हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

अमीर धरती के गरीब लोगों का गुस्सा

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/29/2009 04:49:00 PM


सुनीता नारायण

भारत का नक्शा उठाइए और उन जिलों पर निशान लगाइए जहां वन संपदा उपलब्ध है और जहां पेड़ों का भरापूरा और सघन आवरण मौजूद है। उसके बाद उन पर उन नदियों और धाराओं को चिह्नित कीजिए जिनसे हमें और हमारी जल संपदा को जीवन मिलता है। फिर उन पर खनिज भंडारों की खोज कीजिए। इन भंडारों में लौह अयस्क, कोयला, बाक्साइट और वे सभी खनिज शामिल हैं जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था समृद्ध होती है। पर यहीं मत रुकिए। इस संपदा के ऊपर एक और सूचकांक को चिह्नित कीजिए। वहां उन जिलों की निशानदेही कीजिए जहां हमारे देश के सबसे गरीब लोग रहते हैं। वे सब हमारे आदिवासी जिले हैं। यहां आपको एक संपूर्ण तालमेल मिलेगा।

धरती के सबसे समृद्ध इलाके में सबसे गरीब लोग रहते हैं। अब आप देश की इस श्रेणी वाले हिस्से को लाल रंग से घेर दीजिए। यही वे जिले हैं जहां नक्सलवादी घूमते रहते हैं। इन्हीं जिलों के बारे में सरकार मानती है कि वहां उन्हें अपने ही लोगों से युद्ध लड़ना पड़ रहा है। क्योंकि वे आतंक फैलाने और मारने के लिए बंदूक उठा चुके हैं। खराब विकास के इस सबक को हमें ध्यान से समझना चाहिए।

आइए इस मानचित्र में पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं को पिरोएं। मधु कोड़ा झारखंड राज्य के करीब एक साल तक मुख्यमंत्री थे। वह राज्य खनिज और वन संपदा से समृद्ध है पर वहां के लोग गरीब हैं। आज जांच एजंसियों को पता चला है कि वहां सारे घोटालों का बाप मौजूद है। उन्होंने वहां मधु कोड़ा और उनके सहयोगियों के पास से चार हजार करोड़ का घोटाला पकड़ा है। उन्होंने राज्य को लूट कर अपनी अकूत संपत्ति बनाई थी। इतनी बड़ी राशि का घोटाला राज्य के सालाना बजट का पांचवां हिस्सा है। उससे भी बड़ी बात यह है कि यह घोटाला उन खनिजों के माध्यम से किया गया है जिन्होंने अपनी जनता को कभी समृद्ध नहीं बनाया।

यह मामला यहीं खत्म नहीं होता। इसका सिलसिला देश की दूसरी घटनाओं से भी जुड़ता है। पिछले हफ्ते जब कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने मुख्यमंत्री को हटाने के लिए सरकार को घुटनों के बल ला दिया था तब हम इस घटना को भारत के सूचना मानचित्र यानी कारटोग्राफी से नहीं जोड़ पाए थे। यह खेल रेड्डी बंधुओं का था। इनमें से एक गाली जनार्दन रेड्डी बीएस येदुरप्पा सरकार में पर्यटन मंत्री और दूसरे गाली करुणाकर रेड्डी राजस्व मंत्री हैं। वे दोनों खनन क्षेत्र के दिग्गज हैं। उनकी संपदा और सत्ता कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के इसी तरह से अमीर-गरीब जिलों में विनाशकारी खनन से पैदा होती है।

इन रेड्डी बंधुओं की रियासत बेल्लारी जिले में है जहां से देश के लौह अयस्क का 20 फीसदी हिस्सा पैदा होता है। यहां होने वाली अयस्क की खुदाई में पर्यावरण सुरक्षा का बहुत कम या बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता। खदान से होने वाले उत्सजर्न के कारण इस इलाके का पानी लाल हो गया है। यहां की जमीन खोखली हो गई है, जंगल गायब हो गए हैं और लोगों की आजीविका तबाह हो गई है। दूसरी तरफ बेल्लारी में सबसे ज्यादा निजी विमान पंजीकृत हैं। इसके विपरीत यह मानव विकास सूचकांक के लिहाज से कर्नाटक में नीचे से तीसरे नंबर पर आता है। इसकी साक्षरता दर सिर्फ पचास प्रतिशत है जो कि अपने को प्रगतिशील राज्य बताने वाले कर्नाटक के लिए शर्मनाक है। रेड्डी बंधुओं की अमीरी का राज उस इलाके की असाधारण संपदा है जिसे हम अभी भी गरीब कहते हैं। ऐसे में हमें उस समय क्यों आश्चर्य होता है जब अपनी जमीन की लूट के साक्षी लोगों की नाराजगी का फायदा नक्सलवादी उठाते हैं?

दिक्कत यह है कि हमने उन लोगों के साथ संपदा बांटने के विचार को कभी गंभीरता से नहीं लिया जिनकी जमीन का हम इस्तेमाल करते हैं। जंगलों का ही मामला लीजिए। देश के सघन और जैव विविधता से भरे जंगलों का 60 फीसदी हिस्सा उन्हीं आदिवासी जिलों में ही पाया जाता है। यहीं शानदार बाघ भी पाए जाते हैं। वही सवाल फिर उठता है कि अगर वहां असाधारण संपदा है तो वहां रहने वाले लोग गरीब क्यों हैं?

सच्चाई यह है कि हमने प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित माडल कभी बनाया ही नहीं। ऐसा माडल जो कि टिकाऊ हो और स्थानीय अर्थव्यवस्था और लोगों के लिए फायदेमंद हो। विकास का पहला चरण वह था जब सरकार जंगलों से लाभ लेती थी और उनका दोहन करती थी। बड़े इलाके को कागज और लुगदी उद्योग को सौंप दिया गया। वह स्थिति वैसी ही थी जैसी आज खनिजों के साथ हो रही है। घने जंगलों के इलाके के इलाके काटे जा रहे हैं और आर्थिक संपदा तैयार करने के नाम पर घरती का चीरहरण किया जा रहा है। लेकिन इसमें से स्थानीय लोगों की कोई भागीदारी नहीं की जा रही है। इन्हीं जंगलों के आधार पर सरकारें और निजी कंपनियां अपनी संपदा का निर्माण कर रही हैं। लेकिन इससे स्थानीय लोगों का कोई विकास नहीं किया जा रहा है।

उसके बाद संरक्षण का दौर शुरू हुआ। राष्ट्र ने वनों के संरक्षण का फैसला किया। कहा गया कि बाघ और अन्य वन्य जीवों की हिफाजत की जानी है। लेकिन इस बार भी ऐसा आर्थिक माडल नहीं बनाया गया जिसमें संरक्षण का लाभ लोगों को दिया जाता। सरकार ने जनता को फिर हाशिए पर डाल दिया। मान्यता थी कि जंगलों की रक्षा स्थानीय लोगों की मदद से की जाएगी। आज इन इलाकों में लोगों की तरफ से हिंसा का सहारा लेने के पीछे एक मात्र कारण यह है कि 1980 के वन अधिनियम को ठीक से लागू न किया जाना। यह कानून वन भूमि को गैर वनीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं देता जो कि कई मामलों में सही भी है। इसी नाते लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है।

आज एक तरफ खदानों, विद्युत या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जंगल साफ किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को स्कूल, पानी की टंकी या संपर्क मार्ग के लिए थोड़ी सी जमीन भी नहीं दी जा रही है। उससे भी बुरी बात यह है कि जंगलों की संपदा को उनकी अर्थव्यवस्था के लिए कभी इस्तेमाल नहीं किया जाता। उन्हीं की पीठ पर और उन्हीं की जमीन पर बाघों का संरक्षण होता है पर उन्हें कोई फायदा नहीं होता। क्या उनके गुस्से पर अभी भी हैरानी होनी चाहिए? यह स्थिति बदलनी चाहिए और उसकी गुंजाइश भी है।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 4 टिप्पणियां: Responses to “ अमीर धरती के गरीब लोगों का गुस्सा ”

  2. By Suman on December 29, 2009 at 6:51 PM

    nice

  3. By anjeev pandey on December 30, 2009 at 12:03 PM

    सुनीताजी,
    आपने देश की अकूत प्राकृतिक संपदा और वहां के निवासियों की स्थिति को जिस सूक्ष्मता से रेखांकित किया है, वह पूर्णतया सत्य है. नक्सलवाद के फैलाव का इससे सीधा संबंध है। यह सत्य होते हुए भी हमें नक्सलवाद के उस पहलू की ओर भी सोचना है जिसका जिक्र आपने कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं के लिए किया है। नक्सल नेता भी आज वही कर रहे हैं जो प्राकृतिक संपदा से धनी हुए सफेदपोशों ने किया है। एक ने आम जनता का शोषण भ्रष्टाचार कर किया तो दूसरे उसी का शोषण बंदूकें थमाकर कर रहे हैं। क्यों न इस बात पर जोर दिया जाए कि विकास की क्रांति और सशस्त्र विद्रोह का जवाब शस्त्र से ही दिया जाए। दोनों की ही ठोस रणनीति बनाने की आवश्यकता है। तभी कम से कम मानवाधिकार हनन के साथ इन क्षेत्रों में शांति बहाल होगी और विकास के रास्ते खुलेंगे। आपकी टाइगर आयोग वाले रिकमंडेशन्स भी इस ओर कारगर हो सकते हैं।

  4. By राजीव पांडे on December 30, 2009 at 1:41 PM

    अंजीव जी ने सही कहा है. सशस्त्र विद्रोह क जवब शस्त्र से ही दिया जा सकता है. सुनीता जी उनके जैसे माओवादी समर्थकों को भी सम्भल जाना चाहिए...यह शस्त्र उनके खिलाफ़ भी चलाया जा सकता है.
    न नक्सलवाद, न मार्क्सवाद
    सबसे ऊपर राष्ट्रवाद!

  5. By Anil Pusadkar on January 30, 2010 at 11:29 AM

    आप जिन हिस्सों के प्राकृतिक संपदा की बात कर रही हैं ज़रा आकर देखिये जंगल के जंगल साफ़ कर दिये गये हैं।जिस बाघ का आप ज़िक्र कर रही हैं,उसके दिन नही महिनो भटकने के बाद नही दर्शन तक़ नही होते,आखिर वंहा राज किस्का है?जंगलों मे आज भी नक्सलवाद का साम्राज्य है और अगर वंहा से बाघ गायब हो रहे हैं तो कौन कर रहा है?अगर वंहा से सामरिक महत्व के खनिज टिन की तस्करी हो रही है तो कौन कर रहा है?अगर जंगल काटे जा रहे हैं तो किसके इशारे पर काटे जा रहे हैं?बीड़ी पत्ता तोड़ने मे कमीशन खोरी हो रही है तो कौन कर रहा है?इन सवालो के जवाब आप ढूंढेगी तो आप को पता चल जायेगा कि सबसे अमीर धरती पर रहने वाले लोग गरीब क्यों हैं?आप आईये बस्तर और खुली नज़रों से देखिये तो बहुत सी चीज़ें साफ़ नज़र आयेंगी जो कथित मानवाधिकारवादी और समाजसेवी संगठनों के स्पांसर्ड टूर मे कभी नज़र नही आ सकती।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें