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बीच सफ़हे की लड़ाई

...क्योंकि वह अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं है

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/18/2010 05:18:00 AM



नोबेल पुरस्कार ने शांति को लेकर ओबामा की वचनबद्धता को इतना मजबूत किया है कि अफगानियों के लिए उन्हों ने और अधिक सैनिक भेज दिए हैं. क्या है ये नोबेल की राजनीति और उसका अर्थशास्त्र, बता रहे हैं फिदेल कास्त्रो. अनुवाद साथी अभिषेक श्रीवास्तव का है.

एक नस्ली समाज में अफ्रीकी मूल का अमेरिकी होने के बावजूद चुनाव जीतने पर यदि ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिया गया है, तो इसके स्वाभाविक हकदार एवो भी हैं, भले ही वह उसी देश के हैं, लेकिन उन्होंने अपने वादे रखे हैं।
ऐसा पहली बार हुआ है कि दोनों ही देशों में वहां की जातियताओं के दो सदस्यों ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता है।
मैं कई बार कह चुका हूं कि ओबामा एक स्मार्ट व्यक्ति हैं और वह उसी सामाजिक और राजनीतिक तंत्र में पले-बढ़े हैं जिसमें वह आस्था रखते हैं। उनकी सदिच्छा है कि पांच करोड़ अमरीकियों को स्वास्थ्य सेवाएं मिलें, आसन्न संकट से अर्थव्यवस्था को बाहर निकाला जा सके तथा नरसंहार, युद्ध और शोषण के चलते बरबाद हो चुकी अमेरिका की छवि को सुधारा जा सके। वह अपने देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को बदलने के बारे में न तो सोचते हैं और न ही उनकी ऐसी कोई इच्छा है। जाहिर है वह ऐसा कर भी नहीं सकते।
शांति के लिए नोबेल पुरस्कार तीन अमरिकी राष्ट्रपतियों को मिल चुका है। इसके अलावा एक पूर्व राष्ट्रपति और एक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को भी मिला है। पहला, 1901 में चुने गए रूजवेल्ट को मिला था जो 1898 में क्यूबा में अमेरिकी हस्तक्षेप के चलते हमारी आजादी को बचाने के लिए आए थे। उनके पास घुड़सवार तो थे, लेकिन घोड़े नदारद थे।
दूसरे सज्जन रहे, थाॅमस वुडरो विल्सन, जिन्होंने  दुनिया का बंटवारा करने के लिए अमेरिका को युद्ध में झोंक दिया। जर्मनी पर वर्सेल्स की  संधि के माध्यम से बेहद प्रतिकूल स्थितियां थोपने वाले विल्सन ने फासीवाद के उभार और द्वितीय विश्व युद्ध की नींव रखी।
तीसरे सज्जन हैं, बराक ओबामा। 
कार्टर वह पूर्व राष्ट्रपति थे जिन्हें कुछ साल पहले नोबेल मिला। निश्चित तौर पर वह उन कुछेक अमेरिकी राष्ट्रपतियों में ही रहे जो अपने दुश्मन की हत्या का आदेश नहीं दे सकता, जैसा कि अन्य करते रहे हैं। उन्होंने पनामा नहर लौटा दी, हवाना में यूएस इंट्रेस्ट सेक्शन खोला, भारी बजटीय घाटे से देश को बचाया और रीगन की तरह सैन्य औद्योगिक प्रतिष्ठान के लाभ हेतु पूंजी से खिलवाड़ को रोका।
राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जिन्हें नोबेल मिला वह हैं, अल गोर। जलवायु परिवर्तन के परिणामों पर वह सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे अमेरिकी नेता हैं। राष्ट्रपति पद के वह उम्मीदवार थे, लेकिन जाॅर्ज बुश के फर्जीवाड़े का शिकार बन गए।
इस पुरस्कार के लिए चुनाव को लेकर लोगों का नजरिया काफी बंटा हुआ है। कई लोग इस अनपेक्षित परिणाम में अंतर्निहित जाहिर विरोधाभासों पर नैतिक दृष्टिकोण से सवाल उठा रहे हैं।
यदि किसी किए हुए काम के बदले यह पुरस्कार दिया जाता, तो शायद ये लोग ज्यादा संतुष्ट होते। नोबेल शांति पुरस्कार हालंाकि हमेशा ऐसे लोगों को नहीं दिया गया जो उसके लायक रहे। अक्सर यह असंतुष्ट और अराजक या इससे भी बदत्तर व्यक्तियों को दिया गया है। लेश वालेसा ने यह खबर सुनते ही कहा, ‘कौन? ओबामा? ये तो काफी जल्दी है। उन्हें तो कुछ करने का समय ही नहीं मिला।’
हमारे प्रेस में और क्यूबाडिबेट में भी कुछ ईमानदार क्रांतिकारी साथियों ने अपनी आलोचना प्रस्तुत की है। इनमें से एक ने लिखा, ‘जिस हफ्ते ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, उसी हफ्ते अमेरिकी सीनेट ने अपने इतिहास में सबसे बड़ा सैन्य बजट पारित किया- 626 अरब डाॅलर।’ एक अन्य पत्रकार ने टीवी पर कहा, ‘ओबामा ने आखिर किया क्या है कि उन्हें यह पुरस्कार मिले?’ एक और पत्रकार ने पूछा, ‘लेकिन अफगान युद्ध और लगातार बरसाए जा रहे बमों का क्या?’ जाहिर है कि ये सारे विचार सचाई पर आधारित हैं।
रोम में फिल्मकार माइकल मूर ने एक दिलचस्प टिप्पणी की, ‘बधाई हो राष्ट्रपति ओबामा आपको नोबेल शांति पुरस्कार के लिए; अब कृपया इसके लायक बनकर दिखाएं।’
मुझे लगता है कि ओबामा मूर की टिप्पणी से सहमत होंगे। वह इतने समझदार हैं कि इस मामले और परिस्थिति को समझ सकें। वह जानते हैं कि इस पुरस्कार के लायक अभी वह नहीं हैं। उसी दिन सवेरे उन्होंने कहा था कि उन्हें लगता है कि वह इतनी सारी प्रेरक हस्तियों के बीच खड़े होने के काबिल नहीं हैं, जिन्हें आज तक सम्मानित किया गया है।
कहा जाता है कि जो कमेटी नोबेल पुरस्कार देती है, उसमें पांच लोग होते हैं और सभी स्वीडिश संसद के सदस्य हैं। एक प्रवक्ता ने कहा कि ओबामा के नाम पर सर्वसहमति थी। पता नहीं पुरस्कार विजेता से इस बारे में बात की गई थी या नहीं, या कि उन्हें कोई पूर्व नोटिस देने से पहले ऐसा कोई फैसला लियसा जा सकता है क्या!
ओबामा को इस पुरस्कार की पहले से जानकारी थी या नहीं, इसके आधार पर हमारे नैतिकतावादी फैसले में अंतर आ सकता है। यही बात पुरस्कार देने वालों के बारे में भी कही जा सकती है।
यदि एक नोबेल पारदर्शिता पुरस्कार भी गठित कर दिया जाता, तो ठीक होता।
बोलीविया एक ऐसा देश है जहां तेल और गैस के भारी भंडार हैं और जहां प्राकृतिक लीथियम का बड़ा भंडार है, जो आज काफी मांग में है।
अपने छठें जन्मदिन से पहले एवो मोरालेस, जो कि एक लोकप्रिय किसान नेता है, अपने पिता के साथ एंडीज की पहाड़ियों में टहलने निकले थे। वह 15 दिनों तक चल कर उस बाजार तक पहुंचे जहां उन्हें बेच दिया गया ताकि उनके समुदाय के लिए भोजन खरीदा जा सके। इस अनुभव के बारे में मैंने एवो से एक सवाल पूछा था, जिसका जवाब उन्होंने कुछ यूं दिया था कि ‘उन्होंने हजार सितारा होटल के नीचे पनाह ली थी’; तारों से भरे निरभ्र आकाश का विवरण देने के लिए इससे खूबसूरत शब्द और क्या हो सकते हैं!
उनके बचपन के उन कठिन दिनों में उनके समुदाय के किसानों के पास सिर्फ एक काम हुआ करता था! वे अर्जेंटीना के जूजी प्रांत में गन्ने काटते थे, जहां एमारा समुदाय के कुछ लोग कटाई के सीजन में काम करने नियमित जाया करते थे।
एवो ने जिस जगह पर स्पानी की शिक्षा ली थी, वह ला हिगेरा से बहुत दूर नहीं थी, जहां 9 अक्टूबर 1967 को चे ग्वारा की हत्या कर दी गई थी। इसी महीने की 26 तारीख को 1959 में एवो पैदा हुए थे। वह एक कमरे में अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ रहते और उनका स्कूल यहां से करीब सवा तीन मील की दूरी पर था।
एवो हर कहीं पहुंच जाते थे, जहां उन्हें कोई अध्यापक मिलता था। अपनी इसी भागदौड़ से उन्हें तीन नैतिक शिक्षाएं मिलीं- झूठ मत बोलो, चोरी मत करो और कमज़ोर मत बनो।
तेरह बरस की उम्र में उनके पिता ने उन्हें सीनियर हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए सेन पेद्रो दे उरोरो भेजा। उनके जीवनीकारों में एक ने बताया है कि भौतिक विज्ञान और गणित के मुकाबले वह भूगोल, इतिहास और दर्शन में ज्यादा कुशाग्र थे। सबसे जरूरी बात यह थी कि स्कूल के पैसे चुकाने के लिए एवो भोर में दो बजे उठ जाते और बेकर, निर्माण मजदूर या जो भी  मिलता, वह काम करते थे। दोपहर में वह स्कूल जाते। उनके सहपाठी उनकी काफी बड़ाई करते और उनकी मदद करते थे। बचपन में ही वह अच्छे संगीतकार बन गए थे और उरोरो के एक प्रतिष्ठित बैंड में ट्रम्पेट बजाने लगे थे।
युवावस्था में वह अपने समुदाय की साॅकर टीम के कप्तान बने।
लेकिन एमारा समुदाय के इस गरीब शख्स  के लिए विश्वविद्यालय की पढ़ाई दूर की कौड़ी थी।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेना की सेवा की और पहाड़ों की चोटियों पर अपने समुदाय में वापस आ गए। गरीबी और प्राकृतिक आपदाओं के चलते उनका परिवार एल चपारे नामक जगह पर चला गया जहां उन्होंने एक छोटी सी जमीन हासिल की। तेईस बरस की उम्र में 1983 में उनके पिता गुज़र गए। उन्होंने इस ज़मीन पर खूब मेहनत की, श्रमिकों को एकजुट किया, मजदूर संगठन बनाया और उस जगह को भरा जहां तब तक सरकार की पहुंच नहीं थी।
पिछले पचास बरसों से बोलीविया में सामाजिक क्रांति की जमीन पक रही थी। आखिरकार 9 अप्रैल 1952 को विक्टर पाज़ एस्तोंसोरो के नेशनलिस्ट रेवल्यूशनरी मूवमेंट के नेतृत्व में क्रांति का आगाज़ हुआ। यह हमसे पहले की बात है। शोषक ताकतों की हार हुई और एमएनआर के हाथों में सत्ता आ गई।
कुछ सूत्रों की मानें तो क्रांति के उद्देश्य बोलीविया में अधूरे रहे गए जिनकी वजह से 1956 में इस प्रक्रिया में गिरावट आने लगी। 1 जनवरी 1959 को क्यूबा में क्रांति कामयाब हुई और तीन साल बाद हम ओएएस से आज़ाद हुए। मेक्सिको को छोड़कर अन्य सभी देशों ने क्यूबा से संबंध मजबूत किए।
अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में विघटन का असर बोलीविया पर भी पड़ा। वक्त बीतता गया, आज चालीस साल बाद बोलिवेरायाईक्रांति वेनेजुएला में भी हो चुकी है और मोरालेस और उनकी एमएएस आज बोलीविया की सत्ता में हैं।
इतने संपन्न अतिहास को कुछेक पन्नों में समेट पाना मुश्किल जान पड़ता है।
मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि मोरालेस ने दुष्ट और विश्वासघाती साम्राज्यवादी अभियानों पर विजय हासिल की है, बोलीविया की संप्रभुता की रक्षा की है और हजारों साल पुरानी लोगों की परंपराओं को सम्मान दिलवाया है।
ड्रग तस्करी का जानलेवा दुष्चक्र कम से कम बोलीविया, वेनेजुएला, इक्वेडर और क्यूबा जैसे आल्बा के क्रांतिकारी देशों को अपनी गिरफ्त में नहीं ले सका है। वे जानते हैं कि उन्हें अपने लोगों की शिक्षा, सेहत और भलाई के लिए काम करना है और वे ऐसा कर सकते हैं। उन्हें तस्करी से निपटने के लिए विदेशी टुकड़ियों की जरूरत नहीं।
एमारा समुदाय के राष्ट्रपति के नेतृत्व में बोलीविया अच्छा काम कर रहा है और उसे लोगों का समर्थन हासिल है।
तीन साल से कम की अवधि में निरक्षरता को दूर कर दिया गयाः 824,101 बोलीवियाई अब लिखना और पढ़ना जानते हैं; इनमें एमारा के 24,699 और क्वेश्वा के 13,599 लोग शामिल हैं। क्यूबा और वेनेजुएला के बाद बोलीविया तीसरा देश है जो निरक्षरता से मुक्त है।
यह देश उन करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं दिलवा रहा है जिन्होंने इसका नाम तक नहीं सुना था। यह दुनिया के उन सात देशों में है जहां पिछले पांच वर्षों के दौरान शिशु मृत्यु दर में सबसे ज्यादा कमी की गई है। मातृ मृत्यु दर में भी ऐसी ही कमी आई है। यहां 454,161 लोगों की आंखों की सर्जरी की गई है, जिनमें 75,974 लोग ब्राजील, अर्जेंटीना, पेरू और पैरागुए के हैं।
बोलीविया का सामाजिक कार्यक्रम का लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी हैः एक से आठवीं तक स्कूल जाने वाले हर बच्चे को अनुदान दिया जा रहा है। करीब 20 लाख बच्चे इससे लाभान्वित हो रहे हैं।
साठ साल की उम्र के सात लाख से ज्यादा  लोगों को करीब 342 डाॅलर सालाना का बोनस मिल रहा है।
हर गर्भवती महिला और दो साल से कम उम्र के बच्चे को करीब 257 डाॅलर का अतिरिक्त लाभ दिया जा रहा है।
गोलार्द्ध के तीन सर्वाधिक गरीब देशों में एक  बोलीविया ने राजकीय नियंत्रण में सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और खनिज संसाधनों को ले लिया है और हरेक प्रभावित व्यक्ति के हितों की भरपाई की जा रही है। यह देश काफी संभल कर आगे बढ़ रहा है क्योंकि यह पीछे नहीं जाना चाहता। मुद्रा भंडार लगातार बढ़ रहा है, और एवो के शासन में आने के बाद से यह तीन गुना से ज्यादा हो गया है।
काफी कम समय में बोलीविया ने बायोमीट्रिक चुनावी रजिस्टर बना लिया है और अब तक करीब 47 लाख मतदाताओं का नाम इसमें दर्ज किया जा चुका है।
दिसंबर की 6 तारीख को यहां चुनाव होने हैं। ज़ाहिर है, अपने राष्ट्रपति के लिए लोगों का समर्थन बढ़ेगा। उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को रोकने का किसी में दम नहीं।
तो सवाल उठता है कि उन्हें आखिर नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया?
मैं जानता हूं कि उनकी सबसे बड़ी कमी क्या हैः वे संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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