमाएगा।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ कार्पोरेट कल्चर से समृद्धि लाने का पाखंड ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on January 4, 2010 at 5:07 AM

    व्यवस्था जिस मार्ग पर जा रही है देश में अराजकता व हिंसा तो बढ़नी ही है। समस्या यह है कि जनता को इस व्यवस्था के विरुद्ध गोलबंद करने के लिए भी कोई विश्वसनीय नेतृत्व सामने नहीं आ रहा है।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें