हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

बुद्धिजीवियों, चिंतकों, कलाकारों, साहित्यकारों और लेखकों के नाम अपील

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/27/2009 05:00:00 PM

बस्तर पर हमने सामग्री प्रस्तुत करने का वादा किया था. इस कड़ी में यह अपील, जो आपरेशन ग्रीन हंट की मुखालिफत करने की पुरजोर अपील के साथ बस्तर और छत्तीसगढ़ के लोगों द्वारा किये गए कुछ रचनात्मक कार्यों का ब्यौरा देती है. इसे पंजाबी के लेखक-पत्रकार सतनाम ने बूटा सिंह के साथ मिलकर जारी किया है. सतनाम कुछ साल पहले बस्तर गए थे और वहां से लौट कर शानदार किताब जंगलनामा : बस्तर के जंगलों से लिखी थी.




हुकूमत वैकल्पिक विकास के माडल को ध्वस्त करना चाहती है

प्रिय दोस्तों,
    भारत सरकार ने अपने ही लोगों के ऊपर हमला करने के लिए मध्य भारत में इतनी बड़ी संखया में अर्धसैनिक बलों को जमा किया है। यह भारतीय हकुमत द्वारा इस देश की जनता पर थोपा गया नवीनतम युद्ध है। सरकार का कहना है कि यह मुहिम उन क्षेत्रों में छेड़ी गई है जो केन्द्र या राज्य सरकार के नियन्त्रण में न होकर माओवादियों के कब्जे में हैं।
    वास्तव में इन जंगलों के निवासी जो हजारों सालों से वहां रह रहे हैं, इन्हें बचाए हुए हैं। क्योंकि जंगल उनकी जिन्दगी को सुनिश्चित करता है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। आदिवासी कहे जाने वाले ये लोग जो हमारी धरती के सबसे पुराने निवासी हैं और अभी भी पुराने ढ़र्रे में जीवन यापन कर रहे हैं। वे यहां के सबसे गरीब और दबे-कुचले लोग हैं। आज तक कोई भी उन्हें गुलाम नहीं बना पाया है। 1910 में ब्रिटिश राज ने कोशिश की मगर उनकी लुटेरी सेना पर जवाबी कार्यवाही की और उन्हे पीछे हटना पड़ा। ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ आदिवासियों का यह प्रतिरोध, जो भूमकाल बगावत के नाम से प्रसिद्ध है, महान योद्धा गुण्ड़ाधूर के नेतृत्व में हुआ।19वीं सदी में भी इन्होंने मुण्ड़ा विद्रोह (जिसका नेतृत्व बिरसा मुण्ड़ा ने किया था) में ब्रिटिश सरकार के साथ टक्कर ली थी।
    तब से किसी भी हकुमत ने चाहे वो ब्रिटिश हो या बाद में दिल्ली पर राज करने वाले शासक, दोबारा उनको अधीन करने की हिम्मत नहीं की। आदिवासी अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और अनोखी जीवन शैली के साथ हमेशा एक स्वतंत्र ज़िंदगी जीते रहे हैं। केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने उनके जंगल वहां से मिलने वाली कीमती धातु और खनिज पदार्थ तो बुरी तरह से लूटे हैं, मगर कभी भी उनकी ज़िंदगी की बुनियादी जरूरतों जैसे पीने का पानी, स्वास्थ और शिक्षा आदि को पूरा करने के लिए कुछ नहीं किया। उनके संसाधनों की लूट बडे़ पैमाने पर होती है। हर साल अरबों रूपये की ये सम्पति बडे़ पूंजीपतियों, नौकरशाहों, राजनीतिज्ञों, ठेकेदारों और पुलिस द्वारा हड़प कर ली जाती है। लूट का यह सिलसिला बेरोक-टोक चलता रहा जब तक कि आदिवासियों ने चेतन होकर इस शोषण तथा अमानवीय जुल्म के ख़िलाफ प्रतिरोध का रास्ता अखितयार नहीं कर लिया।
    यह प्रतिरोध उनकी परम्परा का हिस्सा है और उनकी आज़ाद प्रवृति की उपज है। उनका यह संघर्ष उस शोषण को खत्म करने के लिए है जिसने उनके जीवन को नरक समान बना दिया है। यही कारण है कि वे खुद को क्रान्तिकारी मार्क्सवादी विचारधारा से जोड़ते हैं जो लूट, शोषण और दमन रहित संसार का वादा करती है। इसलिए वे सोचते हैं कि उनका मकसद क्रान्तिकारी माओवादी विद्रोहियों के साथ सांक्षा है जो कि हर तरह के शोषण और अत्याचार को खत्म कर एक भेदभाव रहित समतामूलक मानवीय समाज बनाना चाहते हैं।
    जैसा कि हम जानते हैं कि आदिवासियों की धरती बहुमूल्य खनिज पदार्थों, धातुओं तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों जैसे लोहा,कोयला, बाक्साइट, मैंगनीज, सोना, हीरों और यूरेनियम से भरपूर है। भारतीय हकुमत ने कभी भी आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार को मान्यता नहीं दी। बल्कि हमेशा विभिन्न तरीकों से उन पर कब्जा करने की कोशिश की है। भारतीय हुकूमत इस शोषण को ओर तेज करने जा रही है जिसके चलते उसने विदेशी साम्राज्यवादी कम्पनियों भारत के बड़े औद्योगिक घरानों और उनके सांक्षे उद्यमों को इस धरती पर नये प्रोजेक्ट लगाने के लिए आमन्त्रित किया है।
    इस काम के लिए भारत सरकार ने विदेशी तथा भारतीय औद्योगिक घरानों के साथ अरबों-खरबों रूपयों के सहमती पत्रों (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन सहमती पत्र के तहत तय की गई बातें लोगों से छुपा कर रखी गई हैं। भारत सरकार का मौजूदा हमला इन प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों को आदिवासियों से छीन कर साम्राज्यवादी कम्पनियों को सोंपने के लिए है। और यह सब विकास के नाम पर किया जा रहा है। परन्तु यह विकास किसी भी तरह से आदिवासियों और वहां रहने वाले लोगों की जीवन हालतों में सुधार नहीं लाता। बैलाडीला, बालको, बोकारो, भिलाई, जाडूगुडा और इनके जैसी दूसरी परियोजनाएं इसकी पुष्टी करती हैं।
    हाल ही में हमने नंदीग्राम, सिंगूर, काशीपुर, कालिंगा नगर, लालगढ़, पोलावरम, टिहरी और नर्मदा परियोजना क्षेत्र के लोगों को कार फैकट्रीयों, बांधों, बडी खादानों और विद्गोष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द करते देखा है। ये और ऐसी दूसरी परियोजनाओं का वहां या देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले मेहनतकश ग़रीब लोगों के विकास और भलाई के साथ कोई संबंध नहीं है। ये परियोजनाएं वास्तव में देश के उन मुट्ठीभर अमीर परजीवियों और विदेशी साम्राज्यवादी पूंजीपतियों के ख़जाने भरने के लिए है जिनका असली धर्म लूट-मार और शोषण करना है। यहां के लोग अपनी ज़मीन के अधिकार के लिए सरकार तथा उन पूंजीपति गिद्धों के ख़िलाफ संघर्ष करते रहे हैं जिनके इशारों पर सरकार चलती है।
    लोगों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए सरकार ने भारी संखया में हथियारबंद सेना को ख़ास कर उन जगहों पर तैनात किया है जहां संघर्ष मजबूत है और पूंजीपतियों को प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर धरती पर कब्ज़ा करने से रोकता है। जब सरकार माओवादीयों के अधीन क्षेत्रों को वापिस लेने की बात करती है तो वास्तव में वह लोगों के संघर्ष को कुचलना चाहती है और उनकी ज़मीनों को छीन कर बड़े उद्योगपतियों, धन कुबेरों और दानवीय खनन कम्पनियों को भेंट करना चाहती है। माओवाद कुछ ओर नहीं बल्कि बेइंसाफी के ख़िलाफ लोगों की बग़ावत है। इससे कोई फर्क नहीं पडता कि सरकार उन्हें आतंकवादी कहे या कुछ और। इन क्षेत्रों के दसियों लाख लोग माओवादियों के मकसद का दम भरते हैं। और जब लाखों लोग एक न्यायसंगत मकसद के लिए एकजुट हो कर लड़ते हैं तो उनको आतंकवादी नहीं कहा जा सकता।
    सरकार यह मानती है कि भारत के 600 जिलों में से 223 में माओवादी सक्रिय हैं। जिसका मतलब है कि भारत के 223 जिलों में लोग इस विचारधारा को अपनाए हुए हैं और हर तरह के शोषण को खत्म करने के लिए लाखों की संखया में एकजुट हो कर संघर्ष कर रहे हैं। अब यह लोगों का आन्दोलन बन चुका है और बाकी जिलों में रहने वाले लोगों का क्या? क्या वहां के मजदूर, किसान, विद्यार्थी, छोटे दुकानदार, कर्मचारी और मेहनतकश जनता के हित इस समाज में सुरक्षित हैं? और क्या वे बेहतर समाज नहीं चाहते? क्या इन सब का सपना एक नहीं है? और अगर 223 जिलों के लोग बेइंसाफी के खि़ालाफ संघर्ष कर रहे हैं और बाकी वही खवाहिश रखते हैं तो सरकार को उन्हें आतंकवादी शब्द से बुलाने का कोई अधिकार नहीं है।
    भारतीय हुकूमत सिर्फ़ माओवादीयों को ही नहीं बल्कि इस देश के करोड़ों करोड़ लोगों की आकांक्षाओं को, प्रत्येक उत्पीड़ित भारतीय के  सपनों को कुचल देना चाहती है।
    इनको बदनाम और ख़ात्म करने के लिए हुकूमत ने मीड़िया और हर तरह की प्रचार मशीनरी को लगा रखा है। वे दबे कुचले लोगों के प्रतिरोध और परिवर्तनकामी आन्दोलन को मलियामेट कर देना चाहते हैं। जोकि मुसीबतों भरी इस धरती, जिसे हिन्दूस्तान कहा जाता है, पर  लोगों के जीवन में सच्ची खुशियां लाने का एकमात्र रास्ता है, वो धरती जिसमें शोषित और भूखे-नंगों बसते हैं। वो धरती जहां किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं और नौजवानों का भविष्य अंधकार में है। वो धरती जहां मजदूरों को फैक्ट्रीयों से निकाला जा रहा है, जहां संगठित क्षेत्र के मजदूर वो सब अधिकार खो रहे हैं जिन्हे उन्होंने लंबे संघर्ष से हासिल किया था और जिनकी नौकरियों को ठेकेदारी प्रबन्ध के अधीन लाया जा रहा है। वो धरती जहां सरकारी कर्मचारियों को वी.आर.एस. या गोल्डन हैंडशेक के नाम पर चंद टुकड़े फैंक, लात मार कर बाहर निकाला जा रहा है। जहां छोटे दुकानदार और व्यपारियों के कारोबार को बडे मॉल तथा विद्गोष आर्थिक क्षेत्र निगल रहे हैं। ये वो धरती है जो इंसाफ के लिए चीख रही है।
    अगर भारत का प्रधानमंत्री माओवादियों को देश का सबसे बड़ा अन्दरूनी ख़तरा कहता है, तो देश के शासकों को यह सोच लेना चाहिए कि आज़ादी के 62 सालों में उन्होने लोगों को क्या दिया है। बात यहां तक पहुंची ही क्यों?  हिन्दुस्तान के ये शासक पिछले छह दशकों के राज के दौरान पूरी तरह से असफल रहे हैं। जबकि उन्होने ही समाज को शासित और संगठित किया है और स्टियरिंग भी उनके ही हाथ में था। देश की यह मौजूदा हालत उनकी ही देन है, माओवादियों की नहीं। उनकी अपनी बनाई विकास योजनाएं अगर असफल हुई हैं तो उसका दोष प्रतिरोध कर रहे लोगों या माओवादियों को नहीं दिया जा सकता। माओवादी तो अभी कुछ समय से ही परिदृद्गय में आये हैं परन्तु उन वादों का क्या हुआ जो हुकूमत ने लोगों से आजादी के वक्त किए थे कहां आलोप हो गया 'किस्मत के साथ दस्तपंजा लड़ाने' का वो वायदा जो 14-15 अगस्त 1947 की रात को जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से किया था? जो वायदा पूरा नहीं हुआ उसके लिए न तो जनता ज़िम्मेवार हैं और न ही माओवादी।
    तो अब, सरकार आपे्रशन ग्रीन हण्ट के जरिए, आतंकवाद से लड़ने के नाम पर, एक आर-पार की जंग में सिर्फ़ माओवादियों को ही नहीं मिटाना चाहती बल्कि लोगों की इच्छाओं, उनके संघर्षों, उनके प्रतिरोधों तथा एक बेहतर ज़िंदगी जीने के उनके संकल्प का भी गला दबा देना चाहती है। और जब आदिवासियों की धरती इस हमले के आगे क्षुकने से इन्कार कर रही है तो हमें उनको सलाम करना चाहिए।        
   हुकूमत अब अपने ही लोगों के खि़लाफ वायु सेना की ताकत का इस्तेमाल करना चाहती है। ये पिछले 60 सालों के कुशासन और लोगों पर थोपी गई जन विरोधी नीतियों का ही नतीजा है लोगो ने कभी भी उनको ऐसी नीतियां लागू करने का अधिकार नहीं दिया। इसके विपरीत इस सारे समय दौरान लोगों ने इन नीतियों के खि़लाफ याचिका, विरोध प्रदर्शन, हड़ताल, चक्का जाम, भूख हड़ताल और 'वर्क टू रूल' के जरिए अपना विरोध प्रकट किया है, और भगवान ही जानता है कि दुनिया की सबसे बड़ी इस लोकतान्त्रिक हुकूमत ने विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कितनी बार गोलियां चलाई होंगी। कितनी ही बार लोगों को मारा है। पता नहीं कितने लाखों लोगों पर उन्होने लाठी चार्ज किया है और कितनों को जेलों में डाल दिया है। हिरासतों में होने वाली मौतों और बडे पैमाने पर पुलिस मुकाबलों में मारे जाने वाले हजारों लोगों की तो बात ही छोड़ो। उनका यह दमन कभी बंद नहीं हुआ।
    लोगों के गिले-शिकवे सुनने की बजाए इन सब दशकों में मोहनदास कर्मचंद गांधी के अहिंसा के सिद्धान्त पर चलने का दावा करने वाली इस सरकार ने लोगों पर बेतहाशा हिंसा ढ़हाई है-एक माफिया गिरोह के जैसे। फिर भी प्रतिरोध जारी रहा और बग़ावत बढती गई।
    और अब हुकूमत ने अपने ही देशवासियों पर हमला करके देश के अन्दर ही सरहदें खड़ी कर दी हैं।
    मध्य भारत की ग़रीब जनता के ऊपर हो रहा ये मौजूदा हमला और कुछ नहीं बल्कि 1947 से लगातार जारी हुकूमती हिंसा का एक और खूंखार रूप है। इस हमले का मकसद सबसे गरीब आदिवासी किसानों और खादानों में काम करने वाले मजदूरों के ज़ुल्म के खि़लाफ लड़ने के हौंसले को तोड़ना है। इस हमले के जरिए वे देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों को इशारा करना चाहते हैं कि वह अपने अधिकारों के लिए न बोलें, सरकार की नीतियों का विरोध न करें। भले ही वो नीतियां लोगों और देश के हितों के विरूद्ध ही क्यों न जाती हों।
    प्रतिरोध के केन्द्र को न सिर्फ तोड़ने के लिए ही घेरा जा रहा है बल्कि वे उन सब चीजों को भी तबाह कर देना चाहते हैं जिनको लोगों ने संघर्ष के दौरान कड़ी मेहनत से खड़ा किया है। सरकार ने उन लोगों को बदनाम करने के लिए मुहिम छेड़ दी है जो पीछे हटने से इंकार हैं, जो सजदा नहीं करते और उसके विकास तथा प्रगति के खोखले वादों के झांसे में नहीं आते। लोग जानते हैं कि ये विकास उनके लिए नहीं है। साम्राज्यवादी पूंजी, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के आदेश पर कल्याणकारी राज का संकल्प त्याग चुकी सरकार वह लोगों की भलाई के बारे में नहीं सोच सकती।

दण्ड़कारण्य में जन विकास कमेटियां :
    इस हमलें को क्षेलने वाले लोगों ने 'किस्मत के साथ दस्तपंजा लड़ाने' का सपना साकार करने के लिए, अपना भविष्य खुद अपने हाथों में लेते हुए, विभिन्न स्तरों पर  स्थानीय सरकारों का निर्माण किया है।
    आओ एक नजर देखें कि दंडकारण्य के गावों में लोगों ने अपनी विकास समितियों के द्वारा वो क्या बनाया है जिसे सरकार तबाह कर देना चाहती है। इससे हमें हमारे देश के विकास और प्रगति के बारे में माओवादियों के दृष्टिकोण की झलक दिखाई देगी। ऐसा विकास जो देशीय तरीके से आत्मनिर्भर रह कर किया जा रहा है, जो विकास जन हित में है और जो विकास लोगों की जनतांत्रिक भागीदारी के ज़रिए किया जा रहा है। जो इस धरती और इसके प्राकृतिक संसाधनों की कद्र करता है। ऐसा विकास हमें साम्राज्यवादी पूंजी की जकड़ और उसके आदेशों से मुक्त कर देगा। ये एक ऐसा कार्य है जो सिर्फ किसी सच्ची देशभक्त ताकत के द्वारा ही किया जा सकता है।

  • सबसे बड़ा सुधार जमीनों के बारे में किया गया है। उन्होंने हर किसान परिवार को ज़मीन देने के लिए लाखों एकड़ ज़मीन बांटी है। किसी को जोतने से अधिक ज़मीन रखने की इजाज़त नहीं है। इस तरह कृषि में मज़दूरों से पैसे देकर काम करवाने के गैर-ज़रूरी सिलसिले का अन्त कर दिया है। यहां तक कि लोगों पर दबाव ड़ाल कर बिना पैसे दिए काम करवाने और उनका खून पीने वाले पटेलों (गावों में सरकार का नामांकित अधिकारी) को भी उतनी ही ज़मीन रखने की इजाज़त है जितनी वो अपने परिवार की मेहनत के साथ जोत बीज सकते हो। कोई भी ग़ैर आदिवासी यहां ज़मीन का मालिक नहीं बन सकता। 
  • औरतों को ज़मीन पर मल्कियत का समान अधिकार दिया गया है।
  • उन्होंने आदिवासियों को एक या दो सालों के बाद जगह बदलकर खेती करने के पुराने ढंग से निकाल कर योजनाबद्ध स्थाई तरीके से खेती करने लगाया है। आदिवासियों को बिजाई, गुड़ाई और फसल की कटाई करनी सिखाई है। वह अपनी निजि ज़मीनों के साथ-साथ पूरे समूह के इस्तेमाल के लिए सहकारी खेतों में भी खेती करते हैं। कृषि का विकास बिना रसायनिक खादों, कीटनाशकों से किया जा रहा है।
  • उन्होंने गाजर, मूली, बैंगन, भिंडी, करेला, टमाटर आदि तरह-तरह की सब्जियां बीजनी शुरू करवाई हैं। दूर-दराज के इलाकों में बसे आदिवासियों ने ना तो कभी इनको देखा था और ना ही कभी इनका स्वाद चखा था।
  • उन्होने केले, निंबू जाति के फलों, आम, अमरूद आदि के बगीचे लगाए हैं।
  • उन्होनें मछली पालन और सिंचाई के लिए बांध, तालाब और नहरें बनाई हैं। यह सब कुछ सामूहिक मेहनत के ज़रिए किया गया है। और इससे होने वाली पैदावार हर परिवार को मुफ्त में दी जाती है।
  • उन्होने पीने योग्य पानी के लिए कुएं खोदे हैं। जबकि औद्योगिक परियोजनाओं ने भू जल के भण्डार को तबाह कर दिया है। मछलियां तथा जल-जीवन और साथ ही उसके आस पास की नदियां इस कदर प्रदूषित हो गई हैं कि वनस्पति तक नष्ट हो गई है। पानी के इन संसाधनों के इर्द-गिर्द के फलदार वृक्षों पर फूल आने बंद हो गए हैं।
  • उन्होंने बहुत से गावों में चावल मीलें लगाई हैं। इन मीलों ने औरतों को धान कूटने के रोज के काम से मुक्त कर दिया है। इनमें से बहुत सी मीलों का सरकार ने सलवा जुडुम द्वारा नष्ट कर दिया है। लेकिन फिर भी सरकार कहती है कि उसको इन इलाकों के विकास का बहुत फिक्र है।
  • महिलाएं इन विकास गतिविधियों में समान रूप से भागेदारी करती है। पितृसत्ता के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाता है और इसी कारण अपने अधिकारों और जमीन की रक्षा के लिए वे समान रूप से बढ़ चढ़ कर भाग लेती हैं।   
  • उन्होंने ऐसा स्वास्थ प्रबंध कायम किया है जो हर आदिवासी किसान की पहुंच में है। हरेक गांव में एक ऐसी दवा इकाई है जिसे बिमारियों की पहचान करने और इलाज करने की सिखलाई दी जाती है। शोषण और दमन के विरूद्ध लड़ाई के पश्चात दूसरा मुखय कार्य आदिवासियों की सेहत संभाल ही है।
  • वे स्कूल चलाते हैं। सरकार द्वारा बनाए गए स्कूल पूरी तरह से बंद पड़े हैं। उनका इस्तेमाल पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों द्वारा गांवों में छापामारी के दौरान किया जाता है। यही कारण है कि लोग इन पक्की इमारतों को, जो उत्पीड़न का प्रतीक बन चुकी हैं, गिरा देते हैं।
  • उन्होने गोंड़ी भाषा में किताबें और पत्रिकाएं प्रकाशित की हैं। इसके फलस्वरूप पहली बार यह भाषा लेखन जगत में स्थान बना पाई है। गोंड़ लोगों द्वारा रचित गाने, लेख, कहानियां आन्दोलन द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं में छपती है। जनता की तरह अवहेलना का शिकार बनी इस प्राचीन भाषा को विकसित करने में यह आरम्भिक कदम है। यद्यपि गोंड़ी की कोई अस्तित्व मान लिपि नहीं है। वे देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करते हैं।
  • आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए माओवादी आंदोलन ने तेंदू पत्ते की फायदेमंद कीमतें और बांस तथा लकड़ी कटाई की दिहाड़ी तय की है।
  • आंदोलन के क्षेत्रों में कारोबार बेरोक-टोक चलता है। अब हॉट बाजार में व्यापारी  आदिवासियों के साथ धोखा नहीं कर सकते। आंदोलन जंगल की उपज और धान की फायदेमंद दरें तय करता है जिससे व्यापारी सहमत होते हैं। गुरिल्लों की मौजूदगी में कारोबारी लेन-देन ईमानदारी से चलता है। दूसरी तरफ व्यापारी खुश हैं कि उन्हें आंदोलन नियंत्रण वाले इलाको में चोरी और लूट-मार का कोई खतरा नहीं। और वे आजादी से घूम फिर सकते हैं।
  • उनका अपना न्याय प्रबंध है। लोगों के आपसी और उत्पीड़कों के साथ क्षगडों को निपटाने के लिए जन अदालतें लगाई जाती हैं।
  • अब यहां चोरी, फरेब, डकैती और सम्पति व निजी हितों के लिए कत्ल नहीं होते।
  • जंगल विभाग के अधिकारियों, ठेकेदारों तथा पुलिस द्वारा औरतों के साथ की जाने वाली छेड़-छाड़ तथा बलात्कार अब बीते की बात है। अब जंगल में औरतें रात दिन आजादी से घूमती हैं।
  • गांव स्तर की जनतांत्रिक प्रक्रिया अमल में लाई गई है। विकास समिति जैसी अलग-अलग समितियां ग्राम राज्य समिति (जिन्हे अब क्रान्तिकारी जन कमेटी कहते हैं) के अधीन काम करती हैं जो खेती-बाड़ी, शिक्षा, मछली पालन, गांव विकास तथा दवा इकाई आदि का काम देखती हैं।
  • तकरीबन हर गांव में महिलाओं और बच्चों के अपने-अपने संगठन हैं। आदिवासी किसानों के संगठन अलग हैं जिनकी इकाईयां सभी गांवों में हैं।
  • हर गांव में जन मिलिशया (पंरम्परागत हथियारों से लैस जनता) मौजूद है जो अपने गावों और जमीनों की सुरक्षा करता है।
  • इन जंगलों में सांस्कृतिक संगठन बहुत फले-फूले हैं क्योंकि आदिवासियों का संस्कृतिक सरगर्मियों के साथ बहुत लगाव है ये संगठन स्थानिय, राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय हर किस्म के मुद्दों पर गीत, नाच, नाटक और दूसरी कला विद्याओं के द्वारा जनता को जागृत करते हैं।
  • इन इलाकों में भूखमरी से होने वाली मोतों को रोकने में आंदोलन सफल हुआ है।

सलवा जुडुम: हुकूमती हिंसा का निजीकरण
    सलवा जुडुम सरकार द्वारा चलाई दहशत फैलाने वाली मुहिम थी जिसमें आदिवासी नौजवानों को 1500 रूपये महीने पर स्पैशल पुलिस अफसर (SPOs) भर्ती किया गया। इन एस.पी.ओ. को हथियार देकर आंदोलन के इलाकों पर हमले करवाए गए। इन्होंने अर्धसैनिक बलों की मदद से पूरे के पूरे गांव जला दिये, कत्लेआम मचाया, बलात्कार किए और लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। विद्गोष तौर पर प्रशिक्षण प्राप्त नागा बटालियनों को इस मुहिम की हिफाजत के लिए तैनात किया गया था।
    सलवा जुडुम ने हॉट बाजार (साप्ताहिक स्थानीय मण्डियां) बंद करवा के इन इलाकों में कारोबार को तबाह किया और आदिवासियों की अर्थव्यवस्था को नष्ट करके उन्हें क्षुकाने की कोशिश की। यह मुहिम 2005 से 2007 तक जारी रही। उन्होंने खड़ी फसलें तबाह कर दी, आदिवासियों ने जो अनाज या वनोंउपज हॉट बाजारों में आदान-प्रदान के लिए रखी थी उसे जला दिया या उस में ज़हर मिला दिया। मगर यह सब भी आदिवासियों को नहीं क्षुका सका। घुटने टेकने की बजाए वे बांस के बीज खा कर गुजारा करते रहे।
    सलवा जुडुम की खूनी मुहिम ने सैंकड़ों आदिवासियों को मार दिया, सैंकड़ों गावों का नामों निशान मिटा दिया, सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किए और 50 हजार के करीब आदिवासियों को राहत के नाम पर बनाए गए शिविरों में कैद हो कर रहने को मजबूर कर दिया। ये राहत शिविर पुलिस द्वारा बनाए गए थे जिन्हे तोड़ कर आदिवासी आख़िरकार भाग निकले। इस अभियान ने लगभग 30 हजार आदिवासियों को अपने गावों छोड़कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर कर दिया। लाखों लोगों को अपने घर छोड़ कर जंगलों में भटकने पर विवश कर दिया। वास्तव में सरकार ने उनकी समुची अर्थव्यवस्था तथा आजीविका के साधनों को तबाह करने का प्रयास किया। यहां तक कि जंगलों में पानी के खुले संसाधनों में भी जहर मिलाने की धमकियां दी। मगर प्रतिरोध जारी रहा। वो उसको तोड़ नहीं सके।
और अब :
    लोगों को झुकाने में असफल रही सरकार ने क्रोधित हो कर अब आप्रेशन ग्रीन हण्टद्यशुरू किया है। इस सैन्य अभियान में लगभग एक लाख फौजियों को लगाया गया है। प्रधान मंत्री द्वारा दिए जा रहे आद्गवासनों के उल्ट तरह-तरह के बहानों के तहत भारतीय वायू सेना इन जंगलों पर क्षपटने के लिए अपने पंखों को तोल रही है।
    हमें बताया गया है कि माओवादी इस देश की अन्दरूनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। ये माओवादी कौन हैं? ये खुद लोग हैं जिन्होंने विभिन्न सरकारों के ख़िलाफ संघर्ष का रास्ता चुना है। भारत की एक के बाद दूसरी सरकार ने कभी भी जिन्हें सम्मान पूर्वक और चैन की जिंदगी नहीं जीने दी। भारतीय हुकूमत अपने ही लोगों की वो ज़मीने छीनना चाहती है जिन पर वे सदियों से रह रहे हैं और इसके लिए उनको हमले की धमकी दी जा रही है। हम सब 'कोलेटरल डेमेज' (सामान्नातर तबाही) शब्द अर्थात्‌ युद्ध के दौरान आम जनता के मारे जाने से भली भांत वाकिफ हैं। सलवा जुडुम के दौरान ग़ैर-ऐलानी जंग में लोगों का कत्ल किया गया था और अब हुकूमत यह सिलसिला ऐलानिया जंग से बड़े पैमाने पर दोहराना चाहती है। वे लागों को कत्ल कर जन प्रतिरोध की कमर तोड़ना चाहती है। ऐसा करके वो आदिवासियों की संसाधनों से भरपूर धरती को लालची विदेशी पूंजीपति मालिकों को भेंट करना चाहती है। वे उस वैकल्पिक विकास को तबाह कर देना चाहते हैं जो लोगों ने कड़ी मेहनत और लगातर संघर्ष के जरिए किया है।
    आओ सोच विचार करें। आओ जागें। आओ आह्‌वान करें। आओ हर जगह लोगों को जागरूक करें। आओ इस बेइन्साफी के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करें। आओ उस सरकार को जंग बंद करने के लिए कहें जिसने लोगों के दुख सुनने, उनकी अकांक्षाओं की कद्र करने और उनकी मांगों को पूरा करने की बजाए अपने ही लोगों के ख़िलाफ जंग छेड़ दी है।
    हुकूमत द्वारा अपने ही लोगों के विरूद्ध ऐलान की गई यह अन्यायपूर्ण जंग लाजमी बंद होनी चाहिए।

Related Posts by Categories



Widget by Hoctro | Jack Book
  1. 0 टिप्पणियां: Responses to “ बुद्धिजीवियों, चिंतकों, कलाकारों, साहित्यकारों और लेखकों के नाम अपील ”

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


फीड पाएं


रीडर में पढें या ई मेल से पाएं:

अपना ई मेल लिखें :




हाशिये में खोजें