हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

गायब हो रही हैं औरतें

Posted by Reyaz-ul-haque on 1/02/2010 04:42:00 AM

मल्लिका साराभाई

नोबेल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन का अनुमान है कि बीते तीन दशकों में दक्षिण एशिया और अफ्रीका से दस करोड़ महिलाएं विलुप्त हो चुकी हैं। कई लोग इस पर माथापच्ची कर सकते हैं कि यह आंकड़ा दस करोड़ होगा या पांच करोड़, लेकिन मुद्दे की बात यह है कि यह खबर काफी भयावह है और ऐसा रुझान मानवता के भविष्य को लेकर हमें आक्रांत करता है।

जलवायु परिवर्तन से मानवता खत्म होगी या नहीं, यह हमें नहीं मालूम, लेकिन यदि महिलाओं को लेकर यही रुझान जारी रहा तो इससे जरूर मानवीय सभ्यता का समूल नाश हो जाएगा। महिलाओं की संख्या जितनी कम होगी, बच्चों की संख्या भी उसी अनुपात में कम होती जाएगी। यहां तक कि उन पुरुष प्रधान मानसिकता वाले लोगों के लिए भी यह बुरी खबर है, जिनके लिए महिलाएं केवल बच्चे पैदा करने वाली मशीन हैं। यदि यह खबर आपके लिए बुरी नहीं भी है, तब भी आपके पोतों के लिए तो है ही।

भविष्य हमारे सामने है। गुजरात के पटेल समाज का एक उदाहरण लिया जा सकता है। गुजरात में इस समाज के लोगों की तादाद अच्छी-खासी है। शायद पटेल समाज ने भविष्य की आपदा को कुछ साल पहले ही महसूस कर लिया था और एक विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया था। इस यज्ञ में एकत्र लोगों को कन्या भ्रूण की रक्षा करने की शपथ दिलवाई गई थी (जहां तक मुझे जानकारी है, ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि शपथ समारोह में जो १२ लाख लोग उपस्थित हुए थे, उनके घरों में पैदा होने वाली लड़कियों की संख्या में कोई इजाफा हुआ अथवा नहीं)।

राज्य के कुछ पटेल गांवों में स्थिति यह है कि वहां २क् साल से कम उम्र की एक भी लड़की नहीं मिलेगी। यह तथ्य २क् सालों में महिलाओं के संहार की ओर साफ इशारा करता है। हरियाणा के लोग ‘फैमिली वाइफ’ खरीदने के लिए केरल जाते हैं और उन बदकिस्मत महिलाओं के साथ लौटते हैं, जो न तो किसी को समझ सकती हैं और न ही किसी से बातें कर सकती हैं। इन महिलाओं का इस्तेमाल सेक्स और घरेलू कार्यो के लिए किया जाता है। ‘फैमिली वाइफ’ से मतलब है कि उसका उपभोग परिवार के सभी पुरुष सदस्य करते हैं।

तथाकथित सभ्य समाज से आने वाले लोग जो अपनी बेटियों के लिए भव्य शादियों और भारी-भरकम दहेज की योजना बनाते हैं, क्या वे ऐसी स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं? किलो में सोना व सैकड़ों साड़ियां खरीदने की हायतौबा मचाने और दूल्हे के लिए नया घर तलाशने की कवायद में क्या हम नदारद होती बेटियों और स्वयं अपने कार्यो के बीच प्रत्यक्ष और संभवत: एकमात्र प्रासंगिक संबंध नहीं देखते हैं?

कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश बेमानी साबित हुए हैं और उलटे उनसे भ्रष्टाचार व अपराध में बढ़ोतरी ही हुई है। हममें से कई लोग ऐसे डॉक्टरों के बारे में जानते हैं, जो लिंग के परीक्षण पर प्रतिबंध की वजह से कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए खुले में तो कुछ नहीं कहते, लेकिन सांकेतिक रूप में सब कुछ साफ कर देते हैं। लड़की होने पर वे ‘जय माता दी’ कहकर और लड़का होने पर ‘जय रामजी की’ कहकर बधाई देते हैं। कुछ लालची किस्म के व्यापारियों ने तो रिक्शों पर ही परीक्षण प्रयोगशालाएं बना ली हैं, जो झुग्गी बस्तियों व गांवों में फेरे लगाते हैं और लोगों के दरवाजों पर ही बच्चे के लिंग के बारे में जानकारी देते हैं।

लेकिन यह पूरी कहानी का केवल एक पहलू है। आखिर हम दहेज से होने वाली मौतों पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं? लाखों लड़कियों को दहेज की वजह से इतना सताया जाता है कि वे अंतत: परेशान होकर खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर लेती हैं। या फिर उन्हें सता-सताकर मार दिया जाता है। क्या दहेज किसी लड़की की सलामती की गारंटी देता है? या फिर हम दहेज के साथ लड़की को विदा करके स्वयं को यह कहकर तमाम चिंताओं से मुक्त कर लेते हैं कि हमने तो अपने परिवार के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन कर लिया? यहां सवाल यह है कि कभी जिस मुद्दे पर काफी खुलकर चर्चा की जाती थी, क्या आज वह इतना सामान्य हो गया है कि हम दिए जा रहे दहेज के बारे में दबे हुए स्वर में भी बातचीत नहीं करते हैं? जब एक अपराध बहुत सामान्य हो जाता है, यहां तक कि प्रशंसनीय भी, तो वह परंपरा में शामिल हो जाता है।

मैं जानती हूं कि दहेज के मुद्दे पर हममें से ही कई लोग कहेंगे, ‘हां, यह ठीक है कि दहेज अच्छी बात नहीं है, लेकिन इसका विकल्प क्या है? आखिर कोई कब तक लड़कियों को घर पर बिठाकर रखेगा?’ स्वयं से यह सवाल पूछिए, ‘भारत में जो स्थिति है, उसके मद्देनजर इस बात की संभावना ५क् फीसदी है कि आपकी बेटी या बहन को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाएगा। क्या आप वाकई में ऐसा चाहेंगे कि आपकी बेटी या बहन इस तरह से प्रताड़ित हो?’ तब मुझे आपकी ओर से यह सुनने को मिलेगा, ‘पर समाज क्या कहेगा?’

फिर से अपने आप से पूछिए कि समाज आपको क्या कहेगा? क्या आप एक घटिया अभिभावक हैं? कि यह तो हमारे समाज की स्थापित परंपरा है? कि क्या कुटुंब की प्रतिष्ठा धूल में नहीं मिल जाएगी? कि पड़ोसी ने तो अपनी बेटी के विवाह में ५क् लाख का दहेज दिया और यदि आप कम देंगे तो क्या इससे आपकी नाक नीची नहीं हो जाएगी? कि क्या यही वह तरीका नहीं है जिससे आप अपनी बेटी या बहन के प्रति प्यार जता सकते हैं और उसे यह आभास करवा सकते हैं कि आपको उसकी कितनी चिंता है?

समाज को ऐसा कहने दें। स्वयं से फिर पूछें कि आपके लिए क्या ज्यादा मायने रखता है? आपकी बेटी की जिंदगी या आपकी नाक? क्या कभी आप आग में झुलसे हैं? और ऐसा होने पर चीखे भी होंगे? तब कल्पना कीजिए अपनी बेटी के बारे में कि उस पर कोई केरोसिन उड़ेल रहा है या फिर स्टोव फट पड़ा है। उसे होने वाले असहनीय दर्द की कल्पना कीजिए और यह भी कि इसके लिए आप जिम्मेदार हैं।

अब समय आ गया है कि आप अपनी बेटी या बहन की जिंदगी के लिए समाज में सबसे बदतरीन का सामना करने और यहां तक कि समाज से बहिष्कृत होने के लिए भी तैयार हो जाएं। दहेज से इनकार करें, चाहे वह आपके लिए हो या फिर आपके बच्चे या बहन के लिए। ऐसा करने वाले आप सर्वप्रथम बनें। याद रखें, समाज आपकी बेटी या बहन को प्रताड़ित होने या मरने से नहीं बचा सकता। यह काम आज ही करें, कल तो फिर बहुत देर हो जाएगी।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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