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बीच सफ़हे की लड़ाई

उदार आर्थिक नीति के युग में कांग्रेस

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/16/2010 07:35:00 AM

प्रभाकर चौबे

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की ''आधुनिक'' पार्टी है। भारतीय पुनर्जागरण के दौर में जब औद्योगिक क्रांति की हवा देश में मंद-मंद बहने लगी और यहां औद्योगीकरण अपने उदय की आहट दे रहा था उस काल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ।

इस तरह अपना बुर्जुआ चरित्र कायम रखते हुए आज कांग्रेस 125 साल की हो गई और औद्योगीकरण के प्रारंभिक दौर से गुजरते हुए वैश्विक नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की धरा में बहने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर खड़ी है। भाजपा ने जो जनसंघ का नया नाम-रूप है, और जो महज व्यापारियों की पार्टी कहलाती रही, अपनी नई आर्थिक नीतियां कांग्रेस से लिया। इसलिए कहा व माना जाता है कि कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियां एक सी हैं। और हैं भी। बहरहाल यहां कांग्रेस की बात करें। कांग्रेस के गठन में बुर्जुआ समाज के श्रेष्ठवर्ग, प्रतिनिधियों ने प्रमुख भूमिका निभाई और निरंतर इसका बुर्जुआ चरित्र पुख्ता हुआ। यह कांग्रेस की हर पीढ़ी ने किया। आज कांग्रेस में जो पीढ़ी है वह न तो कल्याणकारी राज्य, न समाजवादी ढंग का समाज (स्शष्द्बड्डद्यद्बह्यह्लद्बष् श्चड्डह्लह्लद्गह्मठ्ठ शद्ध ह्यशष्द्बद्गह्ल4) या सम्पूर्ण समाजवाद पर विश्वास करती है न सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी क्षेत्र में बेचने पर परहेज है उसे। ब्रिटिश औपनिवेशक शासन से मुक्त होकर अमरीकी साम्राज्यवादी आर्थिक नीतियों के शिकंजे में जकड़ने के पूरे क्रम का शोधपूर्ण अध्ययन जरूरी है। दरअसल कांग्रेस के जन्म तथा क्रमिक विकास और उसकी राजनीतिक दल के रूप में मजबूती का सामाजिक विश्लेषण तथा सांस्कृतिक समीक्षा जरूरी है। आज तक केवल राजनीतिक विश्लेषण होता रहा है। कांग्रेस इस बात को भले से समझ रही है कि अगर आज उसने पीछे देखना शुरू किया या देखा तो उसका राजनीतिक अंत हो जाएगा क्योंकि इन 125 वर्षों में आज देश में मध्यमवर्ग की संख्या कई गुना बढ़ी है और पहले के मध्यवर्ग की अपेक्षा आज के मध्यवर्ग की इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं, तौर तरीके, दुनिया को देखने का नजरिया और चलने का ढंग एकदम जुदा है, बदला हुआ है। आज इस वैश्विक उदार आर्थिक नीतियों में मध्यवर्ग ज्यादा आत्मकेंद्रित हुआ है और वह इस आर्थिक उदारीकरण के सारे लाभ पोगरा लेने आतुर हैं। उसे न तो कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पसंद है न उसे समाजवाद से कोई लेना-देना है। कांग्रेस के नेतृत्व के केंद्र में बैठे नीति निर्धारक तथा व्याख्याकार और तत्ववेत्ता ज्यादा चतुर हैं और बहुत ही चतुराई के साथ, लेकिन भोला चेहरा बनाकर देश की जनता को उस वैश्विक आर्थिक नीतियों से उत्पन्न होने वाले ''लाभ'' की ओर हांक रहे हैं और उधर ले जा रहे हैं। इस तरह कांग्रेस ने कट्टरता से चिपके रहने को त्यागते हुए समय के अनुसार चलने की नीति का अनुसरण किया और अपने मूल चरित्र को परिमार्जित करते हुए ''कॉर्पोरेट'' चरित्र की ओर बढ़ी है। आजादी की लड़ाई के समय कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी की अपेक्षा एक मंच ज्यादा थी और उस मंच से हर विचारधारा के लोग जुड़कर आजादी की लड़ाई लड़ते रहे। आजादी मिलते ही ऐसे विचार के लोगों ने अपना-अपना रास्ता पकड़ा और कांग्रेस अपने रास्ते पर चलते हुए उसमें आधुनिक तत्व शामिल करती चली और आज वह देश की सबसे बड़ी पूंजीवादी पार्टी है। कांग्रेस ने मतलब साधने बुर्जआ तथा सामंतवादी तत्वों का सहयोग लेने में गुरेज नहीं किया। कांग्रेस मूलरूप से धर्मनिरपेक्ष पार्टी है लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं, खासकर हाल के वर्षों के, जब उसने घोर साम्प्रदायिकता के विरुध्द ''चुप'' रहने की भूमिका अपनाई। खासकर गुजरात दंगों के समय कांग्रेस का रुख सत्ता के लिए खुद को साम्प्रदायिकता के खिलाफ तटस्थ रखने का रहा। ऐसा भी समय आया जब कांग्रेस हिन्दुत्व के घोर कट्टरवाद के विकल्प में ''नरम हिन्दु'' का चेहरा लेकर पेश हुई जिससे उसे वोट मिलें। इस तरह धर्मनिरपेक्षता के मामले में कांग्रेस से कई बार देश ठगा गया और अब धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस अविश्वसनीयता के घेरे में भी आ गई है। कांग्रेस ने अपनी रक्षा के लिए सबसे ज्यादा उपयोग कम्युनिस्ट पार्टियों का किया है। और हर मदद के बाद या मदद देते समय भी कम्युनिस्ट पार्टियों ने खुद को छला गया महसूस किया है। इस तरह आज कांग्रेस न तो समतावादी समाज, समाजवाद चाहने वालों के लिए आशा का केंद्र है और न ही धर्मनिरपेक्षता के लिए उससे वैसी आशा है जो किसी समय हुआ करती थी। कांग्रेस शुरू से साम्राज्यवाद के खिलाफ रही, और इसमें आर्थिक साम्राज्यवाद भी शामिल है, लेकिन अबकी कांग्रेस कभी-कभार कोमल स्वर में साम्राज्यवाद के मंसूबों के खिलाफ बोल ले तो अहो भाग्य! नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद आज जो कांग्रेस है वह दुनिया की तमाम आर्थिक उदारवादी शक्तियों की प्रिय है क्योंकि आज की कांग्रेस आर्थिक नीतियां उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। इस तरह आज कांग्रेस ने अंतरराष्ट्रीय उदार नीतियों के क्लब के प्रमुख सदस्य का दर्जा पा लिया है। कांग्रेस का विकल्प क्या है? यह विचारणीय प्रश्न है। जहां तक सत्ता पर काबिज होने का सवाल है, कभी भाजपा सत्ता में आ जाती है, आ भी सकती है, लेकिन सम्पूर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए जिस विकल्प की बात सोची जाती है उसका धुंधला रूप ही दिखाई देता है। अभी उत्तर आधुनिक युग में जिस दौर से आर्थिक नीतियां चल रही हैं और एक ताकतवर वर्ग पैदा हो रहा है उसमें कांग्रेस के और अच्छे दिन आने के लक्षण दिख रहे हैं। लोकतंत्र में चुनाव में इधर-उधर, ऊपर-नीचे स्थिति बनती है, बिगड़ती है। कुछ सीटें कम ज्यादा होती रहती हैं और गठबंधन की जरूरत भी पड़ती है। लेकिन व्यवस्था में परिवर्तन नहीं हो जाता, उल्टे वह निरंतरता कायम रहती है। आज कांग्रेस की उदार आर्थिक नीति बुर्जुआ दल की निरंतरता का उदाहरण है।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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