हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

नेपाल किधर जा रहा है

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/13/2010 07:02:00 PM

कुछ दिनों पहले खबर आई की नेपाल में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने अपने किशोर सैनिकों के पुनर्वास के लिए उन्हें यूएन के साथ हुए एक समझौते के तहत छोड़ दिया है. इसके साथ ही नेपाल के दूसरे घटनाक्रमों ने भी नेपाल में जनवाद और जनता के संघर्षों को लेकर बहुत सरे सवाल खड़े किये हैं. नेपाल में क्या हो रहा है? वह किधर जा रहा है. अपने इस आलेख में बता रहे हैं टी जी जैकब. इसका अनुवाद किया है साथी अभिषेक श्रीवास्तव ने. 
 



नेपाल का राजनीतिक संकट और सामाजिक जनवाद
नेपाल का माओवादी आंदोलन करीब 40 साल पुराना हो चुका है। यह उतना ही पुराना है जितना भारत, बांग्लादेश या श्रीलंका के माओवादी आंदोलन। दक्षिण एशिया में जमीनी स्तर पर माओवादी आंदोलन का पहला सबसे बड़ा उभार पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में हुआ था जहां के क्रांतिकारियों ने पारंपरिक वामपंथियों के सामाजिक जनवाद को खारिज कर दिया था तथा क्रांतिकारी किसानों और युवाओं ने वाम गठबंधन राजनीति की पोल खोल दी थी। नक्सलबाड़ी ने न सिर्फ भारत के विभिन्न हिस्सों में सकारात्मक क्रांतिकारी कार्रवाई की संभावनाओं को जागृत किया, बल्कि नेपाल में भी ऐसा ही किया। नक्सलबाड़ी से दक्षिण एशिया में 1967 में शुरू हुए माओवादी आंदोलन ने संसदीय लोकतंत्र को खारिज कर दिया और अर्द्धउपनिवेशवाद व अर्द्धसामंतवाद की प्रस्थापना की, जो उनके मुताबिक मुख्यधारा की वामपंथी पार्टियों की बुर्जुआ लोकतंत्र वाली परिकल्पना को अवैध ठहराता है। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में सशस्त्र किसान संघर्ष को लोगों के सामने एक सच्चा लोकतांत्रिक सामाजिक-राजनीतिक तंत्र बनाने के इकलौते विकल्प के रूप में रखा गया है। नेपाल के संदर्भ में, जहां सामंती राजशाही तंत्र कायम था, यह विश्लेषण कहीं ज्यादा जटिल हो गया। नेपाल के माओवादी आंदोलन में शुरुआत से ही सामंतवाद का सामाजिक आधार लिए राजशाही को अपना प्राथमिक शत्रु बताया और अपने मुख्य शत्रुओं में भारतीय विस्तारवाद व वैश्विक साम्राज्यवाद को भी जोड़ा। इसी सैद्धांतिक आधार पर उन्होंने नवजनवादी क्रांति के घोषित लक्ष्य के तहत  लोगों को संगठित करना शुरू किया, जो कि माओ का केन्द्रीय सिद्धांत था और चीन में जिसका कामयाब परीक्षण हो चुका था।
भारत की ही तरह नेपाल और समूचे दक्षिण एशिया का माओवादी आंदोलन ही 60 के दशक में शुरुआत के बाद अगले 10 साल तक एक के बाद एक विघटन का शिकार हुआ। माओवादियों ने तथा बाहरी पर्यवेक्षकों ने भी इस विघटन के पीछे कई अलग-अलग कारण गिनाए जो राज्य की दमनात्मक कार्रवाई और उसे न झेल पाने की माओवादियों की कमजोरी से लेकर राज्य और समाज के चरित्र की गलत समझ यानी वर्ग संरचना व वर्ग संघर्ष की गलत समझदारी तक फैले हुए थे। इन विघटनों के सटीक कारणों को एक किनारे भी रख दिया जाए, तो एक बात तय है। वो यह, कि शुरू से ही एकपक्षीय रहे इस आंदोलन के बिखरने के पीछे एक नहीं, कई कारणों का मिश्रण है और निश्चित तौर पर यह स्थिति लाने में विचारधारात्मक कारणों की बड़ी भूमिका रही। मसलन, 60 के दशक के भारत में औद्योगीकरण की अवस्था को चीन में 1930 के शुरुआती दशकों के औद्योगीकरण (जब माओ ने अनालिसिस आॅफ क्लासेज इन दी चाइनीज कंट्रीसाइड लिखा था, जो क्रांति की सफलता का निर्णायक मोड़ बना) के समान बताने जैसे आग्रह इस किस्म के बचकानेपन की हद थे। नेपाल में भी सामान्यतः यही स्थिति लागू होती है। इस परिघटना को बेहतर तरीके से समझने के लिए जरूरी है कि हम कुछ दूर इतिहास में झांकें।
एक विशिष्ट राजनीतिक धारा के रूप में सामाजिक जनवाद का आरम्भ पश्चिमी यूरोप में हुआ, जहां यह अब भी कई देशों में कभी-कभार संसदीय उतार-चढ़ाव के साथ लोकप्रिय बना हुआ है। विशाल उपनिवेशों से की गई भारी-भरकम लूट ने साम्राज्यवादी देशों में पूंजीवाद व श्रम के बीच अंतर्विरोध को दूर करने में मदद की और ये देश सामाजिक जनवाद की उर्वर भूमि बन गए, जो कि अनिवार्यतः सुधारवादी है, क्रांतिकारी नहीं। यूरोप के संदर्भ में सामाजिक जनवाद की वैचारिक सत्ता के अंतर्गत पूंजीवादी वर्चस्व को क्रांतिकारी तरीके से उखाड़ फेंकने के शास्त्रीय माक्र्सवादी विचार की जगह सुधारों और रियायती समझौतों ने ले ली। इसकी बुनियादी गति दरअसल यूरोपीय बुर्जुआ वर्ग की जूठन के लिए मोलभाव करने से थी जिसके तहत वर्ग-संघर्ष की घुड़की को औजार बनाया जाता था। यह घुड़की बड़े पैमाने पर इसलिए सफल हुई क्योंकि औपनिवेशिक लूट का प्रवाह धीमा पड़ चुका था। न सिर्फ यह राजनीतिक धारा यूरोप में पैदा हुई, बल्कि समूची दुनिया में वहीं से इसका प्रसार हुआ, खासकर तीसरी दुनिया में, जो कि उपनिवेशवाद का शिकार थी और जबरदस्त विपन्नता व गरीबी से जूझ रही थी। इसके चलते तीसरी दुनिया में सामाजिक जनवाद की शुरुआत में आसानी हुई और इसने वर्ग गठजोड़ के माध्यम से समाजवाद के लक्ष्य की उपेक्षा कर दी। इस तरह सामाजिक जनवाद विकसित पूंजीवादी विश्व में पूंजी के हितों की रक्षा करने का एक प्रभावी माध्यम बना, और वहीं से नए-नए आजाद हुए देशों में इसका निर्यात हुआ। पूंजीवादी पश्चिमी देशों में इसका कार्यभार यही था कि इस सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक तंत्र को निरंतर बने रहने दिया जाए, जो अन्यथा पूंजी और श्रम के अंतर्विरोध के दबाव तले फट सकता था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ शुरू से ही गुरु-शिष्य वाले सम्बन्ध थे जो 40 के दशक में स्टालिन के अनुयायियों आर. पी. दत्त और हैरी पोलित के नेतृत्व में चल रही थी। इसलिए, सीपीआई के कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की सहमति से लिए जाते थे, बाद में जिन पर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की सुविधा के हिसाब से मुहर लगा दी जाती थी। इसका अर्थ यह बनता है कि सीपीआई का नेतृत्व कभी भी इस बात को लेकर चिंतित नहीं रहा, या कभी भी उसने यह अध्ययन करने की कोशिश नहीं की कि इस विशाल और जटिल देश की वास्तविकता आखिर क्या है, जहां की सामाजिक संस्थाओं का इतिहास काफी लंबा रहा है और जो सहस्राब्दियों तक जीवित रही हैं। जहां तक क्रांति का सवाल था, यूरोप केन्द्रित यांत्रिक नारोें पर इसकी निर्भरता दयनीय थी। इसका एक अद्भुत उदाहरण हमें तब मिलता है जब हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला किया। पहले जहां क्रांति का नारा था, ‘साम्राज्यवादी युद्ध को जनयुद्ध में बदलो’, वहीं यह नारा हमला होते ही बदल गया- ‘पितृभूमि की रक्षा करो’। यह पतन इतना जबरदस्त था कि जो लोग एक दिन पहले चिल्ला रहे थे कि न तो एक पैसा दिया जाएगा, और न ही युद्ध में अपना एक भी सैनिक भेजा जाएगा, उन्होंने इस साम्राज्यवादी युद्ध के लिए रातों-रात सैनिकों की भर्तियां करनी और पैसे जुटाने शुरू कर दिए। लोगों के साथ यह बेशर्म खेल तब खेला जा रहा था, जब हमारे देशभक्त ब्रिटिश पुलिस और सेना द्वारा बर्बर तरीके से मारे जा रहे थे। आज तक देश की किसी भी आधिकारिक कम्युनिस्ट पार्टी ने इतिहास के इस चरण पर किसी किस्म की कोई आत्मालोचना प्रस्तुत नहीं की है। इन्होंने कुल मिलाकर यही किया कि पार्टी के सम्बद्ध दस्तावेजों को लोगों की आंख से बचाकर छुपा दिया और उन तक पहुंच नहीं होने दी। एक तरह से यह दोहरा अपराध था क्योंकि अपराध करने के बाद सबूत को ही नष्ट कर दिया गया था।
यही वह विश्व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसमें एक कम्युनिस्ट आंदोलन के सामाजिक जनवादी आंदोलन में बदल जाने को समझा जा सकता है। इसी की तार्किक परिणति यह थी कि तेलंगाना संघर्ष से अचानक हाथ खींचकर मुख्यधारा की राजनीतिक प्रक्रिया में पूर्ण स्तरीय भागीदारी की जमीन तैयार की जाने लगी और मुद्दा आधारित आर्थिक संघर्षों को मुखौटा बना लिया गया। इस रूपांतरण की पहली प्रमुख ‘सफलता’ 1957 में केरल में दर्ज की गई, जब सीपीआई ने राज्य विधानसभा में पर्याप्त सीटें जीतकर अपनी सरकार बना ली। यह सरकार सामाजिक जनवाद की सफलता या विफलता के परीक्षण का मानक बन गई, जिसमें जमीन जोतने वाले की और समतापूर्ण सर्वशिक्षा के वादों को पूरा करना शामिल था। ये नारे उन दिनों नेहरूवादी मुहावरों का ही हिस्सा था, लेकिन जब केरल की सरकार ने इन्हें लागू करने के लिए कानून बनाने की शुरुआत की, तो इस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और सीपीआई के काडरों व समर्थकों को खोज-खोज कर निशाना बनाया जाने लगा। इन वादों को लागू करवाने में सामाजिक जनवाद की विफलता या असमर्थता पूरी तरह सामने आ गई। सीपीआई में खलबली मच गई जिसके कारण कांग्रेस समर्थक सीपीआई और सीपीआई (एम) में इसका विभाजन हो गया। सीपीआई (एम) ने कुछ दिनों तक क्रांतिकारी चेहरा बनाए रखा जिससे कम से कम काडरों की विशाल संख्या पर कुछ समय तक उसकी पकड़ बनी रही।
सीपीआई (एम) के इस क्रांतिकारी चेहरे का पर्दाफाश नक्सलबाड़ी आंदोलन उभरने के साथ हुआ। जो कुछ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में हुआ, नेपाल में ठीक उसी का दोहराव हुआ। भारत में जहां क्रांतिकारियों ने सीपीआई (एम) छोड़कर सीपीआई (एमएल) बना लिया, वहीं नेपाल के क्रांतिकारियों ने सामाजिक जनवादी दायरे से बाहर निकलकर सीपीआई (एमएल) का ही एक समानान्तर धड़ा खड़ा किया। जैसा कि हमने पहले बताया, दोनों ही देशों में क्रांतिकारी कतारें विघटन दर विघटन का शिकार होती रहीं, जब तक कि नेपाल के मामले में क्रांतिकारियों ने अंततः दसेक साल पहले खुद को संगठित कर नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) बना ली। इस वक्त तक कई क्रांतिकारी, जिन्होंने कभी सामाजिक जनवाद को खारिज कर दिया था, उस तक वापस लौट गए, लिहाजा जो नई पार्टी बनी, उनमें अपेक्षाकृत युवा थे और घरेलू हालात के चलते उनमें से कई लंबे समय तक भारत में रहे थे। वैसे भी दोनों देशों के बीच खुली सीमा और नेपाल में जीने की खराब स्थितियों के चलते लगातार नेपाली पुरुष और महिला कामगार बड़े पैमाने पर भारत में आ रहे थे और वे भारतीय मानकों से भी खराब कहे जाने वाले पेशों में बेहद कम मजदूरी पर काम करने लगे थे। नेपाली माओवादियों को भारत में हमेशा बड़ी आसानी से शरण मिलती रही और भारतीय मित्रों का समर्थन भी हासिल रहा। इस लेखक को याद है, वह वक्त जब कई बरस तक पार्टी की केन्द्रीय कमेटी दिल्ली और उसके आसपास ही रह रही थी। जाहिर तौर पर उन्होंने भारतीय माओवादियों के साथ भी अपने रिश्ते बना लिए। पिछले करीब एक दशक में ये रिश्ते मजबूत हुए हैं और अब इस स्तर तक पहुंच गए हैं कि दोनों मिल कर अक्सर संयुक्त बयान जारी कर देते हैं, एक-दूसरे के सम्मेलनों में शिरकत करते हैं तथा रिम और माओवादियों समूहों और पार्टियों के दक्षिण एशियाई मंच की सदस्यता भी साझा करते हैं।
10 साल से ज्यादा वक्त बीत गया, जब नेकपा (माओवादी) ने सामंतवादी राजशाही और विश्व साम्राज्यवाद समेत भारतीय विस्तारवाद (यह पेरू के सेंदेरो लुमिनोसो से प्रेरित था) के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की घोषणा की थी। उस वक्त यह पार्टी कुछ नहीं थी और यह शुरुआत सिफर से हुई थी। गुरिल्ला सेना में वृद्धि को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह चमत्कारिक है। मुट्ठी भर गुरिल्लों के एक समूह से आज ये 20 हजार प्रशिक्षित लड़ाकों की सेना बन चुके हैं जिनके पास अधिकतर दुश्मन से छीने गए हथियार मौजूद हैं। इतना ही नहीं, एक करोड़ 70 लाख की आबादी वाले देश का करीब दो-तिहाई हिस्सा इनके प्रभावी नियंत्रण में है। वे अब अपना समान्तर प्रशासन, न्यायालय, स्कूल और अस्पताल बना सकते हैं। कई नए किस्म के सामाजिक संगठन उन इलाकों में खड़े हो गए हैं जो ‘मुक्त’ हो चुके हैं। उन्होंने सामंतों की जमीनों का बंटवारा भूमिहीनों में कर दिया है। राजशाही की मौत, प्रभावशाली जनजातीय स्वायत्ता और जातियों, समुदायों व वर्गों की समानता जैसे नारों ने गरीबों को पिघला दिया और माओवादियों को बड़े पैमाने पर जनता का समर्थन मिला (गौरतलब है कि नेपाल दुनिया के निर्धनतम देशों में से एक है जहां 30 फीसदी से भी कम आबादी का तकरीबन हर चीज पर कब्जा है)।
नेपाल में सामाजिक असमानता बहुत तीखी है जहां अल्पसंख्यक हिंदुओं का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के हरेक अंग पर पूर्ण वर्चस्व है। दलितों और दर्जनों जनजातियों को हर क्षेत्र से बाहर रखा गया है, जो यहां बहुसंख्यक है और जिनका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह प्रचलित बात कि नेपाल एक हिंदू राष्ट्र है और कुछ नहीं, बल्कि नेपाल राजशाही के वफादारों और भारत के हिंदू दक्षिणपंथियों का प्रचार है। माओवादियों ने नेपाली समाज के इन लक्षणों को पहचाना और ठीक करने का संकल्प लिया।
10 साल के इस युद्ध में 17 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। यह युद्ध राजशाही के खिलाफ चला जिसे नई दिल्ली का समर्थन हासिल था। साल भर पहले जब यह साफ हो गया कि माओवादी अब वर्चस्व में आ चुके हैं और यदि किसी बाहरी ताकत द्वारा सशस्त्र हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो शाही नेपाली सेना का खात्मा होना तय है, उस वक्त शांति प्रक्रिया की शुरुआत है। यह ऐसी परिस्थिति थी जिसमें लोकतंत्र के लिए माओवादियों, सामाजिक जनवादियों और नेपाली कांग्रेस जैसी भारत समर्थक पार्टियों का साथ आना अनिवार्य हो गया। यह एक अवसरवादी गठबंधन था क्योंकि इसके कई सदस्यों के रोम-रोम में अवसरवाद भरा हुआ है। पिछले राजा के उत्तराधिकारी के पास और कोई रास्ता नहीं बचा और उसे संविधान सभा के चुनाव की माओवादी मांग माननी पड़ गई। ठीक इसी मौके पर तमाम अनुभवी सामाजिक जनवादी अचानक परिदृश्य में उभर आए और विद्रोहियों को समझाने में लग गए कि शांतिपूर्ण संक्रमण बिलकुल संभव है। नेपाल के भोले-भाले माओवादी तुरंत हथियार डालने को राज़ी हो गए और उन्होंने अपनी गुरिल्ला सेना को बैरकों में भेज दिया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षण में चुनाव करवाए गए, लेकिन इस क्रम में एक बात भुला दी गई कि संयुक्त राष्ट्र और कुछ नहीं, सिर्फ अमेरिका के हाथ की कठपुतली है। 
माओवादियों को लोगों का इतना व्यापक समर्थन हासिल था कि वे चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरे। बाकी तो सब हाल का इतिहास है, जब माओवादी नेता नेपाल के प्रधानमंत्री बने और वित्त मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी उन्हीं के पास गए। लेकिन जब तक गठबंधन स्थिर नहीं रहता, सरकार नहीं टिक सकती। यही वह सर्वाधिक अस्थिर संतुलन है, जिसने समूचे हालात को डावांडोल कर दिया है।
माओवादियों का यह आरोप कि चीजें काठमांडू  में तय होने के बजाय नई दिल्ली में तय की जा रही हैं, काफी विश्वसनीय जान पड़ता है। पहली बात, सीपीएम जैसी भारतीय सामाजिक जनवादी पार्टियों की संलग्नता इस मामले में निश्चित तौर पर रही है। इन्हीं के प्रतिनिधियों ने माओवादियों को समझौते की मेज पर लाने का काम किया तथा हथियार डाल देने व गुरिल्ला सेना को बैरकों में भेज देने पर राजी किया। दरअसल, इसके पीछे एजेंडा नेपाल के सामाजिक जनवादियों के साथ एक गठजोड़ बनाना था जो पूरा हो गया है। शांति समझौते के अंतर्गत अब संविधान सभा तय करेगी कि देश में कैसी गणतांत्रिक सरकार का गठन होगा, साथ ही नेपाली शाही सेना के आकार पर रोक लगाने पर सहमति बनी। चुनवों के बाद नई सरकार ने तुरंत संविधान लेखन की प्रक्रिया शुरू कर दी। राजशाही से सारे अधिकार छीन लिए गए, हालांकि शाही परिवार से उसकी काली कमाई नहीं छीनी गई। लेकिन काफी जल्द सेना की भूमिका और उसके पुनर्गठन पर सवाल पर गतिरोध पैदा हो गया। इसके नाम में से शाही हटा कर इसे नेपाली सेना कर दिया गया। करीब 75,000 की संख्या वाली सेना राजशाही की कट्टर वफादार है। यह वफादारी इतनी गहरी है कि पता ही नहीं चलता कि राजशाही का सेना पर नियंत्रण है या सेना का राजशाही पर। शायद यह दोनों तरीकों से चलता है और एक-दूसरे के हितों को पूरा करता है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि संविधान लिखे जाने से पहले ही सेना के नेतृत्व ने खुले तौर पर चुनी हुई सरकार का उल्लंघन कर डाला। नेपाल के सामाजिक जनवादियों ने भी बड़े नाटकीय तरीके से यहां की चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार को धोखा देते हुए खुद को शाही सेना का वफादार घोषित कर दिया। इन सभी को दिल्ली और अमेरिका की सत्ता का पूरा समर्थन हासिल था। अमेरिका ने तो कई बार यह साफ कर दिया था कि वह नेपाल में माओवादी प्रभुत्व वाली किसी भी सरकार का साथ नहीं देगा क्योंकि यह देश उनके लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है चूंकि एशिया के दो महत्वपूर्ण देशों के बीच यह स्थित है। दूसरी ओर भारत का सत्ताधारी वर्ग इस बात को लेकर चिंतित था ही क्योंकि उसे भय है कि माओवादी सत्ता के अंतर्गत उसके वे आर्थिक हित मारे जाएंगे जो लंबे समय से चली आ रही राजशाही में पूरे होते रहे थे। याद रखें कि माओवादयिों ने यहां की जनता से जो वादे किए हैं, उनमें कुछ बेहद महत्वपूर्ण मसले भारत और नेपाल के बीच के असमान रिश्तों और भारतीय हित में नेपाल के पनबिजली संसाधनों के दोहन से जुड़े हैं। माओवादियों के राजनीतिक कार्यक्रम में वैसे भी भारतीय विस्तारवाद का मसला महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है।
इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल की सत्ता से माओवादियों को हटाने के लिए एक साजिश रची गई जिसमें दोनों देशों के सामाजिक जनवादियों ने भारत के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाई। यही वजह है कि जो सामाजिक जनवादी शाही सेना के आगे घुटनों पर झुक गए, वे भले ही अल्पमत में हों, लेकिन आज नेपाल की सत्ता पर काबिज हैं। कोई भी अब अंदाजा लगा सकता है कि संविधान लेखन और उसे स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया कितनी दूर तक जाएगी। कुल मिला कर कह सकते हैं कि नेपाल आज गृह युद्ध के कगार पर खड़ा है। माओवादी भी इस बात को कह रहे हैं। नेपाली जनता और देश का भविष्य चाहे जो हो, एक बात तो साफ है। राजशाही से गणतंत्र में शांतिपूर्ण तरीके से संक्रमण की माओवादी कोशिशें अब विफल हो चुकी हैं, हालांकि सत्ता में आने पर उन्होंने कोई भी परिवर्तनवादी फैसला जबरिया देश पर नहीं लादा। वास्तव में, वे ऐसा नहीं करने को लेकर अतिरिक्त सतर्क थे। उन्होेंने अपने उद्देश्य को राजशाही के पूर्ण सफाए तक ही सीमित कर दिया था। वे तो कब्जे में ली गई सामंती परिसंपत्तियों को भी लौटाने को तैयार हो गए थे। पचास साल पहले केरल में जो हालात थे, उनसे नेपाल की वर्तमान स्थिति की काफी समानताएं हैं। वहां भी ईएमएस की सरकार काफी सतर्क तरीके से सिर्फ नेहरू सरकार के ही वादों को पूरा करने का प्रयास कर रही थी। इसके बावजूद उसे नहीं रहने दिया गया। आज केरल ओर बंगाल में सामाजिक जनवादी सरकारों का बचे रहना सिर्फ इसीलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि एक लंबी अवधि के दौरान वे सत्ताधारी अभिजात्य वर्ग के संरक्षक और उनका अभिन्न अंग बन चुके हैं। नेपाल के मामले में जनपक्षीय बाध्यताएं और काफी गहरे धंसीं राजशाही विरोधी और भारत विरोधी भावनाएं निश्चित तौर पर माओवादियों को सामाजिक जनवादियों की तारों में शामिल होने से रोकेंगी।  इस संदर्भ में यह ध्यान देना जरूरी है कि शांति प्रक्रिया के आरंभ के बाद अब तक माओवादियों के बीच कम से कम पांच विभाजन हुए हैं। यदि पार्टी को अपने काडरों को रोके रखना है, तो उन्हें दोबारा हथियार उठाने ही होंगे। वे आज जाल में फंस चुके हैं क्योंकि यदि उन्होंने संघर्ष जारी नहीं रखा, तो उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त हो जाएगा। यदि उन्होंने सशस्त्र संघर्ष छेड़ा, तो निश्चित तौर पर यह एक बेहद असमान युद्ध साबित होगा क्योंकि सामाजिक जनवादी भुलावों की ओर खिंच कर उनकी लड़ने की धार अब भोंथरी हो चुकी है। कुल मिला कर नेपाल में माओवादियों के लिए हालात अवांछनीय हो चुके हैं।
सभी समझौतों को धता बताते हुए पिछले महीनों के दौरान नेपाली सेना अपने व्यापक विस्तार में जुटी रही और शही परिवार के वफादार अफसरों को विस्तार दे दिया गया है। इसका मतलब यहहुआ कि सेना अब बल प्रयोग के लिए खुद को तैयार कर रही है और प्रचंड की सरकार का जाना इस दिशा में पहला कदम कहा जा सकता है। यह एक त्रासदी है, जो जमीनी हालात को गलत तरीके से समझने के कारण पैदा हुई है। भारत शाही सेना को हथियारों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा है और बना रहेगा। नेपाली सेना के हालिया विस्तार के मद्देनजर हो सकता है कि यह आपूर्ति और बढ़े।
इतना ही नहीं, बहुत संभव है कि अब यह आपूर्ति एक विशिष्ट तरीके से की जाए जिसमें गुरिल्ला युद्ध के भविष्य को ध्यान में रखा जाए।
समयांतर से साभार.

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 3 टिप्पणियां: Responses to “ नेपाल किधर जा रहा है ”

  2. By Ashok Pande on January 13, 2010 at 8:22 PM

    बेहतरीन आलेख. इधर लम्बे समय से समयान्तर से वंचित हूं. पढ़वाने का आभार भाई!

  3. By ak on January 15, 2010 at 12:06 AM

    bahiya lekh. achcha laga. samajh bhi durust hui.

  4. By कलम के सिपाही on January 16, 2010 at 6:07 PM

    नेपाली माओवादियों का यह प्रयोग हो सकता है कि उस जन दबाव का परिणाम हो जिसमें एक स्वाभाविक मध्यवर्गीय इच्छा होती है कि सब कुछ शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। हो सकता है कि अगले चरण की कार्रवाई के लिए जनता को यह अहसास करवाना ज्यादा उपयुक्त लगा हो कि शांति के लिए युद्ध उतना ही आवश्यक है जितना कि ठीक होने के लिए कैंसर की शल्य चिकित्सा करना। नेपाली माओवादी पार्टी एक स्तर तक गांवों में और पूरे भूभाग के दो तिहाई हिस्से में अपनी पैठ बना ली है। अब शहरी इलाकों के बुनियादी वर्गों को और मध्यवर्ग को साथ लेने का चरण है। ऐसे में आंदोलन में ठहराव मध्यवर्ग और औद्योगिक मजदूरों को साथ लेने में काफी मददगार साबित होगा। पूरी उम्मीद है कि पार्टी इस कार्यभार को पूरा कर रही होगी। लेखक ने आज की परिस्थिति में माओवादियों के लिए आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थित बयां की है लेकिन ऐसी बात नहीं हो सकती है।
    एक अच्छे लेख के लिए धन्यवाद

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें