हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

कोपेनहेगन में आखिर क्या हुआ?

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/09/2010 04:41:00 PM



फिदेल कास्त्रो
(अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव)

युवा किसी से भी ज्यादा भविष्य के बारे में दिलचस्पी लेते हैं। हाल-फिलहाल तक जो बातें होती थीं, उसमें इस पर चर्चा होती थी कि हमें किस किस्म का समाज चाहिए। आज सारी चर्चा इस बात पर होती है कि क्या इंसानी समाज बच पाएगा। ये बातें नाटकीय नहीं। हमें वास्तविक तथ्यों की आदत डाल लेनी चाहिए। हमारे पास अगर कोई आखिरी चीज है, तो वह है उम्मीद। अपने सच्चे तर्कों से हर उम्र के पुरुषों और स्त्रियों ने, और खासकर युवाओं ने शिखर सम्मेलन में जबरदस्त लड़ाई छेड़ी है और दुनिया को एक महान सबक सिखाया है।

अब यह जरूरी हो गया है कि क्यूबा और सारी दुनिया ज्यादा से ज्यादा इस बात को जाने कि आखिर कोपेनहेगन में क्या हुआ। जो लोग इस दुनिया की किस्मत को अपनी मुट्ठी में किए हुए हैं, सचाई उन लोगों के पूर्वाग्रहग्रस्त और अक्सर गलत सूचनाओं से भरे हुए दिमागांे पर ज्यादा भारी पड़ सकती है।

यदि कोपेनहेगन में वास्तव में कुछ भी महत्वपूर्ण हासिल किया गया, तो वह था मीडिया कवरेज जिसे अनुमति दिए जाने के बाद दुनिया भर की जनता वहां पैदा हुई राजनीतिक अराजकता को देख सकी, और यह भी कि किस तरह राज्यों के प्रमुखों, मंत्रियों व सामाजिक आंदोलनों व संस्थानों के हजारों प्रतिनिधियों को शर्मिंदा किया गया, जो एक उम्मीद लेकर कोपेनहेगन तक गए थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों का पुलिस द्वारा बर्बर दमन नाजी टुकड़ियों के व्यवहार की याद दिला गया जिन्होंने अप्रैल 1940 को पड़ोसी डेनमार्क पर कब्जा किया था।

किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि सम्मेलन के आखिरी दिन 18 दिसम्बर 2009 को यही डेनमार्क की सरकार- जो कि अफगानिस्तान की तबाही में नाटो की गठबंधन सहयोगी रही है- राष्ट्रपति ओबामा को सम्मेलन के मुक्त सत्र के लिए हाॅल देने से मना कर देगी, जहां उनके समेत कुल 16 अतिथियों के समूह की बैठक होनी थी और जहां सिर्फ उन्हें ही बोलने का अधिकार होता।

ओबामा की विश्वासघाती और अटपटी फतवेबाजी ने क्योटो संधि की उपेक्षा कर दी और एक बाध्यकारी वचनबद्धता जारी करने में विफल रही। इसके बाद कुछ वक्ताओं को सुनकर वह कमरे से चले गए जिन्हें मंच पर बुलाया गया था, उनमें सर्वाधिक औद्योगिक राष्ट्र, कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के कुछ निर्धनतम देश थे। 170 से ज्यादा देशों के नेताओं और प्रतिनिधियों को सिर्फ सुनने की छूट थी।

चुने गए 16 लोगों के वक्तव्य खत्म होने के बाद एवो मोरालेस ने मंच पर आने का अनुरोध किया। उन्हें दो-तिहाई बोलीवियाई सदन और सीनेट का समर्थन है, हाल ही में उन्हें 65 फीसदी जनता के वोट मिले हैं और वह एमारा मूलवासी हैं। डेमार्क के राष्ट्रपति के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। उन्हें दूसरे प्रतिनिधिमंडलों की बात माननी ही पड़ी। एवो के बौद्धिक और ओजस्वी वक्तव्य के बाद उन लोगों को ह्यूगो शावेज को मंच देना पड़ा। ये दोनों अभिभाषण संक्षिप्त, लेकिन मौके पर की गई टिप्पणी के रूप में इतिहास में दर्ज हो जाएंगे। अपना अभियान पूरा करके दोनों अपने-अपने देशों को चले आए। लेकिन, ओबामा जब लौटे, तो वह खाली हाथ थे। उन्हें अब भी मेजबान देश में अपना काम पूरा करना था।

17 दिसम्बर की शाम से लेकर अगले दिन 18 की सुबह तक डेनमार्क के प्रधानमंत्री और अमेरिका के कुछ वरिष्ठ प्रतिनिधि यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष व 27 देशों के नेताओं के साथ बैठक करते रहे। इन्हें ओबामा की ओर से एक समझौते के मसौदे से परिचित कराया गया जिसे तैयार करने में दुनिया के किसी भी अन्य नेता ने हिस्सा नहीं लिया था। यह पूरी तरह एक अलोकतांत्रिक और गुप्त काम था जिसने सामाजिक आंदोलनों, वैज्ञानिक और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों तथा सम्मेलन के अन्य हजारों प्रतिभागियों की उपेक्षा की थी।

हालांकि 18 की रात और 19 की सुबह 3.00 बजे तक अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष लौट गए थे, राष्ट्रों के प्रतिनिधि सत्रों के दोबारा शुरू होने और आयोजन के औपचारिक समापन की प्रतीक्षा करते रहे। 18 तारीख को दिन भर ओबामा और यूरोपीय नेता बैठकें और प्रेस सम्मेलन करते रहे। इसके बाद वे भी चले गए। इसके ठीक बाद कुछ ऐसा हुआ जो अनपेक्षित थाः 19 की सुबह तीन बजे डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने एक बैठक बुलाई और सम्मेलन का समापन कर डाला। तब तक सिर्फ राष्ट्रों के मंत्री, अधिकारी, राजदूत और तकनीकी कर्मचारी वहां बचे थे।

उस सुबह तीसरी दुनिया के देशों के एक प्रतिनिधि समूह ने ओबामा और दुनिया के अमीर देशों द्वारा सम्मेलन के समझौता दस्तावेज के रूप में पेश किए गए और अमेरिका द्वारा तैयार एक दस्तावेज को चुनौती देते हुए उसके विरोध में संघर्ष छेड़ दिया।

वेनेजुएला की एक प्रतिनिधि क्लाॅडिया सालेमो ने मंच पर वक्तव्य देने के अपने अधिकार का आग्रह करते हुए मेज को जोर-जोर को पीटा था जिससे उसका दायां हाथ लहूलुहान हो चुका था। उनकी आवाज की ओजस्विता और उनकी दलीलों को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

क्यूबा के विदेश मंत्री ने करीब एक हजार शब्दों का एक जबरदस्त अभिभाषण दिया, जिसके कुछ पैरा मैंने इस आलेख के लिए चुने हैंः

‘‘श्रीमान अध्यक्ष महोदय, जिस दस्तावेज के बारे में आपने लगातार दावा किया कि वह है ही नहीं, वह अब सामने आ चुका है (...), हमने देखा है कि कैसे चोरी-छिपे इसे वितरित किया जा रहा है और गुप्त बैठकों में इसकी चर्चा की जा रही है...।’’

‘‘...आपने इस सम्मेलन को जिस तरह चलाया है, मुझे उस पर गहरा अफसोस है।’’

‘‘...इस संदिग्ध और अप्रामाणिक मसौदे की विषय-वस्तु को क्यूबा पूरी तरह अपर्याप्त और अस्वीकार्य मानता है। दो डिग्री सेंटीग्रेड का लक्ष्य अस्वीकार्य है और इसके अगणनीय विनाशक परिणाम होंगे...।’’

‘‘जो दस्तावेज आप दुर्भाग्यवश ला रहे हैं, वह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिहाज से किसी भी तरह से बाध्यकारी नहीं है।’’

‘‘मैं अतीत के मसौदों से भी अच्छी तरह वाकिफ हूं, जिन्हें गुप्त तरीकों से मुट्ठी भर लोगों ने समझौते के रूप में अपना लिया था...।’’

‘‘जो दस्तावेज आप ला रहे हैं, वह पिछले मसौदे में शामिल पहले से ही कमजोर और मामूली बातों को भी शामिल कर पाने में नाकाम है...।’’

‘‘...जहां तक क्यूबा की बात है, यह दुनिया भर में स्वीकार्य इस वैज्ञानिक तथ्य के साथ मेल नहीं खाता जो कहता है कि 2020 तक कम से कम 45 फीसदी तथा 2050 तक 80 से 90 फीसदी उत्सर्जन कटौती तात्कालिक है और इससे बचा नहीं जा सकता।’’

‘‘उत्सर्जन कटौती पर भविष्य में किसी भी समझौते पर पहुंचने के लिए वार्ताएं जारी रखने की किसी भी दलील में अनिवार्य तौर पर क्योटो संधि की वैधता का विचार शामिल होना चाहिए (...)। अध्यक्ष महोदय, आपका पर्चा क्योटो संधि की मौत का फरमान है और मेरा प्रतिनिधिमंडल इसे स्वीकार नहीं कर सकता।’’

‘‘क्यूबा का प्रतिनिधिमंडल भविष्य की वार्ताओं की प्रक्रिया के मूल सिद्धांत के तौर पर ‘समान लेकिन विशिष्ट जिम्मेदारियों’ पर जोर देता है। आपके पर्चे में इस पर एक शब्द भी नहीं कहा गया है।’’

‘‘यह मसौदा घोषणापत्र ठोस वित्तीय वचनबद्धताओं तथा विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण का जिक्र करने में नाकाम रहा है, जो जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में विकसित देशों द्वारा जताई गई बाध्यताओं का हिस्सा है (...)। अध्यक्ष महोदय, आपके दस्तावेज के माध्यम से अपने हित थोप कर विकसित देश किसी भी ठोस वचनबद्धता से बच रहे हैं।’’

‘‘...अध्यक्ष महोदय, आप जिन्हें ‘प्रतिनिधि नेताओं का समूह’ बता रहे हैं, वह मेरे हिसाब से संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में शामिल संप्रभु समानता के सिद्धांत का घोर उल्लंघन है...।’’

‘‘अध्यक्ष महोदय, मैं औपचारिक निवेदन करता हूं कि इस वक्तव्य को पक्षकारों के सम्मेलन के इस खेदजनक और शर्मनाक 15वें सत्र की अंतिम कार्रवाई में शामिल किया जाए।’’

राष्ट्रों के प्रतिनिधियों को उनके विचार व्यक्त करने के लिए कुल एक घंटे का वक्त दिया गया था। इस दौरान कई जटिल, शर्मनाक और अटपटी स्थितियां पैदा हो गईं।

इसके बाद एक लंबी बहस चली जिसमें विकसित देशों के प्रतिनिधियों ने बाकी पर भारी दबाव डाला कि इस दस्तावेज को सम्मेलन के अंतिम समझौते के रूप में मान लिया जाए।

कुछ देशों ने अमेरिका द्वारा प्रचारित इस दस्तावेज के अधूरेपन और गड़बड़ियों पर मजबूती से जोर दिया, खासकर कार्बन उत्सर्जन कटौती पर विकसित देशों द्वारा वचनबद्धता और वित्तपोषण के अभाव पर, जिससे दक्षिण के देश निषेधात्मक और संतुलनकारी उपाय अपना सकते थे। काफी लंबी और तनावपूर्ण बहस के बाद आलबा देशों और सूडान की स्थिति जी-77 के अध्यक्ष के रूप में यह बनी कि यह दस्तावेज सम्मेलन के लिए अस्वीकार्य है, लिहाजा इसे अपनाया नहीं जा सकता।

सहमति के अभाव में सम्मेलन में सिर्फ इस दस्तावेज की उपस्थिति का इस रूप में ‘संज्ञान’ लिया गया कि यह करीब 25 देशों के पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है।

यह फैसला लिए जाने के बाद डेनमार्क के समय के हिसाब से सुबह साढ़े 10 बजे आलबा देशों के साथ ब्रूनो के प्रतिनिधि की संयुक्त राष्ट्र के सचिव के साथ एक मित्रवत बातचीत हुई जिसमें उन्होंने महासचिव को बताया कि वे जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणामों को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के समानांतर अपना संघर्ष जारी रखने के इच्छुक हैं। उनका अभियान पूरा हो चुका था। हमारे विदेश मंत्री और क्यूबा के उपराष्ट्रपति एस्तेबान लाजो लौटकर घर आ गए। उन्हें नेशनल एसेम्बली के सत्र में हिस्सा लेना था, सिर्फ कुछ ही सदस्य और राजदूत कोपेनहेगन में रुके रह गए ताकि वे अंतिम प्रक्रियाओं में शामिल हो सकें।

19 दिसम्बर की दोपहर में उन्होंने निम्न रिपोर्ट दी:

‘‘...जो लोग दस्तावेज को तैयार करने से जुड़े थे, और अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे लोग जिन्होंने मान लिया था कि सम्मेलन इसे स्वीकार कर ही लेगा... क्योंकि वे तथाकथित ‘कोपेनहेगन समझौते’ का ‘सिर्फ संज्ञान’ लिए जाने का असम्मान नहीं कर सकते थे- इन दोनों ने ही एक ऐसी प्रक्रिया लागू करने की कोशिश की, जिससे अन्य सीओपी देश जो इस षडयंत्रकारी सौदे का हिस्सा नहीं थे, इसे मान लें; और इसे इस नीयत से सार्वजनिक कर दिया गया ताकि यह बहाना बनाया जा सके कि समझौता कानूनी था, एक ऐसी चीज जो वार्ता के परिणामों की शर्त होता ताकि वार्ता उसी आधार पर जारी रह सके।’’

‘‘ऐसे विलंबित प्रयासों का एक बार फिर क्यूबा, वेनेजुएला और बोलीविया ने मजबूती से विरोध किया। इन देशों ने चेतावनी दी कि एक ऐसा दस्तावेज जिसे सम्मेलन में स्वीकार नहीं किया गया है, कानूनी नहीं माना जा सकता और इसलिए सीओपी दस्तावेज नाम की कोई चीज नहीं है; लिहाजा, इसके तथाकथित स्वीकारीकरण के लिए कोई नियम नहीं बनाया जा सकता...।’’

 ‘इस तरह कोपेनहेगन की बैठक अपने अंत तक पहुंच रही है, जिसमें पिछले कुछ दिनों के दौरान अमेरिकी प्रशासन के स्पष्ट वैचारिक दिशानिर्देशों के अंतर्गत गुप्त और षडयंत्रकारी तरीके से बनाए गए एक दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया गया है...।’’

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  1. 5 टिप्पणियां: Responses to “ कोपेनहेगन में आखिर क्या हुआ? ”

  2. By दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi on January 9, 2010 at 7:29 PM

    अनुदित कर इस आलेख को पढ़वाने का शुक्रिया। ये बड़े देश ऐसे नहीं मानेंगे। इन की जनता को ही चैतन्य होना होगा।

  3. By अफ़लातून on January 9, 2010 at 7:50 PM

    इस ऐतिहासिक महत्व के लेख को प्रस्तुत करने के लिए अनुवादक और ’हाशिया’ का आभार ।

  4. By अजय कुमार झा on January 9, 2010 at 8:01 PM

    हिंदी ब्लोग्गिंग में इतना गंभीर और सार्थक लेखन /अनुवाद बहुत कम देखने पढने को मिल रहा है इसलिए विशेष आभार ।

  5. By दृष्टिकोण on January 9, 2010 at 9:16 PM

    एक महत्वपूर्ण आलेख को ट्रांसलेट कर सामने लाने के लिए साधुवाद!! पूँजीवादी अखबारों में तो यह कभी नहीं छपता ।

    दृष्टिकोण
    www.drishtikon2009.blogspot.com

  6. By Uday Prakash on January 11, 2010 at 11:39 AM

    यह एक साफ़सुथरा, दोटूक तथ्यात्मक बात करने वाला आलेख है. अगर इसका मूल सचमुच फ़िदेल कास्त्रो ने लिखा है, तो यह आश्चर्यजनक है. इसे पढते हुए हमे अपने देश के ढुलमुल असमंजस भरे रवैये की याद आती रही. बधाई इसे प्रकाशित करने के लिए.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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