हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

चांद पर पहुंचने का झूठ और चालीस साल पहले का सच

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/20/2009 03:00:00 PM

आज जब दुनिया मनुष्य के चांद पर पहुँचने के चार दशक पूरे होने के उलास में डूब-उतरा रही है, हमें एक बार उन वास्तविक तथ्यों और सवालों पर नज़र डालने की ज़रूरत है, जो इस अभियान से जुड़े हुए हैं और उल्लास में डूब जाने से पहले अपने को यह यकीन दिलाने की ज़रूरत है की हम मानव इतिहास के एक सबसे बड़े झूठ से रू-ब-रू होने जा रहे हैं।

ये कुछ सवाल हैं, और तथ्य हैं जो यह साफ़ तौर पर साबित करते हैं कि मनुष्य आज तक चांद पर नहीं पहुँचा है, और हमें झूठ बताया जाता रहा है।



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चीन और साम्राज्यवाद का संबंध

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/07/2009 02:22:00 PM

एक और हत्याकांड के साथ चीन फिर सुर्खियों में है. चीन पिछले कुछ समय से बहुत चर्चा में है, अपने तथाकथित विकास की गति को लेकर, अर्थव्यवत्स्था की अंधाधुंध उन्नति को लेकर, अपनी औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर. लेकिन चीन आज वास्तव में कहां खड़ा है, चीन की इस दीवार के उस पार क्या चल रहा है, जानते हैं रेमंड लोट्टा से. यह आलेख समयांतर के मई अंक से साभार।

दुनिया की प्रमुख साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच आज आर्थिक शक्ति-संतुलन बदल रहा है। नए-नए भू-आर्थिक खेमे आकार ग्रहण कर रहे हैं। इस परिदृश्य में आसार इस बात के हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका के विश्व-प्रभुत्व को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। विभिन्न शक्तियों अथवा उनके गठजोड़ों का भू-राजनीतिक सामथ्र्य बढ़ते जाने के आसार हैं। वर्तमान दौर में यह जरूरी नहीं कि अमरीका के साथ उनकी सीधी भिड़ंत हो जाए। मगर रणनीतिक तरीकों से अमरीकी प्रभुत्व को चुनौती दिए जाने का रुझान प्रबल हो सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर यह बदलता आर्थिक शक्ति-संतुलन जहां एक ओर दुनिया के तमाम अंतर्विरोधों, रगड़ों-झगड़ों और संघर्षों को प्रभावित करता है, वहीं ये अंतर्विरोध, रगड़े-झगड़े और संघर्ष भी विश्व आर्थिक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करते हैं।

इसमें दो राय नहीं कि आज अमरीका ही साम्राज्यवादी विश्व अर्थव्यवस्था में सर्वोपरि है। इसी की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अमरीका ही अपनी वित्तीय ताकत के बल पर एक सूत्रा में बांधे रखता है। हर मामले में अमरीका मौजूदा विश्व व्यवस्था को राजनीतिक-सामरिक बल प्रदान करता है। कम से कम फिलहाल तो यही स्थिति है। लेकिन इस सबके बावजूद आज दुनिया के पैमाने पर अमरीका कमजोर होता जा रहा है।

अमरीका की सामरिक ताकत किसी भी विरोधी शक्ति या संभावित विरोधों से कहीं ज्यादा है। सन् 2001 से, जब से अफगानिस्तान और इराक को हमले का मुख्य निशाना बनाया गया, अमरीका ने अपनी विश्वव्यापी सामरिक मुहिम तेज करते हुए प्रभुत्व जमा लिया। ऐसा प्रभुत्व जो दशकों तक कायम रह सके। फिर भी उसे अपने विश्वव्यापी मंसूबों को पूरा करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। अमरीका की वित्तीय व्यवस्था में मची खलबली अभी बढ़ती जा रही है। विश्व अर्थव्यवस्था के बदलते समीकरणों और परिवर्तनों के कारण अमरीका के सामने अपने संकटों से उबरने के रास्ते सीमित हो रहे हैं।

संक्षेप में कहा जाए, तो साम्राज्यवादी व्यवस्था संक्रमण से गुजर रही है। परिस्थिति तरल है, अभी स्थिर नहीं हो पा रही है। और इस परिस्थिति में लगातार ऊर्जावान चीन वर्तमान समीकरणों को कैसे प्रभावित करता है, यह देखने की बात है। चीन के विकास का क्या स्वरूप है? विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था में चीन के उद्भव के संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं? प्रस्तुत लेख में इन्हीं सवालों का विस्तार से खुलासा किया जाएगा।

(तीन हिस्सों में बंटे इस लेख में पहले चीन के विकास की मौजूदा गति पर एक विहंगम दृष्टि डाली गई है, फिर इस तेज विकास के अलग-अलग पहलुओं को उजागर किया गया है। विश्व अर्थव्यवस्था के साथ चीन के क्या संबंध हैं, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इस विशेषता को कैसे समझा जाए, वर्तमान शासक वर्ग का स्वरूप क्या है, विकास की मौजूदा गति किस तबाही की ओर ले जा रही है. इन सवालों पर रोशनी डाली गई है। अंत में चीन की इस बढ़ती आर्थिक शक्ति के तात्पर्य का व्यापक विश्लेषण किया गया है। जिसमें शामिल हैं चीन के बढ़ते वित्तीय सामथ्र्य, बढ़ती भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और साम्राज्यवादी दुनिया के भीतरी अंतर्विरोधों से संबंधित सवाल।)

1. चीन के विकास की मौजूदा गति

कई लोग मानते हैं कि चीनी समाज आज भी समाजवादी है। आखिर वहां के नेता भी तो अपनी व्यवस्था को समाजवादी ही बताते हैं। वहां की सत्ताधारी पार्टी भी कम्युनिस्ट पार्टी कहलाती है। पर समतावाद अब वहां नहीं रहा। अक्तूबर 1976 में वहां साम्राज्यवाद का तख्ता पलट दिया गया था। माओ-त्से-तुंग की मृत्यु के तत्काल बाद देंग श्याओ-पिंग और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की प्रमुख नव-पूंजीवादी शक्तियों ने सैनिक तख्तापलट को अंजाम दिया। उन्हीं शक्तियों ने माओवादी नेतृत्व के केंद्रीय कोर को तुरत-फुरत गिरफ्तार कर लिया और क्रांतिकारी विपक्ष का दमन कर डाला।

अब चीन की सत्ता नए पूंजीपति वर्ग के हाथ में है। जो साम्राज्यवाद के अधीन है। वह साम्राज्यवादी प्रभुत्व के मातहत है। पारराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश, विश्वव्यापी वित्त के कारोबार, विश्व बैंक एवं विश्व व्यापार संगठन जैसी साम्राज्यवाद द्वारा नियंत्रित संस्थाओं के प्रभाव और संस्कृति एवं विचारधारा के क्षेत्रों में अपनी जबरदस्त घुसपैठ के बल पर साम्राज्यवाद ने चीनी समाज एवं अर्थव्यवस्था के पोर-पोर में प्रवेश कर लिया है।

चीन आज साम्राज्यवाद पर निर्भर है। उसकी अर्थव्यवस्था में भारी मात्रा में पूंजी निवेश की जा चुकी है। जिस पर वह आश्रित है। चीन की अर्थव्यवस्था अमरीका, जापान, जर्मनी जैसे प्रमुख पूंजीवादी देशों को किए जाने वाले निर्यात पर भी आश्रित है। पिछले कुछ दशकों से चीन में जो पूंजीवाद आया और फला-फूला वह इसी परनिर्भरता पर टिका रहा है। आज भी यही स्थिति कायम है। साथ ही साथ चीन के पास अपार श्रम शक्ति है। यह अति-शोषण के लिए अब खुली है। इसीलिए यहां साम्राज्यवादी अपने निवेश से अधिक लाभ कमा पाते हैं। दुनिया भर के निवेशक भागे चले आते हैं। यही चीन की अर्थव्यवस्था के तेज विकास का राज है। यह तेज विकास लगातार जारी रह पाया है और वहां के शासक अपनी सत्ता तथा पहलकदमी को मजबूत आधार पर कायम रख पाए हैं। यही वजह है कि चीन का प्रभाव लगातार बढ़ा है और प्रभावित करने के उसके माध्यम अधिक सशक्त हुए हैं। यह जो कुछ हो रहा है, चीन पर साम्राज्यवाद, विशेषकर अमरीकी साम्राज्यवाद के वर्चस्व के दायरे में हो रहा है।

चीन के शासक इसी दायरे के भीतर अपना खास वजूद कायम करने और अपने भू-रणनीतिक हितों की पूर्ति के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। उनके इस प्रयास का आधार है. उजरती श्रम का गहन शोषण। मगर अपने हितों की पूर्ति के इस प्रयास में चीन के पूंजीपति शासक अपने दायरे को भी चुनौती दे रहे हैं. उस दायरे को जो अधिकतर अमरीकी साम्राज्यवाद को लाभ पहुंचाता रहा है।

दरअसल यह संभव है कि चीन खुद भी साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभरने की ओर अग्रसर हो। इस संक्रमण से गुजर रहा हो। लेकिन वास्तव में वह साम्राज्यवादी शक्ति बन पाएगा या नहीं, यह सिर्फ उसके आंतरिक उपादानों से तय नहीं होगा। तो फिर चीन का भविष्य कैसे तय होगा? विश्व व्यवस्था में ऐसी तमाम आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक परिघटनाएं सामने आ रही हैं। जो एक-दूसरे को प्रभावित भी करती हैं। इन्हीं परिघटनाओं और उनके परस्पर प्रभावों पर निर्भर है, चीन का भविष्य। इनमें कुछ परिघटनाएं एकाएक भी उभर सकती हैं। जैसे संकट और युद्ध। चीन समेत पूरी दुनिया में वर्ग संघर्ष भी ऐसी ही एक परिघटना है। इनमें क्रांतियां भी शामिल हैं।

चीन के विकास की गति और साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में उसका उद्भव कुल मिलाकर उसकी परनिर्भरता और बढ़ती ताकत की संश्लिष्ट गतियों से तय हो रही है। चीन का विकास और उद्भव खुद साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था को भी प्रभावित करता है। परस्पर प्रभावों की इस क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम आखिर क्या होगा? यह अभी निश्चित नहीं है। इतना जरूर तय है कि दुनिया का भावी स्वरूप इसी क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम होगा।

2. चीन का तेज विकास
चीन की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। उससे बड़ी अर्थव्यवस्था केवल अमरीका की ही है। मगर जिस तेजी से चीनी अर्थव्यवस्था विकास कर रही है, उतनी तेजी से और कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं कर रही है। पिछले दो दशकों से उसकी सकल घरेलू उपज (जीडीपी) की विकास दर प्रतिवर्ष 10 फीसदी रही है। किसी भी साम्राज्यवादी देश की विकास दर प्रतिवर्ष 2-4 फीसदी से अधिक नहीं रही है। चीन की सकल घरेलू उपज, यानी समूचे माल उत्पादन और सेवाओं का कुल मूल्य जितना 1990 में था, 2005 तक आते-आते वह दुगुना हो गया। फिर भी चीन अभी गरीब देश ही है। प्रति-व्यक्ति उत्पादन और प्रति-व्यक्ति आमदनी, इन दोनों ही मानदंडों से चीन दुनिया के प्रमुख पूंजीवादी देशों से कहीं अधिक पिछड़ा है।

परंतु विकास दर और औद्योगीकरण के मानदंडों पर देखा जाए, तो पिछले दो दशकों से लगातार चली आ रही तेजी की कोई दूसरी मिसाल विश्व पूंजीवाद के पूरे इतिहास में शायद ही मिले। इस तथ्य के महत्वपूर्ण तात्पर्य इस प्रकार हैं:
1. चीन में उत्पादन क्षमता का स्तर बहुत ज्यादा उन्नत हो चुका है।
2. इसका जबरदस्त असर समूचे विश्व पूंजीवाद की मौजूदा विकास-यात्रा पर पड़ रहा है।
3. दुनिया में चीन तेजी के साथ आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।

विनिर्माण क्षेत्र (मैन्यूफैक्चरिंग) में चीन दुनिया का केंद्र बनता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से जिन पांच प्रमुख देशों में सर्वाधिक विदेशी निवेश हुआ है उनमें चीन भी है। विदेशी औद्योगिक निवेश तो चीन में सभी देशों से ज्यादा है। चीन की अर्थव्यवस्था आज विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के विकास की गाड़ी का इंजन बनी हुई है। दुनिया भर के लोहे, इस्पात, एल्यूमिनियम और तांबे की 20-25 फीसदी खपत अकेले चीन में हो रही है। तेल की जो मांग आजकल बढ़ी हुई है उसका एक तिहाई हिस्सा चीन के ही कारण है।

दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ चीन का बड़ा ही गहरा संबंध है। उसके पास जितने अमरीकी डालर हैं उतने किसी
भी दूसरे देश के पास नहीं हैं। अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में चीन कच्चे माल और ऊर्जा के स्रोतों के लिए मची होड़ के कारण अमरीका और अन्य साम्राज्यवादी देशों के साथ संघर्षरत है। अपनी भू-आर्थिक शक्ति के बल पर वह दुनिया भर में अधिकाधिक आक्रामक तेवर के साथ हिस्सा पाने की जद्दोजहद कर रहा है। अमरीका समझ चुका है कि उसे लंबे दौर में चीन से ही प्रतिस्पर्धा और विरोध का खतरा है। इसीलिए अमरीका आए दिन चीन को घेरने का प्रयास करता रहता है।

यदि विदेशी पूंजी निवेश नहीं होता, तो चीन के इस तेज विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। विदेशी पूंजी की घुसपैठ चीन में काफी गहराई तक हो चुकी है। यह इस बात से समझा जा सकता है कि 28 प्रमुख उद्योगों में से 21 में विदेशी पूंजी ने अधिकतर परिसंपत्ति पर अपना नियंत्राण कायम कर लिया है। कुछ ही वर्षों पहले हाल यह हो चुका था कि जनरल इलेक्ट्रिक जैसी पारराष्ट्रीय कंपनियों का उत्पादन चीन की समस्त कंपनियों के कुल औद्योगिक उत्पादन के तीसरे भाग तक पहुंच गया। जिन कंपनियों में विदेशी पूंजी लगी है उनका आयात-निर्यात तो कुल आयात-निर्यात का 60 फीसदी तक पहुंच चुका है। वह विदेशी पूंजी ही है जिसके सहारे चीन के समुद्र-तट पर जगह-जगह नई विशालकाय कंपनियों की उत्पादन इकाईयां खड़ी हुई हैं। देश में लगी कुल विदेशी पूंजी का 80 फीसदी हिस्सा इसी समुद्र तट पर लगा है।

पिछले दो दशकों से इन शहरी क्षेत्रों में काम की तलाश में गांव-देहात से तकरीबन 20 करोड़ मजदूर जा बसे हैं। चीन के भीतरी पलायन के फलस्वरूप तैयार हुई इसी श्रम-सेना का अति-शोषण होता है। उन्हें मिलता है बहुत ही कम वेतन। आवास तथा आवश्यक सभी सेवाओं के मामले में उनके साथ भेदभाव होता है। समुद्र-तट की विशालकाय कंपनियां देश भर से आए मजदूरों के श्रम से अपनी मूल आवश्यकता की पूर्ति कर लेती हैं, पर उसी श्रम का अति-शोषण करती हैं।

यह विदेशी पूंजी चीन में किन चीजों के उत्पादन में लगी हुई है? एक तो निम्न मूल के सस्ते सामानों के, जैसे तैयार वस्त्रा। जिसमें बहुत ज्यादा पूंजी लगी है। दूसरे किस्म का उत्पादन इलेक्ट्रानिक्स और इन्फरमेशन टेक्नोलाजी के क्षेत्रों में हो रहा है। इतना कि अमरीका को कंप्यूटरों और कंप्यूटर इलेक्ट्रानिक्स तथा इन्फरमेशन टेक्नोलाजी के अन्य सामानों का निर्यात जितना चीन से होता है, उतना अन्य किसी देश से नहीं होता। और इस निर्यातित माल का उत्पादन किस तरह किया जाता है? विदेशी मालिकों ने चीन के स्थानीय पूंजीपतियों को ठेके दे रखे हैं। विदेशों से ही उच्च स्तर की टेक्नोलाजी से निर्मित मुख्य-मुख्य पुर्जे, यंत्रा आदि आयात किए जाते हैं। फिर चीनी ठेकेदारों की देखरेख में इन्हें विदेशी मालिकाने वाले कारखानों में जोड़-जोड़ कर निर्यात के लिए तैयार किया जाता है। पूरे कारोबार का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी मालिकों के हाथ में है। चीन का विकृत विकास किस तरह हो रहा है, इसी से समझा जा सकता है। पूरी तीसरी दुनिया में सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश चीन में ही है। चीन के अपने कारोबार से विदेशी कंपनियां बहुत अधिक मुनाफा कमा लेती हैं। क्योंकि यहां उत्पादन में निवेश पर मुनाफे की दर सर्वाधिक है। योरोपीय संघ के देशों से दुगुना। और लातिन अमरीका से भी ज्यादा।

साम्राज्यवादी पूंजी चीनी पूंजीपतियों को जो ठेका देती है, उससे मुनाफे की गंगा चीन के बजाए बाहरी शक्तियों की ओर ही बहती है। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। चीन में निर्मित एक आईपाॅड जब अमरीका में 299 डालर में बिकता है, तो जिस चीनी कारखाने में उसे जोड़ा गया था उसके हिस्से आता है सिर्फ 4 डालर। 160 डालर हड़प जाती हैं वे सभी अमरीकी कंपनियां जो इसकी डिजाईन तैयार करवाती हैं और माल-ढुलाई से लेकर फुटकर बिक्री तक की सारी क्रिया संचालित करती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय पूंजी ने पूर्वी एशिया के पैमाने पर निर्यात उद्योग में भारी मुनाफा कमाने के लिए
क्षेत्रीय तानाबाना खड़ा कर लिया है। इस क्षेत्रीय व्यवस्था की मुख्य कुंजी चीन ही है। चीन में निर्यात के लिए होनेवाले उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा अमरीका में खपता है। इसीलिए अमरीका के बाजारों में मांग बढ़ जाए, तो चीन की अर्थव्यवस्था तेज चलने लगती है। वही मांग जो ज्यादा से ज्यादा ऋण के आधार पर बढ़ाई जाती है।

निर्यात के विदेशी बाजारों पर चीन एक और तरीके से भी निर्भर है। आयात पर उसे लगातार ज्यादा से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ऊर्जा के संसाधनों, खनिज पदार्थों, खाद्य पदार्थों, अर्द्ध-निर्मित वस्तुओं, पूंजीगत माल (मसलन मशीनरी) और नवधनाढ्य वर्गों के लिए ऐशोआराम के सामानों के आयात के लिए उसका खर्च बेशुमार बढ़ता जा रहा है। इस बढ़े हुए आयात खर्च की पूर्ति होती रहे, इसके लिए भी तेज रफ्तार के साथ निर्यात जरूरी हो जाता है।
दो सदियां बीत रही हैं जब चीन को विदेशी आक्रमण का सामना करना पड़ा था। और साथ में असमान संधियां भी। अलग-अलग हिस्से देश से अलग कर विदेशी प्रभाव में लिए गए। इस तरह चीन पर पश्चिमी पूंजीवाद का वर्चस्व कायम हो गया था। क्रूरता के साथ विदेशी ताकतों की आर्थिक और सामरिक घुसपैठ पिछली सदी में भी जारी रही। अमरीका ने चीन पर अपना बाजार खोलने के लिए आर्थिक दबाव डाला, 1930 के दशक में जापान ने आक्रमण किया तथा आधिपत्य कायम कर लिया और 1945-49 के गृह-युद्ध के दौरान अमरीका ने भ्रष्ट, प्रतिक्रियावादी च्यांग काई-शेक के बलों का समर्थन किया। चीन अपनी संप्रभुता गंवा बैठा था। साम्राज्यवादी वर्चस्व के कारण उसका आर्थिक विकास विकृत और बौना था।

1949 से 1976 तक की चीनी क्रांति ने यह पूरी तस्वीर बदल डाली। विदेशी नियंत्राण का शिकंजा तोड़ दिया गया। जमींदारों और नौकरशाह-पूंजीपतियों की सत्ता की नींव ध्वस्त कर दी गई। देश का अपने संसाधनों के बल पर चैतरफा विकास हुआ। माओ के नेतृत्व में चीनी अर्थव्यवस्था का आत्मनिर्भर और संतुलित निर्माण हो गया। आधुनिक उद्योग का आधार खड़ा हो गया। समाज के सामूहिक श्रम द्वारा तैयार किए गए नए आधारभूत ढांचे के अंग के रूप में चीन को परिवहन के साधन और विद्युत कारखाने हासिल हुए। इन्हीं की बदौलत देश की अर्थव्यवस्था का संतुलित विकास हो सका।

छोटे-छोटे शहरों और गांव-गांव तक उद्योग का प्रसार हुआ। देहातों में कम्यून स्थापित हुए। जिनमें विभिन्न स्तरों पर सहकारी खेती की जाती, किसान साथ मिलकर सिंचाई और बाढ़-नियंत्राण के बड़े-बड़े साधन खुद बना लेते, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा निहायत सस्ते में उपलब्ध कराई जाती। इसी क्रांति का परिणाम था कि देश की श्रम शक्ति का स्वास्थ्य और कौशल समुन्नत रहा।

लेकिन जब 1976 में समाजवाद की सत्ता पलट दी गई, तो नए पूंजीवादी शासकों ने अर्थव्यवस्था को खोल दिया और विदेशी पूंजी के हवाले कर दिया। उन्होंने इसे ऐसा रूप देना शुरू कर दिया जो पूंजी संचय के काम आए। नए सत्ताधारियों ने मजदूरों के अधिकार छीन लिए और उन्हें विदेशी पूंजी तथा नई देशी पूंजी का उजरती गुलाम बना दिया। उन्होंने कम्यून भी भंग कर दिए। अब जब किसान अपनी जमीन से बेदखल होने लगे या खेती से अपना गुजारा नहीं चला पाए, तो उन्हें मजबूर होकर और झटपट कमा लेने के लोभ के कारण भी शहरों की ओर पलायन करना पड़ा। समुद्र-तट के उन तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक नगरों की ओर, जहां उन्हें एक नई जाति में शामिल होना पड़ा। ऐसे मजदूरों की जाति में, जिनसे जैसे चाहे और जितना चाहे काम लिया जाए, जिनका अति-शोषण किया जाए और जिन्हें जब जी चाहे काम से निकाला जाए, तो भी वे असहाय रहते।

साम्राज्यवादी विकास के लिए चीन का वह समूचा आधारभूत ढांचा (इनफ्रास्ट्रक्चर) मुफ्त में उपलब्ध हो गया जिसे खड़ा किया गया था समाजवादी दौर में।

वर्तमान चीन के सामाजिक-आर्थिक ढांचे की यह विशेषता है कि वहां शासक वर्ग का राज्य-आधारित तबका सत्ता के केंद्र में है। शासक वर्ग के इस राज्य-आधारित तबके का समाजवाद और साम्यवाद के साथ दूर-दूर तक का भी कोई नाता नहीं है। यह अपने राजनीतिक उपकरण, अर्थात् चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मार्फत राज करता है। यही तबका चीन के पूंजीपति वर्ग का कोर फ्रैक्शन (भीतर से नेतृत्व करने वाला संगठित समूह) है। यह चीन की अर्थव्यवस्था की कुंजीभूत इकाईयों को नियंत्रित करता है। मुद्रा और कर से संबंधित सभी नीतियों को भी यही तय करता है। यह विदेशी पूंजी से बंधा हुआ है, उस पर निर्भर है और देश की बड़ी निजी पूंजी के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा है। राज्य सत्ता की सैन्य शक्ति और दमनकारी तंत्रा की कमान इसी के हाथ में है। वह जनता के खिलाफ अपनी इस सत्ता का प्रयोग पूरी निर्ममता के साथ करता है। इसे हम 1989 में तियानानमेन चैक पर देख चुके हैं, जहां छात्रों और मजदूरों का नृशंस दमन किया गया था।

चीन के इस राजकीय आर्थिक क्षेत्र में शामिल हैं, सरकारी उद्योग और बैंक। पूरी अर्थव्यवस्था में राजकीय क्षेत्रा का हिस्सा 30 फीसदी है। लेकिन निजी पूंजी के क्षेत्रा का विकास राजकीय क्षेत्रा से कहीं अधिक तेजी के साथ हो रहा है। राजकीय क्षेत्रा के खासे हिस्से का निजीकरण भी हो चुका है। वर्ष 1995 से ही बड़े पैमाने पर राजकीय क्षेत्रा का पुनर्गठन शुरू हो चुका था। करोड़ों की तादाद में राज्य कर्मचारियों की छंटनी हो चुकी है। राजकीय कंपनियां बड़ी तादाद में बंद भी हो चुकी हैं। फिर भी भारी उद्योग और कुंजीभूत सेवा के क्षेत्रों में आज भी कुछ प्रमुख राजकीय कंपनियों का ही वर्चस्व है। यह राजकीय क्षेत्रा ही चीनी पूंजीपति वर्ग के नेतृत्वकारी समूह की सत्ता का आर्थिक आधार है। बैंक और बीमा क्षेत्रों पर तो राज्य का नियंत्राण अब भी बहुत सशक्त है, बावजूद इसके कि इन क्षेत्रों के शेयर अंतर्राष्ट्रीय निजी निवेशकों को बेचे जा चुके हैं।

देश के विकास की बागडोर साम्राज्यवादी वर्चस्व और आयातित टेक्नोलाजी पर निर्भरता के दायरे में ही किसी हद तक राज्य के हाथ में है। इसी राज्य का एक लक्ष्य यह भी है कि विनिर्माण के क्षेत्रा में देश उत्तरोत्तर विकसित से विकसित तकनीक अपनाता जाए। चीन में अब भी पूंजी-केंद्रित वस्तुओं का उत्पादन अधिक हो रहा है, विकसित और मानकीकृत टेक्नोलाजी के सहारे माड्यूलर विनिर्माण ही अधिक हो रहा है। इसी प्रकार से हर क्षेत्रा में विकसित तकनीक अपनाई जा रही है। चीन का शासक वर्ग प्रयासरत है कि उसका औद्योगिक-प्रौद्योगिक आधार विस्तार करता जाए और वैविध्यपूर्ण होता जाए। वह विकास के ढर्रे को अपने दूरगामी हितों के अनुरूप प्रभावित करना चाहता है। मिसाल के तौर पर कार उद्योग को देखें। चीन में कार निर्माण विदेशी पूंजी की सरपरस्ती में तेजी से विकसित हो रहा है। यह विकास फोक्सवागेन और जनरल मोटर्स कंपनियों की सरपरस्ती में हो रहा है। पर सरकार ने अपने बाजार में प्रवेश की शर्त के तौर पर इन पारराष्ट्रीय कंपनियों से अभूतपूर्व पैमाने पर टेक्नोलाजी स्थानांतरण निश्चित करवा लिया है। चीन के शासक इस बात के लिए अड़े हैं कि कार उद्योग में देशी कंपनियां अपने साथ प्रतिस्पर्धा कर सकने वाली विदेशी साझीदार कंपनियों के साथ साझे उद्यम कायम किए रखें।

चीन अनुसंधान और विकास (आर एंड डी) में बड़े पैमाने पर और दूरगामी निवेश कर रहा है। इसकी बड़ी अहमियत है। देश की निजी और राजकीय कंपनियों को सरकार यह प्रोत्साहन दे रही है कि वे कंप्यूटर और दूरसंचार जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में देश के पैमाने पर रहनुमाई करें। चीन के शासकों का मकसद यह है कि वर्तमान विदेशी वर्चस्व वाले, साम्राज्यवादी विकास का प्रयोग ऐसे आधार के रूप में करें जिसके बल पर चीन को विश्व के पैमाने पर आर्थिक शक्ति के रूप में मजबूती के साथ स्थापित करते हुए प्रचारित- प्रसारित और विस्तारित किया जा सके। इसी मकसद से चीनी शासक प्रयास जारी रखे हुए हैं।

चीन का यह जो तीव्र विकास हो रहा है, उस पर अभी तक विदेशी पूंजी का वर्चस्व कायम है और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर निर्भरता भी विश्व के बाजार में जब भी मांग घटती-बढ़ती है, इसका असर तुरंत चीन पर पड़ता है। चीन के लिए यह निहायत जरूरी हो जाता है कि विदेशी पूंजी को निरंतर अपने यहां खींचते रहा जाए। साम्राज्यवादी पूंजी जब उत्पादन के खातिर हमेशा सस्ते से सस्ते क्षेत्रों को खोज रही हो, मैक्सिको से हटकर कभी चीन की ओर, तो कभी चीन से हटकर वियतनाम की ओर भाग रही हो, तो उसे आकर्षित करते रहने की जरूरत स्वतः स्पष्ट है। इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि देश के भीतर सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता लगातार कायम रहे। पर यह मुश्किल है। क्योंकि विदेशी पूंजी के आगमन के साथ ही कृषि और उद्योग जगत में विकृतियां चरम पर पहुंचने लगती हैं और काफी गंभीर हो उठती हैं। बड़े पैमाने पर क्षेत्राीय और सामाजिक विषमताएं पनपने लगती हैं यहां तक कि चीन में शहर और गांव के बीच आमदनी का फर्क अनुमानतः दूसरे किसी भी देश से ज्यादा हो गया है। यह अस्थिरता का बड़ा ही सशक्त कारण बन सकता है।

कम से कम लागत से अधिक मुनाफा कमाते हुए तेज विकास करते जाना चीन के शासक वर्गों का मुख्य लक्ष्य है। उजरती श्रम और किसानों के श्रम का शोषण इसका आधार है। ऐसा विकास अराजक और विध्वंसक होने के साथ ही पर्यावरण का भी नाश करता है।

दुनिया के 10 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर चीन में ही हैं। थ्री गार्जेस बांध परियोजना ने न सिर्फ तीन घाटियों को एक बहुत बड़ी झील में समाकर मानव इतिहास में नया कीर्तिमान स्थापित किया है, बल्कि अपार पारिस्थितिकीय क्षति पहुंचाने के साथ-साथ लाखों की तादाद में स्थानीय आबादी को भी अपने जल-जंगल- जमीन से उखाड़ दिया है। सरकार के स्थानीय अधिकारी किसानों को अपनी जमीन जोतने का अधिकार बेचने के लिए दबाव डाल नाममात्रा का मुआवजा देते हैं। जिससे व्यावसायिक विकास के नाम पर खेती चैपट हो रही है और अंधाधुंध शोषण-दोहन को बढ़ावा मिल रहा है। इस प्रकार देश भर में सिंचित, उर्वर भूमि का आधा हिस्सा बर्बाद किया जा चुका है। इस पूंजीवादी विकास से परिस्थितिकी का विनाश हो जाता है। अनुमान है कि वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और पर्यावरण के अन्य किस्म के विनाश के कारण चीन में प्रतिवर्ष चार लाख लोग बीमारी और अकाल मृत्यु का शिकार हो जान गंवाते हैं।

पिछले साल सिचुआन प्रांत में जो भूकंप आया था उससे अधिक जानें गरीबों की ही गईं। कमजोर भवनों में चलाए जा रहे गरीबों के स्कूल धराशायी हो गए और कई सारे बच्चे, जो इस अनहोनी से बच सकते थे, बेमौत मारे गए। चीन के गांवों में अब किसानों को चिकित्सा शुल्क और स्कूली शिक्षा के लिए अनिवार्यतः शुल्क जमा करना पड़ रहा है। हाल में स्वास्थ्य प्रणाली पर एक सर्वेक्षण से पता चला है कि आजकल गरीब लोग स्वास्थ्य सेवाओं से पूरी तरह वंचित हैं।’’

शहरों में स्वास्थ्य और सुरक्षा की खस्ताहाल व्यवस्था के अंतर्गत निर्यात उद्योग में बहुत कम वेतन पाकर मजदूरों को सप्ताह में 80-80 घंटे कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है। दुनिया भर में चीनी खिलौनों में जहरीले रंग इस्तेमाल किए जाने की बड़ी चर्चा र्है। पर जिन कारखानों में ये खिलौने बनते हैं, वहां मजदूर कितनी जहरीली हवा में सांस लेने को बाध्य हैं, उनमें कितने घायल हो जाते हैं और कितने अपंग, इन बातों का जिक्र तक नहीं होता। चीनी सरकार के ही एक सर्वेक्षण के मुताबिक तकरीबन 10 करोड़ मजदूर गांव छोड़कर शहरों में जा बसे हैं। इनमें 72 फीसदी मजदूरों को अपना वेतन मालिकों के पास बकाया रखकर काम करते जाना पड़ता है। जाहिर है कि यह भी निजी और विदेशी कंपनियों के पूंजी संचय का अहम् हिस्सा है।

सच यह है कि चीन में 1990 से 2002 तक की आर्थिक तेजी के दौरान शहरों में नियमित रोजगार पाने वाले उन मजदूरों की संख्या, जिन्हें निश्चित मानकों के पालन और काम की सुरक्षा जैसे लाभ मिलते हैं। बढ़ी नहीं, बल्कि घटी है। राजकीय क्षेत्रा में इस दौर में चलाई गई कार्यप्रवीणता और लाभदायकता बढ़ाने की मुहिम का यह परिणाम चीन के विकास के ढर्रे की सच्चाई उजागर करता है। रोजगार अगर कहीं बढ़े हैं, तो सिर्फ निजी क्षेत्रा में। ज्यादातर अनौपचारिक किस्म के कार्यों में, जहां नियम-कायदों को ताक पर रखा जाता है और कभी भी काम से निकाल दिया जाता है। बेरोजगार वहां बढ़े हैं जहां शहरों में अट्टालिकाएं खड़ी की जा रही हों या नदियों पर बड़े-बड़े बांध बनाए जा रहे हों या फिर ओलंपिक जैसे खेलों के लिए विशाल आधारभूत ढांचा तैयार हो रहा हो। रोजगार के अवसर मिल रहे हैं सड़कों पर माल बेचने के काम में और तरह-तरह की अवैध गतिविधियों में। चीन का फलता-फूलता ‘‘सेक्स उद्योग’’ भी रोजगार के नए आयाम खोल रहा है। कुछ महिला समूहों का यह अनुमान है कि वर्तमान में 2 करोड़ औरतें देह व्यापार में लगी हैं। अधिकतर गांव-देहात से आकर उद्योग और व्यवसाय के उभरते नए केंद्रों के लालबत्ती इलाकों में अपना वजूद खो बैठी हैं।

गांव-देहात की औरतों को दूसरे किस्म की परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा है। जिन परिवारों में पति और पुत्र शहरों की ओर पलायन कर चुके हों, वहां सारा भार औरत पर ही पड़ जाता है। उनके जीवन में आगे बढ़ने के अवसर प्रायः समाप्त हो चुके हैं। चीन के देहाती समाज पर इसका दुखद परिणाम सामने आ रहा है, हालांकि इसकी जानकारी बहुत कम दी जाती है। हताशा-निराशा की शिकार असंख्य महिलाएं आखिरी रास्ता चुन रही हैं, आत्महत्या का। इनमें ज्यादातर युवा हैं। यह अभूतपूर्व माओवादी दौर के ठीक विपरीत है। समाज के सतत् क्रांतिकारी रूपांतरण के दौर में नारी उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष मुख्य लक्ष्यों में शामिल था। अब हालात बिल्कुल बदल गए हैं।

3.उभरती आर्थिक शक्ति

चीन में पूंजीवाद के इस तीव्र विकास का सीधा प्रभाव पूर्वी एशिया पर पड़ता है। पूर्वी एशिया में पूंजीवादी उत्पादन के जिस क्षेत्रीय ताने-बाने को संगठित करने में जापानी साम्राज्यवाद प्रमुख भूमिका निभा रहा है, उसका स्वरूप अब चीन-केंद्रित हो गया है। विनिर्माण के क्षेत्रा में पूर्वी एशिया जैसा तीव्र विकास दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से में नहीं हो रहा है। समूचे पूर्वी एशिया में चीन के शासकों के आर्थिक-राजनीतिक संपर्कों का जाल मजबूत होता जा रहा है। इस क्षेत्रा में चीन एक सामरिक शक्ति के रूप में अपनी हैसियत दर्ज कराने के लिए आवश्यक क्षमताएं विकसित कर रहा है। यहां से उसने दुनिया के शेष हिस्सों की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है।

दुनिया के मुद्रा और वित्त बाजारों में अब चीन की अहम् भूमिका बन गई है। चीन का विदेशी मुद्रा भंडार एक लाख अस्सी हजार करोड़ डालर (1, 80, 000 करोड़ डालर) तक पहुंच चुका है। उसने यह विदेशी मुद्रा अपने यहां उत्पादित माल के निर्यात के अलावा विदेशों में विभिन्न उद्योग-धंधों में अपने पूंजी निवेश से कमाई है। चीन का निर्यात तंत्रा वाकई लाजवाब है। स्वयं अमरीका भी चीन से जितना माल आयात करता है उतना और किसी देश से नहीं करता। कभी जापान का विदेशी मुद्रा भंडार सबसे बड़ा हुआ करता था। पर अब चीन ने जापान का स्थान ले लिया है। उसकी ज्यादातर विदेशी मुद्रा डालरों में ही है। उसने भारी मात्रा में अमरीकी सरकार की प्रतिभूतियां खरीद ली हैं, अमरीका की सरकारी संस्थाओं को ऋण दे रखा है और नाना प्रकार के वित्तीय उपकरणों में निवेश भी किया है।

अपने डालरों के इस भंडार के कारण चीन ने विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था को प्रभावित करने का अच्छा-खासा सामर्थ्य अर्जित कर लिया है। अमरीकी सरकार का बजट जबरदस्त घाटे में चल रहा है। जितना धन वह करों की वसूली से कमाती है उससे कहीं अधिक उसे युद्धों के मद में, सामाजिक कार्यक्रमों पर और पिछले ऋणों का ब्याज चुकाने आदि में खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा अमरीका को अपने विदेश व्यापार में भी भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। अपने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय असंतुलन की पूर्ति करने के लिए उसे बड़ी मात्रा में पूंजी उधार लेनी पड़ती है। अमरीका अपने ऋणों की वित्तपूर्ति के लिए चीन जैसे देशों पर बुरी तरह निर्भर है। आलम यह है दो साल पहले जब अमरीका के वाल स्ट्रीट में वित्त कंपनियों एवं शेयरों की दलाली करनेवाली कंपनियां डगमगाने लगीं, तो वे भी पूंजी की अपनी सख्त आवश्यकता की पूर्ति के लिए चीन के ‘‘संप्रभु संपदा कोष’’ (सरकार द्वारा प्रबंधित वित्तीय संपदा का अकूत भंडार) की ओर आस लगाए बैठी थीं।

चीन को भारी मात्रा में ईंधन और खनिज पदार्थ भी आयात करने पड़ते हैं। इन संसाधनों के विश्व बाजार का 40 फीसदी हिस्सा सन् 1955 से ही चीन खरीद लेता रहा है। चीन को जापान की तुलना में कहीं अधिक ईंधन और खनिज पदार्थों की जरूरत है। क्योंकि तेज रफ्तार के साथ विकसित हो रहे, विश्व बाजार की ओर उन्मुख चीन के उद्योग अपेक्षाकृत कम विकसित टेक्नोलाजी पर आधारित हैं। इसीलिए चीन के उद्योग में उतने ही उत्पादन के लिए जापान से सात गुना अधिक ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। अपनी इसी औद्योगिक तंत्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चीन को कच्चे माल के स्रोतों की तलाश रहती है।

यही वजह है कि चीन सीधे लातिन अमरीका और अफ्रीका के खनन उद्योग में निवेश कर रहा है और कुछ कंपनियों को तो उसने खरीद ही लिया है। सन् 2003 में 180 करोड़ डालर से सन् 2006 में बढ़कर 1,610 करोड़ डालर तक जा पहुंचे चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में से आधा हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित उद्योगों में ही लगा है।
अफ्रीका के तेल और खनिज पदार्थों के लिए जबरदस्त होड़ शुरू हो गई है। एक ओर अमरीका की तेल कंपनियों ने अंगोला, नाइजीरिया, भूमध्यरेखाई गिनी जैसे देशों में अपना निवेश बढ़ा लिया है। वर्ष 2009 में अमरीकी सेना ने अफ्रीका के भीतर अपनी नई एकीकृत कमान ‘‘अफ्रीकम’’ भी स्थापित कर लिया। अब उसे अफ्रीका में तैनात अपनी फौजों की कमान बाहर से नहीं संभालनी पड़ेगी। इस प्रकार अमरीकी साम्राज्यवाद ने अफ्रीका के तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्राण कायम करने और अफ्रीका के एक बड़े हिस्से को अपने ‘‘आतंकवाद-विरोधी युद्ध’’ के दायरे में समेटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अपनी इस नई मुहिम के तहत् अमरीका अलग-अलग अफ्रीकी देशों की सरकार को पहले से ज्यादा शस्त्रा आपूर्ति करने लगा है और उसके साथ सामरिक सहयोग के नए-नए करार कायम कर रहा है।

दूसरी ओर 1990 के दशक के मध्य से अफ्रीका में चीन की सक्रियता भी बढ़ती गई है। व्यापार में वह अफ्रीका का तीसरा बड़ा साझीदार बन गया है। सूडान की प्रमुख तेल कंपनी में चीन की राजकीय तेल कंपनी ने इतने अधिक शेयर खरीद लिए कि नियंत्राण ही अपने हाथ में आ जाए। चीन ने अल्जीरिया के तेल उद्योग में भी निवेश किया है। अंगोला और नाइजीरिया के तेल क्षेत्रों में भी चीनी निवेश हो चुका है। अब अफ्रीका से चीन अपने तेल आयात की 30 फीसदी पूर्ति कर लेता है। चीन की खनन कंपनियां वहां कोबाल्ट, यूरेनियम, तांबा आदि औद्योगिक खनिज पदार्थों की खोज करने में लगी हैं। इसके लिए चीनी राज्य सहायता कर रहा है। अब चीन की ये खनन कंपनियां कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, जिम्बाब्वे और जांबिया को वित्तीय सहायता दे रही हैं और इन देशों के साथ घनिष्ठ संबंध कायम कर रही हैं।

लेकिन फिर भी अफ्रीका में चीन ने जितना निवेश कर रखा है और जितनी जोड़-तोड़ कर ली है वह अमरीका और योरोप की कारगुजारियों की तुलना में बहुत कम है। पर अफ्रीका में स्वार्थों के बीच टकराव बढ़ रहा है और इस होड़ में चीन की भूमिका उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

अपने हितों की अधिकतम पूर्ति करने के लिए चीन राजनीतिक तथा कूटनीतिक संबंधों, शस्त्रा बिक्री तथा प्रशिक्षण समझौतों और कम ब्याज पर ऋण जैसे माध्यमों का प्रयोग कर रहा है। तीसरी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में वह अपने हितों के अनुरूप विचारधारात्मक रूख भी अपना लेता है। तीसरी दुनिया पर अमरीका के वर्चस्व और अमरीका की लुटेरी नीतियां थोपे जाने की वह आलोचना करता है। चीन इस बात का भी लाभ उठाता है कि फिलहाल अमरीका का ध्यान पश्चिम एशिया पर कंेद्रित है, जहां वह अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए छेड़ी गई एक से अधिक जंग में उलझा पड़ा है।

इसी तरह अमरीकी साम्राज्यवाद भी चीन को अपना रणनीतिक प्रतिस्पर्धी मानकर उसके खिलाफ विष-वमन करने से नहीं चूकता। वर्ष 2006 के बाद से अमरीका का रक्षा विभाग अपने वार्षिक सर्वेक्षण में चीन के साथ युद्ध की संभावनाओं के स्रोत के तौर पर संसाधनों के लिए होड़ को उतना ही महत्व देने लगा है जितना कि ताइवान को लेकर चला आ रहा पुराना रगड़ा।

विश्व अर्थव्यवस्था में चीन के उभार और उसके साथ अमरीका की इस रंजिश की पृष्ठभूमि को समझ लेने के बाद यह समझना मुश्किल नहीं रह जाता कि चीन को अमरीका दानव के रूप में क्यों दर्शाता रहता है। और यह भी कि असुरक्षित खाद्य पदार्थों तथा असुरक्षित दवाओं के निर्यात के सवाल पर, बौद्धिक संपदा के अधिकार के उल्लंघन के सवाल पर, मानवाधिकारों के हनन के सवाल पर और सामरिक मद में अत्यधिक खर्च करने के सवाल पर अमरीका क्यों चीज को कटघरे में खड़ा करता रहता है।

चीन में साम्राज्यवादी पूंजी के वर्चस्व के अधीन जिस तेज रफ्तार के साथ अराजक आर्थिक विकास हो रहा है, जिसके लिए संसाधनों की कमी का सामना भी करना पड़ रहा हैµयह विश्व शक्ति के रूप में उभरने की उसकी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा को वस्तुगत तौर पर बढ़ा देता है। ‘स्टाकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान’ का अनुमान है कि उसने पिछले एक दशक के दौरान अपना सामरिक खर्च तीन गुना बढ़ा लिया है। वर्ष 2006 में उसका सामरिक खर्च जापान से अधिक हो गया, यानी पूर्वी एशिया में सर्वाधिक। दुनिया में सबसे ज्यादा सामरिक खर्च करने वाले देशों में चीन का अब तीसरा स्थान है। उसकी नौसेना की क्षमताओं का स्तर उन्नत हुआ है, प्रक्षेपास्त्रों की किस्में विकसित हो चली हैं और वह अंतरिक्ष के सैन्यीकरण जैसे उच्च टेक्नोलाजी वाले क्षेत्रों में भी प्रवेश कर रहा है। अभी अमरीकी साम्राज्यवाद की तुलना में चीन का सामरिक खर्च बहुत ही कम है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, खासकर पूर्वी एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति उसे पहले से कहीं ज्यादा अहम् किरदार अदा करने की ओर ले जा रही है।

इस संदर्भ में अमरीका सरकार के दो नीति विशेषज्ञों ने अमरीकी साम्राज्यवाद को हाल में जो सलाह दी, उससे सच्चाई का एक महत्वपूर्ण पहलू उजागर होता है.

‘‘60 सालों तक अमरीका के वर्चस्व के बाद अब उत्तर-पूर्वी एशिया में शक्ति-संतुलन बदल रहा है। अमरीका पहले के मुकाबले कमजोर, चीन अधिक मजबूत और जापान व दक्षिण कोरिया संक्रमण की तरल अवस्था से गुजर रहे हैं। इस क्षेत्रा में वाशिंगटन अगर अपनी ताकत कायम रखना चाहता हो, तो उसे इस संक्रमण के लिए जिम्मेदार रूझानों को पहचानना होगा और अपनी ताकत का आधार विस्तारित करने के लिए आवश्यक नए औजारों और नई सत्ताओं को गले लगाना होगा।’’

वर्तमान परिस्थिति की एक विशेषता यह भी है कि चीन तथा रूस के हित कुछ निहायत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समान होते जा रहे हैं और उनके बीच संबंधों तथा सहकार के रूप विभिन्न तरीकों से विकसित हो रहे हैं। वर्ष 2006 तक आते-आते चीन ही रूस का सबसे बड़ा आर्थिक साझीदार बन गया। यहां तक कि रूस के अहम् पाइपलाइन परियोजनाओं का वित्तपोषण चीन करने लगा।

चीन और रूस, दोनों ही तीसरी दुनिया के तेल और गैस उत्पादक देशों को शस्त्रों की पूर्ति करते हैं। ऊर्जा उत्पादन के सबसे अहम् क्षेत्रों में दोनों अपनी सैन्य सामथ्र्य बढ़ा रहे हैं। वर्ष 2001 में दोनों सैन्य शक्तियों ने मिलकर मध्य एशिया के देशों को साथ लेकर ‘‘शंघाई सहकार संगठन (एससीओ)’’ का गठन कर लिया था। यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत था। इस महत्वपूर्ण कदम के बाद अब चीन का आर्थिक विकास और विश्व अर्थव्यवस्था में उसका उद्भव भू-राजनीतिक एस.सी.ओ. (शंघाई कोआपरेशन आर्गनाइजेशन) क्षेत्रीय पैमाने का ऊर्जा गठबंधन ही नहीं, सुरक्षा गठबंधन भी है। चीन, रूस, कजाकस्तान, किरगिजस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान इसके मुख्य सदस्य हैं। इस संगठन में चीन की आर्थिक ताकत के साथ रूस का सामरिक सामर्थ्य और ऊर्जा संसाधन भी जुड़ गए हैं। 2007 की गर्मियों में एस.सी.ओ. का पहला सैन्य अभ्यास संपन्न हो चुका है। चीन की सरहदों के पार उसकी वायुसेना के जवानों की तैनाती का वह पहला मौका था।

एस.सी.ओ. का मकसद साफ है. मध्य एशिया में अमरीका का प्रभाव कम करना, उसका मुकाबला करना और रूस तथा चीन की मजबूतियों को एक साथ लामबंद करते हुए उनकी अपनी-अपनी कमजोरियों की पूर्ति करना। साथ ही, अन्य देशों को रूस और चीन के इर्द-गिर्द ला खड़ा करना। दुनिया के इस ऊर्जा संसाधनों से संपन्न, अशांत क्षेत्रा में विरोधी शक्तियों की यह लामबंदी भले ही आज खास महत्वपूर्ण न लगती हो, भविष्य में यह किसी विस्फोट का वाहक बन सकती है।

विश्व अर्थव्यवस्था के दृश्यपटल पर चीन का इस तरह तेजी के साथ उभर आना कुछ अहम् संभावनाओं को पेश करना है। देखना यह है कि इनमें से कौन-सी संभावना सच साबित होती है और कैसे।

चीन क्या अमरीका पर निर्यात के लिए अपनी निर्भरता और अमरीका सरकार के घाटे की वित्तीय भरपाई करने की अपनी इच्छा का परित्याग करेगा? नहीं, निकट भविष्य में तो यह बिल्कुल संभव नहीं लगता। अगर चीन अचानक डालरों से पिंड छुड़ा ले, तो डालर का मूल्य तो एकदम से गिर ही जाएगा, पर साथ ही खुद चीन को भी बहुत बड़ा झटका लगेगाµअरबों का नहीं, खरबों का। इसके अलावा ऐसा करने पर उसका वर्तमान विकास, जो विकृत और परनिर्भर किस्म का है, जिस निर्यात की बुनियाद पर टिका है वह बुनियाद ही एकाएक खिसक जाएगी। दोनों ही परिणामों को देखते हुए यह निश्चित कहा जा सकता है कि चीन इस विकल्प को तत्काल नहीं चुनने जा रहा है। आखिर चीन अपने पश्चिमोन्मुख निर्यात का स्थान लेने के लिए देश की अपनी घरेलू मांग को बढ़ावा देने की स्थिति में अभी फिलहाल तो नहीं है।

परंतु यदि इस विकल्प को मध्यवर्ती या दीर्घकालीन संभावना के तौर पर परखा जाए, तो आसार कुछ और ही दिखाई देते हैं। मगर दुनिया के आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरणों के बदलने की संभावनाओं के समकक्ष इस विकल्प पर सोचा जाए, तो चीन निर्यात के लिए अमरीका पर अपनी निर्भरता से मुक्त हो, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

चीन की तेज विकास दर और साम्राज्यवादी पूंजी के चीन में निवेश पर मुनाफे की ऊंची दर के कारण विश्व अर्थव्यवस्था, विशेषकर अमरीकी साम्राज्यवाद की अर्थव्यवस्था में जान आ जाती है। उधर, योरोपीय संघ के उभरने के साथ-साथ पश्चिम योरोप का खेमा पहले से अधिक समरूप और प्रतिस्पर्धात्मक हो उठा है। विश्व अर्थव्यवस्था और विश्व वित्तव्यवस्था में यह खेमा अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा है। फिर भी अभी साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में अमरीका ही सर्वोपरि है।

मौजूदा साम्राज्यवादी विश्व अर्थव्यवस्था के साथ चीन जितनी गहराई तक जुड़ गया है, इस स्थिति में अगर कल विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की गाज उस पर पूरी तरह गिर जाए, तो इसका क्या परिणाम निकलेगा? इस पर सोचने की जरूरत है। यदि इस मंदी की गाज पूरी तरह चीन पर पड़ जाए, तो चीन के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था की भी भारी क्षति होगी। तमाम अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा जाएंगी। चीन की अर्थव्यवस्था की तबाही विश्व अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगी और विश्व अर्थव्यवस्था की तबाही चीन को।

दुनिया के दूरगामी भू-राजनीतिक समीकरण क्या होंगे? यह इस पर निर्भर करता है कि चीन और अमरीका मौजूदा वित्तीय संकट का किस प्रकार सामना करते हैं।

अब तक चीन अपनी तेज विकास दर कायम रख पाया है। लेकिन आखिरकार उसकी अर्थव्यवस्था भी तो पूंजीवादी ही है। वह भी अस्थिरता और संकट से मुक्त नहीं रह सकती। यह अनुमान है कि चीन के तीन-चौथाई उद्योगों में उत्पादन की क्षमता वास्तविक उत्पादन से काफी अधिक है। यानी बाजार जितने उत्पादन को खपा सकते हैं उसकी तुलना में उत्पादन में काफी अधिक निवेश हुआ पड़ा है। यही वे हालात हैं जिनमें समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है। सामाजिक ध्रुवीकरण वास्तव में बढ़ भी रहा है। पिछले कुछ वर्षों से हड़तालें, प्रदर्शन, देहातों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाईयां, जमीन से बेदखली और पर्यावरण की क्षति तेजी के साथ बढ़ी है।

चीन के उभार की अंदरूनी गतियां उलझनों और अंतविरोधों से परिपूर्ण है। एक तरफ उसकी आर्थिक ताकत बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ उसकी परनिर्भरता भी बढ़ रही है। वह विदेशी पूंजी पर निर्भर है और विदेशी बाजार पर भी। फिर भी वह दुनिया के पैमाने पर स्थापित हो गया है. आर्थिक शक्ति के रूप में और विनिर्माण के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में। उसके पास विदेशी मुद्रा का अकूत भंडार है, तो वित्तीय मामलों में खासी घुसपैठ भी है। अन्य मुद्राओं में, पर खासकर डालर में। आज वह पहले से ज्यादा आक्रामक तेवर के साथ तीसरी दुनिया के बाजारों में अपने पैर जमा रहा है। अपनी पूंजी देश के बाहर निर्यात कर रहा है।

जरा-सी दूरी लेकर सोचा जाए, तो चीन का शासक वर्ग दूरगामी रणनीति और दूरगामी प्रतिस्पर्धा के इरादे के साथ कदम बढ़ाता दिखाई देता है.अपनी घरेलू जड़ों पर आधारित उद्योग का दायरा विस्तारित करते हुए, उसे वैविध्य और मजबूती प्रदान करते हुए; अपना सामरिक सामथ्र्य बढ़ाकर ताकतवर बनते हुए। मगर अभी वर्तमान दौर में वह अमरीकी साम्राज्यवाद को उकसाना नहीं चाहता, उसके साथ सीधा मुकाबला करने से बचना चाहता है।
सवाल यह है कि क्या भविष्य में चीन साम्राज्यवादी शक्ति बन उभरेगा? यह संभावना न तो खारिज की जा सकती है और न ही इसे अवश्यंभावी माना जा सकता है। लेकिन यह एक वास्तविक संभावना, सचमुच की संभावना अवश्य है। यह हो सकता है कि चीन आज साम्राज्यवादी शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा हो, संक्रमणकाल से गुजर रहा हो।

लेकिन इस किस्म के गुणात्मक परिवर्तन की गुंजाइश है कितनी? और गुणात्मक परिवर्तन किन-किन राहों से होकर गुजरेगा? ये सवाल दरअसल इतिहास से ताल्लुक रखते हैं। जिसका जवाब इस पर निर्भर करता है कि चीनी पूंजीवाद की गति और विकास के साथ चीन के वर्ग-संघर्ष का अंतरसंबंध किस प्रकार प्रकट होता है। खासकर तब जबकि विश्व अर्थव्यवस्था के पैमाने पर समीकरण बदल रहे हों, छोटे-बड़े अनेक उठा-पटक हो रहे हों और विश्व राजनीति में भी बड़ी-बड़ी घटनाएं घट सकती हों। कुछ घटनाएं अप्रत्याशित भी हों। जैसे युद्ध। जैसे छोटे-बड़े झगड़े-झंझट। और क्रांतिकारी संघर्ष भी।

जब ज़मीन पक रही थी : लालगढ़ से लौटकर एक रिपोर्ट

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/05/2009 03:05:00 PM

लालगढ़ से लौट कर रेयाज़ उल हक

अब कादोशोल के गोपाल धवड़ा को शाम ढ़लने के बाद अपने मवेशियों को जंगल में खोजने जाने से पहले सौ बार सोचना पडेगा. सिजुआ की पांचू मुर्मू को सुबह शौच के लिए जाना पहले जितना ही आतंक से भर देने वाला काम होगा. मोलतोला के दिलीप को फिर से स्कूल जाने में डर लगेगा. 17 जून के बाद लालगढ़ में सीआरपीएफ़, पुलिस और हरमादवाहिनी के घुसने के साथ ही सात महीने से चला आ रहा पुलिस बायकाट खत्म हो गया. और इसी के साथ लालगढ़ के लोगों के शब्दों में उनके पुराने दिन शायद फिर से लौट आये हैं, पुलिसिया जोर-ज़ुल्म के, गिरफ़्तारियों के, यातना भरे वे दिन, जब…

लालगढ़ के रास्तों पर फिर से पुलिस और अर्धसैनिक बलों की गाडि़यां दौड़ने लगी हैं. थाने फिर से आबाद हो गये हैं. स्कूलों, पंचायत भवनों और अस्पतालों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के डेरे लग गये हैं. लालगढ़ में पहले भी बाहरी लोगों के जाने पर रोक थी, लेकिन तब भी पत्रकार और बुद्धिजीवी, छात्र आदि जा सकते थे, राज्य के शब्दों में ‘आतंकवादी’ माओवादियों के नियंत्रणवाले लालगढ़ में क्या हो रहा है, यह जो देखना चाहे उसकी आंखों के सामने था. लेकिन अब सरकार के नियंत्रण में आने के बाद लालगढ़ में क्या हो रहा है, किसी को नहीं पता. वहां जाने पर अब पूरी पाबंदी है. लालगढ़ में ‘लोकतंत्र’ को बहाल किये जाने की प्रक्रिया के बारे में हम अब भी कम ही जान पाये हैं. कभी-कभा आ रही खबरें बताती हैं कि किस तरह लोग अभी चल रही कार्रवाई से आतंकित होकर भाग रहे हैं. लोगों के घर, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल जलाये जा रहे हैं. उपयोग में लाये जानेवाले पानी के स्रोत गंदे किये जा रहे हैं. और अनगिनत संख्या में लोगों को माओवादी कह कर प्रताड़ित किया जा रहा है. कुछ हफ़्ते पहले के लालगढ़ में ऐसा कुछ भी नहीं था. माओवादियों से ‘आतंकित’ और उनकी ‘यातनाएं सह रहे’ लालगढ़ के लोग निर्भीक होकर कहीं भी आ जा रहे थे. बच्चे स्कूल जा रहे थे. महिलाएं अपने जीवन में पहली बार बिना किसी डर के जंगलों में जा रही थीं. गांवों में शाम ढले घर से निकलने पर किसी को कोई डर नहीं था. अब ‘मुक्त’ लालगढ़ में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता.

लेकिन लालगढ़ में ‘मुक्ति’ से पहले की, लालगढ़ के लोगों के शब्दों में ‘आज़ादी’ हमेशा से नहीं रही. कुल सात महीने थे, जिनमें पुलिस और अर्धसैनिक बलों को लोगों ने बेहद शांतिपूर्ण तरीके से इलाके से बाहर कर दिया था. यह हुआ था इलाके में पुलिस के आम बायकाट से, जो शुरू हुआ था छोटोपेलिया की चिंतामणि मुर्मु की आंख पुलिस द्वारा फोड़ देने की घटना के बाद.

पूरी रिपोर्ट पढ़िए रविवार पर। यहां क्लिक करिए.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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