हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

किसे इडियट बना रहे हैं आमिर खान!

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/21/2010 05:45:00 PM

 पुण्य प्रसून वाजपेयी



हैलो, जी आमिर खान आपको इन्वाइट कर रहे हैं। इंटरव्यू देने के लिए। आप तो जानते हैं कि आमिर खान देश भ्रमण कर रहे हैं। जी.... '3 इडियट्स' को लेकर। हाँ, रविवार को वह चेन्नई में होंगे....तो आपको चेन्नई आना होगा। आप बीस दिसंबर यानी रविवार को चेन्नई पहुँच जाइए। वहीं आमिर खान से इंटरव्यू भी हो जाएगा। आमिर रविवार को तीन बजे तक चेन्नई पहुँचेंगे तो आपका इंटरव्यू चार बजे होगा। आप उससे पहले पहुँच जाएँ। और हाँ... आमिर




खान चाहते हैं कि इंटरव्यू के बाद आप तुरंत दिल्ली ना लौटें बल्कि रात में साथ डिनर लें और अगले दिन सुबह लौटें। तो आप कब पहुँचेंगे। अरे अभी आपने जानकारी दी... हम आपको कल बताते हैं, क्या हो सकता है। नहीं-नहीं आपको आना जरूर है, हम केवल पाँच जर्नलिस्ट्स को ही इन्वाइट कर रहे हैं और आमिर खासतौर से चाहते हैं कि आप चेन्नई जरूर आएँ। ठीक है कल बात करेंगे।.....तभी बताएँगे।


फोन पर बात खत्म हुई और दिमाग में '3 इडियट्स' को लेकर आमिर खान के देश भ्रमण से जुड़े न्यूज चैनलों पर रेंगने वाली तस्वीरें घुमड़ने लगीं। आमिर, जिसकी अपनी एक इमेज है। ऐसी इमेज जो बॉलीवुड में दूसरे नामी कलाकारों से उन्हें अलग करती है... जो सामाजिक सरोकार से भी जुड़ी है। मेधा पाटकर के आंदोलन को नैतिक साहस देने वाले आमिर खान बिना कोई मुखौटा लगाये पहुँचे थे। अच्छा लगा था। लेकिन जेहन में बड़ा सवाल यही था कि बनारस की गलियों में अपनी माँ के घर को ढूँढ़ते आमिर खान को चेहरा बदलने की जरूरत क्यों पड़ी। मुँह में पान। गंदे दाँत। शर्ट और हाफ स्वेटर......कांख में बाबू टाइप बैग को दबाये आमिर कुछ इस तरह आम लोगों के बीच घूम रहे थे, जैसे वह बनारसी हो गये या फिर बनारस की पहचान यही है। जबकि मध्य प्रदेश में चंदेरी के बुनकरों की बदहाली में उन्होंने करीना कपूर का तमगा जड़ बुनकरों की हालत में सुधार लाने के लिए लोकप्रिय डिजाइनर सव्यसाची मुखर्जी से भी संपर्क किया। कहा गया है कि आमिर बुनकरों के संकटों को समझ रहे हैं। वहीं कोलकाता में सौरभ गांगुली के घर के दरवाजे के बाहर किसी फितरती.....अफलातून......की तरह नजर आए आमिर। पंजाब में एक विवाह समारोह में दुल्हे के माँ-बाप के साथ एक ही थाली में टुकड़ों को बाँटते हुए हर्षोल्लास के साथ खुशी बाँटते नजर आये। बनारस के रिक्शे वाले की समझ हो या चंदेरी के बुनकर या फिर पंजाब के बरातियों की समझ.....सब यह मान रहे थे कि आमिर उनके बीच उनके हो गये। फिर आमिर को चेहरा बदलने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या आमिर का नजरिया वर्ग-प्रांत के मुताबिक लोगों के बीच बदल जाता है। या फिर आमिर पहले मुखौटे से इस बात को अवगत कराते हैं कि मैं आपके बीच का सामान्य व्यक्ति हूं जो आप ही के प्रांत का है। लेकिन उसके बाद अपनी असल इमेज दिखाकर वह अचानक विशिष्ट हो जाते हैं। जैसे झटके में उनके रंग में रंगा व्यक्ति आमिर खान निकला। अगर आखिर में बताना ही है कि मैं आमिर खान हूँ तो फिर मुखौटा ओढ़ने की जरूरत क्यों।


कह सकते हैं यह '3 इडियट्स' के प्रचार का हिस्सा है और इसे इतने गंभीर रूप से नहीं देखना चाहिए। लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है कि जो दबे-कुचले लोग हैं। जो व्यवस्था की नीतियों तले अपने हुनर को भी खो रहे हैं। जिनके सामने दो जून की रोटी का संकट पैदा हो चुका है। जिनके लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं है और राजनीति में वोट बैंक के प्यादे बनकर यही लोकतंत्र के नारे को जिलाये हुए हैं तो क्या वाकई आमिर खान की पहल उनकी स्थिति बदल सकती है। या फिर आमिर की इमेज में इससे सामाजिक सरोकार के दो-चार तमगे और जुड़ जाएँगे। यह सारे सवाल जेहन में रेंग ही रहे थे कि मुंबई का नंबर फिर मोबाइल पर चमका। और आमिर खान के इंटरव्यू का निमंत्रण दोहराते हुए इस बार कई सुविधाओं भरे जवाब जो सवाल का पुट ज्यादा लिए हुए थे.....दूसरी तरफ से गूंजे। आपके रहने की व्यवस्था चेन्नई से डेढ़-दो-घंटे की रनिंग बाद फिशरमैन्स क्लब में की गयी है। यह बेहद खूबसूरत जगह पर है। चेन्नई से महाबलीपुरम की तरफ। आपके कैमरापर्सन की भी ठहरने की व्यवस्था हम कर देंगे। आप उनका नाम हमें बता दें। जिससे उनकी भी व्यवस्था हो जाये। मैं सोचने लगा जब 'आज तक' शुरू हुआ था तो एसपी सिंह अक्सर कहा करते थे कि कहीं किसी भी कार्यक्रम को कवर करने जाना है, तो कंपनी के पैसे से जाना है। किसी की सुविधा नहीं लेनी है। और नेताओं का मेहमान तो बिलकुल नहीं बनना है। इतना ही नहीं जब 'आज तक' न्यूज चैनल के रूप में सामने आया तो भी मैंने उस दौर में इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर और 'आज तक' के मालिक अरुण पुरी को भी मीटिंग में अक्सर कहते सुना कि किसी दूसरे का मेहमान बनकर उससे प्रभावित होते हुए न्यूज कवर करने का कोई मतलब नहीं है। इससे विश्वसनीयता खत्म होती है। और बाद में न्यूज हेड उदय सिंह बने तो उन्होंने भी इस लकीर को ही पकड़ा कि न्यूज कवर करना है तो अपने बूते। कहीं डिगना नहीं है। कहीं झुकना नहीं है। और विश्वसनीयता बरकरार रखनी है।

लेकिन फोन पर मुझे आमिर खान के साथ डिनर का न्यौता देकर लुभाया भी जा रहा था। लेकिन आप हमें क्यों बुला रहे है... हम कैसे '3 इडियट्स' का प्रचार कर सकते हैं। आपको प्रचार करने को कहाँ कह रहे हैं। आप जो चाहे सो आमिर खान से पूछ सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि आमिर जिस तर्ज पर बनारस से चेन्नई तक को नाप रहे हैं, उससे वहाँ के दर्द को भी '3 इडियट्स' में लपेट रहे हैं। सबकुछ प्रचार का हिस्सा है तो हम कैसे इसमें शरीक हो सकते हैं। यह आप कैसे कह सकते हैं... आमिर खान चंदेरी नहीं जाते तो कौन जानता वहां के बुनकरों की बदहाली। मेरा दिमाग ठनका... यानी आमिर चंदेरी गये तो ही देश जान रहा है चंदेरी के बुनकरों की बदहाली। क्या आप जानते हैं कि देश के पैंतीस लाख से ज्यादा बुनकर आर्थिक सुधार तले मजदूर बन गये। जो देश के अलग-अलग शहरों में अब निर्माण मजदूरी कर रहे हैं। सही कह रहे हैं आप चंदेरी का मामला सामने आया तो बाकी संकट भी आमिर उभारेंगे। मुझे भी लगा फिल्मों का नायक यूँ ही नहीं होता... सिल्वर स्क्रीन की आँखों से अगर देश को देखा जाये और प्रधानमंत्री किसी नायक सरीखा हो जाये या फिर नायक ही सर्वेसर्वा हो जाये तो शायद देश में कोई संकट ही ना रहे। मुझे याद आया जब बलराज साहनी, 'दो बीघा जमीन' फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, तो उनसे पूछा गया कि किसानों की त्रासदी की तरफ क्या सरकार इस फिल्म के बाद ध्यान देगी? तो बलराज साहनी का जवाब था कि फिल्म उसी व्यवस्था के लिए गुदगुदी का काम करती है जो इस तरह की त्रासदी को पैदा करती है। इसलिए फिल्मों को समाधन ना मानें। यह महज मनोरंजन है। और मुझे चरित्र के दर्द को उभारने पर सुकून मिलता है। क्योंकि हम जिन सुविधाओं में रहते हैं उसके तले किसी दर्द से कराहते चरित्र को उसी दर्द के साथ जी लेना अदाकारी के साथ मानवीयता भी है।


बलराज साहनी से इतर अगर उत्पल दत्त की मानें तो मुंबई में वैसी ही फिल्म बनती है जैसे किसी जूते की फैक्ट्री में जूते। फिल्मकार और उसकी मार्केटिंग से जुड़े लोग कहते रहते हैं लोग ऐसी ही फिल्म चाहते हैं, जबकि हकीकत में लोगों को सांस्कृतिक पराभव के लिए परिचालित किया जाता है। कह सकते हैं कभी जो जगह साम्राज्यवादियों ने छोड़ी, सत्ताधारियों ने उस जगह को भरने का ही काम किया और फिल्मों के जरिए भी मुनाफे के उस खाली पडे़ तंत्र का सहारा फिल्मकारों ने ले लिया जिसे राज्य ने खाली छोड़ दिया। यानी सरोकार की परिभाषा झटके में बदल दी गयी। और धुआंधार प्रचारतंत्र ने जनता को सांस्कृतिक दिवालियेपन तक पहुँचा दिया। आमिर खान के तौर तरीके इस मायने में अलग हो सकते हैं कि वह फिल्म के प्रचार में ही सरोकार को मुनाफे में बदलना चाहते हैं। असल में तकनीक ने फिल्मों को सहारा सिर्फ फटाफट धंधा कर खुद को उद्योग में बदलने भर का नहीं दिया है, बल्कि न्यूज चैनलों से लेकर रेडियो जॉकी और इंटरनेट का एक ऐसा साम्राज्य भी दे दिया है जिसके आसरे धंधा चोखा भी हो जाए और मुनाफे का बंदरबांट कर हर कोई एक दूसरे की उपयोगिता से लेकर उसे जायज ठहराने में भी लगा रहे। यदि आमिर खान के इंटरव्यू के आमंत्रण से आगे का रास्ता है। यह रास्ता आपको रामगोपाल वर्मा की फिल्म 'रण' में नजर आ सकता है। फिल्म का नायक अमिताभ बच्चन न्यूज चैनलों के धंधे को समझता-समझाता दोनों है, लेकिन इस दौड़ में खुद भी धंधा कर निकल जाता है। मुश्किल यह है कि आमिर खान जिन सवालों को उठाते हुए अपनी फिल्म '3 इडियट्स' का प्रचार करते हैं, रामगोपाल वर्मा उन्हीं सवालों को उठाते हुए अमिताभ बच्चन के जरिए फिल्म ही बनाकर धंधा कर जाते हैं।


हर कोई कह सकता है कि खुले बाजार की थ्योरी तो यही कहती है कि जो चाहे अपना माल बेच लें... तरीका कोई भी अपना लें। लेकिन इसे महीन तरीके से समझने के लिए फिल्मों के बदलते रंग को समझना होगा जो वाकई सत्ताधारियों का अक्स है। नाच-गानों और फंतासियों के बीच नायक जब विलेन की जमकर मरम्मत करता है तो यह सिर्फ अच्छाई पर बुराई या पोयटिक जस्टिस भर का मसला नहीं होता बल्कि जीवन के लिए रोजमर्रा की समस्या पर पर्दा डालने तथा जनता को उसी परीलोक में झोंक देने की चाल भी होती है। जिसमें सारे अन्याय का इलाज है हीरो का मुक्का। जिसके लगते ही खलनायक का हृदय परिवर्तन होता है और वह गरीब-गुरबा की मदद करने लगता है। यही सवाल उठता है कि न्यूज चैनलों के धंधे को भी फिल्म 'रण' बताती है और '3 इडियट' का आमिर का प्रचार भी बुनकरो के सवाल को उठाता है। जबकि बुनकर का हुनर नायिका की गोरी चमड़ी पर भी ठहर नहीं पाता। समाधान क्या है यह रास्ता तुरंत बताना मुश्किल जरूर है क्योंकि मेरे दिमाग में यह भी चल रहा था कि आमिर का इंटरव्यू नकार कर मैं कौन सा तीर मार रहा हूँ जबकि मैं भी तो न्यूज चैनल का हिस्सा हूँ। जो माध्यम धंधे में लिप्त है। ऐसे में यह सवाल भी उठेंगे कि यह भी प्रचार का ही हिस्सा है... जाहिर है यह सही है। लेकिन मामला माध्यम को चुनना भी है। इसे कहने के लिए टीवी न्यूज चैनल पर कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा रहा है बल्कि लघु पत्रिका के जरिए अपनी बात को रखना है। शायद रास्ता यही है कि जनता को जीतकर वापस लाना जरूरी है। व्यवसायिक रूप से भ्रष्ट उन लोगों के विरुद्ध मानव मस्तिष्क के लिए अनवरत संघर्ष जरूरी है जो पूरे मीडिया को नियंत्रित करते हैं और अखबारों, रेडियो तथा टीवी के माध्यम से लगातार झूठ और धोखे की बमबारी करते रहते हैं। इन सबके ऊपर है सरकार, जिसके सदस्य खुलेआम मध्ययुगीन अंधविश्वासों का प्रसार करते हैं जिसे लोकतंत्र का नाम भी दिया जाता है। इसे तोड़ने में संघर्ष तीखा और लगातार का है। जिसके लिए जरूरी है फिल्मों को फैशनेबुल समझ कर देखने वाले दिवालिया मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों के वोटरों में निवृत्त होने के बजाए वास्तविक जनता के पास जाया जाये। लेकिन तरीका '3 इडियट्स' या 'रण' का ना हो। जाहिर है इन सवालों के बीच मैं आमिर खान के इंटरव्यू के आमंत्रण पर क्या कहता...





दरअसल, आमिर के प्रचार की जिस रणनीति को अंगे्रजी के बिजनेस अखबार बेहतरीन मार्केटिंग करार दे रहे हैं, वो सीधे-सीधे लोगों की भावनाओं के साथ खेलना है। फिल्म के प्रचार के लिए लोगों की भावनाओं की संवेदनशीलता को धंधे में बदलकर मुनाफा कमाते हुए अलग राह पकड़ लेना नया शगल हो गया है। लेकिन, यहीं एक सवाल फिर जेहन में आता है कि यहाँ एक लकीर से ऊपर पहुँचते ही सब एक समान कैसे हो जाते हैं। चाहे वह फिल्म का नायक हो या किसी अखबार या न्यूज चैनल का संपादक या फिर प्रचार में आमिर के साथ खड़े सचिन तेंदुलकर। सोचा आमिर खान चेन्नई में क्या इंटरव्यू देते हैं और '3 इडियट्स' का कैसे प्रचार करते हैं, यह दूसरे न्यूज चैनलों को देखकर समझ ही लेंगे।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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