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अमेरिकी बम और फरीदकोट के बच्चों की विकलांगता

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/30/2009 03:51:00 PM


सुभाष गाताडे
बड़ा सिर, आंखें बाहर निकली हुईं और टेढ़-मेढ़े हाथ-पैर जो शरीर संभालने लायक भी नहीं हैं। यह किसी वीडियोगेम का नहीं बल्कि पंजाब के सीमावर्ती जिले फरीदकोट में पैदा हो रहे नवजात बच्चों का वर्णन है जिनकी तादाद यहां अचानक बढ़ती दिख रही है। फरीदकोट के बाबा फरीद सेन्टर फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन के प्रमुख पृथपाल सिंह इससे चिंतित हैं। कुछ समय पहले जिले के दौरे पर आए दक्षिण अफ्रीका के टॉक्सिकॉलोजिस्ट डॉ कारिन स्मिथ ने इस पहेली को सुलझाने में उनकी थोड़ी मदद की। उन्होंने बच्चों के बाल के नमूने जर्मन प्रयोगशाला में भेजे। जांच के परिणाम विचलित करनेवाले थे। पता चला कि विकलांगता में आयी तेजी का कारण इन बच्चों में पायी गयी यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा है। जांच चल रही है कि यूरेनियम के अवशेष प्राकृतिक संसाधनों से हैं या किसी अन्य कारण से। प्रश्न है कि एक ऐसे क्षेत्र में, जहां यूरेनियम के प्राकृतिक स्रोत न हों, वहां बच्चों के खून में यह कहां से आ रहा है? क्या इसका रिश्ता अफगानिस्तान से वहां पहुंचनेवाली हवाओं से जोड़ा जा सकता है जहां युद्ध के मैदान की धूल में मौजूद यूरेनियम के कणों ने बच्चों को प्रभावित किया हो। एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में अप्रैल माह में इस सिलसिले में एक लम्बी स्टोरी छपी थी जिसमें कहा गया था कि पंजाब की जनता अफगानिस्तान और इराक युद्धों का खामियाजा भुगत रही है। इन युद्धों में अमेरिका व उसकी सहयोगी सेनाओं ने जिस नि:शेष यूरेनियम का प्रयोग किया, वही बच्चों की विकलांगता की जड़ में है। गौरतलब है कि सात अक्टूबर 2001 को अफगानिस्तान पर हमला हुआ और सेंटर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट यही बताती है कि प्रभावित बच्चों की तादाद ‘विगत छह सात सालों में तेजी से बढ़ी है।’ जाहिर है जब अफगानिस्तान से तीन सौ किलोमीटर दूर स्थित पंजाब के बच्चों पर इसका असर देखा जा सकता है तो बीच में पड़नेवाले पाकिस्तान के नवजात बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे होंगे। हथियार बनाने के लिए संवर्द्धन की प्रक्रिया से गुजरने या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होने के बाद यूरेनियम का जो हिस्सा बचता है उसे नि:शेष या डिप्लीटेड यूरेनियम कहते हैं। यह अपने ठोस रूप में विकिरणधर्मी (रेडियोएक्टिव) और काफी भारी होता है। हथियारबन्द वाहन जैसे टैंकों की मोटी दीवारों को भी छेद सकने की इसकी क्षमता के कारण सेना में इसकी काफी अहमियत है। किसी भी मोटी दीवार मसलन टैंक को छेदने के बाद वह विस्फोट करता है और उससे बादलनुमा धुआं उठता है। वह जब ठंडा होता है तो धूल के रूप में जम जाता है। यह धूल न केवल रासायनिक तौर पर जहरीली होती है बल्कि विकिरण भी फैलाती है। सांस के रास्ते अन्दर जाने पर वह खतरनाक हो सकती है। वास्तविक खतरा उसके रसायन से होता है जो जहरीला होता है। हालांकि उसके विषैले होने बारे में वैज्ञानिक तौर पर प्रामाणिक सबूत अभी सामने नहीं आये हैं। एक मई, 2008 को बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के ‘वन प्लेनेट प्रोग्राम’ में काबुल और कंधार के डॉक्टरों को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि किस तरह पिछले दो सालों में बाल जन्म विकलांगता के मामले लगभग दुगुने हुए हैं। जैसे कहीं शरीर के अवयव टेढे-मेढ़े हैं तो कहीं सर सामान्य से छोटा या बहुत बड़ा दिख रहा है। अलबत्ता जॉर्ज बुश हुकूमत ने इस मामले में अपने आप को निर्दोष साबित करने की कोशिश की थी, लेकिन प्रोग्राम में ही कनाडा स्थित यूरेनियम मेडिकल रिसर्च सेन्टर के हवाले से बताया गया था कि इसका कारण नि:शेष यूरेनियम हो सकता है। वर्ष 2002-2003 में इस सेंटर ने अफगान नागरिकों के मूत्र की जांच की थी और कई मामलों में उसकी मात्रा इराक युद्ध में लड़े सैनिकों की तुलना में सौ गुना अधिक पायी गई थी। इराक पर कब्जे के बाद वहां प्रतिरोध का केन्द्र बने फालुजा पर भी अमेरिकी सेनाओं ने 2004 में जबरदस्त बमबारी की थी। फालुजा में जन्मे बच्चों में इसी तरह की विकलांगता दिखने पर नवम्बर 2005 में अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन को स्वीकारना पड़ा कि उसने इन हमलों में श्वेत फास्फोरेस और नि:शेष यूरेनियम से बने बारूद का इस्तेमाल किया है। यह अलग बात है कि अमेरिका के तमाम दावे झूठे साबित हुए लेकिन इसी तरह के हथियार इराक में मौजूद होने को लेकर अमेरिका ने दुनिया भर में काफी शोरगुल मचाया था। अमेरिकी रेडिएशन स्पेशलिस्ट ल्युरेन मोरेट के मुताबिक अगर हम वर्ष 1991 के बाद का आकलन करें तो अमेरिका ने डिप्लेटेड या नि:शेष यूरेनियम से बने हथियारों से वातावरण में नागासाकी में फेंके गए एटम बमों की तुलना में चार लाख गुना अधिक विकिरणधर्मिता (रेडियोएक्टिव एटॉमिसिटी) भेजी है। प्रश्न है कि अफगानिस्तान से चलनेवाली इन जहरीली हवाओं के जहर के मामले में तमाम राजनीतिक संगठन, अन्य जनपक्षीय जमातें या बुद्धिजीवी क्यों मौन हैं.

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बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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