हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

असली मुद्दा हिंसा का नहीं, न्याय और अधिकारों का है

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/22/2009 03:55:00 PM

लगता है की सत्ता ने देश की जनता में अपना विश्वास खो दिया है. वह जनता को रद्द करके उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा कर रही है। कहने की ज़रूरत नहीं की यह युद्ध सिर्फ़ माओवादियों के खिलाफ ही नहींलड़ा जाएगा, बल्कि यह जनवाद, आज़ादी, आन्दोलन की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, नारीवाद-हर तरह के विकारों और आन्दोलनों के खिलाफ बहरत की सेना उतारी जा रही है। यह युद्ध देश में ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता, तानाशाही को और मज़बूत करेगा और किसी भी तरह के प्रतिरोध के लिए स्पेस ख़त्म कर देगा. हाशिया इस मुद्दे पर विभिन्न संगठनों और व्यक्तियों का नजरिया आमंत्रित करता है. इस सिलसिले में हमने कात्यायनी की अपील देखी, अब प्रस्तुत है जेएनयू में डीएसयू द्वारा वितरित पर्चे के कुछ अंश।

छत्तीसगढ़ सहित देश के अनेक हिस्सों में गृह युद्ध जैसी स्थितियां गहराती जा रही हैं और सरकार उत्तर पूर्व और कश्मीर के बाद युद्ध का तीसरा मोर्चा खोल रही है. यह युद्ध दो ध्रुवीकृत शक्तियों के बीच चल रहा है, जिसमें एक तरफ राजसत्ता है, साम्राज्यवादी शक्तियां हैं, भारी-भरकम सैन्य शक्ति है, मल्टीनेशनल और भारत के दलाल पूंजीपति हैं, कॉरपोरेट मीडिया है और दूसरी तरफ है पूरे देश की संघर्षरत उत्पीडित जनता, जिसके जल-जंगल-जमीन सहित सारे संसाधनों को छीन लेने की कोशिश हो रही है और जिसके पास क्रांतिकारी संघर्षों की एक समृद्ध परंपरा है और साम्राज्यवाद से युद्ध की सदियों पुरानी विरासत है।

खुद सरकार के आंकडों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में अभी 50000 सीआरपीएफ, बीएसएफ, राष्ट्रीय राइफल्स, कोबरा और सी-60 के जवान तैनात हैं और उनकी मदद के लिए 75000 अर्ध सैनिक बल और भेजे जा रहे हैं. इनके अलावा सेना और वायुसेना को सक्रिय तौर पर सैन्य अभियानों में लगाने की योजना है. इसमें राज्य की पुलिस और स्पेशल पुलिस अधिकारियों की गिनती नहीं की गयी है. कुछ समय में राज्य पर भारी हवाई हमले के साथ बड़े पैमाने पर अरण्य आखेट शुरू कर दिया जायेगा. अगर आप नामों में दिलचस्पी नहीं भी रखते हों, तब भी यह एक अर्थपूर्ण सूचना है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट और सलवा जुडूम दोनों का अर्थ लगभग एक होता है-शिकार पर निकली राजसत्ता. यह 20 रुपये से भी कम पर गुजारा कर रहे, स्कूल, पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित अपने ही लोगों के खिलाफ देश की युद्ध की घोषणा है, जो अपने बजट का 20 प्रतिशत रक्षा के नाम पर खर्च करता है.
यह युद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद की निगरानी में हो रहा है. पिछले कुछ महीनों में काफी संख्या में अमेरिकी डेलिगेटों ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया है और उन्होंने अधिकारियों से मिल कर युद्ध को चलाने के तरीके सुझाये हैं. इसके अलावा भारत की सेना अमेरिका से नक्सलियों से निबटने के तरीके सीख रही है. इसके पहले भी भारत का दलाल शासक वर्ग अमेरिकी साम्राज्यवादियों से जनता के खिलाफ युद्ध के तरीके सीखता रहा है. उसके द्वारा उत्तर पूर्व के अनेक राज्यों और छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों में में चलाये गये सलवा जुडूम, सेंदरा, नागरिक सुरक्षा समिति, तृतीय प्रस्तुति समिति, नरसि कोबरा, हरमाद वाहिनी, सनलाइट सेना और सल्फा जैसे हत्यारे अभियान उसने अमेरिका से ही सीखे हैं, जिसने वियतनाम में इन तरीकों का उपयोग किया था. संसाधनों पर कब्जे के लिए और जनता के प्रतिरोध के दमन के लिए जनता के पैसे से ही नयी-नयी बटालियनों का निर्माण किया जा रहा है. ग्रेहाउंडस और सी-60 के बाद अब कोबरा का निर्माण किया गया है, जिनमें आदिवासियों को अधिक-से-अधिक भरा जा रहा है. इस तरह आदिवासियों को ही सामने रख कर सत्ता इस लड़ाई को लड़ना चाहती है. जनता द्वारा सलवा जुडूम को पराजित करने के बाद राजसत्ता द्वारा माओवाद से लड़ने के नाम पर वंचित, उत्पीडित और संघर्षरत जनता पर बर्बर हमले का यह नया और विस्तारित आयाम है. यह साबित करता है कि शासक वर्ग के साम्राज्यवादी दलाली और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ जनता का प्रतिरोध ऐसे स्तर पर पहुंच गया है कि सत्ता को जनपक्षधर होने के तमाम दावों-दिखावों को छोड़ कर खुलेआम जनता के खिलाफ युद्ध में उतरने की घोषणा करनी पड़ी है।

हालांकि यह युद्ध किसी एक जगह या राज्य तक सीमित नहीं है. जहां-जहां अपने जल-जंगल-जमीन की बर्बर लूट का जनता विरोध कर रही है, उसे माओवादी बता कर उसका निर्ममतापूर्वक दमन किया जा रहा है. यह हमने सिंगूर, कलिंगनगर, नंदीग्राम, कोयलकारो, नेत्रहाट, रायगढ़, जशपुर, जगतसिंपुर, लोहंडीगुडा में देखा है और सबसे हाल में लालगढ़ में हम यह होते देख रहे हैं.

भारत का शासक वर्ग बहुराष्ट्रीय कंपनियों और भारत के दलाल पूंजीपतियों के हित में यह युद्ध चला रहा है. देश के संसाधनों और संपदा की लूट 1991 में देश पर वैश्वीकरण थोपने के बाद और अधिक तेज हुई है. लूट की इस प्रक्रिया में कॉरपोरेट जगत के साथ देश की तमाम सरकारें हैं, पूरी राजसत्ता है, सेना है, पुलिस है और उसके विज्ञापनों पर पलनेवाला मीडिया है. इस तरह पूरी व्यवस्था जनता से उसके जल-जंगल-जमीन को छीन कर मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने में लगी हुई है. नदियां बिक रही हैं, जंगल उजाडे जा रहे हैं, खेतों को बंजर कारखानों और विनाशकारी बांधों में बदला जा रहा है. केवल मुट्ठीभर अरबपतियों को फायदा पहुंचानेवाली इन विनाशकारी विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर जनता को विस्थापित किया जा रहा है. लेकिन ये विस्थापित लोग, जिन्हें आज तक इस सत्ता ने कोई सुविधा नहीं मुहैया करायी, उल्टे उनके पास जो है, उसे छीन ही रही है, जब इस खुली लूट का विरोध करते हैं तो उन्हें राज्य माओवादी कह कर उन उलापा और छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम जैसे काले कानून, सलवा जुडूम, सेना, वायुसेना के जरिये दमन का भयानक सिलसिला थोप देता है।

अपने देश की संपदा को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और दलाल पूंजीपतियों को सौंप पर उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए राज्य द्वारा जारी इस खुली लूट और दमन से जुड़े बस कुछ तथ्य ये हैं. अपने पिछले कार्यकाल में भाजपा की रमन सिंह सरकार ने छत्तीसगढ़ में नये कारखानों के निर्माण के लिए कम से कम 11 कंपनियों से करार (एमओयू) किया. इसके अलावा टाटा, एस्सार, आर्सेलर मित्तल, जिंदल, टेक्सास जैसी कंपनियों को बैलाडिला इलाके में 96 खदानों की लीज दी गयी है, जिनकी शर्तों को देखते हुए कहा जा सकता है कि उन्हें लगभग बेच दिया गया है. इस कदम से इस इलाके में रहनेवाले आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी संस्कृति का खात्मा हो जायेगा।

अपनी जमीन और अपने अस्तित्व को छीन लेनेवाले विकास के नाम पर ऐसी विनाशकारी परियोजनाओं का जनता जब विरोध करती है तो इस प्रतिरोध को कुचलने के लिए और जमीनें खाली करवारने के लिए सत्ता द्वारा सलवा जुडूम जैसा अभियान शुरू किया जाता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गैर कानूनी कहे जाने के बाद भी जारी रखेगये इस अभियान के जरिये सैकड़ों हत्याएं की गयीं, घर फूंक डाले गये और लोगों को अपने गांव छोड़ने पर मजबूर किया गया. सलवा जुडूम से 644 गांवों के 3.5 लाख लोग विस्थापित हुए. उनमें से 47 हजार लोगों को सड़कों के किनारे बनाये गये सरकारी राहत शिविरों में जबरन रखा गया है, जिन्हें सरकार ने अब स्थायी गांव घोषित कर रखा है. जो 40 हजार लोग आंध्र प्रदेश के जंगलों में भाग गये हैं, सरकार ने उन्हें कोई अधिकार नहीं देने की घोषणा की है. बाकी बचे 2,63,000 लोगों ने अपने गांवों में ही रहने का फैसला किया है. सरकार ने कहा है कि जो लोग राहत शिविरों में नहीं रह रहे हैं-वे माओवादी हैं, और इस परिभाषा के अनुसार ये ढाई लाख से अधिक लोग माओवादी हैं।

और अब उनसे लड़ने के लिए सेना उतारी जा रही है. इन हत्यारे अभियानों में कॉरपोरेट जगत की दिलचस्पियों के बारे में इस तथ्य से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहला सलवा जुडूम राहत शिविर बनाने के लिए एस्सार ने फंड मुहैया कराये. एक दूसरा तथ्य यह है कि क्रेस्ट नामक कंपनी बस्तर, दांतेवाड़ा और बीजापुर जिलों में खनिज संपदा के लिए सर्वे करना चाहती थी. उसने कहा था कि वह सर्वे का काम तब तक नहीं कर सकती, जब तक ये इलाके खाली नहीं करा लिये जाते.
ये इलाके अब खाली करा लिये गये हैं. जो नहीं हुए हैं, उन्हें खाली कराने के लिए अब सेना उतारी जा रही है. भारतीय सैन्य-अर्ध सैन्य बलों की यह ताकत उन लोगों पर आजमायी जानी है, जिन्हें पहले ही सत्ता पोषित नरसंहारों की श्रृंखला सलवा जुडूम के जरिये लगभग तबाह कर दिया गया है. कॉरपोरेट जगत के हितों से जुड़े इस सैन्य अभियान को मीडिया किन्हीं खूंखार आतंकवादियों के सफाये के गौरवशाली अभियान के बतौर कोक और नैनो के विज्ञापनों के साथ बेचेगा. हमेशा की तरह माओवादी बना दिये गये लोगों के हरेक प्रतिरोध को खून के प्यासे लोगों की हरकत के बतौर पेश किया जायेगा।

1947 के बाद से विकास और राष्ट्र निर्माण के नाम पर चल रही बादी परियोजनाओं की कीमत सबसे अधिक आदिवासियों ने चुकायी है. इन परियोजनाओं से विस्थापित हुए कुल लोगों में लगभग आधी आबादी आदिवासियों की है, जबकि देश की आबादी में उनका हिस्सा सिर्फ 15 प्रतिशत है. और राष्ट्र निर्माण व विकास परियोजनाओं से हमें हासिल क्या हुआ है? छह करोड़ से अधिक विस्थापित. कुछ दर्जन अरबपति. और 77 प्रतिशत जनता के लिए 20 रुपये प्रतिव्यक्ति दैनिक खर्च.
जाहिर है, यह सिर्फ छत्तीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है. झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश-पूरे देश में यह प्रक्रिया चल रही है. कुछ समय पहले ही हमने सिंगूर में देखा कि किस तरह अपने को कम्युनिस्ट कहनेवाली पश्चिम बंगाल की बुद्धदेव सरकार ने किसानों की जमीन एक कॉरपोरेट घराने के लिए छीनी और टाटा को कार बनाने के लिए 2929 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी दी. इसका विरोध करने पर गांववालों पर निर्दयता से लाठी चार्ज किया गया. एक आंदोलनकारी युवती तापसी मलिक का बलात्कार करने के बाद सीपीएम कार्यकर्ताओं ने हत्या कर दी थी. यही सरकार नंदीग्राम में सलेम ग्रुप के लिए सिंगूर से भी बड़ी एक परियोजना के लिए जमीन हड़पने के लिए लोगों पर बर्बरतापूर्वक गोली चलाने से भी नहीं हिचकी. नंदीग्राम के लोगों को प्रतिरोध के लगभग आठ महीनों के दौरान सरकार और सीपीएम दोनों के हर तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.
लालगढ़ में सत्ता द्वारा किये जा रहे दमन और इसके प्रतिरोध को जनता एक ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले गयी. यहां पुलिस और सीपीएम की हरमाद वाहिनी के दशकों लंबे अत्याचारों के खिलाफ जब जनता ने प्रतिरोध संगठित किया, पुलिस और सीपीएम को अपने इलाके से बाहर खदेड़ दिया और अपने लिए विकास के वैकल्पिक मॉडल विकसित किये तो उसके खिलाफ राज्य ने खुलेआम युद्ध छेड़ दिया. देश के सबसे वंचित और उत्पीड़ित समुदायों में से एक, जंगलमहल की जनता पर राज्य की संगठित सैन्य कार्रवाई इस जून से चल रही है. यहां भी जनता और वैकल्पिक विकास के प्रति उसकी रचनात्मकता के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाईयों में सीपीएम सरकार पीछे नहीं रही है. साफ है सीपीएम भी शासक वर्ग की तरफ से इस युद्ध का नेतृत्व कर रही है और वह इसमें कांग्रेस और भाजपा के साथ कदम-से-कदम मिला कर चल रही है।

इसी तरह उडीसा के कलिंगनगर में टाटा के प्रोजेक्ट के लिए जमीन के अधिग्रहण का किसान विरोध कर रहे थे, तो उन पर पुलिस ने फायरिंग की. इस बर्बर हमले में 14 आदिवासी मारे गये. झारखंड के कोयलकारो बांध परियोजना के जरिये विस्थापन का विरोध करने के कारण लंबे समय से आंदोलनकारी जनता पर दमन चल रहा है. ये तो देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे भारी विस्थापन, जनता द्वारा किये जा रहे प्रतिरोध और सरकार द्वारा किये जा रहे दमन के बस कुछ उदाहरण भर हैं।

अभी हम मीडिया में 'माओवादी हिंसा' की चर्चा बड़े जोर-शोर से देख रहे हैं. लेकिन यही मीडिया पुलिस-सेना-अर्ध सैनिक बलों की कार्रवाईयों में जनता की हत्याओं की खबरों पर चुप्पी साध लेता है. इसी साल फर्जी मुठभेड़ों के नाम पर लगभग 50 लोग अकेले बस्तर इलाके में मारे गये हैं, लेकिन हम कभी मीडिया में इनकी तसवीरें या खबरें नहीं पाते. हमारे देश में वंचित लोग जब तक चुप रहते हैं, तब तक उनकी हत्या और बलात्कार की घटनाएं कभी 'खबर' नहीं बन पातीं, लेकिन जब वे लोग इस दमन के खिलाफ संघर्ष करते हैं तभी वे साम्राज्यवाद के इस प्रचारतंत्र-मीडिया-के लिए खबर बन जाते हैं. लेकिन इसके जरिये भी सिर्फ जनता के संघर्षों की गलत तसवीर और पुलिसिया झूठ का ही प्रचार किया जाता है और जनता के संघर्ष को अनौचित्यपूर्ण ठहराने की कोशिश की जाती है. कहने की जरूरत नहीं है कि सिर्फ जनता के संघर्षों को ही निशाना बनाने के लिए मीडिया और बुद्धिजीवियों द्वारा हिंसा को मुद्दा बनाया जाता है, जबकि असली मुद्दा हिंसा नहीं, बल्कि न्याय और अधिकारों का है, जो जनता से छीने जा रहे हैं।

कुछ बुद्धिजीवी अभी अमन की बातें कर रहे हैं, लेकिन हमें यह समझना पड़ेगा कि अमन अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं हो सकता, बल्कि हमेशा यह इंसाफ के साथ ही आता है. अमन का मतलब अन्याय के खिलाफ चुप्पी नहीं है, बल्कि लड़ाई से अपने अधिकारों को जीतना है. जो लोग लड़ रहे हैं, वे इसी लक्ष्य के लिए लड़ रहे हैं. वे अपने जल-जंगल-जमीन-जिंदगी-ईमान और इज्जत के लिए लड़ रहे हैं।

इस लड़ाई में हरेक जनवादी ताकतों को साम्राज्यवादी लूट और सत्ता के खिलाफ लड़ रही जनता के साथ खड़ा होना है, क्योंकि वर्ग संघर्ष की लड़ाई में बीच का रास्ता नहीं होता.

गोरखपुर से कात्यायनी की आपात अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/22/2009 03:50:00 PM

प्रिय साथी,

आज कात्‍यायनी ने गोरखपुर पहुंचकर मज़दूर आंदोलन के समर्थन में प्रेस कांफ्रेंस की और जिलाधिकारी कार्यालय पर चल रहे मजदूरों के धरने में शामिल हुईं। वहां के हालात को देखकर उन्‍होंने देश भर के साथी लेखकों, एक्टिविस्‍टों के नाम एक आपात अपील जारी की है। इसे आपके पास भेज रहा हूं। कल से वे युवाओं की एक टोली के साथ शहर में पदयात्रा के जरिए जनता तक पहुंचने से सत्‍याग्रह आंदोलन की शुरुआत करेंगी।

आशा है आप इस अपील पर प्रतिसाद देंगे और इसे अपने मित्रों तक भी पहुंचाएंगे...

प्रेस कांफ्रेंस में कात्‍यायनी द्वारा वितरित प्रेस विज्ञप्ति भी आपके देखने के लिए भेज रहा हूं जिसमें उन्‍होंने सत्‍याग्रह आंदोलन की रूपरेखा घोषित की है।

सत्यम



गोरखपुर मजदूर आन्दोलन समर्थक नागरिक मोर्चा

जनवादी अधिकार कर्मियों, कवियों-लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों के नाम

एक ज़रूरी पत्र

त्वरित सहयोगी कार्रवाई के लिए आपात अपील - 21 अक्टूबर 2009, गोरखपुर

प्रिय साथी,

गोरखपुर में आन्दोलनरत मजदूरों और उनके नेताओं पर, फैक्टरी मालिकों के इशारे पर प्रशासन द्वारा आतंक और अत्याचार का सिलसिला चरम पर पहुंचने के साथ हमने 'करो या मरो' के संकल्प के साथ सड़क पर उतरने का निर्णय लिया है और आज से नागरिक सत्याग्रह की शुरुआत की है। इस न्याययुद्ध में हमें आपका साथ चाहिए। इसलिए मैं यह पत्र आपको लिख रही हूं। हम हक, इंसाफ और जनवादी अधिकारों के इस संघर्ष में लाठी-गोली-जेल-मौत के लिए तैयार होकर उतरे हैं। हम आपसे इस संघर्ष में सहयोग की अपील करते हैं, भागीदारी की अपील करते हैं, क्योंकि यह आपकी भी लड़ाई है।

गोरखपुर में फैक्टरी मालिकों की शह पर मजदूरों पर कायम पुलिसिया आतंक राज के खिलाफ शुरू हो चुके निर्णायक संघर्ष में हम आपसे भागीदारी और सहयोग की अपील करते हैं!

हम दमन, फर्जी मुकदमे कायम करके तीन नेताओं की गिरफ्तारी, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उनकी बरबर पिटाई और नौ मजदूरों पर फर्जी मुकदमों के विरोध में नागरिक सत्याग्रह में भागीदारी की अपील करते हैं!

मजदूर नेताओं पर ''नक्सली उग्रवादी'' होने के झूठे आरोप और मालिक-प्रशासन-नेताशाही गंठजोड़ के विरुद्ध हम आरपार की लड़ाई लड़ेंगे!

हमें इस न्याययुद्ध में आपका साथ चाहिए!

- कात्यायनी

आपको शायद पता हो कि गोरखपुर की धागा एवं कपड़ा मिलों तथा प्लास्टिक बोरी के दो कारखानों के मजदूर श्रम कानूनों को लागू करवाने की मांग को लेकर विगत छ: माह से लड़ते आ रहे हैं। गोरखपुर की फैक्टरियों में श्रम कानून का कोई भी प्रावधान लागू नहीं होता और मजदूरों की हालत बंधुआ गुलामों जैसी रही है। ट्रेड यूनियन बनाने की कोशिशें गुण्डागर्दी के बल पर दबा दी जाती रही हैं। पहली बार यह गतिरोध तीन धागा एवं कपड़ा मिलों में टूटा, जब मालिक-प्रशासन-नेताशाही गंठजोड़ के खिलाफ खड़े होकर मजदूरों ने आन्दोलन शुरू किया। उनकी कुछ मांगें मान ली गयीं (जिनसे अब फिर मालिक मुकर रहे हैं) और आन्दोलन समाप्त हो गया। इसके बाद प्लास्टिक बोरी के दो कारखानों के करीब 1200 मजदूरों ने ढाई महीने पहले न्यूनतम मजदूरी सहित श्रम कानूनों के कुछ प्रावधानों को (ध्‍यान दें - कुछ प्रावधान, सभी नहीं) लागू करने के लिए आन्दोलन शुरू किया। इन कारखानों के मालिक कांग्रेसी नेता व पूर्व मेयर पवन बथवाल और उनके भाई किशन बथवाल हैं। इन कारखानों में आन्दोलन शुरू होते ही, सारे मालिक एकजुट हो गये, कई पार्टियों के चुनावी नेता भी उनके पक्ष में बयान देने लगे, प्रशासन छल-फरेब में लग गया और मालिकों के गुण्डों और पुलिस ने आतंक फैलाने का काम शुरू कर दिया।

पिछले ढाई महीनों के दौरान फैक्टरी मालिक और प्रशासन कई बार अपने वायदों से मुकरे। फिर कई बार की वार्ताओं और चेतावनियों के बाद विगत 15 अक्टूबर को मजदूर निर्णायक संघर्ष के लिए कचहरी परिसर में भूख हड़ताल पर बैठे। इसके बाद बर्बर पुलिसिया ताण्डव की शुरुआत हुई। मजदूरों को बलपूर्वक धरनास्थल से हटा दिया गया। महिला मजदूरों को पुरुष पुलिसकर्मियों ने घसीट-घसीटकर और ऊपर उठाकर धरनास्थल से दूर फेंक दिया। फिर 'संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा' (जिसके बैनर तले आन्दोलन चल रहा है) के तीन नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं - तपीश मैंदोला, प्रशांत मिश्र और प्रमोद कुमार को और मुकेश कुमार नाम के एक मजदूर को एडीएम (सिटी) कार्यालय में बातचीत के बहाने बुलाया गया और फिर कैण्ट थाने ले जाकर स्वयं सिटी मजिस्ट्रेट अरुण, एडीएम (सिटी) अखिलेश तिवारी और कैण्ट थाने के इंस्पेक्टर विजय सिंह ने उन्हें लात-घूंसों से बर्बरतापूर्वक पीटा। तपीश और प्रमोद बार-बार कहते रहे कि प्रशांत दिल के गंभीर रोगी हैं, अत: उनके साथ मारपीट न की जाये, पर पुलिस अधिकारी अपनी पशुता से बाज नहीं आये। प्रशांत का इलाज दिल्ली के 'एम्स' और 'मैक्स' संस्थानों में चल रहा है। फिर इन चारों लोगों पर शान्तिभंग और 'एक्स्टॉर्शन' की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया गया। जेल में भी बार-बार आग्रह के बावजूद न तो इन सबका मेडिकल हुआ, न ही प्रशांत को कोई डाक्टरी सुविधा मुहैया करायी गयी। इन्हें जानबूझकर अबतक जेल में रखा गया है ताकि मारपीट के मेडिकल साक्ष्य जुटाये न जा सकें और इनका मनोबल तोड़ दिया जाये। प्रशासन ने अब गैंग्स्टर एक्ट लगाने की भी पूरी तैयारी कर रखी है। प्रशासन की तैयारी कुछ मार्क्‍सवादी साहित्य, बिगुल मजदूर अखबार और पेन ड्राइव आदि की बरामदगी दिखाकर ''माओवादी'' बताते हुए संगीन धाराएं लगाने की थी और कुछ अधिकारियों ने मीडिया में इस आशय का बयान भी दिया। लेकिन फिर कुछ पत्रकारों द्वारा ऐसे कदम के उल्टा पड़ जाने के खतरे के बारे में चेतावनी देने तथा व्यापक मजदूर आक्रोश को देखते हुए प्रशासन ने फिलहाल हाथ रोक रखा है। इन चार लोगों के अतिरिक्त अन्य नौ मजदूरों पर भी फर्जी मुकदमे दर्ज किये गये हैं।

यह बताना जरूरी है कि स्थानीय 'चैम्बर ऑफ कॉमर्स', अलग-अलग फैक्टरी मालिक और पुलिस एवं नागरिक प्रशासन के अधिकारी पिछले ढाई महीने से मीडिया में इस आशय का बयान देते रहे हैं कि इस मजदूर आन्दोलन में ''बाहरी तत्व'', ''नक्सली'' और ''माओवादी'' सक्रिय हैं। स्थानीय भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने भी कई ऐसे बयान जारी किये। मामले को साम्प्रदायिक रंग देते हुए उन्होंने यह भी दावा किया कि इस आन्दोलन में माओवादियों के अतिरिक्त चर्च भी सक्रिय है। इस तरह मालिक-प्रशासन-नेताशाही के गंठजोड़ ने मीडिया के जरिये दुष्प्रचार करके मजदूर आन्दोलन को कुचल देने के लिए महीनों पहले से माहौल बनाना शुरू कर दिया था।

यहां यह बताना जरूरी है कि जिन्हें ''नक्सली'', ''आतंकवादी'' और ''माओवादी'' कहा जा रहा है, उनमें से दो - प्रशांत और प्रमोद गोरखपुर और पूर्वांचल के निकटवर्ती इलाकों में छात्र-युवा संगठनकर्ता के रूप में सात-आठ वर्षों से काम कर रहे हैं और नागरिकों के लिए सुपरिचित चेहरे हैं। छात्र-युवाओं के आन्दोलनों के अतिरिक्त शराबबंदी आन्दोलन, सफाई कर्मचारियों के आन्दोलन और सिरिंज फैक्टरी मजदूरों के आन्दोलनों में वे पहले भी अग्रणी भूमिका निभा चुके हैं। तीसरे साथी तपीश मैंदोला दिल्ली-गाजियाबाद-नोएडा में मजदूरों के बीच काम करने के अतिरिक्त श्रम मामलों के विशेषज्ञ लेखक-पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के मजदूरों के गुमशुदा बच्चों पर पिछले वर्ष प्रकाशित उनकी रिपोर्ट राष्ट्रीय अखबारों और प्रमुख चैनलों पर चर्चित हुई थी और दिल्ली हाई कोर्ट तथा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दो अलग-अलग मामलों पर अपने निर्णयों में उक्त रिपोर्ट का हवाला दिया था। 'नरेगा' में भ्रष्टाचार पर प्रकाशित उनकी सर्वेक्षण रिपोर्ट भी काफी चर्चित रही थी। इस समय तपीश मैंदोला मैनपुरी, इलाहाबाद और मऊ में नरेगा के मजदूरों को संगठित करने का काम कर रहे हैं। अब इन लोगों पर गोरखपुर के प्रशासक और चुनावी नेता ''आतंकवादी'' का लेबल चस्पां कर रहे हैं। यह व्यवहार एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि सबसे बड़ा आतंकवाद तो वास्तव में राजकीय आतंकवाद ही होता है। यह साबित करता है कि ''नक्सलवाद तो बहाना है, जनता ही निशाना है।'' लोकतांत्रिक प्रतिरोध के सारे विकल्प जब जनता से छीन लिये जाते हैं तो उग्रवादी विकल्प चुनने के लिए कुछ लोगों का प्रेरित होना स्वाभाविक होता है।

फिलहाल गोरखपुर में फैक्टरी मालिकों के इशारे पर प्रशासन का जो नंगा आतंकराज चल रहा ह, उसके खिलाफ सात कारखानों के मजदूर धरना और क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे हैं। तपीश, प्रशांत, प्रमोद और मुकेश जेल में बंद हैं। मजदूरों की मांगें स्पष्ट हैं : (1) गिरफ्तार नेताओं को बिना शर्त रिहा करो और फर्जी मुकदमे हटाओ (2) मारपीट के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध जांच और कानूनी कार्रवाई शुरू करो, (3) श्रम कानूनों को लागू कराने का ठोस आश्वासन दो।

इस आन्दोलन के पक्ष में हमने भी आर-पार की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरने का निश्चय किया है और हमारी भी वही मांगें हैं जो मजदूरों की हैं। गोरखपुर पहुंचने के बाद आज से हम नागरिक सत्याग्रह की शुरुआत कर रहे हैं। इसके अन्तर्गत दो दिनों तक लोक आह्नान के लिए शहर में पदयात्रा एवं जनसभाएं करने के बाद हम आन्दोलनरत मजदूरों के धरना और क्रमिक भूख हड़ताल में शामिल हो जायेंगे। यदि प्रदेश शासन और प्रशासन के कानों तक फिर भी आवाज नहीं पहुंची तो दो दिनों के क्रमिक भूख हड़ताल के बाद हम आमरण भूख हड़ताल शुरू कर देंगे। हम फर्जी मुकदमों, गिरफ्तारी और दमन का सामना करने के लिए तैयार हैं। इस ठण्डे, निर्मम और गतिरोध भरे समय में, व्यापक जनसमुदाय के अन्तर्विवेक को जागृत करने और आततायी सत्ता को चेतावनी देने के लिए यदि आमरण भूख हड़ताल करके प्राण देना जरूरी है, तो हम इसके लिए तैयार हैं और हम अपनी इस भावना को आप तक सम्प्रेषित करते हुए आपसे हर सम्भव सहयोग की अपील करते हैं।

इस आंदोलन की तमाम खबरों की जानकारी आपको http://bigulakhbar.blogspot.com पर मिल सकती है। आप इन नंबरों पर संपर्क भी कर सकते हैं:

कात्‍यायनी - 09936650658, सत्‍यम - 09910462009, संदीप - 09350457431

ईमेल: satyamvarma@gmail.com, sandeep.samwad@gmail.com

आप क्या कर सकते हैं :

- दिल्ली, लखनऊ, लुधियाना और देश के अन्य शहरों से साथीगण गोरखपुर आकर इस नागरिक सत्याग्रह में शामिल हो रहे हैं। हम आपका भी आह्वान करते हैं।

- हमारा आग्रह है कि नागरिक अधिकारकर्मियों की टीमें यहां आकर स्थितियों की जांच-पड़ताल करें, जन-सुनवाई करें, रिपोर्ट तैयार करें और शासन तक न्याय की आवाज़ पहुंचायें।

- हमारा आग्रह है कि आप अपने-अपने शहरों में, विशेष तौर पर, दिल्ली, लखनऊ और उत्तर प्रदेश के शहरों में इस मसले को लेकर विरोध प्रदर्शन आयोजित करें।

- हमारा आग्रह है कि आप उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, श्रम मंत्री, श्रम सचिव और गोरखपुर प्रशासन के अधिकारियों को ईमेल, फैक्स, फोन, पत्र और टेलीग्राम के द्वारा अपना विरोध पत्र भेजें और हस्ताक्षर अभियान चलाकर ज्ञापन दें। ये सभी पते, ईमेल पता, फैक्स नं. आदि साथ संलग्न हैं।

साथियो,

गतिरोध और विपर्यय से भरे दिनों में वैचारिक मतभेद अक्सर पूर्वाग्रह एवं असंवाद की शक्त अख्तियार कर लेते हें। अवसरवादी तत्व अक्सर अपने निहित स्वार्थी राजनीतिक खेल और कुत्सा प्रचारों से 'जेनुइन' परिवर्तनकामी जमातों के बीच विभ्रमों-विवादों-पूर्वाग्रहों को जन्म देते और बढ़ाते रहते हैं। हम समझते हैं कि असली कसौटी सामाजिक व्यवहार को बनाया जाना चाहिए। न्याय और अधिकार के 'जेनुइन' और ज्वलंत मुद्दों पर जारी संघर्षों में हमें जरूर कन्‍धे से कन्धा मिलाकर साथ खड़े होना चाहिए, तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद। यही भविष्य की व्यापक एकजुटता की दिशा में पहला ठोस कदम होगा।

गोरखपुर में पुलिसिया आतंक राज की जो बानगी देखने को मिली है, वह भावी राष्ट्रीय परिदृश्य की एक छोटी झलकमात्र है। आपातकाल की पदचापें एक बार फिर दहलीज के निकट सुनायी दे रही हैं। सत्ता जनता के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की तैयारी कर रही है। हम उस युद्ध की चुनौती की अनदेखी नहीं कर सकते। हमें संघर्ष के मुद्दों पर साझा कार्रवाइयों की प्रक्रिया तेज करनी होगी। हमें नागरिक स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों के आन्दोलन को सशक्त जनान्दोलन का रूप देने में जुट जाना होगा। हमें साहस के साथ सड़कों पर उतरकर सत्ता की निरंकुश स्वेच्छाचारिता को चुनौती देनी होगी। हमें साथ आना ही होगा। एकजुटता बनानी ही होगी।

इसी आह्नान और क्रान्तिकारी अभिवादन के साथ,

(कात्यायनी)

संयोजक

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें

Posted by Reyaz-ul-haque on 10/21/2009 04:25:00 PM

प्रधानमंत्री के नाम एक खुला खत

कॉरपोरेट जगत के हित में देश की आम जनता के संहार की योजना रोकें
अरुंधति रॉय, नोम चोम्स्की, आनंद पटवर्धन, मीरा नायर, सुमित सरकार,
डीएन झा, सुभाष गाताडे, प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, हावर्ड जिन अन्य



प्रति
डॉ मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री, भारत सरकार
साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल
नयी दिल्ली, भारत-110011

हम आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्यों के आदिवासी आबादीवाले इलाकों में भारत सरकार द्वारा सेना और अर्धसैनिक बलों के साथ एक अभूतपूर्व सैनिक हमला शुरू करने की योजनाओं को लेकर बेहद चिंतित हैं. इस हमले का घोषित लक्ष्य इन इलाकों को माओवादी विद्रोहियों के प्रभाव से 'मुक्त' कराना है, लेकिन ऐसा सैन्य अभियान इन इलाकों में रह रहे लाखों निर्धनतम लोगों के जीवन और घर-बार को तबाह कर देगा तथा इसका नतीजा आम नागरिकों का भारी विस्थापन, बरबादी और मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा. विद्रोह को नियंत्रित करने की कोशिश के नाम पर भारतीय नागरिकों में से निर्धनतम लोगों का संहार प्रति-उत्पादक और नृशंस दोनों है. विद्रोहियों के खिलाफ सरकारी एजेंसियों द्वारा निर्मित और पोषित हथियारबंद गिरोहों की मदद से अर्ध सैनिक बलों द्वारा जारी अभियान ने पहले से ही छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में सैकड़ों हत्याओं और हजारों के विस्थापन के साथ गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है. प्रस्तावित हथियारबंद हमला आदिवासी जनता में न सिर्फ गरीबी, भुखमरी, अपमान और असुरक्षा की स्थिति को और बदतर करेगा, बल्कि इसका एक बड़े इलाके में प्रसार भी कर देगा।

1990 के दशक की शुरुआत में भारतीय राज्य के नीतिगत ढांचे में आये नवउदारवादी मोड़ के बाद से भारत की आदिवासी जनता को बढ़ती राजकीय हिंसा के जरिये अंतहीन गरीबी और निकृष्टतम जीवन स्थितियां ही हासिल हुई हैं. जंगल, जमीन, नदियों, साझे चरागाहों, गांव के तालाबों और अन्य साझे संसाधनों का गरीब जो भी थोड़ा-बहुत इस्तेमाल कर पा रहे थे, उस पर भी, स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) और उत्खनन, औद्योगिक विकास, आइटी पार्क आदि संबंधी दूसरी 'विकास' परियोजनाओं के कारण भारत सरकार द्वारा हमला बढ़ता जा रहा है. वे भौगोलिक भूभाग, जहां सरकार की सैन्य हमले की योजना है, खनिज, वन संपदा और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं और अनेक कॉरपोरेशनों के बड़े पैमाने पर लूट के निशाने पर रहे हैं. निराशा की स्थिति में स्थानीय आदिवासी जनता द्वारा विस्थापन और अभिवंचनाओं के विरुद्ध किये जा रहे प्रतिरोध ने अनेक मामलों में सरकार समर्थित कारपोरेशनों को उन इलाकों पर कब्जा करने से रोक रखा है. हमें डर है कि सरकार की यह कार्रवाई इन कारपोरेशनों को इन इलाकों में प्रवेश दिलाने और काम शुरू कराने के लिए तथा इन इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों और लोगों के निर्बाध शोषण के लिए रास्ता खोलने के लिए ऐसे लोकप्रिय प्रतिरोधों को कुचलने की एक कोशिश भी है. यह हताशा का बढ़ता स्तर है और सामाजिक वंचना और संरचनागत हिंसा है और अपने अभावों के खिलाफ गरीबों और हाशिये पर जी रहे लोगों के अहिंसक प्रतिरोधों पर राजकीय दमन है, जो सामाजिक आक्रोश और अशांति को बढ़ा रहा है और इसे गरीबों की राजनीतिक हिंसा का रूप दे रहा है. समस्या के स्रोत पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, भारत सरकार ने समस्या से निबटने के लिए सैन्य हमला शुरू करने का निर्णय लिया है, लगता है कि भारत सरकार का यह एक अंतर्निहित नारा है- गरीबों को मारो, गरीबी को नहीं।

हम महसूस करते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विध्वंसक कदम होगा, यदि सरकार ने अपने लोगों को, बजाय उनके शिकायतों को निबटाने के उनका सैन्य रूप से दमन करने की कोशिश की. ऐसे किसी अभियान की अल्पकालिक सफलता तक पर संदेह है, लेकिन आम जनता की भयानक दुर्गति में कोई संदेह नहीं है, जैसा कि दुनिया में अनगिनत विद्रोह आंदोलनों के मामलों में देखा गया है. हमारा भारत सरकार से कहना है कि वह तत्काल सशस्त्र बलों को वापस बुलाये और ऐसे किसी भी सैन्य हमले की योजनाओं को रोके, जो गृहयुद्ध में बदल जा सकते हैं और जो भारतीय आबादी के निर्धनतम और सर्वाधिक कमजोर हिस्से को व्यापक तौर पर क्रूर विपदा में धकेल देगा तथा उनके संसाधनों की कॉरपोरेशनों द्वारा लूट का रास्ता साफ कर देगा. इसलिए सभी जनवादी लोगों से हम आह्वान करते हैं कि वे हमारे साथ जुड़ें और इस अपील में शामिल हों.

अरुंधति रॉय, लेखिका व कार्यकर्ता

नोम चोम्स्की, एमआइटी, अमेरिका

हावर्ड जिन, इतिहासकार, नाटककार व सामाजिक कार्यकर्ता, अमेरिका

जॉन बेलेमी फोस्टर, संपादक, मंथली रिव्यू, अमेरिका

अमित भादुड़ी, प्राध्यापक, जेएनयू

प्रशांत भूषण, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

नंदिनी सुंदर, प्राध्यापक, दिल्ली विवि

कोलिन गोंजालवेज, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्माता

मीरा नायर, फिल्मकार, अमेरिका

दीपंकर भट्टाचार्य, महासचिव, भाकपा (माले) लिबरेशन

बर्नार्ड डिमेलो, एसोसिएट एडीटर, इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली

सुमित सरकार, इतिहासकार

तनिका सरकार, इतिहासकार

गौतम नवलखा, सलाहकार संपादक, इपीडब्ल्यू

मधु भंडारी, पूर्व राजदूत

सुमंत बनर्जी, लेखक

डॉ वंदना शिवा, लेखक व पर्यावरण कार्यकर्ता

जीएन साईबाबा, प्राध्यापक, दिल्ली विवि

अमित भट्टाचार्य, प्राध्यापक, जादवपुर विवि

डीएन झा, इतिहासकार

डेविड हार्वे, नृतत्वशास्त्री, अमेरिका

माइकल लोबोवित्ज, अर्थशास्त्री, वेनेजुएला

जेम्स सी स्कॉट, प्राध्यापक, येल विवि, अमेरिका

माइकल वाटस, प्राध्यापक, कैलिफोर्निया विवि, अमेरिका

महमूद ममदानी, प्राध्यापक, कोलंबिया विवि, अमेरिका

संदीप पांडेय, कार्यकर्ता, एनएपीएम

अरविंद केजरीवाल, सामाजिक कार्यकर्ता

अरुंधति धुरु, कार्यकर्ता, एनएपीएम

स्वप्ना बनर्जी गुहा, प्राध्यापक, मुंबई विवि

गिलबर्ट आसर, प्राध्यपक, लंदन विवि

सुनील शानबाग, रंग निर्देशक

सुदेशना बनर्जी, प्राध्यापक, जादवपुर विवि

अचिन चक्रवर्ती, प्राध्यापक, विकास अध्ययन संस्थान, कलकत्ता विवि, अलीपुर

आनंद चक्रवर्ती, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, दिल्ली विवि

सुभा चक्रवर्ती दासगुप्त, प्राध्यापक, जादवपुर विवि

उमा चक्रवर्ती, इतिहासकार

कुणाल चट्टोपाध्याय, प्राध्यापक, जादवपुर विवि

अमिय दुबे, प्राध्यापक, जादवपुर विवि

सुभाष गाताडे, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता

अभिजित गुहा, विद्यासागर विवि

कविता कृष्णन, एपवा

गौरी लंकेश, संपादक, लंकेश पत्रिका

पुलिन बी नायक, प्राध्यापक, दिल्ली विवि

इमराना कदीर, सेनि प्राध्यापक, जेएनयू

निशात कैसर, प्राध्यापक, जामिया मिलिया इसलामिया

रामदास राव, अध्यक्ष, पीयूसीएल, बेंगलुरू ईकाई

और सैकडों अन्य

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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