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बीच सफ़हे की लड़ाई

देश में कुल कितने गरीब हैं?

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/07/2010 01:00:00 PM


आ र्थिक पंडितों का मानना है कि राष्ट्रीय आय में वृध्दि जिस दर से होती है कोई जरूरी नहीं कि उसी दर से देश की गरीबी घटे। लेकिन आर्थिक नियम यह भी कहते हैं कि अगर राष्ट्रीय आय में वृध्दि होती है तो इसका अंश  देश की जनता में बंटता है। बंटवारा समान हो या असमान इसकी जवाबदेही आर्थिकी की नहीं होती, सरकार की होती है। सरकार यह जवाबदेही तय करती है कि विकास के साथ समानता भी पनपे। लेकिन विकास और समानता सहचरी हो, यह समस्या भारत के सामने ही नहीं बल्कि उन सारे देशों के सामने है जो आज विकास की दौड में हैं। भारत के सामने यह समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल भले ही हो। गरीबी पर सुरेश तेंदुलकर की आई रिपोर्ट  कुछ ऐसी ही कहती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का प्रत्येक तीसरा व्यक्ति गरीब है। आर्थिक क्षेत्र में छलांग लगाते भारत के लिए यह रिपोर्ट किसी शर्म से कम नहीं। रिपोर्ट तो आखिर कागजी सुबूत है जो सर्वे के आधार पर तय किए जाते हैं। सर्वे कोई भी हों उसका एक राजनीतिक पहलू अवश्य होता है। तभी तो गरीबी राजनीति के लिए सबसे लोकप्रिय हथकंडा मानी जाती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि देश में गरीबी एक अलग समस्या है जबकि उसका मापदंड तय करना उससे अलग समस्या। यहां मापदंड से अर्थ उसे तय करने की नीतियों और तरीकों से है। आज अहम सवाल सामने यह है कि देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की वास्तविक संख्या कितनी है? मौजूदा समय में सरकार के पास चार आंकड़े हैं और चारों भिन्न-भिन्न। इसमें देश की कुल आबादी में गरीबों की तादाद 28.5 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक बताई गई है। इन दोनों में से कौन सा आंकडा सही है यह सरकार को ही तय करना है। तीन दशक पहले के आर्थिक मापदंड के अनुसार देश में गरीबी रेखा से नीचे आने वाली आबादी कुल जनसंख्या की 28.5 प्रतिशत है। अभी तक यही आंकडा सरकार दिखाती आई थी, जिसमें गरीबी पिछली गणना से कम दिखती है। इस सरकारी आंकलन को सरकार द्वारा ही गठित तीन समूहों ने खारिज कर दिया है। योजना आयोग द्वारा गठित एसडी तेंदुलकर की रिपोर्ट ने बताया कि वर्ष 2004-05 में गरीबी 41.8 प्रतिशत थी। जबकि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एनसी सक्सेना समिति के अनुसार देश में 50 प्रतिशत यानी आधी आबादी निर्धन है। समस्या सिर्फ इन आंकड़ों के साथ ही नहीं है। गरीबी की प्रतिशत और गरीबी रेखा का निर्धारण इतना पेंचीदा काम है कि सरकार की विभिन्न समितियां भी इसे साफ नहीं कर पातीं। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो सरकार इसे जानबूझ कर पेंचीदा बनाए रखना चाहती है जिसका सरल उदाहरण विभिन्न समितियों का विभिन्न आंकडे पेश करना है। साल 2009 के लोकसभा चुनावों को देख लीजिए। उन क्षेत्रों में कांग्रेस को बंपर मतदान मिले जहां किसानों की कर्जमाफी पर खूब पैसे बांटे गए। अगर गरीबी अपने आप में सियासती दाव-पेंच नहीं होती तो तेंदुलकर की रिपोर्ट आने के बाद उडीसा सरकार राज्य का विशेष दर्जा नहीं चाहती। क्या विशेष दर्जा मिल जाने और केंद्र के उत्तरदान मात्र से समाज की गरीबी समाप्त की जा सकती है? कौन सी ऐसी प्रदेश सरकार है जो इस बात पर मंथन करती है कि केंद्रीय और प्रादेशिक सरकारें आबंटनों के इमानदार बंटवारे पर गंभीरता से विमर्श करती है। सुरेश तेन्दुलकर ने अपनी रिपोर्ट को जारी करते हुए कहा कि गरीबी के निर्धारण की नई तकनीक विकसित की है। यह नई गरीबी रेखा है। तेन्दुलकर कहते हैं कि भारत में हर तीसरा भारतीय इस नई गरीबी रेखा के नीचे है। तेन्दुलकर की रिपोर्ट भले ही इसे गरीबी रेखा कहे लेकिन असल में यह दरिद्र रेखा है। गरीबी से भी एक कदम नीचे। सुरेश तेन्दुलकर ने अपनी रिपोर्ट में काम भी यही किया है। उन्होंने जम्मू कश्मीर, दिल्ली और उत्तर पूर्व के रायों को गरीब तो माना है लेकिन बिहार तथा उड़ीसा को उनसे अधिक दयनीय माना है। आश्चर्यजनक रूप से तेन्दुलकर की यह रिपोर्ट सेनगुप्ता कमेटी की उस रिपोर्ट को भी झूठा साबित कर रही है जिसमें उन्होंने देश की अस्सी फीसदी आबादी को 20 रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करने की बात कही थी। यानी महीने में 600 रुपये पर। तेन्दुलकर का कहना है कि असल में भारत में 41 प्रतिशत से अधिक आबादी 447 रुपये मासिक पर गुजारा कर रही है जो कि सेनगुप्ता के बीस रुपये प्रतिदिन से काफी कम है। इनसे यही बात साफ होती है कि गरीबी रेखा को लेकर ही जब इतनी दुविधा है तो फिर उसके उन्मूलन पर कार्यान्वयन की स्थिति कैसी होगी। सरकार गरीबाें के लिए अनेक राहत योजनाएं बनाती है। इसके लिए उसे गरीबों की पहचान करनी होती है। देश का ग्रामीण विकास मंत्रालय यह काम प्रत्येक पांच वर्ष पर करता है। देश में गरीबी निर्धारण का पहला प्रयास 1992 में किया गया। इसमें उन परिवारों को गरीब माना गया जिनकी सालाना आय 11,000 रु थी। लेकिन समस्या तब खडी हो गई जब ऐसे परिवारों की संख्या योजना आयोग की अनुमानित संख्या से ज्यादा हो गई। इसमें गरीबी के पहचान का आधार प्रति परिवार आमदनी था जबकि इसे प्रति व्यक्ति आमदनी या उपभोग होना चाहिए था। इसलिए 1997 के दूसरे गरीबी पहचान की प्रक्रिया में योजना आयोग द्वारा तय उपभोग को आधार बनाया गया। और उन परिवारों को गरीबी से बाहर माना गया जिनके पास 2 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन या पक्का मकान या घर में महंगे उपकरण हों या उस परिवार का कोई सदस्य प्रति वर्ष 20,000 रुपए से ज्यादा कमाई करता हो। इस पहचान में समस्या यह आ गई कि गरीब परिवारों की संख्या योजना आयोग के अनुमान से नीचे चली गई। यह संख्या मंत्रालय के हिसाब से काफी कम थी। इसलिए 2002 में गरीबी पहचाने के लिए परिवार से संबंधित 11 मापदंड तय किए गए। इसमें जमीन, घर का प्रकार, प्रति परिवार कपडे, प्रतिदिन लिए जाने वाले भोजन, शौचालय आदि को आधार बनाया गया। इस आधार पर प्रति परिवार को एक निश्चित स्कोर देने की प्रक्रिया अपनाई गई। इसमें परेशानी यह आई कि कई प्रदेशों में गरीब परिवारों की संख्या अनुमानित संख्या से पार हो गई। इसे देख 2007 में गरीबी का मापदंड तय करने के लिए एनसी सक्सेना समिति का गठन हुआ। इसके मापदंड कुछ इस प्रकार रहे कि देश की आधी आबादी निर्धनता की सूची में आ गई। गरीबी पेंडुलम बन गई या फिर बना दी गई इस पर विचार होना चाहिए। सब्सिडी के आधार पर गरीबी उन्मूलन का ख्वाब महज ख्वाब बन कर ही रह गया क्योंकि उत्तरदान से समृध्दि कभी नहीं आ सकती। कोई आर्थिक नीति इसे सही नहीं ठहरा सकती। सब्सिडी गरीबी उन्मूलन तो नहीं  कर सकती लेकिन भ्रष्टाचार अवश्य बढा सकती है। नरेगा इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है। वैसे विश्व बैंक भी हाल में ही जारी अपने एक अध्ययन में कह चुका है कि 2015 तक भारत में गरीबी घटने की बजाए और बढ़ेगी। जो गरीब हैं वे और गरीब होंगे। विश्व बैंक का आंकलन है कि 2015 तक भारत की एक चौथाई आबादी भीषण गरीबी में चली जाएगी। सवाल उठता है कि क्या करेंगे हम चांद पर पानी खोज कर। क्या करेंगे उस 'यूनिक आईडी कोड' का। क्या करेंगे पृथ्वी और अग्नि का। क्या करेंगे हम गे और लिव-इन रिलेशन का जब देश के आधे लोग भूखे पेट सोने को अभिशप्त हों। हमें सोचना होगा कि यह समय वेश्यावृति पर शास्त्रार्थ करने या मोबाइल के टैरिफ घटाने पर बतकही के लिए माकूल है या फिर गरीबी मापने के लिए बनाए जाने वाले किसी एकीकृत मापदंड के निर्धारण का। वित्त बजट आने को है। अगर अब किसी एकीकृत मापदंड पर फैसला नहीं होगा तो कब होगा? राष्ट्रकुल खेलों के आयोजन को लेकर माथापच्ची जोरों पर है लेकिन हम अब तक यह तय नहीं कर पा रहे कि देश में कितने गरीब हैं और जो भी गरीबी की सूची में हैं क्या वे वाकई गरीब हैं? (साभार)

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  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ देश में कुल कितने गरीब हैं? ”

  2. By महेन्द्र मिश्र on January 7, 2010 at 3:34 PM

    यहाँ क्या कहें ..बड़े लोग भी गरीबी रेखा का कार्ड बनवाकर बैठे है .....

  3. By महेन्द्र मिश्र on January 7, 2010 at 3:34 PM

    यहाँ क्या कहें ..बड़े लोग भी गरीबी रेखा का कार्ड बनवाकर बैठे है .....

  4. By महेन्द्र मिश्र on January 7, 2010 at 3:35 PM

    बड़े लोग भी गरीबी रेखा का कार्ड बनवाकर बैठे है .....

  5. By रंगनाथ सिंह on January 8, 2010 at 2:00 AM

    क्या कहा जाए...!!

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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