हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

भारत में आदिवासी प्रश्न

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/06/2010 02:04:00 PM

'आदिवासी समेत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक अपनी क्षमताओं को साकार करने, देश में आम समाज का हिस्सा बनने तथा सार्वभौमिक सभ्यता तक पहुंच बनाने के लिए सम्पूर्ण अवसरों की दरकार होती है। एक व्यक्ति की ऐसी प्रगति तभी संभव होगी, यदि आदिवासियों को महज तथाकथित ‘अधिसूचित क्षेत्रों’ में न रखा जाए और अरण्येर अधिकार के नाम पर बहलाया न जाए। हर आदिवासी बच्चे को उसके चुनाव के मुताबिक कवि, डॉक्टर, इंजीनियर, संगीतकार, डाकिया, फुटबॉल खिलाड़ी या अकाउंटेंट अथवा कोई भी अन्य पेशा चुनने में मदद की जानी चाहिए। इस लिहाज से संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासियों के लिए संभावनाओं को बाधित करती है। भारत के आदिवासी विभाजित, बिखरे हुए और अनगिनत बोलियों के बोझ तले दबे हुए हैं। वे खुद में संवाद नहीं कर पा रहे और बाहरी दुनिया से भी परिचित नहीं हैं। उन्हें अंधा न बनाए रखें, प्लेटो के प्राचीन गुहांधकार में जकड़े न रखें।'  फ्रंटियर में प्रकाशित अपने इस लंबे लेख में रंजीत साउ ने कई सवाल उठाए हैं, देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे आदिवासियों के संघर्षों के आगे भी और इस देश की राजसत्ता के आगे भी. इनके जवाब भी शायद अपनी-अपनी तरह सामने आएंगे- आ रहे हैं. हम कोशिश करेंगे कि समय-समय पर उन जवाबों का जायजा भी लिया जाए.हिंदी अनुवाद समयांतर से साभार.


भारत में आदिवासी प्रश्न

दुनिया में लोकतंत्र का पहला फूल सैन्य आविष्कारों के साये में ग्रीस में खिला। हथियारों का विनिर्माण काफी आधुनिक हो चला था। अब राज्यों के पास छोटी फौजी टुकडिय़ों की जगह बड़ी सेनाओं को हथियारों से लैस करने की तकनीक आ चुकी थी। एक बार में हमला करने वाले पुराने जमाने के लड़ाकुओं की जगह राज्यों ने अब भारी-भरकम हथियारों से संपन्न सैन्य बलों को तैनात करना शुरू कर दिया था। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह भूस्वामी हो या किसान, जो खुद को इन हथियारों (होपला) से लैस करने की क्षमता रखता था, वह इस सैन्य टुकड़ी में शामिल हो सकता था। इस नई सेना ने एक नए किस्म की समानता को जन्म दिया।
होपला से लड़े जाने वाले युद्ध की खासियत कंधे से कंधा मिला कर सट कर खड़े होने वाले आठ फौजियों की एक कतार थी, जिसे फैलेंक्स कहते थे। हर सिपाही अपनी वृत्ताकार ढाल को अपनी बाईं ओर रक्षा के लिए रखता था और अपने बगल वाले सिपाही के दाएं कंधे को कस कर पकड़े रहता था। यह जन सेना थी, जिसमें नागरिक ही सैनिक बन चुके थे। होपला ने ग्रीस का रूपांतरण कर डाला और एक सुनियोजित तरीके से गढ़े गए लोकतंत्र की बुनियाद रखी। एक किसान जो अब फैलेंक्स की कतार में राजपरिवार के सदस्य के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा होता था, राजशाही को देखने का उसका नजरिया अब बदल चुका था।
ईसा पूर्व 510 में एथेंस पर स्पार्टा का हमला हुआ। एक निरंकुश तानाशाह के पुत्र क्लीस्थेनीज के नेतृत्व में एथेंस की सेना ने आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया और उसे सिटी मजिस्ट्रेट बना दिया। तीन साल के भीतर ही चौंकाने वाले सुधार लागू किए गए। क्लीस्थेनीज ने अनगिनत पारंपरिक जनजातियों को समाप्त कर के सभी को दस इकाइयों का सदस्य बना दिया और इस तरह एक जनजातीय शहर राज्य का रूप ले सका, जो धीरे-धीरे भूमध्य सागर के पूर्वी तट की सबसे समृद्ध सैन्य, वाणिज्यिक, कलात्मक और बौद्धिक ताकत बन कर उभरा। तकरीबन ऐसे ही सुधारों ने 2000 साल बाद भीतरी एशिया में मंगोलों के लिए कहीं ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे दिए।
लोगों की विधायी परिषद के सदस्यों का चयन हर साल मध्य वर्ग के बीच में से होता था और एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही इस पद पर रह सकता था। इस तरह एक ही समय में अधिकतर किसान, शिल्पकार और व्यापारी परिषद के सदस्य होते और इस तरह उनके नागरिक होने की परिभाषा में बिल्कुल नया और सार्थक आयाम जुड़ गया था। अब तक आविष्कृत राजनीतिक प्रणालियों में यह सर्वाधिक समतापूर्ण प्रणाली थी जिसका असर ग्रीक जगत पर रूपांतरकारी था। दुनिया में लोकतंत्र का यह पहला संगठित स्वरूप था। और इसे किसने किया? एथेंस के उन आदिवासियों ने, वह भी आज से 2500 सदी से भी पहले।
आदिवासियों का इतिहास और उनका नृतत्वशास्त्र अधिकांशत: उन लेखकों द्वारा लिखा गया जो औपनिवेशिक शासकों की सेवा में नियुक्त थे। उन्होंने जनजातियों द्वारा किए गए कार्यों के विनाशक पहलुओं पर जोर दिया तथा व्यापार, खोज और राजनीतिक व सांस्कृतिक संस्थाओं में उनके योगदान की उपेक्षा करते हुए एक ऐसी तस्वीर खींची जो अधूरी और विकृत थी। परिणाम यह हुआ कि आदिवासी जीवन को लेकर आम धारणा आज भी काफी धुंधली और एकपक्षीय है। एक ओर आदर्श तो दूसरे सिरे पर भ्रष्ट।
आज भारत क्रांतिकारी बगावत की चुनौती को झेल रहा है जिसे माओवादी (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) या नक्सल (पश्चिम बंगाल में 1967 में नक्सलबाड़ी में शुरू हुए सशस्त्र संघर्ष से यह नाम आया है) सघर्ष कहा जाता है, जिसका केंद्र वे जंगल हैं जहां अधिकतर आदिवासी रहते हैं। यानी इस संघर्ष को मोटे तौर पर एक आदिवासी उभार मान लिया जाता है, जिससे दुनिया भर में आदिवासियों की दास्तानों का एक नया अध्याय खुलता है। यह अध्याय जमीन जीत लेने के किसी अभियान या उपनिवेश बनाने से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह राजनीतिक सत्ता हथियाने और सामाजिक-आर्थिक न्याय सभी को दिलाने का एक महत्वाकांक्षी संघर्ष है।
इस आलेख में हम शुरुआत करेंगे उन आदिवासी समुदायों के वैश्विक परिदृश्य से, जो इस आधुनिक सभ्यता का मार्ग प्रशस्त करने में शामिल रहे हों। अगला परिदृश्य भारत के कुछ आदिवासी समुदायों द्वारा दिए गए योगदानों को दिखाता है, जिनमें कुछ ऐसे समुदाय हैं जो अब अलग-थलग पड़ गए हैं और जिन पर ‘आदिवासी’ होने का ठप्पा लगा दिया गया है। इस समग्र परिप्रेक्ष्य में ही हमें भारत के आदिवासी असंतोष से पैदा हो रही मौजूदा घटनाओं को देखना होगा। आगे क्या करना है, यह सवाल सरकार, जनता और नक्सल तीनों के लिए खुला है।


सभ्यता के निर्माता

अंग्रेजी में आने वाले शब्द ‘ट्राइब’ का मूल लैटिन का ‘ट्राइबस’ है जो रोमन राज्य में मूल त्रिपक्षीय जातीय विभाजन के लिए इस्तेमाल होता है। कई नृविज्ञानी इसका प्रयोग उन समाजों के लिए करते हैं जो मोटे तौर पर कुटुंब के आधार पर संगठित हुए। यहां भारत में सरकारी भाषा में एक आदिवासी समुदाय मूलत: प्रशासनिक और राजनीतिक अवधारणा है। इस अवधारणा में आदिवासी होने का सामाजिक और आर्थिक पक्ष गायब है।
आदिवासी समुदायों की प्रकृति को समझने के लिए हमने छह समुदायों के उदाहरण लिए हैं- योरोप से तीन-वाइकिंग, गोथ और वैंडल, एशिया से दो-स्काइथियन और मंगोल तथा अमेरिका से एक-संयुक्त राज्य अमेरिका के मूलवासी (नेटिव)। शुरुआती पांच कोटियां बेहद चतुर, विनाशक और वर्चस्व का प्रतीक रहीं जबकि आखिरी समुदाय बर्बर सत्ता और उत्पीडऩ का शिकार रहा। इनमें इतना अंतर आता कहां से है?
वाइकिंग: इंग्लैंड की स्थापना पांचवी ईसवीं में जर्मैनिक और स्कैंडिनेवियन आदिवासियों ने की। इसका नाम भी जर्मैनिक आदिवासी समुदाय एंगल्स पर पड़ा है। स्कैंडिनेविया के वाइकिंग खोजी, लड़ाकू, व्यापारी और समुद्री लुटेरे थे जिन्होंने आठवीं और ग्यारहवीं सदी के बीच योरोप के विशाल क्षेत्र का औपनिवेशीकरण कर डाला। उन्होंने उत्तरी अटलांटिक की यात्राएं कीं, उत्तरी अफ्रीका, पूर्वी रूस, कस्तुनतूनिया और मध्यपूर्व तक गए। वाइकिंग उत्तरी अमेरिका भी गए और वहां कनाडा में उन्होंने एक अल्पजीवी रिहाइश बनाई। वाइकिंग के वर्चस्व की तीन सदियों को इतिहास में वाइकिंग युग के नाम से याद किया जाता है। भौगोलिक स्तर पर वाइकिंग युग का संबंध सिर्फ स्कैंडिनेवियाई भूमि (यानी आधुनिक डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन) से नहीं रहा, बल्कि उत्तरी जर्मनी के तहत आने वाले इलाकों से भी रहा।
वह इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, धर्म और समुद्री कलाओं का असर था जिसने वाइकिंग को उस दौर में विशिष्टता प्रदान की। स्कैंडिनेवियाई भूमि की कृषि उत्पादक क्षमता से कहीं ज्यादा वहां की आबादी हो गई थी। घर में युवाओं की बढ़ती तादाद के मद्देनजर समुद्र पार पैर फैलाना इन तटवर्ती लोगों के लिए अर्थ रखता था, चूंकि इनके पास बेहतर समुद्री तकनीकें मौजूद थीं।
पांचवीं सदी में रोमन साम्राज्य के पतन के बाद योरोप और शेष यूरेशिया के बीच व्यापार प्रभावित हुआ। सातवीं सदी में इस्लाम के उभार ने पश्चिमी योरोप के साथ व्यापार को प्रभावित किया। नए व्यापार मार्गों को खोलकर वाइकिंग समुदाय ने व्यावसायिक समेत कई तरीकों से खुद को लाभ पहुंचाया।
गोथ: गोथ और वैंडल वाइकिंग समुदाय के अग्रज कहे जा सकते हैं। इन्हें जर्मनी के जंगलों का बर्बर समुदाय माना जाता है। इन तीनों की जड़ें स्कैंडिनेविया में ही हैं। ये तीनों स्वीडन के उप्सल शहर में तीन देवताओं वाले एक ही मंदिर में अराधना करते थे। ये तीन देवता थे- युद्ध का देवता थोर, उर्वरता की देवी और गर्जन का देवता। यह एक ऐसा धर्म था जो लोगों और जलवायु के हिसाब से बना था। गोथ और वैंडल को अक्सर इतिहासकार लड़ाइयों में उनकी बर्बरता के लिए ही याद करते हैं बजाय बाद में रोमन साम्राज्य को बनाए रखने में उनकी भूमिका या फिर उत्तरी अफ्रीका के उनके दीर्घजीवी साम्राज्यों के चलते।
गोथों ने 262 ईसवी में रोमन साम्राज्य पर पहला बड़ा हमला किया था, लेकिन 271 तक उनकी हार हुई। जो बच गए वे इसी साम्राज्य का हिस्सा बन गए और कई रोमन सेना में चले गए। एक बार फिर गोथ राष्ट्रीयता का उभार हुआ और उसने एशिया माइनर, ग्रीस और इटली पर हमला कर उन्हें लूट लिया। उन्होंने 410 ईसवीं में रोम पर हमला किया और तकरीबन समूचे आईबेरियन पेनिनसुला पर उनका शासन कायम हो गया। आखिरकार, 711 ईसवी में मुस्लिम उमय्याग के आक्रमण के सामने वे हार गए।
वैंडल: पांचवीं सदी के उत्तराद्र्ध में वैंडलों ने रोमन साम्राज्य में प्रवेश किया और 455 ईसवी में रोम को लूट लिया। भले ही, उनकी लूट पुराने आक्रमणकारियों जितनी बड़ी नहीं थी, लेकिन आधुनिक लेखक इस घटना के लिए उन्हीं पर आरोप लगाते हैं। यहीं से अंग्रेजी में ‘वैंडलिज्म’ शब्द आया जिसका अर्थ विवेकहीन, तोड़-फोड़ और लूट है, खासकर कलाकृतियों पर हमला।
उत्तरी अफ्रीकी तट पर वैंडलों की फतह एक रणनीतिक कदम था, बिल्कुल विकिंग की तरह ताकि भूमध्य (मेडिटेरेनियन) पर हमला किया जा सके। उन्होंने भूमध्य को लूटने के लिए एक बेड़ा भी बनाया।
इन तीन जनजातियों का यह संक्षिप्त आख्यान दिखाता है कि दूसरों को प्रभावित करने वाली किसी परियोजना में कामयाबी के लिए एक निश्चित किस्म की सहूलियत और बेहतर क्षमता की जरूरत होती है। वाइकिंग युग से काफी पहले सिर्फ तीन गतिविधियां ही केंद्र में थीं- व्यापार, समुद्री लूट और जमीन पर कब्जा। वाइकिंग द्वारा कम समय में की गई ज्यादा लूट संभव नहीं हो पाती, यदि स्कैंडिनेवियाई लोगों ने बेहतर जहाज नहीं बनाए होते। अटलांटिक की लंबी यात्राओं के लिए पहली शर्त तो यही थी कि जहाजी अपने अक्षांश को तय कर सकें। वाइकिंग के पास जो आधुनिक तकनीक थी, उससे वे साल भर के दौरान हर हफ्ते दिन के बीचों-बीच सूर्य के अक्षांश को माप सकते थे। ऐसी सूचना सिर्फ एक लकड़ी जैसे सामान्य उपकरण पर दर्ज की जाती जिस पर कुछ चिन्ह बने हुए होते और जहाजी इसके माध्यम से गंतव्य स्थान के अक्षांश की तुलना में अपने अक्षांश का अंदाजा लगा लेता। दिन के मध्य में सूर्य का अक्षांश अथवा धु्रव तारे की स्थिति या फिर दोपहर में पडऩे वाली परछाई के माप और क्षितिज रेखा के ऊपर तारे की ऊंचाई का माप जिसे अंगूठे, बित्ते या हाथ से नापा जाता – यह सभी अक्षांश का एक मोटा अंदाज दे देते थे जो कि पश्चिम की यात्राओं में देशांतर के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था।
स्काइथियन: स्काइथियन घोड़ा चलाने वाले बंजारे थे, एक प्राचीन ईरानी (फारसी) आदिवासियों का समूह थे जो ककेशस से आए थे। एशियाई लोग उन्हें शक के नाम से जानते थे। भारत में आज दो किस्म के कैलेंडर चलते हैं। एक बीसी/एडी वाला परिचित ग्रेगोरियन कैलेंडर और दूसरा शक सम्वत् वाला कैलेंडर जो शक साम्राज्य पर आधारित है जिसकी शुरुआत भारत में 78 ईसवी से मानी जाती है। भारतीय ग्रंथों रामायण, महाभारत आदि में शकों के कई संदर्भ हैं।
शक समुदाय के लोग छोटे-छोटे रजवाड़ों में बंट गए थे जैसे छत्रप इत्यादि, और धीरे-धीरे वे भारतीय समाज का हिस्सा हो गए और इस पर अपनी छाप छोड़ी। उत्तर पश्चिम भारत में शक राजा रूद्रदमन ने संभवत: अशोक का अनुकरण कर धर्म को अपना लिया और अपने शिलालेखों पर उनके धर्मोपदेशों को भी सहर्ष जगह दी। इस क्षत्रप राजा ने शास्त्रोक्त संस्कृत की वापसी में बड़ी भूमिका निभाई और इस काम को उनकी स्मृति में लगे उस शिलालेख से प्रेरणा मिली जो प्राकृत, मगधी या पाली में नहीं थे, बल्कि जिन पर संस्कृत में लिखा था। जाहिर तौर पर क्षत्रप द्वारा संस्कृत का प्रयोग दरअसल स्थानीय शासक वर्ग में विदेशी मूल के शासक के प्रति सद्भाव पैदा करना था ताकि ‘क्षत्रप यानी शक शासक के संदर्भ में राजा के चुनाव के विकल्प का खतरा खत्म किया जा सके।’ इसके बाद संस्कृत के शिलालेख सुमात्रा, जावा, इंडो-चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य हिस्सों में जल्द ही स्वीकार्य हो गए। अभारतीय साम्राज्यों को भी इस प्रतिष्ठित भाषा को अपनाने से ख्याति और विशिष्टता प्राप्त हुई।
मंगोल: बंजर स्तेपी की सर्द हवाओं में पले-बढ़े चंगेज खान ने आरंभिक तेरहवीं सदी में मंगोल साम्राज्य की स्थापना की। प्राचीन ग्रीक इतिहास से अनभिज्ञ उसने मंगोलिया के बीहड़ों में उसी आदिवासी सुधार के मॉडल की एक अनुकृति रची, जो क्लीस्थेनीज के नेतृत्व में एथेंस में थी, जिसके बारे में बताया जा चुका है।
उसकी सेना ने सिर्फ 25 वर्षों में उतनी जमीन और लोगों पर फतह हासिल की जो काम चार सौ साल में रोमन कर पाए थे। जिन देशों में मंगोल फतह हुई, तकरीबन हर जगह उन्होंने सांस्कृतिक संचार में उन्नति की, व्यापार को विस्तार दिया और सभ्यता इन स्थानों में फली-फूली। अपने योरोपीय व एशियाई समकक्षों से कहीं ज्यादा प्रगतिशील चंगेज खान ने उत्पीडऩ को समाप्त किया, सार्वभौमिक धार्मिक स्वतंत्रता का आगाज किया तथा राजसी वैशिष्ट्य के सामंती ढांचे को तोड़ डाला। मंगोलिया में आत्यंतिक जनजातीय हिंसा के बीच पोषित चंगेज खान अपने पीछे आधुनिक सभ्यता के निर्माण की एक महागाथा को छोड़ गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका में मूलवासी (नेटिव): 1995 में हुई अमेरिकी जनगणना में मूलवासी समुदायों ने खुद को नेटिव अमेरिकी कहे जाने के बजाय इंडियन या अमेरिकन इंडियन कहे जाने को तरजीह दी। उनके लिए इंडियन शब्द इंडिया से नहीं आता, बल्कि मूल स्पैनिश एन डियो से आता है जिसका अर्थ है ‘‘ईश्वर में’’। अमेरिका में 1513 में प्रवेश करने वाला पहला औपनिवेशिक स्पेन का एक अन्वेषी था।
1924 में नेटिव समुदाय को अमेरिकी नागरिकता नवाजी गई। 1975 में उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया। आज देश के भीतर संघीय मान्यता प्राप्त 562 जनजातीय सरकारें हैं। इनके पास अपनी सरकार बनाने, कानून लागू करने (दीवानी और फौजदारी), कर लगाने, लाइसेंस देने और गतिविधियों को नियामित करने, आदिवासी क्षेत्रों से लोगों को अलग करने और क्षेत्र का निर्धारण करने के अधिकार हैं। स्वप्रशासन के अधिकारों पर वे ही बंदिशें लागू हैं जो अन्य प्रांतों पर हैं; मसलन, न तो जनजातियों को और न ही प्रांतों को यह अधिकार हैं कि वे युद्ध, विदेशी रिश्तों या मुद्रा (कागजी और सिक्के दोनों) जारी करने संबंधी गतिविधियों में संलग्न हों।
समाज में आदिवासियों के समावेश की रफ्तार धीमी रही है। अठारहवीं सदी में जॉर्ज वॉशिंगटन ने माना था कि नेटिव अन्य नागरिकों के समान हैं लेकिन वे निचले दर्जे के हैं और इसीलिए उन्हें आम समाज का हिस्सा बनाने के लिए उन्होंने आदिवासियों को ‘‘सभ्य’’ बनाने की वकालत की। अगली सदी में इनके बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल खोले गए। लेकिन इन छात्रों के लिए यह अनुभव किसी सदमे से कम नहीं था, जहां उन्हें अपनी मूल भाषा बोलने की मनाही थी, ईसाइयत सिखाई जाती थी और अपने मूल धर्म का पालन करने पर रोक थी। इसके अलावा कई अन्य तरीकों से उन्हें उनकी मूलवासी अस्मिता को त्याग कर योरोपीय-अमेरिकी संस्कृति अपनाने को बाध्य किया जाता था।
एकल जातीय समूहों के बजाय नेटिव अमेरिकन सैकड़ों जातीय-भाषायी समूहों में बंटे हुए हैं। इनका सबसे बड़ा पेशा जुआ है। कई समुदायों के अपने कसीनो (जुआघर) हैं और इनके प्रभावों पर भी काफी चर्चा होती है। कुछ समुदायों का मानना है कि कसीनो जनजातीय संस्कृति को भीतर से खा रहे हैं।
नेटिव अमेरिकियों की आर्थिक स्थिति कमजोर है। सभी आंकड़ों में वे सबसे नीचे आते हैं। सभी अल्पसंख्यकों के बीच इनमें किशोरों की आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है, किशोरियों की गर्भावस्था की दर सर्वाधिक है, हाई स्कूल ड्रॉप आउट दर भी सर्वाधिक है, प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है और बेरोजगारी की दर 50 से 90 फीसदी के बीच है।
हारवर्ड प्रोजेक्ट की एक रिपोर्ट में आदिवासियों की आर्थिक प्रगति में बाधाओं का जिक्र है। इस सूची में कुछ मुख्य कारण निम्न हैं: पूंजी तक पहुंच का अभाव, आदिवासी क्षेत्रों के विपन्न प्राकृतिक संसाधन, बाजारों से दूरी के कारण होने वाले नुकसान, परिवहन की उच्च लागत। इसमें आदिवासी संस्कृति भी शामिल है। शिक्षा और कारोबारी तजुर्बे की कमी आम तौर पर संभावित उद्यमियों की राह में बड़ी चुनौती बन कर उभरती है।
इस खंड में जिन छह किस्म के आदिवासियों की बात की गई है, वे अपने-अपने प्रयासों में कामयाबी के लिहाज से बिल्कुल जुदा हैं। हालांकि एक चीज इनमें समान है: आदिवासियों का निष्पक्ष और सच्चा इतिहास अब तक नहीं लिखा गया है। इन सभी उदाहरणों में अंतिम उदाहरण आगे के विश्लेषण से मेल खाता है। अमेरिकी इंडियन आदिवासी समुदाय और दक्षिण एशियाई इंडियन आदिवासी इतिहास के पन्नों में एक-दूसरे के रिश्तेदार जान पड़ते हैं। दोनों को ही दास बनने पर मजबूर किया गया, और दोनों ही मुख्यधारा के समाजों का हिस्सा अब तक नहीं बन सके हैं।


विश्लेषण का एक मॉडल

वैदिक युग ने कृषि युग का मार्ग प्रशस्त किया। पहली प्रमुख ग्रामीण रिहाइश राजकीय नियंत्रण में बसाई गई। चौथी सदी के उत्तराद्र्ध में चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में चाणक्य (कौटिल्य) ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में आदिवासियों को संगठित करने की प्रक्रिया का जिक्र किया है कि कैसे उन्हें दास बनाकर खेती की जमीनों पर खटाया जाए। ‘‘राजकीय एजेंटों की सभी आदिवासी समुदायों तक पहुंच बनानी चाहिए; उनके बीच ईष्र्या, विद्वेष, विवाद आदि के संभावित स्रोतों की तलाश करनी चाहिए; और असहमति के बीजों को उनके बीच डालना चाहिए। समुदाय के भीतर उच्च पद पर बैठे लोगों को निचले पदों के लोगों के साथ एक साथ बैठकर खाना खाने या विवाह करने से हतोत्साहित किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, निचले दर्जे के आदिवासियों को बराबरी का दर्जा प्राप्त करने और विवाह करने की मांग करने के लिए उकसाया जाना चाहिए। परिवार और समुदाय के भीतर निचले दर्जे के लोगों को समानता की मांग करने के लिए उकसाया जाना चाहिए। सार्वजनिक फैसलों और आदिवासी परंपराओं को भंग करने की स्थिति में लाया जाना चाहिए।’’
प्राचीन भारत में आदिवासियों के इस अमानवीय दोहन का यह अध्याय उनके अमेरिकी समकक्षों के साथ दो सदी बाद हुए व्यवहार से मेल खाता है। उन्नीसवीं सदी में अमेरिका का पश्चिमी विस्तार इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि नेटिव अमेरिकीयों को पश्चिम में जाकर बसना पड़ा। ऐसा अक्सर बल प्रयोग से किया जाता, हालांकि वे इसके विरोधी थे। 1830 में आए इंडियन रिमूवल एक्ट के तहत कम से कम एक लाख नेटिव अमेरिकियों को पश्चिम में बसाया गया जिसके कारण दसियों हजार की मौत हो गई।
भारत में अगला कदम जाति प्रथा को लागू कर आदिवासियों को हमेशा के लिए परित्यक्त कर देना था। समाज के निचले तबके यानी अनुसूचित जाति और समाज के बाहर की जाति यानी आदिवासियों का एक संक्षिप्त इतिहास निम्न है:
गुप्तकाल के दौरान (300-500 ईसवी) शांति और व्यापार में तेजी के चलते ग्रामीण रिहाइशों में निजी उद्यम पनपने लगे थे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उछाल पर थी। इस दौरान शहरी नवधनाढ्य वर्ग, जो कि भूमध्यसागरीय कोरल, महंगी शराबों, घरेलू दासों, मनोरंजन के साधनों तथा रोमन ग्रीक जगत की कला और शिल्प का शौकीन था उसने देश के विदेशी मुद्रा भंडारों को खत्म कर डाला। घरेलू व्यापार विनिमय के लिए मुद्रा यानी सिक्कों की कमी पड़ गई। इस समस्या को सुलझाने के लिए सत्ता ने हर गांव में जाति संतुलित शिल्पकारों की अवधारणा लागू की जिससे वस्तु विनिमय संभव हो सके। हर गांव में उसकी जरूरत के मुताबिक लोहार, बढ़ई, कुम्हार और अन्य शिल्पकार एक निश्चित संख्या में दिए जाते जिनकी कुल अधिकतम संख्या 12 थी। प्रत्येक शिल्पकार को किसानों से फसल का एक निश्चित हिस्सा मिलता। इस तरह हर गांव आत्मनिर्भर हो गया, नगद मुक्त हो गया तथा दूसरे गांवों और बाहरी दुनिया से कट गया। इसका नतीजा यह हुआ कि गांवों में जाति व्यवस्था बहुत सुदृढ़ हो गई। जाति के कट्टर नियमों के तहत अर्थव्यवस्था गतिरोध का शिकार हो गई और अतिरिक्त लोगों को काम दिलाने में अक्षम हो गई। नतीजतन, बेरोजगारी बहुत तेजी से बढ़ी। जातिगत समूहों ने शिल्पकलाओं में महारत हासिल करने से दूसरों को रोका। जाति के कारण कुछ ही लोग ये महीन काम कर पाते थे जैसे भेड़ से ऊन उतारना, चमड़े का काम करना इत्यादि जो कि सारे निचले दर्जे के पेशे थे। कुछ आदिवासी टोकरी बनाने लगे, हालांकि वे कपड़ा बुनना या कातना नहीं जानते थे। दूसरी ओर, सामाजिक ढांचे के चलते ऐसा कोई गांव नहीं था जो पूरी तरह लोहारों के गिल्ड या सिर्फ चर्मकारों को समर्थन देता हो। नतीजा यह हुआ कि जो लोग दुर्भाग्यवश बेरोजगार रह गए, वे जंगलों और पहाड़ों की ओर चले गए और तब से वे आदिवासी कहलाते हैं।
इतिहास तीन स्तरों पर चलता है: पहला, जो सनातन है यानी अपने प्राकृतिक वातावरण के सम्बन्ध में मनुष्य का इतिहास। दूसरा, वह पारंपरिक सामाजिक इतिहास है जो समूह या छोटे समूहों से बनता है। तीसरा इतिहास मनुष्य का न होकर विशिष्ट तौर पर किसी एक मनुष्य का होता है। दूसरे शब्दों में, इतिहास प्रकृति की ताकतों, समाज के ढांचे और व्यक्तियों की भूमिकाओं से गढ़ा जाता है। यह सूत्रीकरण फ्रेंच चिंतकों द्वारा दिया गया है जो मानते हैं कि यह मॉडल ही सम्पूर्ण इतिहास का मॉडल है। सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में आदिवासियों के तुलनात्मक संदर्भों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित किया जा सकता है। मसलन, भारत और अमेरिका के आदिवासियों में आंशिक समानता इसलिए है क्योंकि दोनों देशों में शासक वर्ग द्वारा जतलाए गए अधिकारों के संदर्भ में इनकी सामाजिक व्यवस्था और अनुक्रम तुलनात्मक रहे हैं। यदि योरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने अमेरिकी नेटिवों पर अपना धर्म थोपा, तो भारत में मौर्य साम्राज्य की राजसत्ता ने शाही गांवों के श्रमिकों शिविरों में रहने वाले आदिवासियों के साथ भी तकरीबन यही किया।
नक्सलियों और माओवादियों द्वारा प्रेरित आदिवासी विद्रोह आधिकारिक तौर पर भारतीय राज्य की सुरक्षा के लिए बड़ा और गंभीर आंतरिक खतरा बताया जा रहा है। बागियों ने राजसत्ता के खिलाफ अपना युद्ध घोषित कर दिया है।
आखिर, वे मौजूदा राजसत्ता की जगह क्या लेकर आएंगे; उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अवस्थिति कैसी होगी? यह सब कुछ गोपनीय है और मोटे तौर पर लोगों को नहीं पता। एक सशस्त्र अभियान जो सिर्फ नकारात्मकता की जमीन पर खड़ा हो और अपने सकारात्मक पहलुओं के प्रति चुप हो, उसकी सार्वजनिक विश्वसनीयता नहीं होती। हो सकता है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती हो, लेकिन एक बार गोलियों की कमी पड़ जाए, तो वह हाथ से चली भी जा सकती है। मनुष्य का अस्तित्व सिर्फ राजनीतिक नहीं है।
नक्सलियों को काबू में करने के लिए सरकार और विशेषज्ञ दोनों ही दोतरफा रणनीति की बात कर रहे हैं- जंगलमहाल में पंचायत राज और विकास। पंचायत कानून (पेसा) जैसे ‘ऐतिहासिक क्रांतिकारी आदिवासी समर्थक कानून का उद्देश्य लोकतंत्र की ताजा बयार को लाना था ताकि आदिवासियों की भागीदारी सक्रिय और उत्साहजनक हो। इसके उलट सत्ता व सभ्यता के केन्द्रों से दूर जंगलों में मूलवासियों के झोपड़े अब भी बस टिमटिमा रहे हैं।
लेकिन, नेटिव अमेरिकियों का रिकॉर्ड ऐसा नहीं है। उन्हें तो आत्मनिर्णय का अधिकार भी दे दिया गया था तथा वे सारे अधिकार भी जो न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया जैसे संघीय राज्यों के पास हैं। भारी राजनीतिक जनादेश के बावजूद आदिवासी समुदाय सुदूर अलग-थलग और बंद रिहाइशों में रह रहे हैं और उनके पास बाजार, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और सबसे बढक़र सार्वभौमिक सभ्यता का हिस्सा होने की गुंजाइश की कमी है।
इस संदर्भ में विकास का क्या अर्थ बनता है? सरकारी परियोजनाओं की फेहरिस्त में विकास को सडक़ों के निर्माण, ट्यूबवेल, स्कूल, अस्पताल आदि बनवाने से मापा जाता है- और ये सारी चीजें दरअसल, ‘इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या’ से निकलकर आती हैं, ऐसी व्याख्या जो मनुष्य को एक व्यक्ति नहीं मानती, चूंकि वह सम्पूर्ण इतिहास की संरचना में तीसरा तत्व होता है।
योरोप में 15वीं शताब्दी का पुनर्जागरण दरअसल, व्यक्ति की अवधारणा का चरमोत्कर्ष था: ‘अपने बारे में एक व्यक्ति के रूप में बुनियादी तौर पर विचार करने की सार्वभौमिक क्षमता का विकास’, जो कि किसी परिवार, समूह, कुटुंब या समुदाय का महज सदस्य होने से विशिष्ट है। अब एक व्यक्ति को इंसानियत द्वारा तय की गई तमाम मंजिलों के एक प्रतिनिधि केंद्र के रूप में देखा गया, ‘मनुष्य द्वारा अपनी संप्रभु क्षमता से सचेतन होने के बाद से मस्तिष्क के भीतर सोचे गए हर कुछ और किए गए हर कुछ की एकता का एक बिंदु।’ यह मनुष्य की प्रकृति की एक स्थिर अवधारणा थी जो अतीतोन्मुख थी। उन्नीसवीं सदी आते-आते मनुष्य की एक गतिशील अवधारणा उभरी: ‘मनुष्य एक अनिवार्य प्रस्थान बिंदु नहीं, बल्कि गंतव्य बिंदु है और वह अंतर्भूत गुणों का समुच्चय कम है, बल्कि एक कभी न पूरी होने वाली प्रक्रिया का लक्ष्य है।’ ‘यदि मानवीय स्थिति’ नाम की कोई चीज होती है, तो वह कभी न चुकने वाली स्थिति है। मनुष्य एक सनातन और अपरिवर्तनीय इकाई नहीं है, बल्कि वह परिवर्तन का संकेत है, निरंतर रूपांतरण का एक स्थल है। मनुष्य की प्रगति की प्रक्रिया अंतहीन है। एक ‘व्यक्ति’ इस सनातन गति का वाहक होता है, उस महान नैरंतर्य के मनुष्य में रूपांतरित होने का स्थल, जो सम्मान और प्रतिष्ठा के योग्य हो।
आदिवासी समेत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक अपनी क्षमताओं को साकार करने, देश में आम समाज का हिस्सा बनने तथा सार्वभौमिक सभ्यता तक पहुंच बनाने के लिए सम्पूर्ण अवसरों की दरकार होती है। एक व्यक्ति की ऐसी प्रगति तभी संभव होगी, यदि आदिवासियों को महज तथाकथित ‘अधिसूचित क्षेत्रों’ में न रखा जाए और अरण्येर अधिकार के नाम पर बहलाया न जाए।
हर आदिवासी बच्चे को उसके चुनाव के मुताबिक कवि, डॉक्टर, इंजीनियर, संगीतकार, डाकिया, फुटबॉल खिलाड़ी या अकाउंटेंट अथवा कोई भी अन्य पेशा चुनने में मदद की जानी चाहिए। इस लिहाज से संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासियों के लिए संभावनाओं को बाधित करती है। भारत के आदिवासी विभाजित, बिखरे हुए और अनगिनत बोलियों के बोझ तले दबे हुए हैं। वे खुद में संवाद नहीं कर पा रहे और बाहरी दुनिया से भी परिचित नहीं हैं। उन्हें अंधा न बनाए रखें, प्लेटो के प्राचीन गुहांधकार में जकड़े न रखें।

अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्तव

हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/04/2010 10:33:00 PM

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय - 3  
 
हिंदी समुदाय, नवजागरण और राष्ट्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान खींचनेवाले इस लंबे लेख की तीसरी  और आखिरी किस्त पोस्ट करते हुए हाशिया अभी राष्ट्रीय और औपनिवेशिक संस्कृति पर जारी बहस में भी शामिल हो रहा है. आगे हम इस बहस से जुड़ी कुछ और सामग्री भी पोस्ट करेंगे और इसी के साथ अपना नजरिया भी पेश करेंगे. फिलहाल यह लेख, हंस से साभार.
दूसरी किस्त


प्रसन्न कुमार चौधरी

हिंदुत्व की वैचारिक धारा की उपस्थिति ने एक ओर मुस्लिम लीग के पृथक पाकिस्तान की मांग को बल प्रदान किया, और दूसरी ओर, संभवतः बाबासाहब द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने की प्रक्रिया को भी गति प्रदान की होगी. नागपुर इस हिंदुत्व का मुख्यालय था और महाराष्ट्र उसकी मुख्य कर्मभूमि. 1950 ई में मुंबई में हिंदू कोड बिल के पक्ष में बाबासाहब के नेतृत्व में चले जन-आंदोलन का (जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने शिरकत की थी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उग्र विरोध किया था. आरंभ में हिंदी-भाषी क्षेत्रों में भी आरएसएस ने नागपुर से ही संगठक भेजे थे. नागपुर में ही बाबासाहब ने समारोहपूर्वक अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। जिन प्रदेशें में हिन्दुत्व की विचारधारा और उससे जुड़े संगठनों का प्रभाव काफी सीमित था, वहां बाबासाहब के प्रति पर्याप्त सम्मान के बावजूद धर्मांतरण की घटनाएं भी न के बराबर हुईं.
    महात्मा और बाबासाहब दोनों हिंदुत्व के विचारकों के निशाने पर रहे. इसे आप यूरोपीय आधुनिकता के भारतीयता पर प्रभाव के रूप में देख सकते हैं। इस आधुनिकता ने बाह्‌य और अंदरूनी तौर पर भारत को विभाजित करने का ही काम किया है.

हिंदी समुदाय
इतिहास मे बोलियां और भाषाएं दो स्वरूपों में सामने आती हैं. एक, 'जनों के अंदरूनी' संवाद के माध्यम के रूप में और दूसरा, 'जनों के बीच' संवाद के माध्यम के रूप में. एक 'जनों की अपनी-अपनी बोलियों अथवा भाषाओं' के रूप में, दूसरा 'जनों के बीच संपर्क बोली अथवा भाषा' के रूप में.
    प्राचीन काल से ही, जीविकोपार्जन के लिहाज से समृद्ध भौगोलिक क्षेत्रों में धीरे-धीरे अनेक जन आकर बसने लगते थे. इन जनों के बीच स्वभावतः विभिन्न स्तरों पर संबंध भी विकसित होते. इन जनों की अपनी-अपनी बोलियां (अथवा भाषाएं) तो होती ही थीं, तथापि एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में अनेक जनों के साथ-साथ रहने और उनके बीच अनेक स्तर पर विकसित संबंधों के कारण एक 'संपर्क' बोली (अथवा भाषा) का भी विकास होता.
    इन संपर्क बोलियों/भाषाओं के विकास का कोई एक नियम नहीं है. कभी किसी प्रभावशाली जन की बोली और भाषा ही यह भूमिका निभाने लगती. किसी-किसी अन्य मामले में इन बोलियों/भाषाओं के मेल से कालक्रम में एक नई बोली अथवा भाषा संपर्क बोली अथवा भाषा के रूप में विकसित होती. प्राचीन समाज में इस तरह की बोलियां/भाषाओं का विकास शताब्दियों में घटित होता.
    आज से करीब दस हजार से आठ हजार साल पहले, लगभग दो हजार वर्षों तक, वर्तमान सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी क्षेत्र में (जो अटलांटिक महासागर से नील नदी तक फैला था) पुरातत्वविद डॉ. जेईज सटन के अनुसार, एक समृद्ध 'जल पाषाण' संस्कृति (अक्वालिथिक कल्चर) फलती-फूलती रही थी. इस क्षेत्र में तब कई बड़ी-बड़ी नदियां थीं, ताल थे और दलदली जमीन थी. जलस्रोतों से समृद्ध इस क्षेत्र में विकसित संस्कृति ने तब आस-पास के जनों को भी आकर्षित करना शुरू किया. जाहिर है, इन जनों के बीच अवश्य कोई संपर्क बोली/भाषा विकसित हुई होगी. वर्तमान समय में इन क्षेत्रों तथा आस-पड़ोस के देशों की भाषाओं की गहन छानबीन के बाद भाषाविद जेएच ग्रीनबर्ग ने जो निष्कर्ष निकाले ('लैंग्वेजेज ऑफ अफ्रीका,' 1963,) उस आधार पर सटन उन जनों की बोली को 'नाइलो-सहारन' वृहत भाषा-परिवार जोड़ते हैं. ग्रीनबर्ग वर्तमान में उस वृहत भाषा परिवार का संबंध 'चारी-नाइल' भाषा परिवार से बताते हैं. पूर्वी सूडानी, मध्य सूडानी और कुछ अन्य लघु भाषाएं इस 'चारि-नाइल' भाषा परिवार की ही शाखाएं हैं. करीब हजार वर्षों तक फलने-फूलने के बाद यह संस्कृति जल स्रोतों के छीजने अथवा सूखने के कारण बिखर गई और संभवतः (एशिया की ओर) उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों की नव पाषाणकालीन (नियोलिथिक) संस्कृतियों से जा मिलीं. (जेइजी सटन, 'दि अफ्रीकन अक्वालिथिक', 'एंटीक्विटी', मार्च, 1977.)
    मध्यकाल में दांते की 'डिवाइन कॉमेंडी' और 'इनफर्नो' के कारण 'फ्लोरेंटाइन' बोली को असाधारण सांस्कृतिक प्रतिष्ठा हासिल थी (फ्लोरेंस नवजागरण का केंद्र भी था). इसी फ्लोरेंटाइन बोली से इतालवी भाषा का विकास हुआ. तथापि, इटली के राजनीतिक एकीकरण के समय (1861ई.) में आबादी की मात्र ढाई फीसदी ही इतालवी भाषी थी.
    अमेरिका की उपनिवेशीकरण के क्रम में यूरोप के कई देशों के लोग वहां जाकर बसे. उनकी भाषाएं भिन्न-भिन्न थीं. लेकिन एंग्लो-सैक्सनों के वर्चस्व के कारण अमेरिकन इंगलिश संयुक्त राज्य अमेरिका की भाषा बन गई इन संपर्क बोलियों/भाषाओं के विघटन की भी कोई एक प्रक्रिया नहीं रही है. इतिहास में इन बोलियों/भाषाओं के विघटन के जो कुछ उदाहरण मिलते हैं, उनका यहां संक्षिप्त रूप से जिक्र किया जा सकता है. जिन कारणों से विभिन्न जन एक भौगोलिक क्षेत्र में जमा होने लगते थे, उन्हीं कारणों की अनुपस्थिति (खासकर जलवायु परिवर्तन, अथवा संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में शताब्दियों के उपयोग के बाद जीविकोपार्जन के स्रोतों के क्षरण, आदि) के फलस्वरूप जनों का दूसरे-दूसरे क्षेत्रों में स्थानांतरण भी घटित होता था. ऐसी स्थिति में संबंधित जनों के बीच प्रचलित हो चुकी संपर्क बोली अथवा भाषा विभिन्न क्षेत्रों/प्रदेशों की क्षेत्रीय/प्रादेशिक बोलियों अथवा भाषाओं का (अपनी-अपनी क्षेत्रीय विशिष्टताओं के साथ) रूप ले लेतीं.
    कुछ संपर्क भाषाएं मानकीकरण के क्रम में क्रमशः परिशुद्ध होते हुए मानक भाषा का रूप ले लेती हैं. जनपदीय/प्रादेशिक भाषाओं की तुलना में संपर्क भाषाएं स्वभाव से ही अधिक नमनीय होती हैं-उच्चारण तथा व्याकरण में नमनीयता के साथ-साथ उनमें नए-नए शब्दों को ग्रहण करने की क्षमता तुलनात्मक रूप से अधिक होती है. जिन जनपदीय/प्रदेशिक भाषाओं के बीच वे संपर्क भाषा की भूमिका निभातीं उन भाषाओं का अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र उनका 'कैचमेंट एरिया' (शब्द ग्रहण क्षेत्र) होता. एक सीमा तक 'भ्रष्ट' होने की अंतर्निहित क्षमता हर संपर्क भाषा की विशिष्ट लाक्षणिकता रही है. शुद्धिकरण तथा मानकीकरण के क्रम में उनकी यह क्षमता निरंतर संकुचित होती जाती है और इस प्रक्रिया में उनका जन संपर्क भी क्षीण होता जाता है-वह विशिष्ट 'जनों' की विशिष्ट भाषा बनकर रह जाती है. सबसे शुद्ध और मानक भाषा अंततः एक मृत भाषा बनकर रह जाती है. तथापि इन मृत भाषाओं का भी इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान है. यह विभिन्न बोलियों और भाषाओं की पृष्ठभूमि तथा परिप्रेक्ष्य, और उनके बीच फर्क को रेखंकित करने की समझ हासिल करने में अनिवार्य संदर्भ का काम करती हैं. यथार्थ में इन शुद्ध और मानक भाषाओं का उद्‌भव जनबोलियों तथा भाषाओं से ही होता है, लेकिन हमारी चेतना में प्रायः यह उलट रूप में ('मिरर इमेज' के रूप में) अभिव्यक्त होता है. हमें लगता है कि बोलियों और भाषाओं का विकास इन्हीं (प्लेटो के 'आइडियल्स' की श्रेणी की भांति) शुद्ध मानक भाषाओं से हुआ है-जनों की बोलियां और भाषाएं इन शुद्ध मानक भाषाओं का स्खलन लगती हैं.
    संपर्क भाषाओं की एक और परिणति राजभाषाओं के रूप में देखी जा सकती है. इतिहास में राजकाज में अमूमन आम जन से दूरी बनाकर रखी जाती है-राजसत्ता जनता से ऊपर की एक सत्ता के रूप में उपस्थित होती है, जनसंपर्कों से उसकी कथित 'निष्पक्षता' और शासन के लिए 'जरूरी भयोत्पादक रुतबा तथा दबदबा' खंडित होता है. अपारदर्शिता, गोपनीयता और रहस्यमयता राजकर्म की विशेषताएं रही हैं. राजभाषा बनने के बाद संपर्क भाषा की भी जनता से दूरी बढ़ती जाती है, शासन कार्य के अनुरूप उसका भी मानकीकरण होने लगता है और वह नौकरशाही की भाषा के रूप में एक रहस्यमय दुरूहता का वरण करने लगती है. अपनी भाषा होते हुए भी आम जन राजभाषा को एक अबूझ, पराई, रहस्यमयी कूट भाषा के रूप में देखने लगती हैं, जिस पर उनके रोजमर्रे के जीवन का कितना-कुछ निर्भर करता है. राज का रहस्य एक रहस्यमय भाषा में अपनी अभिव्यक्ति पाता है और यह भाषा शासन के लिए जरूरी 'भयोत्पादक रुतबे तथा दबदबे' का माध्यम बन जाती है. जनतांत्रिक शासन के दौर में भी राजभाषा की दुरूह पारिभाषिक-तकनीकी शब्दावली का कारण राजकाज की उसी परंपरा में निहित है.
    कुछ संपर्क भाषाएं आबादी के स्थानांतरण की स्थिति में स्वतः खत्म हो जाती हैं. लुप्त हो जाने के बाद विभिन्न भाषाओं में उनके अवशेषों से हम उस संपर्क भाषा की कुछ रूपरेखा का पता लगा सकते हैं.
    कुल मिलाकर, संपर्क भाषाओं की कमोवेश यही चार परिणतियां इतिहास में देखने को मिलती हैं. अनेक संपर्क भाषाएं इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरी हैं.
    आदि संस्कृत, आदि द्रविड़, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, उर्दू (खासकर पश्चिमोत्तर भारत में) और हिंदी-ये सब संपर्क भाषाएं ही रही हैं. एक संपर्क भाषा के रूप में पूर्वी और उत्तर भारत के विशाल भूभाग की अनेक जनपदीय भाषाओं तथा बोलियों के साथ हिंदी का कोई विरोध नहीं है. वह (हिंदी) तो अपने अस्तित्व कि लिए इन्हीं पर निर्भर है. जनपदीय भाषाएं और बोलियां हैं, तब ही तो उनके बीच संपर्क भाषा के रूप में हिंदी है. हिंदी का यह संपर्क भाषा वाला स्वरूप उसे भारत की अन्य प्रादेशिक भाषाओं से पृथक करता है. सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि हिंदी श्रेष्ठ है और अन्य प्रादेशिक भाषाएं निम्न. सारी प्रादेशिक भाषाएं काफी समृद्ध हैं. सवाल भाषा के दो भिन्न स्वरूप का है. इसलिए प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित प्रादेशिक अस्मिताओं के तुलना हिंदी के साथ नहीं की जा सकती. एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी अनेक जनपदीय अस्मिताओं (मैथिली, मगही, भोजपुरी, अवधी, बुंदेली, ब्रज, मालवाई, छत्तीसगढ़ी, आदि) की वाहक भाषा है. हाल के दशकों में अंतरक्षेत्रीय संबंधों के प्रसार के कारण महानगरों तथा शहरों के कुछ घरों में हिंदी जरूर बोली जाने लगी है, लेकिन तब भी हिंदी क्षेत्र के लगभग शत-प्रतिशत घरों में लोग अपनी-अपनी जनपदीय भाषाओं और बोलियों में ही बातचीत करते हैं. 'यह कहीं नहीं और हर कहीं बोली जाती है.' यह बात अन्य प्रादेशिक भाषाओं पर लागू नहीं होती. कारण हिंदी का संपर्क भाषा वाला स्वरूप है.
    इन जनपदों का इतिहास हिंदी की तुलना में काफी पुराना है और यह इन जनपदीय लोगों की स्मृति में अब भी सुरक्षित है. इन जनपदों की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत रही है. हिंदी से जुड़ी इन जनपदीय भाषाओं का संबंध भी किसी एक भाषा-परिवार से नहीं, बल्कि अलग-अलग भाषा-परिवारों से रहा है. राजस्थानी, ब्रजभाषा, खड़ी बोली का संबंध शौरसेनी अपभ्रंश और शौरसेनी प्राकृत से रहा है, तो अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, आदि का अर्ध-मागधीप्राकृत से. बिहार की जनपदीय भाषाओं (मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, वज्जिका) का नाता मागधी अपभ्रंश तथा मागधी प्राकृत से जुड़ता है. झारखंड में बोली जाने वाली खोरठा, नागपुरिया, पंचपरगनिया के साथ भी यह बात है. एक-एक जनपद की आबादी यूरोप के अधिकांश देशों से प्रायः ज्यादा ही है और कहीं-कहीं बराबर. हिंदी को उनकी जनपदीय अस्मिता का सम्मान करना चाहिए और उनकी वाजिब मांगों का (मसलन प्राथमिक शिक्षा जनपदीय भाषाओं में देने की मांग का) समर्थन करना चाहिए. जनपदीय अस्मिताएं कहीं-कहीं प्रादेशिक पुनर्गठन की मांगों में भी प्रकट हो सकती हैं. ऐसा होने पर भी यह हिंदी के लिए कतई नुकसानदेह नहीं. यह सकारात्मक बात है कि संबंधित प्रदेशों की विधानसभाओं ने खुद अपने बंटवारे का प्रस्ताव पारित किया.
    हिंदी के प्रसार में जैसे बॉलीवुड और मनोरंजन उद्योग की भूमिका की चर्चा होती है, वैसी चर्चा इस प्रसार में हिंदी क्षेत्र के मेहनतकश वर्गों की भूमिका की नहीं होती. हिंदी का विश्व्यापी प्रसार अंग्रेजी की तरह साम्राज्य की ताकत के कारण नहीं हुआ. सरकारी प्रयासों की भी इसमें कोई खास भूमिका नहीं रही. फिजी, मॉरिशस, कैरेबियाईद्वीप-समूह में हिंदी क्षेत्र के जो मजदूर-किसान गए, वे अपने साथ अपनी-अपनी जनपदीय भाषाएं भी ले गए. भोजपुरी गई तो साथ-साथ हिंदी भी गई. कोलकता, पंजाब, दिल्ली, मुंबई और अब चैन्नई, बेंगलूर, हैदराबाद, कोच्चि जाने वाले हिंदी क्षेत्र के मजदूर और कारीगर अपने साथ ठेठ गंवई हिंदी भी ले जाते हैं और साथ ही तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम सीखकर लौटते हैं. मैथिली नेपाल की दूसरी भाषा है. मैथिली है तो साथ-साथ हिंदी भी चलेगी.
    इन व्यापक जन-संपर्कों के कारण हिंदी पूरे देश में अनेक दिलचस्प रूपों में अवतरित हुई है- बॉलीवुड की फिल्मों और गानों में ये सारे रूप अभिव्यक्त हुए. बंगाली हिंदी, पंजाबी हिंदी, मुंबइया हिंदी, मद्रासी हिंदी, गोवानीज हिंदी, टपोरी हिंदी. हिंदी साहित्य में भी इन सारे रूपों का साक्षात्कार किया जा सकता है. इसी तरह जनपदीय हिंदियों की भी बहुरंगी छटा है- भोजपुरी हिंदी, बुंदेली हिंदी, मैथिली हिंदी, अवधी हिंदी, आदि. यह विविधता हिंदी को दिलचस्प और आकर्षक बनाती है. उसकी विविधता न सिर्फ उसकी अंतर्निहित नमनीयता को प्रदर्शित करती है, बल्कि उसे निरंतर समृद्ध भी करती है. हिंदी समुदाय भारतीयता का ही एक लघु रूप कहा जा सकता है.
    भारत में विंध्य के उत्तर का विशाल भूभाग जिसमें करीब पैंतालीस करोड़ लोग बसते हैं हिंदी का गृह क्षेत्र है. भारत के इतिहास में, उसकी सांस्कृतिक-भाषाई विरासत में इस क्षेत्र की क्या भूमिका रही है, उसकी अतिसंक्षिप्त चर्चा भी यहां मुमकिन नहीं. पाषाण काल से लेकर आज तक, हजारों वर्षों के 'धारावाहिक' इतिहास वाले क्षेत्र की नवीनतम भाषा के रूप में आधुनिक हिंदी गौरवान्वित है, लेकिन साथ ही, जन्म से ही उसके सामने इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक भाषाई परंपरा का वाहक बनने की गंभीर चुनौती भी है. इस क्षेत्र के इतिहास के पैमाने पर देखें तो हिंदी का अभी-अभी जन्म ही हुआ है-इस क्षेत्र के अनेक प्रमुख शहर इससे उम्र में हजारों वर्ष बड़े हैं. हिन्दी समुदाय को तमाम अतिवादी थपेड़ों से इस शिशु की रक्षा करनी है. इस गृह क्षेत्र से परे भारत और विश्व के विभिन्न हिस्सों में इसे बोलने-समझने वालों की आबादी भी करीब उतनी ही आंकी जाती है, जितनी इसके गृह-क्षेत्र की. हिंदी को इस तथ्य के प्रति भी संवेदनशील रहना है.
    उपर्युक्त तथ्यों की रोशनी में, 'एक मंद, दबी हुई हिंदी अस्मिता भारतीयता के अस्तित्वकी एक शर्त है.' राष्ट्रीयता (बांग्ला में जाति) के यूरोपीय आधुनिकता पर आधारित सिद्धांत के तहत एक हिंदी जाति, एक हिंदी प्रदेश और एक हिंदी विधानसभा की बात तार्किक लग सकती है, लेकिन ठोस भारतीय संदर्भ में न सिर्फ अव्यावहरिक है, बल्कि नुकसानदेह भी. हिंदी जातीय संहति का प्रयास हिंदी समुदाय की अंदरूनी जनपदीय विविधता और उसकी बाह्य बहुरंगी छटा को कमजोर करेगा, उसकी अंतर्निहित नमनीयता को नुकसान पहुँचाएगा, और उसे एक प्रादेशिक भाषा के स्वरूप में ला खड़ा करेगा. मुखर और आक्रामक हिंदी जातीयता खुद हिंदी समुदाय और भारत के अंदर सांघातिक तनावों को जन्म देगा और तंततः खुद हिंदी और हिंदी समुदाय को अपने जीवनदायिनी तत्वों से वंचित हर देगा. हिंदी प्रदेशों में यदि हिंदी राष्ट्रीयता को लेकर कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं चला, कहीं थोड़ी-बहुत कोशिश होने पर भी उस जन संमर्थन नहीं मिला और उल्टे, हिंदी प्रदेशों ने ही खुद इसके बंटवारे का फैसला किया, तो इसके पीछे कोई गूढ़ हिन्दी-विरोधी राजनीतिक षडयंत्र नहीं है. कागज पर बिल्कुल तर्कसंगत और उन्नत सिद्धांतों को भी समय-समय पर जमीनी हकीकत की कसौटी पर परखते रहना जरूरी होता है.

नव जागरण
जिस तरह समुदाय के रूप में कल्पना का एकमात्र जरिया बन गया 'राष्ट्र', उसी तरह आधुनिक यूरोप का ऐतिहासिक घटनाक्रम इतिहास लेखन का एकमात्र संदर्भ बिंदु बन गया. इस प्रकार, यूरोप के ठोस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से उसके घटनाक्रम का पृथक कर उसे एक अमूर्त, सार्विक संदर्भ का दर्जा प्रदान कर दिया गया. आधुनिक यूरोप का इतिहास 'नवजागरण' से शुरू होता है, तो हमें भी अपना आधुनिक इतिहास 'नवजागरण' से शुरू करना होगा-बांग्ला नवजागरण, मराठी नवजागरण, हिंदी नवजागरण, आदि. हर प्रदेश में 'नवजागरण' 'खोजा' जाने लगा. मेरी दृष्टि में इतिहासलेखन का यह नजरिया ही गलत है. हमें इस मानसिक अनुकूलन (कंडीशनिंग) से बाहर निकलना जरूरी है. भारत में कोई 'नवजागरण' नहीं हुआ. जो ऐतिहासिक घटनाएं घटीं, उन्हें आप उसी नाम से पुकार सकते हैं, अथवा अपना कोई नाम दे सकते हैं जहां 'नवजागरण' नहीं होता, क्या वहां इतिहास आगे नहीं बढ़ता? इतिहास लेखन के लिए 'नवजागरण' का प्रस्थान बिंदु होना जरूरी है क्या? इसका आशय कथित 'नवजागरण' से जुड़े व्यक्तियों के महत्व को घटाना या बढ़ाना नहीं है, न ही 'नवजागरण' से संबंधित साहित्य को बिल्कुल अनुपयोगी करार देना है. दरअसल, 'नवजागरण' संबंधी शोधों से हिंदी के इतिहास को लेकर कई नए तथ्यों का उद्‌घाटन हुआ है.
    इतिहास के प्रति इस भ्रामक नजरिए के कारण शोधार्थियों को भी अनेक गड़बड़झालों का सामना करना पड़ता है. किन्हीं को लगता है कि भारत में 'असली नवजागरण' उन्नीसवीं सदी में नहीं, बल्कि भक्तिकाल में ही हो गया था. फिर भक्तिकाल में ही क्यों रुका जाए? वैदिक काल, ईसा पूर्व छठी शताब्दी का काल, मौर्य काल, गुप्त काल, संगम काल, विजयनगर साम्राज्य का काल, आदि की भी चर्चा चलेगी और भारत में नवजागरण भाग I, II, III, IV की बात होगी. शेक्सपीयर की खोज शेक्सपीयर से करीब हजार वर्ष पूर्व कालिदास तक जाएगी, कोपरनिकस की खोज आर्यभट तक, हेगेल की खोज धर्मकीर्ति तक, कारडानो की खोज भास्करचार्य तक, उपन्यास विधा की खोज 'दशकुमार चरित' तथा दंडिन्‌ तक जाएगी. यूरोपीय नवजागरण के सांचे में भारतीय इतिहास को ढालने का प्रयास न मालूम हमें कहां-कहां भटकाएगा, फिर भी क्या हासिल होगा?
    हां, एक भिन्न अर्थ में हम 'नवजागरण' शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. जैसे किसी इलाके में निस्वार्थ भाव से सामाजिक-राजनीतिक कार्य में लगे व्यक्ति को लोग वहां के 'गांधी' कहने लगते हैं (मसलन, पीरो के गांधी राम इकबाल), उसी तरह किसी क्षेत्र में 'नवजागरण' की संज्ञा दे सकते हैं. मामला अगर ऐसा हो, तब बात और है. 'पटना के एल्विस प्रिस्ले' की तर्ज पर हम मझौलिया के माइकल एंजलो, लखनऊ के लियानार्डो दा विंची और बरेली के बेकन की खोज कर सकते हैं.
    जब भारत में नवजागरण ही नहीं हुआ तो नवजागरण के प्रतीक पुरुषों अथवा अग्रदूतों की बात ही नहीं उठती.
   
आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास
आधुनिक हिंदी साहित्य के आरंभ काल में साहित्य का रसास्वादन करने वाला पाठक वर्ग मुख्यतः 'उच्च' जाति अभिजातों के कुछ समूहों तक ही सीमित था. दलित वर्ग लगभग पूरी तरह निरक्षर था. 'पिछड़ी' जातियों में भी साक्षरता नाममात्र ही थी. यहां तक कि 'उच्च' जातियों के गरीब तथा निम्नमध्यवर्गीय तबकों का भी यही हाल था. (प्रसंगवश, यहां निरक्षरता का मतलब यही लेना चाहिए कि वे साहित्यिक कृतियों के पाठक नहीं हो सकते थे. इसका मतलब यह कतई नहीं कि इन तबकों की कोई सांस्कृतिक-साहित्यिक अभिरुचि नहीं थी. उनकी अपनी मौखिक परंपरा थी और उनके बीच अपनी गायन तथा नृत्य-नाट्‌य मंडलियां थीं. निरक्षर लोग भी अद्‌भुत गीत रचने में सक्षम थे, उनमें काफी प्रभावशाली कथावाचक और कलाकार थे.)
    जाहिर है, इस पृष्ठभूमि में तत्कालीन साहित्य की अपनी सीमाएं थीं, उन दिनों के लेखकों तथा पाठकों के अपने पूर्वाग्रह थे, अपनी रुचियां थीं, और रस्वादन के अपने मानदंड थे. यह सही है कि कई लेखक इन सीमाओं तथा पूर्वाग्रहों का अतिक्रमण करने में भी समर्थ हुए-खासकर स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह 'अतिक्रमण' अधिक मुखर होकर सामने आया.
    आज स्थिति, अगर काफी संतोषजनक नहीं, तब भी उन दिनों की तुलना में काफी भिन्न है. महिलाओं, दलितों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच साक्षरता काफी बढ़ी हैं, करोड़ों की संखया में स्नातक है और इन समुदायों के बीच से एक मुखर बौद्धिक वर्ग उभर आया है. हिंदी अखबार करोड़ों में तथा पत्रिकाएं लाखों में बिक रही हैं. कस्बों-शहरों से अनेक लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है, हिंदी समीक्षकों के रेडार से बाहर सैकड़ों नए लेखक-पत्रकार, अनुवादक, पटकथा-लेखक, विज्ञापनकर्मी, रेडियो तथा विडियो जॉकीज, आदि सामने आ रहे हैं. इस उभार में, जाहिर है, दलित, नारी तथा पिछड़े वर्गों के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का भी खास योगदान रहा है. हिंदी तथा हिंदी साहित्य के लिहाज से यह सकारात्मक विकास है. इस नये बौद्धिक समुदाय की हिंदी और हिंदी साहित्य पर दावेदारी हिंदी को नया अभूतवूर्व विस्तार देती है. इंटरनेट पर भी अब अच्छी-खासी संखया मे हिंदी की नई पीढ़ी सक्रिय है, और इसमें हिंदी सॉफ्टवेयर निर्माताओं की भी उल्लेखनीय भूमिका रही है.
    समाज में नए वर्गों, समुदायों अथवा समूहों के उत्थान के साथ हमेशा नया इतिहास भी उपस्थित होता है. इतिहास के एक या दो 'अधिकारिक' पाठों का स्थान अब अनेक पाठ ले लेते हैं और पुराने विमर्शों का स्थान नए विमर्श. इस प्रक्रिया में स्वभावतः अनेक पुरानी मूर्तियां टूटती हैं और नई बनती हैं. जिनकी हिंदी को हिंदी ही नहीं माना गया, जिस हिंदी को सुनने से इनकार कर दिया गया, वह हिंदी जब रंगमंच पर एक सशक्त किरदार के रूप में अवतरित होगी तो टकराव होंगे, ज्यादतियां भी होंगी और कुछ निर्दोष मूर्तियां भी टूटेंगी. इतिहास के रंगमंच पर खेले गए नाटक के पहले अंक में प्रायः ऐसा ही होता है, लेकिन कभी एकांकी का आना बाकी होता है. अगर किसी किरदार के साथ अन्याय हुआ है, किसी भूमिका को गलत तरीके से छोटा कर दिया गया है, तो उसके परिमार्जन की संभावना खत्म नहीं होती. हिंदी अगर आज विभिन्न समुदायों के बीच 'रणक्षेत्र' बन गई है तो इससे हिंदी के कुछ किरदार लहूलुहान हो सकते हैं, पर आखिरकार यह हिंदी की जीत ही है. इससे हिंदी को रचनात्मक ऊर्जा मिलती है.
    इस नई स्थिति में यदि विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग हिंदी इतिहास के एक या दो पाठों और पुराने विमर्शों से ही चिपके रहते हैं, तो यह उनकी अप्रासंगिकता का ही परिचायक है-विमर्शों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में उनकी अक्षमता का ही प्रदर्शन है. वैसे, शैक्षणिक विभाग अपने स्वभाव से ही कुछ हद तक रूढ़िवादी होते हैं-हिंदी समाज का बौद्धिक नेतृत्व करने की उनसे उम्मीद भी नहीं की जाती. हिंदी समाज के अमूमन सारे प्रमुख विमर्श इन विभागों में भी बाहर से ही गए. ऐसे विभागों में चले विमर्शों के बारे में हिंदी प्राध्यापकों के जो भी भ्रम हों, उनमें आम हिंदी पाठकों की अधिक दिलचस्पी नहीं होती. वे प्रायः हर खेमे को पढ़ते हैं और अपने उपयोग की सार्थक चीजें हर कहीं से निकाल लेते हैं.
    कुल मिलाकर एक या दो आधिकारिक पाठों का जमाना बीत चुका है, इसीलिए मठों का भी. हिंदी साहित्य का कोई आधिकारिक इतिहास नहीं, कोई आधिकारिक प्रवक्ता नहीं, बहरहाल, हिंदी समाज के लिए यह शुभ स्थिति विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों के लिए मुश्किल स्थिति पैदा कर देती है-वह कौन-सा इतिहास पढ़ाएं? बेहतर तो यही है कि कुछेक प्रचलित पाठों के साथ-साथ हर प्राध्यापक 'अपना इतिहास' पढ़ाए (हिंदी इतिहास के कुछेक पाठ इसी तरह सामने आए प्राध्यापकों के अपने नोट्‌स ही हैं) और छात्रों को भी 'अपना इतिहास' लिखने तथा अपने नायक गढ़ने की स्वतंत्रता दें. पाठ्‌यक्रमों में भी हिंदी इतिहास के विभिन्न पाठों को यथोचित स्थान दिया जाए और किसी भी एक पाठ के 'एकमात्र' पाठ होने के दावे को खारिज कर दिया जाए. कुछेक विषयों की पाठ्‌यपुस्तकों में इस तरह के परिवर्तन शुरू भी हो चुके हैं, तथापि शैक्षणिक-नौकरशाही और रूढ़िवादी प्राध्यापकों के लिए यह जरूर मुश्किल है.
    इतिहास में नई सामाजिक शक्तियों की दावेदारी के साथ इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य कोई नई बात नहीं है. यह हमेशा से होता आया है. अमेरिका में एंग्लो-सैक्सनों की जगह जैसे-जैसे अफ्रीकी अमेरिकनों, हिस्पैनिक समुदायों, एशियनअमेरिकनों, अमेरिकन इंडियनों और महिलाओं की दावेदारी बढ़ेगी, अमेरिका का इतिहास वही नहीं होगा, जो आज पढ़ाया जाता है. यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है. दस-पंद्रह साल बाद पढ़ाए जाने वाले इतिहास में अमेरिका के कई चरित नायक-जेफरसन और अब्राहम लिंकन भी पुनर्मूल्यांकन की जद में आ चुके होंगे. उसी तरह विश्व में जैसे-जैसे चीन, भारत (और ऐसे ही अन्य देशों) की आर्थिक-राजनीतिक शक्ति बढ़ेगी, विश्व-इतिहास की पाठ्‌यपुस्तक भी बदलेगी. चीनी इतिहास से संबंधित पृष्ठों का बढ़ना तो लगभग शुरू ही हो चुका है.

हिंदी आज
हिंदी पहले से ही, सीमित अर्थों में ही सही, एक विश्व भाषा रही है. वैश्वीकरण के दौर में इसके समक्ष नई संभावनाएं और नई चुनौतियां उपस्थित हुई हैं. अब यह हिंदी समुदाय पर निर्भर है कि वह इन संभावनाओं तथा चुनौतियों का क्या करता है.
    आज के वैश्वीकरण के दौर में इतनी बड़ी हिंदीभाषी आबादी की उपेक्षा कौन करेगा? इसीलिए हिंदी समुदाय की ओर से बिना किसी अपेक्षित प्रयास के ही अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं की विभिन्न कृतियां हिंदी में अनूदित होकर आने लगी हैं-वेस्ट सेलर किताबें, हॉलीवुड की फिल्में, कार्टून, सामाचार चैनल्स, नेशनल ज्योगाफ्रिक, डिस्कवरी, हिस्ट्री जैसे चैनल्स, विज्ञापन, आदि. इन सबके कारण, हिंदी अनुवादकों, पटकथा-लेखकों और इन सबसे जुड़े रचनाकारों-कलाकारों की एक नई पीढ़ी सामने आई है. हिंदी पाठकों, श्रोताओं तथा दर्शकों के सामने भी एक नई दुनिया उद्‌घाटित हुई है. इतने बड़े हिंदी-बाजार के प्रति विदेशों में भी उत्सुकता बढ़ी है. कार्टूनों, फिल्मों, विज्ञान-आधारित कार्यक्रमों, विज्ञापनों, बिलबोर्डों का गौर से देखिए तो बाजार में हिन्दी का नया निखरता चेहरा आसानी से पहचाना जा सकता है. अपने स्वरूप में ही संपर्क भाषा होने तथा उसके गुणों से लैस होने के कारण, आरंभ से ही अपने विविध, मिश्रित आधार के कारण 'हिंदी आज' अंग्रेजी के समांतर विश्व की संपर्क भाषा होने की भरपूर संभावना रखती है. विश्व की दूसरी सबसे तेजी से विकसित हो रही भारतीय अर्थव्यवस्था इस संभावना का बल प्रदान करती है. लेकिन हिंदी समुदाय के पास हिंदी क्षेत्रों के राजनीतिज्ञों, राजनायिकों, नौकरशाहों, मीडिया-मालिकों, उद्योगपतियों-व्यवसायियों की मिली-जुली मजबूत लॉबी का नितांत अभाव है. फलस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यताप्राप्त भाषा होने का अपना वाजिब हक भी वह अब तक प्राप्त नहीं कर सकी है. (वैसे, अपने इस वाजिब हक की प्राप्ति के लिए उसे कभी भी दूसरी भाषाओं से उलझना नहीं चाहिए.)
    बहरहाल, हिंदी समुदाय के समक्ष एक बड़ी चुनौती तो इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था है जिसकी विकास दर संतोषजनक नहीं कही जा सकती. यहां हम उन आर्थिक सुधारों की चर्चा में नहीं जा सकते जिसके जरिए इस क्षेत्र को नई आर्थिक गतिविधियों का सक्रिय क्षेत्र बनाया जा सकता है. ऐसे कुछ प्रयास आरंभ भी हुए हैं. कहने की जरूरत नहीं कि गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाली सबसे बड़ी आबादी इसी क्षेत्र में बसती है और कोई भी आर्थिक सुधार इस समस्या से नजरें चुराकर न तो सफल हो सकता है और न ही समावेशी आर्थिक सुधार की संज्ञा पा सकता है. हिंदी के हितों को गति प्रति करने का प्रश्न भी बहुत हद तक इस समस्या से जुड़ा है.
    हिंदी समुदाय आज बाहर से जितनी चीजें ले रहा है, उस तुलना में उसके पास देने के लिए (अपनी श्रमशक्ति के अलावा) कुछ खास है नहीं. यह स्थिति भी बहुत हद तक पहली समस्या से जुड़ी है. यह क्षेत्र विज्ञान तथा तकनीक के अनुसंधान और विकास का क्रियास्थल नहीं बन पाया है.(ज्ञान युग में मोबाइल कंप्यूटर, आदि दैनिक उपयोग के उपकरण बन गए हैं. इनसे संबंधित सारी शब्दावली पर अंग्रेजी का एकछत्र प्रभुत्व है. जैसे किसानों और कारीगरों के दैनिक उपयोग के पुराने उपकरणों के विविध गंवई नाम आपको विभिन्न क्षेत्रों में मिल जाएंगे.) मौलिक शोध-ग्रंथ हिंदी में न के बराबर हैं. शोध से जुड़े हिंदीभाषी शोधार्थी भी अपनी रचनाएं हिंदी में ही लिखते हैं. हिंदी के पास स्तरीय बाल-साहित्य, किशोर-साहित्य, विज्ञान-साहित्य का घोर अभाव है, और अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में अनूदित हिंदी की 'बेस्ट सेलर' क्या, ठीक-ठाक व्यवसाय करने वाली किताबें नहीं के बराबर हैं. ले-देकर मध्य एशिया और अफ्रीका के बाजार में, और कुछ हद तक ब्रिटेन में, बॉलीवुड की कुछ फिल्मों और कुछेक धारावाहिकों ने अपनी थोड़ी-बहुत जगह बनाई है. हिंदी के लिए 'जय हो' की स्थिति अभी कोसों दूर है.
    चुनौती खुद हिंदी पर उत्पन्न खतरों से निपटने की भी है. एक संपर्क भाषा के रूप में अंतर्निहित नमनीयता क्या हिंदी को ही इतना बदल डालेगी कि उसकी पहचान ही मिट जाए? खासकर तब जब सामना अंग्रेजी से हो जिसके पीछे शताब्दियों तक एकसाम्राज्य की ताकत थी और अब अमेरिका की. क्या अपनी नमनीयता पर पड़ने वाले दबावों से हिंदी टूट जाएगी? वैसे समृद्ध सांस्कृतिक-भाषाई विरासत, विशाल शब्द भंडार और विविधताभरा जनाधार हिंदी को पर्याप्त मजबूती प्रदान करता है, तथापि हिंदी क्षेत्र के ही कुछेक हलकों में तुरत-फुरत मुनाफा बटोरने की चाहत रखने वाले भाषाई सटोरिए इसे तोड़ने का प्रयास भी कर रहे हैं. कुछेक हिंग्लिश शब्दों के प्रचलन से वैसे हिंदी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं, लेकिन हिंदी मीडिया के कुछ प्रकाशन एक बनावटी हिंग्लिश के पैरोकार बनकर उभरे हैं.
    नेट पर हिंदी की उपस्थिति धीरे-धीरे बढ़ रही है. यहां भी लक्ष्य नेट पर हिंदी की उपस्थिति को (हिंदीभाषियों की आबादी के अनुपात में कम से कम) आठ फीसदी तक पहुंचाना है. नेट के आरंभ में अंग्रेजी की उपस्थिति पचानबे फीसदी से भी अधिक थी, चीनी की नगण्य. अब चीनी की उपस्थिति पैंतीस फीसदी से भी ऊपर जा पहुंची है (विश्व की आबादी में चीनीभाषी आबादी का अनुपात करीब बाईस फीसदी है).
    एक बड़ा सवाल भाषाओं के विश्व-बाजार में हिंदी को बेचने का है. हिंदी समुदाय के पास हिंदी के छवि-निर्माण, उसकी पैकेजिंग तथा उसकी बिक्री कर कारोबार करने वाले उद्यमियों का नितांत अभाव है. वैसे यह भी हिंदी समाज की पिछड़ी स्थिति की ही एक अभिव्यक्ति है. लेकिन इस पिछड़ेपन की दुहाई देकर इस कार्य से मुंह मोड़ने को भी उचित नहीं ठहराया जा सकता. घरेलू तौर पर भी हिंदी के वर्तमान कारोबारी-और ऐसे कारोबारी कम नहीं हैं-सरकारी अथवा संस्थागत खरीद और सरकारी मदद से होने वाले समारोहों, गोष्ठियों, जलसों, प्रकाशनों आदि से ही संतुष्ट हैं. हिंदी का एक जन बाजार (मास मार्केट) बनाने के लिए जरूरी निवेश करने और जोखिम उठाने का उद्यमी भाव उनमें नदारद है. राजभाषा होने का या एक नकारात्मक पक्ष है.
    हिंदी के जन बाजार के लिए स्थितियां कब से मौजूद हैं. यदि हिंदी के प्रकाशक इस दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तो इतना बड़ा बाजार कोई छोड़ नहीं देगा. दूसरे आएंगे (आ चुके हैं तथा आ रहे हैं) और तब हिंदी के परंपरागत प्रकाशक या तो बदलने को बाध्य होंगे, या बंद हो जाएंगे, या फिर उन्हीं संस्थानों के कनीय भागीदार बनकर रह जाएंगे. हिंदी प्रकाशकों की वेबसाइटें भी अनाकर्षक तथा आवश्यक सूचनाओं से वंचित हैं.
    हिंदी का जन बाजार बनाने में एक बड़ी बाधा खुद हिंदी बुद्धिजीवियों के एक प्रभावशाली हिस्से में बाजार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण है. 'बाजार ही सारी समस्याओं का समाधान है' जैसे बाजारवादी-वर्चस्वादी तर्क का विरोध करते-करते वे प्रायः बाजार का ही विरोध करने लगते हैं, फलतः बाजार में विश्वास के साथ उतरने से कतरा जाते हैं. 'बेचना' शब्द सुनते ही ऐसे लोग भड़क जाते हैं, मानो कोई पाप कर रहे हों. बाजार हजारों वर्ष पुरानी संस्था है और विनिमय के युग में यह हमारे सामाजिक जीवन की प्रमुख हिस्सा है. विनिमय ही आज हमारे जीविकोपार्जन का सर्वप्रमुख जरिया है. बाजार के विरोध के पीछे कभी-कभी कृषि युगीन, कमोवेश स्वयंसंपूर्ण ग्रमीण अर्थव्यवस्था में व्यापारियों के प्रति मौजूद पूर्वाग्रह भी झलकता है. बहरहाल, बाजार विरोध का व्यवसाय भी बाजार में ही फलता-फूलता है.
    हिंदी के कारोबारियों के लिए अफ्रीकी, मध्य एशिया, लातिनी अमेरिका, और सर्वोपरि, चीन के बाजार में अपार संभावनाएं हैं जिन पर पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है.
    हिंदी कारोबार के भौतिक-आर्थिक पक्ष के अलावा उसके साहित्यिक पक्ष की भी यहां थोड़ी चर्चा की जा सकती है. विभिन्न जनपदीय समूहों के बीच संवाद के माध्यम के रूप में हिंदी में प्रायः एक आभासीपन, एक शिष्टता और संवेदनशीलता आ जाती है. कालक्रम मं इसने एक ग्रंथि का रूप ले लिया. यह ग्रंथि श्रेष्ठ साहित्य की रचना में रुकावटें खड़ी कर देती है. साहित्य में हम अपने उदात्त भावों से ही रू-ब-रू नहीं होते, बल्कि अपने उन्मत्त क्षणों का भी साक्षात करते हैं, हम अपने प्रकट जीवन की ही कथा नहीं पढ़ते, अपने अंतरंग तथा गुप्त जीवन के रहस्योद्‌घाटन का भी आनंद उठाते हैं, अपने शिष्ट बरताव का ही पाठ नहीं पढ़ते, उस शिष्टाचार के पीछे छिपी अपनी गालियों पर भी मुग्ध होते हैं. एक शिष्ट, सतही तथा 'अभिभावक' के भाव से गर्वित भाषा में यह सब अभिव्यक्त करना समस्या बन जाता है. ऐसे में हम या तो जनपदीय भाषाओं या बोलियों की शरण में चले जाते हैं या फिर अंग्रेजी की शरण में. साहित्य में यह समस्या पहले श्लील-अश्लील विवाद के रूप में उपस्थित होती है और फिर इस विवाद के परे जाकर परिपक्वता हासिल करती है. इस परिपक्वता के बिना किसी भी भाषा का साहित्य 'सार्विक दिलचस्पी' पैदा नहीं कर पाता. प्रत्येक भाषा की परिपक्वता की निशानी उसमें कथित रूप से 'अश्लील' साहित्य की उपस्थिति है.
    साहित्य समाज का दर्पण है तो इसका अर्थ हुआ कि (दर्पण के प्रतिबिंब की तरह) आप उसमें अपने उलट रूप में प्रतिबिंबित होते हैं. वह सभ्यता को उसकी बर्बरता का और बर्बरता को सभ्यता का, समाज को उसकी असामाजिकता का और असामाजिकों को समाज का चेहरा दिखाता है. वह संतुलित करता है, बसे घरों को उजाड़ता है और उजड़े घरों को बसाता है. वह हर चरित्र को अपने उलट रूप से परिचित कराता है और इस तरह उसके पाखंड का अंत कर उसे अपने अभिशप्त व विभाजित अस्तित्व से मुक्त कर देता है. यह मुक्ति ही साहित्य के सार्विक आकर्षण की कुंजी है. यही शास्त्रीय रचनाओं की कालजयिता का सबब है. हस्तिनापुर के व्यवस्थित राज्य में सारे आदर्श पात्र मौजूद थे- आदर्श पितामह, आदर्श राजा, आदर्श माताएं, आदर्श राजकुमार, आदर्श गुरु, आदर्श मंत्री, आदि. एक-एक कर सारे आदर्श पात्रों का, उनके उलट रूप का उद्‌घाटन करते हुए, कुरूक्षेत्र की रणभूमि में ला खड़ा कर दिया जाता है. और कुरूक्षेत्र में? विरोधों के महासमर के बीच, आजकल की भाषा में, 'क्वांटम कोहेरेंस' का, कृष्ण के 'विश्वरूप' का दिग्दर्शन कराय जाता है. यही चीज आप विश्व की अनेक महागाथाओं में देख सकते हैं.
    सभ्यता तो अपने जन्म से ही पाखंड रचती है. सभ्यता के पेनोप्टिकोन (साभार जेरेमही बेंथम और मिशेल फूको) में हर नागरिक से यह उपेक्षा की जाती है कि वह इस पाखंड को अपना ले, सभ्यता के मानदंडों के अनुकूल खुद को ढाल ले. धीरे-धीरे लगता है कि हर नागरिक स्वेच्छा से सभ्य हो रहा है, उन्होंने सभ्यता का आभ्यंतरीकरण कर लिया है. लेकिन पेनोप्टिकान की प्रहरी-मीनारों के सजग प्रेक्षकों के लए भी इन बंदियों के अंतरतम की निगहबानी नामुमकिन है. वे उन्हें शारीरिक रूप से अनुशासित कर सकते हैं, अपने सांस्कृतिक उपादानों से उनके मनोजगत का भी नियमन कर सकते हैं, तब भी उनके अंतरतम का कोई कोना उनकी नजरों से ओझल ही रहता है.
    सभ्यता को सत्ता को लगता है कि सारे बंदी उसके अनुरूप अनुकूलित हो चुके हैं. लेकिन तभी, सबसे अनुशासित-अनुकूलित उनका हमराही उनका हंता साबित होता है. अंतरतम के उसी अनजान कोने में प्रतिसत्ता का भूमिगत संसार रचा जाता है. साहित्य सभ्यता की सत्ता के पेनोप्टिकोन में रचा गया प्रतिसत्ता का वही भूमिगत संसार है. 'साहित्य सभ्यता का विलोम है.'
    सभ्यता हमेशा कुछ लक्ष्य, कुछ मंजिलें तय करती है ओर उन्हीं से अपनी सफलता के पैमाने निर्धारित करती है. साहित्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, कोई मंजिल नहीं होती और इसीलिए उसकी सफलता का कोई पैमाना नहीं होता. वह तो हमें लक्ष्यहीन, मंजिलविहीन प्रवाह में छोड़ देता है- प्रवाह की पुनप्राप्ति में ही हमें मुक्ति का आनंद मिलता है.
    हिंदी साहित्य में ग्रंथि मुक्ति एक परिघटना बनती दिख रही है. तथापि वह कुछ ज्यादा ही शिष्ट, सभ्य और लक्ष्योन्मुख रही है. फलतः उसके पास सार्विक सहानुभूति वाली रचनाएं कम ही हैं.
   
'हिंदी समुदाय और राष्ट्रवाद'
राष्ट्रवाद और हिंदी के प्रश्न पर जिन भारतीय विचारकों ने अपने गहन शोध, तीक्ष्ण विश्लेषण और बेबाक विचारों से अपनी प्रभावकारी छाप छोड़ी, उनमें निश्चय ही रामविलास शर्मा का नाम काफी सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने दरअसल एक खास विचारशाखा की नींव रखी जिसने हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक समुदाय को काफी प्रभावित किया.
    हिंदी जाति की अवधारणा रामविलास शर्मा की एक प्रमुख अवधारणा रही है. सुधीर रंजन सिंह की पुस्तक 'हिंदी समुदाय और राष्ट्रवाद' (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009; पृष्ठ; 131, मूल्य : 150 रुपए.) इसी अवधारणा को केंद्र में रखकर लिखी गई है. पुस्तक 'राम विलास शर्मा की हिंदी जाति के लिए' समर्पित है. पुस्तक की भूमिका में ही लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि हिंदी जाति के 'महानायक' रामविलास शर्मा के कामों में निहित हिंदी जाति के प्रति पूर्ण समपर्ण से ही उन्हें इस रचना की प्रेरणा प्राप्त हुई है. लेखक का मानना है कि 'हिंदी भाषी समुदाय जातीय पहचान की दृष्टि से अभी अधूरी अवस्था में है. देश के दूसरे आधुनिक भाषा समुदायों की तुलना में इसमें जातीय अनुभूति के स्तर पर अधिक असमानताएं एवं विभाजन हैं. दूसरे शब्दों में, इसमें पिछड़ी और टूटी-फूटी अस्मिताओं का ही अस्तित्व अधिक है... पृथकतावादी (?) आंदोलन देश के दूसरे क्षेत्रों-तेलंगाना, सौराष्ट्र, विदर्भ, कोंकण, दार्जिलिंग, त्रिपुरा, आदि में भी हुए और कुछ में ज्यादा ही दबाव बने, लेकिन उनमें से कोई नहीं टूटा, केवल हिंदी प्रदेश-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार का बंटवारा हुआ. कोई प्रतिरोध नहीं. स्वाधीनता के बाद जैसे विखंडन का सारा इतिहास हिंदी प्रदेशों को सौंप दिया गया हो...' (पृ. 7) इस प्रकार लेखक ने अपनी भूमिका में पुस्तक रचना के पीछे निहित अपनी प्रेरणा और उसकी पृष्ठभूमि का स्पष्ट उल्लेख कर दिया है. पुस्तक पांच अध्यायों में विभक्त है-राष्ट्रवाद : इतिहास का वैचारिक पाठ, राष्ट्र और उसके समुदाय, भाषायी राष्ट्रवाद, नवजागरण और हिंदी समुदाय, हिंदी समुदाय : भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना, एवं राष्ट्र का वर्तमान और हिंदी समुदाय.
    मेरा यह आलेख दरअसल इसी पुस्तक की समीक्षा के बहाने लिखा गया है. पुस्तक में व्यक्त लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों पर मैंने इस आलेख में अपना विचार रखने की कोशिश की है.
    घोषित रूप से हिंदी जाति की अवधारणा के समर्थन में पुस्तक लिखने के बावजूद, ऐसा लगता है कि लेखक खुद इस अवधारणा को लेकर असहज महसूस करते हैं. यह असहजता लगभग हर महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा के दौरान दिख जाती है और 'लेकिन', 'किंतु-परंतु' के साथ लगभग हर अध्याय के निष्कर्ष वाले वाक्यांशों में उपस्थित हो जाती है. मसलन हिंदी जाति के प्रश्न को ही लीजिए. वे लिखते हैं, 'आज इकहरे अर्थ में बंगाली, मराठी या तमिल रहने का युग नहीं है. हिंदी समुदाय की मिश्रित प्रकृति, बोली और जीवनशैलीगत भिन्नताएं, उसकी हदबंदी-मुक्त संस्कृति की सूचक हैं. इसमें आश्चर्य नहीं कि यह समुदाय अपने इस गुण के कारण देश के दूसरे समुदायों के बीच कभी आदर्श बने.' (पृ. 9)
    उपर्युक्त वाक्य में, पुस्तक में भी अनेक जगहों पर और खुद पुस्तक के नाम में भी हिंदी 'जाति' की जगह 'समुदाय' शब्द का प्रयोग किया गया है. एक जगह (पृ. 70) समुदाय को लिखकर कोष्ठक में जाति लिखा गया है. यह हिंदी जाति की अवधारणा के प्रति खुद लेखक की असहजता के संकेत हैं. मेरी नजर में यह 'फ्रायडियन स्लिप' है- 'जाति' की बंद, क्लाउस्ट्रोफोबिक दुनिया की जगह लेखक के अवचेतन में समुदाय की खुली, 'इरोटिक' दुनिया ही बसी है. एक दूसरे कारण का भी आधार बनता है- राष्ट्रीयता के लिए जाति शब्द बांग्ला से लिया गया है. लेकिन एक हिंदीभाषी के लिए जाति से सहज बोध जात (कास्ट) का होता है. दो अर्थों के घुलमिल जाने, एक अर्थ पर दूसरे अर्थ के आरोपन अथवा अध्यास (सुपरइम्पोजिशन) से भी उपर्युक्त असहजता पैदा हो सकती है. (प्रसंगवश, उपर्युक्त उद्धरण के बारे में एक बात और. हिंदी समुदाय को आदर्श बनने न बनने की चिंता नहीं करनी चाहिए.)
    इसी तरह, राष्ट्र और राष्ट्रीयता की जिस अवधारणा का वे पक्षपोषण करते हैं, उस अवधारणा की भारत के संदर्भ में उपयोगिता भी उन्हें संदिग्ध लगती है. रवींद्रनाथ को उद्‌धृत करते हुए (और उनसे सहमत होते हुए) वे कहते हैं, ''पश्चिमी राष्ट्रवाद मुखयतः प्रजातीय अस्मिता का राष्ट्रवाद रहा है, जिसका कुपरिणाम वह विश्वयुद्धों में झेल चुका है. रवींद्रनाथ उस राष्ट्रवाद के कुपरिणामों से प्रथम विश्वयुद्ध के समय ही परिचित हो चुके थे... पश्चिमी राष्ट्रवाद उनके लिए चिंतित करने वाला इसलिए था कि भारत में किसी एक प्रजाति के लोग नहीं रहतेः 'भारत का इतिहास...सृजन की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व की अनेक प्रजातियों ने योगदान दिया है...' रवींद्रनाथ किसी एक प्रजातीय राष्ट्र, (धर्म, क्षेत्र, वर्ण, जाति, चाहे वह जिस आधार पर हो) के धारण के विरुद्ध थे.'' (पृ. 31)... ''भारत के लोग, असली बात है, बहुलता को अंतर्मन से स्वीकार करते हैं, और किसी न किसी विचार के कारण भारत से प्रतिबद्ध दिखाई पड़ते हैं.'' (पृ. 56)... 'भारत की बहुराष्ट्रीयता एक सच्चाई है, तो उससे बढ़कर भारतीयता एक सच्चाई है.' (पृ. 108) (उपर्युक्त वाक्यों में 'प्रजाति' शब्द का प्रयोग मेरी समझ से सही नहीं है. आज से कुछ हजार साल पहले तक मानव जाति की एक दूसरी प्रजाति होमो नियंडरथलेसिस भी मौजूद थी. लेकिन अब हम सभी एक ही प्रजाति, होमो सेपिन्यस, के वंशज हैं. जैसे राष्ट्रीयता के लिए 'जाति' का प्रयोग किया गया है, उसी तरह 'उपजाति' का प्रयोग किया जा सकता था. बांग्ला में उपजाति का भी प्रयोग किया ही जाता है. त्रिपुरा के एक दल का नाम है त्रिपुरा उपजाति जुबो समिति.)
    हिंदुत्व के बारे में लेखक का यह विचार कि 'सावरकर का यह राष्ट्रवाद हिंदू, हिंदुत्व और हिंदुस्तान का एक ऐसा सघनीकरण है, जो धार्मिक प्रेरणाओं से आगे संस्कृति का राजनीतिक रूपांतरण है', मेरी समझ से हिंदुत्व विचारधारा की पैकेजिंग पर ही अटक जाना है.
    हिंदी क्षेत्र में नए प्रदेशों के गठन को नकारात्मक नजरिए से देखने और प्रादेशिक पुनर्गठन के लिए चलने वाले आंदोलनो को पृथकतावादी करार देना भी मेरी नजर में गलत है. इस पर पहले लिखा जा चुका हैं
    पुस्तक का एक बड़ा कमजोर पक्ष वीर भारत तलवार वाला प्रसंग है. गंभीर विमर्श वाली पुस्तक में व्यक्तिगत आक्षेपों से बचना चाहिए. वे लिखते हैं, ''लेकिन सितारेहिंद की छवि ठीक करने में उन्होंने (वीर भारत तलवार ने) भारतेन्दु की जिस ढंग से 'रस्साबंदी' की है, वह सबाल्टर्न पद्धति के लेखन की भी बात नहीं है. उसमें उनकी मानसिक विकृति ही अधिक झलकती है, जिसका थोड़ा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अनुचितन होगा...'' ''जहां तक मुझे ध्यान है वीर भारत तलवार राम विलास शर्मा के शिष्य तो नहीं, अवैतनिक मुंशी अवश्य रहे हैं.'' (पृ. 70) ''अब...'' (पृ. 71) क्या किसी शिष्य या 'अवैतनिक मुंशी' को अपने गुरु की प्रस्थापनाओं या फिर अपनी ही पूर्व प्रस्थापनाओं को चुनौती देने या बदलने का अधिकार नहीं है? क्या ऐसा करना 'मानसिक विकृति' है? किसी लेखक का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना गलत नहीं है, लेकिन इस मनोविश्लेषण से जो तथ्य मिलते हैं, वे उसकी मानसिक शक्ति हैं या विकृति, इस निर्णय पर पहुंचने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. लेखक पुस्तक में जो प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, 'मानसिक विकृति' साबित करने के लिए वे कतई उपयोगी नहीं हैं. उल्टे, इसमें लेखक का ही कोई पूर्वाग्रह झलकता है, क्योंकि पुस्तक के सहज प्रवाह में अचानक यह 'आक्रमण' घटित होता है.
    पुस्तक में जिन विमर्शों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, हिंदी समाज और साहित्य उनसे आगे निकल चुका है. अगर पाठ्‌यपुस्तकों और शैक्षणिक जगत में यही विमर्श बड़ी जगह घेरे हुए है तो इससे यही पता चलता है कि हिंदी शैक्षणिक जगत किस तरह समय से ताल मिलाकर चलने में विफल हो रहा है. मृत्युशय्या पर पड़े डान क्विक्जोट के शब्दों में यह 'पिछले वर्ष के घोंसलों में इस वर्ष के पंछियों की तलाश' के समान है.
    पुस्तक एक अवधारणा की रक्षा और उसी अवधारणा के प्रति असहजता के बीच के अंतर्द्वंद्व से गुजरती हुई 'भूमिका' में घोषित लक्ष्य का निर्वाह करने से चुक जाती है. आगे लेखक अपनी इस असहजता की अंदरूनी दूनिया की पड़ताल करते हैं या नहीं, पता नहीं. लेकिन वह आत्मानुसंधान दिलचस्प होगा.
    बहरहाल, हिंदी समुदाय को केंद्र कर चलने वाले विमर्श के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है.

प्रेम: भावना-अवधारणा और स्त्री

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/02/2010 11:42:00 PM

रणेन्द्र
प्रेम अपने मूल में एक भाव है । व्यक्ति की मूल प्रवृतियों में एक है राग । राग, अनुभव के स्तर पर आकर अनुराग बनता है । अनुराग में जब सान्द्रता और सघनता आती है तब वह प्रेम में ढलता है । प्रेम में व्यक्ति ममेतर से जुड़ना चाहता है । वह एक वृत्त का केन्द्र बन बृहत्तर वृत्त से जुड़ाव महसूस करना चाहता है । दरअसल प्रेम एक ही साथ उसे आत्मबोध भी प्रदान करता है और उसके ‘स्व’ के विसर्जन की कामना भी करता है । कबीर जब राजा-प्रजा किसी को भी ‘शीश’ देकर प्रेम ले जाने की बात करते हैं तो इसी ‘अहम’,  आत्मबोध को विसर्जित करने की ही प्रेरणा दे रहे होते हैं , यथाः ‘‘ प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न हाटि बिकाइ / राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सौ ले जाई ।।’’ या ‘‘ जब मै था तो हरि नहीं अब हरि हैं तो मैं नाही ’’
    रामचन्द्र शुक्ल ने प्रेम की विशिष्टता को गहराई से रेखांकित करते हुए प्रेम और रुपलोभ में अन्तर बताया । प्रेमी किसी एक की कामना करता है, जबकि लोभी हर एक पर लुब्ध हो जाता है । वे प्रेम को आत्मबद्धता की जगह आत्मविस्तार का माध्यम मानते हैं । ठीक उस शायर की तरह जिसके लिए ‘‘ इक लफ्ज-ए मुहब्बत का बस इतना फसाना है / सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है ।’’ इसी जमाने को दिल में समटेने और उसके माध्यम से कायनात को रचने वाले मालिक से जुड़ने की कामना भक्त कवियों और सूफियों ने बार-बार की है । यह एक काल-विशेष में प्रेम की पराकाष्ठा थी, ‘तुम नहीं कोई तो सब में नजर आते क्यों हो /सब तुम्ही तुम हो तो फिर मुँह छुपाते क्यों हो।’’ इसी एकात्म भाव को मीरा इन शब्दों में व्यक्त करती हैं, ‘दधि को नाम बिसर गयी ग्वालन, हरि लो हरि लो बोले रे ’ ।
    प्रेम एक साथ सहज है और जटिल भी। इसे महसूसना सहज है किन्तु व्याख्यायित करना कठिन । यह गूंगे का गुड़ है । कोई चीज आपको अच्छी क्यों लगती है इसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं भी हो सकता है । हो सकता है कोई अबूझ कारण हो । कालिदास की माने तो ‘कुछ चीजें हमें मधुर लगती हैं, कुछ लोग हमें अच्छे लगते हैं . . . वह जन्मोत्तर का सौहार्द है जिसके कारण ऐसा होता है ।’
    लेकिन प्रेम एक पवित्र-सात्विक भावना भर नहीं है । अगर यह भाव इतना निर्दोष है तो यहाँ प्रेम करती स्त्रियाँ अनुपस्थित क्यों हैं ? वे केवल प्रेम का आवलम्बन, काम्या, स्वप्न, उपकरण भर ही क्यों हैं? क्या प्रेम का पाठ पितृसत्ता द्वारा स्त्री के शोषण के लिए आवष्किृत सांस्कृतिक सूत्र भर है ?
    मैनेजर पांडेय का मानना है कि, ‘स्त्री हमारे आकर्षण का केन्द्र तो है किन्तु सम्मान की पात्र नहीं । भारतीय समाज स्त्री का सम्मान करना नहीं सीख पाया है । इसीलिए प्रेम पुरुष का विशेषाधिकार है, जबकि स्त्री के लिए अपराध । जिस समाज में स्त्री की अस्मिता नहीं, वहाँ प्रेम कैसे हो सकता है ।” राणा जी पहले भी जहर का प्याला भेजा करते थे । ‘राणा जी’ आज भी ‘ऑनर किलिंग’ किया करते हैं । अतः प्रेम को अवधारणा की कसौटी पर कसने की आवश्यकता है ताकि इसका वर्ग-चरित्र स्पष्ट हो सके और इसमें स्त्री के लिए स्पेस की तलाश की जा सके ।
    यह सत्य है कि प्रेम ही सबसे पहले आत्मबोध कराता है , स्वाधीनता का अहसास जगाता है, दूसरी ओर प्रिये के प्रति पजेसिवनेस (स्वत्वाधिकार) का भाव रखता है । उसकी आजादी सीमित करता है, बाँधता है । प्रेम और स्वतंत्रता में द्वंद्व एक शाश्वत प्रश्न है । अस्तित्ववादी दर्शन भी यह मानता है कि, ‘‘व्यक्तित्व की जिस स्वाधीनता से प्रेम के आकर्षण और भावावेग का जन्म होता है, प्रेम अपनी अन्तिम परिणति में उस की ही बलि चाहता है, इस तरह वह एक अन्तरविरोधी संवेदना है ।’ एकाधिपत्य का यह भाव भी दर्शनीय है,  ‘‘ नैनां अंतरि आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ / ना हौं देखौं और कूं, ना तुझे देखं देउं ।’’
    इस प्रकार एक आधिपत्यवादी पुरुषोचित प्रेम की अवधारणा सामने आती है जो स्त्री की स्वायतता, स्वतंत्र अस्मिता  को असंभव बनाती दिखती है । अतः स्त्री-दृष्टि से प्रेम का विश्लेषण जरुरी है ताकि इसके तनाव, द्वन्द्व और जटिलताओं को समझा जा सके । इसके जनतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया को गति दी जा सके । प्रेम का इतिहास और स्त्री का इतिहास अन्तर्गुम्फित हैं । वैयक्तिक सम्पति के उदय और स्त्री का मानवी से पदच्युत हो कर सम्पति और वस्तु में तब्दील हो जाना प्रेम के इतिहास का भी एक अध्याय है । आदिवासी और श्रमाधारित जीवन स्थितियाँ एक हद तक स्त्री-पुरुषों को सहभागी बनने को विवश करती हैं । श्रम और प्रकृति का संसर्ग उनके मनोभावों को उत्फुल्ल बनाता है। अतएव  इनके गीतों, कहानियों, चित्रों में प्रेम का ज्यादा समभावी रुप देखने को मिलता है । यहाँ स्त्रियों द्वारा रचित प्रेमगीत भी मिलते हैं जिनमें विशिष्ट अलंकरणों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती । दैनदिंन प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ कविताई में ढ़लती हैं, ‘मन मोरा अदहन, तन मोरा चाउर, नयना मूँग के दालि /अपन बलम के जेंवना जेवंतिउ बिनु लकड़ी बिनु आगि।’ या, हंसिनी को सौत बनाती स्त्री-गीत की इन पंक्तियों में एकत्व बोध मानो दमक उठता है, ‘पिय सन अस मन मिलयूँ जस पय पानि / हंसनि भयि सवतिया, लइ विलगानि ।।’’
    आभिजात्य वर्ग को इस जीवन्त प्रेम से भेंट नहीं हो पाती । यह कल भी सच  था  और  आज भी । रानिवास की स्त्रियाँ सम्बोधन भर के लिए महारानी-रानी जो हों किन्तु हैं पूर्ण आश्रिता । अतएव वहाँ ‘स्व’ बोध कहाँ जो ऐसा प्रेम रचे । शास्त्रीय  साहित्य में , प्राचीन संस्कृत-साहित्य में भी, देह की कामना और उससे जुड़ी वायवीयता,  भावुकता, फैंटेसी ही प्रेम का आधार है । कालिदास, अश्वघोष, भारवि, माघ, अमरु आदि संस्कृत कवियों की नायिकाएँ पुरुष की काम्या, कामिनी भर हैं । उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य पुरुषों के लिए चिरआकर्षण का विषय भर बना रहना है । इसके अलावा उनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। यह छवि ऐसी व्यवस्था से उपजी हैं जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों के पूर्णतया अधीन हैं । पुरुष के जीवन में उनकी कोई सक्रिय सहभागिता है ही नहीं । अतएव यहाँ स्त्री लोक गीतों जैसी कोई रचना भी नहीं दिखती ।
    भक्तिकाव्य-काल का परिप्रेक्ष्य कुछ अलग है । भक्त कवियों ने सामन्ती व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था सबों पर चोट की । इस दौरान निम्न तबकों के साथ स्त्रियाँ भी सामाजिक-सांस्कृतिक विद्रोह की आवाज बुलंद करती हैं । अतएव यहाँ प्रेम एक नये रुप में प्रकट होता है । यहाँ ललद्येद , अंदाल, अक्का महादेवी, मीरा, ताज, हब्बा खातून, अरणिमाल जैसी सैकड़ों भक्त कवयित्रियाँ शाश्वत से नेह लगाती, उसी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती और इस जरिए अजाने अपनी पहचान अपना ‘स्व’ भी अर्जित करती दिखती हैं । प्रेम का यह व्यापार भी अद्भुत है । ये भक्तिनें घर से निकलती हैं विद्रोह करके, सामाजिक - बन्धनों को तोड़ कर आजादी की साँस लेने लेकिन आगे बढ़ कर एक अनूठे अलौकिक  प्रेमी का दासत्व स्वीकार कर लेती हैं । यह उस देश-काल की अपनी सीमा है । मीरा ने हरि को मोल लिया या हरि ने मीरा को मोल लिया यह कौन तय करेगा ? किन्तु इतना सत्य है कि मीरा, अक्का, अंदाल या ललद्येद को यह कहने की जरुरत महसूस नहीं हुई कि पुरुष की झाँई पड़ते भुजंग अंधा हो जाता है या पुरुष नरक के द्वार या मीनार हैं ।  
   प्रेम की अवधारणा आधुनिकता के साथ बदली । आधुनिकता अपने साथ तर्क, जनतांत्रिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि और सबके केन्द्र में मनुष्य को रख कर सामने आई । इसने आजादी, बराबरी और बंधुत्व का आदर्श सामने रखा । पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों और साहित्य-चिन्तकों ने प्रेम के नये अवतार ‘ आवेगमय प्रेम’ की अवधारणा सामने रखी । किन्तु अब प्रेम लगभग दो बराबर व्यक्तियों के बीच का कार्य व्यापार था । अब स्त्रियाँ मात्र काम्या बनने को, कामना के उपकरण बनने को तैयार नहीं थीं । अब प्रेम तो चाहिए था किंतु स्वतंत्रता का आलोप नहीं । ‘आवेगमय प्रेम’ में ‘आवेग’ कोई स्थायी वस्तु नहीं है । वह तभी तक रहता है जब तक प्रेम एक आकांक्षा या स्वप्न के रुप में हो । जैसे ही वह वास्तविक सम्बन्ध का रुप लेता है, जीवन की जटिलताएँ इससे टकराती हैं, आवेग का शीराजा बिखर जाता है । आवेग की इस भंगुरता को महसूस करते हुए इस प्रेम में स्वतंत्रता की अपनी चाह को न छोड़ते हुए भी साथी से ‘व्यक्तिगत प्रतिबद्धता’ की उत्कट कामना की जाती है । किन्तु स्त्री अब इस वाक् जाल में फँसती नहीं दिखती । वह शोषण के हर रुप से परिचित है । अब वह अपने शर्त्त पर प्रेम करना चाहती है । प्रेम उसके लिए कोई रहस्य नहीं , स्वप्न नहीं बल्कि स्वस्थ सहजीवन का आधार भर है ।
    आधुनिक काल में महादेवी प्रेम का नेतृत्व संभालती दिखती हैं । किन्तु वे आधुनिक स्त्री-आकांक्षा का प्रतीक नहीं बन पाती । छायावादी रहस्यवाद उनके प्रेम पर एक अलौकिक चादर डाले रहता है, उर में एक दीपक मदिर-मधुर शाश्वत जलता रहता है, पीड़ा और प्रकाश की धुंध खड़ा करता । ‘तुम आ जाते एक बार / कितनी करुणा कितने संदेश / पथ में बिछ जाते बन पराग/ गाता प्राणों का तार-तार/ अनुराग भरा उन्माद राग, आँसू लेते वे पद पखार ।’
    संभवतः छायावाद की एक सीमा थी । किन्तु परवर्ती कवयित्रियों ने पुरुष वर्चस्व को न केवल ठीक-ठीक समझा बल्कि उनकी धज्जियाँ उड़ा दीं । ज्योत्सना मिलन की यह काव्य पंक्तियाँ पुरुष के वर्चस्व भाव  को एक झटके में धूल चटा देती हैं, ‘प्यार के क्षणों में कभी-कभी / ईश्वर की तरह लगता है मर्द/ औरत को/ ईश्वर . . ईश्वर. . / की पुकार से / दहकने लगता है / उसका समूचा वजूद / अचानक / कहता है मर्द /  ‘‘देखो / मैं ईश्वर हूँ’’/ औरत / देखती है उसे / और / ईश्वर को खो देने की पीड़ा से बिलबिलाकर / फेर लेती है / अपना मुँह ।’’    
    अब वह पुरुष की आँखों  में आँखें डाल उसकी लुब्धता और लम्पटता के बारे में सीधे-सीधे बताना चाहती है बिना किसी संकोच-बिना किसी लाग लपेट के, ‘ अभी-अभी जब मैं तुमसे बतिया रही हूँ / संभव  है मेरी बातों में / महसूसते देह-गन्ध रोमांचित हो  रहे हो तुम / पर मत भूलो कि / जब बतिया रहे होते हो तुम गोल-गोल / तुम्हारी भाषा की दरारों से झाँक रहा होता है / तुम्हारे भीतर बैठा बदशक्ल आदमी ।’’ - (निर्मला पुतुल)
    लेकिन प्रेम में ममेतर से मिलने की कामना , बृहत्तर वृत्त से जुड़ने, शाश्वत अलौकिक का संग करने की आकांक्षा आधुनिक स्त्री भी कर रही है तभी तो अमृता प्रीतम कहती हैं, ‘ काया की हकीकत से लेकर/ काया की आबरू तक मैं थी / काया के हुस्न से लेकर/काया के इश्क तक तू था ।’’ लेकिन भक्त कवयित्रियों से यहाँ एक फर्क है यहाँ गुलामी स्वीकार नहीं । हर हाल में आजादी चाहिए देह की और रुह की भी, ‘ तो हर देश के , हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ / यह एक शाप है, एक वर है / और जहाँ भी / आजाद रुह की झलक पड़े / समझना वह मेरा घर है - अमृता प्रीतम ’’ ।
    आधुनिक स्त्रियों की नजर एकदम साफ है । आजादी - बराबरी और भगिनीत्व की शर्त्त पर उसे कुछ भी नहीं चाहिए, प्रेम भी नहीं । अस्मिता के लोप में नहीं अस्मिता के फैलाव में उसका यकीन है । अब अन्दाज तल्ख सही किन्तु इनकी कविताओं में आज भी इश्के मजाजी के साथ-साथ इश्के हकीकी की झलक है । भले उसका रुप बदला हुआ हो । अब वह प्रकृतिरुपा अपना फैलाव पूरे प्रकृति में कर रही है और उसके इस खास अन्दाजे - बयां से इश्के मजाजी जाहिर हो रही है, ‘ अभी मैं प्रेम से भरी हुई हूँ / पूरी दुनिया शिशु सी लगती है / मैं दे सकती हूँ किसी को कुछ भी / रात-दिन वर्ष-पल-अनंत/ . . . अभी जब मैं प्रेम करती हूँ / दुनिया में भरती हूँ रंग / जंगलों में बिखेरती हूँ हँसी / समुन्द्र को सौपती हूँ उछाल/ पत्थरों में भरती हूँ शान्ति , (अनीता वर्मा) ’’
    तसलीमा तो प्रेम में सूफी शायरा की तरह सीधे खुदा को पुकारी हैं, ‘‘ दोनेां बाँहें बढ़ाकर ओ अपरुप, उठा लो कोमल निदाध / मृदंग बजाकर मुझ प्यासी को प्लावन से भर दो / बड़ी साध जगती है मन में कुँवारी देह में पोत लूँ रक्तवर्णी दाग / दुनिया - जहान छोड़ एक बार छू कर देखूँ असह्य सुन्दर !’’    आधुनिक स्वतंत्रचेत्ता स्त्री ने प्रेम को थोड़ा ढंग से स्वीकारा है । उसे मोह से प्रारम्भ हुआ प्रेम स्वीकार है किन्तु साथी का पजेसिव होना उसे अब स्वीकार नहीं । उसे अपने लिए स्पेस चाहिए । वह बराबरी का सम्मान चाहती है अतः वह प्रेम में थोड़ा ऊपर उठकर ‘मित्रता-भाव’ की चाह करती है जो प्रेम का सुन्दरतम रुप है जो प्रेम को गहराई , नया आयाम देता है और जो प्रेम को भक्ति के उच्चतर भाव की तरह स्थायित्व देता है । इस प्रकार ‘मोह’, ‘प्रेम‘ और ‘मित्रता’ के रुप में  नव्य नेह अपने तीन स्तरों में प्रकट होता हैं ।    और अन्त में सिर्फ यह कि प्रेम के भावकों में देश-काल के अनुरुप भले
मनोदैहिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक परिवर्त्तन आये हों किन्तु प्रेम तो वही है एक शाश्वत भाव, राग और अनुराग जो मन में और पूरी कायनात में पल प्रतिपल सान्द्रता ग्रहण करता रहता है और रोम-रोम से अपने ‘पिऊ’ को पुकारता रहता है । जिस भाव में सोने-जगने का अन्तर भी मिट जाता है, ‘सोऊँ तो सपने मिलूँ जागु तो मन माहि’ । पिऊ को रिझाने का यह अन्दाज भी  कितना निराला है, ‘‘नैंनं की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाए / पलकों की चिक डाल के पी को लिय रिझाए ।’’ यही तो प्रेम है, सम्पूर्ण प्रेम । अपनी पूरी इयत्ता के साथ । आमीन ।

क्या जनतंत्र और मीडिया फासीवाद को किराये पर दे दिए गए हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/01/2010 01:43:00 PM

तहलका के साथ बातचीत में अपने ऊपर हमले की आशंका अरुंधति ने महज कुछ ही दिन पहले जताई थी. टाइम्स नाऊ और अर्नब जो कर रहे हैं वह वास्तव में चिदंबरम और आरएसएस के कारनामों से बहुत अलग नहीं है. उन्होंने इस देश में एक लेखक को, जो महिला भी है, एक हिन्दू फासिस्ट संगठन द्वारा जुटाई भीड़ के हाथों पीट-पीट कर मार दिए जाने के हालात पैदा कर दिए हैं. और ऐसे में अभिव्यक्ति और लेखकीय आज़ादी के लिए लड़ने का दावा करनेवाले लेखकों की शर्मनाक चुप्पी सामने आयी है. 
हम यहाँ अरुंधति के ई-मेल का हिंदी अनुवाद पोस्ट कर रहे हैं. इसका अनुवाद अनिल एकलव्य ने अनुवाद किया है. प्रतिष्ठित वेबसाइट जेड-नेट के हिंदी संस्करण सह संचार से साभार. 

करीब सौ लोगों की एक भीड़ मेरे घर पर आज सुबह 11 बजह पहुँची (रविवार 31 अक्टूबर 2010)। उन्होंने गेट तोड़ दिया और सामान की तोड़-फोड़ की। उन्होंने कश्मीर के बारे में मेरे विचारों के खिलाफ़ नारे लगाए, और मुझे एक सबक सिखाने की धमकी दी।

एन डी टी वी, टाइम्स नाऊ तथा न्यूज़ 24 की ओ बी वैनें पहले से ही घटना का सीधा प्रसारण करने के लिए तैयार थीं। टी वी रिपोर्टों का कहना है कि भीड़ में मुख्यत: भाजपा के महिला मोर्चे के सदस्य थे।

जब वे चले गए तो पुलिस ने सलाह दी कि आगे से अगर हमें कभी आस-पास कोई ओ बी वैन घूमती नज़र आए तो उन्हें बताएं क्योंकि इसका मतलब होगा कि कोई भीड़ भी आने वाली है। इस साल जून में, पी टी आई द्वारा एक झूठी रिपोर्ट अखबारों में छपने के बाद दो लोग मोटरसाइकल पर आए और उन्होंने मेरे घर की खिड़कियों पर पत्थर फेंकने की कोशिश की। उनके साथ भी टी वी के कैमरामैन थे।

तमाशे की तलाश मे लगे मीडिया के इन हिस्सों तथा भीड़ और अपराधियों के बीच यह संबंध किस प्रकार का है? क्या मीडिया जो खुद को पहले ही से उस 'सीन' की जगह तैयार कर लेती है को इस बात की गारंटी होती है कि ऐसे आक्रमण और प्रदर्शन अहिंसक होंगे? अगर ऐसे में आपराधिक घुसपैठ हो (जैसा कि आज हुआ) या इससे भी बुरा कुछ हो तब? क्या मीडिया उस हालत में अपराध में भागीदार नहीं होगा?

यह सवाल महत्वपूर्ण है, यह देखते हुए कि इस समय टी वी चैनल तथा अखबार बेखटके भीड़ के गुस्से को मेरे खिलाफ उकसाने में लगे हैं।

सनसनीखेज खबरों की तलाश में खबर रिपोर्ट करने और खबर उत्पादित करने के बीच की सीमारेखा मिटती जा रही है। क्या फ़र्क पड़ता है अगर टी आर पी रेटिंग की वेदी पर कुछ लोगों की बलि चढ़ानी पड़ती है?

सरकार ने ऐसा संकेत दिया है कि मेरे तथा हाल में कश्मीर की आज़ादी पर हुए सेमिनार में शामिल अन्य वक्ताओं के खिलाफ़ राजद्रोह के आरोपों को आगे बढ़ाने का उसका इरादा नहीं है। तो क्या इस विषय पर मेरी राय के लिए मुझे सज़ा देने का ज़िम्मा दक्षिणपंथी स्टार्म ट्रूपर्स ने ले लिया है?

बजरंग दल तथा आर एस एस ने खुले तौर पर घोषणा की है वो जो भी तरीके उनके पास हैं उनका इस्तेमाल करके मुझे 'ठीक' कर देंगे, जिसमें मेरे खिलाफ देश भर में मामले दर्ज करना भी शामिल है। पूरा देश देख चुका है कि वो क्या कर सकते हैं, और उसे करने में किस हद तर जा सकते हैं।

तो, जहाँ सरकार एक हद तक परिपक्वता दिखा रही है, क्या मीडिया के हिस्से तथा जनतंत्र की व्यवस्था को उन लोगों को किराए पर दिया जा रहा है जो भीड़ के न्याय में यकीन करते हैं?

यह बात मैं समझ सकती हूँ कि भाजपा का महिला मोर्चा मेरे बहाने आर एस एस के वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार पर से ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है, जिन पर हाल ही में सी बी आई ने अजमेर शरीफ़ में हुए बम विस्फोट, जिसमें कुछ लोग मारे गए तथा कई लोग घायल हुए, के लिए मामला दर्ज किया है।

लेकिन मीडिया की मुख्य धारा के कुछ हिस्से ये सब क्यों कर रहे हैं?

क्या अलोकप्रिय मत रखने से एक लेखक किसी बम विस्फोट के आरोपी से अधिक खतरनाक है? या फिर यह विचारधाराओं के तालमेल का सवाल है?

अरुंधति रॉय
31 अक्टूबर 2010

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय-दूसरी किस्त

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/29/2010 05:19:00 PM

राष्ट्रवाद और हिंदी समुदाय -2 

हाशिया पर राष्ट्र, आधुनिकता, समुदाय और इतिहास पर प्रसन्न कुमार चौधरी के लम्बे लेख कि पहली किस्त पोस्ट की गयी थी. अब इसकी दूसरी किस्त पेश कि जा रही है. तीन किस्तों में इस लेख का प्रकाशन हंस में हुआ है, जिसे हम भाई रणेंद्र के सौजन्य से यहाँ साभार पेश कर रहे हैं. 
 
दो दृष्टियां

एक दृष्टि है जो चीजों को, परिघटनाओं को निरपेक्ष रूप से एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ा कर देखती है, ‘बनाम’ की दृष्टि से चीजों को परखती है. ईश्वर बनाम शैतान, अच्छा बनाम बुरा, सही बनाम गलत, सफेद बनाम बर्बर, हम बनाम वे, आदि, आदि. फलतः यह विचार पद्धति स्याह को समाप्त कर सफेद को, गलत का विनाश कर सही को, निम्न को निष्कासित कर श्रेष्ठ को, बर्बर का उन्मूलन कर सभ्य को ... प्रतिष्ठित करने का अभियान चलाती है.

कहा जाता है कि विद्युतीय तथा कम्प्युटर जैसे उपकरण, मानव-मस्तिष्क के न्यूरॉन्सः में सूचना-संप्रेषण की विद्युतीय किया इसी द्विचर (बाइनरी) आधार पर काम करती है-ऑन-ऑफ, शून्य-एक. सृष्टि के विभिन्न अस्तित्व रूपों को मनुष्य इसी बाइनरी आधार पर ग्रहण करता है.

यह दृष्टि मानव-जाति के उद्भव से तथा औजार निर्माण से जुड़ा रहा है. इसने इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आदिम चिंतन में भी हम युग्म प्रतीकों तथा द्विचर विरोधों (हां-ना, काला-सफेद, आदि) का साक्षात करते हैं. मानव समेत अन्य प्राणियों के शरीर में और औजार निर्माण में हम दक्षिण तथा वामपक्षीय समिति, ऊर्ध्व-अधर, अग्र-पश्च, मध्य-छोर आदि सामान्य प्रकार के द्विचर विरोधों को अवलोकन करते हैं. बहरहाल, बुनियादी विरोधों के रूप में ऐसे वर्गीकरण सिद्धांतों का सूत्रीकरण 1896 ई. में इंगलैंड में आर. डेन्नेट द्वारा और 1902 ई. में फ्रांस में ई. दुर्खीम तथा एम. मास्स द्वारा किया गया. विरोधों के अनन्य महत्व के प्रदर्शन के इस संदर्भ में के. लेवी-स्ट्रॉस का भी नाम लिया जा सकता है (1958). (वलेरी अलेक्सेयेव, ‘मानव-जाति की उत्पति’, मास्को, 1987)

निरपेक्ष रूप से श्रेष्ठ और निम्न की अवधारणा के पक्ष में कुछ मनोविश्लेषकों का मानना है कि मानव-शिशु चूंकि अपेक्षाकृत लंबे समय तक अपने पालन-पोषण के लिए बड़ों पर आश्रित होता है, इसलिए शैशवावस्था में ही शिशु-मस्तिष्क में बड़े (पिता) निरपेक्ष रूप से ‘श्रेष्ठ’ तथा ‘सबल’ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं और वयस्क हो जाने के बावजूद अवचेतन में मौजूद यही श्रेणीकरण (द्विविभाजन) अन्य क्षेत्रों में भी अभिव्यक्ति पाता है.

इसी दृष्टि के साथ एक और दृष्टि भी जोड़ दीजिए. इसके अनुसार सृष्टि और उसके सारे अस्तित्व-रूप कुछ निश्चित नियमों से संचालित होते हैं, इन नियमों को पूरी तरह जाना जा सकता है और इन नियमों को जान लेने के बाद सृष्टि का सारा रहस्य स्वतः समाप्त हो जाएगा. इसी दृष्टि के आधर पर कुछ वैज्ञानिक ‘थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ विकसित करने में जुटे हैं.

इस जीवन-दृष्टि पर आधारित कई वैचारिक शाखाएं, संप्रदाय और स्कूल मौजूद हैं. जीवन-दृष्टि एक होने पर भी अनेक विचारशाखाओं की मौजूदगी और उनके बीच निरंतर चलनेवाले विवादों का कारण यह है कि कया सफेद है और क्या स्याह, क्या सही है और क्या गलत, क्या श्रेष्ठ है और क्या निम्न, क्या सभ्य है और क्या बर्बर, क्या पश्चिम है और क्या पूरब...इन प्रश्नों पर इनमें. मतैक्य नहीं है (हो भी नहीं सकता). इसी तरह सृष्टि और मानव समाज को संचालित करनेवाला कौन-सा नियम अथवा. नियमों का समूह सही या गलत है, इस पर इनमें सहमति नहीं है.

यह सृष्टि हर विचार को विभिन्न सांचों पर बांटकर रख देती है-भाववादी, भौतिकवादी, द्वंद्ववादी, अधिभूतवादी, प्रत्यक्षवादी, प्रभाववादी, सारसंग्रहवादी, तार्किक प्रत्यक्षवादी, आदि. जो विचार इन सांचों में नहीं समा पाते, उन्हें वे तोड़कर अलग-अलग सांचों में डाल देते हैं. बुद्ध के विचार फलां प्रतिशत भाववादी. कबीर थोड़े भौतिकवादी, थोड़े अद्वैतवादी. उनके दोहे की एक पंक्ति भौतिकवादी, दूसरी पंक्ति रहस्यवादी-भाववादी. आदि, आदि. इस तरह, इस सृष्टि के विचारक मानव-जाति के सभी पूर्व विचारकों और उनके विचारों के प्रति न्यायाधीश का रूख अख्तियार करते हैं और उन पर अपने फैसले सुनाते हैं.

दूसरी दृष्टि चीजों और परिघटनाओं को उनके दिक्-काल सापेक्ष परिपेक्ष्य में देखती है... किसी भी चीज अथवा परिघटना को अनंत (सापेक्ष) परिप्रेक्ष्यों में देखा जा सकता है. कोई भी पर्यवेक्षण अंतिम नहीं हो सकता. देखना कभी खत्म नहीं होता. एक सापेक्ष परिप्रेक्ष्य में जो महान है, वही दूसरे परिप्रेक्ष्य में अधम हो सकता है, सफेद भिन्न परिप्रेक्ष्य में स्याह है, श्रेष्ठ निम्न है, सभ्य बर्बर और पूरब पश्चिम हो सकता है. (जैसा कि ‘स्टार वार्स’ में एनाकिन स्काइवाकर के इस प्रश्न कि ‘या तो तुम मेरे साथ हो या फिर मेरे दुश्मन हो’ के जवाब में जेदाइ ओबे-वान केनोबी कहता है, ‘निरपेक्षों में सिर्फ सिथ (तामसिक लोग) ही विश्वास रखते हैं.’)

अतः यह दृष्टि विभिन्न दिक्-काल सापेक्ष परिप्रेक्ष्यों को समझने और उन्हें उचित सम्मान देने पर जोर देती है. दो भिन्न परिप्रेक्ष्यों के बीच का संबंध सही और गतल का संबंध नहीं है, उन्हें बनाम के रूप में पेश नहीं किया जा सकता. एक ही समय एक साथ कई (कहिए अनंत) सत्य मौजूद रहते हैं, संघर्ष और टकराव सापेक्ष सत्य एकमात्र सत्य होने को ‘दावा करते हुए’ अन्य सारे सापेक्ष सत्यों का सफाया करने लगता है. हर सत्य का अपना समय है, अपना स्थान है, अपनी उम्र है. समस्या अपनी उम्र से परे जीने की लालसा है.

इस समावेशी जीवन-दृष्टि में ‘एकमात्र’ और ‘अंतिम’ जैसे शब्दों का कोई स्थान नहीं. इसमें ‘कोई विकल्प नहीं है’ जैसे प्रस्ताव नहीं होते. चूंकि सृष्टि और उसके अस्तित्व-रूपों के अनंत आयाम हैं, इसीलिए विकल्पों का भी कोई अंत नहीं. जब आपको लगता है कि सारे दरवाजा बंद हो चुके हैं, तब यह दृष्टि आप में विकल्पों के अनेक झरोखे होने का विश्वास जगाती है और उन्हें ढूंढ़ने तथा साकार करने का साहस पैदा करती है.

यह दृष्टि हमें किसी व्यक्ति, समाज और बाह्य जगत की किसी एकआयामी व्याख्या से रोकती और हमारे मूल्यांकनों को निंदा-प्रशंसा की सफेद-स्याह दुनिया से मुक्त कर देती है. इस दृष्टि के अनुसार, एक बंद दुनिया के ही कुछ निश्चित नियम अथवा नियमों के समूह हो सकते हैं. एक खुली दुनिया को, अनंत प्रवाहमान सृष्टि को नियमों के कुछ निश्चित समूहों में कैसे सीमित किया जा सकता है? नियम हैं और उनके व्यवहारिक उपयोग भी हैं, लेकिन वे एकमात्र नियम नहीं हैं. न्यूटन-पूर्व तथा न्यूटन की त्रिआयामी दुनिया में आइंस्टीन की (दिक्-काल आयाम को जोड़ते हुए) चतुरायामी दुनिया की खोज अब स्ट्रिंग थ्योरी के अंतर्गत षट्आयामी दुनिया और नवीनतम एम-थ्योरी में ग्यारह-आयामी दुनिया तक जा पहुंची है-लेकिन जो सृष्टि अनंत है, ग्यारह आयामों में कैसे बांधा जा सकता है? इस दृष्टि में अनवरत अन्वेषण का आनंद है, न कि अंतिम नियम पा लेने की अहमन्यता.

यह दृष्टि भी मानव-मन में कमोवेश मानव-जाति के जन्मकाल से मौजूद है और इसका भी प्रागैतिहासिक मानव-जनों के उत्पादक कार्यकलाप से, उनके औजार-निर्माण से अंतरंग रिश्ता है. अमेरिकी पुरातत्वविद टी. विन्न ने ओल्डुवाई दर्रे से प्राप्त (सोलह लाख से साढ़े ग्यारह लाख वर्ष पुरानी) पुरातात्विक सामग्री की तुलना (तीन लाख तीस हजार से एक लाख सत्तर हजार साल पुरानी) हसीमिल से प्राप्त सामग्रियों से की. करीब दस लाख वर्ष से भी  ज्यादा लंबे कालखंड के दौरान औजार निर्माण में हुए परिवर्तनों और साथ ही उसमें प्रतिबंबित मानसिक विकास-क्रम का अध्ययन कर उन्होंने संक्रियात्मक गुणों का निरूपण किया, जिसका प्रतिबिंब हस्तकुठार तथा खंडकों जैसे पत्थर के औजारों में देखा जा सकता है. ये गुण हैं: (1) पूर्ण से अंश के और अंश से पूर्ण के संबंध की समझ, (2) अंशों के सहसंबंध का ज्ञान, (3) दिक्-काल संबंधी चेतना और (4) वस्तुओं अथवा संक्रियाओं की एकरूपता का बोध. (वलेरी अलेक्सेयेव, वही) (प्रसंगवश, हस्तकुठार तथा खंडकों के निर्माण में हम मानस के जिन बुनियादी संक्रियात्मक गुणों का साक्षात करते हैं, क्या वही मानव-जाति के हजारों वर्षों के इतिहास में तत्वशास्त्रीय विमर्श के प्रमुख विषय नहीं रहे हैं?)

मस्तिष्क विज्ञान भी अब न्यूरॉन्स की दुनिया से आगे (न्यूरॉन्स को जोड़नेवाले) साइनेप्सेज और साइनेप्टिक क्लेफ्ट्स की दुनिया में जा पहुंचा है. चेतना के उत्स की खोज में लगे वैज्ञानिक अब बताते हैं कि इन्हीं साइनेप्टिक क्लेफ्ट्स के माइक्रोट्युब्यूल्स (सूक्ष्म नालिकाओं) में ‘बोस-आइंस्टीन कंडेन्सेशन’ की, क्वांटम कोहेरेंस की परिघटना घटित होती है-बड़ीं संख्या में सूक्ष्म कण एकल क्वांटम अवस्था सामूहिम रूप से भागीदार होते हैं. मस्तिष्क की बुनियादी संक्रियाओं को अब इसी परिघटना से जोड़ा जा रहा है. (रोजर पेनरोज, ‘शैडोज ऑफ दि माइंड’, लंदन, 1995) यह न्यूरॉन्स की ‘ऑन-ऑफ’ की दुनिया नहीं, माइक्रोट्युब्यूल्स की क्वांटम सहभागिता की दुनिया है-विरोधों का द्वंद्व नहीं, भिन्नताओं का एकत्व.

इस दृष्टि के अनुसार, हर विचारशाखा के अतिवादी दावों और सार्विक होने की जिद को दरकिनार कर दिया जाए तो उनमें अंतनिर्हित सापेक्ष सत्यों की शिनाख्त की जा सकती है. पहली दृष्टि पर आधारित विभिन्न विचारशाखाएं आपस में भले लड़ती रहें, यह दृष्टि तो पहली दृष्टि में भी अंतर्निहित दिक्-काल सापेक्ष सत्य को सवीकार करती है और इतिहास में उसके यथोचित स्थान का सम्मान करती है.
स्वसिद्धांतव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम.
परस्परं विरूध्यन्ते तैरयं न विरूध्यते...
(मांडूक्य उपनिषद, गौड़पाद की. कारिका, 3/17)  

हर व्यक्ति और आंदोलन दिक्-काल सापेक्ष स्थितियों के अनुरूप भौतिकवादी, प्रत्यक्षवादी, परिणामवादी या भाववादी होता है. उसी तरह, व्यक्ति और समाज में हर समय एक ही साथ पूर्व परंपरागत, परंपरागत, आधुनिक और उत्तर-आधुनिक प्रवृतियां होती हैं, भले ही स्थितियों के अनुरूप उनका अनुपात अलग-अलग हो. समुचित संदर्भों से हटकर निपेक्ष रूप में हम वैचारिक सांचों में बांटकर इन प्रवृत्तियों का मूल्यांकन नहीं कर सकते.

पहली दृष्टि की स्वाभाविक परिणति हिंसा के महिमामंडन में होती है, जबकि दूसरी दृष्टि की नैतिक निष्पत्ति अहिंसा में. (जैनियों की अहिंसा का नैतिक संदर्भ अनिवार्यतः उनकी अनेकांतवादी दृष्टि का परिणाम है.)

मानव-जाति के सभी समाजों में ये दोनों दृष्टियां मौजूद रही हैं. हां, अलग-अलग स्थितियों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दोनों दृष्टियों का अनुपात एक समान नहीं रहा है. किसी खास काल में किसी समाज अथवा जीवन के किसी क्षेत्र में एक दृष्टि प्रभावशाली स्थिति में हो सकती है, तो दूसरे काल में दूसरी दृष्टि.

यूरोपीय आधुनिकता में पहली दृष्टि हावी रही है. वहीं क्वांटम विज्ञान में, यूरोप के उत्तर-आधुनिक विमर्श में दूसरी दृष्टि का पक्षपोषण सहज ही रेखांकित किया जा सकता है. लेकिन जाहिर है, यह दूसरी दृष्टि की ओर रहा है. विस्तार में जाने की जगह हम बस कुछ उद्धरणों तक ही खुद को सीमित रखेंगे.

ऐमी सीजैर (फ्रेंच कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव मॉरिस थोरेज के नाम पत्र)
‘मैं किसी निपट विशिष्टतावाद की दीवार में खुद को चिनवाने नहीं जा रहा हूं. न ही मैं किसी हाड़-मांस विहीन सार्विकता में गुम होना चाहता हूं....सार्विकता का मेरा विचार भिन्न है. यह तमाम विशिष्टताओं से. युक्त सार्विकता है, यह तमाम विशिष्टताओं का और गहन होना है और उन सबका सह-अस्तित्व है.’

फ्रांज फैनन
‘इतिहास स्पष्ट रूप से सह सिखाता है कि उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई राष्ट्रवाद के सीधे रास्ते पर नहीं चलती....रूढ़िवादी राष्ट्रवाद सम्राजवाद द्वारा गढ़ी गई लीक का ही अनुसरण करता है...साम्राज्यवाद से ही विरासत में प्राप्त सोपान का स्थान गतिशील संबंधों की नई व्यवस्था को लेना होगा.’

कियान लीकुन (अपने आलेख ‘रिफ्युजिंग टू फॉरगेट’ में लु शुन, 1881-1936, की रचना ‘पोस्टस्क्रिप्ट टू ग्रेव’ का हवाला देते हुए)
लु शुन की मान्यता थी कि विकास-क्रम की श्रृखंला में सब कुछ मध्यवर्ती है....कोई भी पूर्ण अथवा विशुद्ध क्षितिज के परे ही रहेगी. वह एक ऐसा आदर्श है जिसका अनुसरण तक किया जाना चाहिए, लेकिन जिसकी प्राप्ति असंभव है. उसके अनुसरण से ही बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धियों की प्रेरणा मिलती है. उन्होंने भी एक बहु-संस्कृति वाले विश्व की प्रत्याशी की थी.
वाङष्याओ मिंग
‘(चीन की) जटिल स्थितियों की पृष्ठभूमि में चीजों को परस्पर विरोधी श्रेणियों (डायकोटोमीज)- परंपरागत/आधुनिक, खुला/बंद, रूढ़िवादी/सुधारवादी, बाजार/योजना, समाजवाद/पुंजीवाद, कम्युनिस्ट/कम्युनिस्ट-विरोधी-में बांटकर सोचने का बुद्धिजीवियों का असाधारण हठ बड़ा ही सतही लगता है...सांस्कृतिक अध्ययनों को आधुनिक बनाने के नाम पर, जीवन के अलग-अलग सांचों में कदापि कैद नहीं होने देना होगा. न ही अधिकाधिक जटिल होती जा रही शैक्षणिक-प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कार्यशील ज्ञान के नियमन के जाल में फंसना होगा.....चीन में सांस्कृतिक अध्ययनों को न प्रचिलित ज्ञान-शाखाओं की सीमाओं का पालन करना चाहिए, न ही खुद एक नई ज्ञान-शाखा बनना चाहिए....’

भारतीय संदर्भ
भारतीय वैचारिक परंपरा में दूसरी दृष्टि की प्रभावशाली उपस्थिति देखी जा सकती है. ऋग्वेद और उपनिषदों से लेकर जैन, बौद्ध, तांत्रिक मतों, सिद्ध-संतों के दोहों में, सिख गुरुओं की वाणी में भक्तिकालीन सूफी-संत-फकीरों के दोहों तथा कवित्तों में इस दृष्टि का प्रवर्तन अनेक रूपों में हुआ है. इस दृष्टि के चिंतकों-विचारकों की दुनिया से आगे जाकर आम लोगों तक विस्तार हुआ. विभिन्न जनों, जातियों, समुदायों, भाषाओं-बोलियों, पंथों-संप्रदायों, पर्व-त्योहारों, खानपान, पहनावों, रीति-रिवाजों वाले हमारे देश में यह दूसरी दृष्टि हमारे अस्तित्व की आवश्यक शर्त है, हमारा ऐतिहासिक अनुभव है.

हमारा यह ऐतिहासिक अनुभव हमारी महागाथाओं. (रामायण/महाभारत) में भी काफी प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुआ है. वनवास-अज्ञातवास जैसे प्रसंगों को इस दृष्टिकोण से देख जा सकता है. वनवास के दौरान ही प्रमुख चरित-नायक अनेक जनों के संपर्क में आते हैं, उनके साथ बंधुत्व कायम करते हैं... उनके बीच. उनके होकर रहते हैं, उनके मुसीबतों में उनकी मदद करते हैं, उनके खानपान, रीति-रिवाज, उनकी वेश-भूषा, आदि से परिचित होते हैं. भारत के करीब-करीब सभी अंचलों में उनकी कथा के सूत्र मिलते हैं. उन क्षेत्रों में अदा की जानेवाली उन जनों की निर्णायक भूमिका सुरक्षित है. उन क्षेत्रों के लोगों और जनों को लगता है कि उनकी भूमिका के बिना इन चरित-नायिकों की कथा आगे बढ़ती ही नहीं.

इस प्रकार वनवास-अज्ञातवास भारतीय समाज का नेतृत्व करने, और शासन करने योग्य क्षमता हासिल करने का प्रशिक्षण-काल साबित होता है. वनवास के इस दीर्घ अनुभव के बाद ही वे राजकाज संभालने योग्य होते हैं. (कुछ भिन्न संदर्भ में, स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण करने से पूर्व महात्मा गांधी द्वारा ट्रेन के साधारण डिब्बे मे की गई भारत-यात्रा को इस परंपरा में देख सकते हैं.)

भारत जैसी विविधतावाले देश में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व दूसरी दृष्टि अपनाकर ही किया जा सकता था और इसका मतलब था द्विचर (बाइनरी) विरोधों पर आधारित यूरोपीय आधुनिकता का परित्याग. इस आधुनिकता एक चरित्र-लक्षण था हिंसात्मक क्रांति के जरिए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन. वैसे सामंती कृषि युग में भी सत्ता परिवर्तन प्रायः हिंसात्मक उपायों से ही हासिल किया जाता था, तथापि यूरोप की पूंजीवादी क्रांतियों के दौरान हिंसात्मक जनक्रांति का पूरा शास्त्र गढ़ा गया. अगर आप जनतंत्रवादी हैं तो शस्त्र उठाइए और राजतंत्रवादी का सफाया कीजिए. फलतः आधुनिक राजनीति-शास्त्र में सैनिक शब्दावलियों की भरमार हो गई. रूसो, वाल्तेयर, मैकियावेली, हाब्स आदि के साथ-साथ क्लाउजेवित्ज भी राजनीतिक विमर्श में प्रायः उद्धृत किए जाने लगे.

स्वभावतः द्विचर विरोधों पर आधारित यूरोपीय आधुनिकता के परित्याग का मतलब था हिंसात्मक क्रांति का परित्याग. भारत में इस घटना ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में मूर्तिमान रूप ग्रहण किया. उन्होंने विचार और व्यवहार के लगभग हर क्षेत्र में (चिंतन, कार्यशैली, भाषा, वेश-भूषा, आदि में) इस आधुनिकता  का विकल्प प्रस्तुत करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी हुए. पहले वर्णित भारतीय विचार-परंपरा ने उनकी इस कोशिश को बल प्रदान किया और वे यूरोपीय आधुनिकता के समांतर भारतीयता के प्रतीक-पुरुष बन गए. मानव समुदाय के एक रूप के बतौर राष्ट्र की जो अवधारणा यूरोपीय आधुनिकता ने प्रस्तूत की थी, भारत उस अर्थ में राष्ट्र नहीं था, न ही महात्मा गांधी उस अर्थ में एक राष्ट्रवादी नेता. उन्हें परिभाषित करना यूरोप के लिए एक चुनौती था-एक आध्यात्मिक संत? चतुर राजनीतिज्ञ? हाफ-नेकेड फकीर? धूर्त पाखंडी? इसी तरह समुदाय के रूप में भारतीय समाज भी यूरोपीय आधुनिकता के लिए चुनौती बना रहा. हिंसात्मक आंदोलन के साथ प्रायः कम्युनिस्टों का नाता जोड़ा जाता है, लेकिन कम्युनिस्ट खुद हिंसात्मक क्रांति की प्रेरणा बुर्जुआ क्रांतियों से पाते थे. 1879 में ‘दि शिकागो ट्रिब्यून’ के संवाददाता के इसी आशय के प्रश्न का जवाब देते हूए कार्ल मार्क्स ने कहा था, ‘कोई महान आंदोलन बिना रक्तपात के कभी संपन्न नहीं हुआ है. अमेरिका की स्वतंत्रता रक्तपात से हासिल की गई. नेपोलियन ने एक खूनी प्रक्रिया के जरिए ही फ्रांस पर अपना कब्जा जमाया, और वह उसी तरीके से उखाड़ भी फेंका गया. इटली, इंगलैंड, जर्मनी और प्रत्येक देश इस बात का प्रमाण मुहय्या करता है. जहां तक हत्याओं की बात है, यह कोई नई बात नहीं है. मुझे शायद ही कुछ कहने की जरूरत है. ओरसिनी ने नेपोलियन की हत्या करने की कोशिश की. अन्य किसी की तुलना में राजाओं ने सबसे अधिक हत्याएं की हैं, जेसुइट्स ने हत्याएं कीं, क्रॉमवेल के समय प्युरिटन्स ने लोगों को मौत के घाट उतारा. इन सब कार्यों को तब अंजाम दिया गया अथवा देने की कोशिश की गई, जब समाजवाद का पता ठिकाना तक नहीं था...’ (‘दि शिकागो ट्रिब्यून’ में पहली बार प्रकाशित, सं. 6;5 जनवरी, 1879; कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 24, मास्को, 1989) इस तरह हिंसात्मक क्रांति का पक्षपोषण कोई नई बात नहीं थी, यह तो यूरोपीय आधुनिकता का अनिवार्य तत्व था और कम्युनिस्ट खुद इस आधुनिकता की उपज थे. भारत में भी इस आधुनिकता से प्रेरित समूह अथवा दल (‘इतिहास में ऐसा होता आया है’ की तर्ज पर) हिंसात्मक क्रांति का पक्षपोषण करते थे.
नई बात थी अहिंसात्मक आंदोलन. लेकिन हिंसात्मक क्रांति की शब्दावली और कार्यशैली के साथ अहिंसात्मक आंदोलन का संचालन नहीं किया जा सकता था. इसीलिए महात्मा गांधी ने नई शब्दावली और नई कार्यशैली गढ़ी- सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, रचनात्मक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला, आश्रमों का जाल. इनमें से लगभग प्रत्येक मामले में वे खुद अनेक प्रयोगों से गुजरे, क्योंकि उनके पास कोई पूर्व उदाहरण मौजूद नहीं था. अपनी विनम्रता में उन्होंने भले ही इन कार्यों के लिए थॉरो, रस्किन और टॉल्सटॉय का प्रभाव स्वीकार किया हो, लेकिन सच्चाई यह थी कि एक विराट अहिंसात्मक राजनीतिक आंदोलन में करोड़ों लेगों की गोलबंदी इतिहास में अनूठी घटना थी. (प्रसंगवश, उपर्युक्त तीनों चिंतक भी यूरोपीय आधुनिकता का विकल्प ढूंढ़ने अथवा प्रस्तुत करने के अपने प्रयासों के लिए जाने जाते थे) गांधी के बाद हिंसात्मक क्रांति के हर पैरोकार को बचाव की मुद्रा अपनानी पड़ी. हिंसात्मक आंदोलन की कोशिशें समाप्त नहीं हुईं, लेकिन अब एक नई अहिंसक आंदोलनकारी धारा के व्यापक जनगोलबंदी के माध्यम से उसे पीछे जरूर धकेल दिया था. चूंकि यह एक नया प्रयोग था, इसीलिए आरंभिक दौर में इसे स्थापित करने के लिए उन्हें अपेक्षाकृत कट्टर रवैया अपनाना पड़ा और कभी-कभी कुछ कठौर फैसले भी लेने पड़े. राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच नए विचारों को स्थापित करने के लिए ऐसा करना जरूरी होता है. अहिंसा के एस प्रयोग के कारण ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में वे विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न विचारों, पंथों, संप्रदायों तथा अन्य समुदायों के लोगों को एकजुट करने में कामयाब हुए.

भारत के लिए इसका खास महत्व था. अनेक विविधताओं से भरे-पूरे तथा विभिन्न क्षेत्रों के असमान विकास के कारण भारत में सशस्त्र आंदोलन का कोई प्रयास कुछेक क्षेत्रों तक सिमटकर रह जाने या फिर दीर्घकालीन गृहयुद्ध में अधःपतित हो जाने को बाध्य था-यह औपनिवेशिक शासकों को भी भारत में जमे रहने का सुनहरा मौका प्रदान कर देता. 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य -युद्ध की भी यह एक महत्वपूर्ण सीख थी और बाद में चले शस्त्र आंदोलनों की परिणति भी इसे पुष्ट करती हैं.

बहरहाल महात्मा गांधी की अहिंसा यूरोपीय आधुनिकता के विकल्प के रूप में सामने आई थी, इसीलिए इस आधुनिकता से उत्पीड़ित जनों एवं राष्ट्रों में इसके प्रति स्वाभाविक आकर्षण पैदा हुआ, और कइयों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी बना. यूरोपीय आधुनिकता का परित्याग कर भी आधुनिक हो सकते हैं और आधुनिक होने के अपने नए अर्थ गढ़ सकते हैं.

भारत के वैचारिक परंपरा में जहां हम दूसरी दृष्टि की प्रभावकारी उपस्थिति देखते हैं, वहीं सामाजिक नियमन से संबंधित भारत के स्मृति साहित्य में पहली दृष्टि की प्रधानता मिलती है. यथार्थ जगत में इन दो दृष्टियों के बीच निपट विभाजक रेखाएं खींचना मुश्किल है-स्मृतियों में भी दूसरी दृष्टि से संबंधित विचार मिलते हैं, वहीं दार्शनिक परंपरा में भी पहली दृष्टि का प्रभाव जगह-जगह परिलक्षित होता है. यहां हम मुख्यतः दो धाराओं की चर्चा कर रहे हैं.

पहली दृष्टि के चरम अभिव्यक्ति हम जातीय सोपान पर आधारित भारत की सामाजिक संरचना में देख सकते हैं-द्विज और शुद्र, स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच जन्मजात विभाजन की उत्पीड़क सामाजिक व्यवस्था जिसमें जन्म से निर्धारित जातीय अस्मिता अन्य सारी अस्मिताओं का दमन कर देती है. कुछ जातियों को वर्चस्व का सारा सुख और अन्य को वंचना का सारा दुख प्रदान करती है.

जातीय सोपान पर आधारित भारतीय समाज पर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का स्वभावतः एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ना था. फलतः इस शासन के प्रति भारत के विभिन्न समुदायों और जातियों का रूख भी एक जैसा नहीं होना था. औपनिवेशिक शासन के किसी एक पाठ की जगह अनेक पाठ होना कतई स्वाभाविक था. वैसे, अंग्रेज भारत में सामाजिक सुधार के लिए नहीं आए थे, उनका संबंध एक भिन्न उत्पादन प्रणाली से था और उनके देश में नई-नई सामाजिक तथा राजनीतिक संस्थाएं आकार ग्रहण कर रही थीं. कृषि युग के विगत साम्राज्यों से व्यापारिक औधोगिक तथा वित्तीय पूंजी के औपनिवेशिक हित भिन्न थे. और उनकी शासन प्रणाली भी.

अंग्रेजी शिक्षा, सरकारी नौकरी, और बाद में (मनोनयन अथवा निर्वाचन के जरिए) राजनीतिक प्रतिनिधित्व दलित-उत्पीड़ित तथा पिछड़े समुदायों का भारतीय समाज की जातीय जकड़बंदी से, बंद तथा बहिष्कृत दुनिया से मुक्त करने में उपयोगी साबित हुआ था. भारतीय समाज की पुनर्रचना के  प्रयासों में यूरोपीय आधुनिकता उनके लिए त्याज्य नहीं, (और हुआ भी.) पहली दृष्टि पर आधारित भारतीय स्मृति परंपरा की काट पहली दृष्टि पर ही आधारित यूरोपीय आधुनिकता से की जा सकती थी.

समाज की पुनर्रचना के प्रयासों ने दलित-उत्पीड़ित-पिछड़े समुदायों की विशाल आबादी की रचनात्मक ऊर्जा का सामाजिक पुनर्रचना में कारगर उपयोग स्वतंत्रता के बाद जारी रहना था. स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक पुनर्रचना के प्रयासों के बीच सतह पर दिखनेवाली टकराहटों के बावजूद दोनों धाराएं एक-दूसरे की पूरक थीं और भारतीय समाज की अग्रगति के लिए अपरिहार्य भी.

बहरहाल, सामाजिक पुनर्रचना के प्रयासों में यूरोपीय आधुनिकता का सीमित उपयोग तो किया जा सकता था, लेकिन वह इस पुनर्रचना का आधार नहीं हो सकती थी. भारतीय समाज में द्विचर विभाजनों के आधार पर किसी समस्या का समाधान नामुमकिन है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही भारतीय समाज की पुनर्रचना के प्रतीक-पुरुष बन गए डॉ. बाबासाहब अंबेडकर अपने विचारों, अपनी कार्यशैली और वेशभूषा में (महात्मा गांधी से उलट) यूरोपीय आधुनिकता के प्रतिनिधि-पुरुष दिखते थे और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के क्रम में उन्होंने इस आधुनिकता का इस्तेमाल भी किया. मुख्यतः स्मृतियों के परंपरा के खिलाफ उनकी लड़ाई एक समावेशी भारतीय संविधानके निर्माण के साथ, जिसमें यूरोपीय आधुनिकता के कई उपयोगी तत्वों को भी शामिल कर लिया गया था और जिसकी रचना में स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री तथा संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बहुत हद तक एक मुकाम हासिल कर चुकी थी.

बहरहाल, भारतीय समाज की पुनर्रचना के आधार के रूप में उन्हें भी यह यूरोपीय आधुनिकता अपर्याप्त लगी. अंततः उन्होंने बुद्ध धर्म के साथ अपना वैचारिक नाता जोड़ा (पश्चिम विचारकों की शब्दावली में उन्होंने जुडियो-क्रिश्चियन पंथ की जगह एक इंडिक पंथ का वरण किया). यह बुद्ध का पुनराविष्कार था और उन्हें नया अर्थ देना था. इस तरह उन्होंने दलितों को फ्रेंच इनलाइटेनमेंट से नहीं, बल्कि यूरापीय ज्ञानोदय के करीब दो हजार वर्ष पूर्व के भारतीय एनलाइटेंड (बुद्ध) से जोड़ दिया. बुद्ध का दर्शन नहीं है. (बाबासाहब भारतीय और पश्चिमी विचार परंपरा के गहन अध्येता थे और उन्होंने यह निर्णय काफी मनन-चिंतन के बाद लिया था. प्रसंगवश, बौद्ध राजाओं के बीच विभिन्न समयों में हुए कुछेक युद्धों के बावजूद भारतीय समाज में इन दोनों धाराओं का समन्वय घटित हुआ. गुप्त साम्राज्य के पतन और उत्तर भारत में पालों के प्रभुत्व के बीच के करीब पांच सौ वर्षों के दौरान जमीनी स्तर पर इस समन्वय में तांत्रिक संप्रदायों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. दूसरे दलित नेता अपना वैचारिक संबंध विभिन्न संतो-सूफियों-फकीरों के संप्रदायों से जोड़ते थे.)

इस तरह यूरोपीय आधुनिकता का उपयोग करने के बावजूद उन्होंने वैचारिक तौर पर उस आधुनिकता का परित्याग कर दिया. प्रकटतः एक-दूसरे के उलट दिखने के बावजूद सारतः महात्मा और बाबासाहब अंततः एक ही जगह खड़े थे.

राष्ट्र-जनता
जैसा कि हम पहले देख चुके हैं कि प्रत्येक राजनीतिक विचारधारा की भांति राष्ट्रवादी विचारधारा भी अपनी एक अमूर्त राष्ट्र-जनता की रचना करती है. राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान इस अमूर्त राष्ट्र-जनता को मूर्त राष्ट्र-जनता में तब्दील कर दिया जाता है. राष्ट्रवादी आंदोलन का मूल लक्ष्य हासिल हो जाने के बाद इस मूर्त राष्ट्र-जनता को पूनः अमूर्त राष्ट्र-जनता में परिणत कर दिया जाता है.

इसे अलावा, हर राजनीतिक विचाधारा अपनी यथार्थ मांगों को अमूर्त सपनों की पैकेजिंग के साथ प्रस्तुत करता है. यथार्थ प्रायः सपनों के साथ ही अवतरित होता है. यथार्थ मांगों की पूर्ति के बाद और कुछेक सपनों के साकार होने के साथ पैकेजिंग के रूप में आए अमूर्त सपनों को भी त्याग दिया जाता है, वैसे ही जैसे किसी माल की प्राप्ति के बाद आप पैकेजिंग की सामग्री कूड़ेदान में डाल देते हैं.

समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक रूप से सक्रिय मूर्त जनता का एक हिस्सा अमूर्त की दुनिया में वापस जाने से इंकार कर देता है (जैसाकि कुछ पौरांणिक कथाओं में, उलट रूप में, वर्णित किया गया है-स्वप्न में भ्रमण को निकली आत्मा वापस शरीर में जाना भूल जाती है अथवा वापस जाने से इनकार कर देती है). स्थिति तब और भी जटिल हो जाती है जब यथार्थ मांगों की पूर्ति के बाद मूर्त विचारधारा-जनता न सिर्फ अमूर्त की दुनिया में वापस लौटने से इनकार कर देती है, बल्कि वह यथार्थ मांगों के साथ आए अमूर्त सपनों में भी सचमुच यकीन करने लगती है. मूर्त विचारधार-जनता का अमूर्त सपनों के साथ यह मेल अनेक समय में बड़ी ही विकट समस्या पैदा कर देता है. आज भारत समेत पूरी दुनिया में विचारधारा की बुलंद इमारतों से चिपके मूर्त विचारधारा-जनता के छिटपुट निराशावादी समूह बिखरे पड़े हैं-अपनी विचारधारा के कभी जुड़े नेताओं को कोसते, सिर धुनते और अपने सपनों के टूटने का रोना रोते. कुछ मामलों में ऐसे समूहों का अंत आतंकी गिरोहों, अपराध और नशीले पदार्थों की दुनिया में भी होता है. समाज रुका नहीं रहता. कुछ यथार्थ मांगों और कुछेक सपनों की पूर्ति के साथ ही समाज में नई यथार्थ मांगें पैदा हो जाती हैं और उनके साथ नए सपने भी. सवाल नई मांगों और नए सपनों के साथ आगे बढ़ जाने का है, न कि पुरानी मांगों और पुराने सपनों से चिपके रहने का.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब मुस्लिम अभिजातों के एक हिस्से ने स्वतंत्र्योत्तर हिंदू-बहुल भारत में रहने से इनकार करते हुए एक पृथक राज्य की मांग की, तो उन्हें अपनी यह मांग ‘समुदाय के स्वाभाविक आधुनिक रूप राष्ट्र’ की मांग के रूप में रखनी पड़ी. ब्रिटिश तथा यूरोपीय शासक यही शब्दावली समझते थे और ‘राष्ट्र के  आत्मनिर्णय के अधिकार’ के अंतर्गत उनकी मांग पर विचार कर सकते थे. इसीलिए कहा गया कि भारतीय मुसलमान एक पृथक राष्ट्र-राज्य उनका समान मनोवैज्ञानिक गठन है. इस आधार पर एक पृथक राष्ट्र-राज्य उनका हक बनता है. यूरोपीय आधुनिकता और राष्ट्रवादी शब्दावली में प्रस्तुत इस मांग ने तब इस बौद्धिकता से प्रेरित बौद्धिक हलकों को बचाव की मुद्रा में खड़ा कर दिया था. आधुनिकता में रचे-बसे मुहम्मद अली जिन्ना इस धारा के स्वभावतः प्रतीक पुरुष बन गए और पाकिस्तानी संविधान सभा में दिया गया उनका ‘सेक्यूलर राज्य’ संबंधी वक्तव्य इस पूरी आधुनिकता-प्रेरित प्रक्रिया स्वाभाविक हिस्सा था. यह आधुनिकता-आधारित धारा खुद मुसलमानों में तब अच्छा-खासा प्रभाव रखनेवाली उस धारा के विरुद्ध थी जिसका प्रतिनिधित्व मौलाना अबुल कलाम आजाद और मौलाना हुसैन अहमद मदनी करते थे तथा जो जिन्ना के द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के विरोधी थे.

इस मांग की प्राप्ति की दिशा में एक अमूर्त मुस्लिम राष्ट्र-जनता की रचना की गई, जिसे समय-समय पर मूर्त राष्ट्र-जनता का रूप दिया गया. (बताने की जरूरत नहीं कि यह प्रक्रिया कितनी रक्तपातपूर्ण रही.) साथ ही इस यथार्थ मांग को आकर्षक अमूर्त सपनों (एक आदर्श मुस्लिम समाज के निर्माण के सपनों) की पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारा गया. यथार्थ मांग की प्राप्ति के बाद अमूर्त सपनों की पैकिंग सामग्री ठिकाने लगा दी गई.

बहरहाल, इस मामले में भी अमूर्त की दुनिया में वापस लौटने से इनकार करनेवाली मूर्त राष्ट्र-जनता और अमूर्त सपनों के मेल ने पाकिस्तान के लिए समय-समय पर विकट स्थिति पैदा की. कुछ चिरलंबित समस्याओं से जुड़कर तथा जन्म से ही आंग्ल-अमेरिकी और फिर अमेरिकी प्रभुत्वाद के संरक्षण तथा हस्तक्षेपों की वजह से इसने आज विस्फोटक रूप धारण कर लिया है. पाकिस्तान का आज का संकट आधुनिकता-प्रेरित पाकिस्तानी राष्ट्र-राज्य के गठन के अंदरूनी द्वंद्वों का ही प्रकटीकरण है.

हिंदुत्व की विचारधारा भी उसी यूरोपीय आधुनिकता से प्रेरित यूरोपीय राष्ट्रवाद की हीं एक उग्रशाखा (नाजीवाद) का (विचार, कार्यशैली तथा वेशभूषा में) अनुकरण थी. ‘स्वदेशी’ का तमाम दावों के बावजूद यह नितांत ‘विदेशी’ विचारधारा थी जिसका लक्ष्य ‘जुडियो-क्रिश्चियन पंथों’ के अनुरूप हिंदू धर्म का पुनर्गठन करना, ‘हिंदू जाति’ का सैन्यीकरण करना और उसका एक राष्ट्र-राज्य गठन करना था. हिंदूओं की सारी विशिष्टताएं (उनकी विविधता, उनके बीच प्रचलित अनेक पंथ-संप्रदाय, उनके बीच किसी संगठित चर्च तथा अधिकारिक प्रवक्ता का अभाव आदि) उन्हें उनकी कमजोरी लगते थे और वे हिंदुओं के लिए भी ‘एक चर्च, एक पोप, एक रोम’ की रचना करना चाहते थे. जो अपरिभाषेय था, उसे वे अपनी परिभाषा से मंडित करना चाहते थे. जो भारत के अस्तित्व की शर्त था, उसे वे विघटन का कारण मानते थे. वे भारत की समावेशी वैचारिक परंपरा के बजाया उसकी समय-सापेक्ष स्मृति परंपरा के प्रतिगामी पक्षों से खुद को अधिक निकट पाते थे. उदार होने के तमाम दावों के बावजूद उनके कुछ नेताओं द्वारा समय-समय पर हिटलर और गोडसे की प्रशंसा कोई विच्युति नहीं उनके मूल वैचारिक स्त्रोतों का ही प्रकटीकरण है. हिंदुत्व भारतीयता का निषेध है. पश्चिमी आधुनिकता-प्रेरित प्रतिद्वंद्वी विचारधाराएं नहीं, बल्कि गांधी ही उनकी राह की सबसे बड़ी रुकावट थे.

हिंदुत्व की विचारधारा ने भी एक अमूर्त हिंदू-जनता की रचना की और उसे समय-समय पर मूर्त हिंदू जनता का रूप देने की कोशिश की. यह प्रयास भी काफी रक्तरंजित रहा और भयानक दंगों का सबब बना. उन्होंने जबरन समूची हिंदू जनता का प्रवक्ता बनने की कोशिश की और हिंदुओं के पूरे स्पेस पर अपना एकाधिकार जताना चाहा. बहरहाल, उन्हें इसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिली और वे लंबे समय तक हाशिए पर ही रहे.

अमूर्त हिंदू जनता को मूर्त रूप देने में उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान मिली. लेकिन यह कामयाबी भी अपर्याप्त थी और उसका भी एक बड़ा कारण उसकी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक शक्तियां की कमजोरी और गलतियां थीं.

इसलिए हिंदुत्व के नेता ने जब जिन्ना की कब्र पर उनके द्वारा एक ‘सेक्यूलर’ राष्ट्र की रचना के लिए उनकी तारीफ की, तो इसमें उनकी ‘ईर्ष्या’ भी छिपी थी-खुद वही मुकाम न पाने का दर्दं भी था. साथ ही यह दोनों धाराओं के वैचारिक साम्य की स्वीकारोक्ति भी थी.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें