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बीच सफ़हे की लड़ाई

बाबरी मस्जिद की राजनीति

Posted by Reyaz-ul-haque on 12/10/2009 05:00:00 PM

कुलदीप नैयर

'मन्दिर बनने दें'। बाबरी ध्वंस के एक दिन बाद जब मैने अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी तो उन्होंने यह टिप्पणी की थी। उनकी टिप्पणी से मुझे आर्श्चय हुआ था क्योंकि मैं उन्हें भारतीय जनता पार्टी की एक उदारवादी ताकत समझता था। फिर भी मैने उनकी इस टिप्पणी को ज्यादा महत्व नहीं दिया। अब जबकि ध्वंस पर गठित एक सदस्यीय जांच आयोग ने जिसके प्रमुख मनमोहन सिंह लिब्रहान थे मस्जिद को गिराने में सहयोग करने वालों में वाजपेयी के नाम का भी उल्लेख किया है तो उनकी उपरोक्त टिप्पणी कानो में अनुगुंजित हो उठी है। जब वह मस्जिद विध्वंस की सतर्कता सहित तैयार योजना में एक पक्ष थे तो उनकी प्रतिक्रिया अलग हो भी सकती थी।
भाजपा के अन्य दो नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सह-षडयंत्रकारी थे यह तो  6 दिसम्बर, 1992 को ही विदित हो गया था। मेरे लिए आश्चर्यचकित करने वाला नाम तो वाजपेयी का है। यदि मैने वाजपेयी के भाषण की एक क्लिप नही देखी होती तो मैं उनके प्रति उदार हो सकता था। एक टेलीविजन नेटवर्क ने इसे उसी दिन दिखाया था, जिस दिन दिल्ली के अखवार में लीक हुई रिपोर्ट प्रकाशित की थी। वाजपेयी ने 5 दिसम्बर को अर्थात् ढांचा ढहाए जाने से एक दिन पूर्व लखनऊ  में कहा था कि उस स्थान पर भूमि समतल होगी और वहां एक यज्ञ आयोजित होगा।
आयोग ने कहा है कि मस्जिद का विध्वंस रोका जा सकता था। आडवाणी ऐसा कर सकते थे। किंतु वे सभी ''छद्म उदारवादी'' जैसा कि आयोग ने उन्हें बताया है, जानते थे कि क्या हो रहा है और जो गलत काम हो रहा था, उसमें वे अनभिज्ञ नहीं थे।
इस अभ्यारोपण ने हमारी राज्य व्यवस्था को उद्धाटित कर दिया है, क्योंकि तीनो ही ने देश में शीर्ष पद प्राप्त किए। वाजपेयी प्रधानमंत्री हो गए थे और आडवाणी गृह मंत्री एवम् जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री। यदि ये तीनों ही बाबरी मस्जिद के विध्वंस में सहयोगी थे तो पद की शपथ ग्रहण करने में वे इमानदार नहीं थे, जिसमें शपथ ग्रहण करने वाले से यह उपेक्षा की जाती है कि वह देश की एकता और संविधान की गरिमा को बनाए रखेगा जिसकी प्रस्तावना में सेक्युलर का उल्लेख है। लिब्रहान आयोग ने कहा है कि वे उन 68 में शामिल थे जो देश को सांम्प्रदायिकता की ओर धकेलने के लिए जिम्मेदार थे। इतना ही तीनों नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के कि यथावत स्थिति से छेडछाड नहीं की जाएगी विरुध्द कार्य किया। दूसरे शब्दों में  यह कि उन्हाेंने देश की न्यायपालिका और संविधान का भी उपहास उडाया जिसके प्रति सत्ता ग्रहण करते समय उन्होंने अपनी निष्ठा व्यक्त की थी और उन्होंने अपनी आत्मा पर तनिक भी भार महसूस किए बिना छह वर्ष तक शासन किया। प्रश्न मात्र कानून का ही नहीं अपितु नैतिक और राजनीतिक भी है। वाजपेयी, आडवाणी और जाशी के पद पर रहते हुए भी सुनियोजित विध्वंस कैसे हो गया? यह एक ऐसा मामला है जिस पर कम से कम भविष्य के लिए एक जवाब तलाशने हेतु तो बहस होनी ही चाहिए। जिनके हाथ स्वच्छ नहीं है, उन्हें संसद के मंदिर को अपवित्र करने की तो अनुमती नहीं ही दी जानी चाहिए। और यदि वे ऐसा करते हैं तो फिर इस स्थिति में क्या होनी चाहिए जबकि तथ्य प्रकाश में आ गए हों? सच है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में विजयी होकर सत्ता में आई थी। यदि 1999 से पहले जबकि भाजपा ने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था, आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी होती तो क्या पार्टी इतनी अधिक सीटों पर विजयी हो सकती थी? यह तो सोचा भी नहीं जासकता कि आयोग यह कहेगा कि केन्द्र तब तक उत्तर प्रदेश के मामलों मे हस्तक्षेप नही कर सकता था, जब तक कि राज्य के राज्यपाल ऐसा करने को नहीं कहते। यह एक अन्यत्रता सी ही है। मेरा अनुभव यह है कि राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव की इच्छा के अनरूप ही तो पेश करनी थी, जिन्हे वह व्यक्तिगत तौर पर भी जानते थे, क्योंकि दोनो ही तो आन्ध्र प्रदेश के ही थे। यों भी तो संविधान की रक्षा का दायित्व कुल मिलाकर केन्द्र का ही है। विध्वंस होने के पूर्व ही राव आसानी से कार्रवाई कर सकते थे। राष्ट्रपति शासन लागू करने की उद्धोषणा तो एक पखवाड़ा पहले से ही तैयार थी, उसके लिए केबिनेट की मंजूरी की ही प्रतिक्षा थी। प्रधानमंत्री ने बैठक ही आयोजित नहीं की। इससे उनकी मौन सहमति का ही तात्पर्य अभिव्यक्त होता है।  हालांकि राव ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि पार्टी के लोगों केदवाब ने उन्हें समय पर कार्रवाई नहीं करने दी। जब विध्वंस शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री कार्यालय पर बार-बार कॉल की जा रही थी। यही बताया जाता रहा था कि वह पूजा मे व्यस्त हैं, और जब तक विध्वंस पूरा नहीं हो गया, यही जवाब दिया जाता रहा। कोई इससे क्या तात्पर्य लेगा?
यदि कांग्रेस राव के विरुध्द आरोप से इनकार भी करती है तो भी पार्टी को यह तो स्पष्ट करना ही चाहिए कि रात ही रात में वहां छोटा सा मंदिर कैसे उस स्थान पर बन गया जहां कुछ घंटो पूर्व बाबरी मस्जिद खडी थी। उस समय तो पूर्ण नियन्त्रण केन्द्र के हाथ में था, क्योंकि उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार को बर्खास्त करने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया था। जो भी राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद राज्य की सीमाओं से आगे बढ़ चुका था और केन्द्र वहां की घटनाओं पर हर दिन निगाह रख रहा था। राव के व्यवहार पर आयोग के मौन से तात्पर्य उनकी और कांग्रेस पार्टी की भी साठगांठ को ढके रखने से ही लिया जा सकता है।
न्यायमूर्ति लिब्रहान ने अपनी 900 पृष्ठों की रिपोर्ट में जिस बात की व्यख्या नहीं की, वह है उसकी नियुक्ति और रिपोर्ट को पेश करने के बीच सत्रह वर्ष की अवधि का लगना। हालांकि उन्होंने इस विलम्ब के लिए आयोग के सलाहकार को दोष दिया है, फिर भी यह समझ पाना कठिन है कि जांच मे इतना समय क्यों लगा। आयोग पर आठ करोड़ रुपये खर्च हुए और लोगो ने ऐसी टिप्पणी भी की कि वे अपने काम को लम्बा करते रहें। मुझे आशा थी कि कार्रवाई रिपोर्ट (ए टी आर) संक्षिप्त और सार्थक होगा किंतु यह अत्यधिक आम और अस्पष्ट है। और इससे भी आघात लगा है कि सरकार कहे कि किसी के विरुध्द भी दाण्डिक कार्रवाई नहीं होगी। कुछ दोषी खुल कर कह रहे हैं कि उन्होंने जो कुछ किया उन्हें उस पर तनिक भी मलाल नही है। यह त्रासद ही होगा कि जिन्होने मस्जिद गिराई है वे पूर्णत: छुट जाएं। वे उन दो हजार लोगों की हत्या के लिए भी जिम्मेदार हैं जो मस्जिद के विध्वंस के बाद मारे गए थे।
सांम्प्रदायिक वैमनस्य का खतरा किसी न किसी रूप में राष्ट्र के समक्ष उपस्थित है। लिब्रहान आयोग ने सही तौर पर ही इसे रेखांकित किया है। जो लोग बहुलवादी समाज के पक्षधर हैं और जो हिन्दुत्व से अनुप्रेरित हैं, बीच बुनियादी अंतर है। भाजपा अथवा यों कहिए कि उसके मतदाता रा. स्व. संघ की विचारधारा स्पष्ट है। किंतु जो लोग विध्वंस पर राजनीति खेल रहे हैं, वे देश का अत्यधिक अहित कर रहे हैं। रिपोर्ट कुछ माह पूर्व से गृह मंत्रालय में थी और उसके स्कूप की प्रतीक्षा थी। ऐसा करने का पत्रकारों का विशेषाधिकार है। जिन लोगों लोगाें ने मस्जिद ढहाई थी उनलोगों को इस षडयंत्र के लिए कैसे दंडित किया जाए, इस बारे में चर्चा करने के बजाए, राजनीतिक दलों ने इस रिपोर्ट के प्रकाशन को मुद्दा क्यों बना लिया? उल्लेखनीय बात यह भी है कि सभी सेक्युलर दल, जब रिपोर्ट के लीक होने का मामला उठा तो भाजपा के बचाव पर उतर आए। इस विशेषाधिकार का मुद्दा भी बनाना चाहा गया है। यह भी वास्तविक समस्या को टालने का एक तरीका है।

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  1. 2 टिप्पणियां: Responses to “ बाबरी मस्जिद की राजनीति ”

  2. By उम्दा सोच on December 11, 2009 at 1:50 PM

    बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो
    बुल्लेशाह वे कहता
    पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो
    इस दिल में दिलबर (रब) रहता है !

  3. By “लीक से हट कर” on January 10, 2010 at 3:35 PM

    6 दिसम्बर आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास का एक ऐसा दिन, जिसे पूरी दुनिया कभी भूला न सकेगी। हिन्दुस्तान के धर्म-निरपेक्ष छवि पर एक ऐसा बदनुमा दाग, जिसे सदियों तक मिटाया न जा सकेगा। अनेकता में एकता और गर्व से कही जाने वाली गंगा-जमुनी संस्कृति के चार सौ वर्ष पुराने धरोहर को दिन-दहाड़े ढ़ा दिया गया। एक पवित्र इबादतगाह को शहीद कर दिया गया। एक पूरी क़ौम रोती रही, कराहती रही, और हृदय रखने वाली इंसानियत तड़पती रही।

    बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना को 17 वर्ष बीत गए हैं, और यह दिन संगठनों व राजनेताओं के लिए विरोध-प्रदर्शन, धरना, जलसा-जुलूस का दिन बन कर रह गया। इस तरह इन्हें हर साल अपनी टोपी-शिरवानी की गर्द झाड़ने और अपनी भाषणबाज़ी का ज़ौहर दिखाने का मौका मिलने लगा।

    आलम तो यह है कि लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। इस रिपोर्ट को लाने में लिब्राहन साहब को 17 वर्ष लग गए। इसमें देश की जनता का अथाह धन बर्बाद हुआ। लोकसभा- राज्यसभा में बहस भी पूरी हो गई। दिल्ली विधानसभा में तो मार-पीट तक की नौबत आ गई। पर नतीजा हुआ ढ़ाक के तीन पात।

    खैर मामला अभी अदालत में है। लेकिन अब आपको तय करना है कि इस पूरे विवाद का क्या हल है...? इसके वजहों से दो भाईयो, दो धर्मों के बीच जो दूरियां बढ़ी हैं, उसे कैसे पाटा जाए... ? कैसे खत्म किया जाए...?

    आपके विचारों का स्वागत है। इससे जुड़ी आपकी यादें भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। आपके इन विचारों व यादों को हम अपने ब्लॉग http://leaksehatkar.blogspot.com के माध्यम से और फिर इसे पुस्तक की शक़्ल दे कर देश के भावी नागरिकों तक पहुंचाएंगे। तो फिर देर किस बात की। हमें जल्द से जल्द ई-मेल करें---- leaksehatkar@gmail.com पर।

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सुनिए : ऐ भगत सिंह तू जिंदा है/कबीर कला मंच


बीच सफ़हे की लड़ाई


“मुझे अक्सर गलत समझा गया है। इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। लेकिन मैं इस देश के लोगों को यह भी साफ़ साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मेरी एक और निष्ठा भी है जिस के लिए मैं प्रतिबद्ध हूँ। यह निष्ठा है अस्पृश्य समुदाय के प्रति जिसमे मैंने जन्म लिया है। ...जब कभी देश के हित और अस्पृश्यों के हित के बीच टकराव होगा तो मैं अस्पृश्यों के हित को तरजीह दूंगा। अगर कोई “आततायी बहुमत” देश के नाम पर बोलता है तो मैं उसका समर्थन नहीं करूँगा। मैं किसी पार्टी का समर्थन सिर्फ इसी लिए नहीं करूँगा कि वह पार्टी देश के नाम पर बोल रही है। ...सब मेरी भूमिका को समझ लें। मेरे अपने हित और देश के हित के साथ टकराव होगा तो मैं देश के हित को तरजीह दूंगा, लेकिन अगर देश के हित और दलित वर्गों के हित के साथ टकराव होगा तो मैं दलितों के हित को तरजीह दूंगा।”-बाबासाहेब आंबेडकर


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