हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

यह लोकतंत्र है, विवाद है, गुंडई है या उनका पागलपन है

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/30/2009 08:37:00 PM

यह शायद लोकतंत्र है। या शायद उनके संस्कार। या शायद उनकी देशभक्ति। या शायद उनका नीचता के हद पर उतरा पागलपन। वे क्या कर रहे हैं, यह शायद वे ही बेहतर बता सकते हैं? असगर अली इंजीनियर की बातचीत पर आए कमेंट्स के जवाब में संजय काक से एक बातचीत के अंश हाशिया पर पोस्ट किए गए तो अपने दिमाग का संतुलन खोते ये 'देशभक्त' धमकाने की हद तक उतर आए। यह उनका लोकतंत्र और संविधान और देश की उनकी यह समझ है। इसमें संदेह भी नहीं क्योंकि अयोध्या से लेकर गुजरात और उडीसा में उनकी समझ का यही सिलसिला रहा है. ये टिप्पणियां आप भी देखें.


  1. By Ravi Singh on April 30, 2009 8:04 PM

    वाह रेयाज भाई, वाह, क्या खूब कहा है
    महाराज, आपको इन बैंगानियों और जयन्तों से क्या काम..., इन्हें मिर्ची लगे सो लगने दीजिये, आप तो अपनी दुकान चलाईये और इन्शा अल्लाह खूब चल रही है..., चलाते रहिये अपनी दुकान...

    आपने संजक काक का इन्टरव्यू दिखाया, कसम से बहुत मज़ा आया, बहुत दिनों बाद कोई बेशर्म आदमी देखने को मिला.... मैंने तो एसे एसे देशद्रोहियों, मक्कारों, मीरजाफरों को देखा है कि हमारे संजक काक भाई तो उनके बहुत कम बेशर्म है..., दिखाते रहिये..., हमें तो बेशर्मों और बेईमानों को देखने की आदत हो गई है,

    अंग्रेज हमारे देश पर इतने साल राज यूही नहीं कर गये...

    अगर किसी की मौत पर खुशी का माहौल देखना है तो हमारे छत्तीसगढ़ में जब नक्सलवादी आतंकवादी मरते हैं... तब उस माहौल को देखना..., अल्ला कसम. इन घाटी के माहौल को शर्तिया भूल जाओगे

    आप क्या सोच रहे हो आपकी ये दुकानदारी हमेशा यूहीं चलती रहेगी?
    बैंगानियों और जयन्तों की राष्ट्रवादिता यूहीं गालियां खातीं रहेगी?

    अगर हां तो तुम बस मुंगेरीलाल हो...

  2. By Ravi Singh on April 30, 2009 8:14 PM

    रियाज भाई, विनायक सेन के क्या हाल है? आप न बता सकें तो कपिल भाई से ही पूछ कर बता दीजिये...

  3. By अनुनाद सिंह on April 30, 2009 8:17 PM

    वाह 'भाई' वाह !

    इस इंटरब्यू में प्रश्नो के उत्तर कहाँ हैं? मैं तो ढ़ूंढ़ते रह गया।

बेंगानियों और जयंतों के लिए एक कश्मीरी पंडित

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/30/2009 07:04:00 PM

असगर अली इंजीनियर की बातों से बेंगानियों, जयंतों और वगैरहों को मिर्ची लगी हैसच हमेशा मिर्चीदार होता ही हैवे कश्मीर के मुद्दे के भीतर से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा उठा लाये हैं, अमरनाथ का मुद्दा उठा लाये हैं और 'मुसलामन बादशाहों के ज़ुल्म' का मुद्दा उठा लाये हैंहम भी उठा लाये हैं एक कश्मीर पंडित संजय काक से एक बातचीत के कुछ हिस्से और जानते हैं कश्मीर जिन हालत से गुजर रहा है उनमे इस मसले और कश्मीरी पंडित वाले मसले की क्या स्थिति है. संजय काक ने कश्मीर के हालत पर जश्न--आजादी नामक एक शानदार फ़िल्म बनायी है. रविवार से साभार.


आपने अपनी फिल्म में कश्मीर के लोगों की जो इच्छाओं को सामने लाने की कोशिश की है. क्या है वह इच्छा, क्या आप उसे पूरे तौर पर सामने ला पाये हैं?


लोगों की इच्छा क्या है, यह जानना मुश्किल है। हालात वहां इतने बुरे हैं कि मुझे ही नहीं, लोग आपस में भी उनके बारे में बिल्कुल बात नहीं करते हैं. पब्लिक सिमट कर बैठी हुई है. जो लीडर हैं वहां, वे सब भावनाओं की ही राजनीति करते हैं. भावना के स्तर पर वहां के लोग अव्वल तो भारत की फौज को दूर देखना चाहते हैं.

नंबर दो, वे आजादी चाहते हैं. अब आजादी का मतलब उनका क्या है, इस पर हम पाते हैं कि कोई कंसेंसस नहीं है. लेकिन हमें यह कंसेंसस नहीं दिखता, इसका मतलब यह नहीं है कि वह है ही नहीं. बल्कि असल में हम यह नहीं जानते कि वह क्या है. क्योंकि आपको जहां पर किसी भी तरह की आजादी नहीं है, जहां पर कोई सार्वजनिक सभा नहीं कर सकते, जहां आप फिल्म नहीं बना सकते, जहां आप लिख नहीं सकते आजादी के साथ, वहां हम कैसे जान पायेंगे कि लोग वास्तव में क्या चाहते हैं लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि जब कोई वारदात होती है, और आप यह इस फिल्म में भी देखेंगे कि कोई मिलिटेंट कमांडर मारा जाता है, तब जो माहौल होता है, उससे आपको कुछ आइडिया हो जायेगा. जिस तरह वहां हजारों की तादाद में लोग आते हैं, जिस तरह नारे लगाये जाते हैं, जिस तरह उस दिन सुरक्षा बल गायब हो जाते हैं, यह सब कुछ आपको बहुत कुछ कह देता है. यह एक अजीब परंपरा है कश्मीर में.

वहां चप्पे-चप्पे पर फौजी हैं। वहां आर्मी को सलाम किये बिना आप आगे नहीं बढ सकते. लेकिन जिस दिन कोई मिलिटेंट कमांडर मारा जाता है और उसका जनाजा उठता है, तो तीन-चार किमी तक कोई फौजी नहीं दिखेगा आपको. क्योंकि उन्हें मालूम होता कि उस दिन उन्होंने कुछ किया तो फिर उन्हें एक-दो आदमियों को नहीं, हजार-दो हजार लोगों को मारना पडेगा। तो ऐसे अननेचुरल सिचुएशन में आपको पता लगता है कि कश्मीर में लोगों की भावनाएं क्या हैं. आप जब फिल्म देखेंगे तो यह समझ जायेंगे कि मैं यह क्या कह रहा हूं.


आपकी फिल्म के बारे में कहा गया है कि इसमें कश्मीरी पंडितों के बारे में बहुत अधिक नहीं दिखाया गया है. क्या आप उनकी समस्या को कम करके देखते हैं, खास कर पलायन?

ऐसा नहीं था कि उनका पलायन पहले नहीं हुआ था. हम जिस पलायन की बात कर रहे हैं वह हुआ 1991-92 में. लेकिन उस मुद्दे का इस्तेमाल 1993-94 में होना शुरू हुआ. तो मुश्किल हो गया लोगों के लिए कहना कि वहां आजादी की तहरीक जायज है, क्योंकि सरकार ने इसे सांप्रदायिक साबित कर दिया. कहा जाने लगा कि इन्होंने पंडितों को निकाल दिया वहां से.

आज हालत यह हो गयी है कि आप कश्मीर पर बात करें तो पहला सवाल आता है कि कश्मीरी पंडितों पर क्या कहेंगे? फिल्म बनी तब से यही सवाल उठता रहा है कि आपने कश्मीरी पंडितों को क्यों नहीं और समय दिया. मेरा कहना है कि कश्मीर के मुद्दे को हिंदुस्तान में समझने के लिए कश्मीरी पंडितों को इस तरह इस्तेमाल किया गया है जैसे वे ही कवच हों और सबसे बडा सवाल हों.

आपने कश्मीर का नाम लिया ही कि आ गया सवाल कि- बोलिए पंडितों के साथ क्या हुआ?

मेरा कहना है कि पहले आप सबसे बड़े और पहले सवाल को देखें कि कश्मीर में क्या हुआ. इसके बाद ही तो कश्मीरी पंडित निकले न. कश्मीरी पंडितों का मामला कश्मीर समस्या के साथ जुड़ा हुआ है. आप पहले उसका हल करें. फिर इसके बाद ही बात होनी चाहिए. कश्मीरी पंडितों का इस्तेमाल किया गया. जो निकले-भागे बरबाद हुए, वे तो हुए ही, मगर जो जम्मू में कैंपों में रह रहे हैं, उनकी समस्या को कोई भी सरकार चुटकी में सुलझा सकती थी. लेकिन उन्हें बनाये रखना था सरकार को ताकि वे उनका इस्तेमाल कर सकें. जो पढे-लिखे पंडित थे, वे तो दिल्ली आ गये, पर जो छोटे और अनपढ किसान थे, वे बेचारे जम्मू और दूसरे कैंपों में रह रहे हैं. कश्मीरी पंडितों को अहम रोल दिया गया है, ताकि उनका इस्तेमाल हो सके और कश्मीर समस्या पर बात को अटकाया जा सके.

पंजाब में मैंने एक फ़िल्म बनायी थी दूरदर्शन के लिए, 1986 में. पंजाब में एक अच्छा खासा आंतरिक पलायन हुआ था पंजाबी हिंदुओं का, लेकिन पंजाब सरकार में उन्हें सीमा से बाहर नहीं जाने दिया. उन्हें पठानकोट, अमृतसर में शिविरों में रखा गया.

मैंने उन्हें शूट किया है फ़िल्म में. वे वहां छह महीने साल भर रहे और वापस चले गये. कश्मीर सरकार ने ऐसी कोशिश कभी नहीं की. दूसरी तरफ़ कश्मीर में अभी भी 5-6 हज़ार कश्मीरी पंडित हैं. वे कश्मीर छोड़ कर कभी नहीं गये. वे भी जी रहे हैं. कैसे जी रहे हैं, यह कोई नहीं जानता. सरकार की ओर से तो उन्हें थप्पड़ ही मिलते हैं कि तुम यहां क्या कर रहे हो, निकलो यहां से।

मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/29/2009 03:28:00 PM

इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर से रेयाज उल हक की बातचीत

‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’ के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले शख्स के रुप में है. असगर अली इंजीनियर मानते हैं कि जहां-जहां इस्लाम पर जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए खड़े हुए हैं. वे मानते हैं कि कट्टरपंथ मजहब से नहीं, सोसायटी से पैदा होता है. इनकी राय में भारतीय मुसलमान इसलिए अतीतजीवी है क्योंकि यहां के 90 प्रतिशत मुसलमान पिछड़े हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है. यहां प्रस्तुत है, डॉ. असगर अली इंजीनियर से की गई बातचीत के अंश.

असगर अली इंजीनियर
---------------------


अगर धर्म के आधार पर देखा जाये तो दुनिया भर में अमरिकी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष में इसलामी राष्ट्रों के लोग ही सबसे अगली कतारों में हैं. इसके क्या कारण देखते हैं आप ?


विश्व के जिन हिस्सों पर जुल्म हो रहा है, वे सारे वही हिस्से हैं, जहां मुसलमान हैं. आज अमरिकी हमला वियतनाम, कोरिया या चीन पर नहीं हो रहा है. तो वहां के लोग क्यों लडेंगे अमेरिका के खिलाफ ? फलस्तीन में या इराक में जो कुछ हो रहा है, उसे भुगतनेवाले तो मुसलमान ही हैं न ? तो लडनेवाले भी मुसलमान ही होंगे.


• इसके क्या कारण हो सकते हैं कि मुसलमानों को ही टारगेट बनाया जा रहा है?

• • इसलिए कि अमेरिका मध्यपूर्व पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहता है. वहां तेल का भंडार है, जिस पर वह अपना कब्जा जमाना चाहता है. वहां जो भी जुल्म होता है, उसमें वह इस्राइल की हिमायत करता है. इसके जरिये वह अरबों को दबा कर रखना चाहता है. इस्राइल अमेरिका की पुलिस चौकी है, जिसके जरिये अमरिकी अरबों पर कंट्रोल रखना चाहते हैं. जब इस पुलिस चौकी द्वारा फलस्तीन के लोगों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं उनके खिलाफ. इसी तरह अमेरिका इराक पर कब्जा करता है क्योंकि वहां बेशुमार तेल है. सऊदी अरब के बाद वहां सबसे ज्यादा तेल है. इसलिए वह वहां अपना कब्जा जमाये रखना चाहता है. तो बदले की कार्रवाई तो होगी ही.

• भारत और शेष विश्व के मुसलिम समाज में एक फर्क दिखता है. पूरी दुनिया के मुसलिम समाज में ऐसे साम्राज्यवादी जुल्म के खिलाफ हर तरह के संघर्ष चल रहे हैं. लेकिन भारत के मुसलमान इस साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं दिखते या बहुत कम. वे विरोध जताने के लिए एक साधारण-सा जुलूस तक नहीं निकाल पाते हैं. ऐसा क्यों ?

• • इसलिए कि किसी जमाने में जब विरोध किया तो उसका रद्दे अमल सख्त हुआ. जैसे इस्राइल का येरुशेलम पर हमला हुआ था 1968 में, तो मुसलमानों ने बहुत बडा जुलूस निकाला. उसका बहुत ही बुरा रद्दे अमल हुआ. उस समय जनसंघ ने काफी प्रोपेगेंडा किया कि मुसलमानों की वफादारी भारत के साथ नहीं है बल्कि मक्का-मदीना के साथ है, बैतुल मुकस (येरूशेलम) के साथ है. इसका लोगों पर बहुत खराब असर पडा.

इसके अलावा हिंदुस्तान में उस जमाने के मुकाबले में इतनी तबदीलियां आयी हैं कि मुसलमान खुद दुनिया के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा यह महसूस करता है कि उसके अपने भविष्य का क्या होगा. इसलिए वह कश्मीर के भी आंदोलन का खुल कर समर्थन नहीं करता. आप देखेंगे कि कश्मीर की हिमायत में भी दूसरे राज्यों के मुसलमान कोई जुलूस नहीं निकालते. अब वे यह समझते हैं कि उनके हक उनके इलाके से जुडे हुए हैं और उन्हें अपना भविष्य देखना है. इसलिए उनकी वफादारी भी किसी एक पार्टी से खत्म हो गयी. किसी जमाने में उनकी वफादारी सिर्फ कांग्रेस के साथ थी, लेकिन अब हालत यह है कि यहां बिहार में कांग्रेस चुनाव लडती भी है तो वह राजद को वोट देता है. केरल में कम्युनिस्टों को वोट देता है. आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम को वोट देता है. जो क्षेत्रीय हित हैं, वे भी इसमें काम करते हैं.


असगर अली इंजीनियर से पूरी बातचीत रविवार पर पढ़ें।





फिर से हिंद स्वराज

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/28/2009 04:46:00 PM

हिंद स्वराज ने अपने 100 वर्ष पूरे किये. इस छोटी सी पुस्तक पर कनक तिवारी ने एक किताब लिखी है. प्रस्तुत हैं इसके कुछ अंश. हिंद स्वराज पर एक व्यापक बहस की शुरुआत हम इस पोस्ट से कर रहे हैं.

कनक तिवारी


'हिन्द स्वराज' की भाषा में नैतिक स्पंदन होने के कारण उसमें वह वस्तुपरक तर्कमयता तो नहीं है जो इस तरह के राजनीतिक ड्राट में होनी चाहिए थी। गांधी ने सामाजिक विज्ञान की प्रचलित और उपलब्ध मान्यताओं को संषोधित, तिरस्कृत या स्वीकृत करते हुए कोई समाजशास्त्रीय दस्तावेज इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उसका नैतिक, दार्षनिक और धार्मिक पक्ष एक प्रबल तर्क के रूप में गूंजता रहता है। अलग अलग परिस्थितियों और अलग अलग बानगियों के बावजूद अपने देष में राजनीतिक क्रांति करने के मकसद से 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' में भी ऐसी ही अजान दी गई थी, भले ही कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो को बेहतर वैज्ञानिक वृत्ति का तार्किक दस्तावेज समझा जाए। दोनों ऐतिहासिक दस्तावेजों को परिपक्व बुद्धि के सक्रिय मस्तिष्कों ने लिखा था। दोनों ने ऐसी दुनिया का खाका खींचा था कि यदि उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाए तो वह तो बरबाद होने पर तुली थी। मार्क्स के लिए पूंजीवादी व्यवस्था अभियुक्त थी, इतिहास न्यायाधीश था और उनसे पीड़ित मुअक्किल सर्वहारा वर्ग। गांधी के लिए भौतिकता की तृष्णा अभियुक्त थी, उससे मुक्त होने वाला व्यक्ति निर्णायक था और मुअक्किल नैतिक विधिशास्त्र था। गांधी आधुनिक सभ्यता की बीमारी का कारण तॉल्स्तॉय की तरह नैतिकता का अभाव समझते थे और मार्क्स की तरह उन्होंने उसके पतन की भविष्यवाणी की थी। उनके लेखे आधुनिक सभ्यता मनुष्य के नैतिक विकास के रास्ते का रोड़ा है। इसके बावजूद गांधी का दृढ़ विष्वास था कि यह सभ्यता लाइलाज नहीं है क्योंकि लोग अब भी निर्मल हृदय के हैं और उन सबका चिंतन अनैतिक नहीं है। यह सभ्यता भले ही आत्महंता हो लेकिन समाज में ऐसे साहसी और संवेदनशील व्यक्तियों के होने पर यदि इस सभ्यता के दुर्गुणों को बीन कर अलग किया जाए तो मनुष्य के विकास की एक नई कथा लिखी जा सकती है।

प्रथम विश्वयुद्ध के पहले ब्रिटेन अपने राजनीतिक उत्कर्ष पर था। तब गांधी वहां कानून के विद्यार्थी की हैसियत से पढ़ रहे थे। बाद में उन्हें दक्षिण अफ्रीका अर्थात भारत की तरह ही एक गुलाम देश में जिंदगी की जद्दोजहद शुरू करनी पड़ी। ब्रिटेन की औद्योगिक, व्यापारिक, सैन्य और सांस्कृतिक शक्ति को आधुनिक सभ्यता का न्यूक्लियस समझ लिया गया था। जब खामोष अदालत जारी है की तर्ज पर गांधी पानी के जहाज पर बैठे अठारह दिनी महाभारत की तरह 'हिन्द स्वराज' के अध्याय दर अध्याय लिखे चले जा रहे थे, तब पश्चिमी सभ्यता का प्रतीक ब्रिटेन पूरी दुनिया के इतिहास के अहसास के रैम्प पर एक शाश्वत मॉडल बना इठला और इतरा रहा था। उसे इस बात का गर्व था कि न केवल उसका सूरज पूरी दुनिया में नहीं डूबता है बल्कि वह सभी तरह की बौद्धिक समझ के समुच्चय का विश्वविद्यालय भी बन चुका है। पदार्थिक सभ्यता को इतना बड़ा घमंड शायद इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। यह इंग्लैंड था जिसके विचार, रहन सहन, सलीका, ज्ञान-विज्ञान, फौजें, सेवाएं और उत्पाद सारी दुनिया में ठुंसे हुए थे। इस पूरे जगमग माहौल में लगभग चालीस वर्ष का एक भारतीय नवयुवक ऐसा पलीता लगा रहा था कि वह पूरा तथाकथित सभ्य महल एक जीर्ण शीर्ण जलसा घर की तरह उसकी दिव्य दृष्टि को दिखाई देने लगा था। 'किल्डोनन कैसल' नाम के जहाज पर बैठे उस नवयुवक वकील की आत्मा तक को आधुनिक सभ्यता का दंश क्षत विक्षत कर रहा था। इसके बावजूद उसने उस पूरी सभ्यता का तिरस्कार करने के साथ साथ नैतिक समझ का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करने के अपने ऐतिहासिक दाय से मुंह नहीं चुराया। आशीष नंदी के शब्दों में गांधी ने अपने 'आत्मीय शत्रु' से स्वयं को मुक्त कर लिया था। वह उन सभी शिक्षित भारतीयों से बिल्कुल अलग था जिन्हें यह भ्रम था कि औपनिवेशिक आधुनिकता उन सबके जेहन में उन्हें उपकृत करने के लिए बैठ गई है। इन कथित शिक्षित भारतीयों में गांधी के घोषित गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और उनके शिष्य जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। उन दोनों की दृष्टि में गांधी की यह कृति लगभग बकवास और अचानक काल कवलित होने की स्थिति में थी। गोखले तो पहले ही काल कवलित हो गए लेकिन नेहरू की बेटी के प्रधानमंत्री काल में जब जवाहरलाल की नीतियों का दरकना यानी काल कवलित होना षुरू हुआ तब गांधी के 'हिन्द स्वराज' की प्रासंगिकता और स्वीकार्यता भारतीय इतिहास में उभर उभर आई।
'हिन्द स्वराज' का मूल पाठक वर्ग कई तरह के समाजों में विभक्त रहा है। ऊपरी तौर पर यह पुस्तक इंग्लैंड में ही निर्वासित भारतीयों को संबोधित है जो आतंकवाद और हिंसा में विष्वास करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम और नरम दल घटकों को भी एक साथ संबोधित है और साथ साथ बल्कि ज्यादा पूरी अंग्रेज कौम और पश्चिमी सभ्यता को। भारतीय राष्ट्र की गांधी की समझ उन सभी के सन्दर्भ में रही है जो किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र या मत मतांतर के रहे हों। इसके अतिरिक्त डॉक्टरों, इंजीनियरों, उद्योगपतियों और वकीलों वगैरह का जो (उच्च) मध्यवर्ग पनप रहा था, वह भी गांधी की जिज्ञासा के केन्द्र में रहा है। 'अंगरेज' शब्द से उनका आशय उन सभी अंगरेजों से रहा है जो इंग्लैंड या भारत में सत्ता प्रतिष्ठान के अंग के रूप में रह रहे हों। जैसे चूल्हे की आग पर बटलोही में अदहन चुरता है, उसी तरह गांधी के मस्तिष्क में कई मुद्दे वर्षों से खदबदा रहे थे। इस पुस्तक के लिखने के एक महीने पहले गांधी ने अपने मित्र हेनरी पोलक को लिखा था-'इसलिए मैं महसूस करता हूं कि मैं आपसे यह बिल्कुल नहीं छिपाऊं कि मैंने मानसिक तौर पर कौन से प्रगतिशील कदमों को उठाने का संकल्प किया है...हालांकि वे सभी विचार नए नहीं हैं लेकिन इन विचारों ने अब एक नया रूप लेकर मेरे मस्तिष्क पर जबरिया कब्जा कर लिया है।' प्रस्तावना में भी गांधी ने हड़बड़ी में लिखी इस कृति को लेकर यही खुलासा किया है- 'मैंने यह किताब इसलिए लिखी क्योंकि मैं अपने आपको रोक ही नहीं सकता था।' वर्षों बाद भी गांधी ने दुबारा यही बात कही- जिस तरह कोई व्यक्ति उन बातों को बताए बिना नहीं रह सकता जो उसके हृदय में भर गई हों, इसी तरह मैं भी इस पुस्तक को लिखे बिना नहीं रह सका क्योंकि वे बातें मेरे हृदय में लबालब भर गई थीं।

भागीदारी नहीं, व्यवस्था परिवर्तन में है मुक्ति

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/24/2009 07:42:00 PM

कुछ दलित विचारक डाइवर्सिटी के अमेरिकी सिद्धांत की बात करते हैं तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करनेवाले कुछ दलित नेता अमेरिका की प्रसंशा में लगे हुए है. चंद्रभान जैसे तथाकथित दलित विचारक पूंजीवादी व्यवस्था में ही दलितों का उत्थान देखते हैं. उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि देश में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है , वह सही है और उसे रोकने की जरूरत नहीं है. वे केवल इतना ही चाहते हैं कि इस नयी व्यवस्था में कुछ हिस्सा दलितों को भी मिल जाये. निस्संदेह यह हिस्सा 25 करोड दलितों के लिए नहीं, बल्कि उन दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए है , जो भ्रष्ट साधनों से धन कुबेर बन गये हैं. ये दलित धन कुबेर ही निजी कंपनियों में ठेके प्राप्त कर सकते हैं और ये ही इन कंपनियों में नौकरी पाने लायक उच्चतम शिक्षा अपने बच्चों को दिलाने की क्षमता रखते है. इस व्यवस्था में 95 प्रतिशत गरीब दलित कहां आते हैं , जो रोज कमाते और खाते हैं तथा एक पूर्ण नागरिक का हक पाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं और जूझ रहे हैं.
आज की इस दिग्भ्रमित दलित राजनीति और दलित चिंतन के खतरनाक भटकाव में यह विचार करना लाजिमी लगता है कि दलित समाज का हित सिर्फ जातिवाद पर आधारित भागीदारी आंदोलन में नहीं, और न सिर्फ आरक्षण में है, बल्कि समग्र दलित समाज का हित शोषण पर आधारित, इस व्यवस्था को बदलने में है.



डॉ रमाशंकर आर्य

जादी के बाद दलित उत्थान के लिए लगातार कठोर कानून बनाये गये और उनके आर्थिक विकास के लिए कई योजनाएं भी बनायी गयीं. दलितों को शीघ्र न्याय मिल सके, इसके लिए भी विशेष न्यायालय तक गठित किये गये, जिनमें गवाहों के आने-जाने तथा उनकी दैनिक मजदूरी की क्षतिपूर्ति की भी व्यवस्था की गयी, लेकिन इन तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद दलितों का पर्याप्त उत्थान या विकास नहीं हो पाया . उन्हें समाज की मुख्यधारा से भी नहीं जोडा जा सका. उनका शोषण होता रहा. उन पर दमन और अत्याचार भी होते रहे.
देश की दलित समस्या को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों के चिंतकों, विचारकों तथा समाजशस्त्रियों की अलग-अलग राय जरूर देखी जाती है, लेकिन संपूर्णता में विचार करने पर यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि दलित समस्या केवल राजनीतिक या प्रशासनिक कदम उठाने से ही हल होनेवाली नहीं है. यह समस्या मूलतः एक सामाजिक समस्या है. इसे सामाजिक सुधार के द्वारा ही सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए. देश का कोई भी कानून किसी सवर्ण को किसी दलित के साथ बैठ कर खाना खाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. यह सब वैचारिक परिवर्तन या सामाजिक बदलाव से ही संभव है, जिसके लिए आजादी के बाद शायद ही प्रयास किया गया. समाज में व्याप्त जातिवाद की जडता, ब्राह्मणवादी और वर्चस्ववादी सामंती सोच या फिर लोगों में व्याप्त श्रेष्ठ या नीच का बोध सामाजिक परिर्वतन को रोकता रहा है. फलतः सदियों से चली आ रही वर्ण एवं जाति व्यवस्था की सामाजिक बीमारी जीवित है, जिसे बहुत पहले ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए था. इस सामाजिक बीमारी के चलते समाज में समानता , स्वतंत्रता, बंधुता, प्रेम, दया और भाईचारे की भावना का विकास नहीं हो पाया. ये सारे मानवीय मूल्य अपने देश में केवल कागजी बन कर रह गये.

महात्मा फुले, पेरियार और डॉ आंबेडकर ने देश की इस समस्या को ठीक से समझा था और भारतीय समाज को इस बीमारी से मुक्ति दिलाने के लिए ये तीनों सामाजिक विचारक सामाजिक समता की लडाई आजीवन लडते रहे. निस्संदेह इन तीनों विचारकों ने वर्ण और जाति का दंश झेला था, इसलिए अपने समाज को इससे मुक्ति दिलाने के लिए ये आजीवन प्रयत्नशील रहे. डॉ आंबेडकर के जीवन की पहली पुस्तक जाति प्रथा का उन्मूलन में जातिवाद के जहर को समाप्त करने तथा सामाजिक विषमता दूर करने के लिए जिन तर्कों को प्रस्तुत किया है, उनके सामने बडे जातिवादी भी निरुत्तर हो जाते हैं. जातिवाद से लाभ उठानेवाले देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अक्सर जातिवाद उन्मूलन के मामले पर चुप हो जाते हैं, लेकिन बुद्धिजीवी होने के नाते उनसे यह अपेक्षा जरूर की जाती है कि वे निष्पक्ष हो कर समाज को सही दिशा देने के लिए आगे आयें और जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठायें, लेकिन हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने शायद ही इस दिशा में ईमानदार पहल की. डॉ आंबेडकर ने देश के बुद्धिजीवियों की इस भूमिका पर आश्चर्य व्यक्त किया था और कहा भी था कि हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अंदर से निष्पक्ष और ईमानदार नहीं है. उनके अनुसार दुर्भाग्य की बात है कि देश में आजादी के पहले सामाजिक सुधार के जो थोडे आंदोलन चल रहे थे, आजादी मिलने के साथ ही वे सभी आंदोलन या तो समाप्त हो गये (या कर दिये गये) या फिर उनकी दिशा ही बदल दी गयी. फलतः समाज सुधार का काम देश में अधूरा रह गया और सामाजिक विसंगतियां अपनी जगह पर जस-की- तक बनी रह गयीं. देश की राजनीतिक आजादी का मतलब यहां के देश संचालकों ने सभी तरह की समस्याओं से मुक्ति पाना मान लिया था.

आजादी के बाद प्रजातंत्रिक व्यवस्था में विश्वास करनेवाली कोई भी सरकार अपने नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजना घोषित करती है. ऐसी घोषणा उसकी राजनीतिक मजबूरी हुआ करती है. चूंकि प्रजातंत्र में प्रत्येक आदमी के वोट की कीमत बराबर है , इसलिए ऐसा करना लाजिमी है. आजादी के बाद देश में जिस तरह की राजनीतिक व्यवस्था कायम हुई, उसमें सभी राजनीतिज्ञ सत्ता की ओर देखते रहे. वोट खींचने की जुगत भिडाते रहे. उन्हें सामाजिक परिवर्तन या किसी तरह के सामाजिक बदलाव से कोई मतलब नहीं था. फुले, पेरियार और डॉ आंबेडकर जैसे नेताओं के सामाजिक परिवर्तन की लडाई को एक तरह से नकार दिया गया. इनकी जगह दलित वर्ग से ही सत्ता सुख भोगनेवाले कुछ लोगों को खडा कर दिया गया, जिनका लक्ष्य दलित नेतृत्व के नाम पर सत्ता सुख भोगना तथा सत्ता सुखवादियों का साथ देना था. इनके कुटिल वाग्जाल में लंबे समय तक दलित वर्ग उलझा रहा और अपनी भौतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा करता रहा. मगर दलित समाज की यह प्रतीक्षा एक अंतहीन मृग मरीचिका ही साबित हुई. समाज में दलितों का दोहन, शोषण एवं अत्याचार बदस्तूर जारी रहा और सामाजिक भेद-भाव भी पूर्ववत चलते रहे.

आजादी के बाद साठ-सत्तर के दशक में दलितों के बीच राजनीतिक चेतना का उभार देखा जाता है. निस्संदेह शिक्षा और संवैधानिक सुविधाओं ने इस चेतना के उभार में सकारात्मक भूमिका निभायी थी. निश्चित रूप से इसमें दलितों के लिए दिया गया आरक्षण भी शामिल था. दलितों को लुभाने, तथा उनके वोट बैंक पर कब्जा जमाये रखने के एक मजबूत हथियार के रूप में आरक्षण को कांग्रेसी सहित कई पार्टियों ने इस्तेमाल किया और आरक्षण के नाम पर दलितों का वोट अपने पक्ष में करते रहे. दलित समाज में पर्याप्त शिक्षा न होने के चलते लंबे समय तक यह आरक्षण लगभग बेमानी बना रहा और आज भी लगभग वही स्थिति है.

देश के नागरिकों को शिक्षित करने सहित दलितों को शिक्षित करने के नाम पर सरकारी स्कूल जरूर खोले गये , मगर उसी के समकक्ष गैरसरकारी (प्राइवेट) स्कूलों की भी लंबी कतार खडी की जाती रही. देश में स्पष्ट और समान शिक्षा नीति न होने के कारण यहां दो तरह के नागरिक बनाये जाते रहे. अमीर के बच्चे अलग नागरिक, तो गरीब के बच्चे अलग. गैर सरकारी स्कूलों से पढनेवाले संभ्रांत और कुलीन परिवार के बच्चों के साथ दलित और कमजोर वर्ग के सरकारी स्कूलों से पढे-लिखे बच्चों की तुलना और मेधा स्पर्धा की बात भी की जाती रही. यह दोहरा सोच और दोहरी शिक्षा व्यवस्था आज भी चल रही है, बल्कि पहले की अपेक्षा और अधिक बढ गयी है. इस तरह की शिक्षा व्यवस्था में हम कैसे समानता, एकता और भाईचारे की बात कर सकते हैं. पुनः सुनियोजित तरीके से शिक्षा व्यवस्था को प्राइवेट और महंगा बना कर दलित व कमजोर वर्ग को इससे वंचित रखने की साजिश की जा रही है. इस बात को आज स्पष्ट रूप से कई समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों तथा मीडियावालों ने भी चिह्नित करने का काम किया है, लेकिन समाज का सत्ताधारी वर्ग इन्हें एकदम अनसुना करता रहा है.

आजादी के बाद अस्सी और नब्बे के दशकों में देश अंदर दलितों की राजनीति तीन रूपों में अपनी पहचान बनाती नजर आती है. दलित राजनीति की एक धारा संघर्ष करती हुई दिखती है, तो दूसरी धारा समझौतावादी रास्ता अख्तियार कर दलित हित की वकालत करती है. तीसरी धारा है राजनीतिक सौदेबाजी की . पहली धारा का नेतृत्व वाम मार्गियों द्वारा किया जाता रहा है , तो दूसरी धार में कांग्रेस, भाजपा, लोजपा, सपा सहित दक्षिण भारत की अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियां रही हैं. तीसरी धारा की राजनीति करनेवाली एक मात्र पार्टी बहुजन समाज पार्टी है , जिसने शुरुआत तो बहुत अच्छी की थी, लेकिन सत्ता की सौदेबाजी करने के चलते लगातार अपनी सैद्धांतिक विश्वसनीयता खोती जा रही है. मान्यवर कांशी राम जी की अथक मेहनत से तैयार की गयी राजनीतिक जमीन की फसल काटनेवाली दलित नेता मायावती जी को नोयडा, लखनऊ, गाजीयाबाद और दिल्ली में लगभग एक अरब की संपत्ति खडी करने में और लखनऊ में ही परिवर्तन चौक सहित आंबेडकर उद्यान बनाने में उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य के कोष से अरबों रुपये फूंक देने में ही दलित उत्थान नजर आता है. इस दलित महिला ने एक बार भी नहीं सोचा कि इतनी जमीन पर यदि उद्यान की जगह कोई कॉलेज, हॉस्पीटल या टेक्नीकल संस्थान बना दिया जाता और उसमें दलित छात्रों के लिए 50 प्रतिशत निःशुल्क सीटें आरक्षित कर दी जातीं, तो देश के दलितों का बहुत कितना बडा उपकार होता. ऐसा करके बहन मायावती जी सही अर्थों में डॉ आंबेडकर के सपनों को साकार कर पातीं, लेकिन ऐसा न करके उन्होंने दलित राजनीति को भटकाया है और दलित समाज को निराश ही किया है.
आज यह सभी स्वीकार करते हैं कि डॉ आंबेडकर के ईमानदार नेतृत्व ने दलित संघर्ष को सफल बनाया था. दलितों के दुश्मन के रूप में उन्होंने ब्राह्मणवाद तथा पूंजीवाद को चिह्नित किया था, लेकिन दुर्भाग्य है कि मायावती जैसी दलित राजनीतिज्ञ ने दलितों के उन्हीं शत्रुओं के हित में काम करना शुरू कर दिया . डॉ आंबेडकर ने यह जरूर प्रयास किया था कि दलित समाज एक राजनीतिक शाक्ति रूप में उभरे और समान विचार रखनेवालों से मिल कर सामाजिक एवं राजनीतिक लडाई लडे. उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों से मिल कर अपनी राजनीतिक महत्वकांझा पूरी करनेवालों से दूरी बनाये रखने की भी बात कही थी, लेकिन आज मायावती सरीखी राजनीतिज्ञ आंबेडकर की इस बात को भूल कर देश की जनता को और दलित जनसमुदाय को धोखा दे रही हैं. प्रसिद्ध दलित चिंतक श्री कवंल भारती के अनुसार डॉ आंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का खात्मा चाहते थे, सामंती अवशेषों का उन्मूलन चाहते थे और अन्याय पर आधारित व्यवस्था की जगह न्याय पर आधारित व्यवस्था चाहते थे. वे शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग का संघर्ष चाहते थे. इसीलिए वे चाहते थे कि देश का नेतृत्व श्रमिक वर्ग करे, लेकिन दलितों में जो मध्य वर्ग विकसति हुआ, वह अवसरवादी साबित हुआ. उसने अपने लाभ के लिए डॉ आंबेडकर के सिद्धांतों को ही उलट-पलट दिया. उसने अपने हिसाब से डॉ आंबेडकर के दर्शन गढे, जिनमें वे समाजवाद-विरोधी और जातिवादी नजर आते हैं. इन मध्यवर्गीय दलित बुद्धिजीवियों ने डॉ आंबेडकर को संसार का महान विद्वान, संविधान निर्माता और बोधिसत्व के विशेषणों तक सीमित कर दिया. व्यवस्था-परिवर्तन की उनकी क्रांति चेतना को इन नये चिंतकों ने दफन कर दिया. अब इनमें कई नेता भागीदारी आंदोलन चला रहे हैं और अपनी-अपनी जाति का नेता बने हुए हैं. कोई विश्व हिंदू परिषद की तरह पूरे भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के तर्ज पर बौद्ध राष्ट्र बनाने के लिए दीक्षा-कार्यक्रम करा रहा है , तो कोई अमेरिका का गुणगान कर डाइवर्सिटी की वकालत कर रहा है और भारत में उसे लागू करने की मांग कर रहा है. कोई इसी के आधार पर निजी क्षेत्र में आरक्षण मांग रहा है. कोई सत्ता परिर्वतन से ज्यादा दलित -मुसलिम एकता को समझ रहा है. यह है मौजूदा दलित चेतना की स्थिति, जो अपनी ढपली , अपन राग पर आधारित है.

हाल के वर्षों में दलित नेताओं द्वारा भागीदारी आंदोलन चला कर आंबेडकरवाद को एक तरह से दफनाने की साजिश चल रही है. आज बिहार में जितनी दलित जातियां है, उतनी ही भागीदारी आंदोलन चल रहे हैं. आंदोलन ने बिहार में दलित और महादलित को जन्म दिया है . कोई यह कह रहा है कि मेहतर, मुसहर, और भंगी समाज को भागीदारी नहीं दी जा रही है. कोई यह कह रहा है कि सत्ता में पासियों की उपेक्षा हो रही है. कोई धोबी समाज की भागीदार मांग रहा है, तो कोई चमार और दुसाध समाज की भागीदारी के लिए संघर्ष कर रहा है. जितनी जिनकी संख्या भारी है, उतनी वह हिस्सेदारी की बात कर रहा है. इस तरह डॉ आंबेडकर की जाति उन्मूलन की सोच तथा स्वस्थ समाज के निर्माण की कल्पना इस भागीदारी विमर्श में अंतिम सांस ले रही है. आज यह समझना मुश्किल है कि जाति का विनाश व्यवस्था परिवर्तन में है या जाति आधारित भागीदारी की व्यवस्था में है. उपरोक्त भागीदारी आंदोलन का अर्थ है गरीब को लडाना और लूट की संस्कृति को विकसित करना. मेहतर समाज सोच रहा है कि आरक्षण का सारा सुख चमार, दुसाध और धाबी भोग रहे हैं. आरक्षण का लाभ मेहतर और मुसहर समाज को मिलना चाहिए. इस भागीदारी आंदोलन ने दलित जातियों को एक - दूसरे के विरुद्ध खडा करने का काम किया है. वास्तविक लडाई गौण हो गयी है. गैरजरूरी और अनावश्यक मुे उछाले जा रहे हैं. शोषक के खिलाफ शोषण की लडाई ठंडी पड गयी है और गरीब से गरीब की लडाई शुरू हो गयी है. निस्संदेह यह भटकाव की स्थिति है और दलित आंदोलन को निष्क्रिय एवं निष्प्रभावी बनाने की राजनीति है.

कुछ दलित विचारक डाइवर्सिटी के अमेरिकी सिद्धांत की बात करते हैं तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करनेवाले कुछ दलित नेता अमेरिका की प्रसंशा में लगे हुए है. चंद्रभान जैसे तथाकथित दलित विचारक पूंजीवादी व्यवस्था में ही दलितों का उत्थान देखते हैं. उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि देश में साम्राज्यवादी वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है , वह सही है और उसे रोकने की जरूरत नहीं है. वे केवल इतना ही चाहते हैं कि इस नयी व्यवस्था में कुछ हिस्सा दलितों को भी मिल जाये. निस्संदेह यह हिस्सा 25 करोड दलितों के लिए नहीं, बल्कि उन दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए है , जो भ्रष्ट साधनों से धन कुबेर बन गये हैं. ये दलित धन कुबेर ही निजी कंपनियों में ठेके प्राप्त कर सकते हैं और ये ही इन कंपनियों में नौकरी पाने लायक उच्चतम शिक्षा अपने बच्चों को दिलाने की क्षमता रखते है. इस व्यवस्था में 95 प्रतिशत गरीब दलित कहां आते हैं , जो रोज कमाते और खाते हैं तथा एक पूर्ण नागरिक का हक पाने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं और जूझ रहे हैं.

आज की इस दिग्भ्रमित दलित राजनीति और दलित चिंतन के खतरनाक भटकाव में यह विचार करना लाजिमी लगता है कि दलित समाज का हित सिर्फ जातिवाद पर आधारित भागीदारी आंदोलन में नहीं, और न सिर्फ आरक्षण में है, बल्कि समग्र दलित समाज का हित शोषण पर आधारित इस व्यवस्था को बदलने में है.
लेखक पटना विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य से जुडे हैं और दर्शन एवं समाजशास्त्र में के विशेषज्ञ हैं.
लेखक पटना विवि में प्राध्यापक हैं.

क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2009 07:47:00 PM


वरुण गाँधी इसी संसदीय व्यवस्था की उपज हैं-हम इस मुद्दे को इसी तरह देखते हैं. यहाँ पार्टियों के बीच कोई अन्तर नहीं है। सज्जन, टाइटलर, बुद्धदेव, मोदी, संजय गांधी, आडवाणी...इनमें पार्टियों का भेद कहाँ है? सब एक से हैं और उन्हें यह तंत्र स्पेस देता है। हत्यारे, अपराधी, घोटालेबाज, मोनाफखोर, अय्याश, तस्कर, दलाल, गुंडे, बलात्कारी...सब चुनावों की गंगा में नहा कर 'पवित्र' होते हैं और देश का 'भविष्य तय करते' हैं। और यही गंगानहान चल रहा है। वरुण गांधी नहान के तैयारियों में अपनी गलाज़त के उल्टी कर चुके। यह हमारा नज़रिया है...
एक नज़रिया एक वरिष्ठ कानूनविद एजी नूरानी का भी है।

क्यों, कोई कुछ भी बोल जाता है?


एजी नूरानी

रुण गांधी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत कारावास की सजा दी गयी. इस विवेकपूर्ण और राजनीतिक जजमेंट को लेकर अलग-अलग अवधारणाएं हो सकती हैं. नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगडिया ने अब तक जो भी भाषण दिये हैं, उसकी तुलना में वरुण का भाषण ज्यादा भडकाऊ और सोचा-समझा था. यह बात अपने में बहुत कुछ कह रहा है. उनकी शिक्षा विदेश में हुई. उनकी कोई विचारधारा नहीं है और न ही वे कोई वैचारिक कार्यकर्ता हैं, जिन्हें ऐसी गलती के लिए माफ कर देना चाहिए. उनका भाषण हिंसात्मक था, जिसे सांप्रदायिक घृणा के साथ जोड दिया गया.
जनता पार्टी सरकार ने ऐसे मामलों को रोकने के लिए एक कारावास संबंधित कानून पास करने का प्रयास किया था. इस कानून के सबसे बडे पैरोकार तत्कालीन गृह मंत्री चरण सिंह और कानून मंत्री शांतिभूषण थे. वहीं शांतिभूषण, जो भाजपा में कुछ दिन राजनीति करने के बाद आजकल मानवाधिकार के संरक्षक बने हुए हैं. इस बिल पर राम जेठमलानी ने विरोध जताया. उनके विरोध ने बवाल खडा कर दिया. इसी संदर्भ में मीसा पर दुबारा सुनवाई की गयी, लेकिन कारावास संबंधी कानून पास नहीं हो पाया. आपराधिक प्रक्रियाओं को रोकने के लिए चौधरी चरण सिंह और शांतिभूषण का कानून हमेशा के लिए कानून बनना था. भारत ऐसे कानूनों के बगैर भी रह सकता है.
इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में आयीं. उन्होंने रासुका, 1980 को पास किया. उस वक्त मेनका गांधी राजनीतिक और व्यक्तिगत दोनों अर्थों में उसी इंदिरा परिवार की सदस्य थी. पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां रासुका जैसे कानूनों के अंतर्गत कारावास का प्रावधान है. संविधान सभा में बीआर आंबेडकर इस कानून को पेश कर रहे थे. उस वक्त महावीर त्यागी ने उन्हें चेताया था, ऐसा न हो कि एक दिन आपको भी जेल जाना पडे. लेकिन हमें मीसा और रासुका के संरक्षकों पर फब्तियां नहीं कसनी चाहिए. इस विषय को सिद्धांतों के सवाल के साथ जोड कर देखा जाना चाहिए. रासुका, 1980 केंद्र और राज्य सरकारों को यह अधिकार देता है कि अगर कोई व्यक्ति सामाजिक सौहार्द के साथ खिलवाड करता है, तो उसे रोकने के लिए जेल भेजा जा सकता है. सरकार को यह कदम उठाने से पहले सुनिश्चित कर लेना होता है कि ऐसा करना जरूरी है. गिरफ्तारी के पीछे आधार क्या है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए. इसके लिए गठित एक एडवाइजरी बोर्ड इसकी जांच करेगी. बंदी चाहे तो सजा के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है. वरुण ऐसे भाषण एक बार से ज्यादा न दें, इसके लिए उन्हें जेल में डालना जरूरी था. अगर स्वतंत्र छोड दिया जाता, तो क्या वे सामाजिक सौहार्द को नहीं बिगाडते?

रासुका का मामला अभी सुप्रीम कोर्ट के अधीन है, जिसमें राज्य सरकार को अपने आरोपों के सहयोग में कागजात पेश करने हैं. लेकिन इससे संबंधित बहुत सारे सवाल हैं, जिनका विवरण पेश किया जाना चाहिए. समाज में घृणा न फैले, इसके लिए राज्य सरकार को ऐसे आपत्तिजनक कानून क्यों लागू करने पडे? इसका जवाब आसान है. कानून की दृष्टि से देखें, तो यह कानून सक्षम है. लेकिन सरकार की अक्षमता और कानून अनुपालन में पक्षपात के रवैये ने इसे निष्प्रभावी बना दिया है. यही वजह है, जिसके कारण बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे लोग स्वतंत्र घूम रहे हैं. राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ जो विषवमन किया, वह किसी भी सांप्रदायिक घृणा से कम नहीं था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी उतना ही दोषी है. आधुनिक समाज के सभी लोग इस बात से वाकिफ हैं कि हिंदुत्व शब्द का ईजाद वीडी सावरकर ने 1924 में किया था. उसका हिंदू-वाद से कोई लेना-देना नहीं था. हिंदू-वाद की बात उस आदमी ने उठायी, जो एक नास्तिक था. ऐसे ही चुनावी अभियान से जुडा एक हिंदुत्व का मामला 1995 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था. इसमें जस्टिस जेएस वर्मा ने एक चौंकाने वाला जजमेंट दिया था. उनका कहना था कि साधारण रूप में हिंदुत्व को जिंदगी का एक रास्ता समझ लिया जाता है. गहराई से सोच कर इसे हिंदूवादी कट्टरता के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए. 1993 में जेएस वर्मा ने सेकुलरवाद को संविधान की आधारभूत विशेषता मानने से इंकार कर दिया. रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 की धारा 123(3) के अनुसार वैसे प्रत्याशियों को चुनाव से रोका जा सकता है, जो धर्म के आधार पर वोट मांगते हों. इसके अधीन कार्रवाई हो सकती है या नहीं, यह मामला 13 सालों से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. कोर्ट के पास इस पर बहस करने का समय नहीं है. 28 जुलाई 1993 को संसद में धर्म को राजनीति से दूर रखने संबंधी में दो बिल लाये गये. इन दोनों बिल का विरोध करने में जॉर्ज फर्नांडिस सबसे आगे थे, जो आगे चल कर भाजपा के साथ हो लिये. वह प्रयास सफल नहीं हो पाया. लेकिन आज जो कानून है, वह भी प्रभाव दिखाने में सक्षम है. आज ऐसा कानून है, जो ऐसे संगठनों, जो कि गैर कानूनी कार्यों में संलग्न हैं, उन पर पाबंदी लगाता है. इसे हम 1967 के गैर कानूनी गतिविधियों के रोकथाम करनेवाले कानून के रूप में जानते हैं और इसे अलगाववाद पर रोक लगानेवाले कानून के रूप में भी जाना जाता है. लेकिन बाद में इसे क्रिमिनल लॉ एक्ट, 1972 के द्वारा संशोधित कर दिया गया. इसके अंतर्गत किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा अगर कोई सांप्रदायिक दुष्प्रचार फैलाया जाता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जायेगी. ऐसा ही प्रावधान आइपीसी की धारा 153-ए और 153-बी में दिया गया. धारा 153-ए को 1969 में आपराधिक एवं चुनाव कानून को भी भारतीय संहिता में सुधार करते हुए जोडा गया. इसके अनुसार धर्म, जन्मस्थान, आवास, भाषा, जाति या संप्रदाय के नाम पर समाज में विभिन्न धर्मों के बीच किसी भी प्रकार की घृणा या अनेकता की बात फैलाना एक अपराध है. धारा 153-बी अनलॉफुल एक्टिविटिज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 के अनुसार अगर कोई संगठन आइपीसी की धारा 153-ए और 153-बी का उल्लंघन करता है, तो उसे प्रतिबंधित किया जा सकता है. जिस व्यक्ति पर इस कानून के तहत आरोप लगता है, उसे गिरफ्तार भी किया जा सकता है. अमेरिका और ब्रिटेन के समाजों में वंशानुगत पूर्वाग्रहों के बावजूद भडकाऊ भाषण देने पर सख्त पाबंदी है. 1952 में वहां के कोर्ट ने एक धार्मिक संगठन के खिलाफ आपराधिक सजा सुनाई थी. इस सुनवाई के दौरान जज ने कहा था कि एक संगठन या प्रतिनिधि के रूप में ऐसे भाषण का उपयोग करना जो जातिगत या धार्मिक उन्माद फैला सकता है, एक बहुत बडे अपराध को जन्म देता है. एक जनप्रतिनिधि अगर लोगों के समक्ष ऐसे भाषण का उपयोग करता है, जिन लोगों पर उसका प्रभाव ज्यादा है, तो इससे बडा अपराध कुछ हो ही नहीं सकता. किसी काले व्यक्ति द्वारा नस्ल संबंधी फब्ती कसने पर त्वरित कार्रवाई का प्रावधान किया गया. ऐसा कानून अमेरिका में है. लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं, तभी तो वरुण गांधी और उनके जैसे लोग कुछ भी बोलने के लिए स्वतंत्र है.

जहां आदिवासी महिलाओं के लिये जीवन का रास्ता युद्ध है

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/21/2009 06:13:00 PM

मई, 2007 के जन विकल्प में प्रकाशित यह आलेख आदिवासी महिलाओं के उत्पीडन, शोषण और उनकी संघर्ष गाथा को प्रस्तुत करता है. साभार प्रस्तुति.

प हमारी झोपड़ियों से कर्सद गीत (मृत्युगान) के अलावा कोई दूसरा गीत नहीं सुन सकते। आप केवल वही साज सुन सकते हैं जो हम अंत्येष्टि संस्कार के समय बजाते हैं। आप केवल वही नृत्य देख सकते हैं जो मृत्यु के बाद लोगों को श्रद्धांजलि देते समय किया जाता है। यह एक भयावह स्थिति है। वर्तमान में हम पूरी तरह युद्ध में व्यस्त हैं। इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। यह उस विचार को खारिज कर हो रहा है कि महिलाओं की प्रकृति युद्ध के खिलाफ है।

हमारा दण्डकारण्य एक विशाल भूभाग है। कभी हम आदिवासी यहां के बहुसंख्यक निवासी थे। लेकिन बाहरी लोगों के शासन के प्रारंभ (14 वीं शताब्‍दी ई०) जो कि पिछले सात सौ सालों का लंबा काल है, से हमारी आदिवासी जनसंख्या क्रमश: कम होती चली गई। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के आक्रमण के दौरान तथा 'स्वतंत्रता के बाद` इस दर में वृद्धि हुई। कुछ स्थानों पर हम अल्पसंख्यक भी हो गये हैं। हमारा दण्डकारण्य पूर्व तथा दक्षिण में सिलेरू, गोदावरी तथा प्राणहिता नदी, उत्तर में रायपुर तथा पश्चिम में चंद्रपुर की सीमा से लगा हुआ है। महाराष्ट्र छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ भागों में फैला व्यापक जंगल इसे विशिष्ट क्षेत्र बनाता है। इस क्षेत्र में विभिन्न परंपराओं की कई आदिवासी प्रजातियां रहती हैं । इनमें से अधिकांश दोरला, मारिया तथा मुरिया आदिवासी हैं। हम अपनी भाषा में स्वयं को 'कोयाथर` कहते हैं । हमारी भाषा कोया है। अकादमिक पुस्तकों में हमारा उल्लेख 'गोंड़` के रूप में मिलता है। पचपन हजार वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा विस्तृत इस व्यापक क्षेत्र में हमारी जनसंख्या आधे करोड़ से ज्यादा है।


आदिवासियों में महिला तथा पुरुषों का अनुपात लगभग समान है। बाहरी शासकों ने-जो केवल हमारा शोषण और यहां डकैती करते हैं-कभी हमारे विकास के बारे में नही सोचा। हमारे श्रम का सस्ते में शोषण तथा हमारे जंगलों से लूट में ब्रिटिश शासन के समय से ही प्रतिवर्ष लगातार वृद्धि हो रही है। यह कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने हमें घने आंतरिक जंगलों तक सीमित कर दिया। इससे गुजरने वाला हर दिन हमारे जीवन में असहनीय होता गया। ताजा आंकडे बताते हैं कि दक्षिणी बस्तर के दंतेवाड़ा में साक्षरता दर 25 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है तथा महिलाओं में तो 17 प्रतिशत से भी कम है। कुपोषण से मरने वाले हमारे बच्चों की संख्या, जीवित बच जाने वालों से कहीं ज्यादा है। सरकारी आंकड़े स्वयं बताते हंै कि यहां शिशु मृत्यु दर बहुत उच्च है। एक महिला के लिए बच्चे को जन्म देने के बाद जीवित बचा रहना दूसरा जन्म जैसा होता है। अपना शरीर ढकने के लिए हमारे पास कपडे नहीं हैं। हमारे पास पर्याप्त भोजन नहीं है कि हम दो जून अपना पेट भर सकें। हमारा जीवन उत्पादन के लिए लगातार संघर्ष है। पुर्नत्पादन प्रक्रियाओं ने हमें जर्जर बनाकर छोड़ दिया है। हालांकि हम पूरा दिन काम करते हैं फिर भी हम आगे नही बढ़ पाते । हमारे दिन का अधिकांश समय घरेलू कामों, वन उत्पादों के संग्रहण, कृषि कार्य आदि में गुजरता है। यहां तक कि गर्भवती महिला, वृद्ध महिला या तीन साल से ऊपर की बच्ची हो, किसी को कोई राहत नहीं है। कड़ी मेहनत के बावजूद, भूमंडलीकरण की पृष्ठभूमि में हम अपनी रोज की रोटी खरीद पाने में असमर्थ हैं। जिससे किसी अन्य जगह भागने को मजबूर हैं। हमारे लिए अपने परिवार को संभालना कठिन होता जा रहा है। हम लड़ रहे हैं और गंवा रहे हैं। एक दिन अपने जीवन संघर्ष में विजयी होने की आशा के साथ हम लड़ रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं।

हिंसा से जूझना हमारे जीवन का एक अंग है। घरेलू हिंसा की तुलना में राज्य-हिंसा का मुकाबला करना बहुत कठिन होता जा रहा है। परंपरागत हिंसा के बावजूद आदिवासी परंपरा में यह (हिंसा) पूरी तरह असहनीय है। कम से कम वे जीवन की आशा को नहीं मारते। सामान्यत: वे आपके अपने आदमियों से किये गये असंख्य समझौतों को नहीं तोड़ते। राज्य हिंसा हमारे जीवन को शारीरिक , मानसिक (मनोवैज्ञानिक), यौन (लिंग संबंधी), राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक स्तर पर बर्बाद कर रही है। इसी कारण पहले हम राज्य हिंसा से लड़े और जीते। हमारा अस्तित्व इसीलिए है और हम लगातार चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। श्रम से भरे हमारे जीवन में वैज्ञानिक चिंतन को स्थगित कर, सत्ता में बैठी सरकारें हमारे स्वास्थ्य से खेलती रहती हैं। हममें से अधिकतर यह तक नहीं जानते कि संविधान के अनुसार हमारे लिए नि:शुल्क शिक्षा व नि:शुल्क स्वास्थ सेवाओं का प्रावधान है। विकास से हजारों किलोमीटर दूर विशालकाय घने जंगलों में बिखरे गांवों के आदिवासी किसी शिक्षा या स्वास्थ्य सेवा के बारे में सोच तक नहीं सकते। कब कौन सी महामारी फैल जायेगी कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि कोई मामूली बीमारी या दर्द किसी की जान का कब खतरा बन जाएगा। हम अभी भी सिकल सेल जैसी बीमारी से मर रहे हैं। जो अभी भी असाध्य बनी हुई है। फिर भी लोग कहते हैं कि इस दुनिया का बहुत विकास हुआ है। उपयुक्त भोजन की कमी तथा अस्वच्छ वातावरण से होने वाली बीमारियां जैसे टी.वी. तथा कोढ़ प्रतिवर्ष फैल रही है। हमारी गरीबी तथा बुरी आदतों जैसे धूम्रपान, शराब और अब उपभोक्तावादी साम्राज्यवादी संस्कृति के प्रहार के कारण कई हानिकारक तंबाकू, मादक द्रव्य, गुटखा आदि का प्रचलन तेजी से हो रहा है और ये लगातार फैल रहे हैं। हमारे जीवन को तबाह कर रहे हैं। जो कोई भी हम लोगों के बारे में जानता है, उसे यह बताने की कोई जरूरत नहीं है कि आदिवासी जीवन इन सभी के खिलाफ एक संघर्ष है। परिणाम स्वरूप बैगा और अबुझमाड़ मारिया उस आदिवासी समुदाय का हिस्सा है जो छत्तीसगढ़ में आज लुप्त होती जा रही है।
हमारा परिवेश हमेशा विस्फोटों से गूंजता रहता है। हमारे विशाल दण्डकारण्य क्षेत्र में असंख्य खदानें तथा अमूल्य खनिज संपदा है। अगर आदिवासियों का कोई शुभचिंतक इस देश की महत्वपूर्ण खदानों तथा खनिज संसाधनों और बड़ी परियोजनाओं को गिनना तथा मापना चाहे तो लगभग सभी की सभी आदिवासी क्षेत्रों में ही मिलेंगी। यह तथ्य पहले की अपेक्षा आज ज्य़ादा महत्वपूर्ण है। केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा दलाल, नौकरशाह, पूंजीपति तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सैकड़ों समझौते पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए हैं जो हमारे आस्तित्व के लिए खतरा हैं। बैलाडीला, सूरजगढ़, चारगांव, रावघाट, नगरनार, पल्लेमाडी तथा कुव्वेमारा में विस्फोटों से हमारी जमीन को छिन्न-भिन्न कर दिया गया है। हमारे पड़ोसी कलिंगनगर, राउरकेला, झारखण्ड और छोटा नागपुर को भी इसी तरह अलग-थलग किया जा रहा है। इन खदानों ने न केवल हमारे वातावरण को प्रदूषित किया है बल्कि इन परियोजनाओं ने 90 लाख से ज्य़ादा आदिवासियों को बेघर कर दिया है। इससे केवल हमारी जनसंख्या ही नहीं प्रभावित हुई है बल्कि हमारे सह-आस्तित्व में रहने वाले सभी जीवित प्राणियों को नुकसान पहुंचा है। धीरे धीरे वे नष्ट हो रहे हैं। वनस्पतियों की दुर्लभ प्रजातियां लुप्त होती जा रही हैं। उपरोक्त अलगाववादी परिस्थितियों के कारण हम अपने आस्तित्व तथा अपनी जनता के बहुमुखी विकास के लिए युद्ध करने को बाध्य हैं। इस नारे के साथ कि : 'जल, जंगल, जमीन हमारी है! हमारी है!

संघर्ष का विवरण

आधुनिक राज्य के शासन का दखल जैसे-जैसे हमारे जीवन में बढ़ रहा है वैसे वैसे ही हमारा संघर्ष तेजी से फैल रहा है। जब हम इस तथ्य को याद करते हैं कि आदिवासियों की ओर से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों पर पहली गोली चलाई गई थी तो हम तुरंत ही अपने दण्डकारण्य में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ महान विद्रोह के इतिहास को याद करते हैं। 1825 ई.के प्रारंभ में पारलकोट जनविद्रोह के नेता गेंद सिंह के नेतृत्व में आदिवासी महिला पुरुषों ने ब्रिटिश-मराठा सेना के खिलाफ छापामार युद्ध का ऐलान किया। इसे परास्त कर दिया गया था। तब से 1920 ई. तक विभिन्न जगहों में स्थानीय स्तर पर जन विद्रोह हुए। इसमें भारत में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान 1857 ई. में हुआ कोया विद्रोह उल्लेखनीय है। हमारे वीर बाबूराव सेडमेक तथा वेंकटराव जैसे आदिवासी बहादुर योद्धाओं ने विदेशी शासन को पराजित किया और अपने जीवन को बलिदान कर फांसी के फंदे को चूम लिया। 1910 ई. का भूमकाल विद्रोह अविस्मरणीय है। इस महान विद्रोह में ब्रिटिश लोगों की गोलियों से सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए। ब्रिटिश हुकूमत के सैनिकों ने इस विद्रोह के दमन के लिए हमारे जंगलों में भयंकर आतंक मचाया। सैकड़ों महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को अपनी जान गंवानी पड़ी। कई पीढ़ियों के गुजरने के बाद भी कुटुल, दरवेड़ा, कचपाल, छोटा डोंगर, ओड़चा, गीदम तथा कोंडागांव के लोग नरसंहार, अत्याचार, लूट, प्रताड़ना, जिंदा जलाया जाना, संपत्ति के नुकसान आदि को तथा निर्दयी ब्रिटिश लोगों के सैकड़ो साल पहले किए गए अपराध को आज तक नहीं भूल पाये हैं। उनके सैनिक बहुत अधिक संख्या में तैनात थे। महान नेता गुंदाधर आज भी लोगों को लगातार प्रेरित कर रहे हैं और संघर्ष का पर्याय बन चुके हैं। इसके पचास साल बाद, 1960 ई. के प्रारंभ में 'आजाद भारत` में नेहरू की सेनाओं ने बस्तर के राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव और उनके अनुयायियों को निर्दयतापूर्वक मार दिया क्योंकि वे वास्तविक आदिवासी मांगों के लिए लड़ रहे थे। इस तरह हम ऐतिहासिक नजरिये से देखते हुए पाते है कि पिछले दो सौ साल प्रारंभ में साम्राज्यवादी तथा बाद में भारतीय शासक वर्ग के खिलाफ हमारे आदिवासी संघर्ष का इतिहास है। यह कोई साधारण संघर्ष नहीं है। यह एक युद्ध है। यह जीवन के लिए एक संघर्ष है। हम भी आधुनिक राज्य तथा इसके विशाल औजारों से लड़ रहे हैं। हमारे पूर्व की पीढ़ी 'पेडियार` (योद्धा) थी। वह एक जनयुद्ध था। सभी महिला तथा पुरुष इस जनयुद्ध का अंग थे। वे सभी युद्ध में हार के बाद समाप्त हो गए। लेकिन हम नहीं थके हैं। दो-ढाई दशकों से हम स्पष्ट क्रांतिकारी राजनीति के दिशा निर्देशों के अन्तर्गत लड़ रहे हैं ।

1980 से हमारे इलाके में परिवर्तन की नयी हवा का प्रवेश हुआ। हमारी पिछली पीढ़ी द्वारा भुला दिया गया शब्द 'दण्डकारण्य` हमारे जंगलों, झोपड़ियों और हमारे दिलों में दुबारा गूंजने लगा। हमने पहली बार 'जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार है!` नारा सुना इसलिए हमें शोषण और दमन के खिलाफ लड़ना होगा और इसे खत़्म करना होगा। हमने संघर्ष और सत्ता के बीच के अंर्तसंबध को समझा। सुबह से शाम तक श्रम से भरे हमारे दुष्कर जीवन को कहां छला गया, यह हमने समझा। यद्यपि 1964 ई. में नेहरू की सेना द्वारा जब गोली चली तो हमें समझ में आया था कि 1947 ई.में हुए सत्ता हस्तांतरण ने हमारे जीवन को नहीं बदला है। भारतीय शासक वर्ग की नीतियां, जिनके लिए यह तथ्य है कि '1980 से हम संगठित हो रहे हैं `, असहनीय है हमारे दृष्टिकोण को और दृढ़ बना रही है।

हमारा युद्ध जंगलों पर अधिकार के लिए है!

स्वतंत्रता के पहले से हमें अपने जंगलों से बेदखल कर दिया गया था। हम ब्रिटिश कानून के बंदी बन गये। ब्रिटिश लोगों ने पहली बार 1953 ई. में हमारे जंगलों में प्रवेश किया था और हम उनके कानून के शिकार बन गये। पिछले डेढ़ सौ वर्षों में इन जंगलों पर और कई कानून थोपे गये और जंगलों की जमीन हमारे हाथों से छीन ली गई। यह महज संयोग नहीं है कि अर्ध-सामंती तथा अर्ध-औपनिवेशिक चरित्र वाले भारतीय शासक वर्ग ने 1980 ई.में जंगलों को राज्य सूची से केन्द्र सरकार की गोद में सौंप दिया। संथालों द्वारा बहुत दूर एक जगह नक्सलबाड़ी में 1967 ई० में भड़की जंगल चिंगारी को बुझाने के लिए यह एक कुख्यात अध्यादेश था। इसके कारण वैधानिक तरीके से जंगल की जमीन मिल जाने की हमारी उम्मीद राख में मिल गई। अगर पहले हम यह सोचें कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां की 70 प्रतिशत जनता किसान है तो वहां मुख्य मुद्दा ज़मीन का है तब यह स्पष्ट हो जाता है कि 8 प्रतिशत की आदिवासी आबादी का मुख्य मुद्दा भी जमीन ही है। 1980 ई० के केंद्रीय अध्यादेश के अनुसार आदिवासी कृषि जमीन को सरकारी पट्टा से खारिज कर दिया गया। वास्तव में हमें इसके पहले भी जंगल की जमीन का अधिकार पूर्वक प्रयोग करने की स्वतंत्रता नहीं थी। जंगल की जमीन में खेती का अर्थ है शोषक सरकारी वन विभाग के साथ युद्ध करना। हमारे द्वारा जंगल की जमीन पर खेती करने की भनक अगर वन विभाग को लगी तो वे हम पर गिद्ध की तरह झपट्टा मारेंगे। घरों को जलाना, महिलाओं से बलात्कार, भयंकर पिटाई, लघु संपत्ति जैसे मुर्गियां, बकरियां, सुअर, ईप्पा (फूलों से निकाला गया द्रव्य) ताड़ी (पेड़ों से निकाला गया द्रव्य) या कुछ पैसों आदि का लूटना 1980 के दशक से लगातार जारी है। इसके अलावा दानवी कानूनों का प्रयोग कर किसानों को गिरफतार करके बंधक बना लिया जाता है। अब तक इस तरह के हजारों मामले अदालतों में लंबित हैं। जमीन और खेती के बिना किसानी का कोई जीवन नहीं है। इस तरह के कठोर दमन के बावजूद हम जमीन के लिए लड़े। यह हमारा मुख्य संघर्ष था। जब उन्होंने हमारी बोई हुई जमीन को नष्ट करने की कोशिश की तो हमने उन्हें रोका। जब उन्होंने खेती करने से रोकने की कोशिश की तो हमने उन्हें बाँध दिया और हम सभी आदिवासी महिला और पुरुषों ने मिलकर खेत जोत लिया। इससे हमारा आत्मविश्वास बढा। हमने शोषणकारी सरकारी पट्टा के बारे में ध्यान देना बंद कर अपनी खेती की। हमने घोषणा की कि वन विभाग के किसी अधिकारी-जो हमें शैतानों की तरह परेशान करता है-को जंगल के भीतर नहीं घुसना चाहिए। हमने देखा कि बच्चों की नई पीढ़ी उनके दमन के छाया में बडी नहीं हो रही है। पिछले पच्चीस वर्षों में हमने दो लाख एकड़ जंगल की जमीन का इस्तेमाल खेती के लिए किया है।

यहां हम संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा लाये गये वन विधेयक कानून की चर्चा करना चाहेंगे। हमारे देश में पिछले दो ढाई दशक से आदिवासी इलाकों में जनता के जर्बदस्त संघर्षों के कारण सरकार यह कह रही है कि वह आदिवासियों द्वारा खेती की जा रही जमीन का पट्टा देगी। निश्चित रुप से यह किसी प्रेम या सहानुभूति से नहीं किया जा रहा है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि इस प्रक्षेपित विधेयक के पीछे एक बहुत बड़ी साजिश है। कई राज्य सरकारों ने कारपोरेट क्षेत्र के साथ समझौते किये हैं । और बड़े पूंजीपतियों को उत्खनन तथा खनिजों को निचोड़ने के लिए वृहद पैमाने पर जंगल की जमीन सौंपी जा रही है। परिणाम स्वरूप कई आदिवासी समुदायों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। हम वैसे भी नागरनार (बस्तर) कलिंग नगर, राउरकेला (उड़ीसा) बैलाडिला तथा अन्य जगहों के परिणाम भुगत रहे हैं। इस कारण हमें इन समझौतों का विरोध कर इन्हें रोकना चाहिए। हम उनके इस दुष्प्रचार का पर्दाफाश करेंगे कि इन औद्योगिक विकासों से अदिवासियों का विकास होगा। शोषक सरकारी कानूनों के खिलाफ एक जमीनी युद्ध लड़कर हम सब इसका विरोध करेंगे।

वनउत्पाद और वनसंपदा हमारी है

हमारे आदिवासी जीवन की तुलना ईंधन से की जा सकती है। वन क्षेत्रों में बड़ी बड़ी परियोजनाओं के कारण लाखों आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं। लेकिन हमें कहीं कोई सिंचित जमीन नहीं मिल रही है। हलांकि हम विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चे माल की निरंतर अपूर्ति करते हैं फिर भी एक दिन में एक मील चलना हमारे लिए असंभव होता जा रहा है। थोडा सा भी हमारा प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए नहीं है। परिणाम स्वरुप हम अन्न संग्रहण के लिए वन उत्पादों को इकट्ठा करते हैं जो आदिमानव की स्मृति है। सरकार ने वन उत्पादांे का मनमाने ढंग से विभाजन कर दिया और कहा कि हम केवल लघु वन उत्पादों का ही संग्रहण कर सकते हैं। बड़े वन उपजों पर हमारे अधिकार को छीन लिया गया। हलांकि सरकार ग्राम सभाओं पर खूब लफ्फाजी करती है लेकिन व्यवहार में उनका कभी सम्मान नही किया गया। जो लोग 73 वें संविधान संशोधन को एक क्रांति के रूप में प्रचारित करते हैं उन्हें अब आंखें खोलकर देखना चाहिए कि वे किस भ्रम में हैं। हम वन उत्पादो का संग्रहण कई सीमाओं में रहकर करते हैं।

एक ओर जहां हम उन उत्पादों को इकट्ठा करने में अपनी रीढ़ तोड रहे हैं उससे ज्यादा उन पर अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। जिन ढेर सारे वन उत्पादों को लूटकर बाहर ले जाया जाता है उनका संग्रहण भी हम ही करते हैं। इसके लिए हमें बहुत कम पैसा दिया जाता है। तेंदू पत्ता के संग्रहण, पेडों की कटाई, पत्तल बनाने के लिए एकत्र की जाने वाली पवुरू पत्तियों आदि के लिए बहुत कम दर पर भुगतान किया जाता है। हमारा शोषण करने वाले पूंजीपतियों को मालिकाना अधिकार मिला हुआ है। इसी तरह संग्रहित वन उत्पादों को लेकर जब हम बाजाऱ जाते हैं तो हमारा भंयकर शोषण होता है। इस साम्राज्यवादी युग में कुछ भी स्थानीय नहीं बचा है। सब कुछ विश्व बाजार से जुडा हुआ है। भूमंडलीकरण की नीतियों के कारण खुदरा व्यापारी बाहर हो रहे हैं और ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं बचा है जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने प्रवेश न किया हो। अकेले बस्तर से 1100 करोड़ रुपये प्रति वर्ष से ज्यादा कमाने के लिए बड़े बड़े निगमित घराने गला काट प्रतियोगिता कर रहे हैं। केवल उन्हें रोक कर ही हम जंगलों पर अधिकार के संघर्ष को विजयी बना सकते हैं। लोहा, मैग्नीज, कोयला, चूनापत्थर, ग्रेनाईट, बॉक्साईट, डोलामाईट, टीन, किंबरलाईट तथा कोरंडम के अलावा सोना तथा हीरा भी यहां प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। कम्प्यूटर युग में, जहां कच्चे माल को निकालकर औद्योगिक वस्तुओं में तब्दील किया जाता है। वहां मानव जीवन इससे अलग नहीं बचा रह सकता। इसी कारण टाटा, एस्सार, जिंदल, निक्को, रिलायंस, गोदावारी इस्पात, रायपुर लीड्स आदि स्पर्धारत हैं। वैसे भी हमारे जीवन को उनहोंने हर जगह लूटा है। जो कुछ बचा है उसका भी शोषण करने के लिए राज्य सरकारों के साथ घुल मिल रहे हैं और हमारे इलाके में सड़क बना रहे हैं जो कि खनिज संसाधनों से भरा हुआ है। वे हमसे औद्योगिक विकास से स्वर्ग लाने का दावा कर रहे हैं । आदिवासियों के बीच की विशिष्ट मध्यकालीन सामंती ताकतें पूरी तरह उनका सहयोग कर रही हैं। वे सभी निर्दयी तथा फासीवादी दमनकारी ताकतों को जंगलों में भर रहे हैं। जो लोग अपने आस्तित्व के लिए लड़ रहें हैं उन्हें वे अलग थलग कर रहे हैं। नागरनार और कलिंग नगर हमारे सामने सबसे ताजा उदाहरण हैं। कुव्वेमारा, चारगांव तथा रावघाट-जहां जनता के प्रतिरोध के कारण उन्हें अपना शोषण बंद करना पड़ा-हमारे लिए आदर्श हैं। उनके लाभ के लिए हम अपने इलाकों पर उन्हें अधिकार करने तथा अपने आपको मारने की इजाजत नहीं देंगे। हम अपने अस्तित्व के लिए लडेंगे । पिछले पच्चीस वर्षों के संघर्ष को और तेज करने का हमारा संकल्प है। हम प्रतिज्ञा करते हैं कि, 'हम आपस में नही लड़ेंगे और इस देश की सभी आदिवासी तथा अन्य शोषित जनता के साथ मजबूत एकता क़ायम करेंगे।`
जनता की संस्कृति को पतनशील बनाने वाले सरकारी पर्यटन को बंद करो !

दण्डकारण्य का अविभाजित बस्तर 'छत्तीसगढ़ कश्मीर` के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में घने जंगल विशिष्ट वनस्पतियां, पक्षियों की विशिष्ट प्रजातियां, जल प्रपात, प्राचीन गुफायें , मानव ऐतिहासिक प्रगति को समझने में सहायक मूल्यवान प्राचीन निर्मितियां, मंदिर तथा धार्मिक प्रचार केंद्र्र पाये जाते हैं। इस क्षेत्र का हस्तशिल्प विश्व विख्यात है। भारत तथा विदेशों से कई पर्यटक यहां घूमने आते हैं । विभिन्न मानव समुदायों के आपसी विकास को समझने के लिए ये सब सहायक हैं। शोषक सरकार का एक मात्र महत्वपूर्ण काम यहां गलाकाट प्रतियोगिता करके रुपये को डॉलर में तब्दील करना है। इन खूबसूरत जगहों को राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव सुरक्षागृह, बाघ संरक्षण केंद्र आदि जैसे नाम दिये गये हैं। पर्यटकों को लुभाने के लिए इनके बारे में अभूतपूर्व तरीके से प्रचार प्रसार किया जाता है। मौज मस्ती भरी सुविधा प्रदान करने के लिए यहां सितारा होटल तथा अन्य सैरगाह भवनों का निर्माण किया जा रहा है। सरकार इसकी स्वयं सबसे बड़ी प्रर्वतक है।

राज्य हिंसा के खिलाफ विद्रोही जनता

1980 तक हमारा जीवन असहनीय था। हमें क्रूर राज्य के दमन का सामना करना पड़ता था। हमें पूरी दुनिया से कटकर अपनी सीमित दुनिया में जिंदा लाश बनकर रहना पड़ता था। बिना किसी विकास के शोषण , दमन तथा जमींदारों, साहूकारों, ठेकेदारों, बड़े पूंजीपतियों, सरकारी अधिकारियों तथा अपराधियों की अधीनता के कारण हमारा श्रमयुक्त जीवन बरबाद हो गया था। इन सब मामलों के लिए 1980 हमारे जीवन का अहम मोड़ था । मनुष्य के रूप में अभिमान के साथ अपना सर उठाकर कैसे जिया जाय हमने सीखा और इतिहास में पहली बार संगठित होने लगे। भारी संख्या में आदिवासी महिला और पुरुष जनसंगठनों से जुड़ने लगे। एक अलग महिला संगठन का निर्माण किया गया। हजारों गांवों में संगठन बनने लगे। सैकड़ों सदस्यों वाले संगठन विभिन्न स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका में आए। पचास हजार से ज्यादा की सदस्यता के साथ महिला संगठन की इकाई काम कर रही है।

ऐसा एक भी संघर्ष नहीं है जिसको हम संगठित महिलाओं ने नहीं लड़ा हो। सामाजिक और राजनीतिक तथा दैनिक जीवन से जुड़े कई मुद्दों के लिए हमने संघर्ष किया। इनमें से कई में हमने सफलता हासिल की। महिला और पुरुष बराबर हैं, समान मजदूरी के लिए समान भुगतान, महिलाओं पर पितृसत्तात्मक हिंसा बंद करो आदि नारों के साथ हमने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष किया। परिणामत: हमारे क्षेत्र में महिलाओं को संपत्ति में बराबर की भागीदारी तथा समान काम के लिए समान भुगतान मिलने लगा। अब महिलाओं पर पहले जैसा अत्याचार हिंसा तथा अधीनता नहीं है। घरेलू हिंसा में बहुत कमी आई है। महिलाओं की राय का सम्मान किया जाने लगा है। ग्रामीण समाज में लिए जानेवाले सभी निर्णयों में महिलओं की भागीदारी होने लगी है। लेकिन यह सारे परिवर्तन इच्छाविहीन रहकर नहीं हुए हैं। दंडकारण्य में होनेवाला प्रत्येक बदलाव लड़ाई के बाद ही हासिल किया गया है। इस संघर्ष प्रक्रिया में हमें टाडा और पोटा जैसे कुख्यात दानवी कानूनों के अंतर्गत बहुत परेशान किया गया। हम अभी भी इनसे जूझ रहे हैं। एक निर्दोष आदिवासी महिला पौड़ीबाई (मशेली, देवोरिथा, गोंदिया जिला, महाराष्ट्र) को टाडा के अंतर्गत पकड़ा गया और छह साल तक जेल में सड़ाया गया। छूटने के कुछ दिन बाद ही बीमारी के कारण उसने दम तोड़ दिया। इन शोषक सरकारों के द्वारा आदिवासियों के साथ कैसे क्रूर व्यवहार किए जाते हैं यह इस तथ्य से आसानी से समझा जा सकता है कि कैसे झूठा आरोप साबित करके चैतीपल्लो नामक महिला को उम्र कैद दी गई जो पहली महिला उम्रकैदी थी। वह महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के भैरमगढ़ ताल्लुका के मल्लमपुदुर गांव की रहनेवाली थी। धूर्त पुलिस ने दावा किया कि निर्दोश चैतीपल्लो 1991 में लाहिड़ी पुलिस थाने पर आक्रमण में शामिल थी। परिणामस्वरूप टाडा न्यायालय द्वारा अक्टूबर 2004 में फैसला सुनाया गया जिससे उन्हें अपने एक वर्ष छोटे बच्चे के साथ 18 साल तक सीखचों के पीछे रहने को बाध्य किया गया।

गिरफ्तारी और कैद के अलावा महिलाओं को पुलिस को अन्य कई घृणित हिंसाओं का सामना करना पड़ता है। प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न तथा मानसिक उत्पीड़न आदि आंदोलनरत इलाकों की महिलाओं के लिए सामान्य बात बनती जा रही है। इतना ही नहीं जिन चार महिलाओं ने अन्य महिलाओं का विश्वास हासिल किया तथा जो नेतृत्वकारी भूमिका में थी उन्हें देवरी पुलिस द्वारा 1993 में गिरफ्तार किया गया था तब से आज तक वे गायब हैं। संघर्षरत महिलाओं को गोलीबारी में मार देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। दिसंबर 2002 के अंत में हजारों आदिवासी महिला तथा पुरूषों ने अपनी महत्वपूर्ण मांगों के लिए पर्णशाला (खमाम जिला आंध्रप्रदेश) की सड़कों पर प्रर्दशन किया। खूंखार आंध्रप्रदेश पुलिस ने उनपर गोली चलाई जिसमें कुछ प्रदर्शनकारी मारे गये थे। जो महिलाएं पुलिस की क्रूरता तथा अत्याचारों का विरोध करती हैं उन्हें मार दिया जाता है और प्रचारित किया जाता है कि उन्होंने नक्सलियों को मार गिराया है। बारहवीं लोकसभा चुनाव के पहले मार्च 2004 में दांतेवाड़ा के भैरमगढ़ के ब्लॉक पल्ले गांव की बुदिरी के साथ पुलिसवालों ने बलात्कार किया और फिर उन्हें मार डाला। इससे दुनिया के सामने संसदीय लोकतंत्र का असली चेहरा बेशर्मी से उजागर हुआ। युवतियां इस तथ्य को जानती हैं कि राज्य हिंसा हम पर फासीवादी तरीके से थोपी जा रही है जबकि राज्य शांति व अहिंसा के मंत्रों का उपदेश भी दे रहा है और खोखला गांधीवाद खाली हाथों से पराजित नहीं किया जा सकता। इसके लिए दंडकारण्य सश संघर्ष के अंग के रूप में हथियार उठाना ही होगा। वे (दंडकारण्य के) लोग हमारे समर्थन में दृढ़ता से खड़े हैं। हम उनकी बहादुरी का अभिवादन करते हैं। उनके बलिदान 'आधा आकाश हमारा है` की खुशियां ला रहे हैं। दंडकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन को पूरी तरह छिन्न भिन्न करने का प्रयत्न-जो गिरफ्तारी, अत्याचार, हिंसा, कत्ल, गुमशुदगियां आदि से प्रमाणित होता है, हमारे आंदोलन को नहीं रोक सकता। जून 2005 में सेना द्वारा दमन की शुरूआत हुई थी जो 'सफाई अभियान` के रूप में जाना जाता है। वह अभी भी चल रहा है उसका नाम है सल्वा जुडूम।

सल्वा जुडूम
सल्वा जुडूम 18 जून 2005 को आरंभ किया गया था। तब से ही आदिवासी लोगों को मारा जा रहा है। मीडिया के द्वारा इसे गलत और व्यापक तरीके से प्रचारित किया गया कि यह एक स्वत: स्फूर्त शांति मार्च है। शासक वर्ग संपूर्ण विश्व को पूरी तरह से एक अलग तस्वीर दिखा रहा है कि गांधी जी के रास्ते के अनुसार इस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ यह शांतिपूर्ण क्रांति है। एक वर्ग को उखाड़ने तथा उसकी राजनीतिक ताकत को छीनने के लिए एक वर्ग द्वारा युद्ध किया जा रहा है। दंडकारण्य के निर्माण के इतिहास का अध्ययन वर्गसंघर्ष के इतिहास का अध्ययन है। हम जब तक इसको नहीं समझेंगे सेना, पुलिस, अर्धसैनिक बल भारतीय सरकार के प्रमुख विभागों के उच्चाधिकारी, सरकारी अधिकारी, मंत्रालय, विपक्षी कांग्रेस पार्टी के शांति व हिंसक तरीकों द्वारा चलाये जा रहे इस दमन अभियान को नहीं समझ सकते। वास्तव में यह एक दमनकारी सैन्य अभियान है। यह जनता का सामूहिक संहार है। यह आखिर दंडकारण्य में ही क्यों हो रहा है?

वर्तमान समय में दंडकारण्य के बारे में बात करने का तात्पर्य है भ्रूण रूप में उभरती जनता की शक्ति के बारे में बात करना। दंडकारण्य के बारे में जानने का मतलब है हर जगह स्थानीय सामंती वर्चस्व के खिलाफ जनता द्वारा सर्वाधिक जनवादी तरीके से संपूर्ण आजादी के साथ एक नये विकल्प की तथा एक नई व्यवस्था के निर्माण के बारे में जानना। इसको (सल्वा जुडूम को) को पीछे से भारत के बड़े पूंजीपतियों का सहयोग मिल रहा है। यह समस्या उनके तात्कालिक एजेेंडा से संबंधित हितों से जुड़ी है इसलिए सल्वा जुडूम की शुरूआत हुई। जो मानवाधिकार संगठन हमारे क्षेत्र में आए सभी ने पर्याप्त प्रमाण दिखाया कि सल्वा जुडूम का मतलब हत्या, अत्याचार, लोगों को जिंदा जलाना, महिलाओं पर क्रूर आक्रमण, शोषण , संपत्ति का नुकसान, खेती तथा घरों का जलाना है। लगभग सौ साल पहले भूमकाल विद्रोह (1910) के दमन के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा भेजी गई मद्रास रेजीमेंट के भयंकार उत्पात मचाने तथा नरसंहार करनेवाले लोग अभी भी बचे हैं। बच्चों और बूढ़े लोगों को भी नहीं बखशा गया है। गर्भवती महिलाएं मारी जा रही हैं। इस दमन अभियान में महिलाओं को क्रूर दमन का सामना करना पड़ रहा है। बलात्कार के अलावा ऐसी महिलाओं की संख्या-जो अपने पति को खो चुकी हैं और बच्चों को जन्म दे रही हैं-में लगातार वृद्धि हो रही है। अनाथ बच्चों की संख्या बढ़ रही है। पिछले आठ महीने में लाइसेंसधारी गुंडों (पुलिस) तथा सल्वाजुडूम के गुंडों द्वारा सौ से भी ज्यादा महिलाओं का बलात्कार किया गया है। स्थानीय पुलिस द्वारा अतिरिक्त बल के साथ मिलकर विस्तृत पैमाने पर पुलिस शिविर लगाया गया है। इन शिविरों में जिन्हें नक्सलवादियों द्वारा प्रभावित लोगों के लिए राहत शिविर के नाम से जाना जाता है उनके (पुलिस तथा सल्वाजुडूम के गुंडों) आक्रमण से डरे हुए लोग रह रहे हैं। ये शिविर यातना शिविरों की याद दिलाते हैं। इन शिविरों में कई औरतों का बलात्कार किया गया है और अब वे गर्भवती हैं। अब तक अठारह सौ घरों को जलाया जा चुका है। चार करोड़ से ज्यादा की लघु संपत्ति का (मुर्गियां, बकरी, घर, खेती आदि) नुकसान हो चुका है और 150 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। सल्वा जुडूम के नाम पर यह विध्वंस हमारी कोया समुदाय को पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए है। वे हमारी झोपड़ियों से शांति , खुशहाली, संबंध, सहयोग, आदर और न्याय को बर्बाद कर रहे हैं। हम अपनी यातना, त्रासदी, क्रोध, अन्याय, बर्बरता और कठिनाइयों के साथ बचे हुए हैं। अब आप हमारी झोपड़ियों से कर्सद गीत (मृत्युगान) के अलावा कोई दूसरा गीत नहीं सुन सकते। आप केवल वही साज सुन सकते हैं जो हम अंत्येष्टि संस्कार के समय बजाते हैं। आप केवल वही नृत्य देख सकते हैं जो मृत्यु के बाद लोगों को श्रद्धांजलि देते समय किया जाता है। यह एक भयावह स्थिति है। इनसे बाहर आने के लिए हमारे पास अपने युद्ध को और तेज करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। वर्तमान में हम पूरी तरह युद्ध में व्यस्त हैं। हमारे शरीर दुश्मनों की गोलियों से छलनी हैं। हमारे गिरते हाथों से हथियार लेने के लिए प्रत्येक दिन नई शक्तियां उभर रही हैं जबकि दुश्मन हमारे भाई और बहनों का मानवीय कवच के रूप मे इस्तेमाल कर रहा है और उन्हें मार दे रहा है। हम उनके बलिदान हुए चेहरे के सामने कसम खाते हैं कि हमारा युद्ध नहीं रूकेगा। २२ नवंबर को पेड़ाकोरमा में कामरेड बुदिरी की मौत हो गई। जब पुलिस ने उन्हें मानवीय सुरक्षा चक्र के लिए इस्तेमाल किया। वह चार बच्चों की मां थी। हम उन्हें क्रांतिकारी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस जनयुद्ध में लगे लोगों को बचाने में लगे अपने बच्चों को हम विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अपनी जान गंवा दी। इस युद्ध में बहुत सारे लोग घायल हुए हैं। उनके लिए दवाई और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी हो रही है। हमारी परंपरागत कोया आयुर्वेदिक चिकित्सा उपचार की मुख्य दवा है जो लोगों केा बचा रही है। हम महिलाएं कुछ अतिरिक्त समस्याओं से जूझ रही हैं। इन अक्रमणों के दौरान हम बचपन से प्रौढ़ावस्था तक की सारी समस्याओं को सुलझा रही हैं। युद्ध हमें सब कुछ सिखा रहा है। हमें इस बात की खुशी है कि यह सेमीनार इस वक्त हो रहा है और इस विचार को खारिज कर हो रहा है कि महिलाओं की प्रकृति युद्ध के खिलाफ है। युद्ध हमारे जीवन का रास्ता बन गया है। हमारे क्षेत्र में आइए, हमारे साथ सहयोग करिए, हम सब मिलकर लड़ाई लड़ेंगे, हमारे दुश्मन एक हैं, हमारे उद्देश्य एक हैं, हमारे संघर्ष, हमारे रास्ते एक ही हैं।
(अंग्रेजी से अनुवाद : अनामिल)
(17-18 मार्च, 2007 को रांची में ' क्रांतिकारी आदिवासी महिला मुक्ति मंच` के सेमिनार में प्रस्तुत)

डा.विनायक सेन की ओर से जस्टिस कृष्‍णा अय्यर की प्रधानमंत्री के नाम अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/19/2009 09:19:00 PM

डा. विनायक सेन की रिहाई के लिए जस्टिस कृष्‍णा अय्यर की 17 अप्रैल 2009 को प्रधानमंत्री के नाम एक अपील जारी हुई है। हिन्‍दू में इस अपील का मुख्‍य अंश छपा था। इसका मैंने हिन्‍दी में अनुवाद करके अपने ब्‍लॉग अन्दर की बात पर डाला है। आप देखें और चाहे तो नेट पर डाल सकते हैं।

कपिल स्वामी

कपिल भाई को शुक्रिया के साथ उनके ब्लॉग से यह पोस्ट


मैं आपका ध्‍यान एक बेहद अन्‍यायपूर्ण मामले की ओर दिलाना चाहता हूं जोकि भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है : यह मामला है सुविख्‍यात बालरोग विशेषज्ञ और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले डा. विनायक सेन का।

इस कुशल डॉक्‍टर को लगभग दो वर्षों से रायपुर जेल में और फिलहाल छत्तीसगढ़ राज्‍य जनसुरक्षा अधिनियम, 2005 के अन्‍तर्गत कारावास में बन्‍दी बनाकर रखा गया है। डा. सेन जोकि ग्रामीण गरीब आबादी के बीच अपने सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य के कामों की बदौलत पूरी दुनिया के पैमाने पर जानेमाने ख्‍यातिप्राप्‍त डॉक्‍टर हैं, के खिलाफ ''राजद्रोह और राज्‍य के विरुद्ध युद्ध छेड़ने'' के आरोप लगाये गये हैं।

छत्तीसगढ़ के लोक अभियोजक ने दावा किया है कि विनायक ने, एक अपुष्‍ट षड्यंत्र के हिस्‍से के तौर पर, एक वरिष्‍ठ माओवादी नेता नारायण सान्‍याल, जोकि रायपुर जेल में हैं, की ओर से कई पत्र एक स्‍थानीय व्‍यवसायी को दिये, जिसके कथित रूप से वामपंथी-दुस्‍साहसवादियों से संबंध थे। ऐसा कहा गया है कि विनायक द्वारा यह काम जेल में सान्‍याल से एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई बीमारियों के लिए उनका इलाज कर रहे एक डॉक्‍टर, दोनों के तौर पर मिलने के दौरान किया गया।

हालांकि डा. सेन के मुकदमे, जोकि रायपुर सेशन कोर्ट में अप्रैल 2008 के अंत में शुरू हुआ था, में उनके खिलाफ लगाये गये इन आरोपों को सही साबित करने वाले साक्ष्‍यों का छोटे से छोटा हिस्‍सा भी प्रस्‍तुत नहीं किया जा सका है। मूल आरोपपत्र के हिस्‍से के तौर पर गवाही देने के लिए 83 गवाहों की सूची मार्च 2009 में अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्‍तुत की गयी थी, जिसमें से 16 का नाम स्‍वयं सरकार ने वापस ले‍ लिया, और छह लोगों को 'प्रतिकूल' घोषित कर दिया गया, जबकि 61 लोगों से डा. सेन के खिलाफ किसी भी आरोप की पुष्टि करवाये बगैर गवाही दिलवा दी गयी। डा. सेन के खिलाफ मामले के गुण-दोषों की चर्चा न भी की जाये, तो भी अभी तक चलाये गये मुकदमे की कार्रवाई के तरीके के कई पहलू बेहद विक्षोभजनक हैं।

इतना सब पर्याप्‍त न मानते हुए, डा. सेन की जमानत पर रिहाई की अपील विलासपुर उच्‍च न्‍यायालय द्वारा बार-बार (सितंबर 2007 में और दिसंबर 2008 में) अस्‍वीकार कर दी गयी। और उच्‍चतम न्‍यायालय ने उनकी रिहाई की प्रार्थना के लिए स्‍पेशल लीव पेटिशन पर सुनवाई करते हुए उसे ठुकरा दिया।

अभी तक डा. सेन के मुकदमे में साक्ष्‍यों की कमी को ध्‍यान में रखते हुए रायपुर न्‍यायालय को पूर्ण निष्‍पक्षता के साथ तत्‍काल उनके खिलाफ पूरे मुकदमे को रद्द कर देना चाहिए। निश्चित रूप से अभियोजन पक्ष की स्थिति की कमजोरी उन्‍हें कम से कम जमानत पर रिहा होने का हकदार बना देती है। डा. सेन अपने पूरे शानदार कैरियर के दौरान त्रुटिहीन व्‍यवहार के रिकार्ड के साथ, अन्‍तरराष्‍ट्रीय स्‍तर के और सम्‍मानित व्‍यक्ति हैं। मई 2008 में एक अभूतपूर्व कार्रवाई के तहत 22 नोबेल पुरस्‍कार विजेताओं ने उन्‍हें 'पेशेवर सहकर्मी' बताते हुए और उनकी रिहाई की मांग करते हुए एक सार्वजनिक वक्‍तव्‍य पर हस्‍ताक्षर भी किये थे।

सामान्‍य तौर पर जमानत देना उन्‍हीं मामलों में अस्‍वीकार किया जाता है जहां न्‍यायालय को लगता है कि आरोपी साक्ष्‍यों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है, गवाहों को पूर्वाग्रहित कर सकता है या भाग सकता है। डा। सेन के मामले में इनमें से कोई भी वजह लागू नहीं होती है, जैसा कि इस सामान्‍य तथ्‍य से पता चलता है कि उनकी गिरफ्तारी के समय उन्‍होंने अपनी संभावित कैद के बारे में जानते हुए भी छत्तीसगढ़ पुलिस के पास स्‍वेच्‍छा से आने का रास्‍ता चुना और भागने की कोई कोशिश नहीं की।

आज डा. सेन जो मधुमेह के रोगी हैं और अति रक्‍त दाब (हाइपरटेंसिव) के रोगी भी हैं, को अपने हृदय की बिगड़ती जा रही स्थिति के चिकित्‍सकीय इलाज की अत्‍यावश्‍यक आवश्‍यकता है। हाल के सप्‍ताहों में उनका स्‍वास्‍थ्‍य बहुत गिर गया है और उनकी जांच के लिए न्‍यायालय द्वारा नियुक्‍त डॉक्‍टर ने अनुशंसा की है कि उन्‍हें कोई भी देरी किये बिना एंजियोग्राफी, और यदि आवश्‍यक लगे तो संभवत: एंजियोप्‍लास्‍टी करवाने के लिए वैल्‍लोर स्‍थानांतरित कर दिया जाना चाहिए।

उनके सामाजिक योगदान को मान्‍यता देने की बजाय भारतीय राज्‍य ने, डा. सेन और उनकी तरह मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कई लोगों पर गलत ढंग से 'आतंकवादी' होने का ठप्‍पा लगाकर न केवल लोकतांत्रिक नियमों और निष्‍पक्ष शासन को बल्कि अपनी संपूर्ण आतंकवाद विरोधी रणनीति और कार्य को भी पूर्ण रूप से विद्रुपता का विषय बना दिया है।

जमानत का बार-बार अस्‍वीकार किया जाना, जिसका नतीजा 'मुकदमे द्वारा दंड' होता है, भारतीय समाज के लिए एक ज्‍यादा बड़ा खतरा है। इस मामले में हो रहा सरासर अन्‍याय साधारण नागरिकों में भारतीय लोकतंत्र की साख और प्रभाविता के बारे में खुद-ब-खुद केवल उदासीनता पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं करेगा।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें