हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

उग्र उथल-पुथल की तरफ बढ़ता बिहार

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2009 10:33:00 PM

मित्रों, यह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन सच है. मोहल्ला लाइव पर कुछ दिनों पहले एक पोस्ट आयी थी, जिसके लेखक के रूप में हेमंत कुमार का नाम दिया गया है. वास्तव में यह लेख हमारे साथी और प्रभात खबर में उप संपादक कुमार अनिल का है, जिनसे 'अपने ब्लॉग पर डालने' के नाम पर हेमंत कुमार ने यह लेख उनसे माँगा था. कल शाम को कुमार अनिल का यह आलेख मुझे मिला तो मुझे हैरत हुई. आज मैं उनसे लेखक का नाम कन्फर्म कर हाशिया पर पोस्ट कर रहा हूँ, इसे दोहराते हुए, कि यह आलेख हेमंत कुमार का नहीं-जो प्रभात खबर में काम करते हैं और समाचार संपादक हैं, बल्कि यह कुमार अनिल का है और जो प्रभात खबर में उप संपादक हैं. इसके साथ यह तथ्य जोड़ना भी ज़रूरी है कि इस लेख को बिहार के किसी हिंदी अख़बार ने छापने का साहस नहीं दिखाया है. हाँ, इसके एक अंश को टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने छापा है.


राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट दे चुके भूमि सुधार आयोग के चेयरमैन डी बंद्योपाध्याय का मानना है कि बिहार एक उग्र सामाजिक उथल-पुथल की तरफ बढ़ रहा है। बिहार देश के सबसे पिछड़े प्रदेशों में से एक है। कृषि भूमि पर भूस्वामियों के अत्यधिक नियंत्रण के कारण प्रदेश का ग्रामीण हिस्सा घुटन में जी रहा है। बड़े भूस्वामियों की कृषि उत्पादन के विकास में रुचि नहीं है। जो खेती करते हैं, उन बटाईदार किसानों के पास अपनी ज़मीन बहुत कम है। ऐसे में भूमि सुधार की सिफारिशें नकार कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वैधानिक तरीके से उत्पादन संबंधों को व्यवस्थित करने का मौका खो दिया है। अब बिहार में बदलाव उग्र सामाजिक संघर्ष के जरिये ही आएगा।

मुख्यमंत्री के साहस की दाद

बंद्योपाध्याय ने रिपोर्ट को खारिज़ करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री के साहस की दाद दी है। उन्होंने कहा कि कम-से-कम इसे ठंडे बस्ते में तो नहीं रखा गया। कमीशन ने बिहार की अर्धसामंती बेड़ियों को काटने के मक़सद से सुझाव दिये थे। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह इसे स्वीकार करे या खारिज करे।

हृदय चीर देनेवाला चित्र

देश की प्रतिष्ठित पत्रिका इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखे अपने लेख में बंद्योपाध्याय ने कहा है कि ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था हृदय को चीर देनेवाली है। 1991 में ग्रामीण मजदूरों का 89.3 फ़ीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र में कार्यरत था। 2001 में यह घट कर 81.1 फ़ीसदी रह गया। 1991 में इसमें 43.4 फ़ीसदी खेतिहर भी थे। 2001 में ये घट कर 34.9 फ़ीसदी रह गये। इस बड़े बदलाव के कारणों पर अध्ययन किया जाना बाक़ी है। इसके बावजूद इस श्रम शक्ति का जीडीपी (प्राइमरी सेंटर) में 33.4 फ़ीसदी हिस्सा है। 80 फ़ीसदी श्रम शक्ति के केवल एक तिहाई उत्पादन करने से पता चलता है कि यहां कितनी गरीबी है। दूसरी तरफ केवल 19 फ़ीसदी श्रमशक्ति जीडीपी का 66 फ़ीसदी उत्पादित करती है। यह आर्थिक विषमता को दिखाने के लिए काफी है।

औद्योगिकीकरण मुश्किल

पर कतर दिये गये बिहार में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण की संभावना बहुत कम है। इस कारण प्रदेश के पास सरप्लस लेबर को खपाने का विकल्प नहीं है। प्राइमरी से सेकेंडरी सेंटर में श्रम शक्ति के ट्रांसफर होने में शिक्षा की कमी एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण है। द बिहार इकोनॉमी सर्वे 2008-09 के अनुसार 2001 में जब देश की साक्षरता दर 65.7 फ़ीसदी थी, तब बिहार में यह चिंताजनक रूप से 47 फ़ीसदी पर अटकी थी। महिलाओं में यह 33.6 थी।

भूमि सुधार ही एकमात्र रास्ता

बिहार देश का दूसरा सबसे अधिक ग़रीब प्रदेश है। प्राथमिक क्षेत्र की ग़रीबी दूर करने के लिए राज्य का कोई भी हस्तक्षेप तभी सार्थक होगा, जब वह उत्पादन संबंधों में बदलाव के लिए किया गया हो।

रीढ़ हैं छोटे किसान

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे व सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं। इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है। मध्यम व बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं। बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं। पर ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है। यह कृषि संबंध विकास के रास्ते में सबसे बड़ा बाधक है। भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें इसी संबंध को बदलने के नेक इरादे से तैयार की गयी थी। बंद्योपाध्याय को पढ़ते हुए आप चर्चित माले नेता विनोद मिश्र को याद कर सकते हैं, जिन्होंने बहुत पहले बिहार के विकास को जटिल सवाल बताते हुए एक बड़े आपरेशन की ज़रूरत बतायी थी।

ऑपरेशन ग्रीनहंट: जनता के खिलाफ जंग

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/31/2009 01:19:00 PM


प्रफुल्ल बिदवई

जो
कुछ मीडिया में कहा जा रहा है, यदि वह सही है तो श्री मधु कोडा ने दो वर्ष तक झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर काम करने के दौरान 4000 करोड रुपए की विपुल धनराशि गैरकानूनी ढंग से एकत्रित की और उसे दुनिया भर में अलग-अलग परिसंपत्तियों में निविष्ट किया, जिनमें जहाजरानी कंपनियां, होटल और स्विस बैंक खाते शामिल हैं।
जैसा कि बताया जाता है, इसमें से अधिकतर राशि झारखंड में, जो कि भारत के खनिज समृध्द तीन राज्यों में से एक है, खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने के एवज में ली गई रिश्वत के जरिए इकट्ठी की गई। इनमें से अधिकतर परियोजनाएं गैरकानूनी थीं और जितनी अवधि और जितने क्षेत्र के लिए अनुमति दी गई थी वह भी कानूनी सीमा के बाहर थी। आदिवासी झारखंड का सबसे बडा जाति समूह है और वे वहां के मूल बाशिंदे हैं जिनका अपनी भूमि पर से उत्तरोत्तर कब्जा छिनता चला गया है।
 यदि कारोबारियों ने श्री कोडा को 4000 करोड रु रिश्वत में दिए, तो मंजूर की गई परियोजनाओं से उन्हें कम से कम 10,000 करोड रु क़ा लाभ तो हुआ ही होगा। 20 प्रतिशत लाभ की गुंजाइश रखते हुए, कुल व्यापार कम से कम 50,000 करोड रु क़ा रहा होगा। इतनी बडी रकम झारखंड के कुल राजस्व से तीन गुना ज्यादा है। जैसा कि कहा गया है, यदि अकेले कोडा ने इतनी राशि हडप ली है जो झारखंड के वार्षिक बजट की एक चौथाई के बराबर है, तो यदि राज्य न्यूनतम सार्वजनिक सेवाएं भी नहीं जुटा पाता तो यह हैरानी की बात बिल्कुल नहीं होगी। पुलिस का जनता के प्रति रवैया शत्रुतापूर्ण है और वे जनता को परेशान करते रहते हैं। इस स्थिति के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया नक्सलवाद का प्रसार है। अपने सब दोषों के बावजूद नक्सली एकमात्र संगठित राजनीतिक धारा है जो ताकतवरों की लूटपाट के खिलाफ अल्पाधिकार प्राप्त और शोषित लोगों की रक्षा करती है। नक्सलियों का प्रभाव इसलिए बढा है क्योंकि लोगों के पास कोई और सहारा नहीं है। जो स्थिति झारखंड की है, वही स्थिति छत्तीसगढ, अादिवासी उडीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ भागों की भी है। पूरी आदिवासी पट्टी में सार्वजनिक संसाधनों को लूटा जा रहा है। उडीसा में 16,000 करोड रु क़ा एक खनन घोटाला अभी-अभी सामने आया है। यहां तक की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह स्वीकार किया कि उन आधुनिक आर्थिक प्रक्रियाओं में, जो बेरहमी से आदिवासियों के रहने की जगहों पर दखल कायम करती जा रही है, उन्हें कुछ हिस्सा देने में हमारी व्यवस्था नाकाम रही है और यह कहा कि दशकों से आदिवासियों के बीच पैदा हुई अलगाव की भावना अब खतरनाक मोड लेती जा रही है। उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे आदिवासियों के बराबर शोषण और उनके सामाजिक तथा आर्थिक दुरुपयोग को अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। व्यवस्था की नाकामी को स्वीकार करने वाले एकमात्र सरकारी पदाधिकारी नहीं हैं डा. सिंह। योजना आयोग द्वारा नियुक्त की गई बंदोपाध्याय समिति ने भी इसे नक्सलवाद के बढने के लिए उचित रूप से जिम्मेवार ठहराया है। टाटा स्टील छत्तीसगढ में 5000 एकड भूमि पर 19,500 करोड रु का स्टील प्लांट लगाने जा रहा है जिसके लिए पूरे 10 गांव खाली कराने पडेंग़े। एस्सार कॉर्पोरेशन छत्तीसगढ क़े बस्तर इलाके में घुसने के लिए जोर लगा रहा है। आदिवासियों को कई दशकों से लूटा जा रहा है। न्यायपालिका भी इस अपराध में शामिल है और कुछ शीर्ष कॉर्पोरेट वकील तो इस फिराक में हैं कि संविधान की पांचवीं अनुसूची को, जो कि आदिवासियों को कानूनी रक्षा प्रदान करती है, समाप्त कर दिया जाए ताकि विनाशकारी विकास परियोजनाओं को मंजूरी मिल सके। ऑपरेशन ग्रीनहंट के पिछे तर्काधार यही है। आदिवासी पट्टी को ''नपुंसक'' बनाकर उसे ''शांत'' करने के लिए एक बहुत बडे पैमाने पर सैनिक हमला किया जा रहा है। नक्सली तो केवल प्रतीक रूप में निशाना बनाए जा रहे हैं। असलीयत में यह राज्य द्वारा जनता के खिलाफ छेडी ग़ई एक जंग है। इस हमले की शुरूआत बस्तर मे की जाएगी और यह पांच साल तक चलेगा। इसमें लगभग 60,000 तक की संख्या में सशस्त्र सैनिक होंगे जिसमें 27 बटालियन सीमा सुरक्षा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस भी शामिल होगी। इसका लक्ष्य होगा बस्तर में अबझमढ नामक 4,000 वर्ग किमी में फैला हुआ घने जंगलों का इलाका। भारतीय सेना बिलासपुर में एक ब्रिगेड मुख्यालय स्थापित करेगी जो भविष्य में माओ विरोधी ऑपरेशनों में भाग ले सकेगी। भारतीय वायु सेना बंदूकवाहक हेलीकॉप्टर जुटाएगी जिनमें उसके गरुड नामक विशेष बल तैनात होंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है कि भारत की नियमित सशस्त्र सेनाएं जो हमारे बाहर के दुश्मनों से हमारी रक्षा करती है, देश के केंद्रीय भाग में भारतीय नागरिकों के खिलाफ बडे पैमाने पर हमला करने के लिए तैनात की जाएगी। यह आक्रामक ऑपरेशन एक बहुत बडे पैमाने पर मासूम नागरिकों को अपने पाशविक हमलों का शिकार बनाएगा और कष्ट और दुख में बढाेतरी करेगा। हमें इस ऑपरेशन के खिलाफ इसलिए नहीं खडा नहीं होना चाहिए कि हम माओवादियों का समर्थन करते हैं, बल्कि इसलिए कि बुनियादी लोकतांत्रिक मूल्य दांव पर लगा है। माओवादियों की हिंसक मनोवृति का किसी हाल में समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन राज्य द्वारा अपने ही लोगों के खिलाफ एक सामूहिक दंड के रुप में जंग छेडने का विचार ही घिनावन है। सामूहिक दंड न्याय के लिए घोषित मुद्दों के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार वर्जित है। यदि भारतीय राज्य एक बडे पैमाने पर संगठित और सोची समझी हिंसा का सहारा लेती है, जिसमें मुख्यत: नागरिक ही मारे जाएंगे तो वह अपना कद छोटा कर लेगा और थोडा सा भी सभ्य कहलाने का दावा नहीं कर पाएगा। इस ऑपरेशन से तो अन्याय बढेंग़े और भागीदारी का विकास संभव नहीं होगा। आजादी के समय से ही राज्य आदिवासियों के साथ अनुचित व्यवहार करता रहा है और आदिवासी इलाकों में विकास और लोकतंत्र को क्षति पहुंचाता रहा है। उसे अपना रास्ता सुधारना चाहिए और एक ऐसी चेष्टा करनी चाहिए जो गुणात्मक दृष्टि से नई और अलग हो। ऑपरेशन ग्रीनहंट को हरगिज अंजाम नहीं दिया जाना चाहिए।

कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं, हिंदी के नाम पर?

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/30/2009 10:24:00 PM

अनिल

वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में कल 29 दिसंबर को जहां एक ओर 12 वां स्थापना दिवस मनाया गया, वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई-लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे रहे। इन विद्यार्थियों ने इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाया। पिछले नौ दिसंबर को दीक्षांत समारोह के बहिष्कार से लेकर आज यह दूसरा बड़ा आयोजन था, विद्यार्थियों द्वारा जिसके सामूहिक बहिष्कार की घोषणा की गयी। यहां इस पूरे आयोजन और इस स्थापना दिवस की ऐतिहासिकता पर एक नज़र डालना तर्कसंगत होगा।

तीन साल पहले, 29 दिसंबर 2006 के दिन नौवें स्थापना दिवस पर तत्कालीन कुलपति जी गोपीनाथन ने अकादमिक धांधलियों के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन में लगभग चालीस छात्र-छात्राओं को जेल भेज दिया था। तत्कालीन प्रशासन की निरंकुशता और बेशर्मी का एक नमूना यह था कि स्थापना दिवस के उस आयोजन में मिठाइयां बांटते हुए आंदोलनरत विद्यार्थियों के बारे में मंच से एक भद्दी टिप्पणी की गयी थी, जिसका आशय कुछ इस तरह था कि कुछ सनकी क़िस्म के लोग यह समारोह जेल में मना रहे होंगे।

कल शाम, मंच से ऐसी बातें नहीं हुईं। हो भी नहीं सकती थीं। लेकिन, इस आयोजन का एक ख़ामोश संदेश विश्‍वविद्यालय में जारी अन्याय की परतों और उनकी एजेंट ताक़तों की पोल खोल कर रख देता है। नेट, जेआरएफ़ तथा राजीव गांधी फ़ेलोशिप प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को विश्‍वविद्यालय की ओर से कुछ इनामी राशि देकर सम्मानित करने का भी कार्यक्रम था। मंच से नाम पुकारे गये लेकिन नाम की उद्‍घोषणा के वक़्त राजीव गांधी फ़ेलोशिप प्राप्त करने वाले एक भी विद्यार्थी पंडाल में मौजूद नहीं थे। ज्ञात हो कि राजीव गांधी फ़ेलोशिप एम फ़िल में पहुंचने वाले दलित विद्यार्थियों को दी जाती है। इतने बड़े आयोजन में बहिष्‍कार का यह संदेश पूरे आयोजन में छिपी क्रूरता के लक्षण को प्रतिबिंबित कर रहा था।

पिछले वर्षों में विश्‍वविद्यालय में बहुत कुछ बदला, लेकिन विश्‍वविद्यालय के वातावरण में आज भी अन्याय और भेदभाव को प्रोत्साहित करने वाली स्थितियां मौजूद हैं। समाज में सत्ताधारी सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाये रखने वाली सभी ताक़तें एक भिन्न रूप और भिन्न तरीक़ों से सत्ता के पायदान पर आसीन हो गयी हैं। उनमें से मात्र कुछेक ज़रूरी मसलों पर वर्तमान दलित छात्र-छात्राएं आंदोलनरत हैं, लेकिन वर्तमान प्रशासन नीतिगत स्तर पर इन सारे मुद्दों को नाजायज़ और व्यक्‍तिगत स्तर पर अपनी प्रतिष्‍ठा का मुद्दा मान रहा है। उसने इन्हें नज़रअंदाज़ करने और इन मुद्दों को पचाने के नयी और अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक इजाद कर लिये हैं। अब उपलब्धियों का बखान करने वाले अतिरंजित जनसंपर्क द्वारा लोगों को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है। सांस्थानिक जनसंपर्क द्वारा सतही प्रचार करने के इस उपक्रम से वास्तविक मुद्दों को चट कर जाने में आसानी हो जाती है। स्थानीय पत्रकारिता तथा प्रशासन की साठ-गांठ के चलते ऐसे हवाई दावों को चुनौती मिलनी भी मुश्किल हो रही है। साथ ही स्थानीय जनमानस के बीच ऐसी छवि गढ़ने की कोशिश की जाती है जैसे कि विश्‍वविद्यालय कोई असामान्य तथा हर तरह के सवालों से परे रहने वाला संस्थान हो। अब सक्रिय तथा गतिशील हिंदी समाज तो यहां की स्थितियों पर कोई रोज़मर्रा की निगरानी रख नहीं रहा है कि उसे इन रस्मी जनसंपर्क अभियानों से हासिल इन सेकंड हैंड तथा आत्ममुग्ध विवरणों को आलोचनात्मक ढंग से परखने का मौक़ा मिले।

वर्तमान कुलपति विभूति नारायण राय को विश्‍वविद्यालय में आये तेरह-चौदह महीने हो चुके हैं। उनके इस एक साल के कार्यकाल और कामों के बारे में अब कुछेक वस्तुपरक टिप्पणियां कदाचित की जा सकती हैं। दिलचस्प है कि इस दौरान विश्‍वविद्यालय के प्रति अवधारणा और विज़न के बारे में उनकी भाषा और शब्दावली में आश्‍चर्यजन ढंग से, ग़ौरतलब परिवर्तन आया है। कुलपति के रूप में अपने पहले वर्धा आगमन से लेकर अब तक उन्होंने हिंदी समाज और उसकी विसंगतियों, विश्‍वविद्यालय से समाज की अपेक्षाएं, प्रशासन के कामकाज आदि के बारे में कई बार बयान दिये हैं, जो काफ़ी उलझाने वाले अंदाज़ (पोलेमिक स्टाइल) के जीते-जागते नमूने हैं। यहां एक उदाहरण देना उचित होगा, जिससे उनके अकादमिक विज़न के बारे में कुछ ठोस राय बनायी जा सकती है। इस स्थापना दिवस की पूर्वसंध्या पर उन्होंने कहा, “हिंदी को मात्र साहित्य या चिंतन की भाषा नहीं बनानी है, इसे वैश्‍विक स्तर पर एक भाषिक राजदूत की भूमिका निभानी है।” ज़ाहिर है, ऐसा उन्होंने हिंदी विश्‍वविद्यालय की भूमिका के संदर्भ में कहा है। साल भर पहले, कुलपति का कार्यभार ग्रहण करते वक़्त उन्होंने कबीर को याद करते हुए कहा था कि हिंदी विश्‍वविद्यालय को हिंदी समाज में नवजागरण के अग्रदूत की भूमिका निभानी होगी। यहां हिंदी भाषी समाज में हिंदी के प्रगतिशील चिंतन पक्ष के प्रति एक ज़ोर था। लेकिन साल भर में शब्दावली ख़ामोश तरीक़े से बदल गयी। और अब कई पदासीन लोगों को ऐसे प्रसंगों को याद करना बाल में खाल निकालने जैसा लगने लगता है।

यह एक सुपरिचित तथ्य है कि देश के भीतर हिंदी के प्रचारात्मक राजदूत की भूमिका के लिए कई हिंदी प्रचार समितियां सालों से चल रही हैं। इनके ज़िम्मे प्राथमिक काम हिंदी समाज के हिंदी के कर्मकांडी सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करते हुए उन्हें वैध ठहराने से लेकर, सड़े गले परंपरावादी विचारों के पुनरोत्पादन तक का है। एक पतित नौकरशाही मशीनरी ने इनका धंधा और आसान कर दिया है। अब हिंदी विश्‍वविद्यालय भी इस पटाखा तैयारी में व्यस्त है कि वह इसी लीक का अनुसरण करते हुए, विश्‍वविद्यालय की बौद्धिक सरगर्मीयुक्‍त ज़िम्मेदारी से अपने आप को घटाकर (रिड्यूज़ कर) अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर ऐसे ही प्रचारात्मक राजदूत की भूमिका का निर्वहन करेगा। यहां, यह याद करना प्रासंगिक होगा कि भूतपूर्व दो कुलपतियों का कार्यकाल ऐसी ही समझदारियों से संचालित कार्यपद्धतियों की असफलता का दौर रहा है। इन्हीं विचारों की उपज में उस अकादमिक भ्रष्‍टाचार के उत्स हैं, जिसने स्थितियों को और दयनीय बना दिया।

पिछले एक साल में, भवन आदि के निर्माण में अपेक्षाकृत तेज़ी आई है। ढांचागत निर्माण के जो काम पिछले कई सालों से प्रशासनिक इच्छा की कमी के कारण स्थगित पड़े रहे उनकी शुरुआत हो गई है। लेकिन अकादमिक तौर पर कोई भेदभावरहित व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है। न ही अकादमिक गुणवत्ता को बनाने का कोई पैमाना और आदर्श निर्मित किया गया है। इस बीच, कई बड़े, महत्त्वाकांक्षी जनसंपर्क समारोह आयोजित किए गये। इनमें हिंदी समाज के कई लेखक, कवि तथा आलोचकों की अभिनंदनयुक्‍त भागीदारी भी हुई है। आंशिक तौर पर लोगों की इस प्रदर्शनयुक्‍त भागीदारी से हिंदी के दूर-दूर तक पसरे साहित्यिक समाज को यह लुभावना संदेश दिया गया कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन, यह कैसे हो सकता है कि भेदभाव के ढांचे जस के तस क़ायम रहें, अकादमिक विज़न का पूरी तरह लोप हो और आप जनसंपर्कीय रट्‍टा लगाते रहें। यहां भेदभाव और असमानता के बस, औज़ार बदल गये। भाषा बदल गयी, उसके स्वरूप में आंशिक हेरफेर की गयी लेकिन वर्चस्व के प्रतिमान नहीं बदले। अनुष्‍ठानिक गुणगान जारी रहे – बस, उसकी पद्धतियां बदल गयीं।

सत्ता के नीचे के पायदानों पर ऐसे कई लोग हैं जिनका व्यवहार प्रामाणिक रूप से जातिवादी हैं। जो अपने अधिष्‍ठाता, विभागाध्यक्ष या पदाधिकारी होने के रसूख का इस्तेमाल अपने भ्रष्‍ट आचरण को मूंदने-ढांपने के लिए करते हैं। ऐसे कई लोग हैं, जिन्हें पढ़ने-पढ़ाने का कुछ इल्म नहीं है, कोई वास्ता नहीं है, फिर भी वे पदों पर सुशोभित हैं। ऐसे लोग लगातार पदोन्नत होते जा रहे हैं और साफ़-साफ़ असहमति व्यक्‍त करने वाले छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और ग़ैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करते हैं। अब बात बात पर भयाक्रांत करने वाली नौकरशाही घुड़कियों का एक ऐसा मज़बूत घेरा निर्मित हुआ है कि अधिकतर लोग चुपचाप प्रशासन से सुविधाजनक नज़दीकी बनाये रखने में ही अपनी भलाई समझने लगे हैं। आम छात्र-छात्राओं के बीच यह बात सौ फ़ीसदी स्थापित हुई है कि विश्‍वविद्यालय में उन्हीं विद्यार्थियों को तरक़्क़ी या नियुक्‍ति मिलती है, जो हां में हां मिलाते हुए फ़ील गुड मुद्रा में रहते हैं। अकादमिक कौंसिल में छात्र-छात्रा प्रतिनिधियों के नाम पर हुई हालिया नियुक्‍ति इसका सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण है, जहां मनमाने ढंग से यह नियुक्‍तियां संपन्न कर ली गयीं। सौ से अधिक छात्र-छात्राओं के विरोध पत्र के बावजूद अब तक कोई उचित कारवाई नहीं की गयी है। अंततः आंदोलन का रास्ता अख़्तियार करने वाले छात्र राहुल कांबले को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है।

इस आलोक में देखने पर नागपुर तथा वर्धा के स्थानीय मीडिया में छपने वाली ख़बरों और प्रशस्ति आलेखों की असलियत मालूम हो जाएगी। साथ ही, स्पष्‍ट हो जाएगा कि उनमें क्यों लफ़्फ़ाज़ियों तथा स्तुतिगान का एक नपा-तुला मिश्रण मौजूद है?

यह एक दारुण दृश्‍य था कि जनसंपर्क के मुखौटे और पाखंड के घटाटोप के बीच अपनी न्यायपूर्ण मांगों के लिए विश्‍वविद्यालय में छात्र-छात्राओं का एक बड़े समूह ने इस स्थापना दिवस को शोक दिवस के रूप में मनाया। कुल तीन सौ नियमित विद्यार्थियों वाले हिंदी विश्‍वविद्यालय में कई छात्र पिछले बीस-पच्चीस दिनों से भूखे बैठे हैं और ऐसे अनुष्‍ठान पूरे घमंड के साथ जारी हैं। ऐसे में तीन साल पुराने स्थापना दिवस समारोह की यादें ताज़ा हो जाना स्वाभाविक है, जब उस समय की संख्या के लिहाज़ से एक तिहाई छात्र-छात्राएं जेल में हों और अपनी क्रूरता को सामान्य बनाने (नॉर्मलाइज़ करने) के लिए विश्‍वविद्यालय प्रशासन मिठाइयां बांट रहा हो।

महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में स्थापना दिवस के इन आयोजनों में जनकवि सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना की उस कविता की याद लाज़मी है जिसमें उन्होंने पूछा,

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?

यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में
लाशें सड़ रही हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?

यदि हां
तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना है!

क्या अब हिंदी के सक्रिय और चिंतित बुद्धिजीवियों को यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हिंदी के नाम पर आख़िर यह कैसा समाज रचने की बुनियाद निर्मित की जा रही है?

अमेरिकी बम और फरीदकोट के बच्चों की विकलांगता

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/30/2009 03:51:00 PM


सुभाष गाताडे
बड़ा सिर, आंखें बाहर निकली हुईं और टेढ़-मेढ़े हाथ-पैर जो शरीर संभालने लायक भी नहीं हैं। यह किसी वीडियोगेम का नहीं बल्कि पंजाब के सीमावर्ती जिले फरीदकोट में पैदा हो रहे नवजात बच्चों का वर्णन है जिनकी तादाद यहां अचानक बढ़ती दिख रही है। फरीदकोट के बाबा फरीद सेन्टर फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन के प्रमुख पृथपाल सिंह इससे चिंतित हैं। कुछ समय पहले जिले के दौरे पर आए दक्षिण अफ्रीका के टॉक्सिकॉलोजिस्ट डॉ कारिन स्मिथ ने इस पहेली को सुलझाने में उनकी थोड़ी मदद की। उन्होंने बच्चों के बाल के नमूने जर्मन प्रयोगशाला में भेजे। जांच के परिणाम विचलित करनेवाले थे। पता चला कि विकलांगता में आयी तेजी का कारण इन बच्चों में पायी गयी यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा है। जांच चल रही है कि यूरेनियम के अवशेष प्राकृतिक संसाधनों से हैं या किसी अन्य कारण से। प्रश्न है कि एक ऐसे क्षेत्र में, जहां यूरेनियम के प्राकृतिक स्रोत न हों, वहां बच्चों के खून में यह कहां से आ रहा है? क्या इसका रिश्ता अफगानिस्तान से वहां पहुंचनेवाली हवाओं से जोड़ा जा सकता है जहां युद्ध के मैदान की धूल में मौजूद यूरेनियम के कणों ने बच्चों को प्रभावित किया हो। एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में अप्रैल माह में इस सिलसिले में एक लम्बी स्टोरी छपी थी जिसमें कहा गया था कि पंजाब की जनता अफगानिस्तान और इराक युद्धों का खामियाजा भुगत रही है। इन युद्धों में अमेरिका व उसकी सहयोगी सेनाओं ने जिस नि:शेष यूरेनियम का प्रयोग किया, वही बच्चों की विकलांगता की जड़ में है। गौरतलब है कि सात अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान पर हमला हुआ और सेंटर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट यही बताती है कि प्रभावित बच्चों की तादाद ‘विगत छह सात सालों में तेजी से बढ़ी है।’ जाहिर है जब अफगानिस्तान से तीन सौ किलोमीटर दूर स्थित पंजाब के बच्चों पर इसका असर देखा जा सकता है तो बीच में पड़नेवाले पाकिस्तान के नवजात बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे होंगे। हथियार बनाने के लिए संवर्द्धन की प्रक्रिया से गुजरने या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होने के बाद यूरेनियम का जो हिस्सा बचता है उसे नि:शेष या डिप्लीटेड यूरेनियम कहते हैं। यह अपने ठोस रूप में विकिरणधर्मी (रेडियोएक्टिव) और काफी भारी होता है। हथियारबन्द वाहन जैसे टैंकों की मोटी दीवारों को भी छेद सकने की इसकी क्षमता के कारण सेना में इसकी काफी अहमियत है। किसी भी मोटी दीवार मसलन टैंक को छेदने के बाद वह विस्फोट करता है और उससे बादलनुमा धुआं उठता है। वह जब ठंडा होता है तो धूल के रूप में जम जाता है। यह धूल न केवल रासायनिक तौर पर जहरीली होती है बल्कि विकिरण भी फैलाती है। सांस के रास्ते अन्दर जाने पर वह खतरनाक हो सकती है। वास्तविक खतरा उसके रसायन से होता है जो जहरीला होता है। हालांकि उसके विषैले होने बारे में वैज्ञानिक तौर पर प्रामाणिक सबूत अभी सामने नहीं आये हैं। एक मई, 2008 को बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के ‘वन प्लेनेट प्रोग्राम’ में काबुल और कंधार के डॉक्टरों को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि किस तरह पिछले दो सालों में बाल जन्म विकलांगता के मामले लगभग दुगुने हुए हैं। जैसे कहीं शरीर के अवयव टेढे-मेढ़े हैं तो कहीं सर सामान्य से छोटा या बहुत बड़ा दिख रहा है। अलबत्ता जॉर्ज बुश हुकूमत ने इस मामले में अपने आप को निर्दोष साबित करने की कोशिश की थी, लेकिन प्रोग्राम में ही कनाडा स्थित यूरेनियम मेडिकल रिसर्च सेन्टर के हवाले से बताया गया था कि इसका कारण नि:शेष यूरेनियम हो सकता है। वर्ष 2002-2003 में इस सेंटर ने अफगान नागरिकों के मूत्र की जांच की थी और कई मामलों में उसकी मात्रा इराक युद्ध में लड़े सैनिकों की तुलना में सौ गुना अधिक पायी गई थी। इराक पर कब्जे के बाद वहां प्रतिरोध का केन्द्र बने फालुजा पर भी अमेरिकी सेनाओं ने 2004 में जबरदस्त बमबारी की थी। फालुजा में जन्मे बच्चों में इसी तरह की विकलांगता दिखने पर नवम्बर 2005 में अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन को स्वीकारना पड़ा कि उसने इन हमलों में श्वेत फास्फोरेस और नि:शेष यूरेनियम से बने बारूद का इस्तेमाल किया है। यह अलग बात है कि अमेरिका के तमाम दावे झूठे साबित हुए लेकिन इसी तरह के हथियार इराक में मौजूद होने को लेकर अमेरिका ने दुनिया भर में काफी शोरगुल मचाया था। अमेरिकी रेडिएशन स्पेशलिस्ट ल्युरेन मोरेट के मुताबिक अगर हम वर्ष 1991 के बाद का आकलन करें तो अमेरिका ने डिप्लेटेड या नि:शेष यूरेनियम से बने हथियारों से वातावरण में नागासाकी में फेंके गए एटम बमों की तुलना में चार लाख गुना अधिक विकिरणधर्मिता (रेडियोएक्टिव एटॉमिसिटी) भेजी है। प्रश्न है कि अफगानिस्तान से चलनेवाली इन जहरीली हवाओं के जहर के मामले में तमाम राजनीतिक संगठन, अन्य जनपक्षीय जमातें या बुद्धिजीवी क्यों मौन हैं.

कोपेनहेगन : दलाली और धोखेबाजियों की नयी दास्तान

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/30/2009 05:02:00 AM


प्रफुल्ल बिदवई

ब्राजील,
दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन ने मिलकर यह प्रतिज्ञा की थी कि वे जलवायु संबंधी अपने दायित्वों से पल्ला झाडने पर उतारू विकसित देशों की चालों से जलवायु संबंधी बातचीत को प्रभावित नहीं होने देंगे। लेकिन विकसित देशों के हाथ की कठपुतली बन कर उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि जो देश जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, वे अपने यहां हो रहे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे। तीन पृष्ठ का कोपनेहेगन समझौता संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढांचा सभा का करार नहीं है। और न ही उसे आम राय की वैधता प्राप्त है। यह करार जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लडने के लिए एक महत्वाकांक्षी, सख्त, कारगर और पूरे विश्व के लिए बाध्यकारी करार को जल्दी से लागू करने की आवश्यकता के विरुध्द जाता है। इस स्थिति में यह एक अत्यंत गैर-बराबरी का करार है जो बहुत ही निराशाजनक है और जिसके खतरनाक अंजाम देखने को मिल सकते हैं। विश्व के गरीब लोगों पर जिन पर पहले से ही जलवायु परिवर्तन का जबरदस्ती अधिक बोझ डाला गया है, इस समझौते से इसमें और भी इजाफा होगा। इस समझौते के लिए कोई मात्रागत बाध्यताएं निर्धारित नहीं की गई है, जैसा कि 1977 के क्योटो समझौते के अंतर्गत किया गया था, और न ही अनुपालन संबंधी या दंडात्मक व्यवस्थाएं की गई हैं। देशों को मनमर्जी के मुताबिक या दूसरे शब्दों में कुछ भी कार्रवाई न करने के लिए आजाद छोड दिया गया है। जो पिछला अनुभव रहा है, या जिस तरह से ताकतवर कॉर्पोरेट लॉबियां विकसित देशों की सरकारों पर दबाव डालती रही हैं, उसके मद्देनजर इस बात की कोई संभावना दिखाई नहीं देती, कि वे स्वेच्छा से कोई गंभीर दायित्व अपने ऊपर लेंगे। क्योटो समझौते के अंतिम वर्ष 2012 तक उनके 1990 के उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की मामूली कमी करने की व्यवस्था की गई थी। उत्तरी देशों में थोडे से ही ऐसे देश हैं जो उन लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में बढ रहे हैं। अपेक्षाकृत बडी अौर तेजी से विकसित हो रही दक्षिणी अर्थव्यवस्थाओं खास कर चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिणी अफ्रीका को इस समय के अपने सामान्य लक्ष्यों की तुलना में उत्सर्जनों में कटौती करनी पडेग़ी ताकि विश्व जलवायु के स्थिरीकरण और कम कार्बन वाले विकास की ओर बढ सकें। कोपेनहेगन समझौता पर चुपके से केवल 26 देशों की सहमति प्राप्त कर ली गई और ऐसा करने में अगुआनी की अमरीका और चीन ने। कोपेनहेगन समझौता सत्यापन संबंधी सीमा रेखा को भी लांघ गया है। इसके अंतर्गत भारत अपनी घरेलू कार्रवाईयों के बारे में ''अंतरराष्ट्रीय परामर्श और विश्लेषण'' के लिए सूचना प्रस्तुत करेगा। इसके परिणामस्वरूप कई बखेडे शुरू हो जाएंगे, क्योंकि अनुचित हस्तक्षेप के द्वारा हमारी घरेलू कार्रवाइयों का सत्यापन किया जाने लगेगा। अमरीका ने परामर्श की व्याख्या पहले से ही ''समीक्षा'' यहां तक कि ''आपत्ति'' के अर्थों में कर दी है। सत्यापन तभी स्वीकार्य होगा जब दक्षिण की कार्रवाइयों के लिए उत्तर, आर्थिक-सहायता प्रदान करेगा। लेकिन जिन कार्रवाइयों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की जाएगी उनके मामले में निगरानी रखने या सत्यापन करने की इजाजत देने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इस समझौते का पूरे विश्व पर जो व्यापक प्रभाव पड़ेगा, उसके सामने भारत का इससे पीछे हटना बहुत ही महत्वहीन दिखाई देता है। भारत एक ऐसे समझौते को स्वीकार करने का सहअपराधी बन गया है, जो कि महत्वकांक्षाहीन और कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है और जिसमें विश्व स्तर पर या देशों के समूहों के लिए उत्सर्जन की अधिकतम मात्रा या उत्सर्जनों में कटौती के कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किए गए हैं। यह समझौता अल्पविकसित रूप से भारतीय विशिष्ट वर्ग के हित में हो सकता है। जैसा कि मैंने हाल ही में विमोचित अपनी पुस्तक ''ऐन इंडिया दैट कैन से येस: ए क्लाइमेट-रेसपांसिबल डिवलपमेंट अजेंडा फॉर कोपेनहेगन एंड बियांड'' में कहा है, भारतीय नीति निर्माताओं के बीच एक ऐसा अंश है जो लंबे समय से एक गैरकारगर और कमजोर सौदे का जोरों से स्वागत करता है, क्योंकि उससे भारत को अपने उत्सर्जन बढाने में मदद मिल पाएगी, भले ही विश्व पर और खास तौर भारतीय गरीबों पर कैसा भी प्रभाव पडे। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं कि ऐसे सौदे से भारतीय गरीबों पर इस तेजी से होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण ज्यादा भूख, पानी की ज्यादा कमी, ज्यादा बाढाें और ज्यादा विस्थापन और बीमारियों का सामना करना पडेग़ा। नीति-निर्माताओं में से ऐसे लोगों ने एक अच्छे, न्यायपूर्ण और कारगर समझने की बजाए एक खराब और गैरकारगर समझौते को तरजीह दी है। यह आत्महत्या का रास्ता विश्व को कई वर्षों तक बहुत ज्यादा उत्सर्जन के चक्कर में डाल देगा, जिसके भयंकर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। भारत यह बहाना नहीं कर सकता कि उसे इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया था। वह अपनी खुशी से इसके लिए रजामंद हुआ, बल्कि बताया तो यह जाता है कि उससे कानूनी तौर पर बाध्यकारी समझौते का विरोध भी किया। इस बहुत बडी ग़लती के लिए श्री रमेश को दोषी ठहराना निरर्थक है। भारत की इस नीतिगत अव्यवस्था और उसके परिणामस्वरूप एक सख्त, कानूनी बाध्यकारी सौदे पर बल देने के अपने रूख से भारत के पलटने और एक असम्मानजनक घृणित परिणामों के लिए स्वयं डा. मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं। यह कार्रवाई विदेश नीति की एक व्यापक असफलताओं की परिचायक है। भारत ने इससे विश्व में अपना कद छोटा कर लिया है। विभिन्न सूत्रों से प्राप्त सूचनाओं को एक दूसरे से जोडने के बाद हमें यह पता चलता है कि अगले कुछ सप्ताहों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन ढांचा सभा की प्रक्रिया को और ज्यादा नुकसान पहुंचने से बचाने का एक मौका मिलने की छोटी सी संभावना अभी और बाकी है। हम भार के न्यायपूर्ण बंटवारे की मांग करके और एक तुरंत सामूहिक कार्रवाई के द्वारा जिसके एक समतापूर्ण और कारगर वैश्विक सौदे के लिए जबरदस्त दबाव डाल सकते हैं। 

बदलते बिहार का वितंडा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 08:00:00 PM


अरविंद शेष

यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और 'विकास पुरुष' नरेंद्र मोदी इस देद्गा के दूसरे 'विकास पुरुष' की पीठ थपथपाते हैं.

राजनीतिक सत्ता सामाजिक बदलाव का एक औजार जरूर है, लेकिन क्या यह व्यक्तियों को सत्ता में बदल देने का भी औजार है? इसे हमारे देश के तमाम राजनेताओं ने साबित किया है कि सत्तातंत्र की लगाम हाथ लगते ही उनकी दिशा अपने स्वार्थों और नफे-नुकसान के हिसाब से तय होने लगती है. बिहार में लालू प्रसाद के 'ध्वंस-युग' के बाद संपूर्ण क्रांति की ही जमीन पर उगे नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लगभग चार साल में सामाजिक विकास या शैक्षिक सुधार के सवाल पर बने तमाम आयोगों का जिस तरह इस्तेमाल हुआ या उनका जो हश्र हुआ, उसे देखते हुए भुमि सुधार आयोग की सिफारिशों के खारिज किये जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. सत्ता में आते ही अमीरदास आयोग को भंग करने के बाद यह दूसरी बार है जब नीतीश कुमार ने खुले तौर पर यह बताने की कोशिष की है कि उनकी सामाजिक विकास दृष्टि और राजनीति असल में क्या है.
यों, बिहार में मीडिया का जो सामाजिक और वर्गीय चरित्र रहा है, उसमें पिछले तीन-चार साल में सत्ता द्वारा किया गया मीडिया प्रबंधन उसके लिए शायद बिन मांगी मुराद जैसा रहा है.
नीतीश कुमार ने 'बदल गया बिहार' के सुर वाले नारे को 'सूचना' के रूप में पेश किया और महज सूचक बनकर समूचे मीडिया जगत ने इसे देश-समाज के सामने परोस दिया. कुछ समय पहले राज्य में हुए विधानसभा के उपचुनाव भी इसी 'बदल गया बिहार' के शोर के बीच लड़े गये थे. लोकसभा चुनावों के नतीजों से अति उत्साह में आये नीतीश कुमार ने इन उपचुनावों को जिस तरह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल घोषित कर दिया था, उसने स्वाभाविक रूप से इस बात के विश्लेषण का मौका दिया कि महज तीन महीने में मतदाता का मन-मिजाज क्यों बदला.
'विकास वोट के लिए कोई मुद्दा नहीं है' - यह वह शिगूफा है, जो शायद कभी लालू प्रसाद की जुबान से फिसला था. तो बिहार में मौजूदा विकास-राग के दौर में क्या लालू प्रसाद के उस जुमले को अपने असर के साथ लौटने में महज तीन महीने लगे? क्या कारण है कि 'शाइनिंग इंडिया' और 'फील गुड' की तर्ज पर 'बदल गया बिहार' का प्रचार उपचुनावों में कारगर नहीं रहा? कुछ विश्लेषकों की निगाह में भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट और उसे लागू करने की अफवाह से नीतीश सरकार ने मतदाताओं को डरा दिया कि वह जमीन पर जोतदारों को हक देने जा रही है! इस निष्कर्ष को सामने रखने वाले लोग दरअसल नीतीश कुमार को यह बताना चाहते थे कि अगर राज्य के भूपतियों यानी जमींदारों को छेड़ा गया तो उसके नतीजे ऐसे ही होंगे.
आजादी के बावजूद एक ढाचे के तौर पर सामाजिक सामंतवाद ने हमारे देश में लगातार अपना दबाव बनाए रखा है. बिहार में लालू-युग को हम उस ढाचे को तोड़ने, या फिर कुछ सामजिक वर्गों के उसमें घुसपैठ करने के रूप में देख सकते हैं. इसी दौर में देश में नवउदारवादी पूंजीवाद के उभार की पृष्ठभूमि में बिहार में पूंजीवादी सामंतवाद की स्थितियां पैदा हुईं. नीतीश कुमार के लिए यह एक मौका था. लेकिन उन्होंने सामाजिक सामंतवाद के घोड़े का सवार बनना ज्यादा पसंद किया.
अमीरदास आयोग या बंद्योपाध्याय समिति की सिफारिशों का हश्र तो महज कुछ नमूने हैं. भौतिक विकास के पर्याय के रूप में सड़क, अपराध-भ्रष्टाचार से मुक्ति, सामाजिक विकास के लिए अति पिछड़ों और महादलितों के लिए विशेष घोषणाएं और परिवारवाद से कथित 'लड़ाई' - ये ऐसे मुद्दे रहे हैं, जो पिछले तीन-चार साल से कुछ लोगों को रिक्षाते रहे हैं. मगर थोड़ा करीब जाते ही यह साफ हो जाता है कि इन कुछ प्रचार-सूत्रों को किस तरह हकीकत को ढकने या उसे दफन कर देने का औजार बनाया गया है! इसी दौर में एक और महत्वपूर्ण 'मिशन' जारी है, जिसमें सामाजिक यथास्थितिवाद पर हमला करने वाले किसी भी सोच को बड़े करीने से किनारे लगाया जा रहा है. करीब दो महीने पहले पटना में 'बिहार की ब्रांडिंग में मीडिया की भूमिका' विषय पर गोष्ठी हुई थी. यह प्रसंग दिलचस्प इसलिए है कि क्या मीडिया का काम किसी राज्य की 'ब्रांडिंग' करना है, या फिर उसकी प्राथमिकताओं में 'जनता' की जगह 'राज्य' आ गया है. यों बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता संभालने और 'तीन महीने में सब कुछ ठीक कर देने' की मुनादी के कुछ ही समय बाद से मीडिया को सब कुछ 'गुडी-गुडी' दिखायी देने लगा था. तो क्या यह सचमुच सब कुछ ठीक हो जाने का संकेत था, या खुली आंखों पर एक ऐसा चश्मा चढ़ जाना था जिसके पार वही दिखायी देता है जो हम देखना चाहते हैं?
'अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार' के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसका कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है. इसी जुलाई में विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4415 मामले दर्ज किये गये, जिसमें 1028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले अपहरण के थे. इसके अलावा जनवरी से जून तक 1571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी.
ये सरकारी आंकड़े हैं. सबको मालूम है कि अत्याचार के कौन-कौन से रूप हमारे बीच मौजूद हैं, और जितने होते हैं उनमें से कितने मामले पुलिस थानों में दर्ज करवाये जाते हैं. बहरहाल, एक विधायक का कहना था कि सरकार कहती है कि बैंक लूट की केवल एक घटना हुई, जबकि सच्चाई यह है कि इस दौरान बैंक लूट की चौरासी वारदातें हुईं. इसके सबूत हैं. अब बाकी आंकड़ों के साथ-साथ कुछ समय पहले खगड़िया जनसंहार इस तरह के प्रचार की सच्चाई का अंदाजा लगाने के लिए काफी है कि 'बिहार में आज अपराधी घबराता है कोई हरकत करने से.' जहां तक बड़े अपराधियों को काबू में करने का सवाल है मामला सिर्फ 'अपने' और 'दूसरों' के पक्ष का है.
इसके उलट यह जरूर हुआ है कि बिहार में अपनी मांगों को लेकर पिछले तीन-चार सालों में आंदोलन करने वाले किसी भी वर्ग या समूह की शामत आ गयी है. विरोध प्रदर्शनों को लाठियों, पानी के फव्वारों या गोली के सहारे कुचल देना नीतीश सरकार की खासियत बन चुकी है. पुलिस शिक्षकों से लेकर 'आशा' की महिला कार्यकर्ताओं तक पर पूरी ताकत से लाठियां बरसाती है. लेकिन यह सुशासनी लाठी 'विकास' की नयी ऊंचाइयों की ओर अग्रसर भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं चलती.
तमाम दावों के उलट व्यवहार में भ्रष्टाचार की कितनी नयी परतें तैयार हुईं हैं, इस सच का अंदाजा पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला स्तरीय कार्यालयों और पुलिस थानों की गतिविधियों को देख कर ही लगाया जा सकता है. स्कूलों से लेकर आंगनवाड़ी केंद्रों तक का जिला अधिकारी या वरिष्ठ अधिकारियों के औचक निरीक्षण का मतलब कितना ड्यूटी सुनिश्चित करना है और कितना कमाई करना, इसे नजदीक से देखे बिना समझना मुद्गिकल है.
विकास के लिए बुनियादी ढांचे के रूप में अच्छी सड़कों का होना अनिवार्य है. लेकिन 'विकास दिखाई दे' - इसके लिए भी सड़कों का होना जरूरी होता है. और यह कोई छिपी बात नहीं है कि सड़क निर्माण उन कामों में अव्वल है, जिसमें सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है. तो कुल बजट का 30 फीसदी सड़कों को समर्पित किये जाने का मतलब समझना कोई मुद्गिकल काम नहीं है.
यों भी, अगर सरकार सड़कें बनवाने पर खास जोर दे रही है तो यह राज्य के नागरिकों पर मेहरबानी किस तरह है? दूसरे, राज्य उच्च पथों जैसे राज्य के अधीन कुछ को छोड़ कर बाकी सड़कों के मामले में राज्य सरकार की भूमिका महज कार्य कराने तक सीमित है. जबकि राष्ट्रीय उच्च पथों और ग्रामीण इलाकों की सड़कों के निर्माण और विकास के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर वित्तीय सहायता देती है. इसके अलावा घोषित और प्रचारित दावों के विपरीत राज्य में काफी कम सड़कें बनीं हैं, और जो बनी भी हैं वे काफी घटिया स्तर की हैं. ज्यादातर सड़कों पर कोलतार की परत चढ़ा कर उन्हें देखने में सुहाने लायक बना दिया गया, जिसकी उम्र दो से चार महीने से ज्यादा की नहीं होती. इस बार की बरसात गुजरने के बाद बहुत सारी सड़कों की दशा देखी जा सकती है.
परिवारवाद के 'सिंड्रोम' से नीतीश के बचे होने के वितंडे के बीच इस प्रहसन की खबर पर गौर करना रोचक होगा कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत बिहार में लोगों को जो जॉब कार्ड बांटे जा रहे हैं उन पर नीतीश कुमार की फोटो छापी गयी है. परिवारवाद का समर्थन करना लोकतंत्र के रास्ते में बाधा खड़ी करना है. लेकिन यहीं यह देखना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की राजनीति देश और समाज को किस दिशा में ले जा रही है. लोहिया और जेपी के सपनों की जमीन पर खड़े नीतीश कुमार को दिल्ली में मंत्री या बिहार में मुखयमंत्री बनने के लिए बाबरी मस्जिद ढहाने वाली भाजपा का हाथ थामने में कोई दिक्कत नहीं महसूस हुई. तब भी जब गुजरात दंगों का अध्याय उसके साथ जुड़ गया. यह अनायास नहीं है कि परिवारवाद से बचे हुए एक और 'विकास पुरुष' नरेंद्र मोदी इस देश के दूसरे 'विकास पुरुष' नीतीश कुमार की पीठ थपथपाते हैं.
इतिहास के कुछ पन्नों को शायद इसलिए नहीं भूला जा सकता क्योंकि न्याय सुनिश्चित होने तक उन्हें भूलना भी नहीं चाहिए. राजनीति की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं. लेकिन सवाल है कि इसकी कीमत क्या हो. प्रचार की सड़क पर सरपट दौड़ते नीतीश कुमार ने 'सुशासन बाबू' का तमगा तो लटका लिया है, लेकिन आरएसएस और भाजपा के सहारे राजनीति की जमीन तलाशती उनकी सरकार ने समाज को बदल सकने वाले सोच को हर स्तर पर कुंठित किया है. यह ध्यान रखना चाहिए कि समाज को बदलने के लिए सड़कों के मुकाबले सोच की ज्यादा जरूरत होती है.
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार

अमीर धरती के गरीब लोगों का गुस्सा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 04:49:00 PM


सुनीता नारायण

भारत का नक्शा उठाइए और उन जिलों पर निशान लगाइए जहां वन संपदा उपलब्ध है और जहां पेड़ों का भरापूरा और सघन आवरण मौजूद है। उसके बाद उन पर उन नदियों और धाराओं को चिह्नित कीजिए जिनसे हमें और हमारी जल संपदा को जीवन मिलता है। फिर उन पर खनिज भंडारों की खोज कीजिए। इन भंडारों में लौह अयस्क, कोयला, बाक्साइट और वे सभी खनिज शामिल हैं जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था समृद्ध होती है। पर यहीं मत रुकिए। इस संपदा के ऊपर एक और सूचकांक को चिह्नित कीजिए। वहां उन जिलों की निशानदेही कीजिए जहां हमारे देश के सबसे गरीब लोग रहते हैं। वे सब हमारे आदिवासी जिले हैं। यहां आपको एक संपूर्ण तालमेल मिलेगा।

धरती के सबसे समृद्ध इलाके में सबसे गरीब लोग रहते हैं। अब आप देश की इस श्रेणी वाले हिस्से को लाल रंग से घेर दीजिए। यही वे जिले हैं जहां नक्सलवादी घूमते रहते हैं। इन्हीं जिलों के बारे में सरकार मानती है कि वहां उन्हें अपने ही लोगों से युद्ध लड़ना पड़ रहा है। क्योंकि वे आतंक फैलाने और मारने के लिए बंदूक उठा चुके हैं। खराब विकास के इस सबक को हमें ध्यान से समझना चाहिए।

आइए इस मानचित्र में पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं को पिरोएं। मधु कोड़ा झारखंड राज्य के करीब एक साल तक मुख्यमंत्री थे। वह राज्य खनिज और वन संपदा से समृद्ध है पर वहां के लोग गरीब हैं। आज जांच एजंसियों को पता चला है कि वहां सारे घोटालों का बाप मौजूद है। उन्होंने वहां मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों के पास से चार हजार करोड़ का घोटाला पकड़ा है। उन्होंने राज्य को लूट कर अपनी अकूत संपत्ति बनाई थी। इतनी बड़ी राशि का घोटाला राज्य के सालाना बजट का पांचवां हिस्सा है। उससे भी बड़ी बात यह है कि यह घोटाला उन खनिजों के माध्यम से किया गया है जिन्होंने अपनी जनता को कभी समृद्ध नहीं बनाया।

यह मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसका सिलसिला देश की दूसरी घटनाओं से भी जुड़ता है। पिछले हफ्ते जब कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने के लिए सरकार को घुटनों के बल ला दिया था तब हम इस घटना को भारत के सूचना मानचित्र यानी कारटोग्राफी से नहीं जोड़ पाए थे। यह खेल रेड्डी बंधुओं का था। इनमें से एक गाली जनार्दन रेड्डी बीएस येदुरप्पा सरकार में पर्यटन मंत्री और दूसरे गाली करुणाकर रेड्डी राजस्व मंत्री हैं। वे दोनों खनन क्षेत्र के दिग्गज हैं। उनकी संपदा और सत्ता कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के इसी तरह से अमीर-गरीब जिलों में विनाशकारी खनन से पैदा होती है।

इन रेड्डी बंधुओं की रियासत बेल्लारी जिले में है जहां से देश के लौह अयस्क का 20 फीसदी हिस्सा पैदा होता है। यहां होने वाली अयस्क की खुदाई में पर्यावरण सुरक्षा का बहुत कम या बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता। खदान से होने वाले उत्सजर्न के कारण इस इलाके का पानी लाल हो गया है। यहां की जमीन खोखली हो गई है, जंगल गायब हो गए हैं और लोगों की आजीविका तबाह हो गई है। दूसरी तरफ बेल्लारी में सबसे ज्यादा निजी विमान पंजीकृत हैं। इसके विपरीत यह मानव विकास सूचकांक के लिहाज से कर्नाटक में नीचे से तीसरे नंबर पर आता है। इसकी साक्षरता दर सिर्फ पचास प्रतिशत है जो कि अपने को प्रगतिशील राज्य बताने वाले कर्नाटक के लिए शर्मनाक है। रेड्डी बंधुओं की अमीरी का राज उस इलाके की असाधारण संपदा है जिसे हम अभी भी गरीब कहते हैं। ऐसे में हमें उस समय क्यों आश्चर्य होता है जब अपनी जमीन की लूट के साक्षी लोगों की नाराजगी का फायदा नक्सलवादी उठाते हैं?

दिक्कत यह है कि हमने उन लोगों के साथ संपदा बांटने के विचार को कभी गंभीरता से नहीं लिया जिनकी जमीन का हम इस्तेमाल करते हैं। जंगलों का ही मामला लीजिए। देश के सघन और जैव विविधता से भरे जंगलों का 60 फीसदी हिस्सा उन्हीं आदिवासी जिलों में ही पाया जाता है। यहीं शानदार बाघ भी पाए जाते हैं। वही सवाल फिर उठता है कि अगर वहां असाधारण संपदा है तो वहां रहने वाले लोग गरीब क्यों हैं?

सच्चाई यह है कि हमने प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित माडल कभी बनाया ही नहीं। ऐसा माडल जो कि टिकाऊ हो और स्थानीय अर्थव्यवस्था और लोगों के लिए फायदेमंद हो। विकास का पहला चरण वह था जब सरकार जंगलों से लाभ लेती थी और उनका दोहन करती थी। बड़े इलाके को कागज और लुगदी उद्योग को सौंप दिया गया। वह स्थिति वैसी ही थी जैसी आज खनिजों के साथ हो रही है। घने जंगलों के इलाके के इलाके काटे जा रहे हैं और आर्थिक संपदा तैयार करने के नाम पर घरती का चीरहरण किया जा रहा है। लेकिन इसमें से स्थानीय लोगों की कोई भागीदारी नहीं की जा रही है। इन्हीं जंगलों के आधार पर सरकारें और निजी कंपनियां अपनी संपदा का निर्माण कर रही हैं। लेकिन इससे स्थानीय लोगों का कोई विकास नहीं किया जा रहा है।

उसके बाद संरक्षण का दौर शुरू हुआ। राष्ट्र ने वनों के संरक्षण का फैसला किया। कहा गया कि बाघ और अन्य वन्य जीवों की हिफाजत की जानी है। लेकिन इस बार भी ऐसा आर्थिक माडल नहीं बनाया गया जिसमें संरक्षण का लाभ लोगों को दिया जाता। सरकार ने जनता को फिर हाशिए पर डाल दिया। मान्यता थी कि जंगलों की रक्षा स्थानीय लोगों की मदद से की जाएगी। आज इन इलाकों में लोगों की तरफ से हिंसा का सहारा लेने के पीछे एक मात्र कारण यह है कि 1980 के वन अधिनियम को ठीक से लागू न किया जाना। यह कानून वन भूमि को गैर वनीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं देता जो कि कई मामलों में सही भी है। इसी नाते लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है।

आज एक तरफ खदानों, विद्युत या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जंगल साफ किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को स्कूल, पानी की टंकी या संपर्क मार्ग के लिए थोड़ी सी जमीन भी नहीं दी जा रही है। उससे भी बुरी बात यह है कि जंगलों की संपदा को उनकी अर्थव्यवस्था के लिए कभी इस्तेमाल नहीं किया जाता। उन्हीं की पीठ पर और उन्हीं की जमीन पर बाघों का संरक्षण होता है पर उन्हें कोई फायदा नहीं होता। क्या उनके गुस्से पर अभी भी हैरानी होनी चाहिए? यह स्थिति बदलनी चाहिए और उसकी गुंजाइश भी है।

क्या हुआ उन सुझावों का? बदलते बिहार की बानगी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 04:48:00 AM




भूमि सुधार आयोग की रपट
बिहार में भूमि सुधारों को गति देने के इरादे से देवव्रत बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग बना था. श्री बंदोपाध्याय ने तय समय पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. रिपोर्ट में व्यापक भूमि सुधार की अनुशंसा की गयी थी. इस अनुशंसा से बड़े भूस्वामी और सामंती मिजाज के वैसे लोग जो जमीन पर काबिज रहना चाहते हैं, प्रभावित हो सकते थे. इस रिपोर्ट को सरकार ने कूड़ेदान में फेंक दिया. (पिछले विधान सभा चुनाव के ठीक पहले इसे कचरे के डब्बे से बाहर निकाला गया. लेकिन जैसे ही सवर्ण सामंतों ने आंखें तरेरीं सरकार बैकफुट पर आ गयी. नीतीश कुमार ने फरमाया, हमारा इरादा कभी भी इसे लागू करने का नहीं था, इस पचड़े में नहीं पड़ेंगे हम. सिर्फ यही नहीं कि भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को नीतीश कुमार ने हमेशा के लिए दफन कर दिया बल्कि उससे बुरी बात यह रही कि मुख्यमंत्री और उनके कारिंदे भूमि सुधार को एक घृणित काम के रूप में प्रचारित करने में जुट गये. देश के नामी विद्वान देवव्रत बंदोपाध्याय को भी इस पूरे प्रकरण में काफी अपमान झेलना पड़ा. इन दिनों मुख्यमंत्री के सामने उनके मंत्री बंदोपाध्याय के लिए सार्वजनिक रूप से अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं.)

समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग
भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे की अध्यक्षता में बने समान स्कूल शिक्षा प्रणाली आयोग ने अपनी अनुशंसाएं सरकार को सौंप दी हैं. इन अनुशंसाओं के लागू होने पर अमीर और गरीब, डीएम और चपरासी के बच्चे एक समान स्कूल में पढ़ पाएंगे. शिक्षा के क्षेत्र में ये क्रांतिकारी काम होता. लेकिन सरकार को क्रांति की नही भ्रांति की जरूरत है. इस आयोग की रपट भी कचराघर के हवाले है.

अति पिछड़ा वर्ग आयोग
सरकार ने अति पिछड़ों के लिए एक आयोग बनाया. उदयकांत चौधरी अध्यक्ष बनाये गये. श्री चौधरी लंबे समय से अति पिछड़ों के लिए कार्य करते रहे हैं. उनसे गलती हुई कि रिपोर्ट अंगरेजी में लिख दी. नीतीश कुमार बिफरे. अंगरेजी तो ऊंची जात के लोगों की भाषा है. आप क्यों अंगरेजी लिखते हैं. फिर उस रिपोर्ट को उलटा-पुलटा गया. बाप रे! यह तो उदयकांत चौधरी नहीं, नाग चौधरी है. इन अनुशंसाओं को मानने का मतलब है अति पिछड़े इतने ताकतवर हो जाएंगे कि राज सत्ता हथिया लेंगे. मुख्यमंत्री ने गुस्से में रिपोर्ट फेंक दी. हिदायत दी गयी कि वेतन, भत्ता लेना है तो मुंह बंद रखिए वर्ना इस्तीफा देकर कचहरी पकड़िये.
(चौधरी को कचहरी पकड़ा दिया गया. कार्यकाल समाप्त होने पर आयोग को विस्तार नहीं दिया गया. जबकि 'पिछड़ा वर्ग आयोग' को उस दिन ही विस्तार मिल गया. स्मरणीय यह भी है कि पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष नीतीश के स्वजातीय हैं.)

प्रशासनिक सुधार आयोग

तीन महीने के लिए आयोग बना. गलती से एक वामपंथी बुद्धिजीवी को भूमिहार होने के कारण इसका सदस्य बना दिया गया. वामपंथी बुद्धिजीवी ने भूमिहारी करने से इंकार कर दिया. बेचारे त्याग पत्र देकर बाहर हो गये. रिपोर्ट सरकार के हवाले है. सिफारिश थी कि नागरिक परिषद् बेमतलब की चीज है. नीतीश कुमार बिफरे. अपने यहां कुछ बेमतलब के लोग भी तो हैं. बेचारे भोला बाबू कहां जाएंगे. नागरिक परिषद् का गठन हुआ और भोला बाबू काबिज हुए. भांड में जाये सिफारिश.

किसान आयोग
रामधार पुराने आइएएस हैं. आलू-प्याज उपजाने वाली जाति से आते हैं. किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिये गये. आयोग की सिफारिशों लेकर घूम रहे हैं. सिफारिश देखने की किसे फुरसत है. रोड मैप तैयार है. किसान उस पर दौड़ें. जादे काबिलियत छांटेंगे तो बंदोपाध्याय और दुबे वाली दशा में ला देंगे-हां.
(अंततः इन्हें हटाकर नब्बे वर्षीय उपेंद्र वर्मा को अध्यक्ष बना दिया गया, जिन्हें किसानी से कभी लेना-देना नहीं रहा.)

अल्पसंख्यक आयोग
इस आयोग के अध्यक्ष कभी काबिल नेता जाबिर हुसेन थे. उस समय आयोग ने चार रिपोर्टें दी थीं जो अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित हुईं थी. अशराफ जाबिर ने अरजाल मुसलमानों की हालत का गहन सर्वेक्षण करवाया था. आयोग ने आद्री से अल्पसंख्यकों की माली और तालीमी हालत का जो सर्वेक्षण कराया था उसका इस्तेमाल नीतीश कुमार ने चुनाव में मुसलमानों को पटाने के लिए किया. लेकिन जब राजपाट में आये तो इसका अध्यक्ष एक मिडलची को बना दिया, जिसका काम मुख्यमंत्री के लिए जादू-टोना करना और ताबीज बटोरना भर है. अध्यक्ष पर कई मुकदमे चल रहे थे. राज शक्ति से सब मुकदमे खत्म हुए. (इस आयोग ने अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है.)

महादिलत आयोग
महादलितों के लिए भी एक आयोग बना. ऐसा लगा कि इस आयोग के बनने से पहले ही इसकी रिपोर्ट तैयार हो गयी थी. आयोग के गठन के चंद माह बाद ही उसकी पहली रिपोर्ट आ गयी. नीतीश कुमार का दिल खिलखिल. बेलछी में दलितों को जिंदा आग में क्षोंकन का अभ्यास काम में आया. आयोग की दूसरी रिपोर्ट भी जल्दी ही आयी. रिपोर्ट में धोबी और पासी को भी महादलित माने जाने की सिफारिश की गयी. जहां अन्य आयोगों की रिपोर्टें कचरे में पड़ी कराहती रहीं वहीं महादलित आयोग की इस रिपोर्ट को राज्य सरकार ने दूसरे-तीसरे दिन ही पूरा का पूरा स्वीकार करने की घोषणा की.
नीतीश से बेहतर कौन जानता है कि उन्हें चमार और दुसाध के वोट तो मिलने से रहे. एक मायावती के साथ, दूसरे रामविलास के. दोनों को उपेक्षा की टोकरी में डालो. कुल दलितों के 60 फीसदी वोट इन जातियों के पास हैं. धोबी और पासी को जोड़ दें तो महादलित 40 प्रतिशत हो जाएंगे (कुल दलित वोटों के). नीतीश कुमार का मन बाग-बाग हुआ. मायावती, रामविलास तीस-तीस, नीतीश के हिस्से चालीस. दलितों में यह बांट-बखरा काम आया. आग से नीतीश कुमार का काम नहीं चलता. आरी से चलता है. काटो-बांटो और राज करो. (अब चमार को भी महादलित में शामिल करने की तैयारी है.) हो गया दलितों का सत्यानाश! डॉ. अम्बेदकर की आत्मा को कराहने दो. महादलितो ंके वोट रणवीर सेना-भूमि सेना-कुंवर सेना के खुर्राट नेताओं को दिलाने दो. इसी रास्ते बिहार का विकास होगा.
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार 

यह नीतीश राज नहीं, पुलिस राज है-एक पुरानी चिट्ठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/28/2009 05:52:00 PM

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को शिवानंद तिवारी का लिखा पत्र


ए-107, जगत अमरावती अपार्टमेंट
महेश नगर, बेली रोड, पटना.
19 जुलाई, 2006
प्रिय नीतीश जी,
बहुत चिंतित होकर यह पत्र लिख रहा हूं. पिछले दिनों की कुछ घटनाओं पर आपकी तथा आपके कुछ मंत्रीमंडलीय सहयोगियों की प्रतिक्रिया ने मुझे गंभीर चिंता में डाल दिया है. यह चिंता लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर है. आप-हम सभी ने लोकतंत्र की स्थापना के लिए आपात काल का विरोध किया था और जेल यातनाएं सही थी. उसके बाद सन्‌ 80 में जब पंडित जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे, तब उनके द्वारा प्रेस की आजादी का गला घोंटने के उद्देश्य से तथाकथित प्रेस बिल लाया जा रहा था. उस काले कानून के विरुद्ध अन्य साथियों के साथ आप-हम भी लड़े थे और जेल गये थे. मैं समझता हूं कि आपको अच्छी तरह स्मरण होगा, जब प्रेस बिल के विरुद्ध प्रदर्शन पर बेली रोड पर पुलिस द्वारा बर्बर ढंग से लाठी चार्ज किया गया था. हमलोग बचने के लिए तत्कालीन मंत्री डॉ ईशा के आहते में आ गये थे. लेकिन जब पुलिस का एक वरीय पदाधिकारी टेम्पू पर सवार विजय कृष्ण को बुरे ढंग से पीटने लगा तब आप-हम अपने को रोक नहीं पाये और बगैर परवाह किये कि हमें चोट लग सकती है, हम लोगों ने उक्त पदाधिकारी की उस वहशी कार्रवाई का मजबूती से विरोध किया था. हमलोगों की गिरफ्‌तारी हुयी और हम साथ ही जेल गये. उस साल का दशहरा हमलोगों ने जेल में ही बिताया था.
आज आप मुख्यमंत्री हैं. उपरोक्त घटनाओं का स्मरण जानबूझ कर करा रहा हूं ताकि लोकतंत्र के लिए उन संघर्षों की याद ताजा हो जाए. इस लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आघात नहीं पहुंचे, यह कमजोर नहीं हो यह देखना और इसकी रक्षा करना हम सबका धर्म है. इस लोकतंत्र ने ही लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाया, एक ताकतवर नेता के रूप में देश में स्थान दिया. तो इसी लोकतंत्र ने उन्हें हटाकर आज आपके हाथ में शासन की बागडोर सौंपी है. लेकिन सत्ता की कुर्सी के गंभीर रोग हैं. दुनिया भर के मनीषियों ने इस रोग के विषय में सत्ता की कुर्सी पर बैठने वाले को आगाह किया है. लोकतंत्र में सत्ता किसी की स्थायी नहीं होती है. लेकिन सत्ता का यह भी रोग है कि इस पर बैठने वाले को भ्रम हो जाता है कि उसका स्थान स्थाई है. अगल-बगल के चाटुकार कैसे हवा देकर फुलाने की चेष्टा करते हैं इसका अनुभव संभवतः आप करते होंगे. मैंने भी लोगों को फुलाते और फुलते देखा है. इसलिए इस पत्र का उद्देद्गय आपको आगाह करना भी है.
इधर कुछ घटनाओं के संदर्भ में 'कानून अपना काम करेगा', 'कानून की नजर में कोई छोटा-बड़ा कोई नहीं है', 'कानून के मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा', इस तरह का डायलॉग रोज सुन रहा हूं. इस पर गुस्सा भी आ रहा है और चिढ़ भी हो रही है. आखिर कानून कोई जिंदा चीज नहीं है, जो बगैर भेद-भाव के समान नजर से स्वयं कार्रवाई करता है. यह किताबों में लिखी बेजान इबारत है. इसके इस्तेमाल के लिए तंत्र बनाया गया है, तरीके निर्धारित किये गये हैं. इसको इस्तेमाल करने वाला किस तरह इसका इस्तेमाल कर रहा है यही देखना तो आपका काम है. दुर्भाग्य से हमारे देश में आज भी वही तंत्र और वही कानून है जिसके सहारे अंग्रेजों ने हमारे देश पर राज किया और देश को लूटा. आजादी के लिए संघर्षरत हमारे पुरखों का इसी तंत्र और कानून के सहारे दमन किया जाता था. इसलिए हमारे प्रशासनिक तंत्र में दमन का मनोभाव है. इसका चरित्र जनाभिमुख नहीं, जन-विमुख है. इसी को नियंत्रित करना ही तो लोकतांत्रिक सरकार का काम है. अगर सरकार तंत्र को अपनी मर्जी से कानून के इस्तेमाल का अधिकार दे देगी तो लोकतांत्रिक शासन नामलेवा भर रह जायेगा और यह पुलिसिया तथा अफसरी शासन में बदल जायेगा.

उपरोक्त संदर्भ में इधर की घटनाओं का उल्लेख कर अपनी बातों को आपके समझ स्पष्ट करना चाहूंगा. पहली घटना का हलका सा जिक्र आपको इससे पहले लिखे पत्र में मैंने किया है. यह मामला एक वरीय पदाधिकारी और दो विधायकों के बीच उस पदाधिकारी के चेम्बर में हुए झंझट के संबंध में है. विधायकों पर मुकदमा हुआ. हप्ता भर बाद पुलिस ने अनुसूचित जाति पर अत्याचार की धारा जोड़ कर उस केस को गंभीर बना दिया ताकि उन विधायकों का जेल जाना पक्का हो जाए. इस पर कोई डायलॉग बोलता है, वह भी कोई मंत्री जो मंत्री बनने से पूर्व एक विधायक है, एक राजनैतिक कार्यकर्ता है कि कानून अपना काम करेगा तो थप्पड़ मारने की तबीयत होती है. एक राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में उनको यह अहसास नहीं हुआ कि हमारी पुलिस या हमारा प्रशासन जनता के प्रति कितना संवेदनशील है. अगर कोई राजनैतिक कार्यकर्ता या विधायक, चाहे वह किसी भी दल का हो, किसी पदाधिकारी के यहां कोई सवाल लेकर जाए. उस सवाल के प्रति असंवेदनशील उक्त पदाधिकारी से जोर देकर सवाल पूछे तो पदाधिकारी उस पर केस कर दे. हमारी बेइज्जती की गयी. इधर सरकार के लोग उस पदाधिकारी के पक्ष में खड़े हो जाएं. सरकार के लोग जो जनता के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने जनता के सवालों को लेकर प्रशासन से जीवन भर जद्दोजहद किया है, वे भी कहने लगें कि कानून अपना काम करेगा तो आप ही बताएं कि इस पर गुस्सा नहीं आयेगा तो क्या होगा.

जिस पदाधिकारी से मिलने उक्त दोनों विधायक गये थे, वह कैसा है, यह आप नहीं जानते हैं क्या! अपने अफसरी जीवन में उसने कितनों को प्रताड़ित किया है, इसकी गिनती नहीं हो सकती है. वह तो इतना मजबूत है कि जब लालू यादव का जमाना था तो अपने चेम्बर में लोगों को बैठाकर कहता था कि यह अहीर नहीं गड़ेरिया है. यह कौन नहीं जानता है. छपरा में कमीश्नर था तो सोनपुर मेला में मंच पर मंत्री बैठे हुए हैं और वहां उनके सामने नेताओं और मंत्रियों को गलियाता था. मुक्षे स्वयं इसका तर्जुबा है. मैंने उसको डांट कर चुप कराया था. जहां तक मुक्षे स्मरण है कि सरकार ने उस समय उसके इस आचरण की जांच का आदेश दिया था. पता नहीं उस जांच का क्या हुआ. वैसे पदाधिकारी के लिए और इस सेवा के पदाधिकारियों की शान में कोई तेज आवाज में बोलने की गुस्ताखी भविष्य में नहीं कर पाये इसके लिए हप्ता भर बाद अनुसूचित जाति उत्पीड़न की धारा जोड़ दी जाए और मंत्री, मुख्यमंत्री बोलें कि कानून अपना  काम करेगा तो बताइए गुस्सा नहीं तो क्या प्रेम उमड़ेगा. नीतीश जी ऐसा करना पुलिस और अफसरशाही को निरंकुश बनाना होगा. मैं तो बिहार विधान सभा के सभी सदस्यों को सामूहिक रूप से कहूंगा कि वे मांग करें कि उक्त तथा उनके जैसे अन्य पदाधिकारियों के विरुद्ध निगरानी विभाग में कितने मामले हैं और उन पर क्या कार्रवाई हुई है. आखिर यह चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के न्यूनतम अधिकार और प्रतिष्ठा का सवाल है. सरकार का काम या मंत्रीमंडल का काम क्या इतना भर रह गया है कि अफसर मनमाना करे और कोई विरोध करे तो सरकार और मंत्री अफसर के पक्ष में खड़े हो जाएं और उसे निरंकुश बनाने में मदद करे तो लोकतंत्र कैसे चलेगा और कैसे बचेगा.

मैं आनंद मोहन के मामले का भी आपको स्मरण कराना चाहूंगा. आप जानते हैं कि आनंद मोहन का मैं समर्थक नहीं हूं. समता पार्टी में एक से अधिक बार मैंने आनंद मोहन का विरोध किया है. उसके चलते मुक्षे क्या क्षेलना पड़ा है वह भी आपको याद होगा. लेकिन आनंद मोहन को एक राजनैतिक व्यक्ति के रूप में आप सहित सभी लोगों ने मान्यता दी है. वे लोकसभा के सदस्य रहे हैं. उनकी पत्नी लोकसभा, विधान सभा की सदस्य रही हैं. अलग-अलग समय पर आप सहित अन्य लोगों ने आनंद मोहन से राजनैतिक समझौता किया है. जब जरूरत हो तो राजनैतिक गठजोड़ और जरूरत पूरी हो जाए तो आनंद मोहन गुंडा, यह कैसी नीति है भाई! उनके साथ पुलिस को ऐसा करने की छूट कैसे दी जा सकती है. टीवी पर साफ दिखाई दे रहा है कि पुलिस अफसर पीछे आनंद मोहन पर हाथ चला रहा है. कानून की कौन सी धारा इसकी इजाजत देती है? आनंद मोहन न्यायिक हिरासत में थे. जेल प्रशासन के अनुरोध पर सहरसा एसपी के द्वारा दिये गये पुलिस बल के साथ वे देहरादून गये थे. देहरादून से सहरसा जाने के रास्ते में पटना आये थे. कहा जा रहा है कि हिरासत में प्रेस से बात कर रहे थे. इसलिए उनके विरूद्ध गृह-सचिव के लिखित आदेश पर पुलिसिया कार्रवाई की गयी. आनंद मोहन के विरुद्ध कार्रवाई क्यों? कार्रवाई तो गृह सचिव महोदय को अपनी पुलिस के विरुद्ध करनी चाहिए जिसकी हिरासत में आनंद मोहन थे और जिसने उन्हें ऐसा करने दिया. और इसमें कौन नयी बात है. इस देश में पुलिस हिरासत मे रहते हुए किसको मीडिया से बात करने से रोका जाता है. इस मंत्रीमंडल में जरूर कुछ सदस्य होंगे जो 74 आंदोलन में जेल में रहते हुए अखबार में बयान छपवाते रहे हैं. कम से कम सुशील मोदी ने तो ऐसा जरूर किया होगा. मैं तो जेल से अखबारों में लेख भिजवाता था.

इसलिए आनंद मोहन के साथ जो हुआ वह सरासर गलत था. वैसे आनंद मोहन के लिए तो गृह सचिव और पटना के पुलिस पदाधिकारी राजनैतिक मददगार साबित हुए हैं. मैंने अखबारों में पढ़ा कि पटना स्टेशन पर जो कुछ हुआ उसके लिए आनंद मोहन के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया है. कानून सबके लिए बराबर है, तो इस आधार पर उस पदाधिकारी पर भी मामला दर्ज होना चाहिए जिसने आनंद मोहन पर हाथ चलाया था. लेकिन ऐसा होगा, मुक्षे इसका यकीन नहीं है. जो लोग टेलीविजन में भाषण दे रहे हैं कि आनंद मोहन का मामला कानून और अदालत का मामला है, उनको मालूम होना चाहिए कि कानून अपने आप काम नहीं करता है. वह तो उसके इस्तेमाल करने वाले की मनसा और नीयत के अनुसार काम करता है. इसलिए सवाल कानून पर अंकुश लगाने का नहीं, इसको इस्तेमाल करने वाले पर अंकुश लगाने का है. ताकि वह कानून के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं करे.
मुख्यमंत्री जी, लोक शिक्षकों के प्रदर्शन पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई पर आपकी प्रतिक्रिया ने भी मुक्षे ठेस पहुंचायी है. इसके पहले बेली रोड पर शिक्षा मित्रों पर बर्बर लाठी चार्ज हुआ था. उस समय आपने घोषणा की थी कि सरकार इसकी जांच कराएगी और दोषी को दंड देगी. कुछ नहीं हुआ और दूसरी घटना हो गयी. हम-आप कई जुलूस में शामिल रहे हैं. ऐसे जुलूस में भी शामिल रहे हैं जिसमें जुलूस वाले पुलिस को भड़कार बल प्रयोग के लिए उकसाते हैं. प्रेस बिल के विरुद्ध जुलूस में भी ऐसा हुआ था, आपको स्मरण होगा. लेकिन किसी भी उकसावे के विरुद्ध पुलिस की प्रतिक्रिया संयमित होगी. परिस्थिति के अनुपात में होगी. भीड़ तो असंगठित होती है, उसमें अनुशासन नहीं होता है. लेकिन पुलिस तो संगठित और अनुशासित बल है. राज्य की संगठित और वैध हिंसा की ताकत का प्रतीक है. भीड़ की कार्रवाई और पुलिस की कार्रवाई में चारित्रिक फर्क होना चाहिए. पुलिस और भीड़ एक जैसा आचरण करने लगे तो क्या होगा! ढेला वाला और गोली वाला एक तरह का आचरण करने लगेगा तो क्या परिणाम निकलेगा! इसलिए बेली रोड और आर.ब्लॉक दोनों स्थानों पर पुलिस की प्रतिक्रिया न तो संगठित थी और न अनुशासित, दोनों मामले में पुलिस की प्रतिक्रिया बर्बर थी. पुलिस के चरित्र में बर्बरता का जो यह अंश है उसी को नियंत्रित करना सरकार का काम है, जनप्रतिनिधियों का काम है. अगर सरकार आंख मूंद कर इस प्रकार की पुलिसिया कार्रवाई का समर्थन करने लगेगी तो इसको नीतीश राज नहीं कहकर पुलिसिया राज कहा जायेगा.

उपरोक्त घटनाएं मुझे विचलित कर रही हैं. इसलिए अल्प समय में ही यह दूसरा पत्र आपको लिखना  पड़ रहा है. इस पत्र को आप किस रूप में लेते हैं यह आप पर निर्भर है. इसे आप एक विरोधी द्वारा आपको और आपकी सरकार को बदनाम करने के उद्देश्य से लिखा गया पत्र भी समझ सकते हैं. शायद इस पत्र की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होगी. लेकिन इस पत्र को आप अपने वरीय मित्र की चेतावनी के रूप में भी ले सकते हैं जो अपनी समझ के अनुसार उन कमजोरियों को आपको दिखाने का प्रयास कर रहा है जिन्हें दूर करना आपके हित में होगा. यह आप पर निर्भर है कि आप इसे किस प्रकार लेते हैं. इसकी चिंता मुझे नहीं है.
शुभकामनाओं के साथ!
आपका

(शिवानंद तिवारी)
पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार 

बुद्धिजीवियों, चिंतकों, कलाकारों, साहित्यकारों और लेखकों के नाम अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/27/2009 05:00:00 PM

बस्तर पर हमने सामग्री प्रस्तुत करने का वादा किया था. इस कड़ी में यह अपील, जो आपरेशन ग्रीन हंट की मुखालिफत करने की पुरजोर अपील के साथ बस्तर और छत्तीसगढ़ के लोगों द्वारा किये गए कुछ रचनात्मक कार्यों का ब्यौरा देती है. इसे पंजाबी के लेखक-पत्रकार सतनाम ने बूटा सिंह के साथ मिलकर जारी किया है. सतनाम कुछ साल पहले बस्तर गए थे और वहां से लौट कर शानदार किताब जंगलनामा : बस्तर के जंगलों से लिखी थी.




हुकूमत वैकल्पिक विकास के माडल को ध्वस्त करना चाहती है

प्रिय दोस्तों,
    भारत सरकार ने अपने ही लोगों के ऊपर हमला करने के लिए मध्य भारत में इतनी बड़ी संखया में अर्धसैनिक बलों को जमा किया है। यह भारतीय हकुमत द्वारा इस देश की जनता पर थोपा गया नवीनतम युद्ध है। सरकार का कहना है कि यह मुहिम उन क्षेत्रों में छेड़ी गई है जो केन्द्र या राज्य सरकार के नियन्त्रण में न होकर माओवादियों के कब्जे में हैं।
    वास्तव में इन जंगलों के निवासी जो हजारों सालों से वहां रह रहे हैं, इन्हें बचाए हुए हैं। क्योंकि जंगल उनकी जिन्दगी को सुनिश्चित करता है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। आदिवासी कहे जाने वाले ये लोग जो हमारी धरती के सबसे पुराने निवासी हैं और अभी भी पुराने ढ़र्रे में जीवन यापन कर रहे हैं। वे यहां के सबसे गरीब और दबे-कुचले लोग हैं। आज तक कोई भी उन्हें गुलाम नहीं बना पाया है। 1910 में ब्रिटिश राज ने कोशिश की मगर उनकी लुटेरी सेना पर जवाबी कार्यवाही की और उन्हे पीछे हटना पड़ा। ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ आदिवासियों का यह प्रतिरोध, जो भूमकाल बगावत के नाम से प्रसिद्ध है, महान योद्धा गुण्ड़ाधूर के नेतृत्व में हुआ।19वीं सदी में भी इन्होंने मुण्ड़ा विद्रोह (जिसका नेतृत्व बिरसा मुण्ड़ा ने किया था) में ब्रिटिश सरकार के साथ टक्कर ली थी।
    तब से किसी भी हकुमत ने चाहे वो ब्रिटिश हो या बाद में दिल्ली पर राज करने वाले शासक, दोबारा उनको अधीन करने की हिम्मत नहीं की। आदिवासी अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और अनोखी जीवन शैली के साथ हमेशा एक स्वतंत्र ज़िंदगी जीते रहे हैं। केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने उनके जंगल वहां से मिलने वाली कीमती धातु और खनिज पदार्थ तो बुरी तरह से लूटे हैं, मगर कभी भी उनकी ज़िंदगी की बुनियादी जरूरतों जैसे पीने का पानी, स्वास्थ और शिक्षा आदि को पूरा करने के लिए कुछ नहीं किया। उनके संसाधनों की लूट बडे़ पैमाने पर होती है। हर साल अरबों रूपये की ये सम्पति बडे़ पूंजीपतियों, नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों, ठेकेदारों और पुलिस द्वारा हड़प कर ली जाती है। लूट का यह सिलसिला बेरोक-टोक चलता रहा जब तक कि आदिवासियों ने चेतन होकर इस शोषण तथा अमानवीय जुल्म के ख़िलाफ प्रतिरोध का रास्ता अखितयार नहीं कर लिया।
    यह प्रतिरोध उनकी परम्परा का हिस्सा है और उनकी आज़ाद प्रवृति की उपज है। उनका यह संघर्ष उस शोषण को खत्म करने के लिए है जिसने उनके जीवन को नरक समान बना दिया है। यही कारण है कि वे खुद को क्रान्तिकारी मार्क्सवादी विचारधारा से जोड़ते हैं जो लूट, शोषण और दमन रहित संसार का वादा करती है। इसलिए वे सोचते हैं कि उनका मकसद क्रान्तिकारी माओवादी विद्रोहियों के साथ सांक्षा है जो कि हर तरह के शोषण और अत्याचार को खत्म कर एक भेदभाव रहित समतामूलक मानवीय समाज बनाना चाहते हैं।
    जैसा कि हम जानते हैं कि आदिवासियों की धरती बहुमूल्य खनिज पदार्थों, धातुओं तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे लोहा,कोयला, बाक्साइट, मैंगनीज, सोना, हीरों और यूरेनियम से भरपूर है। भारतीय हकुमत ने कभी भी आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार को मान्यता नहीं दी। बल्कि हमेशा विभिन्न तरीकों से उन पर कब्जा करने की कोशिश की है। भारतीय हुकूमत इस शोषण को ओर तेज करने जा रही है जिसके चलते उसने विदेशी साम्राज्यवादी कम्पनियों भारत के बड़े औद्योगिक घरानों और उनके सांक्षे उद्यमों को इस धरती पर नये प्रोजेक्ट लगाने के लिए आमन्त्रित किया है।
    इस काम के लिए भारत सरकार ने विदेशी तथा भारतीय औद्योगिक घरानों के साथ अरबों-खरबों रूपयों के सहमती पत्रों (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन सहमती पत्र के तहत तय की गई बातें लोगों से छुपा कर रखी गई हैं। भारत सरकार का मौजूदा हमला इन प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों को आदिवासियों से छीन कर साम्राज्यवादी कम्पनियों को सोंपने के लिए है। और यह सब विकास के नाम पर किया जा रहा है। परन्तु यह विकास किसी भी तरह से आदिवासियों और वहां रहने वाले लोगों की जीवन हालतों में सुधार नहीं लाता। बैलाडीला, बालको, बोकारो, भिलाई, जाडूगुडा और इनके जैसी दूसरी परियोजनाएं इसकी पुष्टी करती हैं।
    हाल ही में हमने नंदीग्राम, सिंगूर, काशीपुर, कालिंगा नगर, लालगढ़, पोलावरम, टिहरी और नर्मदा परियोजना क्षेत्र के लोगों को कार फैकट्रीयों, बांधों, बडी खादानों और विद्गोष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द करते देखा है। ये और ऐसी दूसरी परियोजनाओं का वहां या देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले मेहनतकश ग़रीब लोगों के विकास और भलाई के साथ कोई संबंध नहीं है। ये परियोजनाएं वास्तव में देश के उन मुट्ठीभर अमीर परजीवियों और विदेशी साम्राज्यवादी पूंजीपतियों के ख़जाने भरने के लिए है जिनका असली धर्म लूट-मार और शोषण करना है। यहां के लोग अपनी ज़मीन के अधिकार के लिए सरकार तथा उन पूंजीपति गिद्धों के ख़िलाफ संघर्ष करते रहे हैं जिनके इशारों पर सरकार चलती है।
    लोगों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए सरकार ने भारी संखया में हथियारबंद सेना को ख़ास कर उन जगहों पर तैनात किया है जहां संघर्ष मजबूत है और पूंजीपतियों को प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर धरती पर कब्ज़ा करने से रोकता है। जब सरकार माओवादीयों के अधीन क्षेत्रों को वापिस लेने की बात करती है तो वास्तव में वह लोगों के संघर्ष को कुचलना चाहती है और उनकी ज़मीनों को छीन कर बड़े उद्योगपतियों, धन कुबेरों और दानवीय खनन कम्पनियों को भेंट करना चाहती है। माओवाद कुछ ओर नहीं बल्कि बेइंसाफी के ख़िलाफ लोगों की बग़ावत है। इससे कोई फर्क नहीं पडता कि सरकार उन्हें आतंकवादी कहे या कुछ और। इन क्षेत्रों के दसियों लाख लोग माओवादियों के मकसद का दम भरते हैं। और जब लाखों लोग एक न्यायसंगत मकसद के लिए एकजुट हो कर लड़ते हैं तो उनको आतंकवादी नहीं कहा जा सकता।
    सरकार यह मानती है कि भारत के 600 जिलों में से 223 में माओवादी सक्रिय हैं। जिसका मतलब है कि भारत के 223 जिलों में लोग इस विचारधारा को अपनाए हुए हैं और हर तरह के शोषण को खत्म करने के लिए लाखों की संखया में एकजुट हो कर संघर्ष कर रहे हैं। अब यह लोगों का आन्दोलन बन चुका है और बाकी जिलों में रहने वाले लोगों का क्या? क्या वहां के मजदूर, किसान, विद्यार्थी, छोटे दुकानदार, कर्मचारी और मेहनतकश जनता के हित इस समाज में सुरक्षित हैं? और क्या वे बेहतर समाज नहीं चाहते? क्या इन सब का सपना एक नहीं है? और अगर 223 जिलों के लोग बेइंसाफी के खि़ालाफ संघर्ष कर रहे हैं और बाकी वही खवाहिश रखते हैं तो सरकार को उन्हें आतंकवादी शब्द से बुलाने का कोई अधिकार नहीं है।
    भारतीय हुकूमत सिर्फ़ माओवादीयों को ही नहीं बल्कि इस देश के करोड़ों करोड़ लोगों की आकांक्षाओं को, प्रत्येक उत्पीड़ित भारतीय के  सपनों को कुचल देना चाहती है।
    इनको बदनाम और ख़ात्म करने के लिए हुकूमत ने मीड़िया और हर तरह की प्रचार मशीनरी को लगा रखा है। वे दबे कुचले लोगों के प्रतिरोध और परिवर्तनकामी आन्दोलन को मलियामेट कर देना चाहते हैं। जोकि मुसीबतों भरी इस धरती, जिसे हिन्दूस्तान कहा जाता है, पर  लोगों के जीवन में सच्ची खुशियां लाने का एकमात्र रास्ता है, वो धरती जिसमें शोषित और भूखे-नंगों बसते हैं। वो धरती जहां किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं और नौजवानों का भविष्य अंधकार में है। वो धरती जहां मजदूरों को फैक्ट्रीयों से निकाला जा रहा है, जहां संगठित क्षेत्र के मजदूर वो सब अधिकार खो रहे हैं जिन्हे उन्होंने लंबे संघर्ष से हासिल किया था और जिनकी नौकरियों को ठेकेदारी प्रबन्ध के अधीन लाया जा रहा है। वो धरती जहां सरकारी कर्मचारियों को वी.आर.एस. या गोल्डन हैंडशेक के नाम पर चंद टुकड़े फैंक, लात मार कर बाहर निकाला जा रहा है। जहां छोटे दुकानदार और व्यपारियों के कारोबार को बडे मॉल तथा विद्गोष आर्थिक क्षेत्र निगल रहे हैं। ये वो धरती है जो इंसाफ के लिए चीख रही है।
    अगर भारत का प्रधानमंत्री माओवादियों को देश का सबसे बड़ा अन्दरूनी ख़तरा कहता है, तो देश के शासकों को यह सोच लेना चाहिए कि आज़ादी के 62 सालों में उन्होने लोगों को क्या दिया है। बात यहां तक पहुंची ही क्यों?  हिन्दुस्तान के ये शासक पिछले छह दशकों के राज के दौरान पूरी तरह से असफल रहे हैं। जबकि उन्होने ही समाज को शासित और संगठित किया है और स्टियरिंग भी उनके ही हाथ में था। देश की यह मौजूदा हालत उनकी ही देन है, माओवादियों की नहीं। उनकी अपनी बनाई विकास योजनाएं अगर असफल हुई हैं तो उसका दोष प्रतिरोध कर रहे लोगों या माओवादियों को नहीं दिया जा सकता। माओवादी तो अभी कुछ समय से ही परिदृद्गय में आये हैं परन्तु उन वादों का क्या हुआ जो हुकूमत ने लोगों से आजादी के वक्त किए थे कहां आलोप हो गया 'किस्मत के साथ दस्तपंजा लड़ाने' का वो वायदा जो 14-15 अगस्त 1947 की रात को जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से किया था? जो वायदा पूरा नहीं हुआ उसके लिए न तो जनता ज़िम्मेवार हैं और न ही माओवादी।
    तो अब, सरकार आपे्रशन ग्रीन हण्ट के जरिए, आतंकवाद से लड़ने के नाम पर, एक आर-पार की जंग में सिर्फ़ माओवादियों को ही नहीं मिटाना चाहती बल्कि लोगों की इच्छाओं, उनके संघर्षों, उनके प्रतिरोधों तथा एक बेहतर ज़िंदगी जीने के उनके संकल्प का भी गला दबा देना चाहती है। और जब आदिवासियों की धरती इस हमले के आगे क्षुकने से इन्कार कर रही है तो हमें उनको सलाम करना चाहिए।        
   हुकूमत अब अपने ही लोगों के खि़लाफ वायु सेना की ताकत का इस्तेमाल करना चाहती है। ये पिछले 60 सालों के कुशासन और लोगों पर थोपी गई जन विरोधी नीतियों का ही नतीजा है लोगो ने कभी भी उनको ऐसी नीतियां लागू करने का अधिकार नहीं दिया। इसके विपरीत इस सारे समय दौरान लोगों ने इन नीतियों के खि़लाफ याचिका, विरोध प्रदर्शन, हड़ताल, चक्का जाम, भूख हड़ताल और 'वर्क टू रूल' के जरिए अपना विरोध प्रकट किया है, और भगवान ही जानता है कि दुनिया की सबसे बड़ी इस लोकतान्त्रिक हुकूमत ने विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कितनी बार गोलियां चलाई होंगी। कितनी ही बार लोगों को मारा है। पता नहीं कितने लाखों लोगों पर उन्होने लाठी चार्ज किया है और कितनों को जेलों में डाल दिया है। हिरासतों में होने वाली मौतों और बडे पैमाने पर पुलिस मुकाबलों में मारे जाने वाले हजारों लोगों की तो बात ही छोड़ो। उनका यह दमन कभी बंद नहीं हुआ।
    लोगों के गिले-शिकवे सुनने की बजाए इन सब दशकों में मोहनदास कर्मचंद गांधी के अहिंसा के सिद्धान्त पर चलने का दावा करने वाली इस सरकार ने लोगों पर बेतहाशा हिंसा ढ़हाई है-एक माफिया गिरोह के जैसे। फिर भी प्रतिरोध जारी रहा और बग़ावत बढती गई।
    और अब हुकूमत ने अपने ही देशवासियों पर हमला करके देश के अन्दर ही सरहदें खड़ी कर दी हैं।
    मध्य भारत की ग़रीब जनता के ऊपर हो रहा ये मौजूदा हमला और कुछ नहीं बल्कि 1947 से लगातार जारी हुकूमती हिंसा का एक और खूंखार रूप है। इस हमले का मकसद सबसे गरीब आदिवासी किसानों और खादानों में काम करने वाले मजदूरों के ज़ुल्म के खि़लाफ लड़ने के हौंसले को तोड़ना है। इस हमले के जरिए वे देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों को इशारा करना चाहते हैं कि वह अपने अधिकारों के लिए न बोलें, सरकार की नीतियों का विरोध न करें। भले ही वो नीतियां लोगों और देश के हितों के विरूद्ध ही क्यों न जाती हों।
    प्रतिरोध के केन्द्र को न सिर्फ तोड़ने के लिए ही घेरा जा रहा है बल्कि वे उन सब चीजों को भी तबाह कर देना चाहते हैं जिनको लोगों ने संघर्ष के दौरान कड़ी मेहनत से खड़ा किया है। सरकार ने उन लोगों को बदनाम करने के लिए मुहिम छेड़ दी है जो पीछे हटने से इंकार हैं, जो सजदा नहीं करते और उसके विकास तथा प्रगति के खोखले वादों के झांसे में नहीं आते। लोग जानते हैं कि ये विकास उनके लिए नहीं है। साम्राज्यवादी पूंजी, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के आदेश पर कल्याणकारी राज का संकल्प त्याग चुकी सरकार वह लोगों की भलाई के बारे में नहीं सोच सकती।

दण्ड़कारण्य में जन विकास कमेटियां :
    इस हमलें को क्षेलने वाले लोगों ने 'किस्मत के साथ दस्तपंजा लड़ाने' का सपना साकार करने के लिए, अपना भविष्य खुद अपने हाथों में लेते हुए, विभिन्न स्तरों पर  स्थानीय सरकारों का निर्माण किया है।
    आओ एक नजर देखें कि दंडकारण्य के गावों में लोगों ने अपनी विकास समितियों के द्वारा वो क्या बनाया है जिसे सरकार तबाह कर देना चाहती है। इससे हमें हमारे देश के विकास और प्रगति के बारे में माओवादियों के दृष्टिकोण की झलक दिखाई देगी। ऐसा विकास जो देशीय तरीके से आत्मनिर्भर रह कर किया जा रहा है, जो विकास जन हित में है और जो विकास लोगों की जनतांत्रिक भागीदारी के ज़रिए किया जा रहा है। जो इस धरती और इसके प्राकृतिक संसाधनों की कद्र करता है। ऐसा विकास हमें साम्राज्यवादी पूंजी की जकड़ और उसके आदेशों से मुक्त कर देगा। ये एक ऐसा कार्य है जो सिर्फ किसी सच्ची देशभक्त ताकत के द्वारा ही किया जा सकता है।

  • सबसे बड़ा सुधार जमीनों के बारे में किया गया है। उन्होंने हर किसान परिवार को ज़मीन देने के लिए लाखों एकड़ ज़मीन बांटी है। किसी को जोतने से अधिक ज़मीन रखने की इजाज़त नहीं है। इस तरह कृषि में मज़दूरों से पैसे देकर काम करवाने के गैर-ज़रूरी सिलसिले का अन्त कर दिया है। यहां तक कि लोगों पर दबाव ड़ाल कर बिना पैसे दिए काम करवाने और उनका खून पीने वाले पटेलों (गावों में सरकार का नामांकित अधिकारी) को भी उतनी ही ज़मीन रखने की इजाज़त है जितनी वो अपने परिवार की मेहनत के साथ जोत बीज सकते हो। कोई भी ग़ैर आदिवासी यहां ज़मीन का मालिक नहीं बन सकता। 
  • औरतों को ज़मीन पर मल्कियत का समान अधिकार दिया गया है।
  • उन्होंने आदिवासियों को एक या दो सालों के बाद जगह बदलकर खेती करने के पुराने ढंग से निकाल कर योजनाबद्ध स्थाई तरीके से खेती करने लगाया है। आदिवासियों को बिजाई, गुड़ाई और फसल की कटाई करनी सिखाई है। वह अपनी निजि ज़मीनों के साथ-साथ पूरे समूह के इस्तेमाल के लिए सहकारी खेतों में भी खेती करते हैं। कृषि का विकास बिना रसायनिक खादों, कीटनाशकों से किया जा रहा है।
  • उन्होंने गाजर, मूली, बैंगन, भिंडी, करेला, टमाटर आदि तरह-तरह की सब्जियां बीजनी शुरू करवाई हैं। दूर-दराज के इलाकों में बसे आदिवासियों ने ना तो कभी इनको देखा था और ना ही कभी इनका स्वाद चखा था।
  • उन्होने केले, निंबू जाति के फलों, आम, अमरूद आदि के बगीचे लगाए हैं।
  • उन्होनें मछली पालन और सिंचाई के लिए बांध, तालाब और नहरें बनाई हैं। यह सब कुछ सामूहिक मेहनत के ज़रिए किया गया है। और इससे होने वाली पैदावार हर परिवार को मुफ्त में दी जाती है।
  • उन्होने पीने योग्य पानी के लिए कुएं खोदे हैं। जबकि औद्योगिक परियोजनाओं ने भू जल के भण्डार को तबाह कर दिया है। मछलियां तथा जल-जीवन और साथ ही उसके आस पास की नदियां इस कदर प्रदूषित हो गई हैं कि वनस्पति तक नष्ट हो गई है। पानी के इन संसाधनों के इर्द-गिर्द के फलदार वृक्षों पर फूल आने बंद हो गए हैं।
  • उन्होंने बहुत से गावों में चावल मीलें लगाई हैं। इन मीलों ने औरतों को धान कूटने के रोज के काम से मुक्त कर दिया है। इनमें से बहुत सी मीलों का सरकार ने सलवा जुडुम द्वारा नष्ट कर दिया है। लेकिन फिर भी सरकार कहती है कि उसको इन इलाकों के विकास का बहुत फिक्र है।
  • महिलाएं इन विकास गतिविधियों में समान रूप से भागेदारी करती है। पितृसत्ता के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और इसी कारण अपने अधिकारों और जमीन की रक्षा के लिए वे समान रूप से बढ़ चढ़ कर भाग लेती हैं।   
  • उन्होंने ऐसा स्वास्थ प्रबंध कायम किया है जो हर आदिवासी किसान की पहुंच में है। हरेक गांव में एक ऐसी दवा इकाई है जिसे बिमारियों की पहचान करने और इलाज करने की सिखलाई दी जाती है। शोषण और दमन के विरूद्ध लड़ाई के पश्चात दूसरा मुखय कार्य आदिवासियों की सेहत संभाल ही है।
  • वे स्कूल चलाते हैं। सरकार द्वारा बनाए गए स्कूल पूरी तरह से बंद पड़े हैं। उनका इस्तेमाल पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों द्वारा गांवों में छापामारी के दौरान किया जाता है। यही कारण है कि लोग इन पक्की इमारतों को, जो उत्पीड़न का प्रतीक बन चुकी हैं, गिरा देते हैं।
  • उन्होने गोंड़ी भाषा में किताबें और पत्रिकाएं प्रकाशित की हैं। इसके फलस्वरूप पहली बार यह भाषा लेखन जगत में स्थान बना पाई है। गोंड़ लोगों द्वारा रचित गाने, लेख, कहानियां आन्दोलन द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं में छपती है। जनता की तरह अवहेलना का शिकार बनी इस प्राचीन भाषा को विकसित करने में यह आरम्भिक कदम है। यद्यपि गोंड़ी की कोई अस्तित्व मान लिपि नहीं है। वे देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करते हैं।
  • आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए माओवादी आंदोलन ने तेंदू पत्ते की फायदेमंद कीमतें और बांस तथा लकड़ी कटाई की दिहाड़ी तय की है।
  • आंदोलन के क्षेत्रों में कारोबार बेरोक-टोक चलता है। अब हॉट बाजार में व्यापारी  आदिवासियों के साथ धोखा नहीं कर सकते। आंदोलन जंगल की उपज और धान की फायदेमंद दरें तय करता है जिससे व्यापारी सहमत होते हैं। गुरिल्लों की मौजूदगी में कारोबारी लेन-देन ईमानदारी से चलता है। दूसरी तरफ व्यापारी खुश हैं कि उन्हें आंदोलन नियंत्रण वाले इलाको में चोरी और लूट-मार का कोई खतरा नहीं। और वे आजादी से घूम फिर सकते हैं।
  • उनका अपना न्याय प्रबंध है। लोगों के आपसी और उत्पीड़कों के साथ क्षगडों को निपटाने के लिए जन अदालतें लगाई जाती हैं।
  • अब यहां चोरी, फरेब, डकैती और सम्पति व निजी हितों के लिए कत्ल नहीं होते।
  • जंगल विभाग के अधिकारियों, ठेकेदारों तथा पुलिस द्वारा औरतों के साथ की जाने वाली छेड़-छाड़ तथा बलात्कार अब बीते की बात है। अब जंगल में औरतें रात दिन आजादी से घूमती हैं।
  • गांव स्तर की जनतांत्रिक प्रक्रिया अमल में लाई गई है। विकास समिति जैसी अलग-अलग समितियां ग्राम राज्य समिति (जिन्हे अब क्रान्तिकारी जन कमेटी कहते हैं) के अधीन काम करती हैं जो खेती-बाड़ी, शिक्षा, मछली पालन, गांव विकास तथा दवा इकाई आदि का काम देखती हैं।
  • तकरीबन हर गांव में महिलाओं और बच्चों के अपने-अपने संगठन हैं। आदिवासी किसानों के संगठन अलग हैं जिनकी इकाईयां सभी गांवों में हैं।
  • हर गांव में जन मिलिशया (पंरम्परागत हथियारों से लैस जनता) मौजूद है जो अपने गावों और जमीनों की सुरक्षा करता है।
  • इन जंगलों में सांस्कृतिक संगठन बहुत फले-फूले हैं क्योंकि आदिवासियों का संस्कृतिक सरगर्मियों के साथ बहुत लगाव है ये संगठन स्थानिय, राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय हर किस्म के मुद्दों पर गीत, नाच, नाटक और दूसरी कला विद्याओं के द्वारा जनता को जागृत करते हैं।
  • इन इलाकों में भूखमरी से होने वाली मोतों को रोकने में आंदोलन सफल हुआ है।

सलवा जुडुम: हुकूमती हिंसा का निजीकरण
    सलवा जुडुम सरकार द्वारा चलाई दहशत फैलाने वाली मुहिम थी जिसमें आदिवासी नौजवानों को 1500 रूपये महीने पर स्पैशल पुलिस अफसर (SPOs) भर्ती किया गया। इन एस.पी.ओ. को हथियार देकर आंदोलन के इलाकों पर हमले करवाए गए। इन्होंने अर्धसैनिक बलों की मदद से पूरे के पूरे गांव जला दिये, कत्लेआम मचाया, बलात्कार किए और लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। विद्गोष तौर पर प्रशिक्षण प्राप्त नागा बटालियनों को इस मुहिम की हिफाजत के लिए तैनात किया गया था।
    सलवा जुडुम ने हॉट बाजार (साप्ताहिक स्थानीय मण्डियां) बंद करवा के इन इलाकों में कारोबार को तबाह किया और आदिवासियों की अर्थव्यवस्था को नष्ट करके उन्हें क्षुकाने की कोशिश की। यह मुहिम 2005 से 2007 तक जारी रही। उन्होंने खड़ी फसलें तबाह कर दी, आदिवासियों ने जो अनाज या वनोंउपज हॉट बाजारों में आदान-प्रदान के लिए रखी थी उसे जला दिया या उस में ज़हर मिला दिया। मगर यह सब भी आदिवासियों को नहीं क्षुका सका। घुटने टेकने की बजाए वे बांस के बीज खा कर गुजारा करते रहे।
    सलवा जुडुम की खूनी मुहिम ने सैंकड़ों आदिवासियों को मार दिया, सैंकड़ों गावों का नामों निशान मिटा दिया, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किए और 50 हजार के करीब आदिवासियों को राहत के नाम पर बनाए गए शिविरों में कैद हो कर रहने को मजबूर कर दिया। ये राहत शिविर पुलिस द्वारा बनाए गए थे जिन्हे तोड़ कर आदिवासी आख़िरकार भाग निकले। इस अभियान ने लगभग 30 हजार आदिवासियों को अपने गावों छोड़कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर कर दिया। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ कर जंगलों में भटकने पर विवश कर दिया। वास्तव में सरकार ने उनकी समुची अर्थव्यवस्था तथा आजीविका के साधनों को तबाह करने का प्रयास किया। यहां तक कि जंगलों में पानी के खुले संसाधनों में भी जहर मिलाने की धमकियां दी। मगर प्रतिरोध जारी रहा। वो उसको तोड़ नहीं सके।
और अब :
    लोगों को झुकाने में असफल रही सरकार ने क्रोधित हो कर अब आप्रेशन ग्रीन हण्टद्यशुरू किया है। इस सैन्य अभियान में लगभग एक लाख फौजियों को लगाया गया है। प्रधान मंत्री द्वारा दिए जा रहे आद्गवासनों के उल्ट तरह-तरह के बहानों के तहत भारतीय वायू सेना इन जंगलों पर क्षपटने के लिए अपने पंखों को तोल रही है।
    हमें बताया गया है कि माओवादी इस देश की अन्दरूनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। ये माओवादी कौन हैं? ये खुद लोग हैं जिन्होंने विभिन्न सरकारों के ख़िलाफ संघर्ष का रास्ता चुना है। भारत की एक के बाद दूसरी सरकार ने कभी भी जिन्हें सम्मान पूर्वक और चैन की जिंदगी नहीं जीने दी। भारतीय हुकूमत अपने ही लोगों की वो ज़मीने छीनना चाहती है जिन पर वे सदियों से रह रहे हैं और इसके लिए उनको हमले की धमकी दी जा रही है। हम सब 'कोलेटरल डेमेज' (सामान्नातर तबाही) शब्द अर्थात्‌ युद्ध के दौरान आम जनता के मारे जाने से भली भांत वाकिफ हैं। सलवा जुडुम के दौरान ग़ैर-ऐलानी जंग में लोगों का कत्ल किया गया था और अब हुकूमत यह सिलसिला ऐलानिया जंग से बड़े पैमाने पर दोहराना चाहती है। वे लागों को कत्ल कर जन प्रतिरोध की कमर तोड़ना चाहती है। ऐसा करके वो आदिवासियों की संसाधनों से भरपूर धरती को लालची विदेशी पूंजीपति मालिकों को भेंट करना चाहती है। वे उस वैकल्पिक विकास को तबाह कर देना चाहते हैं जो लोगों ने कड़ी मेहनत और लगातर संघर्ष के जरिए किया है।
    आओ सोच विचार करें। आओ जागें। आओ आह्‌वान करें। आओ हर जगह लोगों को जागरूक करें। आओ इस बेइन्साफी के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करें। आओ उस सरकार को जंग बंद करने के लिए कहें जिसने लोगों के दुख सुनने, उनकी अकांक्षाओं की कद्र करने और उनकी मांगों को पूरा करने की बजाए अपने ही लोगों के ख़िलाफ जंग छेड़ दी है।
    हुकूमत द्वारा अपने ही लोगों के विरूद्ध ऐलान की गई यह अन्यायपूर्ण जंग लाजमी बंद होनी चाहिए।

अपराध मुक्त बिहार का प्रचार और माफियाओं के मौला

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/27/2009 11:43:00 AM

अपराध मुक्त बिहार का दावा कितना खोखला है, यह हम आगे जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और इन दिनों खुद को नीतीश कुमार का ढोल और भोंपू कहने वाले शिवानंद तिवारी तथा श्याम रजक की जुबानी सुनेंगे. इससे पहले नीतीश की सोहबत में पलने वाले दुर्दांत अपराधियों की सूची पर नजर डाल लें. नीतीश चाहे सांसद रहे हों, रेल मंत्री बने हों या मुख्यमंत्री, इन बाहुबलियों को मदद पहुंचाने में उन्होंने कभी कोताही नहीं की.  

दिलीप सिंह
मोकामा का प्रमुख बाहुबली. नेशनल सिक्यूरिटी एक्ट का आरोपी. नीतीश ने 1989 में बाढ़ से चुनाव जीतने के लिए इसकी मदद ली और जीत भी गये. 1990 में बतौर ईनाम दिलीप को मोकामा विधान सभा सीट से जनता दल का टिकद देकर विधायक बनवाया. लालू राज में मंत्री.

सूरजभान सिंह
मोकामा का एक और बाहुबली. अनेक व्यवसायियों समेत कई राजनीतिक हत्याओं का आरोपी. छोटे-मोटे अपराध करने वाला तथा जुआ खेलने का लती सूरजभान दिलीप सिंह का शागिर्द था. दिलीप सिंह के राजनीति की दुनिया में पहुंच जाने के बाद सूरजभान की हैसियत और खूंखारपन बढ़ता गया. उसने कई चुनावों में नीतीश की मदद की. बाद में मोकामा से निर्दलीय विधायक फिर बलिया से निर्दलीय सांसद बना. इन दिनों रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा में है लेकिन नीतीश-ललन की जोड़ी का पूरा प्रश्रय आज भी इसे प्राप्त है. सरकारी वकील की हत्या के मामले में नीतीश के इशारे पर बचाया गया. गत लोकसभा चुनाव में लोजपा में होते हुए भी मुंगेर में ललन सिंह को जितवाने के लिए हरवे-हथियार के साथ तैनात रहा.

वृजबिहारी प्रसाद
पूर्वी चंपारण के बाहुबली विधायक देवेंद्र दुबे के कत्ल का आरोपी. कामख्या सिंह, विनोद सिंह, ओंकार सिंह, टाइगर मिश्र सरीखे खूंखार अपराधियों की टीम का सरगना. नीतीश और उनके खास सिपहसलार रामाश्रय सिंह बृज बिहारी को राजनीति में लाये. नीतीश कुमार के लिए उसने 1991 के लोकसभा चुनाव में बाढ़ में जमकर उत्पात मचाया. बाद में रेलवे ठेकों के चक्कर में मारा गया. जब तक जीवित रहा नीतीश कुमार का वरदहस्त उसे प्राप्त रहा.     

दुलारचंद यादव
दो दर्जन से ज्यादा हत्याओं का आरोपी. पटना से सटे फतुहा थाना पर हमला बोल कर हथियार लूटने का भी आरोप. नीतीश का अनन्य सहयोगी. लोकसभा चुनाव के दौरान बाढ़ के निकट एक गांव में हुई सीताराम सिंह की हत्या में नीतीश कुमार के साथ धारा 302 और 307 का सहअभियुक्त.

संजय सिंह
सीवान का नामी गैंगेस्टर. नीतीश ने 1995 के चुनाव में जीरादेई से समता पार्टी का उम्मीदवार बनाया. कई-कई बड़े-बड़े ठेके दिलवाये. 1996 के लोकसभा चुनाव में संजय के गुर्गों ने बाढ़ में नीतीश की भरपूर मदद की. अपराध की दुनिया में राजनीतिक के नियम नहीं चलते. उस चुनाव में दिलीप सिंह ने भी नीतीश की काफी मदद की थी. जबकि दिलीप सिंह उन दिनों लालू प्रसाद के साथ था.

अनंत सिंह
बिहार का सबसे दुर्दांत अपराधी. दिलीप सिंह का छोटा भाई. जदयू का मोकमा से विधायक. बाहुबली सूरजभान (सांसद, लोजपा) से अब अदवात. छोटे सरकार के नाम से जाने जाने वाले अनंत सिंह के रोंगटे खड़ा कर देने वाले अपराधिक कारनामों से बिहार का बषा-बषा परिचित है. राजनीति में इसकी हैसियत का अंदाजा एक वाकये से लगाया जा सकता है. पिछले दिनों लोकसभा चुनाव के दौरान मुंगेर में ललन सिंह को मदद करने के एवज में सूरजभान सिंह को जदयू में लाने का फैसला किया गया था. अनंत को जब इसकी सूचना मिली तो उसने जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह को ऐसा घुड़का कि दोबारा इस बारे में बात करने की हिम्मत न नीतीश कुमार को हुई, न ही ललन सिंह को. बिहार के सबसे अधिक बिकने वाले हिंदी अखबार में इसके लोग बतौर पत्रकार भी बहाल होते रहे हैं.

मुन्ना शुक्ला
गैंगेस्टर मुन्ना शुक्ला नीतीश कुमार के समर्थन से ही लालगंज से निर्दलीय चुनाव जीत सका था. अगले चुनाव में उसे जदयू का टिकट दिया गया. रेलवे के ठेकों की बदौलत आज अरबों का मालिक.

सतीश, बब्लू, सुनील
वास्तव में नीतीश कुमार की सोहबत में पलने वाले अपराधियों की फेहरिश्त काफी लंबी रही है. वर्ष 2000 के बिहार विधान सभा चुनाव में तो उन्होंने प्रदेश के छंटे हुए अपराधियों को समता पार्टी का प्रत्याशी बनाया था. इनमें सतीश पांडेय, बब्लू देव, सुनील पांडेय आदि तो मोस्ट वांटेड थे. नीतीश अपराधियों का साथ लेते ही नहीं बल्कि उनके मारे जाने के बाद उनके परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेवारी भी उठाते रहे हैं. पूर्णिया जिला के तत्कालीन समता पार्टी के अध्यक्ष बाहुबली बूटन सिंह की पत्नी लेसी सिंह को उन्होंने राज्य महिला आयोग के संवैधानिक पद से नवाजा है. बाहुबली प्रदीप महतो की पत्नी अश्ववमेध देवी को पहले कल्याणपुर से विधायक बनाया फिर गत लोकसभा चुनाव में उजियारपुर से टिकट देकर लोकसभा भेज दिया.

पुस्तिका सुशासन का असली चेहरा से साभार 

जिसकी रोशनी में हम अपना संसार देखें : एरिक हॉब्सबाम की इतिहास की शानदार किताबें, हिंदी में

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2009 07:34:00 PM

संवाद प्रकाशन से विश्व पुस्तक मेला (30 जनवरी, से 7 फरवरी, 2009, प्रगति मैदान, नई दिल्ली) के अवसर पर बीसवीं सदी के सर्वाधिक समादृत इतिहास ग्रंथों की 5 खंडों की श्रृंखला का प्रकाशन हो रहा है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस श्रृंखला के लेखक एरिक हाब्शबाम हैं और अलग-अलग खंडों का अनुवाद हिंदी के प्रमुख इतिहास अध्येता और समर्थ लेखकों, प्रो लाल बहादुर वर्मा, प्रकाश दीक्षित और वंदना राग ने किया है. ये पांचों खंड संवाद की परंपरा के अनुसार पेपरबैक के मुख्य संस्करण में होंगे. लगभग 1800 पृष्ठों से अधिक के इन पांचों खंडों का मूल्य 1500/- है, पुस्तक मेले में यह श्रृंखला 1100/- के विशेष रियायती मूल्य पर उपलब्ध होगी. प्रस्तुत है, इस श्रृंखला के लिए आलोक श्रीवास्तव की भूमिका.

एरिक हॉब्सबाम ने वह लकीर खींच दी है, जिस पर बहस आगे चलेगी. भविष्य का कोई इतिहासकार इसकी अनदेखी नहीं कर पाएगा.'
- द इकानामिस्ट


एरिक हाब्सबाम की यह इतिहास-श्रृंखला पिछली कुछ सदियों के इतिहास पर आधारित है, बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस श्रृंखला की पुस्तकें इतिहास के भू-स्तरों का उत्खनन करती है- तारीखों, व्यक्तियों, घटनाओं की ऊपरी पर्तों के नीचे दबी उन प्रक्रियाओं को सामने लाती हैं, जो घटनाओं, व्यक्तियों और उनके इतिवृत्तों में प्रतिफलित होते हैं.
यह श्रृंखला शुरू होती है 1789 की फ्रांसीसी-क्रांति और इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति से़ एक क्रांति ने दुनिया के वैचारिक विन्यास को नया मोड़ दिया तो दूसरी क्रांति ने उत्पादन और वितरण के उन प्रारूपों को निर्मित किया, जिनसे विश्व का आर्थिक ढांचा, राजनीतिक समीकरण और समाज-व्यवस्था परिवर्तित हुई़ गत दो सौ वर्षों के इस इतिहास ने व्यक्तियों के विचार और परिधान तक बदल दिए.
मनुष्यों के संबंधों, भावनाओं और जीवन-लक्ष्यों तक को गतिशील कर दिया़. यह इतिहास जो मुख्य रूप से पूंजीवाद और इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यवाद का इतिहास रहा है, बीसवीं सदी में इसने आतरेकों का रूप लिया. ये अतिरेक मानव-जीवन के प्रत्येक आयाम में घटित हुए हैं. हाब्शबाम ने जिस कालखंड का इतिहास लिखा है, वह अपने पूर्ववर्ती काल के इतिहास से निम्न बातों में भिन्न है-
1- अपनी गति में
2- अपने गुणात्मकं परिवर्तन में
दुनिया हमेशा आगे बढ़ती रही है, पर फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिकं-क्रांति के पहले इतिहास की गति हमेशा मंथर रही, इतनी मंथर कि इसने जन-सामान्य के जीवन पर असर ज़रूर डाले, पर उसे आमूल आलोड़ित कभी नहीं किया़. इतिहास की यह मंथर गति दुनिया को बदलती भी रही, पर इस तरह से नहीं कि थोड़े से ही वर्षों में जीवन-शैली से लेकर सामाजिक ढांचे तक में इतने बड़े बदलाव हो जाएं कि गुज़रा ज़माना पहचान में ही न आए. अतः हाब्शबाम की यह पुस्तक गुज़रे ज़माने का इतिवृत्त नहीं है, न ही यह उन अर्थों में मार्क्सवादी पद्धति से जनता के इतिहास के निर्माण का उपक्रम है, जो हमारी सदी के इतिहास-लेखन का एक मुख्य आधार रहा है. एक रूपक में कहें तो यह इतिहास के महासमुद्र में उतरे एक गोताखोर द्वारा देशों गए दृश्यों का तरतीबवार, विहंगम, गहन और जीवंत पर्यवेक्षण है.
यह पुस्तक उत्प्रेरित नहीं करती और न ही इतिहास-निर्माण' के लिए किसी स्थूल प्रेरणा का सृजन करती है. इस पुस्तक का लक्ष्य मात्र यह है कि गुजरी दो सदियों के उस इतिहास को जो जटिलतम और बहुस्तरीय होता गया है- सही दूरी और सही दृष्टिकोण से देखा जा सके- उसके सभी आयामों और विस्तारों को़ एक और रूपक इस बात को समझने के लिए उपयोगी हो सकता है़. वनस्पति-विज्ञान की प्रयोगशाला में जिस प्रकार पौधों की टहनियों को क्षैतिज या अनुप्रस्थ काट की पतली परतों में सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है, उसी प्रकार इतिहास की अनुप्रस्थ काट इन चारों खंडों में है़.


यह पुस्तक मूलतः यूरोप के बारे में है, क्योंकि इन दो सदियों में यूरोप ही उस समस्त ऐतिहासिक प्रक्रिया का स्रोत और उत्स रहा है, जिसने समूचे भूमंडल के इतिहास को गतिशील किया, उसे स्वरूपित किया है. हालांकि एशिया, लातिन अमरीका आदि के संदर्भ और विवरण इन सभी खंडों में हैं, पर यह मूलतः यूरोप के इतिहास को प्रस्तुत करने वाली श्रृंखला है. निश्चित रूप से दुनिया के अन्य भू-भागों में इन दो सदियों में इतिहास ने बड़ी करवटें लीं , खुद हमारे देश भारत में यह दो सदियों का कालखंड- उपनिवेश बनने से आरंभ होता है़ जिस समय यूरोप में फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिक-क्रांति का ईंट-गारा इकट्ठा हो रहा था, भारत में 1757 के प्लासी-युद्ध को जीतने के बाद अंग्रेज़ी राज मजबूत हो रहा था. यह इतिहास घट भारत में रहा था, पर निश्चित रूप से यूरोप में हुई पूंजीवादी क्रांति और उससे जनमे साम्राज्यवाद की परिणति था. फिर और आगे, 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रकाशन हुआ, पूरा यूरोप आसन्न क्रांति की लपटों से घिरा रहा और पेरिस कम्यून के रूप में एक क्रांति हुई ठीक उसी कालखड में साम्राज्यवाद के विरुद्ध- किसी भी मायने में फ्रांसीसी-क्रांति से कम नहीं- एक महाविद्रोह भारत में हुआ. इसकी प्रेरणाओं, घटकों और विवरणों से इतिहासकार, बुद्धिजीवी या अकादमीशियन जो कुछ भी सिद्ध करते रहें- यह ऐतिहासिक सच है कि यह मात्र विफल विद्रोह न था- भारत से सचमुच अंग्रेज़ी राज खत्म कर दिया गया था, 1857 का युद्ध हिंदुस्तानियों ने- वे सिपाही रहे हों या किसान या राजे-रजवाड़े, सामंती शक्तियां रही हों या पिछड़ी अर्थ-व्यवस्था के नुमाइंदे- जीत लिया था, हां इस जीत को वे कुछ माह से अधिक बनाए न रख सके. यदि यह जीत स्थाई हो सकी होती- और इसके स्थाई हो सकने में निर्णायक कुछ  ही मामूली बातें आड़े आईं- यदि पटियाला नरेश और नेपाल के राणा का विपुल-सक्रिय सैन्य और संसाधनगत सहयोग अंग्रेज़ों को न मिला होता तो ब्रिटिश राज भारत में पुनःस्थापित कभी न हो पाता- तो इसके असर बहुत दूर तक जाते़ ब्रिटिश-साम्राज्य के उस समय भारत से खात्मे ने समूची दुनिया में ब्रिटिश साम्राज्य को खत्म किया होता, यूरोपीय क्रांतियों का भविष्य उससे तय होता और मरणासन्न ब्रिटिश-साम्राज्य के गर्भ से अमरीकी साम्राज्यवाद कभी जन्म नहीं ले पाता. 1857 का दुनिया के आधुनिक इतिहास पर फ्रांसीसी क्रांति से कम असर कतई न पड़ता, क्योंकि पूरी दुनिया उस समय अलाव पर थी. यूरोप पर कम्युनिज़्म का प्रेत मंडरा रहा था' (इस वाक्य से कम्युनिस्ट मेनीफ़ेस्टो की शुरुआत होती है) जो लोग 1857 को स्थानीय गतिविधि और राजे-राजवाड़ों तक सीमित कर देखते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि वह एक ऐसा कालखंड था, जब पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से रची दुनिया का इतिहास अंतर्ग्रंथित हो चुका था और इतिहास की हर बड़ी घटना- वैश्विक संबंधों और दुनिया के ढांचे को एक सिरे से दूसरे सिरे तक खड़खड़ा देती थी़. बहरहाल, हाब्शबाम की यह श्रृंखला इतिहास के इसी अंतर्ग्रंथन का बहुविध प्रगटीकरण है. अतः इसके अधिकांश पन्ने भले ही यूरोपीय इतिहास की घटनाओं ने घेर रखा हो, पर यह अपने सार रूप में विगत दो सदियों के उस समूचे आलोड़न को अपने भीतर समाहित किंए हुए है, जिनके परिणामों की श्रृंखला से हमारा समय और समाज बना है. हमारी भावनाएं, हमारे विचार, हमारे दैनिक जीवन के संघर्ष और हमारी प्रेरणाएं उद्भूत हैं.
इस श्रृंखला में गहरे उतरना एक तरह से अपने अस्तित्व की जड़ों में जाने जैसा है, हम 21 वीं सदी में जी रहे लोग, चाहे वे एशिया में हों, यूरोप में या ग्लोब के किसी भी हिस्से पर- हम एक साझे इतिहास की निर्मिति हैं, इसे इतिहास का संयोग या इतिहास की अनिवार्यता जो भी कहें- यह साझा इतिहास- पूंजीवाद के उदय के बाद से एक ओर तो यूरोप से संचालित हुआ है, दूसरी ओर यह नित्य वैश्विक होता गया है. इसके इन दोनों अभिलक्षणों को इतनी संपूर्णता और परिपक्वता के साथ अब तक किसी इतिहासकार ने प्रस्तुत नहीं किंया है. वे सजग पाठक जो इतिहास के अध्ययन में संस्कारित हैं, या विचारों की दुनिया से जुड़े रहे हैं, उन्हें अनेक स्थलों पर लेखक से असहमत होने का मौका मिलेगा, शायद कहीं-कहीं दृष्टिदोष भी मिलें, लेखक की देशकालगत सीमाएं भी उजागर होती दिखेंगीं, पर यह याद रखना ज़रूरी है कि यह पुस्तक जनपक्षधरता की घोषणावाली शब्दावली में भले न लिखी गई हो, पर इतिहास की सहस्रों घटनाओं और उनकी व्याख्यापरक प्रस्तुति के पीछे बीसवीं सदी का वह दिमाग़ ही काम कर रहा है, जो मनुष्य और राष्ट्रों की मुक्ति को, उनकी गरिमा और स्वतंत्रता को विचारों और स्वप्नों की दीर्घा से देखता रहा है, उसके लिए विकल, प्रयत्नशील रहा है. इसलिए यह किताब हमारे पुरखों की दुनिया का एक मुकम्मल अनुभव हमारे भीतर संचरित करती है, जिसकी रोशनी में हम स्वयं को और अपने इस संसार को अधिक स्पष्ट और प्रामाणिक रूप से देख सकंने के योग्य बनते हैं.


अदालती निर्णय पर कानूनी मुहर का प्रश्न : एक बहस

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2009 04:39:00 AM

अंजलि सिन्हा
 
अगस्त, 1997 में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था जिसे विशाखा जजमेंट के नाम से जाना जाता है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को लेकर इस फैसले ने दिशानिर्देश जारी किए थे। पिछले दिनों न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने इस फैसले को लेकर एक अलग ढंग का सवाल उठाया। उनका कहना था कि क्या कोर्ट को ऐसे दिशानिर्देश देने का अधिकार है? क्या कोर्ट अन्तरिम तौर पर संसद की भूमिका निभा सकता है। रैगिंग व छात्रसंघ चुनाव के मामले को संविधान पीठ को विचारार्थ भेजते हुए जस्टिस काटजू ने ये बातें रखीं। यह मामला न्यायालय क्षेत्र के अन्दर का है या बाहर का, यह कानूनविद तय करते रहें, लेकिन कामकाजी महिलाओं के नजरिये से देखें तो इस जजमेंट का महिला कर्मियों के लिए विशेष महत्व है। इन दिशानिर्देशों के चलते ही कई स्थानों पर कामकाजी महिलाओं को कार्यस्थल की उत्पीड़नकारी परिस्थितियों से लड़ने या उत्पीड़कों को दंडित कर पाने का रास्ता मिला। लेकिन क्या यह अधिक विचारणीय प्रश्न नहीं होना चाहिए कि क्यों बारह साल से अधिक समय से महिलाओं के लिए कार्यस्थलों की सुरक्षा का मुद्दा इस जजमेंट के सहारे ही चलता रहा है। ज्ञात हो कि विशाखा जजमेंट सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तब दिया गया था जब उसके सामने विशाखा बनाम राजस्थान सरकार का मसला आया था। यह मसला राजस्थान के महिला कल्याण के कार्यक्रम ‘महिला सामाख्या’ में कार्यरत एक साथिन भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना से जुड़ा था। भंवरी देवी बलात्कार कांड ने उस दौर में तमाम महिला संगठनों को उद्वेलित किया था और उसे न्याय दिलाने के लिए देश भर में जबर्दस्त प्रदर्शन हुए थे। भंवरी ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए गांव में एक दबंग परिवार में बाल विवाह रोकने के लिए थाने में शिकायत की थी जिससे नाराज उक्त परिवार के चार लोगों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया था। मामला बाद में कोर्ट में पहुंचा और उसने कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया था कि हर महिला कर्मचारी का कार्यस्थल पर यौनहिंसा से बचाव उसका संवैधानिक अधिकार है और इसे सुरक्षित करने की जिम्मेदारी मालिक तथा सरकार दोनों पर डाली गयी। हमारा संविधान बिना जेंडर, जाति, नस्लभेद के कोई भी पेशा चुनने का अधिकार देता है तथा साथ में अपने हर नागरिक के लिए गरिमामय जीवन जीने का हक भी देता है। संविधानप्रदत्त इन्हीं अधिकारों के आधार पर यह जजमेंट दिया गया था। इसी के बाद से कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाने के लिए अलग से स्पष्ट कानून की मांग होती रही है। यघपि सरकार को यह काम स्वत: ही पहल लेकर करना चाहिए था क्योंकि भारतीय समाज में व्याप्त असुरक्षित माहौल से समाज और सरकार अनभिज्ञ नहीं है। जैसे-जैसे महिलाओं का सार्वजनिक दायरे में प्रवेश बढ़ता गया है वे उतनी ही बड़ी मात्रा में यौन हिंसा का शिकार होती गयी हैं। यूं घर-बाहर के अन्य सामाजिक क्षेत्र भी सुरक्षा के लिहाज से संकटग्रस्त ही रहे हैं, लेकिन नौकरीवाली जगह को विशेषत: सुरक्षित बनाने के लिए जवाबदेही तय करनेवाली बात थी। जानने योग्य है कि विशाखा जजमेंट के तुरन्त बाद तत्कालीन सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश भर के संस्थानों तथा शिक्षण संस्थानों को निर्देश जारी किया (13 अगस्त 1997) कि सभी संस्थान तथा मालिक अपने यहां यौन हिंसा से बचाव के लिए गाइडलाइन तैयार करें। यह भी जानने योग्य है कि इसी जजमेंट को आधार बनाते हुए दिल्ली में जेएनयू तथा दिल्ली विश्वविघालय ने अपने यहां अधिनियमों का निर्माण किया है। छात्रों-कर्मचारियों-शिक्षकों की जागरूकता के चलते इस पर एक हद तक अमल भी करना पड़ा है, कई यौन उत्पीड़क अध्यापक-कर्मचारी दंडित भी हुए हैं लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सरकार तो मात्र निर्देश जारी करके निश्ंिचत हो गयी जबकि उसे इस जजमेंट के बाद खयाल आना चाहिए था कि इसे कानूनी शक्ल दी जाए। यह गाइडलाइन हैं और निश्चित ही उसकी सीमाएं हैं। मालिक, अभियोजक/ एम्प्लॉयर या कोई भी अन्य संस्थान बाध्य नहीं है कि अपने यहां यौन उत्पीड़न विरोधी कमेटियां बनाए ही या बचाव का उपाय न करने पर सजा का प्रावधान हो। जस्टिस काटजू के सवाल ने इस मुद्दे की तरफ नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। अब सरकार को बताना चाहिए कि वह कब तक बिना कानून के सिर्फ अदालती जजमेंट के आधार पर कामचलाऊ रवैया अख्तियार किए रहेगी। कोर्ट ने कम से कम अपने फैसले के आधार पर महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल मुहैया कराने का प्रयास किया, लेकिन इस मामले में कानूनी बाध्यतावाली जवाबदेही संसद और प्रशासन को ही सुनिश्चित करनी है। अब न्यायालय अपने लिए जो रास्ता तय करे किन्तु उसका यह कदम जनहित में था और कोई भी प्रगतिशील न्यायप्रिय तथा बराबरी में विश्वास रखनेवाला व्यक्ति इसे जरूरी कदम मानेगा।

शांति को दोबारा परिभाषित करते ओबामा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/25/2009 04:00:00 AM


महेश राठी
यदि क्रूरता और बर्बरता शांति और जनवाद की परिभाषा बन जाए, जंग शांति का घोषित औजार हो जाए, आसमान से बमों के साथ ब्रेड की बरसात ही नए विकास का मानवीय चेहरा हो, तो बराक ओबामा  को शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाना निश्चय ही न्यायोचित होगा, परंतु विडंबना यह है कि गांधी और मार्टिन लूथर किंग को तथाकथित रूप से अपना आदर्श मानने वाले और अमेरिकी जनता की युद्ध विरोधी भावना के साथ सहानुभूति पर दस माह पहले राष्ट्रपति बने बराक ओबामा  की कूटनीतिक बयानबाजी में विश्व शांति के प्रयास ढूंढने वाले लोग या तो अति कल्पनाशील हैं या किसी खास राजनीतिक एजेंडे पर काम करने वाले। अफगानिस्तान में तीस हजार सेना बढ़ाने, पाकिस्तान में अपनी सेना उतारने की चेतावनी और वॉशिंगटन से ही अफगानिस्तान की सत्ता बदलने की धमकी देने वाले जंगी राष्ट्रपति की कहानी जन्म से लेकर अब तक बहकने, संभलने सीनेटर और पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनने की शानदार उपलब्धियों वाली तो है, परंतु उसके लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया जा सके, उसमें ऐसा कुछ भी नही। शांति के लिए युद्ध की जरूरत समझाने वाले ओबामा  निश्चय ही जोशीले भाषण करने वाले अच्छे वक्ता हैं, परंतु यह भी कड़वी सच्चाई है कि अभी तक उन्होंने कूटनीतिक भाषण करने के अलावा शांति के लिए किया भी कुछ नहीं है। 2012 तक अमेरिकी परमाणु हथियारों में कटौती का मसौदा जनवरी, 2008 में ही तैयार हो चुका था। यदि आज भी हथियारों की बात हो तो जनसंहार के सबसे अधिक हथियार आज भी अमेरिका के पास ही है। चाहे रासायनिक हथियार हों, जैविक हथियार या परमाणु हथियार अमेरिका के पास ही दुनिया में उन हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा है और अभी तक दो बार इस्तेमाल होने वाले अणु बमों का श्रेय भी उसी के खाते में है। तब दुनिया की शांति को वास्तविक खतरा किससे है और वास्तविक शांति दूत कौन और खतरे के संचालक कौन? एक अनुमान के अनुसार, दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 11,000 करोड़ डॉलर से भी अधिक हो चुका है, जो शीतकाल के कुल खर्च को भी पीछे छोड़ रहा है। इसमें अकेले अमेरिका की भागीदारी 5,000 करोड़ डॉलर से भी अधिक है। वर्तमान अन्तरराष्ट्रीय सहायता खचोंर्ं से लगभग 15 गुना अधिक सैन्य बजट में वृद्धि हथियार उघोग में आये उछाल के चलते है, जो शस्त्र निर्माण में संलग्न 100 शीर्ष निगमों द्वारा हथियारों की बिक्री बढ़ाने की कोशिशों व रणनीति का नतीजा है। 2000 में 1,570 करोड़ डॉलर का व्यवसाय करने वाली शीर्ष कंपनियों ने 2004 में 2,680 करोड़ डॉलर का व्यवसाय किया, यानी लगभग 60 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी केवल चार वषार्ें में हथियारों की यह बढ़ोत्तरी सामरिक संघर्षों को बढ़ा रही है, ऐसे में ओबामा  का कौन-सा प्रयास है, जिसे शांतिवाहक कहा जाए! अमेरिका के तथाकथित आतंकवाद के खिलाफ युद्ध अभियान से आज पूरी दुनिया को खतरा है, बावजूद इसके पूरी दुनिया जानती है कि अपने हितों को साधने के लिए अमेरिका ने ही आतंकवाद को जन्म दिया है। मध्य एशिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा- इजराइल और फिलीस्तीन हैं। इनके बीच जारी संघर्ष अमेरिकी हित-पूर्ति के चलते आज तक नहीं सुलझ पाया है। जनसंहारक हथियारों की खोज में शुरू हुआ इराक पर हमला सात लाख से भी अधिक बेगुनाह लोगों की जानें ले चुका है। इसी आतंकवाद विरोध ने अफगानिस्तान को आदिम युग वाले कबायली दौर में धकेल दिया है। आज इसे सर्वविदित तथ्य के रूप में देखा जा रहा है कि दुनिया में आतंकवाद की उपजाऊ जमीन पाकिस्तान है, जो आज भी भारत और ईरान जैसे पड़ोसी देशों के खिलाफ चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों को शह दे रहा है। इन सबके बावजूद बराक ओबामा  पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि को बढ़ाने वाले बडे़ पैरोकार बनकर उभरे हैं! पाकिस्तान को दी जाने वाली इस सहायता का क्या इस्तेमाल हुआ है और भविष्य में क्या होना है, पिछले दिनों पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ इसे पूरी दुनिया को बता चुके हैं। ओबामा  की यह सहायता पाक में पल रहे आतंक और पाक सेना को मजबूती देकर दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं करेगी। जिस देश की रणनीति के चलते आज पूरे मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और आधे से अधिक अफ्रीका की शांति दांव पर लगी है, उसी देश के राष्ट्रपति को शांति का नोबेल पुरस्कार इस पुरस्कार के निर्णायक मंडल की नीयत पर सवालिया निशान लगाता है, मगर कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति गांधी के इस्तेमाल की बचकाना कूटनीति से तो बाज आएं, क्योंकि गांधी की सोच में हिंसा की पैरोकारी के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी सोच और उनका दर्शन शांति को सतत प्रोत्साहित करता है। इसी वजह से गांधी को आजादी के संदेशवाहक कहा जाता है। गांधी की अहिंसा से आजादी और शांति, दोनों हासिल हो जाती है।

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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