हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

विकास की प्राथमिकताओं की अनदेखी

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/04/2010 04:35:00 AM

अवधेश कुमार

इस समय भारत की स्थिति पर नजर दौड़ाई जाए तो अंदर और बाहर उसकी परस्पर विरोधी और बेमेल तस्वीर नजर आती है। हम इस पर आत्ममुग्ध हो सकते हैं कि इन दिनों दुनिया के विकसित देश भारत को अकल्पनीय महत्व दे रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री को जलवायु सम्मेलन में भाग लेने के लिए जो कूटनीतिक कोशिशें हुईं, उतनी और किसी के संदर्भ में नहीं हुई। यकीनन यह विश्व पटल पर भारत के बढ़ते महत्व का प्रमाण है। दुनिया के प्रमुख देश भी अब वैश्विक चुनौतियों के निदान में भारत की अपरिहार्यता स्वीकार करने को विवश हैं किंतु देश के भीतर एक अजीब अराजक स्थिति है। इस समय लगता ही नहीं कि कुछ नए राज्यों के गठन के अलावा भारत की कोई अन्य प्राथमिकताएं भी हों। संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दल ही भाग्यविधाता होते हैं और हमारे राजनीतिक दल हैं कि देश की मूल प्राथमिकताओं को दरकिनार कर अपनी कल्पना का राज्य बनाने या फिर राज्य संबंधी दूसरे की कल्पना का विरोध करने में तल्लीन है। कोई मुंडन करा रहा है तो कोई दूसरे के मुंडे हुए सिर वाले शरीर के पुतले जला रहा है। यह राजनीतिक दलों की अगंभीर और गैर जिम्मेवार भूमिका की ही दु:खद परिणति है। पहले इस पर विचार करें कि देश की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? योजना आयोग द्वारा गठित एसडी तेंदुलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2004-05 में देश में गरीबों की आबादी 41.8 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा सामान्य नहीं है। स्वयं योजना आयोग उस समय गरीबों की संख्या 28.3 प्रतिशत बता चुका है। प्रति व्यक्ति खर्च या उपभोग के आधार पर गरीबी की सीमा का आकलन भारतीय परंपरा के अनुसार फिट नहीं बैठता और इसमें भारतीय दृष्टिकोण से परिवर्तन होना चाहिए किंतु यह अलग से विचार का विषय है। इस समय मूल प्रश्न यही है कि जिस देश को दुनिया भविष्य की आर्थिक और सामरिक महाशक्ति मानकर व्यवहार कर रहा है, उसमें गरीबी का यह आकड़ा शर्मनाक नहीं है? गरीबों की इतनी संख्या लेकर हम कैसी महाशक्ति बन पाएंगे? सवाल है कि हमारे राजनीतिक दलों की प्राथमिकता नए राज्यों के गठन पर बावेला मचाना होना चाहिए या फिर गरीबी के कलंक के अंत के लिए एकजुट होकर कमर कसना? अगर गरीबी के आंकड़े के साथ महंगाई के ताजा आंकड़े को मिला दें तो स्थिति दिल दहलाने वाली है। महंगाई दर 4.6 प्रतिशत हो चुकी है। खाने के सामानों की दर में तो तीन प्रतिशत की वृद्धि है लेकिन खाघ महंगाई 17.7 प्रतिशत बढ़ी है। यानी महंगाई से त्रस्त आम आदमी के लिए राहत की कोई संभावना नहीं है। किसी भी आर्थिक आंकड़े में इस वर्ग की आय बढ़ने की तस्वीर नहीं है। जाहिर है, देश की इतनी बड़ी आबादी को अपनी कम आय में जीने के लिए और कतरब्यौंत करनी होगी। ये स्थितियां एक दो दिनों में दूर नहीं हो सकतीं किंतु अगर राजनीतिक दल नियति निर्धारक हैं तो उन्हें उन सारे कारणों की ईमानदारी से छानबीन पर फोकस करना चाहिए कि आखिर विकास के इतने दावों के बावजूद देश में गरीबों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों है? क्यों कुछ लोगों की अमीरी बढ़ रही है तो दूसरी आ॓र कंगालों की फौज भी बड़ी हो रही है? सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद आम उपभोक्ता वस्तुओं के दाम घटने की बजाय क्यों उछल रहे हैं? कौन सी शक्तियां बाजार-भाव का निर्धारण कर रही है? कारणों की ईमानदार छानबीन हो तो एकमात्र निष्कर्ष यही आएगा कि देश में आमूल बदलाव व पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। अगर देश के राजनीतिक दल जन सेवा की एकमात्र भूमिका के प्रति ईमानदार होते तो उनकी प्राथमिकता भारत के पुनर्निर्माण के लिए काम करना होता। आर्थिक मंदी, दुनिया में आतंकवाद-उग्रवाद के खतरे तथा जलवायु संकट ने वर्तमान सम्पूर्ण ढांचे को प्रश्नों के घेरे में ला दिया है। क्या नेपाल के मंत्रिमंडल का हिमालय की गोद में बैठक करके सम्पूर्ण हिमालयी सभ्यता पर मंडराते खतरे का आभास कराने का प्रयास हमारे लिए इसके बचाने के लिए प्राणपण से संकल्प लेने का अवसर नहीं हो सकता? किंतु विभ्रमित राजनीतिक दल मानो किसी कयामत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस समय संसद सत्र चल रहा है और भयावह स्थितियां सामने हैं। इसमें एक स्वस्थ लोकतंत्र का तकाजा था कि सरकार और विपक्ष दोनों इन पर गंभीर बहस करें और प्राथमिकताओं का निर्धारण कर उनको हासिल करने के लिए रास्ता निकालें, किंतु दुर्भाग्य कि संसद भी इनकी अगंभीरता और गैर जिम्मेवार भूमिका का शिकार हो चुकी है। राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने संसद कार्यवाही की नियमावली में ऐसा संशोधन करने का सुझाव दिया है जिसमें प्रश्नकाल में प्रश्न पूछने वाले सांसदों की अनुपस्थिति में भी उनका प्रश्न पूछा जा सके। हमने देखा कि 30 नवंबर को लोकसभा में प्रश्न पूछने वाले सांसद क्रमवार एक से 28 तक अनुपस्थित थे। राज्यसभा में ऐसे सांसदों की संख्या छह थी और सभापति को पूछना पड़ा कि क्या यह एक वायरस की तरह फैल रहा है? हमारे राजनेता व सांसद अपने तरीके से इसका बचाव कर रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि प्राथमिक शिक्षा अधिकार विधेयक संसद पटल पर रखा गया और उसे पारित करने के समय राज्यसभा में केवल 55 सांसद उपस्थित थे। राजनीतिक दलों की गैर जिम्मेवार भूमिका का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता है? 11 दिसंबर को बिमस्टेक देशों के बीच उग्रवाद और जलवायु परिवर्तन पर समझौता हुआ। बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, थाइलैंड, म्यांमार, नेपाल और भूटान जैसे देशों के इस संगठन का इन दो मामलों पर समझौता कितना महत्वपूर्ण परिणामों वाला हो सकता है इसका आभास हम सबको है। पूर्वोत्तर ही नहीं, जेहादी आतंकवाद और माआ॓वादी आतंकवाद से मुठभेड़ के लिए भी इन देशों का सहयोग आवश्यक है। बांग्लादेश, भारत, नेपाल, भूटान, म्यामांर सम्पूर्ण हिमालयी सभ्यता के अंग हैं। श्रीलंका और थाईलैंड भी इससे जुड़े हैं। हिमालयी सभ्यता बचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी लेकिन देश में राजनीतिक दलों का इनसे कोई सरोकार हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आता। 1998 के नाभिकीय परीक्षण को लेकर देश के मुट्ठी भर वैज्ञानिक प्रश्न खड़े कर भारत की क्षमता को संदेह के घेरे में ला रहे हैं, दूसरे पक्ष के वैज्ञानिक उसका खंडन कर रहे हैं, पर हमारे राजनीतिक दल इनसे निरपेक्ष बैठे हैं। क्यों? स्पष्ट है कि इस प्रकार के अगंभीर और विभ्रमित राजनीतिक दलों वाला देश कभी भी वास्तविक महाशक्ति नहीं बन सकता। जब आप गैर प्राथमिक मुद्दों पर उलझे रहेंगे, देश को उच्चतम शिखर पर ले जाने का उपक्रम ही नहीं होगा तो फिर उसका परिणाम क्या आ सकता है? जाहिर है, अगर भारत को ठोस विकास का लक्ष्य हासिल करना है, गरीबी के कलंक और आर्थिक असमानता की खाई को पाटकर विश्व पटल पर सम्मानित और प्रेरणादायी स्थान पाना है तो फिर सबसे पहले हमें अपनी राजनीति को गंभीर और उत्तरदायित्वपूर्ण बनाना होगा।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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