हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

जिसकी रोशनी में हम अपना संसार देखें : एरिक हॉब्सबाम की इतिहास की शानदार किताबें, हिंदी में

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/26/2009 07:34:00 PM

संवाद प्रकाशन से विश्व पुस्तक मेला (30 जनवरी, से 7 फरवरी, 2009, प्रगति मैदान, नई दिल्ली) के अवसर पर बीसवीं सदी के सर्वाधिक समादृत इतिहास ग्रंथों की 5 खंडों की श्रृंखला का प्रकाशन हो रहा है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस श्रृंखला के लेखक एरिक हाब्शबाम हैं और अलग-अलग खंडों का अनुवाद हिंदी के प्रमुख इतिहास अध्येता और समर्थ लेखकों, प्रो लाल बहादुर वर्मा, प्रकाश दीक्षित और वंदना राग ने किया है. ये पांचों खंड संवाद की परंपरा के अनुसार पेपरबैक के मुख्य संस्करण में होंगे. लगभग 1800 पृष्ठों से अधिक के इन पांचों खंडों का मूल्य 1500/- है, पुस्तक मेले में यह श्रृंखला 1100/- के विशेष रियायती मूल्य पर उपलब्ध होगी. प्रस्तुत है, इस श्रृंखला के लिए आलोक श्रीवास्तव की भूमिका.

एरिक हॉब्सबाम ने वह लकीर खींच दी है, जिस पर बहस आगे चलेगी. भविष्य का कोई इतिहासकार इसकी अनदेखी नहीं कर पाएगा.'
- द इकानामिस्ट


एरिक हाब्सबाम की यह इतिहास-श्रृंखला पिछली कुछ सदियों के इतिहास पर आधारित है, बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि इस श्रृंखला की पुस्तकें इतिहास के भू-स्तरों का उत्खनन करती है- तारीखों, व्यक्तियों, घटनाओं की ऊपरी पर्तों के नीचे दबी उन प्रक्रियाओं को सामने लाती हैं, जो घटनाओं, व्यक्तियों और उनके इतिवृत्तों में प्रतिफलित होते हैं.
यह श्रृंखला शुरू होती है 1789 की फ्रांसीसी-क्रांति और इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति से़ एक क्रांति ने दुनिया के वैचारिक विन्यास को नया मोड़ दिया तो दूसरी क्रांति ने उत्पादन और वितरण के उन प्रारूपों को निर्मित किया, जिनसे विश्व का आर्थिक ढांचा, राजनीतिक समीकरण और समाज-व्यवस्था परिवर्तित हुई़ गत दो सौ वर्षों के इस इतिहास ने व्यक्तियों के विचार और परिधान तक बदल दिए.
मनुष्यों के संबंधों, भावनाओं और जीवन-लक्ष्यों तक को गतिशील कर दिया़. यह इतिहास जो मुख्य रूप से पूंजीवाद और इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यवाद का इतिहास रहा है, बीसवीं सदी में इसने आतरेकों का रूप लिया. ये अतिरेक मानव-जीवन के प्रत्येक आयाम में घटित हुए हैं. हाब्शबाम ने जिस कालखंड का इतिहास लिखा है, वह अपने पूर्ववर्ती काल के इतिहास से निम्न बातों में भिन्न है-
1- अपनी गति में
2- अपने गुणात्मकं परिवर्तन में
दुनिया हमेशा आगे बढ़ती रही है, पर फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिकं-क्रांति के पहले इतिहास की गति हमेशा मंथर रही, इतनी मंथर कि इसने जन-सामान्य के जीवन पर असर ज़रूर डाले, पर उसे आमूल आलोड़ित कभी नहीं किया़. इतिहास की यह मंथर गति दुनिया को बदलती भी रही, पर इस तरह से नहीं कि थोड़े से ही वर्षों में जीवन-शैली से लेकर सामाजिक ढांचे तक में इतने बड़े बदलाव हो जाएं कि गुज़रा ज़माना पहचान में ही न आए. अतः हाब्शबाम की यह पुस्तक गुज़रे ज़माने का इतिवृत्त नहीं है, न ही यह उन अर्थों में मार्क्सवादी पद्धति से जनता के इतिहास के निर्माण का उपक्रम है, जो हमारी सदी के इतिहास-लेखन का एक मुख्य आधार रहा है. एक रूपक में कहें तो यह इतिहास के महासमुद्र में उतरे एक गोताखोर द्वारा देशों गए दृश्यों का तरतीबवार, विहंगम, गहन और जीवंत पर्यवेक्षण है.
यह पुस्तक उत्प्रेरित नहीं करती और न ही इतिहास-निर्माण' के लिए किसी स्थूल प्रेरणा का सृजन करती है. इस पुस्तक का लक्ष्य मात्र यह है कि गुजरी दो सदियों के उस इतिहास को जो जटिलतम और बहुस्तरीय होता गया है- सही दूरी और सही दृष्टिकोण से देखा जा सके- उसके सभी आयामों और विस्तारों को़ एक और रूपक इस बात को समझने के लिए उपयोगी हो सकता है़. वनस्पति-विज्ञान की प्रयोगशाला में जिस प्रकार पौधों की टहनियों को क्षैतिज या अनुप्रस्थ काट की पतली परतों में सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है, उसी प्रकार इतिहास की अनुप्रस्थ काट इन चारों खंडों में है़.


यह पुस्तक मूलतः यूरोप के बारे में है, क्योंकि इन दो सदियों में यूरोप ही उस समस्त ऐतिहासिक प्रक्रिया का स्रोत और उत्स रहा है, जिसने समूचे भूमंडल के इतिहास को गतिशील किया, उसे स्वरूपित किया है. हालांकि एशिया, लातिन अमरीका आदि के संदर्भ और विवरण इन सभी खंडों में हैं, पर यह मूलतः यूरोप के इतिहास को प्रस्तुत करने वाली श्रृंखला है. निश्चित रूप से दुनिया के अन्य भू-भागों में इन दो सदियों में इतिहास ने बड़ी करवटें लीं , खुद हमारे देश भारत में यह दो सदियों का कालखंड- उपनिवेश बनने से आरंभ होता है़ जिस समय यूरोप में फ्रांसीसी-क्रांति और औद्योगिक-क्रांति का ईंट-गारा इकट्ठा हो रहा था, भारत में 1757 के प्लासी-युद्ध को जीतने के बाद अंग्रेज़ी राज मजबूत हो रहा था. यह इतिहास घट भारत में रहा था, पर निश्चित रूप से यूरोप में हुई पूंजीवादी क्रांति और उससे जनमे साम्राज्यवाद की परिणति था. फिर और आगे, 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का प्रकाशन हुआ, पूरा यूरोप आसन्न क्रांति की लपटों से घिरा रहा और पेरिस कम्यून के रूप में एक क्रांति हुई ठीक उसी कालखड में साम्राज्यवाद के विरुद्ध- किसी भी मायने में फ्रांसीसी-क्रांति से कम नहीं- एक महाविद्रोह भारत में हुआ. इसकी प्रेरणाओं, घटकों और विवरणों से इतिहासकार, बुद्धिजीवी या अकादमीशियन जो कुछ भी सिद्ध करते रहें- यह ऐतिहासिक सच है कि यह मात्र विफल विद्रोह न था- भारत से सचमुच अंग्रेज़ी राज खत्म कर दिया गया था, 1857 का युद्ध हिंदुस्तानियों ने- वे सिपाही रहे हों या किसान या राजे-रजवाड़े, सामंती शक्तियां रही हों या पिछड़ी अर्थ-व्यवस्था के नुमाइंदे- जीत लिया था, हां इस जीत को वे कुछ माह से अधिक बनाए न रख सके. यदि यह जीत स्थाई हो सकी होती- और इसके स्थाई हो सकने में निर्णायक कुछ  ही मामूली बातें आड़े आईं- यदि पटियाला नरेश और नेपाल के राणा का विपुल-सक्रिय सैन्य और संसाधनगत सहयोग अंग्रेज़ों को न मिला होता तो ब्रिटिश राज भारत में पुनःस्थापित कभी न हो पाता- तो इसके असर बहुत दूर तक जाते़ ब्रिटिश-साम्राज्य के उस समय भारत से खात्मे ने समूची दुनिया में ब्रिटिश साम्राज्य को खत्म किया होता, यूरोपीय क्रांतियों का भविष्य उससे तय होता और मरणासन्न ब्रिटिश-साम्राज्य के गर्भ से अमरीकी साम्राज्यवाद कभी जन्म नहीं ले पाता. 1857 का दुनिया के आधुनिक इतिहास पर फ्रांसीसी क्रांति से कम असर कतई न पड़ता, क्योंकि पूरी दुनिया उस समय अलाव पर थी. यूरोप पर कम्युनिज़्म का प्रेत मंडरा रहा था' (इस वाक्य से कम्युनिस्ट मेनीफ़ेस्टो की शुरुआत होती है) जो लोग 1857 को स्थानीय गतिविधि और राजे-राजवाड़ों तक सीमित कर देखते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि वह एक ऐसा कालखंड था, जब पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से रची दुनिया का इतिहास अंतर्ग्रंथित हो चुका था और इतिहास की हर बड़ी घटना- वैश्विक संबंधों और दुनिया के ढांचे को एक सिरे से दूसरे सिरे तक खड़खड़ा देती थी़. बहरहाल, हाब्शबाम की यह श्रृंखला इतिहास के इसी अंतर्ग्रंथन का बहुविध प्रगटीकरण है. अतः इसके अधिकांश पन्ने भले ही यूरोपीय इतिहास की घटनाओं ने घेर रखा हो, पर यह अपने सार रूप में विगत दो सदियों के उस समूचे आलोड़न को अपने भीतर समाहित किंए हुए है, जिनके परिणामों की श्रृंखला से हमारा समय और समाज बना है. हमारी भावनाएं, हमारे विचार, हमारे दैनिक जीवन के संघर्ष और हमारी प्रेरणाएं उद्भूत हैं.
इस श्रृंखला में गहरे उतरना एक तरह से अपने अस्तित्व की जड़ों में जाने जैसा है, हम 21 वीं सदी में जी रहे लोग, चाहे वे एशिया में हों, यूरोप में या ग्लोब के किसी भी हिस्से पर- हम एक साझे इतिहास की निर्मिति हैं, इसे इतिहास का संयोग या इतिहास की अनिवार्यता जो भी कहें- यह साझा इतिहास- पूंजीवाद के उदय के बाद से एक ओर तो यूरोप से संचालित हुआ है, दूसरी ओर यह नित्य वैश्विक होता गया है. इसके इन दोनों अभिलक्षणों को इतनी संपूर्णता और परिपक्वता के साथ अब तक किसी इतिहासकार ने प्रस्तुत नहीं किंया है. वे सजग पाठक जो इतिहास के अध्ययन में संस्कारित हैं, या विचारों की दुनिया से जुड़े रहे हैं, उन्हें अनेक स्थलों पर लेखक से असहमत होने का मौका मिलेगा, शायद कहीं-कहीं दृष्टिदोष भी मिलें, लेखक की देशकालगत सीमाएं भी उजागर होती दिखेंगीं, पर यह याद रखना ज़रूरी है कि यह पुस्तक जनपक्षधरता की घोषणावाली शब्दावली में भले न लिखी गई हो, पर इतिहास की सहस्रों घटनाओं और उनकी व्याख्यापरक प्रस्तुति के पीछे बीसवीं सदी का वह दिमाग़ ही काम कर रहा है, जो मनुष्य और राष्ट्रों की मुक्ति को, उनकी गरिमा और स्वतंत्रता को विचारों और स्वप्नों की दीर्घा से देखता रहा है, उसके लिए विकल, प्रयत्नशील रहा है. इसलिए यह किताब हमारे पुरखों की दुनिया का एक मुकम्मल अनुभव हमारे भीतर संचरित करती है, जिसकी रोशनी में हम स्वयं को और अपने इस संसार को अधिक स्पष्ट और प्रामाणिक रूप से देख सकंने के योग्य बनते हैं.


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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ जिसकी रोशनी में हम अपना संसार देखें : एरिक हॉब्सबाम की इतिहास की शानदार किताबें, हिंदी में ”

  2. By pratibha on December 26, 2009 at 8:16 PM

    इतिहास के गहरे समंदर में उतरकर ये जो खजाना किताबों में सहेजा गया है वो सचमुच कमाल है. भूमिका ने किताबें पढऩे की ललक बढ़ा दी है.
    संवाद प्रकाशन की किताबें हमेशा बड़े काम की होती हैं. आलोक जी को बधाई!

  3. By नरेश गोस्वामी on December 27, 2009 at 1:05 PM

    आलोक भाई का मैं तो काफी पहले से मुरीद रहा हूँ. संवाद सिर्फ प्रकाशन गृह नहीं एक मुक़म्मल सांस्कृतिक आन्दोलन है. पुस्तकों के चयन और प्रकाशन में संवाद ने जिस दृष्टि का परिचय दिया है वह कमाई-धमाई वाले दिमाग से नहीं उपजती. ऐसा उन्मेष अपने समाज और मनुष्यता से गहरे लगाव के बाद पैदा होता है. आलोक और उनके सहकर्मियों ने यह बात लगातार सिद्ध की है कि आदमी अपने सरोकारों को लेकर साफ़ और निष्ठावान हो तो रास्ता हमवार हो ही जाता हैं.
    एरिक होब्स्बोम को हिंदी में लाना एक सांस्कृतिक पूँजी का निर्माण करना है.

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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