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आर्थिक मंदी में क्या कर रहे हैं अर्थशास्त्री ?

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/06/2010 05:00:00 PM


वैश्विक आर्थिक मंदी में अर्थशास्त्र क्या कर रहा है? कौन सी हलचले हैं वहां? बता रहे हैं अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता जॉर्ज एकेरलोफ़, जो यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में प्रोफ़ेसर हैं, और कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज जिन्हें 2001 में नोबेल पुरस्कार मिला था. दोनों प्रोफ़ेसर वैश्वीकरण के शिल्पकारों में से हैं और साम्राज्यवादी लूट की अहम रणनीतियों के लिए पुरस्कृत किये गए हैं.

अर्थशास्त्रियों के पेशे के लिए आर्थिक  व वित्तीय संकट एक महत्वपूर्ण क्षण रहा है. क्योंकि इन संकट ने इसके समक्ष कई दीर्घकालिक विचारों को बतौर परीक्षण रखा है. यदि विज्ञान को भविष्य के आकलन की क्षमता के रूप में परिभाषित किया जाता है, तो अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेशन ने संकट को एक बहुत बड़ी चिंता के रूप में देखा है.  हालांकि इसके बावजूद इस पेशे में विचारों की भारी विविधता है, जैसा कि प्राय: देखा-समझा जाता है. इस साल अर्थशास्त्र में नोबेल विजेता दोनों शख्सियतों ने अपना जीवन वैकल्पिक विचार की खोज में लगा दिया है.   अर्थशास्त्र ने विचारों की संपदा पैदा किया है, जिसमें से कई दलील देते हैं कि बाजार न तो आवश्यक रूप से दक्ष और न ही स्थिर. और अर्थव्यवस्था या हमारा समाज अर्थशास्त्रियों के बड़े तबके के द्वारा इस्तेमाल में लायी जानेवाली प्रतिस्र्धात्मक समानता के विभिन्न मानकों से वर्णित नहीं किया जाता. उदाहरण के लिए व्यवहारवादी अर्थशास्त्री जोर देते हैं कि बाजार में भागीदार प्राय: कुछ इस तरह से कार्य करते हैं कि उसे आसानी से तार्किकता से सुलझाया नहीं जा सकता. इसी तरह आधुनिक सूचना अर्थशास्त्र दिखाता है कि यदि बाजार प्रतिस्पर्धात्मक है, तो वे तब कार्यदक्ष नहीं  होते, जब सूचना अपूर्ण हो या पूर्वाग्रही हो (जैसे कि वित्त संकट के मूल के बारे में कुछ जानते हैं, कुछ नहीं), जैसा कि हमेशा होता है.  शोध-रिसर्च की कड़ी ने दिखाया है कि यहां तक कि तथाकथित तार्किक उम्मीदें के मानक की ओर्थक विचारधारा का इस्तेमाल करके भी बाजार स्थिर व्यवहार नहीं करता और कभी भी प्राइस बबल यानी मूल्य बुलबुले पैदा हो सकते हैं. संकट ने दरअसल में भरपूर साक्ष्य उपलब्ध कराया है कि निवेशक शायद ही तार्किक होते हैं, लेकिन तार्किक उम्मीदों की धारा, इस छिपी धारणा के साथ कि सभी निवेशक के पास वही सूचना है, के बावजूद यह संकट पहले से ही गहराता गया था.  चूंकि संकट ने नियामक तंत्र की जरूरत को फ़िर से खड़ा किया है. इसलिए इसने नये वैकल्पिक विचार व सोच की खोज को आधार दिया है, जिससे पता चल पाये कि यह ओर्थक व्यवस्था किस जटिल तंत्र में काम करती है और यह भी सूत्र मिल जाये कि कैसे हालिया वित्त संकट की पुनरावृत्ति को टाला जा सकता है.  सौभाग्य से कई अर्थशास्त्री आत्म-नियंत्रण और पूर्ण  कार्यदक्ष बाजार व्यवस्था की वकालत करते दिख रहे हैं, जो पूर्ण रोजगार की दशा में हमेशा रहे. वहीं कुछ अर्थशास्त्री और समाजविज्ञानी अन्य तरह के वैकल्पिक विचार व उपागम भी टटोल रहे हैं. ये एजेंट आधारित ये मॉडल परिस्थितियों की विविधता यानी नेटवर्क मॉडल पर खासा जोर देते हैं. यह मॉडल फ़र्मो की जटिल अंतरसंबद्धता व अंतरनिर्भरता पर केंद्रित करता है. इसी तरह एक सरसरी निगाह हाइमन मिंस्की के नजरअंदाज किये काम पर भी देनी जरूरी है, जिसने तीन दशक पहले संकट की पुनरावृति पर काम किया था. इसके साथ ही अभिनव मॉडल भी है, जो विकास की गतिशीलता को समझाने से जुड़ा है.   अब तो अर्थशास्त्र का दायरा भी अपने सीमा से बाहर हो चला है और इसमें मनोविज्ञानियों, राजनीति विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों के कामकाज को शामिल किया जा रहा है. हमें ओर्थक इतिहास से भी काफ़ी कुछ सीखना है. कई प्रयोगों के बावजूद यह माना जाना चाहिए कि यह संकट पूर्व के संकटों की तरह ही है. हालांकि इस बार जटिलता अधिक रही और बेलआउट की भविष्यवाणियों पर आशंका के बादल मंडराते रहे. विचार मायने रखते हैं, यह निहित स्वार्थों से बेहतर चीजें हैं. हमारे रेगुलेटर और चुने हुए प्रतिनिधि राजनीतिक रूप से बंधक हैं. वित्त बाजार में विशेष हितों ने अराजक नियामक तंत्र और इसकी विफ़लता से काफ़ी लाभ बटोरा है. हमारे रेगुलेटर और राजनीतिज्ञ बौद्धिक कब्जे की स्थिति से दो चार हुए हैं. अब इन्हें ज्यादा विस्तृत नियम व कायदे गढ़ने की जरूरत है.   ऐसे ही जॉर्ज सोरोस ने बुडापेस्ट की सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी में न्यू इकोनॉमिक थिंकिंग नाम से नयी पहल की शुरुआत की है. इससे कुछ नये विचार व प्रस्थापनाओं की शुरुआत होगी. न्यू इकोनॉमिक थिंकिंग (आइएनइटी) को पूरी आजादी दी गयी है, अपनी सामग्री और रणनीति के लिहाज से. सोरोस ने पेशे से जुड़े सभी प्रमुख चेहरों को जुटा कर इस बाबत कुछ करने की गुजारिश की.  भले ही वे वाम पक्ष हो दक्षिणपंथी, नये हों या पुराने या फ़िर सत्ता समर्थक हो या प्रतिष्ठान विरोधी, सबको इसमें कुछ पहल करने को कहा गया.   पिछले तीन दशकों में ओर्थक पेशे में एक विचार इस आधार पर खड़ा था कि बाजार पूर्णता में काम करता है. यह सोच वैसे शोधों के बूते जमींदोज हो गया है कि बाजार संपूर्णता में नहीं काम करता, बल्कि खामियों के साथ भी काम करता है. अब तो बाजार की गलतियों को लेकर एक विचार को समर्थन मिलता दिख रहा है.  बाजार व्यवस्था में विचार अमूमन किसी आदर्श से कम की स्थिति से काम नहीं करते. मानवीय क्षणभंगुरता और ओर्थक तंत्र की जटिलता के प्रति अपूर्ण जानकारी की दुनिया में न्यू इकोनॉमिक थिंकिंग  से कुछ अच्छा होने की उम्मीद जग सकती है. ताकि वैकल्पिक रास्तों की तलाश हो सके. इससे बाजार की सीमाओं और इसकी अपूर्णता पर बात स्पष्ट होगी और इसकी वैकल्पिक व्यवस्था का श्रीगणेश हो सकता है. कॉपीराइट : प्रोजेक्ट सिंडिकेट -2009

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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