हाशिया

बीच सफ़हे की लड़ाई

आदिवासी सरकार को दुश्मन और नक्सलियों को दोस्त मान रहे हैं

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/08/2009 05:00:00 PM


महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्रों की दीवाल पत्रिका दख़ल की दुनिया ने आपरेशन ग्रीन हंट के परिप्रेक्ष्य में दंतेवाडा में कार्यरत गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार को बोलने के लिए आमंत्रित किया. प्रस्तुत है इस कार्यक्रम में हिमांशु का  वक्तव्य.

अभी हमारे प्रधान मंत्री जी ने कहा इस समय देश के सामने सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद है और नक्सलवाद का केन्द्र अभी छत्तीसगढ़ है और छत्तीसगढ़ में भी दान्तेवाड़ा तो उसका हेड क्वार्टर माना जाता है इसलिये वहाँ जो कुछ हो रहा है उसके लोकल डायनामिक के बारे में मैं ज्यादा जानता हूं इसलिये आपको वहाँ के डायनामिक से परिचित कराने की कोशिश करूंगा. आप लोगों को मालूम ही है कि सन २००० में मध्यप्रदेश से काटकर छत्तीसगढ़ राज्य बनाया गया और छत्तीसगढ़ राज्य मूलतः आदिवासी प्रदेश है जहाँ-जहाँ आदिवासी हैं इत्तेफाक से वहीं-वहीं खनिज भी हैं और ये एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत हुआ है. इस पूरे भारतीय उप महाद्वीप पर पहले जो मूल निवासी रहते थे उनको बाद में सेन्ट्रल एशिया से जो प्रजातियां आयी उन्हें ढकेला और समतल जमीनों पर बाहर से आयी हुई प्रजातियों ने कब्जा किया और आदिवासी जंगल की तरफ चले गये और हम लोग भी भारत के मूल निवासी बन गये अब जहाँ जहाँ आदिवासी हैं वे जंगलों में हैं उबड़ खाबड़ जमीनों पर हैं और इत्तेफक से उनके नीचे खनिज है तो २००० में जब छत्तीसगढ़ बना तो छत्तीसगढ़ की सरकार ने बहुत सारे एम.ओ.यू. उन खनिजों के उत्खनन के लिये किये कई सारी कम्पनियों के साथ जिसमे भारतीय कम्पनियाँ भी हैं और अंतरराष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी हैं और उसको अब याद आया कि नक्सलवाद समस्या है कुछ इत्तेफाक ऐसा होता है कि ४ जून २००५ को वह एक एम.ओ.यू. साइन करती है एक बहुत बड़ी कम्पनी के साथ और ५ जून से नक्सलियों को समाप्त करने का एक गाँधी वादी स्व स्फूर्त आंदोलन चलाती है जिसका नाम सलवा-जुडुम होता है. जिसको सरकार कहती है कि यह स्व स्फूर्त आंदोलन है लेकिन नवम्बर २००४ में ही उसकी पूरी रूपरेखा और बजट और प्रस्तावना कलेक्टर दांतेवाड़ा राज्य शासन को भेजते हैं कि स्व स्फूर्त आंदोलन शुरू किया जाना है जिसका इतना बजट लगेगा और ये उसकी स्टेटजी होगी और वो स्व स्फूर्त आंदोलन अचानक फूट पड़ता है और आंदोलन में क्या होता है उसमे कुछ आपराधिक किस्म के तत्वों को इकट्ठा किया जाता है गुंडे बदमासों को लगाया जाता है फोर्स उनके साथ जोड़ी जाती है बहुत सारे आदिवासी नवजवानों को बंदूकें दी जाती हैं और उन्हें कहा जाता है हि ये विशेष पुलिस अधिकारी हैं और इन लोगों का काम ये होता है कि ये गाँव में जाते हैं और गाँव में जाकर आदिवासियों से कहते हैं क्योंकि तुम लोग नक्सलियों की मदद करते हो इन्हें खाना देते हो इसलिये तुम्हें सड़क के किनारे जो थाने के चारो तरफ कैम्प बनाया गया है उसमे चलकर रहना पड़ेगा और हमारे मुख्यमंत्री टी.वी. पर कहते हैं कि जो लोग सरकार के साथ हैं वो सलवाजुडुम कैम्प में आ गये हैं और जो सरकार के साथ नहीं है वो अभी भी जंगलों में रह रहे हैं जब ये सलवा-जुडुम गाँव में जाता है तो ये जाकर लोगों को पकड़ने की कोशिश करता है लोग इससे बचने के लिये जंगलों की तरफ भागते हैं और इन भागते हुए लोगों पर गोली चलायी जाती है आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है बहुत सारे लोगों की हत्या कर दी गयी बहुत सारे लोगों को जेलों में ठूस दिया गया और इस तरह से लगभग ७०० गाँव जलाये गये और एक गाँव पर कोई एक बार नहीं २०-२० बार हमला किया गया लगातार इससे बचने के लिये बहुत सारे गाँव के लोगों ने अपने नौजवान लड़के लड़कियों से कहा कि जब पुलिस आये........ अब हालत ये है तो यह देखते हैं कि बार-बार अपने घरों को बनाने की कोशिश की आदिवासियों ने और फिर जला दिया जाता है फिर वो कोशिश करते हैं अपनी फसल उगाने की फिर फसलें जला दी जाती हैं फिर वो लोग पाहाड़ों में जाकर गड्ढा खोदकर अपना धान दबाते हैं छुपाते हैं फिर ये फोर्सेज जाती हैं और ढूढ़-ढूढ़ कर उनका धान जलाती हैं....... तो उन्होंने अपने लड़के लड़कियों से कहा कि तुम लोग जब पुलिस आये तो बता देना ताकि हम लोग भाग जायेंगे तो वो अपना तीर धनुष डण्डे वगैरह लेकर गाँव के बाहर पहरे देते हैं तो हमारी भारत सरकार कहती है कि देखिये इन्होंनें भारत राष्ट्र के खिलाफ हथियार उठा लिये हैं और अब हम हेलीकाप्टर में मशीन गन लगाकर हमारी जो इलिटेस्ट फोर्स है भारतीय फौज की, सबसे बेहतरीन जो कमाण्डो दस्ता है वो हम इनको मारने के लिये भेजेंगे हमने उनसे कहा कि आपने एक बार इनको मारने के लिये सलवा-जुडुम शुरू किया था तथाकथित रूप से नक्सलियों को मारने के लिये आज पुलिस की रिपोर्ट कहती है कि नक्सलियों की संख्या में सलवा-जुडुम के बाद २२ गुना का इज़ाफा हो गया है क्योंकि जब आपने गावों पर हमला किया तो बार-बार के हमलों से बचने के लिये लोग जंगलों में जब गये तो नक्सली उनके साथ आ गये और उन्होंने कहा कि ठीक है अब जब हमला होगा तो हम आपके साथ हैं तो लोगों को अब सरकार हमलावर लगती है और नक्सली बचाने वाले लगते हैं तो वो उनके नेचुरल और परिस्थितिगत दोस्त हो गये तो बहुत सारे लोग नक्सली हो गये तो हमने कहा कि आप जनता को नक्सलियों की तरफ ढकेल क्यों रहे हैं आप फिर से हमला करेंगे तो अभी जो थोड़े बहुत आदिवासी बचे हुए हैं वो पूरी तरह से नक्सली हो जायेंगे आप इअनकी संख्या में बढ़ावा हो ऐसा काम क्यों करते हैं आप कुछ ऐसा काम करिये जिससे शान्ति बढ़े और हम लोगों ने कोशिश की सुप्रीम कोर्ट गये सुप्रीम कोर्ट में ये अप्लीकेशन डाली गयी है और याविका में कहा कि साब इस तरीके से वहाँ किया गया है तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जितने भी आदिवासियों के घरों को जलाया गया है सलवा-जुडुम के द्वारा उन सबको पुनर्वासित किया जाय सबको कम्पलसेसन दिये जायें सारी एफ.आई.आर. लिखी जाय जिन पुलिस के खिलाफ हो, जिन एस.पी.ओज. के खिलाफ हो लेकिन आज तक सरकार ने एक भी आदिवासी को न तो बसाया, न कम्पलसेसन दिया न एक भी एफ.आई.आर. लिखी. हम लोगों ने जब बसाने की कोशिश की हमने ३० गाँव को करीब-करीब पुनर्वास किया तो उसमे लगातार अड़चने डाली गयी बार-बार जाकर उन गाँव में अभी भी हमला कर रहे हैं और दहसत की वज़ह से फिर से मुझे खबरें आ रही हैं कि फिर से वहाँ भगदड़ मच रही है हम लोगों ने करीब १००० के लगभग एफ.आई.आर. कराने की कोशिश की और वो एफ.आई.आर. एक की भी नहीं दर्ज की गयी हम लोगों ने एस.पी को कम्प्लेन लिखी और वो सारी कम्प्लेन बहुत सीरियस किस्म की हैं उसमे बलात्कार हैं, हत्यायें हैं, घर जलाना है, सम्पत्ति लूटना है, लेकिन भारत का जो सी.आर.पी.सी. है क्रिमिनल कोर्ट उसकी धारा १५४ कहती है कि जब एक पुलिस अधिकारी को किसी काग्नीजेबल अफेंस के बारे में सूचित किया जायेगा तो वो तुरंत एफ.आई.आर लिखेगा और उनकी जाँच शुरू करेगा लेकिन हमारा एस.पी. हाई कोर्ट में कहता है कि चूंकि ये लोग झूठी शिकायतें करते हैं इसलिये हम एफ.आई.आर. नहीं लिखते हम अपने स्तर से जाँच करते हैं और उसके बाद वो झूठी पायी जाती हैं सुप्रीम कोर्ट का इंस्ट्रेकसन है कि पुलिस इस बात का फैसला नहीं करेगी कि उसको जो शिकायत की गयी है वो सच है या झूठ ये फैसला कोर्ट करेगी लेकिन हमारे यहाँ का एस.पी. ये बात लिखकर दे रहा है कोर्ट में और खतरे की बात ये है कि कोर्ट इसको स्वीकार कर रहा है और ऐसे मामले है....अभी सिंगारा में एक काण्ड हुआ जिसमे १९ लोगों को मार डाला गया और ये कहा गया कि ये इनकाउंटर हुआ है जिसमे ४ लड़कियां थी. मेरे पास फोटो थे उसमे पहला फोटो जिस लड़की है उसकी आंतें बाहर आयी हुई हैं. हमने कहा कि जब इनकाउंटर होता है तो वो उधर से गोली मारते हैं ये इधर से गोली मारते हैं ये आंत तो बाहर तब आती है जब आप चाकू मारकर.....मुझे एक पुलिस आफिसर ने बताया कि ये तब बाहर आती है जब चाकूमारकर घुमाकर बाहर निकाला जाता है और ये बहुत ट्रेंड लोग होते हैं ये हमे ट्रेनिंग दी जाती है कि चाकू कैसे मारना है. इन्होंने पकड़ा था उनको और पकड़कर ४ लड़कियों को अलग ले गये उनके साथ रेप किया और चाकू से मारके मार डाला और बाकी को लाइन में खड़ा करके गोलियों से उड़ा दिया हम उस केस को कोर्ट में लेके गये उस केस में हम एक साल से इसलिये लड़ रहे हैं कि साहब इसकी जाँच कर लो और एफ.आई.आर. कराने का आदेश दे दो और कोर्ट एफ.आई.आर. कराने का आदेश नहीं दे रहा है वो बार-बार तारीखें टाल रहा है. आप आदिवासियों के लिये कोर्ट का दरवाजा बंद कर देंगे? पुलिस उनके लिये नहीं है सरकार उनके लिये नही है मीडिया उनके बारे में लिखता नहीं है आदिवासियों के लिये आपने क्या रास्ता छोड़ा है? कहाँ जायें वो? किसके पास जायें? और ये सब कर कौन रहा है हम लोग कई बार कहते हैं, यहाँ तक कि हमारे कम्युनिस्ट साथी कि ये जो रूलिंग क्लास है ये इसका अत्याचार है गरीब जनता पर हमने कहा अच्छा ये बताइये ये रूलिंग क्लास क्या है? चिदम्बरम? क्या चिदम्बरम रूलिंग क्लास हैं? क्या चिदम्बरम कर रहा है ये सब? कौन कर रहा है ये और ये सिर्फ बस्तर में हो रहा है ऐसा थोड़ी है अभी मैं बंगलौर गया वहाँ पर सैकड़ों एकड़ जमीन पर बुल्डोजर चला दिया गया क्योंकि वो जमीन सरकार को चाहिये आप अपने देश के लोगों की फसलों पर बुल्डोजर चला देंगे? क्योंकि वो गरीब हैं क्योंकि आपको उनकी जमीने चाहिये नर्मदा घाटी में लोंगों की जमीनों पर बुल्डोजर चला दिया गया जब वहाँ पर खेती करके फसल उगाने की कोशिश की गयी तो. उनके लिये कोर्ट बंद, सरकार उनकी नहीं, पुलिस नहीं तब वो क्या करेंगे इस घोर विवशता की स्थिति में आप सोचिये कि आप हों तो आप क्या करेंगे. हम लोग आपस में ये समझने की कोशिश करते हैं कि ये किसके लिये किया जा रहा है कौन कर रहा है? तो हम लोग एक शब्द प्रयोग करते हैं कि रूलिंग क्लास, तो रूलिंग क्लास कौन है चिदम्बरम...मनमोहन सिंह या फिर पार्लियामेंट भी है रूलिंग क्लास में मुख्यमंत्री भी कार्पोरेट भी मल्टिनेशनल कम्पनियां फिर उसमे काम करने वाले लोग फिर सप्लायर, बैंकर, ट्रांसपोर्टर उनके कन्ज्यूमर यानि हम सब मतलब कि हम सब मिलकर रूलिंग क्लास बनते हैं और हमारे लिये इन आदिवासियों को मारा जाता है हम जो मिडिल क्लास हैं हमारी लिविंग स्टैंडर्ड को मेनटेन रखने के लिये क्योंकि हम ही सरकार हैं जब हम कहते हैं कि सरकार ये कर रही है तो हम जो मिडिल क्लास हैं हमारे लिये इनके ऊपर हमला किया जाता है इसको थोड़ा और समझने की कोशिश करेंगे एक शब्द है एक्सट्रक्चरल वाइलेंस तंत्रगत हिंसा ये क्या है दुनिया के जितने भी संसाधन हैं ये किसके हैं जमीने पानी हवा किसकी है इसका मालिक कौन हैं अगर प्राकृतिक दृष्टिकोण से देखे तो जितने भी लोग इस दुनिया में हैं ये सबकी है किसकी कितनी है यदि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत से देखें तो सबकी बराबर है यानि सबकी बराबर होनी चाहिये लेकिन बराबर है क्या आज के समाज में यह बराबर नहीं है हम तय करते हैं चूंकि मैं एम.ए. पास हूं इसलिये मेरे पास ज्यादा होगा तुम चूंकि बिना पढ़े लिखे हो इसलिये तुम्हारे पास कम होगा मैं बड़ी जाति का हूँ इसलिये मेरे पास ज्यादा जमीन होगी तुम छोटी जाति के हो इसलिये तुम्हारे पास कम होगी मैं बड़े शहर में रहता हूँ इसलिये मेरे पास ज्यादा सम्पत्ति होगी तुम दांतेवाड़ा में रहते हो इसलिये तुम्हारे पास कम होगी और हम इन सारी चीजों को स्वीकार करते हैं ये हमारे वैल्यू सिस्टम का पार्ट हो गया है ये ठीक लगने लगा है और ठीक लगता लगता है यानि मेरा अमीर होना भी ठीक है उसका गरीब होना भी ठीक है ये भी ठीक वो भी ठीक और हमारे इस वैल्यू सिस्टम को एंडोर करता है हमारा पोल्टिकल सिस्टम. ठीक है हमारे सम्पत्ति की रक्षा राज्य करेगा पुलिस आपके अमीरी की रक्षा करेगी गरीब आदमी आपकी सम्पत्ति नहीं छू सकता किसी समान वितरण की बात अब नहीं उठायी जायेगी आपके पिता जी ने जितनी सम्पत्ति आपके लिये छोड़ी है उसकी रक्षा अब पुलिस करेगी तो हम लोगों को तो ठीक लग रहा है क्योंकि हम तो मजे में हैं हमको तो मिल गया है लेकिन जो इस संरचना के बाहर है और जिसकी जमीनों पर बुल्डोजर चलवाया जा रहा है जिसके गाँव जलाये जा रहे हैं यही स्ट्रक्चरल वायलेंस है कि आप गरीब को गरीब रखते हैं और अमीर अमीर होता है. चूंकि हम सब इसके लाभार्थी हैं इसलिये हम इसके खिलाफ नहीं है लेकिन जो इस हिंसा को झेल रहा है जो दिन भर मेहनत करने के बाद भूखा सोता है जिसकी जमीन पर बुल्डोजर चलाया जा रहा है जिसके गाँव को जलाया जा रहा है मल्टीनेशनल और बड़े-बड़े कार्पोरेशन के लिये और हमारे लिये वि इस स्ट्रक्चरल वायलेंस के खिलाफ़ लड़ रहा है वो पूरे सट्रक्चर के खिलाफ खड़ा है वो इस गैरबराबरी-गैरवितरण को स्वीकार नहीं कर रह है वो आपके स्ट्रक्चर को चैलेंज कर रहा है वो आपके वैल्यू सिस्टम, आपके पोलिटिकल सिस्टम को चेलेंज कर रहा है और इकोनामिक सिस्टम को भी चेलेंज कर रहा है और लड़ रहा है और हम फिर नैतिकता पर प्रश्न ऊठाने लगते हैं कि वो वायलेंस कर रहा है. उसकी वायलेंस हमे दिखती है हमारी वायलेंस हमे दिखती नहीं है जो बहुत छिपी हुई है और लम्बे समय से परंपरा और मूल्यों के खोल में चली आ रही है. जिसे हम संस्कृति का नाम दे दिये हैं इस संस्कृति के नाम पर राष्ट्र के नाम पर हम उसे मारते हैं और कैसे मारते हैं उसको गरीबी में मारते हैं भुखमरी में मारते हैं उसको भूख से मारते हैं वो मरता जा रहा है दिनों-दिन उसे हाशिये पर ढकेला जा रहा है ये जो हाशिये पर ढकेले जाने की प्रक्रिया है यह बहुत साफ हो गयी है. चूंकि विज्ञान की तरक्कीयों के कारण कम्युनिकेशन की प्रक्रिया तेज हो गयी है और ये सारे संघरष एक दिन में हमको दिख जाते हैं पूरे देश में जहाँ-जहाँ संघर्ष हो रहे हैं वो हमको साफ दिख रहा है. तो हाशिये पर ढकेल दिये गये लोगों के संघर्षों को.......अच्छा हमारी एक पत्रकार मित्र हैं कहने लगी कि यू.पी. में भी तो गरीब हैं वहाँ तो नक्सलवादी नहीं है हमने कहा कि तीन तरह के गरीब समाज में हैं पहली तरह के गरीब वो हैं जो आपकी अमीरी से खुश हैं. यानि व जो आपके यहाँ कपड़े साफ करते हैं, जो गुब्बारे बेंचते हैं वे कहते हैं कि साब आप लोग अमीर हैं तो हमारा भी पेट पलता है. दूसरी तरह के गरीब वो हैं जो मानते हैं कि हमारी किस्मत में ही गरीबी लिखि है, हम छोटी जाती के हैं, हम कम पढ़े लिखे है इसलिये वे अपनी गरीबी से समझौता करके बैठे हैं. तीसरी तरह के गरीब वो है जो जंगलों में रहता था आपसे कुछ नहीं माग रहा था आप अपनी अमीरी को बरकरार रखने के लिये जाकर के उस पर हमला किया है अब वो लड़ता बढ़्ता चला आ रहा है मुश्किल ये हो गयी कि इनके साथ कुछ पोल्टिकल आइडियोलाजी के लोग भी जुड़ गये हैं वे उससे कह रहे हैं कि अब तुम पलट के वार करो लड़ो ये लड़ाई है और ये तुम्हें सत्ता तक पहुंचायेगी अब मुश्किल जो आने वाली है वो ये कि बाकी के जो दो तरह के गरीब हैं अगर इनके साथ मिल गये तो समस्या बहुत बड़ी हो जायेगी हमारा जो वर्ग है उसी तरह से उनका भी है फिर ऐसी स्थिति में या तो वर्ग संघर्ष होगा या वर्ग समन्वय हो सकता है जो गाँधी की लाइन है वो तब हो सकता है जब हम समझे इसको और स्वीकार करें कि हां ये हमारे लिये मारे जा रहे हैं और हम इस पोल्टिकल स्ट्रक्चर के एक्सप्लायटेशन को नकारते हैं और हम उनके ऊपर होने वाले हमलों के खिलाफ़ हैं या तो हम अपने वर्ग को छोड़ करके उस वर्ग में मिल जायें और कहें कि हम इनके साथ खड़े हैं जिनके ऊपर हमला हो रहा है और अगर नहीं समझे तो विनोवा ने कहा था कि तीन रास्ते हैं भाई समाज में ये जो चल रहा है संघर्ष या वयलेंस इसको मिटाने का पहला तरीका है कानून का यानि कानून से गैरबराबरी को मिटा दो दूसरा तरीका है करुणा का यानि कम्पेसन जिससे लोग समझ जाय कि ये नहीं चल सकता दुनिया सबकी है और सबकी बराबर है और इसमे सबको जीने का बराबरी का अधिकार है कोई किसी को छीन कर नहीं जियेगा कोई किसी को मारकर नहीं जियेगा और तीसरा रास्ता है कत्ल का यानि कानून, करुणा और कत्ल. फिर जब आप उनको समझेंगे नहीं उन पर हमले करेंगे, उनका शोषण करेंगे तो हिंसा होगी और उसको कोई नहीं टाल सकता और अब तो हम हमला कर रहे हैं हमने सोच लिया है कि हमारी जो क्लास है हम इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं हम अपनी अमीरी को नहीं छोड़ेंगे और विकास के नाम पर ये सब करेंगे हम अंधाधुंध मायनिंग भी करेंगे और अंधाधुंध विकास भी करेंगे हम इसी माडल को रखेंगे. एक सर्वे ये कहता है कि ये जो हमारा इकोनामिक ग्रोथ का माडल है इसमे सिर्फ ४०% लोग एकमोडेट हो सकते हैं बाकी के ६०% लोग नहीं हो सकते आपको ये प्रक्रियायें अपनानी पड़ेगी इस गैरबराबरी के जीवन को जीने के लिये. सबके लिये इस तरह का जीवन जीने का संसाधन है ही नहीं तो आपको विकास के एक दूसरे माडल के बारे में सोचना पड़ेगा और अभी सोचना पड़ेगा और उसे लागू करवाना पड़ेगा हम लोग जो मजे में हैं हम बहुत थोड़े हैं वो ज्यादा हैं वो करोड़ों है जिनको हम मारने की कोशिश कर रहे हैं यानि आप अपनी उच्चतम स्थिति तक जाने के बाद ६०% को मारना पड़ेगा और जब आप इन्हें मारेंगे तो वो आसानी से मर जायेंगे? चुपचाप मर जायेंगे? वो रेजिस्ट नहीं करेंगे? वो लड़ेंगे और विनोवा कहते थे कि अब आने वाले समय में अगर लड़ाई हुई तो जीत हार नहीं होगी अब तो सर्वनाश होगा देखिये हम लोग प्रकृति की बहुत कमजोर कड़ी हैं मनुष्य किसी एक ग़लती से खत्म हो सकते हैं. कल्पना कीजिये अगर ये वंचित किये गये शोशित तबके की बात नहीं सुने और इसी तरह से आगे बढ़्ते गये और किसी सिरफिरे के हाथ में परमाणु हथियार आ गया तो क्या होगा. वायलेंस जो आज के जमाने में डेवलपमेंट का एक अनिवार्य अंग बन गयी है इससे हमे निज़ात पानी पड़ेगी सारी दुनिया इससे चिंतित है लेकिन रूट तक हम पहुंच नहीं पा रहे हैं आप मीडिया से जुड़े हुए लोग हैं आप भी एक क्लास का प्रजेंटेशन ही करते हैं हमसे बहुत से लोग कहते हैं कि ये बात मीडिया में क्यों नहीं आयी हम कहते हैं कि ये तो मीडिया वालों से पूछो. चूंकि वो आदिवासियों की मीडिया नहीं है वहाँ तो राही सावंत, रविशंकर, बाबा रामदेव हैं और नौजवान तबके के लिये गुलाबी पर्दे लगा दिये गये जैसे बहुत खूबसूरत हो दुनिया हिंदुस्तान के करोड़ों लोग किस हालत में हैं और किस तरह से संघर्ष कर रहे हैं वो तो नौजवान पीढ़ी को देखने ही नहीं दिया जा रहा है वो हमेशा आपको मूल प्रश्नों से हटाने की कोशिश कर रहे हैं. तो समस्या दूर नहीं है, अलग नहीं है दुनिया दो नहीं है एक ही है जुड़ी हुई है अगर दुनिया में कुछ होगा तो असर हम पर पड़ेगा अगर हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री कह रहा है कि नक्सलवाद सबसे बड़ी समस्या है तो हमको पूछना चाहिये कि ये समस्या पैदा क्यों हुई क्योंकि अगर आपको समस्या को हल करना है तो उसे आपको समझना होगा यदि नहीं समझते और उस पर कुछ कार्यवाही करेंगे तो हल के बजाय आप उसको बिगाड़ देंगे, आप हल नहीं कर पायेंगे और यही हुआ है अभी एक बार गलत तरीके से हल करने की कोशिश की तो उसे २२ गुना बड़ा दिया अब ये दुबार कत्ल की कोशिश कर रहे हैं लाखों लोगों को उस तरफ ढकेल रहे हैं और इससे ये सामाजिक हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं इसलिये हम जो देश में सोचने वाले लोग हैं वो समझें, संघर्ष के कारणों को समझे, संघर्ष की परिस्थितियों को समझें संघर्ष में जो लोग पीड़ा में हैं उनको समझें और जाकर उनके साथ खड़े हो जाय कि हम इनको ऐसे नहीं मारने देंगे इनकी बात जायज है ये इन जमीनों के मूल निवासी हैं ये जमीने इनकी हैं आप इन्हें ऐसे कैसे मार सकते हैं आखिर जमीन लेने का एक कानून है एक तरीका है मैने वहाँ के डी.जी.पी. से बात की छत्तीसगढ़ के मैने कहा आप किसकी रक्षा कर रहे हैं आपको तो भारत के संविधान की रक्षा करनी है आपकी नियुक्ति भारत के संविधान ने की है और भारत का संविधान कहता है कि अगर आपको आदिवासियों की जमीन चाहिये तो जो नियम है.

नियम न. १ आपको गाँव के ग्राम सभा की अनुमति लेनी होगी

नियम न.२ आपको एक आदर्श पुनर्वास नीति बनानी होगी और इसके लिये पूरा गाँव बैठता है और तय करता है कि किसके पास कितनी जमीन है और जमीन के बदले में किसको कितनी जमीन दी जायेगी. इसका लड़का कितना पढ़ा है उस मुताबिक उसको उद्योग में नौकरी दी जायेगी. कुआं है उसके बदले रूपया दिया जायेगा. इस तरीके से प्रत्येक परिवार की एक आदर्श पुनर्वास नीति बनेगी वो बुक बनेगी और बुक को विधान सभा अंगीकृत करेगी और पहले पुनर्वास किया जायेगा इसके बाद माइनिंग शुरू करेंगे होता क्या है ? धुरली गाँव में जिस दिन वहाँ एस्सार के लिये ग्राम सभा की गयी पूरे गाँव के २० कि.मी. तक पुलिस की घेरा बंदी लगा दी गयी कोई अंदर नहीं जायेगा लोगों को जबरन गर्दन पकड़ कर ग्राम सभा में ले जाया गया और ग्राम सभा क्या थी एक कमरे में एस.पी. साहब कलेक्टर साहब और प्रतिपक्ष के नेता महेन्द्रकर्मा बैठे थे और तीनों बैठे थे सामने रजिस्टर रखा था और उसमे लिखा था कि मैं अपनी जमीन स्वेक्षा से देने के लिये सहमत हूं और इस पर अंगूठा लगाओ और इधर से निकलो ये ग्राम सभा थी उस दिन तक वहाँ नक्सलाइट नहीं थे और अगले दिन से आ गये. करिये आप लीजिये जबरदस्ती जमीनें और आज तक एस्सार की हिम्मत नहीं हुई की खोल दे प्लांट क्योंकि वहाँ नक्सलाइट आ गये. आप ऐसे ही मार डालेंगे आप गर्दने पकड़ कर ग्राम सभा करायेंगे और आप समझते हैं वो कुछ नहीं करेंगे इसमे से शान्ति निकलेगी वो हाथ जोड़कर खड़ा हो जायेगा कि आइये साहब मुझे मारिये और मेरी जमीन ले जाइये मेरा घर जला दीजिये वो लड़ेगा मुझसे कई बार लोग कहते हैं आप जस्टिफाइ कर रहे हैं वायलेंस को मैंने कहा मैं स्थितियों को बता रहा हूं तुम मेरे मुंह में मिट्टि भर दो बिनायक सेन को जेल में डाल दो क्योंकि वि सलवा-जुडुम को ऊजागर करते हैं मेरा आश्रम तोड़ देते हो क्योंकि मैं कहता हूँ गाँवों को मत जलाइये. तुम कहते हो यह डेमोक्रेसी है गाँव जालाओगे, घर जलाओगे, लिखने नहीं दोगे और कहोगे कि डेमोक्रेसी है. ऐसी डेमोक्रेसी को जनता नहीं रखेगी आज आप देखिये कि संघर्ष हो किसके बीच रहा है पुलिस बनाम जनता जनता क्यों लड़ रही है इस तंत्र के खिलाफ़. हम कभी सोचते नहीं थे कि राजशाही जायेगी लेकिन चली गयी. ये तंत्र अगर जनता की नहीं सुनेगा जनता इसे नहीं रहने देगी ये जनतंत्र खतरे में है ये जो तथाकथित जनतंत्र है इसे बचाना है तो बचा लिजिये. मै तो कमेंटेटर हूँ और आप कमेंटेटर पर गुस्सा कर रहे हैं. तुम्हारी टीम ग़लत खेल रही है तो हारेगी ही. मैं तो बता रहा हूँ आज बस्तर में क्या हो रहा है आदिवासी सरकार को दुश्मन और नक्सलियों को दोस्त मान रहे हैं.

रोम बहुत विकसित सभ्यता थी लेकिन गुलामों के ऊपर टिकी हुई थी एक दिन उन्हीं गुलामों ने इस पर हमला करके इसे नष्ट कर दिया अब आप कहें कि आप रोमन साम्राज्य के पतन की बातें मत बताइये. वहाँ तो गुलाम प्रथा थी वहाँ भी लोकतंत्र था लेकिन गुलामों को वोट डालने की आज़ादी नहीं थी और आज हम वोट खरीद लेते हैं. गाँधी ने दो बातें कही थी कि तुम्हारी ये सभ्यता दो चीजों को जन्म देगी एक पर्यावरण विनाश को दूसरे युद्ध को.

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  1. 1 टिप्पणियां: Responses to “ आदिवासी सरकार को दुश्मन और नक्सलियों को दोस्त मान रहे हैं ”

  2. By शरद कोकास on December 9, 2009 at 10:07 AM

    बहुत सही विश्लेषण है यह , रियाज़ भाई ।

सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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