हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

मेरा जुर्म और तुम्हारी वीरता

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/23/2009 01:20:00 AM

कुलदीप प्रकाश की कविताएँ

मेल खोला तो एक मित्र की चिट्ठी पर नज़र गयी...कुछ कविताएँ किसी भूमिका-परिचय के बिनाशुरुआती पंक्तियाँ ही खरोच छोड़ती हैं...बिना एक मिनट का समय गंवाए उन्हें प्रस्तुत कर रहा हूँ...कवि का परिचय आपमे से किसी के पास हो तो बताएं, आगे शामिल कर लेंगे. कुछ कविताओं में शीर्षक नहीं दिए गए हैं


पहले तुम्हारे हाथ में थी बन्दूक
तो यह तुम्हारी वीरता थी
अब मेरे हाथ में है बन्दूक
तो यह मेरा जुर्म है.

--



वे शांति स्थापना के लिए निकले हैं
ज़ाहिर है
कब्रिस्तान में शोर नहीं होता

--

कब्रगाह

सफ़ेद कबूतरों से भरे
आसमान
के नीचे की जमीन

--


समय

मैं उनसे कुछ नहीं कहना चाहता
की समय जिनके लिए
किसी बुढ़िया की आँखों की तरह है
और उनसे भी नहीं
जिनके लिए वह
कलेण्डर में पड़ी तारीखों के बीच की खाली जगह है

मैं उनकी ओर मुखातिब हूँ
की जिनकी ताम्बई बाँहों में
समय ने
पिघला पिघला के भरा है इस्पात
की घड़ी और सुइओं का मतलब
जिनके लिए
आदमी से मशीन
और मशीन से आदमी में बदलने का आदेश है

मैं उनसे भी कुछ कहना चाहता हूँ
जो दावा करते हैं
समय पर समय को समझ लेने का
की साथियों
यह समय
समय के बारे में सोचते हुए समय गुजारने का नहीं
बल्कि
समय रहते
समय को बदल देने का समय है.

--


यूँ तो इस मौसम की
सबसे तल्ख़ हकीकत है सन्नाटा
मगर आने से पहले
तूफान कभी मुनादी नहीं करते


--


पहाड़

बड़े से बड़े तूफान के आने पर भी
पहाड़
नहीं बदलते अपनी जगह
लेकिन जब उतरती है शाम
तो वे बदल लेते हैं अपना रंग


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कत्ल
कत्ल करने के कितने तरीके ढूंढ लिए हैं तुमने
हैरत है मौत होती है लेकिन एक सी


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एक भुला दी गई कहावत

अगर कोई सही बात कहता है
तो तुम उसका समर्थन करो
अगर कोई भी सही बात नहीं कहता
तो तुम खुद उसे कहो


--


कॉमरेड
इस सबसे बेहतरीन शब्द को
सबसे बेहतरीन आवाज में
तुमसे कहता हूँ मैं
कॉमरेड

सर्दियाँ जाने वाली हैं
और बसंत आने वाला है
हौसला रखो
ओ दोस्त
सर्द हो गए लोगों
और सर्द हो गए संबंधों पर
अफ़सोस करते हुए वक़्त जाया मत करो

इस सर्द रात की हवा में
आने वाले बसंत की खुशबु सूंघ लेना ही
क्रांति
और सबसे बढ़ कर जीवन है

मैं मानता हूँ की बहुत कठिन है रास्ता
और लोहे के दांतों वाली है बर्बरता
लेकिन यकीन करो मेरे दोस्त
हमारे जलते सीनों में धंसे उसके पाँव
मोम के हैं

मेरे साथी
हमें चलना है दिगंत तक
अपनी ही राख से
कई कई बार लेना है जन्म
हमें दौड़ना है
बिजली के तार को मोड़कर बनाये गए चक्के के पीछे भागते हुए बच्चे की तरह
नंगे पाँव
थपाथप
धरती पर अपने होने की मोहर लगाते हुए.

--


हम फिर हो गए हैं अजनबी
एक लम्बे महीने के बाद
जिसमें हमने समेटने चाहे
कई वर्ष
बहुत सारे अतीत के
और कुछ एक भविष्य के
कई वर्षों
के डर
हादसे
और रुलाइयां
फूट पड़ते रहे बीच बीच में
हम अभिशप्त हैं
अतीत और भविष्य के अथाह समुद्र के बीच
अभी के छोटे से टापू पर डरते हुए रहने को
दिन में कई कई बार इस टापू को लील जाता है समुद्र
अपनी दानवी जकड में
हम अभिशप्त हैं
क्योंकि हमने किया है प्यार
वक़्त की इजाज़त के बिना
जैसे प्रोमिथियास चुरा लाया था अग्नि
देवताओं के राज्य से
इस लम्बे महीने में
कुछेक क्षन
हमने रोक दिया था
बहते वक़्त को
उसकी मर्ज़ी के खिलाफ
हमने विद्रोह किया
शाश्वत समुद्र के खिलाफ
उन नश्वर क्सानों में
अब एक लम्बे महीने के बाद
हम फिर हो गए हैं अजनबी
अच्छा है
क्योंकि अजनबी ही बनते है दोस्त
और प्रेमी
आओ कुछ समय
समय की मर्ज़ी मानें
और जुटाएं इतनी शक्ति
की अगली बार रोकें समय को
और भी मुकम्मल तरीके से.


--


आओ एक नई शुरुआत करें
वैंसे नहीं
जैंसे
बजट पेश करते हुए
हर साल करता है वित्तमंत्री
आंकडों की बाजीगरी पर
शाब्दिक लफ्फाजी का रंगरोगन चढाते हुए
बल्कि
वैसे
जैसे
पंखो को चोंच से खुजलाते हुए
तैयार होते है पक्षी
एक लम्बी उडान के लिए .


--


बैसाख के तप्त महीने में
चिलचिलाती हुई गर्मी है
लू ने सोख लिया है नमी के हर पोर को
फिर भी
नाली के किनारे उग आयें हैं
पुदीने के हरे हरे पौधे.

हम नहीं जानते कि हम इस बर्बरता को क्या कहें.

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/20/2009 01:15:00 AM

हम नहीं जानते कि हम इस बर्बरता को क्या कहें.आप ख़ुद देखें और फैसला करें।





कुछ और वीडियो के लिए यहाँ दस्तक दें.

बुद्धि की मंदी है : मुद्दों का न होना

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/11/2009 05:01:00 PM

पी साइनाथ

म-से-कम दो प्रमुख अखबारों ने अपने डेस्कों को सूचित किया कि 'मंदी' (recession) शब्द भारत के संदर्भ में प्रयुक्त नहीं होगा। मंदी कुछ ऐसी चीज है, जो अमेरिका में घटती है, यहां नहीं. यह शब्द संपादकीय शब्दकोश से निर्वासित पडा रहा. यदि एक अधिक विनाशकारी स्थिति का संकेत देना हो तो 'डाउनटर्न' (गिरावट) या 'स्लोडाउन' (ठहराव) काफी होंगे और इन्हें थोडे विवेक से इस्तेमाल किया जाना है. लेकिन मंदी को नहीं. यह मीडिया के दर्शकों के खुशहाली भरे, खरीदारीवाले मूड को खराब कर देगा, जो कि अर्थव्यवस्था को उंउं, उंउं, ठीक है, मंदी (recession) से बाहर निकालने के लिए बेहद जरूरी है.

'डोंट वॅरी-बी हैप्पी' के इस फरमान ने हास्यास्पद और त्रासदीपूर्ण दोनों स्थितियों को पैदा किया है। कई बार उन्हीं या दूसरे प्रकाशनों के इस नकार भरे नजरियेवाली सुर्खियां हमें बताती हैं कि 'बुरे दिन बीत गये और उबरने की शुरुआत हो रही है.' किस बात के बुरे दिन? मंदी के? और हम किस चीज से किसी तरह उबरने लगे हैं? अनेक प्रकाशन और चैनल इस प्रकार के बहाने बना कर अनेक पत्रकारों समेत अपने कर्मियों को थोक में निकाल बाहर कर रहे हैं.

वे गरीब आत्माएं (इनमें से अनेक ने बडे होम लोन इएमआइ पर करार किये, जब कि अर्थव्यवस्था अब से भी अधिक गिरावट पर थी) नौकरियां खो रही हैं, क्योंकि...जो भी हो, ठीक है। कल्पना कीजिए कि आप डेस्क पर कार्यरत उनमें से एक हैं, अपने पाठकों को आश्वस्त करने के लिए कि सब ठीक है, खबरों की काट-छांट कर रहे हैं. आप शाम में मंदी के भूत की झाड-फूंक करते हैं. अगली दोपहर के बाद आप खुद को उसका शिकार पाते हैं, जिसे आपने मिटा दिया था. मीडिया का पाखंड इसमें है कि वह उसके उलटा व्यवहार करता है, जिसे वह यथार्थ कह कर वह अपने पाठकों को बताता है,-जी, यह बिजनेस की रणनीति का हिस्सा है. लोगों को डराओगे तो वे कम खर्च करेंगे. जिसका मतलब होगा कम विज्ञापन, कम राजस्व, और भी बहुत कुछ कम.

इन दैनिकों में से एक में एक बार एक शीर्षक में 'आर' शब्द का जिक्र था, जिसमें कुछ इस तरह का मखौल किया गया था कि कैसी मंदी? एक खास क्षेत्र में अधिक कारें बिक रही थीं, ग्रामीण भारत चमक रहा है (यहां शब्द था, 'नयी-नयी मिली समृद्धि')। हमें उजले पक्ष की खबरों की जरूरत है-तब भी जब हम निचली सतह पर कुछ अलग करने की कोशिश कर रहे हैं. टेलीविजन चैनल हमेशा की तरह (संदिग्ध) विशेषज्ञों को सामने ला रहे हैं, जो बता रहे हैं कि चीजें उतनी बुरी नहीं हैं, जितनी वे बना दी गयी हैं (किनके द्वारा, हमें यह बिरले ही बताया जाता है). गिरती मुद्रास्फीति के लिए खुशनुमा सुर्खियां हैं. (हालांकि कुछ बाद में इसकी उत्पाद संख्या बनाने को लेकर सतर्क हो गये हैं). लेकिन इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया है कि अनाज की कीमतें कितनी गंभीर समस्या हैं. भूख अब भी कितना बडा मुददा है. इसका एक संकेत तीन या दो रुपये और यहां तक कि एक रुपये किलो चावल देने का वादा करती राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में है. (यह अजीब है कि एक आबादी जो कारें खरीदने के लिए तत्पर दिखती है, अनाज खरीदने के लिए नहीं). हालांकि आप जानते हैं कि इन घोषणापत्रों की असलियत क्या है.

इसलिए मीडिया अपने चुने हुए विश्वस्त विशेषज्ञों, प्रवक्ताओं और विश्लेषकों से बात करता है और एलान करता है : इस चुनाव में कोई मुददा नहीं है। निश्चित तौर पर मीडिया जिनके बारे में बात कर रहा है, वैसे बहुत नहीं हैं. और हां, यह राजनीतिक दलों के लिए एक राहत की तरह आता है, जो उन्हें सामने आ रही बडी समस्याओं को टालने में सक्षम बनाता है. यहां तक कि उभरते हुए मुद्दों को सामने लाने के अवसर, जो अनेक मतदाताओं के लिए एक बडी मदद होते-छोड दिये जा रहे हैं. इस तरह हमें आइपीएल बनाम चुनाव, वरुण गांधी, बुढिया, गुडिया और इस तरह की दूसरी बकवासों के ढेर पर छोड दिया गया है. जरनैल सिंह को (जिन्होंने बेयरफुट जर्नलिज्म-नंगे पांव पत्रकारिता को एक नया मतलब दिया है) इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने वरुण गांधी जैसी बकवासों को परे कर दिया और 1984 के बाद से सभी चुनावों के लिए महत्वपूर्ण रहे एक मुद्दे पर वास्तव में ध्यान खींचा.

हम अमेरिका में हो रहे विकास के बारे में जो रिपोर्ट करते हैं, उसमें और यहां जिस यर्थाथ पर हम जोर देते हैं, उसमें एक अनोखा अंतर है, और वास्तव में अंतर महत्वपूर्ण हैं-लेकिन वे सामने कैसे आये इसे प्रस्तुत करना हम नहीं चाहते। वर्षों से, हम वैश्वीकरण के एक खास स्वरूप के मुनाफों की दलाली करते रहे हैं. इसमें हम विश्व अर्थव्यवस्था (पढें, अमेरिकी और यूरोपीय) से अधिक से अधिक एकाकार होते गये, सारी चीजें अच्छीं हासिल हुईं. लेकिन जब वहां चीजें बदतर होने लगीं, वे हमें प्रभावित नहीं करतीं. ओह नहीं, बिल्कुल नहीं.

यह अनेक तरीकों से यहां पार्टियों में जानेवालों और साधारण लोगों के बीच की दूरी की माप भी है। बादवाले लोगों के लिए किसी भी तरह बहुत उत्साहित नहीं होना है. उनमें से अनेक आपको विश्वास दिलायेंगे कि उनके पास मुद्दे हैं. लेकिन हम कैसे उन समस्याओं को उठा सकते हैं, जिनका अस्तित्व हम पहले ही खुले तौर स्वीकार चुके हैं? इसलिए भूल जाइए, कृषि संकट और पिछले एक दशक में एक लाख 82 हजार किसानों की आत्महत्याओं को. और बहरहाल, भुखमरी और बेरोजगारी मीडिया में मुद्दा कब रहे? अधिकतर प्रकाशनों ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन को नगण्य स्पेस दिया है. ये सारी समस्याएं वॉल स्ट्रीट में गिरावट के पहले घटी थीं (मीडिया के लिए जो खुद अप्रत्याशित तौर पर, बिना किसी चेतावनी के घट गया.)

पिछले डेढ साल से, इतनी भीषण चीजें कहीं नहीं हुईं। उद्योग जगत का संकट, निर्माण उद्योग में नकारात्मक विकास, इन सेक्टरों में कुछ नौकरियों का खत्म होना, इन सबका थोडा जिक्र हुआ. अधिकतर एक चलताऊ जिक्र. लेकिन चीजें असल में तब बुरी हुईं जब ऊपर का 10 प्रतिशत हिस्सा शिकार बना. उन्हें फिर से आश्वस्त किये जाने और कारें खरीदना जारी रखे जाने की जरूरत है. कुछ जगहों पर 'उन्हें शिकार मत बनाओ' का मतलब है विभ्रमों, सिद्धांत, यथार्थ और रिपोर्टिंग के बीच की रेखा को धुंधला करना है. इसका बेहद खतरनाक नतीजा हो सकता है.

आबादी के बडे हिस्से के लिए, जो अपने मोबाइल फोन पर शेयर बाजार की ताजा सूचनाएं नहीं पाता, चीजें उतनी बेहतर नहीं हैं। वर्ष 2006 मीडिया में एक बडे बूमवाले वर्ष के रूप में दर्ज है. लेकिन उस वर्ष के तथ्य हमें संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में 132वें स्थान पर रखते हैं. तब से उस पहले से ही निराशाजनक स्थान से आयी और गिरावट ने हमें 128वें स्थान पर रखा है-भूटान से भी नीचे. कमवजन के और कुपोषित बच्चों के संदर्भ में भारत एक आपदाग्रस्त जोन है. सूचकांक में हमसे नीचे रहे देश भी इस मोरचे पर काफी बेहतर कर रहे हैं. हम इस ग्रह पर ऐसे बच्चों की सबसे अधिक संख्यावाले देश हैं. और मुद्दे हैं ही नहीं? प्रभावी राजनीतिक ताकतों की उन मुद्दों को टाल जाने की क्षमता का मतलब यह नहीं कि वे मौजूद नहीं हैं. यह बात कि हम अपने आसपास चल रही विशाल प्रक्रियाओं से जुडने में अक्षम हैं, हमें मीडिया के बारे में अधिक और मुद्दों के बारे में कम बताती है.

ऑर्डरों के रद्द हो जाने के कारण निर्यात आधारित सेक्टरों में उदासी है। यह गुजरात, महाराष्ट्र और हर जगह की सच्चाई है. यह सब होने के साथ ही, लाखों मजदूर-हर जगह के प्रवासी, उडीसा, झारखंड या बिहार अपने घरों को लौटने लगे हैं. वे किसके लिए लौट रहे हैं? उन जिलों के लिए, जहां काम का भारी अभाव है, जिस वजह से उन्होंने पहले उन्हें छोडा था. उस जर्जर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पास, जो पहले की ही, घटी हुई, आबादी को खिला पाने में अक्षम है. नरेगा के पास, जो शुरू होने में ही अक्षम था और निश्चित तौर पर फंडिंग के अपने वर्तमान स्तर पर, इन अतिरिक्त लाखों लोगों का सामना नहीं कर सकता.

यह मंदी-या इसे आप जो चाहें कहें-के नये चरण के हमले और इन चुनावों में वोट देने के बीच फंसा हुआ समय है। इस माह और मई में हम वोट देने जा रहे हैं. प्रवासी मजदूरों और दूसरों की नौकरियों का जाना हर हफ्ते बढ रहा है. मानसून के आते-आते आपके पास एक थोडी बुरी स्थिति होगी. कुछ महीनों के बाद, अभूतपूर्व रूप से यह बुरी होगी. लेकिन चुनाव अभी हो रहे हैं. अगर ये आज से कुछ माह बात होते, तो कुछ राज्यों में बेहद निर्णायक नतीजे आते. और मुद्दे भी वरुण, बुढिया, गुडिया या अमर सिंह के अंतहीन कारनामे नहीं होते.

इसी बीच, अपने दर्शकों को मीडिया यह शायद नहीं बताये कि हम महान मंदी (ग्रेट डिप्रेशन) के बाद के सबसे बुरे, 80 वर्षों के बाद देखे गये सबसे गंभीर आर्थिक संकट का हिस्सा हैं. इसके बाद जो हो सकता है, उसके लिए पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को तैयार करने के लिए कुछ भी नहीं हो रहा है. अकेला ठहराव खबरों (और लकवाग्रस्त संपादकीय प्रतिभा) में है. बडी गिरावट मीडिया के प्रदर्शन में है. बाकी की दुनिया के लिए यह एक मंदी है, जिसमें हम और बदतरी की ओर बढ रहे हैं.

अनुवाद : रेयाज उल हक
मूल अंगरेजी सोमवार, 20 अप्रैल, 2009 को द हिंदू में प्रकाशित

भारतीय पुलिस और डॉ विनायक सेन के जीवन पर खतरा

Posted by Reyaz-ul-haque on 5/10/2009 06:25:00 PM

यह पत्र डॉ विनायक सेन की पत्नी इलीना सेन द्वारा 22 अप्रैल, 2009 को भेजा गया है.

प्यारे साथियो,
मैं कुछ बेहद पीडाजनक अनुभवों को यहां आपके साथ बांट रही हूं। हमारे पास इसके स्पष्ट प्रमाण हैं कि छत्तीसगढ पुलिस विनायक सेन की स्वास्थ्य की देखभाल की जरूरतों में सक्रिय हस्तक्षेप कर रही है. मैं तथ्यों को आपके सामने रख रही हूं.

कई वर्षों से हाइपरटेंसिव के मरीज रहे विनायक रायपुर में एकमात्र कार्डियोलॉजी में डीएम डॉक्टर आशीष मलहोत्रा, जो निजी तौर पर चिकित्सा कर रहे हैं, के यहां कार्डियाक एसेसमेंट टेस्ट के दौरान एंजाइना से ग्रस्त पाये गये। वे 2007 में और उसके बाद अपने डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाएं ले रहे थे. जेल में 2008 के दिसंबर और इस वर्ष जनवरी-फरवरी में कभी-कभी व्यायाम के बाद उन्हें सीने में और बायें हाथ में झुनझुनी दर्द की शिकायत हुई. उन्होंने जेल अधिकारियों को इसकी सूचना दी और जब इस बारे में कुछ भी ठोस नहीं किया गया (जेल अस्पताल में सुविधाएं नहीं हैं) उन्होंने अदालत को इसकी सूचना दी. उनकी ओर से 17 फरवरी, 2009 को एक आवेदन इस आग्रह के साथ अदालत में दाखिल किया गया कि उन्हें अपनी पसंद की सुविधाओंवाले अस्पताल में-सीएमसी, वेल्लोर को तरजीह देते हुए-इलाज कराने की इजाजत जेल अधिनियम-1894 की धारा 39-ए के तहत दी जाये, जो जेल अधीक्षक को कैदी अथवा उसके परिवार द्वारा बांड भरे जाने और अधीक्षक द्वारा रखी गयी शर्तों की बाध्यता के साथ उन्हें अपनी पसंद के इलाज की अनुमति देने में सक्षम बनाता है. 20 फरवरी, 2009 को जज ( इस मामले को देख रहे 11वें अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश बीएस सलूजा) ने जेल अधिकारियों को विनायक सेन के हृदय की स्थिति के बारे में मेडिकल बोर्ड की राय हासिल करने का आदेश दिया, ताकि विनायक के आवेदन पर सही निर्णय लिया जा सके.

विनायक 20 फरवरी, 2009 और 17 मार्च, 2009 के बीच कभी रायपुर जिला अस्पताल ले जाये गये, जहां उन्हें देखनेवाले डॉक्टरों ने इसीजी और इकोकार्डियोग्राफ की सलाह दी।

17 मार्च को विनायक ने अदालत से शिकायत की कि उनके इलाज के आग्रह पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है और यह कहते हुए वे थोडे भावुक हो गये कि उन्हें लगता है कि कोर्ट के लिए उनके जीवित रहने या मर जाने का कोई अर्थ नहीं है। जज भी समान रूप से विचलित थे और मैं सबूतों के रखे जाने और आरोपित के वापस जेल ले जाये जाने के बाद उनसे निजी तौर पर मिली ताकि मैं उन्हें समझा सकूं कि जितना रेकार्ड किया गया है, विनायक की स्थिति उससे कहीं अधिक की मांग करती है. जज नरम दिखे और 18 मार्च को विनायक से अदालत में पूछा कि वे रायपुर में किस डॉक्टर से दिखाना चाहेंगे, जो यह तय करेगा कि उन्हें वेल्लोर के लिए भेजे जाने की जरूरत है या नहीं और इस पर विनायक द्वारा डॉ आशीष मलहोत्रा का नाम लिये जाने के बाद उन्होंने जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि वे विनायक को डॉ मलहोत्रा को दिखायें ताकि यह जाना जा सके कि उन्हें आगे के इलाज के लिए रेफर करने की जरूरत है या नहीं.

विनायक 25 मार्च को डॉ आशीष मलहोत्रा को दिखाये गये. अदालत के 18 मार्च के आदेश के आधार पर जेल अधीक्षक ने पुलिस से आग्रह किया कि वह विनायक को दिखाने ले जाने के लिए सुरक्षा गार्ड मुहैया कराये. इसके बाद सशस्त्र पुलिस बल से भरी एक बस विनायक को डॉ मलहोत्रा से दिखाने सुबह 10 बजे के करीब ले गयी और मुझे डॉ मलहोत्रा के यहां से पुरानी रिर्पोंटों के लिए 10.30 में फोन आया. मैंने ऐसा किया और अधिकतर कंसल्टेशन के दौरान मौजूद रही. जेल अधीक्षक के आग्रहवाले पत्र कि वे सीएमसी, वेल्लोर रेफर किया जाने, इसीजी, इकोकार्डियोग्राफ और ट्रेडमिल टेस्ट की आवश्यकता पर स्पष्ट राय दें, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विनायक को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) है और उन्हें एंजियोग।्राफी और आगे की जांच के लिए वीएमसी, वेल्लोर रेफर कर दिया ताकि एंजियोप्लास्टी/कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी हो सके. मैंने प्रिस्किप्शन की फोटो प्रति अपने रिकार्ड के लिए रख ली, क्योंकि मुझसे पूरी प्रक्रिया के लिए भुगतान करने को कहा गया.

मैं विनायक से 26 मार्च को जेल में मिली और दक्षिण भारत में यात्रा के दौरान सुविधाओं पर बात की। मुझे झटका लगा जब अधीक्षक ने कहा कि विनायक की जांच और इलाज वेल्लोर में नहीं, रायपुर में होगा. किसी गलती को महसूस करते हुए मैंने सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन किया कि मुझे जेल और डॉक्टरों के बीच विनायक सेन के इलाज के संदर्भ में हुए पत्राचारों को दिखाय जाये. ये मेरे हाथ में आये अंतिम दस्तावेज हैं.

इलाज की कहानी के अंत पर आने से पहले मैं यह बताना चाहूंगी कि जेल ने 31 मार्च को विनायक को रायपुर में एस्कॉटर्स हॉस्पिटल ले जाने की कोशिश की और मेरी पिछली मुलाकात में हुई बातों के अनुसार विनायक ने यह कहते हुए कि, जैसा कि जेल अधीक्षक का भी निर्देश है, वे छत्तीसगढ में कहीं भी इलाज कराने को इच्छुक नहीं हैं क्योंकि इससे उनका जीवन खतरे में पड जायेगा, लिखित तौर पर वहां जाने से इनकार कर दिया. उनका यह जवाब एक टिप्पणी के साथ 31 मार्च को अदालत में आगे के निर्देश के लिए प्रस्तुत किया गया. अदालत ने लोक अभियोजक को इसे भेजते हुए सात दिनों में जवाब देने को कहा. मेरी जानकारी में अब तक ऐसा कोई जवाब नहीं दाखिल किया गया है. विनायक ने डॉ मलहोत्रा द्वारा लिखी गयी दवा (atrova statin) लेना शुरू कर दिया और कुछ लाक्षणिक राहत की सूचना दी।

आरटीआइ के नतीजों पर आते हैं। मुझे अब डॉ मलहोत्रा का 25 मार्च का मूल रेफरल लेटर मिला है. लेकिन जेल अधीक्षक के नाम उनके सवाल को उद्धृत करता 26 मार्च का एक दूसरा पत्र भी था, जिसमें उन्होंने राय दी है कि एंजियोग्राफी की सुविधाएं छत्तीसगढ में एस्कॉटर्स, अपोलो, भिलाई मुख्य अस्पताल, रामकृष्णा अस्पताल और दो अन्य जगहों पर है. उन्होंने यह भी लिखा है कि उन्होंने डॉ सेन को वेल्लोर इसलिए रेफर किया क्योंकि पत्र उनसे ऐसा करने के लिए कहता था. इससे जुडे सवाल ये हैं : डॉ मलहोत्रा के पास दूसरी बार पत्र क्यों भेजा गया? यदि जेल अधीक्षक ने ऐसा पत्र भेजा तो किसने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया?

यह पूरी तरह अदालत की अवहेलना है। डॉ मलहोत्रा से कोर्ट ने यह जानना चाहा था कि वेल्लोर भेजे जाने की जरूरत है या नहीं, इस पर अपनी राय जाहिर करें. अदालत ने डॉ मलहोत्रा से छत्तीसगढ में मेडिकल सुविधाओं की व्यापकता के बारे में नहीं पूछा था.

डॉ मलहोत्रा बेशक दबाव में थे, जब उन्होंने कहा कि उन्होंने विनायक को वेल्लोर रेफर किया था, क्योंकि पत्र उन्हें ऐसा करने को कहता था। किसी मामले में अपने मरीज के साथ हुए या नहीं हुए उनके संवाद विशेषाधिकार प्राप्त सूचना माने जाते हैं.

यदि एक डॉक्टर पब्लिक सेक्टर का नहीं है, इस हद तक डराया जा सकता है, जो एस्कॉटर्स, अपोलो आदि के डॉक्टरों को भी कहा जा सकता है, जो कि मेडिकल कॉलेज में स्थापित निजी मेडिकल संस्थान हैं (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के बडे उदाहरण, जिनमें सभी मानव संसाधन सार्वजनिक सेक्टर के होते हैं लेकिन ब्रांड नेम और आगे के लिए रेफरल विकल्प निजी होते हैं)।

इन हालात में विनायक बिल्कुल सही हैं कि उनका जीवन छत्तीसगढ के किसी सरकारी नियंत्रणवाले अस्पताल में खतरे मे पड सकता है।

दरअसल मैं अब चिंतित हूं कि पुलिस/अभियोजक का प्लान ए (विनायक को बदनाम करो और दोषी साबित करो) संकेत दे रहा है कि वे अब प्लान बी (छत्तीसगढ में किसी अस्पताल में इलाज के दौरान किसी से कह कर-जैसे कुछ बूंदों के साथ हवा इंजेक्ट कर के- उनकी हत्या कर दो) लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।

मैं सभी साथियों से अपील करना चाहूंगी कि विनायक की शारीरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इस सामग्री का प्रकाशन करें, इसके बारे में लिखें, उच्च न्यायालयों और राजनेताओं से अपील करें। यह बहुत जरूरी है.

मैं यह कहते हुए अंत करना चाहती हूं कि जिसकी हम मांग कर रहे हैं, पसंद के अस्पताल में इलाज का-वह भारतीय न्यायिक इतिहास के लिए अनजान नहीं है। दरअसल रायपुर सेंट्रल जेल से ही हत्या के आरोप में जेल में बंद शिवसेना नेता धनंजय सिंह परिहार को सरकारी खर्च पर केइएम अस्पताल, मुंबई, शंकर नेत्रालय, चेन्नई और तीन दूसरे अस्पतालों में 2003 में इलाज के लिए ले जाया गया था. पुलिस विनायक सेन को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडे खतरे के रूप में चित्रित कर रही है. क्या हम उसे ऐसा करने देने जा रहे हैं?

इलीना

मूल अपील मंथली रिव्यू की वेबसाइट से

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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