हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

साहित्य, समाज और नागरिक चेतना के चंद सवाल

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/20/2010 02:54:00 PM


एक लोकतांत्रिक समाज का नागरिक होने के नाते हम नागरिक चेतना, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों और लेखकीय दायित्व के भव्य सवालों के समक्ष खुद को पाते हैं। इसमें नागरिक कहां खड़ा है? लेखन क्या है? नागरिक चेतना और लेखन के आपसी सम्बंध क्या हैं? हमारे अपने समाज में लोकतन्त्र, लेखन और समाज के क्या रिश्ते हैं? उन्हें कैसा होना चाहिए? इन जटिल सवालों के सन्दर्भ में लेखक-संपादक पंकज बिष्ट का यह महत्वपूर्ण लेख। यह इस माह आजकल में प्रकाशित हुआ है। इसे लेखक की अनुमति से हाशिया पर साभार प्रस्तुत किया जा रहा है।




नागरिक चेतना और साहित्य पर बात करने से पहले नागरिक चेतना को समझ लेना आवश्यक है। नागरिक शब्द को अगर रूढ़ अर्थ में लें तो वह व्यक्ति को किसी एक राजनीतिक इकाई यानी राष्ट्र से जोड़ता है और इस तरह व्यक्ति की सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों को उसी इकाई तक सीमित कर देता है। इस सीमा में भी नागरिक होने का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होना है जो अपनी चेतना में आधुनिक, सहिष्णु और उदार है। वह जिस भूगोल और समाज में रहता है वह मात्रा उसकी जाति और धर्म के लोगों का बना नहीं होता बल्कि अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और यहां तक कि भौगोलिक सीमा में कई गुना ज्यादा व्यापक और विशाल होता है - देश विशेष की सीमाओं तक पहुंचा हुआ। इस अर्थ में कि वह उस देश की, जो कि एक भौगोलिक, राजनीतिक और आर्थिक इकाई है, सारी विविधता का प्रतिनिधित्व करता है।


कहा चाहे जो भी जाए, रचना और रचनाकार को लेकर मिथ चाहे जितने भी हों, सच यह है कि लेखन कोई आध्यात्मिक या मोक्ष की तलाश में की जानेवाली एकांतिक तपस्या नहीं है। वैसे तो तथाकथित आध्यात्मिक गतिविधियां भी सामाजिक स्थितियों से सीधा संबंध रखती हैं या कहिए उनका परिणाम हैं, इस पर भी कम से कम लेखन, फिर चाहे वह कितना भी व्यक्तिवादी क्यों न हो, अंततः एक सामाजिक प्राणि के रूप में व्यक्ति और उसके अपने समाज से संबंधों की तलाश होता है। लेखन की अक्सर सांसारिकता से जो असहमति नजर आती है वह कुल मिला कर एक बेहतर नयी दुनिया की तलाश ही होती है। वृहत्तर अर्थों में साहित्य, जो है और जो होना चाहिए, उसके बीच का पुल है। इसलिए अगर रचनाकार समाज को जानेगा ही नहीं तो फिर वह किस समाज से असहमति जाहिर करेगा और किस के सपने का निर्माण करेगा!


दूसरे शब्दों में कहें तो जितना सक्रिय पाठकीय संसार होगा उतना ही जागरूक और सचेत लेखक और उसका लेखन होगा। साहित्य और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है। न तो साहित्य समाज को समझे बगैर उसे कुछ सिखा सकता है, न ही कोई सीख दे सकता है। दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि कोई भी समाज साहित्य विहीन न होता है और न ही हो सकता है। साहित्य यानी रचनात्मकता मानवीय प्रकृति का अभिन्न अंग रही है जो कल्पनाशीलता की सक्रियता के माध्यम से विकास की प्रेरक शक्ति (मोटिवेटिंग फोर्स) के रूप में सदा विद्यमान नजर आती है। साहित्य को काफी हद तक सारे ज्ञान का प्रारंभिक बिंदु कहा जा सकता है क्यों कि मनुष्य की उत्सुकता, बेचैनी, रचनात्मकता, कल्पना और आकांक्षा इतने विस्तृत रूप में साहित्य में ही अभिव्यक्ति पाती है। निश्चय ही आज विज्ञान ने कल्पना के लिए बहुत जगह नहीं छोड़ी है पर रचनात्मकता का महत्व इस पर भी खत्म नहीं हो सका है क्योंकि मानवीय जीवन की संश्लिष्टता और जटिलता को कोई भी विज्ञान कभी व्याकख्यायित या सूत्रबद्ध शायद ही कर पाये।


साहित्य का अपने शाश्वत मूल्यों के कारण भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं को लांघ जाना एक सामान्य बात है, इस पर भी हर बड़ा रचनाकार कुल मिला कर समाज विशेष की ही देन होता है और उसी समाज विशेष की भाषा, संस्कृति, परंपराओं और इतिहास के दायरे में उसकी रचनात्मकता अभिव्यक्ति पाती है। इसलिए जिस साहित्य का अपने समाज से जितना आदान-प्रदान (इंटरेक्शन) हो रहा होगा वह साहित्य उतना ही जीवंत, संवेदनशील और प्रभावशाली होगा।


हम मौखिक साहित्य से कई गुना दूर आ चुके हैं। एक मायने में मौखिक परंपरा को श्रव्य और दृश्य के इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों ने पूरी तरह से आत्मसात कर लिया है। इसलिए इनके विकास ने एक नई ही दिशा ले ली है। आज कुल मिला कर साहित्य की जो सबसे जीवंत सक्रियता नजर आती है वह लिखित या मुद्रित शब्द के रूप में ही है। इसलिए किसी भी समाज में साहित्य की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि वह विकास की किस स्थिति में है। इसे जानना इसलिए भी जरूरी है कि साहित्य की लोकप्रियता या कहिए असर का संबंध उस समाज में शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक विकास की दशा से भी है। अगर समाज में साहित्य के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं है तो उसका असर, फिर चाहे वह चेतना में हो या भौतिक स्तर पर, कितना होगा समझा जा सकता है।


दुर्भाग्य से हिंदी समाज की स्थिति इस संदर्भ में कोई सुखद नहीं है। इसके कारण कई हो सकते हैं पर सबसे बड़ा कारण है शिक्षा की स्थिति। आज भी हिंदी समाज भारत के सबसे कम शिक्षित समाजों में है जहां साक्षरता आधी से ज्यादा शायद ही हो। साहित्य की सबसे बड़ी शर्त शिक्षा है और शिक्षा का न होना ऐसी बड़ी अड़चन है जो समाज को साहित्य से दूर रखती है। साहित्य अपने माध्यम के तौर पर अभी भी अपने परंपरागत रूप यानी मुद्रित सामग्री के तौर पर ही सबसे ज्यादा स्वीकार्य है। बल्कि कहना चाहिए अपने लिखित रूप में ही प्रचलन में है। गोकि साहित्य के रूपांतरण के कुछ अन्य माध्यमों, जैसे कि कथा-फिल्में और टीवी धारावाहिकों, के दबदबे से इनकार नहीं किया जा सकता पर साहित्य के रूपांतरण का यह सिलसिला कोई बहुत नया नहीं है और कुल मिलाकर अपने मूल रूप में नाटकों के निकट है जिसमें प्रौद्योगिकी की भूमिका अहम हो गई है। नाटक साहित्य की एक विधा के तौर पर सदा से स्वीकार्य रहा है। पर ये माध्यम कविता की बात हो छोड़िये कहानियों और आगे चल कर उपन्यासों तक का पर्याय नहीं बन पाया है। असल में हर माध्यम अपनी सीमा स्वयं होता है और जो माध्यम जितना स्थूल होगा उस माध्यम की सीमाएं भी उतनी ही स्पष्ट होंगी। निश्चय ही चाक्षुष माध्यमों ने मुद्रित शब्द के वर्चस्व को चुनौती ही नहीं दी है बल्कि उसके लिए 'स्पेस' का संकट भी खड़ा किया है पर यह साहित्य के विकल्प के तौर पर नहीं हो सका है बल्कि उसके घटिया स्थानापन्न, मनोरंजन के सतही साधन, के तौर पर ही नजर आ रहा है। कुल मिला कर शब्द की विराट और चमत्कारिक/ मायावी शक्ति अतुलनीय है।


हां, यह जरूर है कि साहित्य के अब तक के सबसे बड़े माध्यम किताब के विकल्पों की तलाश लगातार जारी है। इन प्रयत्नों को ऑडियो तथा ई-बुक के रूप में देखा जा सकता है। ऑडियो-बुक (सुनी जा सकनेवाली किताब) तो साहित्य के मूल चरित्र से मेल न खा सकने के कारण (साहित्य और वह स्वरों के माध्यम से?) स्वयं ही असफल साबित हो चुकी है। पर ई-बुक, जो कि मूलतः साहित्य के परंपरागत माध्यम शब्द का ही प्रौद्योगिकीय सशक्तीकरण है, की सफलता की संभावना से दुनिया भर का पुस्तक व्यवसाय सचेत जरूर हो गया है। अगर ई-बुक सफल होगी या पुस्तक के विकल्प के रूप में कोई और उपकरण सफल होगा तो मात्रा इसलिए कि वह शब्द के मूल रूप से छेड़-छाड़ न कर उसके संप्रेषण और वितरण को पुष्ट कर उसे ज्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश करेगा। इंटरनेट और इलैक्ट्रॉनिक की दुनिया के अन्य विकासों ने असल में पुस्तक के रूप में बदलाव को लगभग अनिवार्य कर दिया है और ई-बुक इसी का परिणाम है जिसने साहित्य के सबसे सशक्त माध्यम शब्द की उपस्थिति में सुधार कर उसे और सहज व सर्वव्यापी बना दिया है। ई-बुक शब्द का नहीं बल्कि शब्द के माध्यम - संयोजन, संग्रहण और वितरण - का विकल्प और विकास है। मात्र एक किताब का विकल्प नहीं बल्कि एक छोटा-मोटा पुस्तकालय है और इंटरनेट की सुविधा के कारण इसका असीमित विस्तार किया जा सकता है। मानव की अभिव्यक्ति की तलाश का सबसे पुरातन माध्यम होने के बावजूद शब्द अपनी प्रतीकात्मकता में कल्पना की जिन संभावनाओं से भरा होता है, उसका कोई विकल्प अब तक नहीं खोजा जा सकता है। जो भी हो यह इस बात का संकेत है कि शब्द की अनिवार्यता से साहित्य के लिए बच पाना शायद ही कभी संभव हो पायेगा।


पर दिक्कत यहां दूसरी है।


चाक्षुष माध्यम, जैसा कि कहा जा चुका है, कुल मिला कर आदमी के लिए मनोरंजन और आनंद का ज्यादा आसान और सतही माध्यम साबित होते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि वे लोगों के पास समय नहीं छोड़ते। नतीजा यह है कि साहित्य चूंकि एकाग्रता, चेतना और कल्पना के स्तर पर कहीं अधिक सक्रियता की मांग करता है, इसलिए अच्छे साहित्य के रसास्वादन के लिए किसी व्यक्ति और समाज को परिष्करण की एक सतत प्रक्रिया से गुजरने की अनिवार्यता होती है। इसे मोटे तौर पर आप रुचि परिष्करण की प्रक्रिया मान सकते हैं, जो सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के घटकों से तो निर्धारित होती ही है, निजी स्तर पर भी पहल और सक्रियता की मांग करती है। तुलनात्मक रूप से कठिन, यह प्रक्रिया आम आदमी को साहित्य की अपेक्षा टीवी व फिल्म की ओर ज्यादा आसानी से खींच ले जाती है। जहां तक हिंदी समाज का सवाल है उसमें साहित्य का प्रभाव कभी भी बहुत व्यापक नहीं रहा है। जब, पिछली सदी के मध्य तक, चाक्षुष माध्यम इतने प्रबल नहीं हुए थे, साहित्य का महत्व तो था पर प्रभाव तब भी सीमित ही था। आज भी इस समाज में साक्षर होने की प्रक्रिया ही चल रही है। पर दुर्भाग्य से अब उसके पास साहित्य रसिक समाज में बदलने के लिए आवश्यक समय नहीं रहा है। इसका परिणाम यह है कि उसमें साहित्य के प्रति रुचि और साहित्य का उस पर प्रभाव घटा ही है। एक अशिक्षित या अर्धशिक्षित समाज में चाक्षुष माध्यमों की भूमिका कम से कम साहित्य के लिए कुल मिला कर घातक ही साबित होती है।


यह वह पृष्ठभूमि है जिसे समझे बगैर हम अपने समाज पर यानी 'नागरिक' पर साहित्य के असर का मूल्यांकन नहीं कर सकते।


कुल मिला कर साहित्य की भूमिका एक बेहतर विवेकवान और नैतिक रूप से सशक्त व्यक्ति बनाने की होती है। दूसरी ओर नागरिक होने का अर्थ ही एक ऐसा व्यक्ति होना है जो अपनी चेतना में आधुनिक, सहिष्णु और उदार है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, वह जिस समाज में रहता है वह मात्रा उसकी जाति और धर्म के लोगों का बना नहीं होता बल्कि अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और यहां तक कि भौगोलिक सीमा में कई गुना ज्यादा व्यापक और विशाल होता है। इसीलिए किसी देश के निवासी को उस देश का नागरिक कहा जाता है।



असल में आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास मुश्किल से सौ साल पुराना है। पिछली सदी का लगभग आधा समय हिंदी साहित्य ने औपनिवेशिक दौर का सामना किया और तब वह अपनी सोच और चेतना में पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रतिनिधित्व करता था। प्रेमचंद, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, वृंदावनलाल वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा नवीन और दिनकर ऐसे प्रमुख रचनाकार हैं जिनकी रचनाओं में औपनिवेशवाद का तीव्र और सीधा विरोध देखा जा सकता है। दूसरी ओर वे लेखक जिनकी रचनाओं में ऐसा सीधा विरोध नहीं है जैसे कि जैनेंद्र या फिर छायावादी कवि पंत, महादेवी और निराला इस पर भी इन की रचनाएं मूलतः मानवीय गरिमा और उसकी मुक्ति की चेतना का ही प्रसार करती हैं। अपने समाज के प्रति प्रेम, संस्कृति व इतिहास के प्रति सम्मान, समानता और शोषण का विरोध इन रचनाओं का मुखय संदेश है। जरूरी नहीं है कि साहित्य को सीधे-सीधे ही अपनी बात कहनी चाहिए। यह वैसे भी सदा से विवाद का विषय रहा है कि क्या साहित्य का काम जनता को वृहत्तर स्तर (मास लेवल) पर उत्प्रेरित (मोटिवेट) करना ही है जो उसे तात्कालिक स्थिति पर तीव्र प्रतिक्रिया करने को उकसाती है या उसमें गहरे विवेक और चेतना को जगाना है जो हर स्थिति में सही-गलत का फैसला करने में सहायक हो। संभवतः सांस्कृतिक स्तर पर यह स्थिति ज्यादा ऊंची कही जा सकती है। दूसरी ओर पत्रकारिता ने अपने दो सौ साल के इतिहास में आधुनिक जीवन में एक ऐसे माध्यम के तौर पर जगह बनाई है जो जन चेतना और जनआंदोलन के लिए ज्यादा प्रभावशाली साबित हुआ है। इसलिए कम से कम रचनात्मक साहित्य से अब सीधे-सीधे जन चेतना और मास मोबिलाइजेशन की अपेक्षा का न तो औचित्य रहा है, न ही जरूरत। आज इस काम को मास मीडिया - फिल्म, रेडियो, टेलीविजन आदि - ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम देने में सक्षम है।


साहित्य का सरोकार मूलतः आधारभूत और शाश्वत मानवीय मूल्यों, विवेक व चेतना से होता है। टॉलस्टाय का उपन्यास युद्ध और शांति युद्ध के विरोध का संदेश देता है तो अपराध और दंड मानवीय मन की जटिलता को अपनी पूरी संश्लिष्टता में समक्षने में मददगार साबित होता है। यही मूल्यवत्ता देश और काल की सीमा लांघ कर पूरी मानवता के लिए संदेश बन जाती है।


साहित्य और कलाओं की देश-काल को लांघने की यह शक्ति अक्सर उसे सामाजिक और राजनीतिक सत्ता केंद्रों के आमने-सामने खड़ा कर देती है। जैसे कि यामा द हेल पिट में चित्रित वेश्याओं के नारकीय जीवन का चित्राण तत्कालीन रूसी शासकों और समाज की भर्त्सना भी है। इसी तरह चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों मे चित्रित तत्कालीन ब्रिटिश समाज कोई बहुत 'सकारात्मक' रूप में हमारे सामने नहीं आता। अंकल टाम्स कैबिन में अमेरिका के घिनौने नस्लीय यथार्थ से आप रूबरू होते हैं। साफ है कि कोई भी शासक इस तरह की आलोचना सुनने को आसानी से तैयार नहीं होता। पर इससे कहीं ऊपर ये रचनाएं मूलतः इस बात की ओर इशारा करती हैं कि आदमी और आदमी में कोई अंतर नहीं है। आदमी के द्वारा आदमी का शोषण और दमन अनैतिक है। सामाजिक असमानता अक्षम्य है। हम जानते हैं कि इस तरह के यथार्थ और सत्य के सामने आने से निहित स्वार्थी और सत्ताधारी वर्ग के हितों को नुकसान पहुंचता है और इस तरह साहित्य और समाज का टकराव सामने आता है।


समकालीन रचनाओं को लें तो दक्षिण अफ्रीकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित श्वेत लेखिका नादिम गार्डिमर की रचनाओं में वहां के समाज में फैली या कहना चाहिए वहां के तत्कालीन गोरे (योरोपीय) शासकों में फैली रंगभेद की नीतियों और अश्वेतों के दमन का जो चित्रा उभरता है वह सत्ताधारियों के लिए बैचनी का कारण बनता है। केन्या के कवि-लेखक केन सारोवीवा जिन्हें अपने देश के पर्यावरण और देशवासियों की आजीविका की रक्षा करने के पक्ष में खड़े हो जाने पर फांसी दे दी गई थी या फिर घाना के न्युगूगी वांग थो का सत्ता का विरोध करने के लिए निष्कासन और जेल तथा इंडोनेशियाई लेखक प्रमोदय अनंत तोर का दो दशक तक अपने ही शासक वर्गों द्वारा जेल में डाले रखना साहित्य के सरोकारों को बतलाता है। इन सब के साहित्य में मूलतः वही घटक महत्वपूर्ण हैं जिनके लिए युद्ध और शांति या फॉर हूम द बैल टॉल्स, डेविड कॉपर फील्ड, नाना, अन्ना केरेनिना, प्लेग, क्राइम एंड पनिशमेंट, गोदान, गोरा, झूठा सच, मैला आंचल, हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीट्यूड या और भी कोई रचना जानी जाती है। पर यह घटक कोई इतना समकालीन भी नहीं है। युद्ध और हिंसा आदिकालीन और सर्वव्यापी चिंताएं हैं। महाभारत और इलियड कमोबेश इसी एक चिंता के सरोकार की रचनाएं हैं।


समकालीनता साहित्य में किस तरह से अभिव्यक्त होती है इसे आजादी के बाद के हिंदी साहित्य से आसानी से समझा जा सकता है। इस दौर के रचनाकार की चिंताएं दूसरे रूप में अभिव्यक्त होती हैं। ये रचनाएं साहित्य की अपनी प्रतिबद्धताओं और सत्ताधारियों के अपने सरोकारों के बीच के टकराव को नये परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्ति देती हैं। इस मामले में यशपाल का उपन्यास झूठा सच विभाजन की विभीषिका को ही नहीं दर्शाता बल्कि उसकी अतार्किकता को भी रेखांकित करता है। रेणु का मैला आंचल आजादी के बाद भी स्थितियों में परिवर्तन न आने और ग्रामीण समाज की बेचैनी व बढ़ते राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी तो आजादी के बाद ग्रामीण समाज के विघटन, भ्रष्टाचार और पतन का दस्तावेज है। राग दरबारी ऐसा पहला उपन्यास है जो न्यायपालिका, शिक्षा की संस्थाओं और नौकरशाही में आ चुके भयावह पतन को पहली बार इतने बड़े पैमाने पर चित्रित करता है। सातवें और आठवें दशक की, और काफी हद तक आज की भी, हिंदी कविता सीधे-सीधे सत्ता से असहमति की कविता है। इसलिए जरूरी नहीं कि नागरिक चेतना पैदा करनेवाला साहित्य किसी सत्ता से, किसी समाज की परंपराओं और मान्यताओं से, फिर चाहे वे तात्कालिक हों या परंपरागत, सहमत हो ही।


साहित्य की राजनीतिक-सामाजिक संस्थानों से असहमति और टकराहट मूलतः एक बेहतर समाज और व्यवस्था की तलाश की ही प्रक्रिया है और उसका जाने-अनजाने सरोकार वृहत्तर मानवीय समाज है। जबकि सत्ता की प्रवृत्ति अक्सर यथास्थिति को बनाए रखना है जिससे कि उसे ज्यादा चुनौतियों का सामना न करना पड़े।


पर सत्ताओं को भी सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं किया जा सकता। असल में राजनीतिक सत्ताओं की जड़ें सामाजिक सत्ताओं में होती हैं और वहीं से वे ऊर्जा पाती हैं। ये सत्ताएं कई तरह से व्यक्ति और समाज के आगे बढ़ने में रुकावटें पैदा करती हैं। कहीं वे नस्लवाद के रूप में नजर आती हैं तो कहीं धार्मिक भेदभाव और घृणा के रूप में और कहीं जातिवादी या लैंगिक दमन के रूप में।


नस्लवाद का विरोध अगर टॉनी मोरिसन जैसे लेखकों ने किया है तो भारत में जातिवाद का विरोध पूरा एक आंदोलन लिए हुए है। धर्म के नाम पर जो टकराव हमें फिलस्तीनियों और यहूदियों में देखने को मिलता है वह कम भयावह नहीं है। महमूद दरवेश जैसे लेखकों ने उत्पीड़ित फिलिस्तीनी होने को अपनी रचनाओं में बखूबी अभिव्यक्त किया है।



लैंगिक भेदभाव आज दुनिया में एक बड़ा सवाल है। स्त्री-पुरुष की समानता का सवाल हमारे जैसे परंपरावादी समाज में काफी जटिलताएं लिए है। स्त्रियों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के अलावा जीवन साथी चुनने की आजादी, इस बंधन से मुक्त होने की आजादी, जैसे सवालों को समकालीन साहित्य में लगातार अभिव्यक्ति मिली है। महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, चंद्रकिरण सोनरेक्सा, मन्नू भंडारी से लेकर प्रभा खेतान तक न जाने कितनी ऐसी लेखिकाएं हैं जिनकी रचनाएं इस संघर्ष की अभिव्यक्ति हैं। पर मजे की बात यह है कि स्त्रियों के इस हक की लड़ाई में वे अकेली नहीं हैं। हिंदी का जितना भी लेखन है यानी पुरुषों का लिखा, वह मूलतः स्त्रियों के पक्ष में ही है। चाहें तो आप गुलेरी से लेकर प्रेमचंद, जैनेन्द्र, अज्ञेय, रघुवीर सहाय और मंगलेश डबराल तक किसी की रचना को देखें वे स्त्री स्वतंत्रता के पक्ष में नजर आयेगी।


इस लेख में अधिकांशतः हिंदी साहित्य के संदर्भ में नागरिक चेतना के सवालों को परखने की कोशिश की गई है पर इस मामले में हिंदी कोई अपवाद नहीं है। जो बातें हिंदी के संदर्भ में लागू होती हैं वही बातें अन्य भारतीय या दुनिया की अन्य भाषाओं के संदर्भ में भी यथावत देखी जा सकती हैं। स्त्री मुक्त के संदर्भ में बंगला के रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शरत चंद्र चट्टोपाध्याय को कौन भूल सकता है। इसी तरह स्त्रियों के अधिकारों पर वर्जीनिया वुल्फ, सिमोन द'बोउवा तस्लीमा नसरीन की रचनाओं का जो महत्व है उससे हम परिचित हैं ही।


इस तरह से आर्थिक-सामाजिक दमन के हर सवाल पर साहित्य लगातार यह चेतना फैलाने में मदद करता है कि बिना समानता व भय तथा उत्पीड़न मुक्त समाज के दुनिया बेहतर नहीं हो सकती।


प्रतिबद्धताओं और सरोकारों की सीमाओं की इस पृष्ठभूमि के चलते सत्ता या व्यवस्था के संस्थानों और साहित्य के बीच टकराव की संभावना सदा बनी रहती है। सत्ता द्वारा इस स्थिति को स्वीकार न करना, बल्कि दंडित करने की कोशिश करना आम बात कही जा सकती है, पर साहित्य का सरोकार सत्ताधारियों की आंख मूंद कर प्रशंसा न होता है और न ही होना चाहिए। जब भी और जहां भी ऐसा होता है साहित्य अपनी प्रासंगिकता और रचनाकार अपनी गरिमा खो देता है। वैसे जो सत्ताएं जितनी तानाशाह और बर्बर होंगी उनमें टकराव और असहिष्णुता की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। पाकिस्तान में फैज अहमद फैज का उत्पीड़न, बंग्लादेश में तस्लीमा नसरीन का उत्पीड़न और तुर्की में पामुक का उत्पीड़न इसकी विभिन्नता के उदाहरण हैं। पर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में जो उदारता, समक्षदारी, सहिष्णुता और प्रौढ़ता होती है उसमें साहित्य की असहमति को सदा सकारात्मक तरीके से लिया जाता है। बल्कि अक्सर उसकी तीव्र और आवेशमय असहमति और आलोचना को भी सहा जाता है। जो भी हो, सत्ता तानाशाह हो या फिर लोकतांत्रिक, साहित्य की अपनी भूमिका रहती है और जो साहित्य उसे नहीं निभाता अपने महत्तर उत्तरदायित्व से बचता है। इसलिए नागरिक चेतना का अगर कोई अर्थ साहित्य के संदर्भ में है तो यही है कि वह लोगों में ऐसी चेतना पैदा करे जो समानता, सहिष्णुता और शांति की दिशा में समाज को आगे ले जाने में सहायक हो।


अंत में हो सकता है शासक वर्ग के लिए या फिर राजनीतिक संदर्भों में नागरिकता का सवाल एक निश्चित राजनीतिक इकाई, यानी राष्ट्र और उसकी तात्कालिक सत्ता के संदर्भ में हो पर जहां तक साहित्य का सवाल है उसके लिए नागरिकता एक वृहत्तर, सर्वदेशीय और सर्वकालिक संदर्भ है। साहित्य की रचनाओं में हम इन्हीं मूल्यों के माध्यम से नये संसार और नए आदमी को रचने की कोशिश करते हैं।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ साहित्य, समाज और नागरिक चेतना के चंद सवाल ”

  2. By रवि कुमार, रावतभाटा on January 21, 2010 at 11:39 PM

    एक महत्वपूर्ण आलेख...

  3. By ak on January 25, 2010 at 1:27 AM

    dhanyawad bhai reyaz. lekh padhane ke liye.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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