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भोपाल गैस कांड : देश की सरकार हत्यारों के साथ खड़ी है

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/02/2009 07:00:00 PM

जब देश की सरकार देशी-विदेशी निगमों के हित में जनता के खिलाफ सेना और वायुसेना उतार रही है, एक कार्पोरेट की लापरवाही, मनमानी और हमारी व्यवस्था के जन विरोधी चरित्र से जुडी जनता की त्रासदी की बरसी को याद करना प्रासंगिक है. इस घटना से जुड़ा हर तथ्य भयावह है-दुर्घटना की वजहें, उसके पीड़ित, उनका हश्र, उनका आन्दोलन, उनकी व्यथा और कुल मिला कर भोपाल गैस त्रासदी-शायद त्रासदी एक गलत शब्द है, क्या यह किसी जनसंहार से कम था और अगर न भी था तो हमारी सरकार के रवैये ने इसे जनसंहार तो बना ही दिया है-हमारे पूरे तंत्र, इसकी प्राथमिकताओं और इसके चरित्र को उजागर करता है. इस घटना को याद कर रहे हैं प्रफुल्ल बिदवई.



भारत में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्होंने लालची निजी उघमियों और कठोर हृदय सरकारों के मिले-जुले संधान के कारण अपने जीवन में इतना ज्यादा विस्थापन और असीम तबाही व बर्बादी झेली है कि वह एक चमत्कार ही है। उन्होंने शासन प्रणाली पर अपना गुस्सा और घृणा उतारने के लिए हिंसक तरीकों का सहारा नहीं लिया है। भोपाल के जिन निवासियों को यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन के कीटाणुनाशक तैयार करने वाले प्लांट से भारी मात्रा में निकले जहरीले रसायनों का घातक प्रभाव झेलना पड़ा था, वे हर लिहाज से इस विशेष श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। उन्होंने बेपनाह दर्द और लंबे समय तक कष्ट भोगा है जिसे कारपोरेट छल-कपट और अफसरशाहों की उदासीनता ने और भी अपमानजनक बना दिया। पच्चीस वर्ष पूर्व भोपाल गैस त्रासदी के कारण हुई मौतों की संख्या पहले सप्ताह में ही 3,000 से बढ़कर 20,000 तक जा पहुंची थी। कार्बाइड प्लांट से निकले जहरीली गैसों के कारण पैदा बीमारियों और विकृतियों से महीने दर महीने कई लोगों की जानें जाती रहीं। 1,00,000 से ज्यादा संभवत: 1,50,000 (सही संख्या किसी को मालूम नहीं, क्योंकि सरकार ने स्वास्थ्य सर्वेक्षणों को अघतन बनाने की तकलीफ ही गवारा नहीं की) अब भी अनेक प्रकार की दुर्बल कर देने वाली बीमारियों से जूझ रहे हैं-जैसे फेफड़े की पुरानी बीमारी, जिगर और दिमाग की विकृतियों के साथ ही मांसपेशियों, शारीरिक ढांचे, पेट की अंतड़ियों और आंखों में पैदा हुई विकृतियां। यूनियन कार्बाइड प्लांट से निकली 40,000 किलोग्राम जहरीली गैसों (जिनमें घातक मिथाइल आइसो साइनेट (मिक) गैस भी शामिल थी) का शिकार बने लोगों में 69 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा के फेफड़ों की क्षमता नष्ट हो गई और अब वे शारीरिक श्रम या ऐसे काम नहीं कर सकते जो सामान्य मानव रोजमर्रा के जीवन में करते हैं। लगभग 10,000 लोगों ने तो चारपाई पकड़ रखी है जिनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं है। एक-चौथाई सदी बीत चुकी है लेकिन भोपाल गैस त्रासदी अब भी जारी है। पीड़ित मानवों के बीमार जिस्मों के अलावा यूनियन कार्बाइड प्लांट के कब्जे वाली लगभग 60 एकड़ भूमि के पांचवें हिस्से से भी अधिक क्षेत्रफल में रासायनिक प्रदूषण और उससे भी अधिक बदतर प्रदूषित भूजल के रूप में, जिसे लोगों को मजबूरन पीना पड़ रहा है, यह अब भी मौजूद है। 1999 से अब तक 10 से भी ज्यादा वैज्ञानिक सर्वेक्षण सरकारी और स्वतंत्र अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए हैं। इनमें ग्रीन प्लेस और विज्ञान तथा पर्यावरण कोड द्वारा किए गए सर्वेक्षण भी शामिल हैं। इन सर्वेक्षणों में पाया गया है कि प्लांट की जमीन में भारी मात्रा में पारा, निकल, तांबा, क्रोमियम, हेक्सा क्लोरो साइक्लोहेक्सीन, क्लोरो बेंजीन और कार्बाराइल कीटाणुनाशक मौजूद हैं। एक सैंपल स्थल पर तो पारे की मात्रा सुरक्षित सीमा से 60 लाख गुना अधिक थी। इनमें से बहुत से रसायन लंबे समय से पर्यावरण में बने हुए हैं। दो नए सर्वेक्षणों का परिणाम घोषित किया जा रहा है। इनमें से एक सर्वेक्षण भारतीय प्रयोगशाला द्वारा किया गया है और दूसरा एक स्विस संस्थान द्वारा। ये सर्वेक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्लांट की मिट्टी और पानी दोनों में बहुत ज्यादा मात्रा में ऐसे रासायनिक प्रदूषणकारी तत्व मौजूद हैं जो केवल कार्बाइड के अवशेषों में ही पाए जा सकते थे लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने सर्वेक्षणों के इन दावों को अपने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जांच-परिणामों का हवाला देते हुए पूरी तरह नकार दिया है। बोर्ड के जांच परिणाम शंकास्पद हैं क्योंकि इसने पानी के सैंपल तक नहीं लिए हैं। प्लांट-स्थल से सैकड़ों टन जहरीला कचरा साफ करने की बजाय राज्य सरकार जनसंपर्क की कवायद द्वारा अपनी छवि साफ करने की फिराक में है। इसके लिए उसने कार्बाइड त्रासदी की 25वीं बरसी पर प्लांट-स्थल को जनता के लिए खोल दिया है। हालांकि राज्य सरकार की यह कार्रवाई मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अक्टूबर 2005 के एक आदेश के खिलाफ है जिसमें कहा गया था कि ‘फैक्टरी परिसर पर सशस्त्र गार्ड तैनात करके उस पर उपयुक्त चौकसी रखी जानी चाहिए ताकि कोई बाहर का व्यक्ति उसमें दाखिल न हो सके। ...इस परिसर को कोई बाग या प्रयोगशाला नहीं माना जा सकता जहां बच्चे आकर खेलते हैं।’ एक तरफ राज्य सरकार कार्बाइड प्लांट की जहरीली विरासत दफन करने पर आमादा है वहीं दूसरी आ॓र केंद्र सरकार यूनियन कार्बाइड के बाद दूसरी सबसे बड़ी रासायनिक कंपनी-अमेरिका की डाऊ केमिकल (जिसने 1999 में 9.3 मिलियन डॉलर में यूनियन कार्बाइड को खरीद लिया था) के लिए लाल कालीन बिछाने को आतुर है। कानूनी तौर पर प्लांट स्थल की सफाई कराने की जिम्मेदारी अब कार्बाइड से डाऊ के पास चली गई हंै। भारत में रसायन तथा उर्वरक विभाग ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में डाऊ पर 100 करोड़ रूपये का प्रारंभिक दावा भी दायर कर दिया था लेकिन डाऊ की दलील है कि उसकी भोपाल पीड़ितों के प्रति कोई देनदारी या जवाबदेही नहीं है और न ही उसकी उस स्थल को साफ करने की कोई जिम्मेदारी बनती है। अलबत्ता, वह उच्चतम स्तर पर केंद्र सरकार में लॉबी प्रचार में जुटी है। उसके चेयरमैन अपना पिंड छुड़ाने के लिए दो बार प्रधानमंत्री से मिल चुके हैं। डाऊ ने अमेरिकी-भारतीय व्यापार परिषद का समर्थन जुटा लिया है जिसने पिछले सप्ताह अमेरिका में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ, मनमोहन सिंह को बधाई देने के लिए आयोजन किया था। उसने एक पुरजोश मित्र के रूप में उघोगपति रतन टाटा का भी साथ हासिल कर लिया है। रतन टाटा ने स्थल को ‘सुधारने’ (साफ करने) के लिए ‘अगवानी करके पैसे का इंतजाम करने’ की पेशकश भी की है ताकि डाऊ भारत में निवेश कर सके। डाऊ की लंबे अरसे से भारत के विकसित होते बाजार पर निगाह रही है। अपने पांव जमाने के लिए उसने बार-बार विभिन्न कंपनियों और आईआईटी संस्थानों के साथ तकनीकी सहयोग करार करने की कोशिश की है लेकिन आईआईटी संस्थानों के सैकड़ों पूर्व छात्रों ने डाऊ की इच्छा का विरोध किया है और तर्क दिया है कि वह उनके कैम्पसों में जाकर वहां के छात्रों की भर्ती नहीं कर सकती। डाऊ ने पुणे के निकट एक अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की भी कोशिश की है। यों जनता के जोशीले विरोध प्रदर्शनों के कारण उसे पीछे हटना पड़ा लेकिन उसने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी हैं। वह अब भी सरकार के गलियारों में प्रचार में जुटी है और उसने कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को अपना वकील भी रख लिया है। कहा जा रहा है कि मोंटेक सिंह अहलुवालिया और कमलनाथ जैसे ताकतवर सरकारी पदधारियों का समर्थन भी उसने हासिल कर लिया है लेकिन डाऊ को अब उसकी देनदारी से मुक्त करना ‘जले पर नमक छिड़कने’ जैसा होगा।

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ भोपाल गैस कांड : देश की सरकार हत्यारों के साथ खड़ी है ”

  2. By Pramod Tambat on December 2, 2009 at 8:46 PM

    भोपाल गैस त्रासदी जिम्मदार लोगों की गैर जिम्मदारी की जीती जागती मिसाल है।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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