हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

क्या मायावती जाति के विनाश के ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा करेंगीं?

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/30/2009 05:35:00 AM

पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार और समाजवाद के अध्येता शेष नारायण सिंह के विचार। रिजेक्ट मॉल से साभार.


पिछली सदी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के जानकारों में डा. बीआर अंबेडकर का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी के समकालीन रहे अंबेडकर ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश को माना था. उनको विश्वास था कि जब तक जाति का विनाश नहीं होगा, तब तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है। दर असल डॉ बी आर अंबेडकर उन पांच ऐसे लोगों में हैं जिन्होंने भारत के बीसवीं सदी, के इतिहास की दशा तय की.

जाति के विनाश के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाली उनकी किताब,The Annihilation of caste , ने हर तरह की राजनीतिक सोच को प्रभावित किया. है..आज सभी पार्टियां डॉ अंबेडकर के नाम की रट लगाती हैं लेकिन उनकी बुनियादी सोच से बहुत बड़ी संख्या में लोग अनभिज्ञ हैं.सच्चाई यह है कि पश्चिम और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के जो भी आन्दोलन चले हैं उसमें इस किताब का बड़ा योगदान है. यह काम महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने शुरू किया था . उनके बाद के क्रांतिकारी सोच के नेताओं ने उनसे बहुत कुछ सीखा .. डॉ अंबेडकर ने महात्मा फुले की शिक्षा संबंधी सोच को परिवर्तन की राजनीति के केंद्र में रख कर काम किया और आने वाली नस्लों को जाति के विनाश के रूप में एक ऐसा गुरु मन्त्र दिया जो सही मायनों में परिवर्तन का वाहक बनेगा. डॉ अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरू किये गए ज्योतिबा फुले के अभियान को एक अंतर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया.

सत्ता और अंबेडकर के सिद्धांत

The Annihilation of caste में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। जाहिर है कि जाति व्यवस्था का विनाश हर उस आदमी का लक्ष्य होना चाहिए जो अंबेडकर के दर्शन में विश्वास रखता हो। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन आज उत्तर प्रदेश में जो सरकार कायम है, उसके बारे में माना जाता है कि वह अंबेडकर के समर्थकों और उनके अनुयायियों की है। राज्य की मुख्यमंत्री और उनके राजनीतिक गुरू कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और आज सत्ता उनके पास है। इस बात की पड़ताल करना दिलचस्प होगा कि अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोग रही सरकार ने उनके सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिया क्या कदम उठाए है।


उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की पिछले पंद्रह वर्षों की राजनीति पर नज़र डालने से प्रथम दृष्टया ही समझ में आ जाता है कि उन्होंने जाति प्रथा के विनाश के लिए कोई काम नहीं किया है। बल्कि इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर है। दलित जाति को अपने हर सांचे में फिट रखने के लिए तो उन्होंने छोड़ ही दिया है अन्य जातियों को भी उनकी जाति सीमाओं में बांधे रखने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चला रही हैं। हर जाति का भाईचारा कमेटियाँ बना दी गई हैं और उन कमेटियों को मुख्यमंत्री मायावती की राजनीति पार्टी का कोई बड़ा नेता संभाल रहा है। डाक्टर साहब ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके। जाहिर है जब तक समाज जाति के बंधन के बाहर नहीं निकलता आर्थिक विकास का लक्ष्य भी नहीं हासिल किया जा सकता।

एक अजीब बात यह भी है कि मायावती सरकार के कई मंत्रियों को यह भी नहीं मालूम है कि अंबेडकर के मुख्य राजनीतिक विचार क्या हैं उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब का नाम क्या है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का कोई नेता मार्क्स के सिद्धांतों को न जानता हो, या दास कैपिटल नाम की किताब के बारे में जानकारी न रखता हो। उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब The Annihilation of caste के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि वह एक ऐसा भाषण है जिसको पढ़ने का मौका उन्हें नहीं मिला लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की और से उनको मुख्य भाषण करने के लिए न्यौता मिला। जब डाक्टर साहब ने अपने प्रस्तावित भाषण को लिखकर भेजा तो ब्राहमणों के प्रभुत्व वाले जात-पात तोड़क मंडल के कर्ताधर्ता, काफी बहस मुबाहसे के बाद भी इतना क्रांतिकारी भाषण सुनने कौ तैयार नहीं हुए। शर्त लगा दी कि अगर भाषण में आयोजकों की मर्जी के हिसाब से बदलाव न किया गया तो भाषण हो नहीं पायेगा। अंबेडकर ने भाषण बदलने से मना कर दिया। और उस सामग्री को पुस्तक के रूप में छपवा दिया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है।

इस पुस्तक में जाति के विनाश की राजनीति और दर्शन के बारे में गंभीर चिंतन भी है और विमर्श भी। और इस देश का दुर्भाग्य है कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास का इतना नायाब तरीका हमारे पास है, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। डा- अंबेडकर के समर्थन का दम ठोंकने वाले लोग ही जाति प्रथा को बनाए रखने में रूचि रखते है हैं और उसको बनाए रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जाति के विनाश के लिए डाक्टर अंबेडकर ने सबसे कारगर तरीका जो बताया था वह अंर्तजातीय विवाह का था, लेकिन उसके लिए राजनीतिक स्तर पर कोई कोशिश नहीं की जा रही है, लोग स्वयं ही जाति के बाहर निकल कर शादी ब्याह कर रहे है, यह अलग बात है।

इस पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।
अंबेडकर का कहना था कि स्वतंत्रता की अवधारणा भी जाति प्रथा को नकारती है। उनका कहना है कि जाति प्रथा को जारी रखने के पक्षधर लोग राजनीतिक आजादी की बात तो करते हैं लेकिन वे लोगों को अपना पेशा चुनने की आजादी नहीं देना चाहते इस अधिकार को अंबेडकर की कृपा से ही संविधान के मौलिक अधिकारों में शुमार कर लिया गया है और आज इसकी मांग करना उतना अजीब नहीं लगेगा लेकिन जब उन्होंने उनके दशक में में यह बात कही थी तो उसका महत्व बहुत अधिक था। अंबेडकर के आदर्श समाज में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, बराबरी ब्राहमणों के अधियत्य वाले समाज ने उनके इस विचार के कारण उन्हें बार-बार अपमानित किया। सच्चाई यह है कि सामाजिक बराबरी के इस मसीहा को जात पात तोड़क मंडल ने भाषण नहीं देने दिया लेकिन अंबेडकर ने अपने विचारों में कहीं भी ढील नहीं होने दी।

तकलीफ तब होती है जब उसके अनुयायियों की सरकार में भी उनकी विचारधारा को नजर अंदाज किया जा रहा है। सारी दुनिया के समाज शास्त्री मानते हैं कि जाति प्रथा भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीति क विकास में सबसें बड़ा रोड़ा है है, और उनके विनाश के लिए अंबेडकर द्वारा सुझाया गया तरीका ही सबसे उपयोगी है जरूरत इस बात की है कि सभी राजनीतिक पार्टियां इसको अपना मुद्दा बनाए और मायावती को चाहिए कि इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करें।


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देश के कानून छत्तीसगढ मे लागू नही

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/29/2009 05:00:00 AM

हमने सुना कि गृहमंत्री चिदंबरम छत्तीसगढ़ में जनसुनवाई करने जा रहे हैं. वैसे इस राज्य को जनसुनवाइयों का खूब अनुभव है. यहाँ जिस तरह की जनसुनवाइयां होती रही हैं, हाशिया पर उनके बारे में पहले भी लिखा जा चुका है. ‘जन चेतना’ ऐनवायरमेंट सपोर्ट ग्रुप के सदस्य रमेश अग्रवाल द्वारा कुछ जनसुनवाइयों की तफसील यहाँ दी जा रही है. हम उम्मीद करने की कोशिश करते हैं कि राज्य में इतिहास दोहराया नहीं जायेगा. 

जम्मू कश्मीर की तर्ज पर कई कानून राज्य में प्रभावित नही है। छत्तीसगढ पर्यावरण संरक्षण मंडल की कार्यप्रणाली से तो ऐसा ही लगता है कि पर्यावरण संबंधी कानून राज्य पर लागू नही होते। प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण की बेहतरी के लिये भारत सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई है जिसे ई.आई.ए. अधिसूचना 2006 के नाम से जाना जाता है।

इस अधिसूचना की शुरूवात ही इन शब्दों से होती है कि कोई भी उद्योग राज्य अथवा केन्द्र सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना स्थापना संबंधी कोई कार्य नही करेगा। सबसे पहले सरकार के निर्देशानुसार उद्योग के लगने वाले क्षेत्र की व्यापक पर्यावरण अध्ययन रिपोर्ट तैयार करनी होती है। इसके बाद जन सुनवाई होती है और अंत में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय मंजूरी देता है। ( कुच्छ श्रेणी विशेष के उद्योगो के लिये  राज्य सरकार मंजूरी दे सकती है।)

लेकिन छत्तीसगढ राज्य में केन्द्र सरकारी की मंजूरी तो बाद की बात है, बल्कि जन सुनवाई के बहुत पहले ही उद्योगो का अधिकाशं काम पूरा हो चुका होता है। महावीर कोल बेनिफिकेशन का रायगढ की घरघोडा तससील के भेंगारी गांव में पावर प्लांट जन सुनवाई के पहले ही स्थापित हो चुका था। ऐसा नही है कि पर्यावरण विभाग को इसकी जानकारी नही थी। अगस्त 2007 में बिना पर्यावरणीय स्वीकृति निर्माण कार्य जारी रखने पर कंपनी को नोटिस भेज काम तत्काल बंद करने का निर्देश दिया गया। नोटिस पर अमल  हुआ भी या नही, यह जानने की कोई कोशिश पर्यावरण विभाग ने नही की। जन सुनवाई की घोषणा होने के बाद हमने पाया कि पावर प्लांट का काम लगभग पूर्णता की ओर था और अभी भी काम चल ही रहा था। स्थिति की तमाम जानकारी मय सबूत आला अधिकारियों को भेज कर जन सुनवाई रद्द करने की मांग की गई। चुंकि हफ्ते भर बाद ही जन सुनवाई होनी थी और इस बात पर हंगामा खडा हो सकता था, सो आनन फानन में प्लांट का निरीक्षण कर जन सुनवाई के मात्र तीन दिन पहले 28 जुलाई को कंपनी के विरूद्ध कोर्ट में केस प्रस्तुत कर नियमो की खाना पूर्ति कर ली गई। पहले ही विभाग द्वारा किये गये दो सालों से लंबित 22-23 केसों में एक और मामले की बढोतरी कर पर्यावरण विभाग ने अपना पल्ला झाड लिया।  तमाम वैध आपत्तियों और जन आक्रोश को दर किनार कर  संगीनो के साए में 31 जुलाई को जन सुनवाई की औपचारिकता पूरी कर ली गई।

दिनांक 4 अगस्त को एस.ई.सी.एल की छाल कोयला खदान के लिये और  9 अगस्त को जिंदल के सिमेंट प्लांट के लिये भी तमाम नियमों को दरकिनार कर जन सुनवाई पूरी कर ली गई।

कोयला खदान की जन सुनवाई में तो लोगों का आक्रोश चरम सीमा पर था। आम ग्रामीणों की बात तो अलग क्षेत्र के सरपंच तक को जन सुनवाई के बारे में मालूम नही था। आक्रोशित ग्राम वासियों ने एक स्वर में जन सुनवाई कैंसिल करने की मांग करते हुए जन सुनवाई का बहिष्कार कर दिया। लेकिन जिद्द पर अडे अधिकारियों ने पुलिस के बल पर जन सुनवाई की खानापूर्ति कर ही ली।

जिंदल की जनसुनवाई में तो पूरा धनागर गांव ही पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। ऐसी सुरक्षा व्यवस्था तो शायद खतरनाक आतंकवादियो की कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी नही होती होगी। जन सुनवाई तो कानूनन अवैध थी ही। एक और दिलचस्प नजारा यहां देखने को मिला। लोगों को हुक लगाकर बिजली लेना अपराध है की समझाईस देने वाले अधिकारी स्वयं तार में हुक फंसाकर पंडाल में पंखे चला रहे थे। यहां भी लोगो ने जन सुनवाई को नियम विरूद्ध साबित करने में कोई कसर नही छोडी। अधिसूचना का हवाला दिया गया। लेकिन जन सुनवाई का नाटक हर हालत में पूरा करने की कसमें खा कर ही मंच पर बैठने  वाले अधिकारियो पर न कोई असर होना था और न हुआ।

हाल में तीन और जन सुनवाईयों का ऐलान कर दिया गया है। इंड सिनर्जी व एम.एस.पी. स्टील एण्ड पावर लिमिटेड के स्टील व पावर प्लांट के विस्तार के लिए और सिंघल एंटरप्राईजेस के नये स्टील व पावर प्लांट लगाने के लिये। न तो पूर्व में हुई जन सुनवाईयां करवाने का अधिकार छत्तीसगढ बोर्ड  व जिला प्रशासन को था और न इन तीन घोषित जन सुनवाईयां करवाने का।

नियमत: उद्योग द्वारा जन सुनवाई करवाने के लिये जिस दिन आवेदन दिया जाता है उसके सात दिनों की तय सीमा में जन सुनवाई का स्थान व दिनांक घोषित कर समाचार पत्रों में सूचना प्रकाशित हो जानी चाहिये और 45 दिनों के भीतर जन सुनवाई हो जानी चाहिये।

अधिसूचना में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि 45 दिनों की तय सीमा में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जन सुनवाई करवाने में असफल रहता है तो केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय किसी अन्य एजेंसी के द्वारा जन सुनवाई करवायेगा।

लेकिन ऐसा हो नही रहा है। 45 दिनों की बात तो अलग ये जन सुनवाईयां तो 7-8 महीनों बाद हो रही हैं। जन सुनवाई करवाने का अधिकार खो चुका छत्तीसगढ बोर्ड बेशर्मी की सारी हद्दे तोड कर जिला प्रशासन की मदद से जन सुनवाईयां करवा कर कानून का खुला मजाक उडा रहा है।

इंड सिनर्जी  व एम.एस.पी. में जन सुनवाई हुए बिना, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के संरक्षण में  प्लांट  विस्तार का काम युद्ध स्तर पर जारी है। एक की जन सुनवाई इस 29 अगस्त को और दूसरे की  16 सितम्बर को और सिंघल की 19 सितम्बर को होनी है।

कुच्छ दिनों पूर्व ही बोर्ड ने कई स्पंज आयरन उद्योगो का निरीक्षण कर प्लांट बंद करने का नोटिस दिया था। ताज्जुब की बात है कि इन उद्योगो द्वारा फैलाया जा रहा प्रदूषण ही केवल बोर्ड को नजर आया लेकिन उसी परिसर में बिना मंजूरी और बिना जन सुनवाई विस्तार कार्य निरीक्षण टीम को दिखाई नही दिया। जाहिर सी बात है आंखे जरूर बोर्ड की होती है लेकिन  चश्मा उद्योगों का होता है। वही देखती हैं जो उद्योग दिखाना चाहते हैं।

अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि रायगढ जिले के अधिकांश स्पंज व पावर प्लाटों के खिलाफ कोर्ट में केस चल रहे हैं। इनमें इंड सिनर्जी, एम.एस.पी और सिंघल भी शामिल हैं।  कुच्छ ऐसे भी आदतन  है जिन पर दो दो केस चल रहे हैं। नोटिसों की गिनती तो शायद बोर्ड स्वयं भी नही बता पायेगा। अहम सवाल है कि  बोर्ड ने दोषी मानकर ही उद्योगो के खिलाफ कोर्ट में मामले दायर किये होगे,  तो उन्ही दागी उद्योगो को विस्तार या नया प्लांट लगाने की अनुमति क्यों ?  चाकू से हत्या के आरोपी को तोप का लाइसेंस देना कितना जायज है ? बोर्ड की फैलायी गंदगी को न्यायालय  क्यों साफ करे। वो भी तब जबकि कानून ने स्वयं बोर्ड को अधिकार दे रखे हैं कि वह प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगो को बंद करवा सकता है। मामले को अदालत ले जाने के पीछे मंशा ही यही है कि उद्योगो को कोई फौरी नुकसान न हो। हमारे देश की अदालतों का हाल सब जानते हैं। पहले से ही केसो की भरमार से ओव्हरलोड अदालत में मामला जाने का मतलब है दोषी उद्योगो को वर्षो के लिये राहत। सन 2005 में दाखिल 18-20  मुकदमों मे आज तक एक का भी फैसला नही हो पाया है और न ही तत्काल भविष्य में होने की उम्मीद दिखती है। अगर एक आध मामले में किसी को दोषी मान सजा सुना भी दी गई तो हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने में सभी सक्षम है। 5-10 साल वहां लग जाना कोई बडी बात नही है। लेकिन उन निर्दोष ग्रामीणो और आम जनता को क्या राहत मिली जो वर्षो से चिमनीयों के जहर उगलते धुंए से तिल तिल कर हर दिन हर पल मौत की ओर बढने को मजबूर हैं। जमीन उद्योगो के पास चली गई, जो बच गई वो किसी काम की नही रही।

ऐसा नही है कि केवल पर्यावरणीय कानून ही छत्तीसगढ पर लागू नही होते। वन संरक्षण संबंधी कानूनों का भी यही हाल है। साल डेढ साल पहले वन महकमे को भी निरतंर उजडते जंगल और राख से जले पेडो की चिंता हुई। लगभग सभी स्पंज आयरन कारखानों को वन संरक्षण अधिनियम के तहत नोटिस तामील कर केस दर्ज किये गये। साहब के दरबार में उद्योगपतियों ने कई बार हाजिरी भी दी। मामले पेशी दर पेशी खिसकते रहे। कभी साहब नही तो कभी किसी बडे अधिकारी का दौरा। पेशी बढाने के लिये कारणों की कमी आडे नही आती।

चुल्हा जलाने के लिये जंगल से चार लकडी लाने वाले पर सख्त कार्यवाही करने वाला वन विभाग एम.एस.पी जैसे बडे उद्योग के खिलाफ कोर्ट में मामला हार गया। मामला ऊपरी अदालत में ले जाने की बात तो दूर, पूरी फाईल ही आफिस से गायब हो गई। प्लांट से सटे वन विभाग के मुनारे बहुत कुछ कह रहे हैं पर लगता है वर्षों से अधिकारियों के कदम इन घने जंगलो में नही पडे।    

खुले आम कानून से खिलवाड कर जिस गुंडागर्दी से बोर्ड छत्तीसगढ में जन सुनवाईयां करवा रहा है, उनसे जिस कदर जन आक्रोश बढ रहा है वो किसी भी दिन उग्र हो कर प्रदेश की शांति व्यवस्था के लिये घातक हो सकता है। इंड सिनर्जी का यह पहला विस्तार नही है। पहले  विस्तार के लिये भी जन सुनवाई हुई थी, जिसमें भारी हंगामा हुआ था। कई गंभीर आरोप कंपनी पर लगे थे लेकिन तमाम आपत्तियों को दर किनार कर पहले राज्य सरकार ने और फिर केन्द्र सरकार ने विस्तार की अनुमति दे दी। कुच्छ माह पहले रायगढ जिले की तमनार तहसील में कोल मांईस की जन सुनवाई के दौरान जिस बहिशाना तरीके  से ग्रामीणॉं को लाठियों से पीटा गया वो घाव अभी भरे नही हैं। किसी जन सुनवाई में अगर गोलियां भी चल जाए तो आश्चर्य नही होना चाहिये। 

अब वे खाकी से रंगेंगे पूरा कैनवास : साथी रणेंद्र की कविताएँ

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/28/2009 04:59:00 AM

साथी रणेंद्र की इन कविताओं को पढ़ते वक्त हम उत्पीडन और फासीवाद की उन वैश्विक परम्पराओं से रू-ब-रू होते हैं जो हमारी सत्ता के ज़रिये हम तक भी पहुँच रही है, और हमें इदी अमीन जैसा किसी को चुनने पर हर पांच साल पर विवश होना पड़ता है. पढ़िए इन कविताओं को और डरिये...लेकिन (और अगर आप भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त कवि नहीं हैं तो) इसके बाद उठिए भी. इन हालत के खिलाफ संघर्ष के लिए.


सलवा जुडुमः छह कविताएँ





1
अब वहाँ आकाश नीला नहीं है
न जंगल हरा
न नदियाँ साँवली
न धरती गोरी

बादशाह सलामत ने
 खुरच लिए रंग सारे

अब वे
खाकी से रंगेगे
पूरा कैनवास


2
निचोड़े जा रहे हैं
हरे साँवले जंगल

जमा किया जा रहा है
विशालकाय गढ्ढे में
जीवन-रस

जिसमें
धोई जानी हैं
खाकी वर्दियाँ


3

‘शिकारी आयेगा
दाना डालेगा
लोभ से फँसना नहीं’

यह गीत पंछी नहीं
बहेलिए गा रहे हैं

इरादे बिल्कुल साफ हैं
पंछी विहीन होना है
जंगल को ...
...आकाश को



4
बर्बरता, दानवता, पशुता,
वहशत, हैवानियत, क्रूरता
उत्पीड़न, अनाचार, नृशंसता
आदि-आदि भयावह शब्द सारे

दौड़ते-भागते आए
साँवले जंगल के मुहाने तक
वहाँ खाकी वर्दी को देखा
और शरमा गए



5
जंगलों के ऊपर छाया
यह काला विषैला धुँआ
धुँआ नहीं
बादशाह सलामत की काया की
छाया भर है

बेचैन हैं हुजूर बहादुर
कुछ ढूँढ रहे हैं
चप्पे-चप्पे पर है
उनकी नजर

कई नाम हैं
बादशाह सलामत के
इतिहास के पन्नों से लेकर
भविष्य की पुस्तकों तक
सैकड़ों-हजारों नाम

हम कोई भी एक
चुन सकते हैं...
जैसे ईदी अमीन

अब हम उनकी परेशानी का सबब
ठीक-ठीक समझ सकते हैं

हुजूर की दीर्घतम काया से भी
दीर्घ, भीषण, तीव्र भूख ही
उनकी परेशानी बेचैनी है
और खाली पड़ा है फ्रिजर
एक कोना भी नहीं भरा है
ताजे नरगोश्त से



6
बादशाह सलामत को
‘संस्कृति’ से बहुत प्यार है
प्यारे लगते हैं कवि, आलोचक
कथाकार, संस्कृतिकर्मी बुद्धिजीवी सारे
सम्मानों, पुरस्कारों, पदकों से लकदक

बहुत अच्छी लगती हैं
पद, गीत, कवित्त, चैपाईयाँ
दोहे, पहेलियाँ, मुकरियाँ, सवाईयाँ

छन्द का बंध बहुत भाता है
हुजूर बहादुर को

तुकों और तुकबन्दियों की तो
पूछिए मत
झूमने लगते हैं
दरबार और दरबारी

अब यहूदीवाद का तुक मिलाकर देखिए
उसी वजन का काफिया
स्वराघात, मात्रा, छन्द, बन्ध, राग, लय सब
फिर देखिए हुजूर बहादुर का रंग
उल्लास, उमंग

फड़फड़ाने लगती हैं मूछें
तड़पने लगती हैं
बाहों की मछलियाँ
पूरी काया में स्फुरण
उज्ज्वल भाल पर स्वेदकण

खुद व खुद आ जाती है तलवार
म्यान के बाहर
वही चमचमाती तलवार
आबदार!
आदिम रक्त पिपासु

अदेर किए कूच करती
चतुरंगी सेना
हाथी घोड़ा पालकी
जय कन्हैया लाल की

‘अन्य’ की तलाश में
युगों से जुटी गुप्तचर एजेंसियाँ

माटी के ढूँहों, खेतों के पार
साँवले जंगलों के बीच
माटी के गाँव हैं
जहाँ माटी के गीत गाते
माटी के बेटे साँवले, काले, कुरूप
यही हैं, यही हैं, गद्दार राष्ट्रद्रोही
पापी पातक ‘अन्य’

सर्वव्यापी ईश्वर ‘बाजार’ में
नहीं जिनकी आस्था
जिसकी पूजा-अर्चना-आराधन
से रहते है दूर
हिकारत से भरे पापी कृतघ्न

नया देवता नव्य ईश
साक्षात परम ब्रह्म
जिसके गोद में लहराता है
लुब्ध मध्यवर्ग का जन ज्वार
टीवी, फ्रिज, एयरकंडीशनर
वाशिंग मशीन, लैपटॉप, कार
फ्लैट, ब्रान्डेड कपड़े, ऐशो आराम अपरम्पार
मीलों लम्बी जिसकी
चमचमाती लिस्ट के साथ सोया
यौन सुख में डूबा
अघाया मध्यवर्गीय धार
जिसके सित्कारों से
अश्लील हो गई हैं
दसों दिशाएँ
जिनमें कर रहा सौन्दर्य सन्धान
नया भगवान
जिसकी उँगलियों की डोर में
बँधी सारी पुतलियाँ

इन लहरों से दूर
सूखा असिंचित साँवला जंगल
बुदबुदाता गाता गुनगुनाता
साँप काटे का मंत्र
या प्रतिकार-प्रतिरोध का गीत
यही है, यही है गद्दार, राष्ट्रद्रोही
पापी पातक ‘अन्य’

हुलका कर, ललकार कर
घेर कर हाँक कर, चिन्हित कर लेगी सेना
उतारेगी अन्तहीन गहरी काली सुरंग में
फिर पूरी तहजीब
और सलीके से
भरी जायेगी मिट्टी
रोपे जायेंगें सूर्ख गुलाब

जैसा सन् चैरासी में
बड़े पेड़ के गिरने से
धरती हिली खुली सुरंग
या दो हजार दो में
क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया
ठीक-ठीक वैसे ही
पहचाना गया है ‘अन्य’ को
सारी सावधानी और महीनी के साथ

हाइपर एक्टिव हैं
सम्मानों, पुरस्कारों, पदकों
से लकदक लदे अतिविनम्र
कविगण, आलोचक, कथाकार
संस्कृतिकर्मी बुद्धिजीवी सारे
शोक संदेशों, भाषणों,
प्रेस विज्ञप्तियों के प्रारूपण में
व्यस्त, अति व्यस्त,
पसीने से लथपथ
कई-कई पाठ कर चुके
बस आखिरी प्रारूप बाकी है।

बच्चों के अधिकारों का ढोंग और अमेरिकी जेलें

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/27/2009 05:00:00 AM


कुछ समय पहले मंथली रिव्यू में छपे एक लम्बे लेख में बताया गया था कि दुनिया में जितने कैदी हैं, उनमें से चौथाई अमेरिकी जेलों में हैं. उनमें भी बहुसंख्या अश्वेत लोगों की है. आर्थिक संकट के बढ़ने के साथ ही जेलों में बढ़नेवाले कैदियों की संख्या में भी भरी इजाफा हुआ है, और यहाँ मार्क्स याद आते हैं. सुभाष गाताडे बता रहे हैं अमेरिकी जेलों में बंद बच्चों की स्थिति और आमतौर पर अमेरिकी जेलों की स्थिति के बारे में. हम कोशिश करेंगे मंथली रिव्यू के उक्त आलेख को हिंदी में प्रस्तुत करने की. साथ ही भारत में भी ऐसे एक अध्ययन की सख्त ज़रुरत है.

अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में पिछले दिनों बच्चों और किशोरों के एक हिस्से के भविष्य से जुड़ी चन्द अहम याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हुई। बाल्यावस्था या किशोरावस्था (जुवेनाइल) में किये गये अपराध के लिए ताउम्र बिना किसी पैरोल के जेल में सजा काटने के लिए अभिशप्त इन बन्दियों के माता-पिताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के संयुक्त प्रयासों से अदालत के सामने आयी इन याचिकाओं के बहाने अमेरिकी आला अदालत इस मसले पर विचार करेगी कि ऐसा कदम कहीं असंवैधानिक और सख्त तो नहीं है। फिलवक्त अमेरिकी जेलों में 1,700 से ज्यादा ऐसे बंदी सजा भुगत रहे हैं जो अपनी बाकी उम्र उस अपराध के लिए जेल में ही बिता देंगे जो उन्होंने बाल्यावस्था या किशोरावस्था में किया था। इस दौरान उन्हें पैरोल पर भी रिहा नहीं किया जाएगा। इनमें से कुछ बंदी तो ऐसे हैं, जिन्हें उस वक्त गिरफ्तार किया गया जब वे मात्र तेरह साल के थे। गौरतलब है कि अपने आप को जनतंत्र का प्रहरी बताने वाले अमेरिका के अलावा दुनिया के बाकी किसी देश में बच्चों और किशोरों को इस कदर दंडित करने का कानून सम्मत नहीं है। दरअसल बालपन या किशोरावस्था में किये गये अपराधों के बारे में अधिकतर मुल्कों की न्याय प्रणालियां ज्यादा सहानुभूतिपूर्वक ढंग से सोचती हैं। यहां तक कि तमाम मुल्कों में- जिनमें भारत भी शामिल है- बाल अपराधी का वास्तविक नाम उजागर करने पर पाबन्दी है। यह समझा जाता है कि आवेश में, गुस्से में उसके द्वारा किये गये अपराध की सजा उसे बाकी उम्र भुगतनी न पड़े, इसलिए उसे बाल सुधार गृह में रखा जाता है। यह अलग बात है कि प्रशासनिक लापरवाही या समाज की बेरूखी के चलते ऐसे बाल सुधार गृहों का ठीक से संचालन नहीं होता। उन्नीस साल की निकोल डुपुरे, जो इन दिनों अमेरिका के मिशिगन कारागार की राबर्ट स्कॉट करेक्शनल फैसिलिटी में- रिश्ते में दादी लगनेवाली एक महिला की हत्या के आरोप में बन्द है, उसके बारे में उसके मां-बाप और अन्य सभी आत्मीय जन एक बात जानते हैं कि वह कभी भी रिहा नहीं होगी। यहां तक कि इस लम्बे अन्तराल में उसे पैरोल पर भी रिहा नहीं किया जाएगा। किशोरावस्था में अनजाने उससे जो अपराध हुआ है, उसके बारे में प्रायश्चित करने का मौका भी उसे कभी नहीं मिलेगा।

दो साल पहले ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘गार्डियन’ (4 अगस्त, 2007) ने एक सर्वेक्षण में बताया था कि निकोल जैसे 2270 लोग संयुक्त राज्य अमेरिका की विभिन्न जेलों में पैरोल के बिना उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। ये सभी लोग जिन्होंने जब यह अपराध किया तो 18 साल से कम उम्र के थे और छह तो महज 13 साल के थे। सभी जानते हैं कि यह एक ऐसी उम्र है जब अमेरिकी कानून उनके कार चलाने पर या सेना में भर्ती पर पाबन्दी लगाता है यहां तक कि घर से दूर रहने पर रोक लगाता है। उस उम्र में इन सभी पर वयस्कों की अदालत में मुकदमा चला और इन्हें सजा सुनायी गयी। निकोल की ही तरह जेल में उम्र भर के लिए बन्द बेनेटन नामक युवा के बारे में रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख था कि जिस वक्त 16 साल के उपरोक्त किशोर को सजा सुनायी जा रही थी, तब जूरी में बैठी कई महिलाओं के आंखें नम हो उठी थीं। सच यह है कि समूची दुनिया को मानवाधिकार और जनतंत्र का सबक सिखाने का दावा करनेवाला अमेरिका उन गिने-चुने मुल्कों में शुमार किया जाता है (जिसमें सोमालिया का नाम भी आता है), जिन्होंने बाल अधिकार सम्बन्धी संयुक्त राष्ट्रसंघ के कन्वेन्शन पर दस्तखत करने से इनकार किया है और जो स्पष्ट तौर पर बाल या किशोर अपराधियों को इस तरह दंडित करने पर पाबन्दी लगाता है।

एमनेस्टी इंटरनेशल तथा ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि दुनिया में महज तीन अन्य मुल्क हैं- इस्राइल, दक्षिण अफ्रीका और तांजानिया- जिनके कानून में ऐसी सजा का प्रावधान है। यह अलग बात है कि तीनों मुल्कों में मिला कर ऐसे महज 12 कैदी हैं। वैसे बच्चों को जेल में ठूंसनेवाले अमेरिका के बारे में यह तथ्य भी जानने योग्य है कि अमेरिकी जेलों की आबादी में 1970 के बाद आठ गुना बढ़ोतरी हुई है। समूची दुनिया में यह एक रिकार्ड है। दुनिया का अन्य कोई मुल्क ऐसा नहीं है, जहां इस छोटे से अन्तराल में जेलों में इतने कैदी बढ़े हों। जेएफए इंस्टीट्यूट द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक इन दिनों अमेरिकी जेलों में 22 लाख कैदी बंद हैं। यहां इस हकीकत को भी रेखांकित करना जरूरी है कि अमेरिकी जेल-आबादी में अल्पसंख्यकों की मात्रा कुल आबादी में उनके अनुपात से काफी ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक एक चौथाई अश्वेत पुरूषों को अपनी जिन्दगी में कभी न कभी जेल के अनुभव से गुजरना ही पड़ता है, जबकि 70 श्वेत पुरूषों में से महज एक पर ऐसी नौबत आती है। इस सन्दर्भ में यह तथ्य भी बेहद महत्वपूर्ण है कि बन्दियों की संख्या एवम कुल आबादी के अनुपात के मामले में रूस के बाद अमेरिका का नम्बर आता है। रूस में अगर एक लाख लोगों में से 685 लोग जेल में हैं तो अमेरिका में यह आंकड़ा 670 तक पहुंचता है। अगर हम यूरोप के साथ इन आंकड़ों की तुलना करें तो वहां यह आंकड़ा महज 100 है। अमेरिकी जेलों में बन्द लोगों के यह आंकड़े एक तरह से प्रचंड हिमशिलाखंड का सिरा ही मालूम पड़ते हैं, जब हकीकत का दूसरा पहलू उजागर होता है। जेलों में बन्द इस विशाल आबादी के अलावा लाखों लोग ऐसे हैं जो ‘सुधारात्मक’ नियंत्रण में है। सुधारवादी नियंत्रण में बन्द लोगों की जनसंख्या 66 लाख है। यह विचारणीय सवाल है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर लोगों को जेल में ठूंस देने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं।

आज से लगभग 25 साल पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता रिचर्ड वोगेल ने ‘मंथली रिव्यू’ नामक चर्चित प्रगतिशील पत्रिका में इसको समझने की कोशिश की थी। उनके मुताबिक, ‘आर्थिक स्थितियों और कारावास के बीच के आपसी सम्बन्ध एवम समग्र सामाजिक प्रवृत्तियों की पड़ताल इस तथ्य को साफ तौर पर स्थापित करती है कि पूंजीवाद और कारावास में साफ सम्बन्ध है।

मार्क्स ने इस बात की आ॓र पहले ही इशारा किया है कि पूंजीवाद के अन्तर्गत, जेलें दरअसल मेहनतकशों की अतिरिक्त आबादी को सड़ने के लिए छोड़ देने का स्थान होती हैं। पूंजीवाद के तहत लोगों की बेरोजगारी और अर्द्ध बेरोजगारी के सामाजिक प्रभावों का आकलन जेलों की आबादी के उतार चढ़ाव से किया जा सकता है।’ अपनी आबादी के अच्छे खासे हिस्से को तरह-तरह के मामलों में उलझा कर जेलों में या ‘सुधारगृहों’ में डालने में अमेरिकी शासकों का जहां कोई सानी नहीं दिखता वहीं यह बात उतनी ही महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी नागरिक समाज में ऐसी आवाजें लगातार बुलन्द रही हैं, जिन्होंने अपने शासकों की लगातार मुखालफत की है।

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क्या आप छत्तीसगढ को नागालैंड बनाना चाहते है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/26/2009 05:00:00 AM

हालाँकि शुभ्रांशु चौधरी की यह रिपोर्ट कुछ समय पहले की है, लेकिन यह हमें बताती है कि नक्सलवाद को सैनिक ताकत से ख़त्म करने की कोशिशों के नतीजे क्या होते होते हैं. 

नक्सली हिंसा की वारदातों की कुल संख्या के मामले में पिछले साल पहली बार छत्तीसगढ का आंकडा अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों को पार कर गया । हाल ही में प्रकाशित गृह मंत्रालय के आंकडों के अनुसार अब छत्तीसगढ पिछले वर्ष से नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य बन गया है।

कुछदिन पहले नक्सलियों ने छत्तीसगढ में बिरला समूह के हिण्डालको कंपनी की एक खदान पर हमला बोला । कंपनी के अधिकारियों को बंधक बनाया ।कंपनी के बुल्डोजर चलाकर सब कुछ तहसनहस किया और जो भी मिला लूटकर ले गए ।

कॉरपोरेट इंडिया पर नक्सलियों का यह अब तक का संभवत: सबसे बडा हमला था । और इसके बाद से ही विशेषज्ञ अब आंध्रप्रदेश के बाद छत्तीसगढ को नक्सली गतिविधियों का नया केंद्रस्थल मान रहे हैं ।

पर क्या नक्सलवाद सिर्फ कानून और व्यवस्था की ही समस्या है जैसा कि प्रदेश की भाजपा सरकार बार-बार घोषित कर रही है ?

वैसे तो नक्सली प्रदेश में पिछले 3 दशक से मौजूद हैं पर हाल में उनकी गतिविधियों में अचानक तेजी आई है । यह राज्य की भाजपा सरकार की नक्सलियों से बलपूर्वक निपट लेने की रणनीति का परिणाम हो सकता है ।

उत्तर और दक्षिण छत्तीसगढ में जहां नक्सलियों का दबदबा है अब आए दिन पुलिस थानों पर हमले हो रहे हैं ।  और रिपोर्टों के अनुसार अगर हमला थाने के करीब भी हो अक्सर रात में पुलिस थाने के बाहर ही नहीं निकलती ।

हाल ही में राज्य शासन ने नक्सल प्रभावित बस्तर के आई जी का यह कहकर तबादला कर दिया कि वे कभी भी मौका ए वारदात का दौरा नहीं करते ।

राज्य सरकार इस बात की जानकारी देने को तैयार नहीं है कि कितने पुलिस कर्मियों ने नक्सल प्रभावित इलाकों से बदली के लिए अरजी दी हुई है ।

यद्यपि अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी एक विशेष आदेश से सिपाहियों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बगैर वर्दी और प्राइवेट वाहनों में गश्त लगाने की अनुमति दे दी है । पर इस बीच ही नक्सलियों की बारुदी सुरंगों से दर्जनों से ज्यादा सी आर पी एफ के जवान मारे जा चुके हैं ।

छत्तीसगढ के गृह मंत्री का लगभग रोजाना अखबारों में बयान आ रहा है कि सामाजिक आर्थिक समस्या की आड में नक्सलवाद एक कानून व्यवस्था की समस्या है और उससे उसी तरह निपटा जाएगा ।

“समस्या' के समाधान के लिए प्रदेश १५ लैंड माइन प्रतिरोधी गाडियां मंगा रहा है । रात में भी दिखाई देने वाले विशेष नाईट विजन गॉगल्स खरीदे जा रहे हैं। और इस अभियान की एक प्रमुख रणनीति के तहत सी आर पी एफ और गुजरात पुलिस के बाद अब नागालैंड पुलिस को प्रदेश में बुलाया गया है ।

नागा पुलिस अधिकारी आए दिन राज्य का दौरा कर रहे हैं ।

नागा पुलिस और सेना के हेलीकॉप्टर की मदद से “एक गुप्त स्थान पर' कोई विशेष अभियान चलाने की खबर मीडिया को पिछले काफी हफ्तों से दी जा रही है । पर उस अभियान के बाद से ४२ ग्रामवासियों की गिरफ्तारी के अलावा और कुछ सुनने में नहीं आया ।

गिरफ्तार ४२ आदिवासियों में से ३५ एक ही गांव के थे और पुलिस के अनुसार उनके पास से भारी मात्रा में नक्सली साहित्य बरामद हुआ है ।

उत्तर छत्तीसगढ में जहां नक्सलियों ने पिछले दिनों भरे बाजार के पास एक थाने को लूट लिया था विशेष अभियान के बाद पुलिस ने एक दर्जी को गिरफ्तार किया है जो पुलिस के अनुसार नक्सलियों के लिए वर्दी सिलता हुआ पकडा गया था ।

अब यह बात अलग है कि अगर स्थानीय अखबारों में छप रही खबरों पर विश्वास किया जाए तो उनके अनुसार आजकल छत्तीसगढ के कुछ नक्सल प्रभावित जिलों में ठेकेदार और सरकारी कर्मचारियों की तर्ज पर पुलिस कर्मियों ने भी नक्सलियों को हफ्ता देना शुरु कर दिया है ।

अब छत्तीसगढ के गृह मंत्री नागालैंड की तर्ज पर “समस्या' से निपटना चाहते हैं । उन्होने पिछले दिनों में कई बार यह बात कही है कि नागा पुलिस को इसलिए बुलाया गया है क्योंकि उसे आतंकवादियों से लड़ने का लम्बा अनुभव प्राप्त है ।

पता नहीं छत्तीसगढ के गृह मंत्री को यह पता है कि नहीं कि छत्तीसगढ में तो सिर्फ नक्सल प्रभावित इलाके में ही पुलिस वाले नक्सलियों को हफ्ता देते हैं पर नागालैंड में तो संभवतय गृह मंत्री भी दशकों से नागा विद्रोहियों को हफ्ता देते आ रहे हैं ।

छत्तीसगढ के गृह मंत्री के लिए मैं नागालैंड से एक वाकया उनके लिए सुनाना चाहूंगा

घटना ४-५ साल पहले की है जब नागालैंड में आज की तरह युद्वविराम नहीं हुआ था । हम बी बी सी की एक फिल्म के लिए नागा विद्रोहियों के साथ कुछ समय बिताना चाहते थे । फोन पर तय यह हुआ कि हम नागालैंड में बर्मा की सीमा से लगे मोन शहर में  आ जाएं उसके बाद विद्रोही हमें अपने अड्डे पर ले जाएंगे ।

पर मोन में पहुंचकर किससे मिलना है ?

 “अरे आप मोन आ तो जाइए बाकी हम पर छोड दीजिए' फोन पर दूसरी ओर से आवाज आई । मुझे आश्चर्य तो हुआ पर और कोई चारा नहीं था । सो नियत दिनपर मैं मोन पहुंचा । खाली बैठे कुछ सूझ नहीं रहा था तो मैंने सोचा कि मोन के जिलाधीश से एक बार मिल लेना सुरक्षा की नज़र से उचित होगा ।

नागा आदिवासी नृत्य पर डॉक्यूमेंटरी बनाने की जो कहानी मैंने इनर लाइन परमिट लेने के लिए लिख रखी थी कलेक्टर के पास जाने के पहले मैंने एक बार उसे और पढ लिया । ताकि कहीं हडबडी में मै यह ही न भूल जाउं कि हम वहां क्या करने आए हुए हैं ।

पर्चा अंदर भेजते ही आश्चर्यजनक रुप से कलेक्टर स्वयं मुझे लेने के लिए बाहर आ गए । “मैं आपका ही इंतजार कर रहा था । आपसे मिलने के लिए कोई अंदर बैठा हुआ है ।' छोटे से कद के कलेक्टर ने कहा ।

मुझसे मिलने यहां कौन बैठा हो सकता है मुझे कुछ समझ में नहीं आया ।

चाय पर दूसरी कुर्सी पर बैठे एन एस सी एन के एरिया कमांडर से मेरा परिचय कराया गया । आश्चर्य की कोई बात नहीं थी सिर्फ नागालैंड की सच्चाइयों से मेरा पहला परिचय था ।

चाय नाश्ते के बाद सिविल ड्रेस में बैठे हट्टे कट्टे से कमांडर साहब से मैंने कहा अब हम कलेक्टर साहब को भी कुछ काम करने देते है ताकि हम बाहर जाकर कुछ काम की बात कर सकें । पर मुझे फिर से अचरज में डालते हुए कमांडर साहब ने कहा “अरे कलेक्टर साहब को भी तो पता रहना चाहिए आप उनके जिले में क्या क्या कर रहे हैं '।

ये तो सिर्फ शुरूआत थी ।

इसके बाद एन एस सी एन के साथ काम कर रहे एक ब्रिटिश ने न सिर्फ तत्कालीन मुख्यमंत्री एस सी जमीर के साथ मेरा साक्षात्कार तय कर दिया वरन साक्षात्कार के समय मेरे साथ कोहिमा भी आए ।

मैं छत्तीसगढ के गृहमंत्री को एक और कहानी बताना चाहता हूं जो नागालैंड से नहीं बल्कि उन्ही के छत्तीसगढ से है ।

कुछ दिनों पहले मैंने छत्तीसगढ में नक्सलियों के साथ एक और फिल्म के लिए कुछ समय बिताया । वहां वरिष्ठ नक्सली नेताओं के सामने एक बूढे आदिवासी से मैंने पूछा - ये नक्सली दादा लोग बेहतर हैं या सरकार ?

उसने बगैर लागलपट के कहा – “मुझे लगता है कि सरकार अच्छी है क्योंकि सरकार हमें कुछ दे सकती है । पर सरकार को तो मैंने देखा ही नही, पुलिस के सिवाय . इसलिए मुझे लगता है कि नक्सली दादा लोग ही बेहतर हैं ' ।

विशेष अभियान में नागा पुलिस के साथ मिलकर छत्तीसगढ पुलिस ने ऐसे ही आदिवासियों को पकडा है ।

अब छत्तीसगढ के गृहमंत्री से मैं यह पूछना चाहता हू कि क्या यह संभव नहीं है कि यही आदिवासी आपकी सरकार के लिए नाइट विजन गॉगल्स का काम करें और पुलिस को यह आकर बतला दे कि लैंड माइन कहां लगे हैं

नागालैंड में हमारी सेना ने पिछले ५० सालों में क्या हासिल किया हे ? क्या आप छत्तीसगढ को नागालैंड बनाना चाहते हैं ?

और जैसा सभी पूछ रहे हैं मेरा भी यही प्रश्न है कि छत्तीसगढ की सरकार नक्सलियों से बातचीत क्यों नहीं करना चाहती ?

यदि  छत्तीसगढ का गैर आदिवासी नक्सली नेतृत्व सच में आदिवासियों का भला चाहता हैं तो वे इस प्रस्तावित बातचीत से उनके लिए कुछ हासिल करना चाहेंगे जो उनके साथ लड रहे है ।

नक्सलियों ने आंध्रप्रदेश में ऐसा नहीं किया और इस बात की पूरी आशंका है कि छत्तीसगढ का मूलत: तेलुगु भाषी नक्सली नेतृत्व वही करेगा जो उन्होने आंध्र में किया ।

हमें डर है कि जो छत्तीसगढ के आदिवासी पिछले ५० सालों में इस देश की वर्तमान राजनीति से पीडित रहे हैं अगले काफी वर्ष तक नक्सलवादियों के लाल किले में लाल झंडा फहराने के दिवास्वप्न से पीडित रहेंगे ।

पर हो सकता है हमें गलत साबित करते हुए आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने के लिए छत्तीसगढ का नक्सली नेतृत्व सामने आए और यह साबित करे कि वह छत्तीसगढ के आदिवासियों को सिर्फ अपनी राजनीति के एक मोहरे की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं ।

सरकार के लिए नक्सलियों के मकसद का पर्दाफाश करने के लिए बातचीत का न्यौता एक अच्छा मौका हो सकता है ।

देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/25/2009 12:53:00 PM

नक्सल आन्दोलन के जनाधार, उसकी वजहों और उस पर विभिन्न पक्षों के नज़रियों के बारे में बता रहे हैं रुचिर गर्ग. छत्तीसगढ़ की जन वेबसाईट से साभार.

देश के राजनैतिक नक्शे पर नक्सलवाद आज एक बड़ी ताकत के रुप में दर्ज है । इतनी बड़ी ताकत कि शासक वर्ग यह आशंका व्यक्त करने लगा है कि नक्सली नेपाल की सीमा से लेकर केरल तक काम्पेक्ट रिवाल्य्शूनरी ज़ोन बनाने में या देश को दो हिस्सों में बांटने की साजिश में लगे हैं । सत्ताधारियों को ये भी आशंका है कि हिन्दुस्तान के नक्सली संगठनों की नेपाल के माओवादियों से लेकर श्रीलंका, बंग्लादेश और भूटान के क्रांतिकारी दलों से नजदीकियां इसी कथित रणनीति का हिस्सा हैं .

ऐसी ही आशंकाओं से लिपटी हुई राज्यसभा में प्रस्तुत Department related parliamentary Standing Committee On Home affairs  की 88 वीं रिपोर्ट कहती है Left Wing extremism has been posing one of the biggest challenges on the internal security front .

सशस्त्र संघर्ष के जरिए राजसत्ता पर कब्जे के नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी मे फूटी चिंगारी ने आज देश की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है । देश के 9 राज्यों के सामने तो नक्सलवाद सीधी चुनौती है । कुछ अन्य राज्यों में इसकी जड़े फैल रही है, नक्सलियों के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भी बढे हैं । दक्षिण एशिया के एक दर्जन सशस्त्र क्रांतिकारी संगठनों ने मिलकर 2001 में एक समन्वय समिति काम्पोसा बनाई . इसमें नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (माओवादी) की मुख्य भूमिका है ।

देश के दो ताकतवर नक्सली संगठन पीपुल्स वार और एमसीसी के 2004 में हुए एकीकरण में  भी नेपाली माओवादियों की भूमिका उल्लेखनीय मानी जाती है। ये दक्षिण एशिया के माओवादियों के इस समन्वय का भारत में दिखने वाला सीधा प्रभाव है । तत्कालीन पीपुल्स वार की पोलित ब्यूरो के एक सदस्य रामजी के मुताबिक ‘काम्पोसा का पहला लक्ष्य है दक्षिण एशिया में भारतीय विस्तारवाद के विरुद्ध लड़ना’ । पीपुल्स वार और एमसीसी (आज की भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी) को पिछले दिनों अमेरिका ने आतंकवादी संगठनों की अपनी सूची में शामिल कर लिया । इस नई एकीकृत पार्टी की सदस्य संख्या 12000 से अधिक है इसमें आधे से ज्यादा सशस्त्र सदस्य हैं .

एक तरफ नक्सली ताकत की यह तस्वीर है दूसरी तरफ सरकार, संसदीय जनतंत्र में आस्था रखने वाले राजनैतिक दल, मीडिया और बुद्धिजीवियो का एक बडा हिस्सा इसे एक समस्या ही मानकर बहसों में उलझा है । और यह कथित समस्या राजसत्ता पर कब्जे के अपने नारे के साथ न केवल सीधे सत्ता प्रतिष्ठानों पर हमले कर रही है बल्कि दिल्ली की सडको पर अपने जनाधार के प्रदर्शन को उत्सुक है । समस्या इसलिए क्योंकि किसी सच्चे लोकतंत्र में हिंसा की वकालत नहीं की जा सकती, लेकिन देश के संसदीय लोकतंत्र को नक्सलवाद की चुनौती का अस्तित्व, आज राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा के रुप में दर्ज है  ।

देश की कौन सी तस्वीर है जो नक्सलवाद के इस चेहरे पर दिखाई देती है ?


इस तस्वीर में देश के वे इलाके शामिल हैं जहां भूख है, जानलेवा कर्ज है , गरीबी-बेरोजगारी है, बेईलाज मौत है, अशिक्षा है, पीने के साफ पानी का अभाव है, जल, जंगल, जमीन और दूसरे प्राकृतिक संसाधनो का असली मालिक न केवल अपने हक से वंचित है बल्कि अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान के लिए अपने बेइँतहा शोषण के खिलाफ सम्मानजनक जीवन के लिए छटपटा रहा है । ये वंचितों का वो इलाका है जहां आजादी के बाद से सुशासन के कदम अब तक नही पड़े। अब इन इलाकों में खून बरस रहा है ।

एक समय था जब इन इलाकों में लोकतंत्र को कोई चुनौती नहीं थी  जल जंगल ,जमीन पर लोकतंत्र का पहरा था । लोकतंत्र के प्रतिनिधि केवल सांसद और विधायक ही नहीं थे, पुलिस भी इसी भूमिका में थी और जंगल के कानून भी आदिवासियों को जंगल पर अपना हक जताने से रोकने के लिए मुस्तैद थे । इन आदिवासियों के हाथों में वोट का उछलता पत्थर तो था, पर इससे वे अपनी जिंदगी की रक्षा नहीं कर पाए. आजादी के बाद का हर चुनाव इस बात का गवाह था ।

और विषमता केवल आर्थिक मोर्चे पर नहीं थी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के अवसरों की बात हो या अपनी संस्कृति, अपनी पहचान, अपनी अस्मिता का सवाल हो – तस्वीर हमेशा विषम थी. इन्हीं परिस्थितियों में संसदीय लोकतंत्र को चुनौती देता हुआ नक्सलवाद देश के अलग अलग इलाकों में अलग अलग समय में अपनी सांगठनिक और रणनीतिक क्षमताओँ के साथ पैर जमाता गया. यहां प्रकाश सिंह की ‘ द नक्सलाइट मूवमेंट इन इँडिया ’ को उद्धृत करना उपयुक्त होगा.

इस किताब के सातवें अध्याय में उन्होंने जयति घोष और कृष्णा भारद्वाज से लेकर पी साईँनाथ और जवाहर रोजगार योजना के अध्ययन तक का जिक्र करते हुए कहा है कि ये संयोग नहीं है कि नक्सली देश के उन इलाकों में सक्रिय है जहां गरीबी रेखा के नीचे गुजर करने वाले देश के ग्रामीण गरीबों का 90 प्रतिशत हिस्सा बसता है । जवाहर रोजगार योजना पर योजना आयोग के इस अध्ययन ( 1992) के मुताबिक

‘The Analysis of third round of NSSO survey (1987-88) revealed that a little over 90 % of thre rural poor below Poverty Line live in the 10 major states of Andhra Pradesh, Bihar, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Orissa , Rajasthan, Tamilnadu, Uttar Pradesh And West Bengal ’

यह वास्तव में संयोग नहीं है कि हिन्दुस्तान में नवजनवादी क्रांति के सपने के साथ नक्सलवाद ने देश के जिन इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत की है वे मानवीय गरिमा के हर पैमाने पर सबसे निचले दर्जे पर हैं . इसके असंख्य उदाहरण है, एक उदाहरण भूख गरीबी और बदहाली के लिए कुख्यात उड़ीसा के काशीपुर का है. सितंबर 2000में  जब इस इलाके में भूख से मौत की खबरें आईँ तो उस इलाके का जायजा लेने पहुंचे पत्रकारों और स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं ने जो देखा वो रौंगटे खड़े कर देने वाला था ।

अनाज को मोहताज लोग सड़ी गली आम की गुठलियों को उबालकर पी रहे थे । लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐसी अमानुषिक तस्वीर को देखने पहुंची भीड़ में मैं भी था. हमने देखा कि गरीबी रेखा के नीचे गुजर करने वाले लोगों के राशनकार्ड्स पर अनाज दर्ज था लेकिन ये अनाज उनकी झोपड़ियों तक नहीं पहुंचा था । लोगों के पास काम  नहीं था । जेबे खाली थी , इसी दौरान उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को तब लोगों के भारी गुस्से का सामना करना पडा –जब उनकी ये टिप्पणी अखबारों में छपी कि आम की गुठलियों का घोल इन ग्रामीणों का पारंपरिक भोजन है । नवीन पटनायक जब इस इलाके दौरे पर गए तो गुस्साए लोगों ने उनके काफिले पर आम की गुठलियां फेंकी थी . मुख्यमंत्री के काफिले पर आम की सड़ी गली गुठलियां फेंकने वाले वो गुस्साए आदिवासी नक्सलवादी नहीं थे । मुख्यमंत्री की उस कथित टिप्पणी से उन गरीब आदिवासियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंच थी । उनकी कार्रवाई उस प्रशासन, उस सरकार और उस व्यवस्था के खिलाफ गुस्से का स्वतस्फूर्त प्रदर्शन थी ।

क्या इसे संयोग कहा जाए कि इसी कोरापुट जिले में छह फरवरी 2004 को पीपुलस् वार ने जिला मुख्यालय पर जबर्दस्त हमला कर एक तरह से पूरे शहर की प्रशासनिक मशीनरी को बंधक बना लिया था .

क्या बिना जनाधार के ऐसा हमला संभव था जिसमें नक्सलियों ने एस पी दफ्तर से लेकर ट्रेजरी और जेल तक लूट ली । 500 से ज्यादा अलग अलग तरह के हथियार और 25000 से ज्यादा कारतूस ले गए इस हमले को पीपुल्स वार ने ‘ भारत में जारी माओवादी जनयुद्ध के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन ’  कहा है ।

कुलदीप नैय्यर ने भी आदिवासियों की दुर्दशा को इस तरह व्यक्त किया है

 “Orissa is another state where corruption may be less in comparison but where government is using force to dispossess the adivasi of their land in order to hand it over to multinationals. Kashipur in Orissa is currently experiencing the onslaught because the tribals who live around the mines are sought to be moved out. If the oustees were naxalites it would only strengthen the argument that the system did not give them any real option”

इस व्यवस्था ने आदिवासियों की उपेक्षा में संविधान के प्रावधानों की खुली धज्जियां उड़ाई हैं पांचवी अनुसूची के क्लाज 3 और संविधान के आर्टिकल 244 के मुताबिक जिन राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र हैं उन राज्यों के राज्यपालों के लिए कानूनन ये आवश्यक है कि वे इलाकों के प्रशासन के बारे में भारत के राष्ट्रपति को वार्षिक या जब भी राष्ट्रपति चाहें रिपोर्ट भेंजे. केन्द्र ने इसके लिए वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने बाद यानि 30 सितंबर तक यह रिपोर्ट भेजने के निर्देश जारी किए थे । लेकिन हाल क्या है?   ? नक्सलवाद से जूझ रहे अविभाजित मध्यप्रदेश की स्थिति का जब संसदीय समिति ने अध्ययन करना चाहा तो पता चला कि वर्ष 1992 के रिपोर्ट मध्यप्रदेश के राज्यपाल के सचिवालय से 9 जुलाई 1996 को भेजी गई और ये रिपोर्ट वर्ष 2000 तक आदिवासी मामलों के मंत्रालय में परीक्षण के लिए पडी हुई थी. मामला संयुक्त संसदीय समिति का था तो राज्य सरकार सक्रिय हुई और किसी तरह 1996-97 तक की रिपोर्ट भेज दी गई ,लेकिन तब तक समिति अपना अध्ययन पूरा कर चुकी थी । संयुक्त ससंदीय समिति ने बाद में अपना उल्लेख किया कि

“ It is more painful to note that this report highlights only the achievements of the state government in tribal development. The indepth analysis of the solutions to the problems of scheduled areas is not included in the reports”

नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र का ब़ड़ा हिस्सा आदिवासी बाहुल्य है । ये ऐसे जंगलवासी हैं जो सदियो से शोषण का शिकार हैं । इस शोषण के खिलाफ आदिवासियों के ऐतिहासिक विद्रोह भी दर्ज है .बस्तर में 1825 में तत्कालीन मराठा शासकों के अत्याचारं के खिलाफ, उनके द्वारा थोपे गए नए नए करों के खिलाफ शहीद गेंदसिंह के नेतृत्व में हुआ परलकोट विद्रोह हो या अंग्रेजों द्वारा बस्तर के वनों की लूट की कोशिशों के खिलाफ 1859 का कोया विद्रोह या 1910 का भूमकाल विद्रोह हो , सभी संसाधनों की लूट और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ आदिवासियों के बागी तेवर के प्रतीक बन गए । इनमें भूमकाल विद्रोह का खास तौर पर जिक्र करना चाहिए । बस्तर 1854 के बाद अंग्रेजों की सत्ता के अधीन था । 1876 के बाद अंग्रेजों ने बस्तर में सुधार और जनकल्याण के नाम पर बहुत से काम किए । इस इलाके की प्रमुख सडकें अंग्रेजों की देन हैं ।सबसे महत्वपूर्ण रायपुर, जगदलपुर सड़क 1898 में बन गई थी । आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने के लिए वन संपदा के संरक्षण के नाम पर वन कानूनो की रुप रेखा तैयार की गई पर इन सब का निशाना बस्तर की अनमोल वनसंपदा ही थी । इसके अलावा वस्तर में स्कूल और अस्पताल खोले गए । अपनी जरूरतों के अनुकूल न्याय पालिका और पुलिस तंत्र का विकास किया गया। इन सबसे वहां अंग्रेज और उनके एजेंटों की संख्या बढ गई , उनके अत्याचार बढ़ गए । इन्हीं अत्याचारों के खिलाफ बगावत थी – भूमकाल विद्रोह .

एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा था कि – आदिवासियों ने नए वन कानूनों, पुलिस के हस्तक्षेप, स्कूलों एवं बेगारी को पसंद नहीं किया था। समूचे बस्तर में लोग अपने जीवन के ढांचे में लाए जा रहे बदलाव के बारे में बोलते रहे । जंगल के पुत्रों आदिवासियों ने माना था कि जंगलों पर उनका अलग नहीं किया जाने वाला अधिकार है तथा कोई भी हस्तक्षेप उनके लिए तंग करने वाला है । उन्होंने माना था कि वे जंगलों से जो चाहे कर सकते हैं  तथा हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है ।

आजादी की आधी सदी बाद क्या स्थिति है ?

21 जुलाई 2004 को केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर स्वीकार किया कि –

· वन प्रशासन ने जन जातीय समुदायों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय किया है

· क्योंकि सरकारी तंत्र आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता प्रदान नहीँ कर रहा है इसलिए आदिवासियों का – अपराधीकरण – हो रहा है

· क्योंकि आदिवासियों के पास मालिकाने के दस्तावेज नहीं थे इसलिए ब्रिटिश शासन मे जंगलों के सीमांकन के समय भी उनके अधिकारों का निर्धारण नहीं किया गया

· 1947 के बाद बहुत सारे जंगलों को आरक्षित वन घोषित कर दिया गया परंतु उस समय भी आदिवासियों के अधिकारों का निर्धारण नहीं किया गया ।

अधिकारों से वंचित आदिवासी, रोज अपनी जमीन से बेदखल हो रहे आदिवासी, जिस अपराधीकरण की ओर उन्मुख हुए शायद वो ही नक्सल वाद था ।

नक्सलियों ने क्या किया

नक्सली केवल कुछ हजार सशस्त्र गुरिल्लाओँ या पेडो  और पहाड़ियों की ओट के दम पर नहीं टिके हैं । इन सब का महत्व है लेकिन जनाधार के बिना यह सब महत्वहीन है । इस पर चर्चा के लिए दंडकारण्य का उदाहरण उपयुक्त होगा . आज देश के सबसे बड़ी माओवादी पार्टी भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी ने इसे अपने आधारक्षेत्र के रुप में विकसित करने का लक्ष्य रखा है । नक्सलियों के मुताबिक, दीर्घ कालीन युद्ध में रणनीति दृष्टिसे दंडकारण्य बडा महत्वपूर्ण है ।

दंडकारण्य में छत्तीसगढ राज्य के बस्तर, दंतेवाडा और कांकेर जिले तथा महाराष्ट्र का गढचिरौली जिला शामिल है। इस पूरे इलाके का क्षेत्रफल 53000 किलोमीटर से ज्यादा है। यह इलाका वन और खनिज संपदा से भरपूर है लेकिन आजादी के बाद से विकास का एक अधकचरा ढांचा ढो रहा है , बल्कि ये कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि विकास ऐसा जो बाजार के अनुकूल हो । यहां आदिवासियों की आबादी 60 प्रतिशत से ज्यादा है  और इनमें अधिकांश गौंडी हैं , बच्चों को साक्षर बनाना भी यहां लोगों के लिए जंग जीतने जैसा है , और बारी इलाज की आती है तो लोग जंग हार जाते हैं । उदार आर्थिक नितियों के हर तरह के दुष्प्रभाव यहाँ देखे जा सकते हैं और औसत जीवन राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और बाल मृत्यु दर काफी ज्यादा । अच्छी बारिश के बावजूद हर साल सूखा पड़ता है । जंगलों की खुली लूट का उदाहरण है ये इलाका ।

छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डा रमन सिंह कहते हैं कि नक्सलवाद का विकल्प विकास है लेकिन किसी सरकार को ये बात आजतक समझ आ रही है जब एक बड़े हिस्से में नक्सलियों की एक तरह से समानांतर सरकार चल रही है,  और विकास भी कैसा ? सरकार चाहती है कि बस्तर में सडकों का जाल बिछे, रेल लाइनें बिछ जाएं , बडे बांध और बड़े उद्दोग लग जाएं । बस्तर में भयानक कुपोषण, मलेरिया से मौंते, गर्भवती महिलाओं की चिकित्सकीय देखभाल के खराब इंतजाम, सिंचाई और खेती की आधुनिक सुविधाओं का अभाव यह सब है. एड्स जैसी बीमारी भी इस इलाके में पहुंच गई है लेकिन ,सरकार की चिंता रही है बस्तर का औद्योगिकीकरण , बस्तर में पर्यटन को बढावा देने की नीतियां लागू करना. उद्योगपतियों और पर्यटकों की जरूरतों के ही अनुकूल सुविधाओँ को ढांचा खड़ा करने के लिए सरकार लालायित रहती है . एक तरफ बस्तर के चित्रकोट में स्थित एशिया के सबसे बड़े जलप्रपात की ओर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए वहां रंगीन रोशनी का इंतजाम किया गया है औरक राज्य की राजधानी रायपुर में आकर्षक होर्डिंग्स लगाए गए हैं . दूसरी तरफ बस्तर की जनता की मर्जी के खिलाफ एक उद्योग (एस्सार) को नदी जल के जरिए लौह अयस्क की विशाखापट्टनम तक ढुलाई की अनुमति दी गई है ।

जो पानी बस्तर का जीवन है वह आदिवासी के खेतों में न जाकर बड़े उद्दोगों को मिलेगा । इन उद्योगों की वजह से बडे पैमाने पर पेड़ भी कटेंगे । नदियां भयानक प्रदूषण का शिकार भी होंगी । बल्कि कहा ये जा रहा है कि शंकिनी नदी का जल यदि लौह चूर्ण के परिवहन के लिए उपयोग में लाया गया तो 600गांव मरूस्थल में तब्दील हो जाएंगें । एस्सार ग्रुप को रिजर्व फोरेस्ट का 14 हैक्टेयर जंगल पाइपलाइन बिछाने के लिए दिया गया है ।उन्हें ये जंगल काटने की अनुमति दी गई है । दूसरी ओर क्षेत्र के आदिवासी ग्रामीण जंगल में प्रवेश करने से जेलजाते हैं  वे सूखा पत्ता नहीं बटोर सकते और जंगल में आदिवासी जलाऊ लकड़ी के लिए तरसते हैं । सच ये है कि रिकार्ड में चाहे केवल 14 हेक्टेयर रिजर्व फोरेस्ट पाइप लाइन बिछाने के लिए दिया गया हो लेकिन इस व्यापार के कारण हजारों हेक्टेयर का रिजर्व फोरेस्ट जोखिम में पड़ गया है । क्षेत्र के विधायक कवासी लखमा ने चुनाव के वक्त कहा था कि एस्सार पाइपलाइन लगाने के लिए उनकी लाश पर से गुजरना होगा और इस नारे पर ही वे पुन कांग्रेस के विधायक बने हैं लेकिन इसके बाद वे पाइप लाइन बिछाने के काम के संदर्भ में मौन हो गए ।

संसदीयलोकतंत्र के खिलाफ नक्सलवाद की जडों के मजबूत होने के आर्थिक सामाजिक कारणों का ये शायद उपयुक्त उदाहरण है ।

एक दिलचस्प मामला एनएमडीसी के प्रस्तावित स्टील प्लांट का है । पहले ये स्टील प्लांट बस्तर में हीरानार नामक स्थान पर लगने वाला था । बताते हैं कि नक्सली विरोध के कारण इस प्रोजेक्ट को हीरानार के बजाय जगदलपुर के समीप नगरनार में लगाने का फैसला हुआ था। स्थानीयलोंगों ने इस प्लांट का कड़ा विरोध किया । धरना प्रदर्शन हुए। विरोध करने वालों का कहना था कि इस प्लांट से उनकी हजारों एकड उपजाउ जमीन चली जाएगी, बस्तर की जीवनरेखा  मानी जाने वाली इंद्रावती नदी प्रदूषित हो चाएगी और इतनी कीमत चुकाने के बाद लोगों को नौकरिया भी नहीं मिलेगी क्योंकि इस प्लांट में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होना है । दिलचस्प यह है कि नगरनार प्लांट एक ऐसा मामला था जिसपर कांग्रेस की तत्कालीन जोगी सरकार और तब के विपक्षी दल बीजेपी का स्टैंड एक ही था – प्लांट लगना चाहिए। इसके लिए लोगों के आंदोलन को कुचला गया , आंदोलन के समर्थन में बस्तर आने की कोशिश कर रहे डाक्टर ब्ह्मदेव शर्मा और वंदना शिवा जैसे लोगों को वहां घुसने नही दिया गाय और अंततः तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसका शिलान्यास किया .

लोग सवाल कर रहे हैं कि बस्तर में पहले ही एनएमडीसी का एक संयंत्र बैलाडीला में स्थापित है । उस संयंत्र ने बस्तर का क्या भला किया ? रोजगार के नाम पर ड्राइवर, खलासी, रसोइये जैसी नौकरियां ही स्थानीय लोगों के हिस्से आई और प्रदूषण से लेकर अपनी जमीन से बेदखवली तक के दंश भी उन्होंने झेले । लोहे और बाक्साइट की खदानों के कारण हजारों किसानों के खेत बरबाद हुए । मशीनीकरण ने रोजगार छीने ।

नक्सलियों के विरोध के कारण आज बस्तर में कई खदाने बंद हैं । उनकी मांग है कि आदिवासियों  के अधिकार बरकरार रखते हुए खनन ऐसा हो जिसमें मशीनीकरण के कारण लोगों के रोजगार कम नहों । ऐसा खनन आज किसी उद्दोग पति के लिए मुनाफे का सौदा नहीं होगा । नतीजा खनन बंद, खेती जारी और आदिवासी किसान मशीनीकरण के खिलाफ नक्सली आंदोलन में भी शामिल हुआ । इस मुद्दे पर बस्तर के चार गांव या कुव्वेमारी, खदान क्षेत्रों में जिस राजनैतिक शक्ति ने संघर्ष किया होता शायद वहां का किसान उसके साथ होता ।नक्सली ये मांग भी कर रहे हैं कि आजादी के बाद से बस्तर के विकास पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाए ताकि यह पता चले कि बस्तर से कितना लोहा जापान गया , कितनी लकडी और कितना बाक्साइट कितना टिन, कितना डोलोमाइट , और कितना ग्रेनाइट बेचा गया । और बदले में बस्तर को क्या मिला ।

साम्राज्यवाद विरोधी जनसंघर्ष मंच के एक अनुमान के मुताबिक दंडकारण्य क्षेत्र से छत्तीसगढ़  सरकार को सालाना 500 करोड़ और महाराष्ट्र सरकार को सालाना 150 करोड रुपए की आमदनी हो रही है। ये कहानी बस्तर में ही खत्म नहीं होती । बस्तर क्षेत्र से लगी हुई दल्ली राजहरा की खदानों में एक समय बीस हजार श्रमिकों को रोजगार हासिल था । आज प्रोडक्शन बढ़ गया है लेकिन रोजगार सिर्फ 2000 श्रमिकों को हासिल है । भिलाई स्टील प्लांट में बीस साल पहले जब उत्पादन एक मिलियन टन था तब यहां 96000 श्रमिक थे । आज उत्पादन 5.2 मिलियन टन हैं और श्रमिकों की संख्या 37000 है

क्या बस्तर के जंगलों में सक्रिय नक्सलियों की नजर पडोस के दल्लीराजहरा और भिलाई में श्रमिक असंतोष पर नहीं होगी ? उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों का असर बस्तर से लेकर भिलाई तक समान रुप से दिखता है । और ऐसे साम्राज्यवादी हितों का विरोध नक्सली एजेंडा का अहम हिस्सा है . आज के नक्सल आंदोलन के सामाजिक आर्थिक कारणों की चर्चा तेलंगाना के सशस्त्र जनसंघर्ष के जिक्र के बिना पूरी नही होगी। नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी आज तेलंगाना क्षेत्र में शोला बनकर आसापास के राज्यों में भी फैलती है तो लोग इसकी जडे तेलंगाना के उस सशस्त्र किसान संघर्ष ( 1946-51 ) में भी देखते हैं जिसमें 4000 कम्यूनिस्ट और लड़ाकू किसान मारे गए थे । 10000 से अधिक कम्यूनिस्ट कार्यकर्ता और जनसैनिक तीन-चार साल तक नजरबंद कैंपों और जेलों में रहे .कम से कम 50000 ऐसे लोग थे जिन्हें समय समय पर घसीट कर पुलिस और फौज के कैंपों में ले जाया गया और वहां उन्हें हफ्तों तथा महीनों तक पिटाई, यातनाओँ  और आतंक का शिकार बनाया गया । इस संघर्ष के दौर में 3000 गांवों की किसान जनता ने जिनकी संख्या मोटे तौर पर 30 लाख के करीब होगी। 16 हजार वर्ग मील के क्षेत्र में लड़ाकू ग्रामपंचायतों के आधार पर ग्रामराज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की ।

हैदराबाद राज्य के शासकों द्वारा जनता के बडे हिस्से की संस्कृति और भाषा को दबाने की कोशिशों के विरोध से लेकर

“जमीन जोतने वाले की”

जैसे क्रांतिकारी नारों पर अमल उस सशस्त्र विद्रोह की सामाजिक- राजनैतिक पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा थे ।आज नक्सली संघर्ष की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक पृष्ठभूमि में भी ये मुद्दे मौजूद हैं।

दंडकारण्य को आधार क्षेत्र बल्कि एक मुक्त क्षेत्र में बदलने की अपनी लड़ाई के क्रम में नक्सली यहां ग्राम राज्य कमेटियां या जनताना सरकार का गठन कर रहे हैं। वर्ष 2003 तक दंडकारण्य में ही 500 गांवों में इनका गठन हो चुका है । करीब 2000 गांव इन कमेटियों के प्रभाव में बताए जाते हैं तत्कालीन पीपुल्स वार के पोलित ब्यूरो सदस्य रामजी के मुताबिक – “हम अब सिर्फ उन्हीं इलाकों में कमेटियों का गठन कर रहे है जहां भौगोलिक परिस्थितियां गुरिल्ला लड़ाई के अनुकूल हो, जनता सक्रिय हो, वर्ग संघर्ष तेज हो. RPC यानी जनताकीबीज रूपी सत्ता. जब गांव में जनता की यह बीजरुपी सत्ता रहती है तब वहां संसदीय व्यवस्था के किसी भी अंग को काम करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि दो शक्तियों का संघर्ष होता है तो कोई एक ही शक्ति टिक सकती है, दो नहीं । वो चाहे हमारी सत्ता हो या दुश्मन की”।

अपने संघर्ष की इस अवस्था तक नक्सली पहुंचे कैसे?

प्रतीक के तौर पर दंडकारण्य का ही उदाहरण लेना चाहिए । जनवरी 1934 में मजदूर किसान प्रतिनिधियों की दूसरी राष्ट्रीय कांग्रेस के समापन भाषण में माओत्से तुंग ने कहा था – “अगर हम जीतना चाहते हैं तो हमें और भी बहुत सा काम (जनता  को गोलबंद करने के अलावा ) करना होगा । हमें भूमि संबंधी संघर्षों में किसानों का नेतृत्व करना होगा और उनमें जमीन बांटनी होगी , उनके श्रम के उत्साह को बढ़ाना होगा तथा कृषि उत्पादन बढ़ाना होगा, मजदूरों के हितों की रक्षा करनी होगी, सहकारी समितियों की स्थापना करनी होगी । आम जनता के सामने जो समस्याएं हैं , कपड़े,लत्ते, खुराक , मकान ईंधन, चावल,खाद्य,तेल व नमक, बीमारी व स्वास्थ्य रक्षा तथा शादी ब्याह की जो समस्याएं हैं उन्हें हल करना होगा” ।

नक्सली ये कर रहे हैं । दंडकारण्य में उन्होंने 80 के दशक की शुरुआत में प्रवेश किया था । शोषण के अर्धसामंती अवशेष, जीवन की आदिम युगीन परिस्थितियां, सांस्कृतिक पहचान का संकट , भाषा को दबाने की कोशिशें , आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों को नकारती उन्हें उनके परिवेश से खदेडती सत्ता , उनके संसाधनों के दोहन में लगा देशी विदेशी उद्योंगपति , पुलिस से लेकर वन विभाग तक सरकारी अमले के रोज बरोज के अंतहीन अत्याचार , उनकी उपज पर मुनाफा बटोरता स्थानीय गैर आदिवासी सेठ साहूकार , उन्हें निरक्षर रखने की कोशिश , उन्हें बेईलाज मारता स्वास्थ्य विभाग, उन्हें कुपोषित रखती सार्वजनिक वितरण प्रणाली , उनके वोट से संसदीय जनतंत्र की मलाई चाटते नेता, संघर्ष का विकल्प बनने की कोशिश करते एनजीओ आदिवासियों का ईसाई धर्म और हिन्दू धर्म में धर्मातंरण सबकुछ था उस दंडकारण्य में (और आज भी है )

नक्सलियों ने तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी से लेकर इन तमाम छोटे बडे मुद्दों पर आदिवासियों को संगठित करने का काम किया । जो संसदीय व्यवस्था इन आदिवासियों को बेहतर जीवन का विकल्प नहीं सुझाती थी, उनके विकल्प के रुप में नकस्लियों ने अपने को प्रस्तुत करने की कोशिश की । तेंदुपत्ता तोड़ाई की मजदूरी बढ़वाना या आदिवासी की मुर्गी और बेटी को सरकारी कारिंदों से बचाना उनकी लड़ाई की तात्कालिक मुद्दे थे । उन्होंने आदिवासियों के पराईकरण के मुद्दे को अपनी लड़ाई का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया । नक्सलियों का आरोप है कि -हिन्दु धर्म के प्रसार से आदिवासियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है । आदिवासियों को वनवासियों का नाम देकर उसे हिन्दू धर्म की एक शाखा बताया जा रहा है , जो एक सोची समझी साजिश है। संघ परिवार के लोग जो कि भारत के सांमती और दलाल पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं आदिवासियों में छुआछूत जैसे घिनौनी प्रथा की बीज बोने की कोशिश कर रहे हैं । आदिवासियों के नाम , रस्मों रिवाज, संस्कृति, देवी देवताओँ में विकृत ढंग से बदलाव करते हुए सभी का हिन्दूकरण कर रहे हैं उनकी भाषा गोन्डी (1991 की जनगणना के मुताबिक गोंडी बोलने वालों की संख्या 2,124,852 थी ) के हिन्दी करण और उनके जीवन के तमाम दूसरे पहलुओं का हिन्दूकरण किया जा रहा है । कुल मिलाकर यहां पर आदिवासियों के पराईकरण (aliention) की प्रक्रिया बड़े षडयंत्र के तहत जारी है।

तेंदुपत्ता आंदोलन तो दंडकारण्य में 1982 में ही शुरु हो गया था। इसके बाद नक्सलियों के नेतृत्व में आदिवासी किसानों ने हजारों एकड़ वन्यभूमि पर कब्जा कर लिया। मजदूरी वृद्धि आंदोलन चलाया गया । वन उत्पादों के उचित मूल्यों के लिए आंदोलन हुए। तत्कालीन पीपुल्स वार ने यह नोट किया कि इन आंदोलनों के विस्तार के परिणाम स्वरुप 1984 तक दंडकारण्य के क्षेत्र में दलोँ की संख्या में वृद्धि हुई, दलों का निर्माण बढ़ गया , वर्ग संघर्ष भी तीव्र हुआ और साथ साथ दमन भी बढ़ गया ।

1987-88 के भीषण सूखे के दौरान नक्सलियों ने आदिवासियों को संगठित कर साहूकारों से लेकर सरकारी गोदामों तक में हमले करके धान कपडा, बर्तन, आदि लूटा और किसानों में बांट दिया। पीपुल्स वार ने अपनी एक सांगठनिक रिपोर्ट में सूखा हमलों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा – “इस किस्म का आंदोलन हमारी पार्टी के लिए एक नया अनुभव था । संघर्ष के अनेक रुपों को समन्वयित कर आंदोलन को जारी रखना इसकी विशेषता है । इस आंदोलन से जनता के बीच सांगठनिक विकास के साथ साथ उनमें जुझारु पन बढ गया । कुल मिलाकर पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में सूखा संघर्ष का अच्छा प्रभाव पड़ा है। हमारे आंदोलन को मजबूत आधार मिला” ।

नक्सलियों ने शराबबंदी से लेकर सामाजिक कुरीतियों तक के खिलाफ आंदोलन छेड़कर महिलाओँ को संगठित किया । उन्होंने कुछ हिस्सों में किसानों को खेती के आधुनिक तरीके सिखाए, उनमें बीजों का वितरण किया , छोटे तालाब और बांध बनवाए, नंगे पांव डाक्टर की तर्ज पर ग्रामीण डाक्टर तैयार किए , स्कूल भी खुलवाए। नक्सलियों ने भूमिकब्जा आंदोलन को अत्यंत महत्व दिया । इसके तहत खेती के लिए न केवल जंगल काटकर जमीन को खेती योग्य बनाया गया बलकि बड़े किसान भूमिपतियों की जमीन , विवाद ग्रस्त जमीन आदि पर भी कब्जा कर उन्हें गरीब किसानों में बांटा गया. इस दौरान इस बात का भी ध्यान रखने की कोशिश की गई कि आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच टकराव न हो ।

तस्वीर साफ है दंडकारण्य एक बड़ा उदाहरण है उन परिस्थितियों का जो नक्सलवाद जैसे किसी भी जुझारु, क्रांतिकारी आंदोलन के लिए अनुकूल हैं ।

आदिवासी जन आंकाक्षाओं की उस अभिव्यक्ति का जो अपने अंतहीन शोषण के खिलाफ अपनी नैसर्गिक संपदा पर अपने हक के लिए उठी है उस रणनीति और सांगठनिक क्षमता का जिसका प्रदर्शन पीपुल्स वार (अब कम्यूनिस्ट पार्टी माओवादी) ने किया उस हिंसा का जिसके छींटे लोकतंत्र के दामन को खून से रंग रहे हैं और उस बाजार परस्त शासन व्यवस्था का जिसमें सुधार के लक्षण दूर दूर तक नहीं दिख रहे हैं. शायद देश के बाकी नक्सल प्रभावित इलाकों की तस्वीर भी ऐसी ही है ।

अब हमहुं सीरियस बानी : लालू प्रसाद

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/24/2009 05:00:00 AM


लालू जी बिहार में राज्य सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं. आपकी प्रतिक्रिया?

लालू प्रसाद : तीन साल हो गये! 60 फीसदी समय समाप्त? हम का बतावें. आप ही
लोग बताइए का हुआ तीन साल में?


आप पर आरोप है कि आपने बिहार को रसातल में डुबा दिया था.
लालू प्रसाद : रसातल क्या प्रलय से भी बुरा होता है. हमने जानबूझ कर ऐसी
बाढ़ तो नहीं ही लायी थी, जिससे एकबारगी लाखों लोग बेहाल हो गये. हमने
सामाजिक न्याय का बैनर लगाकर राज किया था और सामाजिक न्याय के झंडे को
झुकने नहीं दिया. ये विकास का बैनर लगाकर राज कर रहे हैं क्या हुआ विकास
आप ही बताइए. इनके देखा-देखी मैंने भी रेल में विकास का बैनर लगाया और
दुनिया देख रही है कि रेल में विकास हो रहा है.



लेकिन जदयू के लोग कहते हैं कि रेल का भविष्‍य बरबाद कर रहे हैं आप?
लालू प्रसाद : विकास से भविष्‍य बरबाद ही होता है. मार्क्स, गांधी, कबीर
से लेकर सभी साधु संतों ने यही बतलाया है कि धन-दौलत, सुविधा आदमी को
बरबाद करते हैं, सभ्यता को चौपट करते हैं. लेकिन जब बहुत विकास, विकास
सुना तो हमने कहा कि ई भी करके दिखलाते हैं और दिखला दिया. बिहार में
सामाजिक न्याय का बैनर लगाया था, रेल में विकास का बैनर लगाया. हमने
दोनों जगह औसत से बेहतर किया. जनता से पूछकर देखिए मेरे बारे में.



जनता तो आपको चारा घोटाला से जोड़कर देखती है.
लालू प्रसाद : पांव फिसल गया था और उसकी सजा भी भुगत ली. जेल गया, फजीहत
झेली. लेकिन यह अब पुरानी बात हो गयी. लेकिन नीतीश का तो सारा घोटाला है.
सारे अफसर और मंत्री भ्रष्‍टाचार में डूबे हैं. पग-पग पर घोटाला. अफसर पर
मंत्री का और मंत्री पर मुख्यमंत्री का भरोसा नहीं है. मंत्रियों के
ट्रांस्‍फर लिस्ट को मुख्यमंत्री रद्द करते हैं. लूट की संस्कृति बन रही
है.



लेकिन नीतीश कुमार को तो जनता ईमानदार मानती है.
लालू प्रसाद : हम 1974 में जेपी के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे थे. तब
बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफुर थे. जिसे लोग चचा गफूर कहते थे.
ईमानदार थे. जेपी भी उन्हें ईमानदार मानते थे. लेकिन ईमानदार चचा गफूर के
चारों ओर भ्रष्‍ट लोग बैठे थे. उससे भी बुरा हाल आज है.



आप पर परिवारवाद का भी आरोप है. आपने पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया, जो
एक दिन पहले तक रसोईघर संभालती थीं. उन्हें राजनीति का कोई ज्ञान नहीं
था.
लालू प्रसाद : मंडन मिश्र का सुग्गा भी संस्कृत बोलता था. पॉलिटिकल
परिवार का नौकर-चाकर भी राजनीति जान जाता है. वो तो मेरी पत्नी हैं. आज
नीतीश भी तो महिलाओं के विकास की बात करते हैं. एतना को मुखिया बनाया
एतना को सरपंच. तो जानते हैं न सौ चोट सोनार का एक चोट लोहार का. हमने
एके बार सीएम बना दिया एक महिला को. कहा जाता है क्रांति घर से की जाती
है. हमने घर से क्रांति की. इस कलियुग में लोग तरह-तरह से औरतों को तबाह
करते हैं. आग लगाते हैं, जहर-माहुर खाने के लिए मजबूर करते हैं. हमने
अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाया. अगर यह गलती है तो मैं गलत हूं.



लालू जी आप रेल के विकास की बात करते हैं लेकिन विकास के नाम पर आप जनता
का सरेआम पॉकेट काट रहे हैं. साइड शायिका आपने दो से बढ़ाकर तीन कर दिया.
तत्काल योजना, टिकट लौटाना सब महंगा हो गया.
लालू प्रसाद : विकास का मतलब ही है आंख बंद डिब्बा गायब. यही सब विकास का
जादू-टोना है. आप तो सब भेदे खोल दे रहे हैं.



ठीक है नहीं खोलेंगे भेद. लेकिन जमीन लेकर रेलवे में नौकरी देने का आप पर
आरोप है, उस पर आपका क्या कहना है?
लालू प्रसाद : हम भुमिहीन परिवार से आते हैं और गरीब-गुरबा की राजनीति
करते हैं. विनोबा जी को लोग जैसे भूदान करते थे, वैसे ही हमको भी दान
करते हैं लोग. गरीबों को यह मंजूर नहीं कि गरीबों का नेता भी गरीब रहे.
अब जहां लेन-देन की बात है तो यह तो राजनीति में जमाने से चलता है. सुभाष
बाबू ने कहा था तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. जो लोग कुछ
पढ़ते, समझते नहीं, वहीं लोग हम पर आरोप लगाते हैं. नीतीश के दो ठो कुकुर
हैं, वही दोनों भौंकते हैं. लेकिन वो लोग क्या कहेगा. एक तो बन डमरू है,
हिस्टीटर है, उसकी बात को कोई सीरियसली नहीं लेता. और रहे दूसरे. तो
बेचारे डालडा के डिब्बे की तरह चिकने-चुपड़े आदमी हैं. कर्पूरी जी के
दुलरूआ थे. लेकिन उन्होंने भी कुछ देकर ही पद-प्रतिष्‍ठा हासिल की है.
सारा बिहार जानता है. गीत सुना है न. बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.



अब महाराष्‍ट्र मसले पर आइए लालू जी. आपने महाराष्‍ट्र सरकार की आलोचना
की. राज ठाकरे पर निशाना साधा. लेकिन जिस रोज कैबिनेट की बैठक हो रही थी
आप भागकर पटना राहुल राज के घर पहुंच गये. क्यों?
लालू प्रसाद : अरे भाई, लोग रगेदा-रगेदी किये था. लेट होता तो कामे
गड़बड़ा जाता. राहुल राज संभ्रांत भुमिहार परिवार से था. भुमिहार बहुत
वोकल हैं बिहार में. नीतीश अपना वोट पक्का कर रहा था. हम तो केवल उसको
डायलूट कर रहे थे. भूमिहार हमको वोट कहां देता है. जादे बकबक न करे मेरे
खिलाफ, मैं तो बस एतना ही चाहता हूं. देर करने से काम गड़बड़ाता.



तो यह सब वोट की राजनीति हो रही थी. हमने समझा आप तीनों नेता बड़े मसले
पर एकजुट हुए हैं.

लालू प्रसाद : जरूर हुए हैं एकजुट हम सब ने इक्ट्ठे प्राइम मिनिस्टर साहब
से बात की. लेकिन जो सच है सो सच है. ई राहुल राज तो खैर नाजुक बच्चा था
नहीं मारना चाहिए था बेचारे को. लेकिन नीतीश जितने तत्पर हुए तो क्या ऐसे
ही. गरीब का बेटा मारा जाता तो नीतीश ऐसे तत्पर होते क्या? एतना एनकाउंटर
हुआ और गरीबों के एक से एक होनहार नेताओं को मारा गया. कोई कुछ नहीं
बोला. लेकिन आज राहुल राज पर सब बोल रहा है. सब बोल रहा है तो हम भी
बोलेंगे. नहीं बोलेंगे तो लोग बोलेगा कि नहीं बोले. असली बात भी बोलेंगे
और काम की बात भी बोलेंगे.



लालू जी, जदयू सांसदों के इस्तीफे पर क्या कहना है आपका?
लालू प्रसाद : नौटंकी है और क्या. चुनाव से दो महीना पहले इस्तीफा दे रहे
हैं. एक कहावत है बांझ गाय बाभन के दान. ऐसी नौटंकी उन्हीं को मुबारक हो.
पब्लिक सबकुछ जानती है. हिम्मत है तो राज्य सभा से भी इस्तीफा करें. और
उससे भी बढ़कर नीतीश स्वयं अपने पद से इस्तीफा करें.

आप इस्तीफा क्यों नहीं करते?
लालू प्रसाद : पहले नीतीश इस्तीफा करे हम भी कर देंगे. लेकिन हम जानते
हैं कि वह नहीं करेगा. वो नौटंकी कर रहा है.


लेकिन आपकी अब तक की राजनीति नौटंकी शैली की ही तो रही है.
लालू प्रसाद : थी, अब नहीं है. अब हमहुं सीरियस बानी.

पिछले  इंटरव्यू की तरह यह भी काल्पनिक है, एक साल पुराना है और इसलिए कुछ सवाल-जवाबों को समझाने के लिए के लिए आपको जेहन  पर जोर डालना पड़ेगा.  तीन साल-तेरह सवाल पुस्तिका से साभार है.  यह पूरी शृंखला आप यहाँ पढ़ सकते हैं.




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बिहार के लोग बिहार को बरबाद नहीं होने देंगे : सुशासन बाबू से बातचीत

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 07:00:00 PM


साधो राह दुनो हम देखा

सबसे पहला सवाल आपके घोषणा पत्र से. पार्टियां नये-नये वायदे तो करती
रहती हैं और बराबरी व धर्मनिरपेक्षता जैसे नारे लगभग सभी पार्टियों के
होते हैं. लेकिन अक्टूबर,2005 के चुनाव में आपका दो नया नारा था, जो अन्य
पार्टियों से अलग था-वह था 'न्याय के साथ विकास' और जाति निरपेक्षता का
नारा. उनका क्या हुआ?

सुशासन बाबू : हमने इसमें थोड़ा संशोधन किया. हमें विकास करना था लेकिन
न्याय के साथ विकास संभव नहीं दिखता था इसलिए भ्रष्‍ट्राचार के साथ विकास
का इरादा बनाया. जाहिर है इसे नारा नहीं बनाया जा सकता था. क्योंकि बिहार
के लोग पिछड़ी मानसिकता के होते हैं और भ्रष्‍ट्राचार को पसंद नहीं करते.
यह सत्य-अहिंसा की भूमि रही है और यहां के लोगों को भ्रष्‍ट्राचार से
लड़ने में बड़ा मन लगता है. लेकिन एक महान अर्थशास्‍त्री, जिसे हमने
सांसद बनाया है, ने हमें बतलाया कि विकास के लिए भ्रष्‍ट्राचार जरूरी
होता है. तो इस तरह हमने भ्रष्‍ट्राचार के साथ विकास को आगे बढाया. न्याय
के चक्कर में हमेशा महाभारत हुए हैं और हमें शांतिपूर्ण वातावरण में
विकास को संभव बनाना है. यह भ्रष्‍ट्राचार के साथ ही संभव था. हमें पता
है कि हर स्तर पर घूसखोरी बढ़ी है. मंत्री से संतरी तक खुलेआम
भ्रष्‍ट्राचार कर रहे हैं. लेकिन विकास भी हो रहा है.

और जाति निरपेक्षता?
सुशासन बाबू : वह मेरा गढ़ा हुआ शब्‍द नहीं था. निरपेक्षता नकारात्मक
होती है. मैं सापेक्षता में विश्‍वास करता हूं. इंजीनियर हूं. आइंसटीन के
सापेक्षतावाद को जानता हूं. मैंने जाति निरपेक्षता को जाति सपेक्षता में
बदल दिया है. प्रधान सचिव, निजी सचिव से लेकर झाड़ू लगाने वाले तक को
अपनी विरादरी का रखा है. इसके बड़े फायदे हैं. लालू माई का हिज्जे करते
थे, तोड़ते थे-एम फॉर माइनॉरिटी और वाई फॉर यादव. मैंने माइ को मुकम्मल
रखा है. माई का मतलब-माई. मेरी जाति.

क्या यह सही है आपने कभी जाति से जमात की ओर जैसी बात कही थी? लेकिन
हकीकत यह है कि पहले से तय जमातों को आपने टुकड़ों में तोड़ दिया. ओबीसी
से अतिपिछड़ा और दलित से महादलित बना दिया. आपका इरादा क्या है?

सुशासन बाबू :
इरादा स्पष्‍ट है. बांटों और राज करो सत्ताधारियों का
पुराना नारा है. हमने इस पर वैज्ञानिक ढंग से अमल किया है. इसके फायदे आ
रहे हैं.

किसे हो रहा है फायदा? आपको या समाज को?
सुशासन बाबू :
मेरे समाज को. मतलब मेरी जाति को. मैं मुश्किल से डेढ़
परसेंट वाला हूं. समाज को इस तरह तोड़े बगैर मेरा काम नहीं चलेगा. अंगरेज
कम थे. उन्हें भी राज करने के लिए भारतीय समाज को तोड़ना पड़ा था.

आपकी जाति के बारे में भी सवाल उठते हैं? कुछ आपको कुरमी कहते हैं लेकिन
कुछ का कहना है कि आप कुरमी नहीं अवधिया हैं. कुरमी तो जानता हूं, यह
अवधिया क्या होता है?

सुशासन बाबू : हम लोग अवध से आये हैं इसलिए अवधिया हैं. जैसे नेहरू
कश्‍मीर से आये हुए कश्‍मीरी थे. या सोनिया इटली से आयी हुई इटालियन हैं.
बौद्धों को जड़ मूल से साफ करने के लिए पुश्‍यमित्र मत्र शुंग ने हमारे
पुरखों को अवध से लाकर इधर बसाया था. हमने यहां आकर बौद्धों को ही नहीं,
मुसलमानों को भी जड़ मूल से साफ कर दिया. नगरनौसा का इतिहास उठा कर देख
लीजिए. हमलोग बहादुर कौम के लोग हैं. बेलछी-पिपरा का मेडल भी हमारी
बिरादरी के पास है. जब हमलोग यहां बस गये तो प्रभाव जमाने के लिए अपने को
कुरमी में समाहित कर लिया और उसके माथा बन गये. कुछ साल लव-कुश का नारा
देकर कुशवाहों को भी अपने जाति साम्राज्य में शामिल किया था, लेकिन वे
छिटक कर अलग हो गये.

कहा जाता है कि कुशवाहों का आपने शोषण किया? क्या यह सच है?
सुशासन बाबू : शोषण नहीं किया. उल्लू जरूर बनाया. न बनाता तो सीएम कैसे
बनता. उनके कई उल्लुओं को कैबिनेट में रखा है.

सुना जाता है कि आपके कैबिनेट में जाहिल मंत्रियों की भरमार है. क्या बात है?
सुशासन बाबू :
मैं ज्ञानमार्गी नहीं भक्तिमार्गी हूं. मुझे ज्ञानी नहीं
भक्त चाहिए. आजकल भक्तों को चापलूस कहा जाने लगा है, यह अच्छी बात नहीं
है. प्रबंधन का पहला मंत्र है कि जाहिल नौकर रखो. काबिल नौकर रखकर लोग
फेर में पड़ते हैं. नौकर ही मालिक बन जाता है. यह काम मैं नहीं कर सकता.
मैं जीरो वॉट के बल्व पसंद करता हूं. सुरक्षित होते हैं. सौ-हजार वाट के
बल्व हमें नहीं चाहिए.

अब विकास की बात करें. चुनाव के दौरान आप अपने भाषणों में शेरशाह को
उद्धृत करते थे. बतलाते थे कि शेरशाह की तरह ही मैं कम समय में प्रभावी
काम करुंगा. शेरशाह केवल साढ़े चार साल हिंदुस्तान का बादशाह रहा. उसने
कलकत्ता से पेशावर तक सड़क बनवायी. जिसे आज जीटी रोड कहा जाता है. आपके
राज का तीन साल-मतलब दो तिहाई खत्म हो रहा है लेकिन अभी तक पटना से
शेरशाह के शहर सासाराम तक भी साबूत सड़क नहीं बनी.
सुशासन बाबू :
सड़क बनवाकर मैं सड़क पर नहीं होना चाहता. सुना है न
मुहावरा सड़क छाप. नहीं बनना मुझे सड़क छाप.

यह मजाक की बात नहीं है. बिहार की तमाम सड़कें पहले से भी बरबाद हो गयी
हैं. आप आंख मिलाकर बात तो कीजिए.
सुशासन बाबू :
विकास होगा. सड़कें बनेंगीं. यह निर्माण के पहले का
विध्वंस आप देख रहे हैं. दो कदम आगे बढ़ने के लिए एक कदम पीछे भी हटना
पड़ता है.

लेकिन आप तो पांच कदम पीछे दो कदम आगे का कदम ताल कर रहे हैं. बिहार
जरूरत से ज्यादा पीछे चला गया है.
सुशासन बाबू :
अखबार देखिए. अखबार मेरी तारीफ के पुल बांधते हैं.

जी नहीं, चापलूसी करते हैं. वे जब सही छापते हैं तो आप उनका विज्ञापन बंद
करते हैं. आपने तो गोयवेल्सों की टीम खड़ी कर दी है.
सुशासन बाबू :
तो क्या आप हमें हिटलर कहना चाहते हैं?

नहीं हिटलर कहना नहीं चाहता, अपनी बात रखना चाहता हूं.
सुशासन बाबू :
लेकिन आपको जानना चाहिए कि हिटलर इतना बुरा आदमी नहीं था.
उसे जर्मनी के विकास की चिंता थी. हमें भी बिहार के विकास की चिंता है.

लेकिन हिटलर के कारण जर्मनी बरबाद हो गया था. 
सुशासन बाबू : बिहार के लोग बिहार को बरबाद होने नहीं देंगे. आप विशवास मानिए.

मन थोडा हल्का हुआ? यहाँ हमने सुशासन बाबू का एक काल्पनिक इंटरव्यू पेश किया. इस का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है (और अगर कोई साम्यता हुई तो यह महज इत्तेफाक होगा). यह इंटरव्यू हाशिया पर इधर कुछ समय से चल रही बेहद गंभीर पोस्टों से उबरने के लिए पेश किया जा रहा है. आगे इसी तरह की एक और बातचीत भी प्रस्तुत की जाएगी. कहने की ज़रुरत नहीं, (या है?) की यह पोस्ट बिहार पर ही हमारी शृंखला की अगली कड़ी है और तीन साल तेरह सवाल से साभार ली गयी है.

बिहार : जिस-जिस ने मांगा हक, सबको मिली लाठी

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 05:00:00 PM

बढ़ते अपराध के कारण जिस बिहार को जंगल राज का नाम दिया गया था, वहां आज अपराध की क्या हालत है, और पुलिस महकमे की आतंरिक राजनीति क्या है, और क्यों बिहार में पिछले कुछ सालों में लगभग हर जनांदोलन पर पुलिसिया लाठी-गोली बरसी है, इसे जानते हैं निरंजन के इस आलेख में. यह बिहार पर हमारी पोस्टों की शृंखला की ताज़ा कड़ी है.  

जरा याद कीजिये. वर्ष 2005 का बिहार विधान सभा चुनाव. एक ओर लालू प्रसाद थे, तो दूसरी ओर नीतीश कुमार. जनता कोई विकल्प ढूंढ रही थी. एक बेहतर विकल्प के रूप में नीतीश कुमार जनता के खांचे में फिट बैठ रहे थे. लोक-लुभावन वादे किये जा रहे थे. प्रदेश की जर्जर सड़क, खराब बिजली व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक करने का आश्‍वासन तो था ही, साथ ही यह भी कहा जा रहा था की नीतीश कुमार की सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. वह बिहार की जनता को 'जंगल राज' से मुक्ति दिलायेंगे. यह वह दौर था, जब समाचार पत्रों में रोजाना अपहरण, हत्या, लूट की खबरें देखने को मिल रहीं थी. शहरों का मध्यवर्ग इससे उब चुका था. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार का यह कहना कि मेरी सरकार बनी तो तीन माह में कानून का राज स्थापित होगा. जात-पात से उपर उठकर बिहार का विकास होगा. मध्यवर्ग के लिए डूबते को तिनका के सहारे के समान था. चुनाव हुआ और जनता ने जोरदार समर्थन देकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान किया. बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार बनी. पिछले सालों में अन्य वादों की ही तरह इस सरकार का 'कानून का राज' स्थापित करने का वादा भी धराशायी हो गया है. इन सालों में छोटे अपराधों पर तो कुछ सख्ती बरती गयी है लेकिन बड़े अपराधियों को खुली छूट मिली है. बड़े आपराधिक धंधों को जहां बड़ी सफाई से संस्थागत रूप दे दिया गया है वहीं गरीबों पर पुलिसिया जुल्म में काफी बढ़ोत्‍तरी हुई है.आइये अब जानें कि कानून का राज स्थापित करने वाली सुशासन सरकार का पुलिसिया ढांचा क्या है. नीतीश सरकार गठन के पहले से पुलिस महानिदेशक के पद पर कुरमी जाति से आने वाले आशीष रंजन सिन्हा काबिज थे. नीतीश सरकार ने उन्हें तो पद पर बरकरार रखा लेकिन सरकार बनने के एक माह बाद ही दिसंबर, 2005 में भूमिहार जाति से आने वाले अभ्यानंद को अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर बिठा कर पूरा पुलिस महकमा उनके हाथों में सौंप दिया. अभ्यानंद की छवि पैसा के मामले में ईमानदार लेकिन जाति के मामले में बेईमान अधिकारी की रही है. एडीजी रहते हुए भी उनपर जात-पात करने के आरोप लगे.यहीं से शुरू हुआ 'कुर्मी को ताज, भूमिहार का राज' तथा 'नीतीश कुमार-नया बिहार, थोड़ा कुरमी-ज्यादा भुमिहार' का जुमला. जब तक आशीष रंजन सिन्हा और अभ्यानंद अपने पदों पर रहे, उनके बीच छत्‍तीस का आंकड़ा बना रहा है. दोनों अधिकारी अपना-अपना 'राज' समझ कर एक-दूसरे के आदेश को ठेंगा दिखाते रहे। डीजी अपने आदमियों को मलाईदार पोस्टिंग दिलाने में दिलचस्पी दिखाते, तो अभ्यानंद अपने पसंदीदा पदाधिकारी को रूतबे वाली कुर्सी पर विराजमान करने की फिराक में रहते। लिहाजा पुलिस मुख्यालय में गुटबाजी चरम सीमा पर रही। आशीष रंजन सिन्हा की सेवानिवृनि का समय आया तो इन दो अधिकारियों के माध्यम से कुर्मी-भूमिहार के बीच सना संतुलन बना रहे मुख्यमंत्री ने अभ्यानंद को भी चलता कर दिया. 8 अप्रैल, 2008 को अभ्यानंद को भी आशीष रंजन सिन्हा के साथ ही बीएमपी का डीजी बनाकर पुलिस मुख्यालय से विदा कर दिया गया.जब तक ये दोनों अधिकारी मुख्यालय पर काबिज रहे पुलिस महकमे के अन्य अधिकारियों के लिए पुलिस हेडक्वार्टर के लिए 'हेडकक्वार्टर' बना रहा.

दरोगा बहाली

सरकार बनने के साथ ही पुरानी दारोगा बहाली को रदद करते हुए नयी दारोगा बहाली की घोषणा हुई थी तथा बहाली को पूरी तरह निष्‍पक्ष कराने का सपना अभ्यार्थियों को दिखाया गया था. बिहार में 1994 के बाद से दारोगा की बहाली नहीं हुई है. बेरोजगारी से जूझ रहे छात्रों को सुशासन में भरोसा तो हुआ, लेकिन बहाली प्रक्रिया 'बीरबल की खिचड़ी' साबित हुई है.

अमीर दास आयोग

अपराध समाप्त करने का दावा करने वाले सुशासन बाबू ने सरकार बनते ही अमीर दास आयोग को भंग कर दिया। यह आयोग रणवीर सेना के राजनीतिक संबंधों की जांच कर रहा था. आयोग की रिपोर्ट से राज्य सरकार में काबिज किन-किन दिग्गजों पर गाज गिरने वाली थी, यह अब किसी से छुपा नहीं है. स्पीडी ट्रायल 'कट्टा पकड़ने पर स्पीडी ट्रायल, एके-47 से मुख्यालय घायल'. स्पीडी ट्रायल का जिक्र आते ही एक वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी यह जुमला सुना डालते हैं. वास्तव में 'स्पीडी ट्रायल' पूरी तरह हास्यास्पद साबित हुआ है. इसकी शुरूआत कथित तौर पर सभी दलों के बड़े अपराधियों पर लगाम कसने के लिए की गयी थी. लेकिन हुआ उल्टा है. इस बड़े जाल में छोटी मछलियां तो फंस जा रही हैं लेकिन मगरमच्छ जाल फाड़ कर निकलवा दिया जा रहा है. इसके प्रमाण हैं अनंत सिंह और प्रभुनाथ सिंह जैसे लोग. महाराजगंज से जदयू सांसद प्रभुनाथ सिंह वर्ष 95 में मशरख में हुए दोहरा हत्याकांड के अभियुक्त थे, लेकिन सरकारी गवाह हाजिर नहीं हुए और पिछले दिनों वे आराम से बरी हो गये.

जिस-जिस ने मांगा हक, सबको मिली लाठी

पिछले तीन सालों में पटना के लोगों के 'अमन-चैन' के नाम पर प्रजातांत्रिक विरोधों को लगभग प्रतिबंधित कर दिया है. जयप्रकाश नारायण द्वारा छात्र आंदोलन के दौरान बैरिकेटिंग तोड़ने की घटना का फक्र से जिक्र करने वाले-सत्ता में बैठे उनके चेलों को इतना भी बर्दाश्‍त नहीं है कि आंदोलनकारियों का कोई जत्था विधान सभा की ओर जाने वाले रास्ते में आर ब्लॉक चौराहे पर बने बैरिकेटिंग को छुए भी. नीतीश सरकार ने अपने शासन की शुरूआत से ही यह साफ कर दिया था. किसी को भी सरकार के विरोध में आवाज उठाने की इजाजत नहीं दी जाएगी. आम लोगों का संगठन हो अथवा शिक्षकों, डॉक्टरों, छात्रों, कर्मचारियों का-जिसने भी प्रभावशाली विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए, उसे पुलिस का बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा. सबसे अधिक मार उन संगठनों के लोगों को खानी पड़ी जिसके लोगों ने बड़ी संख्या में पटना पहुंच राज्य सरकार को अपनी बात सुनानी चाही. महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्‍शा गया. शिक्षा मित्र, वाम छात्र संगठनों, आशा कार्यकर्ताओं, दारोगा भर्ती के उम्मीदवारों, पीएमसीएच के जूनियर डॉक्टरों, वित्त रहित शिक्षकों समेत लगभग डेढ़ दर्जन संगठनों को विरोध प्रदर्शनों के दौरान बर्बर लाठी चार्ज झेलना पड़ा है. वास्तव में स्थिति यह हो गयी है कि लाठी चार्ज के भय से कोई भी संगठन अब पटना में प्रदर्शन करने से पहले दस बार सोचता है. अतिक्रमण हटाने के नाम पर राजधानी के गरीबों पर तो लगभग हर दो-तीन महीने पर लाठियां बरसायी ही जा रही हैं. पटना के अलावा अन्य जिलों के प्रशासन को भी विरोध प्रदर्शनोंसे सख्ती से निपटने के आदेश दिये गये हैं. कहलगांव में तो बिजली की मांग पर विरोध कर रहे स्थानीय लोगों पर सिर्फ लाठियां ही नहीं भांजी गयीं, गोली तक चलायी गयी।


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अपराधियों को बचाने के लिए पुलिस ने जेएनयू छात्रों पर किया लाठी चार्ज

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 02:10:00 PM

कल दोपहर से हम इस मामले जूझ रहे थे. जैसा की भाई चन्दन पाण्डेय की इस रिपोर्ट में आप देखेंगे, रसूखवाले अपराधियों को बचाने में पुलिस ने बेहद तत्परता दिखाई. दोपहर बाद साढ़े तीन बजे से पुलिस जेएनयू के गेट पर जमी रही और उसने पूरी कोशिश की कि अपराधी बचा लिए जाएँ. लेकिन जब छात्र अड़े रहे तो उसने निर्ममता से उन पर लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इसमे बान, कुसुम समेत हमारे कई साथी घायल हुए. लेकिन दुर्भाग्य की बात है की देर रात हुए सभी छात्र संगठनों की मीटिंग में आइसा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे संगठनों के सदस्यों ने इस मामले में छात्रों की ही गलती को रेखांकित किया और माफीनामा जैसा कुछ लेकर आने की कोशिश की, जिस पर अनेक छात्रों और संगठनों ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. यहाँ भी देखें.




कोई सुने तो शायद ही विश्वास करे कि भारत के सबसे अग्रणी विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ इतना अमानवीय सलूक किया गया। एक मामूली विवाद, जिसमें जेनयू के छात्रों का ज़रा-सा भी दोष नहीं था, पुलिस ने अपराधियों को बचाने के लिए निर्दोष छात्रों पर लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज में पचास से ऊपर छात्र घायल हुए हैं। पंद्रह छात्रों की हालत गंभीर है। सबसे पहले हम निर्दोष छात्रों के स्वस्थ होने की प्रार्थना करेंगे फिर आगे की बात।

घटना कुछ यूं घटी : चार बिगड़ैल रईसजादे जेनयू आये। 24×7 ढाबे पर उन्‍होंने शराब की महफिल जमायी। फिर नशे मे चूर होकर छात्रों से बदतमीजी की। छात्रों ने, जो आजकल सेमेस्टर परीक्षाओं की तैयारी मे लगे हैं, पहले तो इनकी “तमीजदार” हरकतों पर ध्यान नहीं दिया, पर जब एकजुट होकर विरोध करने लगे तो चारों गुंडे भाग निकले।

गुंडों के पास कार थी, इसलिए इनकी रफ्तार के नीचे आने से बाल-बाल बचे लोगों ने विश्‍वविद्यालय सुरक्षा को फोन मिलाया। जेएनयू मेन गेट पर जब सुरक्षाकर्मियों ने इन्‍हें रोका, तब इन चार गुंडों मे से एक ने पिस्टल दिखाया। पिस्टल देखते ही बड़ा दरवाजा बंद कर दिया गया। मेन गेट पर एक नहीं, दस-पंद्रह सुरक्षाकर्मी रहते हैं। जैसे ही मेन गेट बंद हुआ, कहानी शुरू हो गयी। चूंकि विश्वविद्यालय की सुरक्षा का ज़‍िम्‍मा निजी कंपनी के हाथों मे है, इसलिए उनके सारे अधिकार दिल्ली पुलिस के पास गिरवी हैं। उन्‍होंने तुरंत दिल्ली पुलिस को बुला लिया और “महान” दिल्ली पुलिस ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया – उन चार गुंडों को बचाने का काम।

ख़बर है कि चारों बेहद शक्तिशाली घराने से हैं। दिल्ली पुलिस कितनी ताक़तवर है या दिल्ली पुलिस का एक हाईस्कूल पास सिपाही (साथ में अधिकारी भी थे) कितना ताक़तवर है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि छात्रों तथा सुरक्षाकर्मियों के लाख आग्रह के बावजूद दिल्ली पुलिस की महान सत्ता ने एफआईआर मे पिस्टल को पिस्टल नहीं लिखा। कभी उसे खिलौना बंदूक लिखा, तो कभी लाइटर लिखा, तो कभी कुछ लिखा।

छात्रों की मांग बस इतनी थी कि इन चार गुंडों की शिनाख्त हो। पता तो चले कि ये हैं कौन, जिनके अमीर खानदान की गुलामी दिल्ली पुलिस तक कर रही है, जो आराम से जेनयू मे बंदूकें लहराते दिखाई पड़ते हैं? पर दिल्ली पुलिस ने यह नहीं होने दिया। और अंतत: जो हुआ, वो यह कि सैकड़ों निर्दोष छात्र अपनी मामूली मांग के बदले पुलिस की बेरहम लाठियों से पीटे गये। आंसू गैस के गोले छोड़े गये। हवाई फायर हुआ। ख़बर यह भी है कि कुछ छात्र गोली का शिकार हुए हैं। मैं चाहूंगा कि ये ख़बर अफवाह बन जाए। नौजवानों की मृत्यु की ख़बर से वीभत्स कोई दूसरी ख़बर नहीं होती है।

उन चार गुंडों को बचाने में लगी पुलिस इस कदर मुस्तैद थी कि घटनास्थल पर तीन वैन लाठी-बंदूक से लैस पुलिस पहले ही बुला ली गयी। फिर दो वैन आरएएफ (rapid action force) भी बुला लिया गया। जहां पुलिस अपने सारे काम शातिरपने के साथ पूरी कर रही थी, वहीं छात्र अपनी बात किसी तक पहुंचा नहीं पा रहे थे। मसलन “ताकतवर” मीडिया भी घटनास्थल पर सात बजे के बाद पहुंची है, जबकि छात्र कुछ गुंडों की शिनाख्त की यह लड़ाई दिन के दो बजे से लड़ रहे थे।

विश्वविद्यालय के नख-दंतविहीन सुरक्षाकर्मियों के पास हथियार की जगह वॉकी-टॉकी है। ऐसे में छात्रों के पास बस एक ही हथियार था कि वो मेन गेट खुलने न दें। पुलिस का सारा ज़ोर इसी पर था कि मेन गेट खुले और दिल्ली पुलिस (एसीपी रैंक तक के अधिकारी घटनास्थल पर थे) अपने मालिकों के मुस्टंडे बच्चों को लेकर भाग निकले, कुछ रिश्वत पानी का इंतज़ाम हो, कोई प्रोन्नति मिले।

उन चारों को पुलिस की गाड़ी, जो मेन गेट के अंदर थी, में रखा गया था। आप छात्रों के अनुशासित और मानवोचित विरोध का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि वो चारों मेन गेट के इस पार थे, जहां छात्रों की तादाद पांच सौ से ऊपर थी। फिर भी कोई शारीरिक क्षति उन गुंडों को छात्रों ने नहीं पहुंचायी।

पुलिस की मुस्तैदी का दूसरा नमूना यह निकला कि मीडियाकर्मियों तक को उन चार “बहादुरों” की तस्वीर उतारने की इजाज़त नहीं दी गयी। छात्रों के पास शाम के आठ बजे तक कोई नेता तक नहीं था। हालांकि जो ख़बरें अभी रात के दो बजे तक आयी है कि जिस नेता से उम्मीदें थीं, जब वो सामने आया तो छात्र अपनी लड़ाई और मनोबल दोनों हार गये। क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगों का नाम लेना ज़रूरी है?

अभी निहत्थे छात्र अपनी मांग मनवाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक से मेन गेट खुल गया और लाठीचार्ज का आदेश हो गया। जो मौक़े पर थे, उनका कहना है कि एक-एक छात्र को पांच-पांच पुलिस वाले पीट रहे थे। छात्राओं तक को नहीं बख्शा गया है। ख़बरों के अनुसार पचास से ऊपर छात्र ज़ख्मी हुए हैं। उन चार गुंडों को पुलिस ने इसी बीच बाहर निकाल लिया। कल से उन गुंडों के पक्ष में दलीलें मिलनी शुरू हो जाएंगी। जो कुछ नहीं कहेगा, वो भी इतना तो कहेगा ही कि – जेनयू के लड़कों को ऐसा करने की क्या ज़रूरत थी? कुछ लोग देश के इन बेहतरीन विद्यार्थियों को पढ़ने और पढ़ते रहने की सलाह देंगे। विश्वविद्यालय के सुरक्षा नियम कुछ और कड़े हो जाएंगे, जो कि छात्रों को ही परेशान करेंगे।

अब जबकि उन चार अमीर गुंडों की पहचान नहीं हो पायी है, तो कायदे से सरकारी महकमा इस पूरी वारदात को झूठा भी करार दे सकता है। मीडिया को सरकारी विज्ञापन पाने का बेहतरीन मौक़ा छात्रों ने खुद लाठी खाकर दिया है। खुद के शरीर पर लाठी खा कर पुलिस वालों को प्रोन्नति पाने के क़ाबिल बनाने वाले छात्रों के प्रति आप क्या सोचते हैं? मैं घटनास्थल पर निहायत निजी कारणों से मौजूद था। अपने जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिलाषा को असफल होते देख अब मेरे पास लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर जब जेनयू के मेन गेट का नज़ारा देखा तो निजी दुख को कुछ पल के लिए किनारे कर वहां मौजूद छात्रों से मिला, सुरक्षाकर्मियों से मिला, पुलिसवालों से बात की। पाया कि छात्रों की मांग बिल्कुल जायज़ थी।

महामारी से ग्रस्त बिहार का मीडिया

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/23/2009 12:31:00 PM

नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार के राज-समाज कि एक मुकम्मल पड़ताल जारी है. आईये, बिहार में पिछले साल आयी बाढ़ के दौरान बिहार के मीडिया के रवैये पर दिवाकर के साथ एक नज़र डालें. यह आलेख भी तीन साल-तेरह सवाल पुस्तिका से साभार है.  यह पूरी शृंखला आप यहाँ पढ़ सकते हैं.


अगर आप अमेरिकी मीडिया के इजरायल-प्रेम को समझना चाहते हैं तो मीडिया के
शीर्ष पदों पर बैठे यहूदियों की बहुतायत को नजरअंदाज नहीं कर सकते.
-योगेंद्र यादव

यह बात बिहार के संदर्भ में भी लागू होती है. अगर आपको बिहारी मीडिया के राग-द्वेष को समझना है, तो यह भी जानना होगा कि स्थानीय समाचार पत्रों, टीवी चैनलों के शीर्ष पदों पर कौन लोग हैं.योगेंद्र यादव ने मीडिया के चरित्र को समझने के लिए वर्ष 2006 में दिल्ली के प्रमुख हिंदी व अंग्रेजी मीडिया हाउसों में शीर्ष पदों पर काम करने वाले लोगों की सामाजिक पृष्‍ठभूमि का सर्वेक्षण किया था. सर्वेक्षण में यह तथ्य आया था कि दिल्ली के मीडिया हाउसों में 90 प्रतिशत शीर्ष पदों पर हिंदुओं का कब्जा है. इसमें से 49 प्रतिशत (भूमिहार व त्यागी के साथ) ब्राहमण हैं. कायस्थ 14 प्रतिशत. राजपूत 7 प्रतिशत. वैश्‍य 7 प्रतिशत. गैर द्विज उच्च जाति 2 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ी जाति के लोग 4 प्रतिशत हैं. सर्वेक्षण में इन नतीजों के आने के बाद काफी हंगामा मचा था. सारा देश इस बात से चकित था कि राष्‍ट्रीय मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर दलित और आदिवासी एक भी नहीं है और लगभग 45-60 फीसदी आबादी वाले अन्य पिछड़ा वर्ग का हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत है. इस सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आयी थी कि देश की आबादी में 13.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले मुसलमानों की संख्या मीडिया में फैसला लेने वाले पदों पर महज तीन प्रतिशत है.

अगर ऐसा ही एक सर्वेक्षण बिहार में किया जाए तो? बिहार से इस समय मुख्य रूप से 6 हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं. इनमें से पांच के संपादक ब्राह्‌मण हैं. इन छह समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख के पदों पर काबिज लोगों में 4 ब्राह्‌मण 1 भुमिहार व एक राजपूत हैं. यही हाल टीवी चैनलों का भी है. बिहार में हिंदी, अंग्रेजी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर 100 फीसदी हिंदुओं का कब्जा है. इनमें 99 प्रतिशत द्विज हैं. पिछड़ी जाति का कोई भी पत्रकार फैसला लेने वाले पद पर नहीं है. इन पदों पर दलित, मुसलमान व महिलाओं की उपस्थिति शून्‍य है. अब सवाल यह उठता है कि बिहार की इस द्विज पत्रकारिता ने किसका हित साधा है? किसने इसका उपयोग किया है? इसके अपने राग-द्वेष क्या हैं? लालू प्रसाद के 15 साल व नीतीश कुमार के तीन साल के दौरान मीडिया के रूख के तुलनात्मक अध्ययन से इन सवालों के जबाव मिलते हैं. पिछले तीन सालों से अखबार के पन्नों पर विकास की धारा बह रही है. छोटी से छोटी खबर में यह देखा जाता है कि कहीं यह नीतीश कुमार के खिलाफ तो नहीं जा रही है. लालू प्रसाद के शासनकाल में सिर्फ सुशील कुमार मोदी के बयानों को आधार बनाकर सप्ताह में चार विशेष खबर (स्टोरी) छापने वाले अखबारों को अब ध्यान से देखें. आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि पिछले तीन सालों में इन समाचार पत्रों में एक भी ऐसी खबर नहीं छपी है, जिससे नीतीश कुमार को राजनैतिक रूप से नुकसान पहुंचने की आशंका हो. विपक्षी दलों के नेताओं के बयान तक सेंसर किये जा रहे हैं. वास्तव में राजद शासनकाल के अंतिम दिनों में जिस मिशनरी सक्रियता से खबरें 'गढ़ी' जा रही थीं, उससे कहीं अधिक तत्परता से नीतीश कुमार के इन तीन सालों में खबरें 'दबायी' जा रही हैं.

कोसी में 18 अगस्त, 2008 को प्रलयंकारी बाढ़ आयी. हजारों लोग मारे गये. लोगों ने इसे बिहार में विगत एक सदी में आयी सबसे बड़ी आपदा कहा. मुख्यमंत्री तक ने इसे प्रलय कहा. यह भी साफ था कि कोसी तटबंध राज्य सरकार की लापरवाही के कारण टूटा था. लेकिन मीडिया ने चुप्पी साधे रखी. बिहार के अखबारों में इस पर एक भी खोजपरक रिपोर्ट नहीं छपी. इतना ही नहीं, बाढ़ की त्रासदी को कम से कम करके दिखाया गया. सरकारी दावे पहले पन्ने की खबर बनते रहे.

खबरों के न छपने के कारण दोतरफा हैं. एक ओर द्विज मीडिया का अपना 'लालू फोबिया' तथा जातिगत हित है तो दूसरी ओर नीतीश कुमार की प्रच्छन्न तानाशाही. नीतीश कुमार व उनके सलाहकारों ने सुनियोजित तरीके से पत्रकारों को पालतू और भ्रष्‍ट बनाया है. खोजपरक रिपोर्ट की तो बात ही छोड़िए, अखबार को भेजे गये विपक्षी दलों के बयान तक छपने से पहले मुख्यमंत्री के टेबल पर पहुंच जा रहे हैं. सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल तुरुप के पत्तों की तरह किया जा रहा है. नतीजा यह है कि बिहार से समाचार पत्र राज्य सरकार की योजनाओं, घोषणाओं की सूचना देने वाले बुलेटिन की भूमिका में पहुंच गये हैं.

एक-अणे मार्ग में नीतीश और बिहार : प्रतिक्रांति के साल

Posted by Reyaz-ul-haque on 11/22/2009 04:59:00 PM



नीतीश सरकार के चार साल 24 नवम्बर को पूरे हो रहे हैं और मीडिया की मानें तो बिहार में पिछले चार सालों में स्वर्ग उतर आया है. हर जगह चाटुकारों के चारणगीत सुने जा सकते हैं-जिसमें सरकारी प्रचार तंत्र से आगे-आगे है वहां का मीडिया (बल्कि प्रेमचंद के शब्दों को इस सन्दर्भ में कहें तो बिहार का मीडिया सरकारी प्रचारतंत्र के आगे चलनेवाली मशाल बन गया है). उसकी नज़र से देखें तो यहाँ सब तरफ फीलगुड है. पिछले कुछ सालों कि तरह इस साल भी नीतीश सरकार की तारीफ़ के पुल बंधे जायेंगे और विशेषांकों के ज़रिये जनता को बताया जायेगा कि उसे भले ही पता नहीं, सरकार उसके ऊपर कितनी मेहरबान है. मीडिया भले न करे (और हम उम्मीद भी नहीं करते), लेकिन ऐसा नहीं है कि इस सरकार पर किसी की आलोचनात्मक नज़र नहीं है. पिछले साल एक पुस्तिका आयी थी-तीन साल तेरह सवाल. हालाँकि इस पर किसी का नाम नहीं था, लेकिन पढनेवाले जानते हैं कि यह किसने लिखी-प्रकाशित की थी. इस पुस्तिका का असर यह रहा था कि खुद नीतीश कुमार तक ने इस पर नाराज़गी जताई थी.  


इस 24 तारीख को सरकार के चार साल पूरे हो रहे हैं और हम हाशिया पर इन चार सालों में बिहार की दशा-दिशा पर लेखों की शृंखला प्रस्तुत करेंगे. हालांकि इसकी शुरुआत हाशिया पर कुछ दिन पहले की पोस्ट से ही हो गयी थी, लेकिन आज से ये विशेष पोस्टें प्रस्तुत की जा रही हैं. पहली पोस्ट के रूप में तीन साल तेरह सवाल से विनोद कुंतल का एक एक प्रासंगिक लेख, साभार. कल हम एक और लेख पोस्ट करेंगे. 

अगर आपके विरोधी आपकी तारीफ करते हैं तो समझिए कि आप गलत रास्ते पर हैं.

लेनिन

चारों ओर से वाह, वाह का शोर है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वाहवाही के समंदर में उब-डूब कर रहे हैं. कोई विकास पुरुष कह रहा है, कोई सर्वश्रेष्‍ठ मुख्यमंत्री तो कोई भावी प्रधानमंत्री. इन प्रशंसकों ने उनके आसपास भव्य और गुरुगंभीर महौल सृजित करने की भी भरपूर कोशिश की है. कोसी की बाढ़ ने रंग में भंग जरूर डाला है लेकिन राग मल्हार अब भी जारी है.

कौन हैं ये प्रशंसक? क्या ये समाजवाद के समर्थक हैं? सामाजिक न्याय के हिमायती हैं? अगर नहीं, तो ये समाजवादी नेता नीतीश कुमार की प्रशंसा में कसीदे क्यों काढ़ रहे हैं? जाहिर है, नीतीश के आसपास आरक्षण विरोधियों का जमावड़ा अनायास तो नहीं ही है.

इसे समझने के लिए राजग के वोट समीकरण व नीतीशकुमार की मानसिक बुनावट को समझना होगा. राजग 'नया बिहार-नीतीश कुमार' के नारे के साथ सत्ता में आया है. अगर नीतीश कुमार का नाम न होता तो राजग को अति पिछड़ी जातियों, पसमांदा मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलता. मार्च, 2005 में हुए विधान सभा चुनाव में भी माना जा रहा था कि राजग सत्ता में आया तो नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन गठबंधन के स्तर पर इसकी साफ तौर पर घोषणा नहीं की गयी थी. उस चुनाव में अपेक्षा से कम वोट मिलने के बाद राजग (भाजपा) को महसूस हुआ कि किसी पिछड़े नेता के नाम के बिना उसकी नैया पार नहीं हो सकती. इसलिए राष्‍ट्रपि‍त शासन के बाद फिर चुनाव हुआ तो भाजपा ने नीतीश को बतौर मुख्यमंत्री घोषित करते हुए- 'नया बिहार-नीतीश कुमार' का स्लोगन बनाया. इस स्लोगन के अपेक्षित परिणाम आये. नीतीश कुमार को फेन्स पर खड़े पिछड़े तबके ने दिल खोलकर वोट दिया. दरअसल, वे लालू को किसी अपर कास्ट नेता से पदच्यूत कराना नहीं चाहते थे. इस तरह नीतीश कुमार ने बाजी जीती. लेकिन नीतीश कुमार को हमेशा यही विश्‍वास रहा कि उनकी जीत उंची जातियों के सहयोग के कारण हुई है. पिछड़ी जातियों के सहयोग को उन्होंने नजरअंदाज किया.

दरअसल नीतीश को दो तरह के वोट मिले थे. एक तो सामंतों का वोट था दूसरा पिछड़ों का. सामंतों का वोट बहुप्रचारित 'पिछड़ा राज' हटाने के लिए था. पिछड़ों का वोट विकास के लिए था.लेकिन सत्ता में आने के साथ ही सामंती ताकतों ने उन्हें अपने घेरे में लेना शुरू कर दिया. सत्ता के शुरूआती दिनों में नीतीश ने इसका प्रतिरोध किया लेकिन पांच-छह महीने में ही वह इन्हीं ताकतों की गोद में जा बैठे. उनके इस आत्मसमर्पण के साथ ही बिहार में के प्रतिक्रांति दौर की शुरूआत हो गयी. लंबे संघर्ष से बिहार के पिछड़े तबकों को जो आत्मसम्मान हासिल हुआ था, उसे अचानक ध्वस्त किया जाने लगा. पंचायत से लेकर विधानमंडल तक के जनप्रतिनिधियों पर द्विज नौकरशाही का शिकंजा कस दिया गया. रणवीर सेना जैसे संगठन का तो जैसे राज्य-सत्ता में विलय ही हो गया. दूसरी ओर माओवाद को खत्म करने के नाम बड़े पैमाने पर पिछड़े तबके के युवकों को मरवाया गया तथा नक्सल संगठनों के लगभग सभी नेताओं को चौतरफा घेराबंदी कर जेलों में ठूंस दिया गया है. इन संगठनों से वैचारिक असहमति रखने के बावजूद, शायद ही कोई इससे असहमत होगा कि दूर-दराज के गांवों में शक्ति-संतुलन कायम रखने में इन्होंने बड़ी भूमिका निभायी है. इनकी गैरमौजूदगी ने कई ईलाकों में सामंती ताकतों का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. रही-सही कसर द्विज नौकरशाही पूरी कर रही है. गांव-गांव में 'बाभन राज' वापस आ जाने की घोषणाएं की जा रही हैं. पिछड़े-दलित तबकों के सामने अपमान और विश्‍वासघात के इन घूंटों को पीने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है.

शुरू के पांच-छह महीने में नीतीश सरकार ने अपनी चुनावी घोषणा पर अमल करते हुए सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने वाले अनेक फैसले किये थे. इनमें अत्यंत पिछड़ों के लिए पंचायत चुनाव में 20 फीसदी तथा महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण सबसे महत्वपूर्ण था. महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का फैसला बाद में हुई शिक्षक नियुक्ति में भी बरकरार रखा गया. यह ऐसे फैसले थे जो बिहारी समाज को आतंरिक रूप से बदलने की क्षमता रखते थे. शुरूआती महीनों में सत्ता में पिछड़ी जातियों के नेताओं की सशक्‍त हिस्सेदारी के भी संकेत दिखते रहे. लेकिन जल्दी ही सब कुछ बदलने लगा. पंचायत चुनाव में मिला आरक्षण अत्यंत पिछड़ों के लिए 'काल' बन गया. इस आरक्षण के कारण जो द्विज तथा गैर द्विज दबंग जातियां पंचायत चुनाव न लड़ सकीं थीं उन्होंने नौकरशाही के साथ गठबंधन कर, चुनाव जीत कर आए पंचायत प्रतिनिधियों को घेरना शुरू किया. अतिपिछड़ी जातियों के सैकड़ों मुखिया व अन्य पंचायत प्रतिनिधियों पर विभिन्न आरोपों में मुकदमे दर्ज किये गये. इनमें कइयों को गैर जमानतीय धाराओं में जेलों में डाला गया.

इन सबके साथ-साथ जनता दल (यू) के शीर्ष पर भी यह परिवर्तन साफ दिखने लगा. सामंत-द्विज तबके के लोग पार्टी तथा राज्य सरकार में हावी होने लगे. चुनाव के दरम्यान विजेंद्र प्रसाद यादव पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. उपेंद्र कुशवाहा की बड़ी हैसियत थी. विजेंद्र-उपेंद्र की जोड़ी का जिक्र खुद नीतीश कुमार शान से करते थे. प्रेमकुमार मणि जैसे चिंतक-लेखक तब नीतीश कुमार के खासम-खास थे, जिनसे हर बात में सलाह ली जाती थी. लेकिन राज पाट आते ही प्राथमिकताएं बदल गयीं. पिछड़े वर्गों से आने वाले नेता धकिया दिये गये. 'विजेंद्र-उपेंद्र की जोड़ी की जगह 'ललन-प्रभुनाथ' की जोड़ी हावी हो गयी. प्रेमकुमार मणि की जगह शिवानंद तिवारी लाये गये. नीतीश कुमार ने प्रयास करके पिछड़ा राज वाली छवि को खत्म किया. सामंती ताकतों को विश्‍वास में लेने के लिए शीर्षासन करने से भी नहीं चूके. जिन शक्तियों ने बिहार में सामाजिक न्याय का आंदोलन पुख्ता किया था, उन सबको नीतीश कुमार ने एक-एक कर अपमानित किया. कोशशि की गयी कि अतिपिछड़ों और मुसलमानों को रणवीर सेना-भूमि सेना का पिछलग्गू बनाया जाए. अतिपिछड़ों की राजनीतिक शक्ति को सामाजिक परिवर्तन के बजाए द्विजवाद के विस्तार में लगाया गया. भागलपुर में एक अशराफ मुसलमान और विमगंज में एक अशराफ महिला को इसी ताकत पर लोकसभा भेजा गया.

सत्ता में आने के बाद जदयू में पार्टी स्तर पर नीतीश कुमार की तानाशाही भी बढ़ती गयी है. जार्ज फर्नांडिस को हाशिये पर धकेलने के बाद अब उनके निशाने पर शरद यादव हैं. शरद को किनारे करने के लिए भी 'उपेक्षा' की वही तकनीक लागू की जा रही है जो जार्ज के लिए की गयी थी. कुल मिलाकर यह कि पिछले तीन सालों में बिहार की सत्ताधारी पार्टी रणवीर सेना-भूमिसेना के साझा संगठन में तब्दील होती गयी है. इसे सत्ता में लाने वाली जातियों को हाशिये पर धकेल दिया गया है.

नीतीश कुमार की जकड़बंदी करने वाली सामंती ताकतें यही चाहती थीं. प्रशंसा की जो दुदुभियां बजायी जा रही हैं, उनका राज भी यही है. इस 'रास्ते' पर आगे बढ़ रहे नीतीश को उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे पिछड़े नेताओं का हश्र जरूर याद रखना चाहिए.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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